रविवार, 6 अप्रैल 2025

पाठ, प्रमाता और विमर्श: लकान के आलोक में आलोचना की पुनर्रचना की प्रस्तावना

 

—अरुण माहेश्वरी



“प्रमाता से अनीहा क्यों!”(1)— इस प्रश्न के मूल आशय में हमारी चिंता न केवल आलोचना की वर्तमान जड़ता से जुड़ी हुई है, बल्कि साहित्यिक पाठ को जानने की एक नयी चेतना-केंद्रित पद्धति की ओर संकेत करना भी है। 


इस संदर्भ में यदि हम लकान की उस धारणा को केन्द्र में रखें जिसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध लेख On the Subject Who Is Finally in Question (अन्ततः सवाल के घेरे में आए प्रमाता पर)(2) में विकसित किया था, तो हम पाठ, पाठक और विश्लेषक के संबंध में वैसी एक नई संरचनात्मक दृष्टि तैयार कर सकते हैं, जिसमें यह त्रिकोणीय संवाद-संरचना किसी निश्चित अर्थ की ओर नहीं, बल्कि प्रमाता की अपनी विस्थापित गतिकता (displaced dynamism)(3) की तलाश की ओर प्रवृत्त होती है। विस्थापित गति अर्थात् उसकी आत्म-विच्छिन्न और विभाजित, अपनी धुरी से हटी हुई गति, उसके अव्यक्त और अनपेक्षित अर्थ की दिशा में गति । ‘प्रमाता से अनीहा क्यों !’ में प्रमाता ईश्वर-स्वरूप है, पर वह ईश्वरीय ‘परमता’ भी प्राणी की एक विच्छिन्न अवस्था ही है, जिसे साधने की तमाम कोशिश के बाद भी उसे कभी साधा नहीं जा सकता है । 

बहरहाल, यह उपक्रम इसलिए ज़रूरी है क्योंकि लकान के अनुसार प्रमाता (subject) कभी भी स्वयं के लिए पारदर्शी नहीं होता — अर्थात् वह अपने भीतर पूरी तरह से सुलझा हुआ नहीं होता है (4)। उसकी चेतना, उसकी कामना और उसका अर्थबोध — सभी विस्थापन और विभाजन (displacement and splitting) (5) की संरचना में गतिशील होते हैं। विश्लेषक को जानने की जरूरत है कि जिस प्रमाता से संवाद कर रहा है, वह किसी पूर्णता की आवाज़ नहीं, बल्कि एक अधूरी गूँज है। वह प्रमाता स्वयं से असंपृक्त होता है और उसके कथित सत्य की अभिव्यक्ति में वही असंपृक्तता प्रकट होती है । 

लकान ने अपनी पुस्तक Four Fundamental Concepts of Psycho-Analysis में प्रमाता के संदर्भ में विच्छिन्नता (alienation) और अलगाव (separation) इन दोनों पदों का परस्पर पूरक क्रियाओं के अर्थ में प्रयोग किया है जिन्हें प्रमाता के गठन की प्रक्रिया का एक मूलभूत तत्त्व माना गया है । विच्छिन्नता विभाजन का काम करती है और अलगाव प्रमाता की प्राणीसत्ता (being) और उसकी प्रतीकात्मक प्रणाली (symbolic order) के द्वारा सर्जित अर्थ के बीच चयन का काम करता है । जैसे ही मनुष्य प्रतीकात्मक प्रणाली के द्वारा प्रदत्त अर्थ को ग्रहण करता है, प्रमाता की प्राणीसत्ता का अंत हो जाता है; और प्राणीसत्ता का चयन प्रमाता को निरर्थक कर देता है । लकान ने इसका जो मॉडल पेश किया था उसमें प्रमाता की प्राणीसत्ता उसकी आंतरिक जैविक अथवा अनुभूतिपरक क्रिया से जुड़ी है और अर्थ अन्य से, आत्म के बाहर की किसी चीज से जुड़ा होता है । संकेतक का प्रभुत्व प्रमाता के लोप के समानुपातिक होता है । और जैविकता का चयन उसकी सार्थकता पर संकट पैदा करता है जो संभवतः प्रमाता के लिए असहनीय होता है क्योंकि प्रमाता हमेशा अर्थ की तलाश में रहता है ।

बहरहाल, प्राणीसत्ता या अर्थ, इनमें से कुछ भी क्यों न चुना जाए, अंततः प्रमाता के लिए दूसरे विकल्प के एक हिस्से का नुकसान होता ही है । जब संकेतक प्रमाता को उसके बोधिसत्व से विच्छिन्न कर देते हैं तब फिर से बोध प्राप्त करना उसके लिए असंभव हो जाता है । 

लकान के यहां विच्छिन्नता नाना रूपों में आती है − प्रमाता का स्वयं से संबंध के संदर्भ में; अन्य के साथ संबंध के संदर्भ में; और भाषा के साथ संबंध के संदर्भ में भी ।   


लकान के अनुसार यह aphanisis की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रमाता अपनी इच्छा के वृत्त में स्वयं को मिटा देता है । “The fading (aphanisis) of the subject between two signifiers.” ("दो संकेतकों के बीच प्रमाता का लुप्त हो जाना" (Seminar XI से)। 

जब प्रमाता किसी एक संकेतक (signifier) के साथ अपनी पहचान कायम करता है, तब वह दूसरे संकेतक से दूर हो जाता है — और इस तरह वह पूर्ण रूप से कभी स्वयं को रख नहीं पाता, हमेशा कुछ छूटा रह जाता है, या कहें — कुछ अभाव बना रहता है। 

लकान के अनुसार, अर्थ का चयन ही प्रमातात की प्राणीसत्ता को गायब कर देता है । और, यह गायब होना कोई आकस्मिक विलोपन नहीं, बल्कि संरचनात्मक क्रिया है — एक ऐसी प्रक्रिया जो संकेतन श्रृंखला (signifying chain) में प्रमाता की जगह को अस्थिर बनाए रखती है। लकान इसे ही प्रमातृत्व की अस्थिरता (instability of subjectivity) कहते हैं।

प्रमाता जब अपने बारे में कुछ कहता है (“मैं हूँ…”) — वह उस वाक्य में खुद को संपूर्ण रूप से नहीं पकड़ पाता है। उसके कुछ होने के संकेतक के साथ कुछ न होने का अभाव भी जुड़ा होता है। वह अभाव प्रमाता को स्वयं से अलग करता है। इसलिए लकान के अनुसार, प्रमाता एक तरह से हमेशा अधूरा होता है, और जब वह कोई इच्छा प्रकट करता है — वह अपने ही कथन से अलग होता जाता है। यह अलगाव ही aphanisis है।(6)

विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती था’ के पहले अध्याय की शीर्षकनुमा पंक्ति है – “हाथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी ।” 

बहरहाल, अब यदि हम किसी साहित्यिक पाठ को पाठक और आलोचक के सामने उपस्थित एक प्रमाता की संरचना के रूप में देखें, तो वह भी एक ऐसे ही प्रमाता की तरह आता है, जो स्वयं अपने अर्थ से संपूर्णतः अवगत नहीं होता। पाठ के भीतर जो आकृतियाँ, प्रतीक, और चुप्पियाँ हैं — वे सब मिलकर उसे एक विमर्शशील प्रमाता का रूप दे देती हैं। इतना ज़रूर है कि यह प्रमाता भी भाषा के माध्यम से प्रकट होता है, और उसी के माध्यम से अपने को छुपाता भी है। यह वही स्थिति है जिसे लकान अपने एक प्रमुख सूत्र वाक्य में कहते रहे हैं: The unconscious is structured like a language, but it also resists it (7)।

इसलिए जब कोई विश्लेषक किसी पाठ का सामना करता है, तो वह किसी वस्तु (object) का विश्लेषण नहीं कर रहा होता, बल्कि वह एक ऐसे प्रमाता की गतिशीलता से संवाद कर रहा होता है जो स्वयं में विच्छिन्न, विभाजित और विलंबित होता है। उसका अर्थ कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि प्रमाता की, अर्थात् पाठ की अवशिष्ट कामना (object petit a) (8) से प्रेरित गति की तरह होता है — सब कुछ कह कर भी जो कुछ कहना रह जाता है, उस अभाव से उत्पन्न गति की तरह।

इसीलिए हम कहेंगे कि पाठक, विश्लेषक और पाठ — ये तीनों बोरोमियन गाँठ की तरह जुड़े होते हैं (9), जिसमें हर एक का अस्तित्व बाकी दो के साथ संबंध में ही संभव होता है। यदि इनमें से कोई एक छूट जाए, तो संपूर्ण संरचना विघटित हो जाती है। लकान ने अपने परवर्ती लेखन में इस गांठ के साथ प्रमाता के स्वलक्षण (जिसे उन्होंने sinthome अर्थात् प्रमाता की अपनी फैंटेसी से जुड़े लक्षण के रूप में अलग से परिभाषित किया था) को जोड़ा था जो चित्त की इस बोरोमियन संरचना को थामे रहता है । इसीलिए विश्लेषक वह नहीं है जो पाठ को पूरा करता है, बल्कि वह है जो पाठ के अभाव को समझता है और उस अभाव को ही उसका गतिशील सौंदर्यात्मक सत्य मानता है।

इस दृष्टि से देखें तो आलोचना अर्थ की खोज नहीं, विमर्श की प्रक्रिया बन जाती है। पाठ एक विषय नहीं, बल्कि एक बाह्याश्रित अस्तित्व (ex-sistence) (10) हो जाता है — वह जो बाहर है, जो भाषा में नहीं समा सकता, और जो बार-बार अर्थ की सीमाओं को तोड़ता है। लेखक का सिंथोम । विश्लेषक का कार्य उस अर्थ को पकड़ना नहीं, उस विलंबित अर्थ की गूँज को सुनना है, जिसे पाठ स्वयं में छुपाए रखता है।

जाहिर है कि यहाँ पर आलोचक की भूमिका किसी शिक्षक या निर्णायक की नहीं, एक संवादी प्रमाता की हो जाती है। वह स्वयं भी अपने पूर्वग्रहों, प्रतीकात्मक संरचनाओं और इच्छाओं से बँधा होता है। इसीलिए उसकी आलोचना भी एक प्रकार की प्रति-आनयन (countertransference) (11) में होती है — जिसमें वह अपने ही प्रमातृत्व की सीमाओं से जूझते हुए पाठ के प्रमातृत्व से संवाद करता है। खुद भी पाठ से प्रभावित या विश्लेषित होता है।

इस आलोचना दृष्टि में पाठ का मूल्य न तो उसकी विचारधारा से तय होता है, न उसकी शैली से — बल्कि उस स्पंदनशील अभाव से होता है जो उसे रचती है, और जो हर बार एक नए पाठक के साथ नए विमर्श की संभावना खोलती है।

इस प्रकार कुल मिला कर एक ऐसी आलोचना की संरचना विकसित होती है जो स्वयं को प्रत्येक पाठ में अद्वितीय मानती है। वह किसी सिद्धांत की सेवा में नहीं, बल्कि उस सिद्धांत की प्रक्रिया में रहकर ही एक अनिश्चित खोज को जारी रखती है। यही आलोचना का अजडप्रमात्तृत्व है (12)। यही विमर्शशील प्रमाता — उत्पलदेवाचार्य की अजडप्रमातृत्व सिद्धि(13) — का दर्शन है, जो न पाठ को निष्कर्ष बनाता है, न आलोचना को निर्णय।

बल्कि दोनों को एक निरंतर गतिक प्रवाह में रखता है — जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कविता में वह आदमी “गर्म कोट पहनकर विचारों की तरह चला जाता है” — और पाठ, आलोचक और पाठक तीनों उस ‘कोट’ की तरह किसी काल्पनिक वास्तविकता में प्रवेश करते हैं, जहाँ भाषा की सीमाएँ ही अर्थ का उद्गम बन जाती हैं।

यह आलोचना नहीं, एक अनकहा संवाद है — जो स्वयं को रचते हुए पाठ में प्रकट होता है, और जिसका आधार है प्रमातृत्व । (14)

संदर्भ सूची

1. https://chaturdik.blogspot.com/2025/03/blog-post_19.html

2. Lacan, On the Subject Who Is Finally in Question, Écrits, p. 229

3. “the race… the post to be approached… metaphor I will give him” — Ibid., p. 230

4. “the subject is never transparent to himself” — Ibid., p. 236

5. “the characteristic structure of displacement and splitting” — Ibid., p. 234

6. देखें, ‘प्रमाता का आवास’, अरुण माहेश्वरी, पृष्ठ- 152-156

7. “The unconscious is structured like a language, but it also resists it” — लकान के पाठों में बार-बार आने वाले कथन का सार जो उनके सिद्धांत का एक मूल सूत्र है । 

8. “object a” as the leftover of desire — Écrits, references scattered, see esp. p. 196

9. The structure where three elements are mutually bound like Borromean rings — Ibid., p. 196 

(यह एक ऐसी संरचना है जिसमें लकान प्रमाता को उसकी छवि (imaginary), उसके भाषाई संसार (symbolic) और उसके यथार्थ (Real) के तीन छल्लों की ऐसी विशेष गांठ के रूप में देखते हैं जिनमें से किसी भी एक के हट जाने से चित्त की पूरी संरचना ही बिखर जाती है । परवर्ती दिनों में लकान ने इस संरचना को कायम रखने में प्रमाता के स्वलक्षण (sinthome) की प्रमुख भूमिका को भी शामिल किया था । इस गांठ का बोरोमियन नाम फ्रांस के 16वीं सदी के "मिलानीज़ बोरोमियो" (The "Milanese Borromeo") के बोरोमियो परिवार से बना है, सैंट चार्ल्स बोरोमियो और उनके चचेरे भाई फेडेरिको बोरोमियो से, जो दोनों ही कार्डिनल और मिलान के आर्चबिशप थे। इन दोनों ने इटली में काउंटर-रिफ़ॉर्मेशन (प्रति-सुधार आंदोलन) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। "बोरोमियन गाँठ" शब्दावली की उत्पत्ति किसी तटस्थ गणितीय या मनोविश्लेषणात्मक प्रयोग से नहीं, बल्कि एक राजकीय प्रतीक (heraldic crest) से हुई थी। बोरोमियो परिवार की राजकीय घोषणा (royal proclamation) में पहली बार उन तीन परस्पर गुंथे हुए छल्लों का उल्लेख हुआ था, जो एक-दूसरे से इतने गहरे जुड़े थे कि उनमें से कोई एक भी हटाने पर पूरा संबंध-विन्यास टूट जाता।

इस प्रकार, यह केवल सजावटी आकृति नहीं थी, बल्कि उस समय के राजनीतिक-सांस्कृतिक आदर्श का प्रतीक थी — संगठित एकता, आपसी आश्रय, और अविभाज्य सह-स्थिति की आकांक्षा। इसी प्रतीकात्मक संरचना ने आगे चलकर लकान को चित्त की अपनी टोपोलॉजिकल कल्पना का आधार दिया।)

10. “ex-sistence” — Ibid., p. 234

11. “theoretical equivalence is fully maintained in the countertransference” — Ibid., p. 192

12. “the subject… remains an intact subject” — Ibid., p. 192

13. राजानक-उत्पलदेव प्रणीता सिद्धित्रयी; लेखक – सूर्यप्रकाश व्यास, चौखंभा संस्कृत संस्थान, वाराणसी, प्रथम संस्करण, वि.सं. 2045; The Kashi Sanskrit series 259.

14. Entire concluding note and affirmation from Lacan: “as long as some trace of what I have instituted remains…” — Ibid., p. 236








बुधवार, 2 अप्रैल 2025

प्रभात पटनायक के लेख “Common Trend” के बहाने

—अरुण माहेश्वरी 



आज के “टेलिग्राफ” में प्रकाशित प्रभात पटनायक का लेख “Common Trend” समकालीन यूरोप की राजनीति में उभरते नए रूझानों की पहचान कराता है। वे बताते हैं कि राजनीतिक मध्य का विघटन और दक्षिण-वाम ध्रुवीकरण अब केवल जर्मनी या फ्रांस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक और शायद राजनीति की सार्वभौमिक परिघटना बन चुका है। वे इस प्रवृत्ति को नव-उदारवाद के संकट की परिणति के रूप में देखते हैं। लेकिन लेख जिस बिंदु पर रुक जाता है, हमारी दृष्टि में वहीं से आज के वास्तविक संकट की गहराई शुरू होती है।


हम लगातार इस बात को दोहराते रहे हैं कि नव-उदारवाद वास्तव में कोई अस्थायी राजनीतिक प्रयोग नहीं है जिसे केवल लोक-कल्याण की उपेक्षा या बाज़ारोन्मुख नीतियों के ज़रिये समझा जा सके। यह पूंजीवाद की उस संरचनात्मक अवस्था का नाम है जो लाभ की दर में गिरावट, उत्पादन से वित्त की ओर पलायन, और श्रम से पूंजी के संबंध में आए गहरे अवसाद का परिणाम है। मार्क्स ने “पूंजी” में लाभ की सामान्य दर में गिरावट की जिस प्रवृत्ति का विश्लेषण किया था, यह उसीका एक और ऐतिहासिक स्वरूप है।


प्रभात मानते हैं कि मध्यमार्गी राजनीति जो दशकों तक नव-उदारवाद का नेतृत्व करती रही है, वह अब विघटित हो रही है । लेकिन वे इस विघटन को पूंजी की आंतरिक गति के ही एक तार्किक परिणाम की बजाय इससे पैदा हुए राजनीतिक असंतोष की प्रतिक्रिया मात्र मानते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ हमारी नज़र में उनके लेख की आलोचनात्मक क्षमता सीमित हो जाती है।


वे पश्चिम में दक्षिणपंथ के उत्थान के रूप में जिन ताक़तों को पहचानते हैं, जैसे AfD, Le Pen, Meloni, या ट्रंप, वास्तव में वे नव-उदारवाद से उत्पन्न हताशा की प्रतिक्रियाएँ हैं। उनकी भाषा भले ही ‘राष्ट्रवाद’ (Make America Great Again) या ‘संप्रभुता’ (sovereign) की हो सकती है । लेकिन उनकी संरचना पूंजी के उसी वर्चस्व को और सुदृढ़ करती है, जो नव-उदारवाद की विशिष्टता माना जाता है । ये शक्तियाँ सत्ता में आते ही उसी वित्तीय अनुशासन और सामाजिक कटौतियों को दोहराती हैं जिनके विरुद्ध वे जनता के असंतोष का लाभ उठा कर वे सत्ता तक पहुँची थीं। 


प्रभात ठीक ही यह पहचानते हैं कि ये ताक़तें विरोध में रहते हुए नव-उदारवाद से अलग दिखती हैं, पर सत्ता में आते ही उसी की भाषा बोलने लगती हैं। परंतु वे इस विडम्बना की जड़ में उनके उस प्रमातृत्व (subjectivity) को नहीं देखते, जो पूंजी के विमर्श के बीच से ही गठित हुआ है । 


प्रभात के लेख में वाम की जो छवि उभरती है, वह भी कोई स्वच्छ छवि नहीं है । जर्मनी में Die Linke का विघटन, या ब्रिटेन में लेबर की सीमित सफलता, यही दर्शाते हैं कि वाम भी नव-उदारवाद के विरोध में कोई सम्यक् प्रत्युत्तर पेश नहीं कर पा रहा है। वाम की राजनीति अब भी इस भ्रम में है कि कल्याणकारी राज्य की पुनर्रचना से पूंजी की अनैतिकता पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके मूल में वही केन्सियन विचारधारा सक्रिय है, जो पूंजीवाद के संकटों के तात्कालिक समाधान प्रस्तुत करती रही है—मूल संकट के स्रोत की दिशा में जाए बिना। यह समझना उनके वश में नहीं है कि नव-उदारवाद कोई नैतिक विचलन नहीं, बल्कि पूंजी के तर्क की एक परिष्कृत अवस्था है। इसलिए इसका कथित संकट भी दरअसल पूंजीवाद की एक और आंतरिक टूटन है, जिसे नए रूपों में आत्मसात कर लेने की पूंजी के पास अपार क्षमता है।


यदि वाम को वाकई विकल्प बनना है, तो उसे ‘कल्याण’ की पुनर्स्थापना से आगे बढ़कर उस प्रमाता को संबोधित करना होगा, जो पूंजी को केवल एक आर्थिक तर्क नहीं, बल्कि एक नियति—यहाँ तक कि एक फैंटेसी—के रूप में स्वीकार कर चुका है। यह प्रमाता, जिसे लकान की भाषा में हम ex-sistent (बाह्याश्रित अस्तित्व) कह सकते हैं, अब अपने ही रचे पूंजी-संरचित संसार में बाँध दिया गया है। वह पूंजी के प्रतीकात्मक तंत्र को ही यथार्थ का पर्याय मान बैठा है—जिसे लकान ‘रीयल’ कहते हैं: ऐसा यथार्थ जो स्वयं में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता, जो प्रतीकों के पार होता है लेकिन उन पर शासन करता है। इस अर्थ में पूंजी का यह विमर्श रीयल के रूप में काम करता है—जिसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर बदला नहीं जा सकता। और यह वह जगह है जहाँ से हर वैकल्पिक राजनीति बार-बार परास्त होती है।


प्रभात पटनायक के लेख में यह बोध नहीं है कि संकट अब केवल नीति या रणनीति का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। पूंजीवाद का वर्तमान संस्करण संसाधनों के वितरण की विषमता भर नहीं पैदा करता, वह प्रतीकों और संभावनाओं के अर्थतंत्र को भी केंद्रीकृत कर देता है। ‘भविष्य’, ‘विकास’, ‘प्रगति’—इन सभी की कल्पना अब केवल वित्तीय पूंजी के द्वारा ही मूर्त हो सकती है, ऐसा प्रतीकात्मक ढाँचा बना दिया गया है। तथाकथित वाम भी इस प्रतीक संरचना से बाहर निकलने की जगह उसी में एक अधिक मानवीय संस्करण की माँग करता है। वह पूंजी को चुनौती नहीं देता, केवल उसमें अपनी जगह सुरक्षित करना चाहता है।


इसलिए आज का संकट नव-उदारवाद का संकट नहीं है—बल्कि उस प्रमाता का संकट है, जो नव-उदारवाद के भीतर गठित हुआ है और अब उसी की सीमाओं में अपनी मुक्ति की तलाश कर रहा है। ट्रंप का टैरिफवाद हो या यूरोप की ‘सॉवरेन’ वाली भाषा—ये सभी उसी भ्रम के लक्षण हैं, कि संकट का हल कहीं बाहर है, न कि स्वयं उस संरचना में जिसमें संकट अंतर्निहित है।


प्रभात पटनायक का लेख इस व्यापक पृष्ठभूमि की ओर संकेत तो करता है, पर वहाँ टिकता नहीं है। वह राजनीति की सतह पर बहस को सीमित रखता है—जहाँ संकट के लक्षण तो स्पष्ट हैं, पर उनके गहन कारणों की तहों तक जाने की कोशिश नहीं की गई है। हम पहले भी उनके इस प्रकार के राजनीतिक सूत्रीकरणों की सीमाओं की ओर इशारा करते रहे हैं। पत्रकारितामूलक टिप्पणियाँ राजनीतिक घटनाओं की पंजिका के लिए उपयोगी हो सकती हैं, पर उनसे कोई नई वैचारिक दिशा नहीं मिलती। क्योंकि वे उस सिंथोम (sinthome) को नहीं पहचानतीं, जिसके माध्यम से पूंजी का विमर्श प्रमाता को बाँधता है। 


और यही कारण है कि प्रभात का वाम एक भला, लेकिन भटका हुआ मार्गदर्शक बनकर रह जाता है।


https://search.app/j6NnUt6upTtCEqAJ7


टैरिफवाद और सभ्यता की विपरिगति


-अरुण माहेश्वरी 





कल आधी रात में डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल को अमेरिका की मुक्ति का दिन घोषित किया है। 


सवाल है कि दुनिया की यह सबसे बड़ी महाशक्ति किससे मुक्त हुई है? 


यह सवाल जितना स्वाभाविक है, उतना ही भयानक भी। 


ट्रंप की निगाह में यह मुक्ति किसी आर्थिक निर्भरता से नहीं, बल्कि वास्तव में सभ्यता के बंधनों से मुक्ति है—न्याय और सहकार के विचार से, मानव जीवन के शील से, उस सामाजिक भावना से जो मनुष्य को पशु से भिन्न बनाती है। यह वस्तुतः पाशविक शक्ति की मुक्ति है । 


यह एक ऐसी स्वतंत्रता है जिसमें कोई नैतिक उत्तरदायित्व नहीं, केवल प्रभुत्व और नियंत्रण की इच्छा है।


ट्रंप की टैरिफ घोषणाएँ व्यापार नीति की बात नहीं, एक मानसिकता की सार्वजनिक उद्घोषणा हैं, जो यह मान कर चलती है कि मनुष्य मूलतः स्वार्थमूलक होता है, और जीवन की गति केवल टकरावों से संचालित होती है। 


यह सोच सहयोग की हर संभावना को अस्वीकार कर, उसे एक नैतिक भ्रम की तरह देखती है। और जब यह सोच अमेरिका जैसी किसी वैश्विक शक्ति की नीति बन जाती है, तो वह पूंजीवाद का वैसा बर्बर रूप ले सकती है जिसे कम्युनिस्ट नेता जार्ज दिमित्राव ने फासीवाद का क्लासिक रूप कहा था।


टैरिफवाद अब कोई अर्थनीति नहीं रहा—वह एक घोषित रणनीति है, जो व्यापार को सैनिक युद्धों के स्थान पर रखकर, उसे उन्हीं उद्देश्यों का औजार बना देती है। 


जैसा कि हेगेल ने कहा था, शब्द वस्तुओं की सत्ता का अंत कर देते हैं, लेकिन उन्हें एक सर्वकालिक सत्य में रूपांतरित भी कर देते हैं। 


टैरिफवाद सैनिक युद्धों का वैसा ही शाब्दिक रूपांतरण है—वस्तु का अंत, नाम का स्थायीकरण। यह ‘ट्रेड वॉर’ अब केवल एक मुहावरा नहीं, एक सर्वमान्य यथार्थ बन चुका है।


ट्रंप के टैरिफवाद की सफलता की एकमात्र गारंटी अमेरिका की सैन्य शक्ति है। यही बात इसे खतरनाक बनाती है। 


यह कोई अंत नहीं, बल्कि युद्ध के अधिक नग्न और बर्बर रूपों में प्रवेश की शुरुआत है। 


युद्ध अब न केवल मिसाइलों, बल्कि टैक्स, डेटा, पेटेंट और सप्लाई चेन से लड़े जाएँगे। वे एलान के साथ शुरू नहीं होंगे—बल्कि खुले आम, चरणबद्ध रूप से, लोकतंत्र के भीतरी तंतुओं को क्षीण करते हुए आगे बढ़ेंगे।


जैसे प्रथम विश्वयुद्ध के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध में विरोधी शक्तियों के समुच्चयों में बड़े बदलाव आए थे । राष्ट्रों की नई भूमिकाएँ, नई संधियाँ, नए विश्वासघात देखने को मिले थे । वैसे ही आगामी युद्ध, यदि वह होता है, तो अपने साथ ऐसी पुनर्रचनाएँ लाएगा, जिनकी अभी केवल आहट मिल रही है। 


यह भी संभव है कि इस बार कोई हिटलर किसी गठबंधन का इंतज़ार न करे, अकेला ही विश्व-विजय के अभियान पर निकल पड़े। बाद में उसके अभियान जो जुड़ेंगे, जुड़ जायेंगे । बाक़ी सब कुचले जायेंगे । 


इस स्थिति में तथ्यों का भाषा से अधिक तीखा होना स्वाभाविक है। 


कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी टैरिफ़ों के जवाब में काउंटर-मेज़र्स लागू करने की घोषणा कर दी है। यूरोपीय संघ ने अमेरिकी आयात पर 20% टैक्स को “अनुचित और विध्वंसक” बताते हुए चेताया है कि यह यूरोपीय नौकरियों और मुद्रास्फीति के लिए घातक है। चीन ने ताइवान के निकट सशस्त्र सैन्य अभ्यास करते हुए स्पष्ट किया है कि वह अब हर ‘संभावित लड़ाई’ के लिए पूरी तरह तैयार है। 


इन घटनाओं को केवल राजनीतिक असहमति कह कर नहीं टाला जा सकता। यह वही क्षण है जिसमें सभ्यता का केंद्र एक बार फिर पुनर्रचना और टकराव के दौर में प्रवेश करता है।


इसलिए ज़रूरी है कि हम टैरिफवाद को केवल आर्थिक नीति न समझें, बल्कि एक वैचारिक युद्ध की घोषणा के रूप में भी पढ़ें। 


यह व्यापार की नहीं, विचार की भी लड़ाई है। और यदि हम इसे कर-नीति मानकर अनदेखा करते रहे, तो यह युद्ध को धीरे-धीरे सामान्य, आवश्यक और नैतिक घोषित कर देगा। 


यही वह बिंदु है जहाँ हमें सबसे अधिक सतर्क होने की आवश्यकता है। क्योंकि एक बार जब स्वार्थ को सार्वभौम मूल्य मान लिया जाता है, तब वह किसी भी हिंसा को उचित ठहरा सकता है।