मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

ग़ैर-ईमानदारी का वर्गीकरण : संदर्भ ट्रंप और मोदी


-अरुण माहेश्वरी


भाषाशास्त्री जॉन्सन के नाम के 'इकोनॉमिस्ट' के ताज़ा (18-24 फ़रवरी 2017 के) अंक के स्तंभ में इस बार 'गैर-ईमानदारी का वर्गीकरण' शीर्षक से ट्रंप की अनर्गल और मिथ्या बातों को पत्रकारों को किस प्रकार लेना चाहिए, उसके बारे में लिखा है ।

स्तंभ में लिखा गया है कि डोनाल्ड ट्रंप के बारे में कहा जाता है कि वे कुछ भी बोले और उसमें साफ तौर पर कुछ असत्य बातें न हो, यह मुमकिन नहीं है । 'न्यूयार्क टाइम्स' उसे 'कुटी' कहता है । ट्रंप ने जब कहा कि तीस लाख लोगों ने ग़ैर-क़ानूनी ढंग से मतदान किया है तो 'टाइम्स' ने इस पर तीखी टिप्पणी की - 'ट्रंप ने सिनेटरों के सामने आम लोगों के मतदान के बारे में झूठ की रट लगाई ।' अमेरिकी मीडिया में अभी ट्रंप की बातों के बारे में झूठ, मिथ्या, असत्य की तरह के शब्द बार-बार दोहराये जा रहे हैं ।

इसी पर स्तंभ में लिखा गया है कि "मिथ्या और झूठ के बीच फर्क होता है । आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनेरी में कहा गया है कि झूठ वह मिथ्या बयान है जो किसी को धोखा देने के लिये कहा जाता है । मिथ्या असत्य बात को कहते है । झूठ का मतलब है जानबूझकर कर धोखाधड़ी के लिये कही गई असत्य बात । अर्थात, आप जानते है कि जो कह रहे हैं, वह असत्य है, फिर भी सामने वालों को बेवक़ूफ़ बनाने के लिये कहते जा रहे हैं ।"

स्तंभ में सवाल उठाया गया है कि "कोई ट्रंप के अंदर की बात को कितना जान सकता है ? राष्ट्रपति को अपनी पीठ थपथपाने से कौन रोक सकता है ? कुछ लोग उन्हें आत्म-मुग्धता का शिकार भी कहते हैं ।" जॉन्सन कहते हैं कि "कोई भी दूर से ट्रंप की मनोदशा के बारे में तो कुछ नहीं कह सकता है । लेकिन ऐसा लगता है कि पत्रकार झूठ शब्द का इस्तेमाल बहुत धड़ल्ले से, मिथ्या और झूठ के बीच के सूक्ष्म अंतर को बिना समझे कर रहे हैं ।"

इसी में आगे स्तंभ में  तथ्यपरक क्रिया पदों के प्रयोग का प्रसंग उठाते हुए कहा गया है कि इनका प्रयोग तभी किया जा सकता है जब जिस सूचना के बारे में बात की जा रही है, वह सत्य हो । अगर कोरा मज़ाक़ न करना हो तो कोई यह नहीं कह सकता है कि उसने यह मान लिया है कि चाँद सोरे से बना हुआ है ; या उसे पता चला है कि संयुक्त राष्ट्र पीने के पानी में ज़हर मिलाता है ।

झूठ के बारे में वे लिखते हैं कि झूठ एक ख़ास प्रकार की ग़ैर-तथ्यात्मक क्रिया है । इसमें दी जाने वाली सूचना सिर्फ ग़लत नहीं होती है, बल्कि उसके साथ यह जानकारी भी निहित होती है कि वह बात कहने वाला आदमी जानता है कि वह असत्य बोल रहा है । आदमी अपने झूठे विश्वास के कारण भी झूठ बोलता चला जाता है ।

स्तंभ में लिखा गया है कि सरासर झूठ बोलने वाला आदमी अक्सर अपनी झूठ के पीछे कुछ सुराग़ छोड़ जाता है । मसलन, ट्रंप के सुरक्षा सलाहकार माइकल फ़्लिन ने  कई ईमेल छोड़ दिये थे जिनसे प्रमाणित हो गया कि उसने रूस के राजदूत से अमेरिकी पाबंदियों के सिलसिले में चर्चा की थी, जबकि उसने कहा था कि उसने ऐसी कोई बात नहीं की । इसकी तुलना में, सचाई के बिल्कुल विपरीत, ट्रंप का यह कहना कि ओबामा के काल में हत्या की दर दुगुना हो गई थी, उसका एक कोरा भ्रम हो सकता है, जो कुछ ख़ास प्रकार की वेब साइट्स पर उसके अतिरिक्त भरोसे के कारण पैदा हुआ हो ।

स्तंभ में लिखा गया है कि यह भी मुमकिन है कि ट्रंप को किसी भी बात के झूठ-सच की कोई परवाह नहीं है । वे अनर्गल ढंग से जो मन में आता है बोलते जाते हैं ।


स्तंभ की राय में राष्ट्रपति की ऐसी बातों को झूठ के बजाय कोरी बकवास (bullshit) कहना चाहिए । "ट्रंप की झूठी बात को रंगे हाथ पकड़ लेने पर प्रेस उसके बारे में बिलकुल सही शब्द का प्रयोग करें तो वह ज्यादा प्रभावशाली होगा । संवाददाता धीरज रख सकते हैं और बिल्कुल सटीक रह सकते हैं । राष्ट्रपति का कार्यकाल अभी सयाना नहीं हुआ है ।"


इकोनोमिस्ट के स्तंभ की इस पूरी चर्चा को कुछ हद तक हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी पर भी लागू करके देखा जा सकता है । इसमें एक बड़ा फर्क यह जरूर है कि मोदी जी का कार्यकाल अब अपनी आधी उम्र पार कर अपने उत्तरार्द्ध में प्रवेश कर चुका है और इस दौरान उन्होंने पूरी बेपरवाही के साथ ग़लत तथ्यों और मिथ्या अवधारणाओं के आधार पर नोटबंदी की तरह का एक ऐसा जघन्य काम कर दिया है जो देश की पूरी अर्थ-व्यवस्था पर प्राणघाती हमले से कम नहीं है । इसमें वे इसलिये एक झूठे व्यक्ति भी कहे जा सकते हैं क्योंकि इस नोटबंदी से देश के ग़रीबों और किसानों की रोजीरोटी पर पड़े प्रतिकूल प्रभाव के सारे तथ्यों को जान कर भी वे लगातार इसे काला धन वालों पर किया गया हमला बताते जा रहे हैं, जबकि काला धन पर इसके प्रभाव के आज तक कोई तथ्य नहीं मिले हैं ।

यहाँ हम स्तंभ की उपरोक्त टिप्पणी को मित्रों के साथ साझा कर रहे है :

http://www.economist.com/news/books-and-arts/21717019-press-should-call-out-politicians-when-they-lie-lying-isnt-same-talking?frsc=dg%7Ce

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