− अरुण माहेश्वरी
विषय पर केंद्रित होने पर स्वयं विषय का स्वरूप बदल जाता है (द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में मनन का स्थान ) ; विकल्प का निर्विकल्प में विश्रांति ही तत्व है ; इस प्रकार उत्तरोत्तर विश्रांति के द्वारा अपना स्वरूप स्फुट होता है - यह शेष है ।
रविवार, 24 मई 2026
धरती का जीव होने पर भी “कॉकरोच” को पृथ्वीत्व होना अभी बाकी है
शुक्रवार, 22 मई 2026
पुनश्च: कोकरोच : एक राजनीतिक सत्य का प्रमाता
−अरुण माहेश्वरी
भारत के सीजेआई सूर्यकांत ने बेरोजगार नौजवानों के लिए ‘काकरोच’ शब्द का प्रयोग करके अनजाने में एक नए राजनीतिक नामकरण की जमीन तैयार कर दी । यह नामकरण नहीं बल्कि फ्रैंज काफ्का के कायांतरण का ही पुनर्कायांतरण है। काफ्का में कायांतरण अस्तित्वगत त्रासदी था; यहाँ वही रूपांतरण राजनीतिक प्रतिप्रत्यय (reversal) बन जाता है। अर्थात् जिसे व्यवस्था “कीट” कहती है, वही सत्य का वाहक बनता है। काफ्का ने विश्वयुद्धों की त्रासदी में फंसे मनुष्यों की विडंबना को तुच्छ कीट में रूप में देखा था । सीजेआई ने फासीवादी सत्ता के जोम में उसी जीव को राजनीति के सत्य के प्रमाता में कायांतरित कर दिया ।
काकरोच! स्थापित मानव पहचान के सब रूपों से परे राजनीति के सामान्य सत्य का प्रमाता जो किसी जाति, धर्म, भाषा या वर्ग का नहीं है, जो व्यवस्था की घृणा का ऐसा पात्र है जो हर दमन के बाद फिर लौट आता है, और जिसे पूरी तरह समाप्त कर पाना असंभव होता है। इसीलिये अब वह केवल अपमानसूचक शब्द नहीं है । वह राजनीतिक सत्य की प्रमात्रिकता (subjectivity) का एक नया नाम है।
ऐलेन बाद्यू के दर्शन में “राजनीतिक सत्य” का प्रमाता न तो केवल एक नागरिक होता है, न किसी समुदाय का प्रतिनिधि, न किसी जातीय, धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का वाहक। वह उस सत्य-प्रक्रिया का धारक-वाहक होता है जो स्वयं समुदायों, पहचानों और स्थापित वर्गीकरणों की सीमाओं को तोड़ती है। और जब कोई प्रमाता किसी राजनीतिक सत्य का प्रमाता बनता है, तब वह अपने को हर पूर्व-निर्धारित पहचान से विस्थापित कर देता है। इस मायने में उसकी भूमिका मूलतः “विस्थापनकारी” (displacing) होती है।
जहां तक राजनीतिक सत्य का सवाल है, वह इतिहास के भीतर पैदा होता है, लेकिन वह इतिहास से निःसृत या अलग नहीं होता। इतिहास उसका भुवन (world) होता है, उसका आधार नहीं। यह ठीक वैसे ही है जैसे गणित का सत्य केवल उसकी भाषा से पैदा नहीं होता, कला का सत्य केवल प्रतीकों से नहीं निकलता, वैसे ही राजनीति का सत्य केवल संस्कृति, परंपरा और पहचान की सीमाओं से नहीं निकलता। वह एक घटना (event) के रूप में स्फुटित होता है — ऐसी घटना, जो राज्य और समाज की स्थापित गिनती में एक छेद पैदा करती है।
ऐलेन बाद्यू के लंबे अर्से से एक राजनीतिक मित्र रहे सिल्वैन लाजारस (Sylvain Lazarus) जो खुद फ्रांस में एक बड़े समाजशास्त्री और राजनीतिक सिद्धांतकार के रूप में ख्यातिलब्ध रहे, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है Anthropology of the Name (नाम का मानव विज्ञान) लाजारस ने इस पुस्तक में राजनीतिक नामों और वर्गीकरणों की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण किया है। इतिहास में कैसे राजनीतिक सत्य का प्रमाता किसी नए नाम से अवतरित होता रहा है! जैसे जन-विद्रोही स्पार्टा, फ़्रांसीसी क्रांति के “साँ-क्यूलोत” (sans-culottes), (कुलीनता-विरोधी जन), समाजवादी क्रांति में मज़दूर वर्ग, भारत के अछूत, अमेरिका के काले और आज की दुनिया के एलजीबीटी प्लस भी । ये नाम केवल सामाजिक श्रेणियाँ नहीं है; ये खास क्षण के राजनीतिक सत्य के वाहक के नाम हैं। इतिहास और अकादमिक चिंतन के लिए यह विश्लेषण निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन दर्शन के लिहाज से राजनीतिक सत्य का वास्तविक प्रमाता ऐसी किसी भी स्थायी पहचान में सीमित नहीं रह सकता है। वह हर नाम को पार कर जाता है; हर भुवन में लौट-लौट कर आता है । कोकरोच हमें इस सत्य का सबसे उपयुक्त नाम प्रतीत होता है । हम देखेंगे कि बहुत जल्द ही इसे एक दार्शनिक श्रेणी के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिलेगी ।
यहां “काकरोच” का रूपक एक नया अर्थ ग्रहण कर रहा है। वह किसी जैविक जीव का नाम नहीं रह जाता; वह उस प्रमाता का नाम बन जाता है जिसे राज्य और अभिजन राजनीति अपनी गिनती से बाहर फेंक देना चाहती है, लेकिन जो हर बार एक नए रूप में लौट आता है। वह व्यवस्था के लिए घृणित हो सकता है, पर राजनीतिक सत्य के लिए सबसे उपयुक्त वाहक है। इस प्रकार “काकरोच” अपमान का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सत्य का नाम बन जाता है जो हर स्थापित पहचान, हर अभिजन नैतिकता और हर राज्य-निर्धारित गिनती को भेद कर उभरता है। यही उसकी सार्वभौमिकता है, और यही उसका भयावह आकर्षण भी।
बाद्यू जब कहते हैं कि राजनीति एक घटना-जनित सत्य-प्रक्रिया है, तब उनका तात्पर्य यह होता है कि यह प्रक्रिया राज्य द्वारा पहले से “गिने जा चुके” सामाजिक वर्गों से पैदा नहीं होती। राज्य समाज को अपनी प्रशासनिक और वैचारिक गिनती में बाँध कर रखता है। पर राजनीतिक घटना हमेशा “गिनती से बाहर” (uncounted) स्थलों से फूटती है। घटना राज्य की गिनती में एक छेद पैदा करती है।
यही कारण है कि आधुनिक राजनीति में कभी-कभी ऐसे उभार दिखाई देते हैं जो पारंपरिक दलगत और वैचारिक संरचनाओं के बाहर से आते हैं। भारत में जब एक ओर चुनावी प्रक्रिया से एक सर्वग्रासी फासीवादी प्रवृत्ति का उभार दिखाई देता है, तो वहीं दूसरी ओर राजनीति के भीतर ऐसे विचित्र और अनपेक्षित उभार भी पैदा होते हैं — जैसा हमने आम आदमी पार्टी या तमिलनाडु में विजय की टीवीके में देखा है। इनका महत्व केवल इनके कार्यक्रमों में नहीं, बल्कि इस तथ्य में भी होता है कि ये राजनीति को केवल राजसत्ता प्राप्ति की मशीन में बदल देने से इंकार करने की संभावना भी खोलते है । इनका महत्व उनके कार्यक्रमों से अधिक उनके अनपेक्षित उभार में है ।
यहीं से राजनीति स्वयं को राज्य से अलग करके सोचने लगती है। ठीक उसी तरह जैसे माओ की “सनातन क्रांति” का विचार इस धारणा पर टिका था कि क्रांति केवल सत्ता पर कब्ज़े की घटना नहीं, बल्कि सत्य की सतत पुनरावृत्ति है।
बाद्यू राजनीति के सत्यों की कुछ सामान्य विशेषताओं की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि हर राजनीतिक सत्य किसी ऐतिहासिक अनुक्रम में प्रकट होता है; हर सत्य का अपना एक प्रमात्रिक रूप (subjective form) होता है। इसलिए रोबेस्पिएर, लेनिन या माओ जैसे “राजसत्तावादी क्रांतिकारी” और स्पार्टाकस, म्युंत्सर या तुपाक अमारू जैसे जन-विद्रोही एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार, सत्य एक नहीं, सत्यों की बहुलता होती है — the multiple of truths।
लेकिन यह बहुलता केवल विचार में नहीं रहती। उसे किसी संगठित भौतिक शरीर (political body) की आवश्यकता होती है। लेनिनवादी पार्टी, लाल सेना, जन-संगठन — ये सब सत्य के उसी निकाय के रूप हैं, जिनके माध्यम से सत्य किसी ऐतिहासिक भुवन में प्रकट होता है।
बाद्यू के अनुसार हर राजनीतिक सत्य के मूल में कुछ उत्समूलक तत्व (generic kernel) होते हैं। इसमें पहला है इच्छा (desire) — सामाजिक-आर्थिक अनिवार्यता और दमन के विरुद्ध उठने की इच्छा। दूसरा है समानता (egalitarianism) — संपत्ति और सत्ता के स्थापित रूपों का निषेध। तीसरा है विश्वास (confidence) — जनता की सामूहिक शक्ति में विश्वास, उस अभिजनवादी संदेह का विरोध जो हमेशा जनता को अक्षम मानता है। और चौथा है रोब या दबदबा (terror) — अर्थात् वह शक्ति जो “मुक्त प्रतिस्पर्धा” के तथाकथित प्राकृतिक नियमों को अंतिम सत्य मानने से इंकार करती है और राज्य की हिंसा को सीधी जन-शक्ति से चुनौती देती है।
इसीलिए “सर्वहारा की तानाशाही” को मार्क्सवादी राजनीति में केवल दमनकारी अवधारणा के रूप में नहीं देखा गया था। वह राजनीतिक सत्य की इन चारों शर्तों को एक ठोस रूप देने का प्रयास था — समता की इच्छा, मजदूर वर्ग की शक्ति में विश्वास, स्थापित संपत्ति-सत्ता की संरचना का विरोध और मजदूर वर्ग की शक्ति के प्रत्यक्ष प्रदर्शन का रूप।
कोकरोच जनता पार्टी इन सब शर्तों को पूरा करेगी या नहीं, हम नहीं जानते । पर इसके गठन के साथ आज की राजनीति में दिखाई दे रहे आलोड़न से इतना साफ है कि भारत का दमित राजनीतिक सत्य अपने नए ऐतिहासिक रूप को पाने के लिए आकुल-व्याकुल है । अहंकारी सीजेआई ने उसकी जमीन तैयार कर दी है । जिस शब्द का प्रयोग अपमान के लिए किया गया था, वही अब एक नए राजनीतिक सत्य के नाम में बदलता दिखाई दे रहा है।
गुरुवार, 21 मई 2026
कोकरोच जनता पार्टी के उदय का दर्शनशास्त्र
-अरुण माहेश्वरी
ऐलेन बाद्यू की प्रसिद्ध उक्ति है—“दुनिया में केवल शरीर और भाषा है, सिवा इसके कि एक सत्य है”(There is only body and language, except that there is a truth) यह कथन “लोकतांत्रिक भौतिकवाद” के विरुद्ध बाद्यू के भौतिकवादी द्वंद्ववाद की उद्घोषणा की तरह है।
लोकतांत्रिक भौतिकवाद कहता है कि दुनिया केवल शरीरों, पहचानों, उपभोगों, भाषिक खेलों और सत्ता-व्यवस्थाओं का तंत्र है; जो है, वही अंतिम है। लेकिन बाद्यू कहते हैं कि नहीं, इस “जो है” के भीतर ही एक ऐसा तत्व उपस्थित होता है जो स्वयं उस व्यवस्था में गिना नहीं जाता। वह जो गिनती के बाहर होता है, वही सत्य है एक अपवाद, एक अतिरिक्तता, एक ऐसी दरार जो पूरी व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती देती है।
सत्य कभी भी सामान्य प्रशासनिक भाषा में प्रकट नहीं होता। वह शुरू में हास्यास्पद, विकृत, अस्वीकार्य या “असभ्य” दिखाई देता है। इसीलिए हर व्यवस्था अपने सत्य को पहले “कोकरोच” की तरह देखती है — एक ऐसे जीव की तरह जो हर सफ़ाई अभियान के बाद भी बचा रहता है; जो अंधेरों, दरारों और सड़ांध में पलता है, और मज़े की बात है कि उसकी उपस्थिति ही सभ्यता के पूरे दंभ पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
कोकरोच जनता पार्टी का रातोंरात उभरना इसी अर्थ में केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि “गणना से बाहर” पड़े हुए जीवन-तत्वों की वापसी का संकेत है। यह उन अस्मिताओं का उदय है जिन्हें राज्य, मीडिया और शिष्ट राजनीतिक भाषा ने हमेशा कीट-पतंगों की तरह देखा । ऐसे अवांछित, गंदे, असभ्य तत्व जो दृश्य से हटाए जाने योग्य हैं । लेकिन बाद्यू के अर्थ में सत्य हमेशा वहीं से आता है जहाँ व्यवस्था की आम तौर पर दृष्टि नहीं जाती ।
यहाँ “कोकरोच” केवल एक व्यंग्यात्मक नाम नहीं है, वह स्वयं एक दार्शनिक श्रेणी, सत्य का धारक-वाहक प्रमाता बन जाता है। यह कोकरोच वह है जो परमाणु विस्फोट के बाद भी जीवित रह जाता है; जो इतिहास के हर विनाश के बाद भी लौट आता है।
आधुनिक राज्य स्वयं को स्वच्छता, विकास, राष्ट्र और सुरक्षा की चमकदार भाषा में प्रस्तुत करता है, लेकिन उसके नीचे जो सड़ांध, बेरोज़गारी, भय, असुरक्षा, असमानता और अपमान जमा होता है, वही अंततः कोकरोचों की दुनिया बनाता है। यही मैक्सिम गोर्की की “नीचे की दुनिया” (The Lower Depths) है ।
कोकरोच जनता पार्टी नीचे की दुनिया की नई राजनीति का संकेतक है । यह कहना कि “हम ही कोकरोच हैं” इस नीचे की दुनिया के अपमान को उलट देना है जिसे व्यवस्था ने जनता पर थोप रखा था। ठीक वैसे ही जैसे इतिहास में फ़्रांसीसी क्रांति के “साँ-क्यूलोत” (sans-culottes), (कुलीनता-विरोधी जन), भारत के अछूत, अमेरिका के काले और आज की दुनिया के एलजीबीटी प्लस आदि शब्दों को जिस नफ़रत के भाव के साथ शुरू में कहा गया, बाद में वे ही प्रतिरोध की पहचान बन गए। इसी श्रेणी में हम समाजवादी क्रांति के मज़दूर वर्ग को भी रखेंगे ।
बाद्यू के अनुसार सत्य का उदय हमेशा एक “घटना” (Event) के रूप में होता है, कुछ ऐसा जिसकी संभावना पुराने ज्ञान में नहीं थी। भारतीय राजनीति में दशकों से वही स्थापित दल, वही जातीय-सांप्रदायिक समीकरण, वही मीडिया-निर्मित राष्ट्रवाद और वही चुनावी प्रबंधन चलता रहा है। ऐसे में “कोकरोच जनता पार्टी” का अचानक उभरना इस बात का संकेत हो सकता है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व की पारंपरिक भाषा टूट रही है। इससे लगता है जैसे जनता अब अपने को “सभ्य नागरिक” के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा कुचले गए अस्तित्व के रूप में पहचानने लगी है।
हर घटना अपने साथ एक नए प्रमाता को भी जन्म देती है। बाद्यू के यहाँ प्रमाता कोई पहले से तैयार व्यक्ति नहीं होता; वह सत्य के प्रति निष्ठा (fidelity) की प्रक्रिया में बनता है। कोकरोच जनता पार्टी का वास्तविक महत्व भी इसी में होगा कि क्या वह केवल क्षणिक आक्रोश बन कर रह जाएगी, या वह उन लोगों के भीतर एक नए राजनीतिक प्रमाता को जन्म दे पाएगी जो अब तक केवल उपभोक्ता, मतदाता या भीड़ थे।
यहीं पर कुछ दूसरे प्रश्न भी उठ जाते हैं, क्योंकि व्यवस्था हर सत्य को जल्दी ही तमाशे में बदल देती है। मीडिया “कोकरोच” को मीम बना सकता है, सत्ता उसे हास्य में बदल सकती है, और बाज़ार उसे टी-शर्ट तथा सोशल मीडिया ट्रेंड में बदल सकता है। सत्य की राजनीति और बाज़ार की विडंबना के बीच यही संघर्ष निर्णायक होता है।
फिर भी, इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने भारतीय राजनीति के “साफ-सुथरे” मुखौटे को चीर दिया है। उसने दिखाया है कि राष्ट्र की चमकदार भाषा के नीचे असंख्य ऐसे जीवन हैं जिन्हें व्यवस्था की दृष्टि में मनुष्य तक नहीं माना जाता। यदि वे स्वयं को “कोकरोच” कहकर सामने आते हैं, तो यह दरअसल मानव-विरोधी राजनीतिक संरचना पर सबसे तीखा व्यंग्य है।
बाद्यू की भाषा में कहें तो सत्य हमेशा “स्थिति के ज्ञान” से अतिरिक्त होता है। कोकरोच जनता पार्टी इसी अतिरिक्तता का एक विचित्र, व्यंग्यात्मक और विघटनकारी संकेत है। वह हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल संसदों और टीवी स्टूडियो में नहीं बनता; वह उन अंधेरी दरारों में भी बनता है जहाँ व्यवस्था अपने कचरे को फेंकती है। और कई बार वही कचरा, वही “कोकरोच”, इतिहास के अगले प्रमाता के रूप में लौट आता है।
मंगलवार, 12 मई 2026
तमिलनाडु और भारत में जेनजी की दस्तक
−अरुण माहेश्वरी
तमिलनाडु में टीवीके की जीत एक असाधारण घटना है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक की दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति के भीतर वहां अचानक एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट घटित हुआ जिसे पारंपरिक राजनीतिक विश्लेषणों ने लगभग असंभव माना था।
हमारी नजर में, यह केवल किसी अभिनेता की लोकप्रियता का परिणाम नहीं है। भारत में अभिनेता पहले भी राजनीति में आए हैं। लेकिन यहाँ निर्णायक बात यह है कि यह एक ऐसे समय में संभव हुआ है जिसे दुनिया में जेनजी के उभार के समय के रूप में भी पहचाना जा रहा है । विजय के पीछे भी कुछ एक ऐसी युवा आकांक्षा संगठित हुई है जो अपने को पुरानी विचारधारात्मक संरचनाओं के साथ बेमेल पाती है ।
यह उस नए राजनीतिक प्रमाता के उदय की घोषणा है जिसकी आहट पिछले छह दशकों से हमें दुनिया के अलग-अलग कई विद्रोहों में कभी धीमी तो कभी काफी विस्फोटक ध्वनि में सुनाई देती रही है। आज जिसे “जेनजी” कहा जा रहा है, वह दरअसल केवल एक आयु-समूह नहीं, बल्कि इतिहास की एक नई राजनीतिक सत्ता-चेतना है—एक ऐसा प्रमाता जो पुराने वर्गीय, वैचारिक और संगठनात्मक ढाँचों के भीतर स्वयं को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाता है।
आज के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के अनुसार, राजनीतिक सत्य का प्रमाता किसी पहले से स्थापित सामाजिक वर्ग का दूसरा नाम नहीं होता। वह हमेशा किसी एक घटना (event) से जन्म लेता है। एक ऐसी घटना से जो स्थापित व्यवस्था की गणना से बाहर होती है, जो राजनीति के पुराने व्याकरण को तोड़ देती है, और जिसके प्रति जनता की निष्ठा राजनीति के एक नए भुवन का निर्माण करती है।
कहना न होगा, टीवीके के विजय के उभार की घटना तमिलनाडु में द्रमुक राजनीति के जगत में एक बड़ी दरार की तरह है । द्रमुक-अन्नाद्रमुक की दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति के बीच अचानक एक ऐसे राजनीतिक केंद्र का उभरना जिसे स्थापित दलों ने लंबे समय तक “सिनेमाई लोकप्रियता” समझ कर हल्के में लिया था, यह बताता है कि यहां राजनीति की सामाजिक संरचना बदल रही है। यहाँ केवल अभिनेता की लोकप्रियता निर्णायक नहीं है; निर्णायक वह युवा आकांक्षा है जो अपने लिए एक नई भाषा, नया प्रतीक और नया राजनीतिक शरीर खोज रही है।
यह वही ऐतिहासिक ऊर्जा है जिसकी पहली विराट आधुनिक अभिव्यक्ति हमें 1968 के मई महीने में फ्रांस के कैम्पस विद्रोह में दिखाई दी थी। फ़्रांस के विश्वविद्यालयों के छात्र केवल शिक्षा-व्यवस्था के खिलाफ नहीं उठे थे; उन्होंने आधुनिक राजसत्ता, नौकरशाही, पूँजीवादी श्रम-संरचना और यहाँ तक कि सोवियत शैली के संगठित वामपंथ—सभी को चुनौती दी थी। “कल्पना को सत्ता दो” का नारा केवल सांस्कृतिक विद्रोह नहीं था; वह राजनीति के एक नए प्रमाता का उदय था। उसने तत्कालीन फ्रांस के बड़े-बड़े कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया था । ऐलेन बाद्यू, मिशैल फुको ने वहीं से अपने रास्ते को किंचित बदल कर सामाजिक विश्लेषण की अपनी नई धाराओं और दर्शन को विकसित किया था ।
उस समय राजसत्ता और बाद्यू जिन्हें राजसत्तावादी क्रांतिकारी कहते हैं, सांस्थानिक कम्युनिस्ट पार्टियां—दोनों ने मिलकर उस शक्ति को दबाया था । फ़्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी ने छात्रों को अव्यवस्थित अराजकतावादी कह कर खारिज किया। बीसवीं सदी का पारंपरिक वामपंथ उस नई युवा चेतना को समझ नहीं पाया, क्योंकि उसकी राजनीति अब भी औद्योगिक मजदूर वर्ग की पुरानी समझ पर टिकी हुई थी।
अगर हम गौर से देखें तो भारत में इस युवा शक्ति का एक सबसे तीखा रूप 1967 में नक्सलवादी विद्रोह में सामने आया जब कोलकाता के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से निकले प्रतिभाशाली नौजवानों ने पहली बार नक्सलबाड़ी में हुए कृषक आंदोलन की भावभूमि से खुद को जोड़ कर उसे एक अखिल भारतीय परिघटना का रूप दिया; भारतीय राज्य को यह एहसास कराया कि राजनीति केवल चुनाव और पार्टी-संगठन की चीज़ नहीं है। तब एक नई पीढ़ी स्वयं को इतिहास का प्रत्यक्ष निर्माता मानने लगी थी। उस आंदोलन की त्रासदी अपनी जगह है, लेकिन यह भी सत्य है कि भारतीय राजनीति में विद्रोही युवा प्रमाता की वह पहली बड़ी दस्तक थी । बाद में गुजरात के छात्र आंदोलन और बिहार में जेपी के आंदोलन के बीच से इसका राजसत्तावादी चरित्र भी सामने आया ।
इक्कीसवीं सदी में प्रवेश के साथ ही दुनिया में नया डिजिटल युग आया। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस नई पीढ़ी को पहली बार वैश्विक समकालिकता प्रदान की। 2011 में अरब वसंत (Arab Spring) में ट्यूनीशिया, मिस्र और मध्यपूर्व के दूसरे देशों के युवाओं ने यह दिखाया कि राजनीतिक संगठन अब केवल पार्टी कार्यालयों से नहीं, मोबाइल फ़ोन और नेटवर्कों से भी निर्मित हो सकता है। यह कोई पारंपरिक मजदूर आंदोलन नहीं था। डिजिटल संचार स्वयं राजनीतिक संगठन की शक्ति बन चुका था।
दक्षिण एशिया में भी हमें हाल में कमोबेस यही ढर्रा दिखाई देता है। श्रीलंका में अरगलाया (संघर्ष) (2022) के दौरान युवाओं ने राष्ट्रपति भवनों तक पर कब्ज़ा कर लिया। जनता ने पारंपरिक राजनीतिक कुलीनता से अपनी निष्ठा को खत्म कर सड़कों पर उतरे नए प्रमाता को वैधता प्रदान की। बांग्लादेश (2024) में छात्रों और नौजवानों ने दीर्घकालिक सत्ता-संरचना के विरुद्ध जिस शक्ति का प्रदर्शन किया, उसने भी यह दिखाया कि डिजिटल पीढ़ी अब भय की पुरानी राजनीतिक संरचनाओं से मुक्त हो रही है।
पिछले साल ही हमने अपने पड़ोसी नेपाल में तो बाकायदा जेनजी के नाम से सत्ता परिवर्तन के हिंसक संघर्ष को देखा । वहाँ केवल पारंपरिक दलों की सत्ता ही नहीं हिली, बल्कि काठमांडू के एक युवा लोकगायक को जनता ने प्रधानमंत्री पद तक पहुँचा दिया । यह घटना अत्यंत प्रतीकात्मक है। इसका अर्थ यह है कि जनता अब केवल विचारधारात्मक कैडरों या राजनीतिक वंशों में प्रतिनिधित्व नहीं खोज रही। वह सांस्कृतिक रूप से अपने निकट और भावनात्मक रूप से अपनी बेचैनी को व्यक्त करने वाले व्यक्तित्वों में अपना सत्य देखने लगी है।
इसी व्यापक पृष्ठभूमि में भारत की हाल की राजनीति को समझना होगा। अभी हमने गौर किया कि बंगाल में सीपीआई(एम) ने इस बार जिस प्रकार छात्रों और कम उम्र के नौजवानों को उम्मीदवार बनाया, वह भी केवल एक चुनावी प्रयोग नहीं कहलायेगा। इन उम्मीदवारों की इस चुनाव में काफी चर्चा रही । इनकी सफलता के बारे में हमें गहरा संदेह जरूर था, जो एक हद तक चुनाव परिणामों में भी देखने को मिला, लेकिन इसमें हमें बंगाल में बीज रूप में ही क्यों न हो, जेनजी आंदोलन की एक झलक दिखाई दी । लंबे समय तक खास प्रकार की पारंपरिक राजनीति पर टिके रहने के बाद बंगाल का वामपंथ पहली बार इस ऐतिहासिक तथ्य को स्वीकार करता दिखाई दिया कि राजनीति का भुवन बदल चुका है। इसमें डिजिटल युवा पीढ़ी का प्रवेश हो चुका है ।
इन उम्मीदवारों की जीत नहीं हुई, लेकिन उन्हें जिस मात्रा में मत मिले और जिस प्रकार इन नये उम्मीदवारों के बावजूद वामपंथ के मत प्रतिशत में कोई और बड़ी गिरावट नहीँ आई, वह संकेत देता है कि बंगाल में भी जेनजी का नया प्रमाता जन्म ले रहा है। हमारी नजर में यह महत्वपूर्ण है कि यह समर्थन केवल वैचारिक अनुशासन के कारण नहीं आया; इसमें युवा आकांक्षा, सांस्कृतिक पहचान और भविष्य की बेचैनी का तत्व निश्चित रूप से काम करता रहा है। यद्यपि इस युवा नेतृत्व के कुछ लोगों के मुंह से जब हमने पारंपरिक आशालीन भाषा को सुना और उनमें प्रतिद्वंद्विता के पुराने तेवर को ही पाया तो थोड़ी निराशा भी हुई । हमारा मानना है कि ऐसे चंद लोग शीघ्र ही पुरानी राजनीति के कीचड़ में कहीं धस जायेंगे, वामपंथ में जेनजी की ताजगी बनी रहेगी । इन उम्मीदवारों की हार भी अपने भीतर एक सत्य छिपाए हुए है। बाद्यू बार-बार कहते हैं कि सत्य की प्रक्रिया का मूल्य केवल सत्ता प्राप्ति से तय नहीं होता। कई बार राजनीतिक घटना अपनी तत्काल सफलता में नहीं, बल्कि भविष्य के प्रमाता के निर्माण में निर्णायक होती है। बंगाल में वामपंथ का मत प्रतिशत बनाए रखना इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। वह संकेत देता है कि राजनीति के पुराने मठों के भीतर भी नई पीढ़ी एक नए सत्य की खोज कर रही है।
यहीं पर भारत में राहुल गांधी की राजनीति को भी नए ढंग से समझने की जरूरत है। राहुल गांधी की यात्राएँ, उनका लगातार सड़क पर उतरना, बेरोज़गारी, असमानता और संविधान के प्रश्न को भावनात्मक-राजनीतिक भाषा में उठाना, प्रेम-मोहब्बत की तरह के मनोविश्लेषण के प्रतीकों को राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश करना—इन सबका प्रभाव केवल कांग्रेस संगठन तक सीमित नहीं रह सकता है। हमें लगता है जैसे वे कांग्रेस की तरह के राजनीति के सबसे प्राचीन गढ़ से ही उसी नए राजनीतिक भुवन के सत्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ जनता की निष्ठा पुराने दलगत अनुशासन से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष संवेदनात्मक संपर्क से बनती है। तमिलनाडु में विजय के दल को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने में जरा सी भी हिचक न दिखा कर भी कांग्रेस ने राहुल के इसी नये भुवन के प्रति निष्ठा जाहिर की है ।
इसमें शक नहीं कि राहुल गांधी की राजनीति का संकट यह है कि वह अब भी एक पुराने पार्टी-संगठन के भीतर बँधी हुई है, जबकि उसकी अपील का स्रोत उससे बाहर उभरती युवा आकांक्षा में है। इसीलिए उनकी राजनीति में लगातार एक द्वंद्व दिखाई देता है—एक ओर संस्थागत कांग्रेस, दूसरी ओर सड़कों और डिजिटल माध्यमों में बनती नई जन-ऊर्जा।
ऐलेन बाद्यू के अनुसार किसी भी राजनीतिक सत्य के प्रमाता के निर्माण के लिए चार तत्व आवश्यक होते हैं—घटना, जनाकांक्षा, नया भुवन और उस सत्य के प्रति निष्ठा। कहना न होगा, आज क्रमशः दुनिया के स्तर पर जेनजी की राजनीति इन चारों शर्तों को पूरा करती दिखाई देती है।
पहली बात, इसमें घटना का तत्व है—ऐसी अप्रत्याशित राजनीतिक दरारें जिन्हें पुरानी राजनीति समझ नहीं पा रही। दूसरी बात, यह एक नए भुवन का निर्माण करती है—डिजिटल संचार, सांस्कृतिक तात्कालिकता और नेटवर्क आधारित सामूहिकता का भुवन। तीसरी बात, इसमें जनता की निष्ठा दिखाई देती है—श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और अब तमिलनाडु और भारत की राजनीति में राहुल गांधी की परिघटना । और चौथी बात, यह सीधे वर्तमान सत्ता की संरचनाओं को चुनौती देता है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बीसवीं सदी का मजदूर वर्ग अब अपनी पुरानी हरावल दस्ते की ऐतिहासिक पहचान खो चुका है। प्लेटफ़ॉर्म पूँजीवाद, अस्थायी श्रम, डिजिटल संचार और सांस्कृतिक उद्योगों ने श्रम की केंद्रीकृत संरचना को विघटित कर दिया है। इसलिए राजनीति का नया प्रमाता भी पारंपरिक वर्गीय पहचान से मुक्त है। और, आज की दुनिया में जेनजी केवल युवा मतदाता नहीं है। वह एक नया ऐतिहासिक प्रमाता है—अस्थिर, विस्फोटक, डिजिटल, भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से तीव्र। यही उसकी शक्ति है और कह सकते हैं कि यही उसका संकट भी है।
लेकिन इतिहास का हर नया सत्य पहले अराजक दिखाई देता है। 1968 के फ़्रांसीसी छात्र, नक्सलबाड़ी के नौजवान, अरब स्प्रिंग के डिजिटल विद्रोही, श्रीलंका के अरगलाया आंदोलनकारी, बांग्लादेश के छात्र, नेपाल का युवा लोकगायक नेतृत्व, बंगाल के युवा वामपंथी उम्मीदवार और तमिलनाडु में टीवीके की विजय—ये सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। ये राजनीति के एक नए वैश्विक भुवन के विविध संकेत हैं। और शायद पहली बार भारत की राजनीति भी उस नए भुवन की दहलीज़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राजनीति के बूढ़े गिद्धों की सत्ता के उलट जाने का वक्त करीब आ रहा है ।
