चतुर्दिक

विषय पर केंद्रित होने पर स्वयं विषय का स्वरूप बदल जाता है (द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में मनन का स्थान ) ; विकल्प का निर्विकल्प में विश्रांति ही तत्व है ; इस प्रकार उत्तरोत्तर विश्रांति के द्वारा अपना स्वरूप स्फुट होता है - यह शेष है ।

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

सिंह की खाल में गधा

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-अरुण माहेश्वरी  आज डी वाई चन्द्रचूड़ अपनी नई किताब के प्रचार के उत्साह में कुछ ऐसी बात बोलते जा रहे हैं, जिनसे अब उनके चरित्र पर पड़े लफ़्फ...
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शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

नेपाल का जेन जी विद्रोह : अब आगे क्या ?

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 - अरुण माहेश्वरी   9 सितम्बर 2025 को नेपाल में जो कुछ हुआ, वह सचमुच बहुत अप्रत्याशित सा था।  सोशल मीडिया पर पाबंदी और सत्ता के भ्रष्टाचार क...
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

ग़ालिब के बहाने ग़ज़लों की संरचना पर क्षण भर

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-अरुण माहेश्वरी  गत रात जगजीत सिंह की आवाज़ में ग़ालिब पर एक पूरी पटकथा को सुन रहा था । इसमें उन्होंने कई ग़ज़लें भी सुनाईं । इसी में उनकी ...
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मंगलवार, 19 अगस्त 2025

एल्गोरिद्म-जनित लैलैंग (Algorithmic Lalangue): भाषा, अवचेतन और नाद

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  −अरुण माहेश्वरी   कल (18 अगस्त 2025) के ‘टेलिग्राफ़ ‘ में प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स से लिया गया लेख “Seggs, Rizzs and Algospeak” हमें आज क...
शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

डा.नगेन्द्र का सार-संग्रहवाद

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(कल Sudha Singh जी की वॉल पर हमने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के एक आयोजन के निमंत्रण पत्र को देखा । यह आयोजन आगामी 19-20 अगस्त 2025...

‘प्र’ उपसर्ग की महत्ता

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−अरुण माहेश्वरी भारतीय ज्ञानमीमांसा में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय, ये तीन पद ज्ञान की पूरी त्रिपुटी को रचते हैं। इन्हें केवल स्थिर परिभाषाओं...
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Arun Maheshwari
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