चतुर्दिक

विषय पर केंद्रित होने पर स्वयं विषय का स्वरूप बदल जाता है (द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में मनन का स्थान ) ; विकल्प का निर्विकल्प में विश्रांति ही तत्व है ; इस प्रकार उत्तरोत्तर विश्रांति के द्वारा अपना स्वरूप स्फुट होता है - यह शेष है ।

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

एल्गोरिद्म-जनित लैलैंग (Algorithmic Lalangue): भाषा, अवचेतन और नाद

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  −अरुण माहेश्वरी   कल (18 अगस्त 2025) के ‘टेलिग्राफ़ ‘ में प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स से लिया गया लेख “Seggs, Rizzs and Algospeak” हमें आज क...
शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

डा.नगेन्द्र का सार-संग्रहवाद

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(कल Sudha Singh जी की वॉल पर हमने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के एक आयोजन के निमंत्रण पत्र को देखा । यह आयोजन आगामी 19-20 अगस्त 2025...

‘प्र’ उपसर्ग की महत्ता

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−अरुण माहेश्वरी भारतीय ज्ञानमीमांसा में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय, ये तीन पद ज्ञान की पूरी त्रिपुटी को रचते हैं। इन्हें केवल स्थिर परिभाषाओं...
8 टिप्‍पणियां:
रविवार, 3 अगस्त 2025

अजिजुल हक़ को श्रद्धांजलि

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  — अरुण माहेश्वरी दुर्दान्त नक्सली नेता अजिजुल हक़ नहीं रहे । 21 जुलाई के दिन उनका निधन हो गया । वे 83 साल के थे ।  सीपीआई(एम-एल) के जन्म (...
रविवार, 27 जुलाई 2025

ये ‘नैरेटिव’ के भूखें !

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  −अरुण माहेश्वरी  ठोस यथार्थ नहीं कोरा आख्यान, वस्तु नहीं सिर्फ चेतना – दर्शन के जगत का यह सनातन संघर्ष हमारे जीवन में कैसे-कैसे गुल खिलाता...
रविवार, 20 जुलाई 2025

ट्रंप के कुत्सित क़िस्सें

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  आज के “टेलिग्राफ” के पहले पन्ने पर न्यूयार्क टाइम्स की न्यूज़ सर्विस की एक लंबी कहानी छपी है जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और कम उम्र की...
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Arun Maheshwari
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