गुरुवार, 21 मई 2026

कोकरोच जनता पार्टी के उदय का दर्शनशास्त्र

-अरुण माहेश्वरी




ऐलेन बाद्यू की प्रसिद्ध उक्ति है—“दुनिया में केवल शरीर और भाषा है, सिवा इसके कि एक सत्य है”(There is only body and language, except that there is a truth) यह कथन “लोकतांत्रिक भौतिकवाद” के विरुद्ध बाद्यू के भौतिकवादी द्वंद्ववाद की उद्घोषणा की तरह है। 

लोकतांत्रिक भौतिकवाद कहता है कि दुनिया केवल शरीरों, पहचानों, उपभोगों, भाषिक खेलों और सत्ता-व्यवस्थाओं का तंत्र है; जो है, वही अंतिम है। लेकिन बाद्यू कहते हैं कि नहीं, इस “जो है” के भीतर ही एक ऐसा तत्व उपस्थित होता है जो स्वयं उस व्यवस्था में गिना नहीं जाता। वह जो गिनती के बाहर होता है, वही सत्य है एक अपवाद, एक अतिरिक्तता, एक ऐसी दरार जो पूरी व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती देती है।

सत्य कभी भी सामान्य प्रशासनिक भाषा में प्रकट नहीं होता। वह शुरू में हास्यास्पद, विकृत, अस्वीकार्य या “असभ्य” दिखाई देता है। इसीलिए हर व्यवस्था अपने सत्य को पहले “कोकरोच” की तरह देखती है — एक ऐसे जीव की तरह जो हर सफ़ाई अभियान के बाद भी बचा रहता है; जो अंधेरों, दरारों और सड़ांध में पलता है, और मज़े की बात है कि उसकी उपस्थिति ही सभ्यता के पूरे दंभ पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।

कोकरोच जनता पार्टी का रातोंरात उभरना इसी अर्थ में केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि “गणना से बाहर” पड़े हुए जीवन-तत्वों की वापसी का संकेत है। यह उन अस्मिताओं का उदय है जिन्हें राज्य, मीडिया और शिष्ट राजनीतिक भाषा ने हमेशा कीट-पतंगों की तरह देखा । ऐसे अवांछित, गंदे, असभ्य तत्व जो दृश्य से हटाए जाने योग्य हैं । लेकिन बाद्यू के अर्थ में सत्य हमेशा वहीं से आता है जहाँ व्यवस्था की आम तौर पर दृष्टि नहीं जाती । 

यहाँ “कोकरोच” केवल एक व्यंग्यात्मक नाम नहीं है, वह स्वयं एक दार्शनिक श्रेणी, सत्य का धारक-वाहक प्रमाता बन जाता है। यह कोकरोच वह है जो परमाणु विस्फोट के बाद भी जीवित रह जाता है; जो इतिहास के हर विनाश के बाद भी लौट आता है। 

आधुनिक राज्य स्वयं को स्वच्छता, विकास, राष्ट्र और सुरक्षा की चमकदार भाषा में प्रस्तुत करता है, लेकिन उसके नीचे जो सड़ांध, बेरोज़गारी, भय, असुरक्षा, असमानता और अपमान जमा होता है, वही अंततः कोकरोचों की दुनिया बनाता है। यही मैक्सिम गोर्की की “नीचे की दुनिया” (The Lower Depths) है । 

कोकरोच जनता पार्टी नीचे की दुनिया की नई राजनीति का संकेतक है ।  यह कहना कि “हम ही कोकरोच हैं” इस नीचे की दुनिया के अपमान को उलट देना है जिसे व्यवस्था ने जनता पर थोप रखा था। ठीक वैसे ही जैसे इतिहास में फ़्रांसीसी क्रांति के “साँ-क्यूलोत” (sans-culottes), (कुलीनता-विरोधी जन), भारत के अछूत, अमेरिका के काले और आज की दुनिया के एलजीबीटी प्लस आदि शब्दों को जिस नफ़रत के भाव के साथ शुरू में कहा गया, बाद में वे ही प्रतिरोध की पहचान बन गए। इसी श्रेणी में हम समाजवादी क्रांति के मज़दूर वर्ग को भी रखेंगे । 

बाद्यू के अनुसार सत्य का उदय हमेशा एक “घटना” (Event) के रूप में होता है, कुछ ऐसा जिसकी संभावना पुराने ज्ञान में नहीं थी। भारतीय राजनीति में दशकों से वही स्थापित दल, वही जातीय-सांप्रदायिक समीकरण, वही मीडिया-निर्मित राष्ट्रवाद और वही चुनावी प्रबंधन चलता रहा है। ऐसे में “कोकरोच जनता पार्टी” का अचानक उभरना इस बात का संकेत हो सकता है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व की पारंपरिक भाषा टूट रही है। इससे लगता है जैसे जनता अब अपने को “सभ्य नागरिक” के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा कुचले गए अस्तित्व के रूप में पहचानने लगी है।

हर घटना अपने साथ एक नए प्रमाता को भी जन्म देती है। बाद्यू के यहाँ प्रमाता कोई पहले से तैयार व्यक्ति नहीं होता; वह सत्य के प्रति निष्ठा (fidelity) की प्रक्रिया में बनता है। कोकरोच जनता पार्टी का वास्तविक महत्व भी इसी में होगा कि क्या वह केवल क्षणिक आक्रोश बन कर रह जाएगी, या वह उन लोगों के भीतर एक नए राजनीतिक प्रमाता को जन्म दे पाएगी जो अब तक केवल उपभोक्ता, मतदाता या भीड़ थे।

यहीं पर कुछ दूसरे प्रश्न भी उठ जाते हैं, क्योंकि व्यवस्था हर सत्य को जल्दी ही तमाशे में बदल देती है। मीडिया “कोकरोच” को मीम बना सकता है, सत्ता उसे हास्य में बदल सकती है, और बाज़ार उसे टी-शर्ट तथा सोशल मीडिया ट्रेंड में बदल सकता है। सत्य की राजनीति और बाज़ार की विडंबना के बीच यही संघर्ष निर्णायक होता है।

फिर भी, इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने भारतीय राजनीति के “साफ-सुथरे” मुखौटे को चीर दिया है। उसने दिखाया है कि राष्ट्र की चमकदार भाषा के नीचे असंख्य ऐसे जीवन हैं जिन्हें व्यवस्था की दृष्टि में मनुष्य तक नहीं माना जाता। यदि वे स्वयं को “कोकरोच” कहकर सामने आते हैं, तो यह दरअसल मानव-विरोधी राजनीतिक संरचना पर सबसे तीखा व्यंग्य है।

बाद्यू की भाषा में कहें तो सत्य हमेशा “स्थिति के ज्ञान” से अतिरिक्त होता है। कोकरोच जनता पार्टी इसी अतिरिक्तता का एक विचित्र, व्यंग्यात्मक और विघटनकारी संकेत है। वह हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल संसदों और टीवी स्टूडियो में नहीं बनता; वह उन अंधेरी दरारों में भी बनता है जहाँ व्यवस्था अपने कचरे को फेंकती है। और कई बार वही कचरा, वही “कोकरोच”, इतिहास के अगले प्रमाता के रूप में लौट आता है।



8 टिप्‍पणियां:

  1. पैनी नज़र का सूक्ष्म विश्लेषण, याद शुभकामनायें।

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  2. कॉकरोच जनता पार्टी का उदय जन क्रान्ति के पहले की सुगबुगाहट प्रतीत होता है। जिस जनता की सत्ता के गलियारों में कोई गिनती नहीं वही सर्वहारा जनता एक दिन क्रान्ति की संवाहक बनेगी यह विश्वास भी बनता है।
    बहरहाल आपको इस विश्लेषणपरक लेख के लिये बधाई।

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  3. उत्तम विश्लेषण 🙏

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  4. उम्दा लेख !!कॉकरोच पार्टी आशा की किरण ज़रूर है पर भय भी की कहीं अन्ना हज़ारे जैसा खेल फिर ना हो जाये

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  5. उत्तम रूप में है

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  6. उत्तम रूप में है

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  7. फेसबुक वॉल पर पढ़ा था।आज यहां दुबारा पढा।बाद्यू के दर्शन के आलोक में एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण सामने आया जो उम्मीद भी जगाता है और आशंका भी। बढ़िया समझाया है आपने। सीखता रहता हूं आपसे। प्रणाम

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