सोमवार, 19 जनवरी 2026

“Board of Peace” : शेखचिल्ली का महल, जिसकी इतिहास में कोई ज़मीन नहीं है

-अरुण माहेश्वरी

 

जिस गति से चीन का उभार हो रहा है और ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका जिस तेज़ी से अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिकाओं से पैर खींच रहा है, उससे अब यह साफ़ हो चला है कि वर्तमान विश्व-व्यवस्था के भीतर ही वह दबाव पैदा हो रहा है जो एक नई व्यवस्था को जन्म देगा।

कोई भी व्यवस्था तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उसकी अंदरूनी संभावनाएँ चुक नहीं जातीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से चली आ रही अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था में आज संसाधनों की खींच-तान, वैधता का क्षरण, और वैश्विक गठबंधनों में शिथिलता के चलते क्षय के वही लाइलाज लक्षण दिखाई देने लगे हैं जो उसकी मृत्यु को लगभग तय कर रहे हैं।

यदि हम इस प्रक्रिया को गणित की सेट थियरी की भाषा में कहें तो यह एक ऐसी आंतरिक बाध्यता (forcing) की तरह है जो पुराने ढाँचे के भीतर ही नई स्थिति को “अपरिहार्य” बना देती है। परिवर्तन किसी घोषणापत्र या रणभेरी से नहीं आता—वह व्यवस्था के भीतर जमा हुए अन्तर्विरोधों के दबाव से जन्म लेता है।

लेकिन ठीक इसी ऐतिहासिक मोड़ पर ट्रंप का ग़ज़ा को केंद्र में रखकर बहुदेशीय “Board of Peace” (शांति-निकाय) का प्रस्ताव—कुछ चुनिंदा देशों को पत्र लिखकर संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुस्तरीय संस्था के स्थान पर अपने सीधे प्रभुत्व वाली बहुदेशीय संस्था की परिकल्पना—दरअसल इसी फोर्सिंग की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया को पहले ही रोककर उलट देने की एक कोशिश है। जो परिवर्तन भीतर ही भीतर पक चुका है, उसे बाहर से शक्ति के प्रयोग द्वारा बलपूर्वक मोड़ देने का प्रयास है।

यहीं फ्रेडरिक एंगेल्स का लेख “इतिहास में बल प्रयोग की भूमिका” याद आता है। लेख के बिल्कुल आरंभ में ही उन्होंने एक प्रमेय की तरह यह सवाल रखा था कि “ख़ून और तलवार की नीति” कुछ समय के लिए सफल क्यों होती है—और अंततः उसका विफल होना क्यों लाज़िमी है। एंगेल्स का निष्कर्ष साफ़ था: बल प्रयोग किसी समय तक परिणाम दे सकता है, पर वह इतिहास का नियम नहीं बन सकता। इतिहास का नियम अंततः आर्थिक संरचना और उत्पादन-सम्बन्धों की गति से तय होता है। सत्ता का अंतिम संतुलन वहीं टिकता है जहाँ उसकी आर्थिक ज़मीन मौजूद होती है।

ट्रंप का “शांति-निकाय” इसी अर्थ में सचमुच शेखचिल्ली का महल है।

वे यह मानकर चल रहे हैं कि हिंसा, धमकी, प्रतिबंध, और मनमाने ढंग से चुने गए देशों तथा प्रतिनिधियों की सूची से एक नई वैश्विक संरचना बनाई जा सकती है। उन्होंने विश्व-व्यवस्था को एक निजी क्लब समझ लिया है। उनका जड़ राजनीतिक विवेक शायद यह देख ही नहीं पा रहा कि विश्व-व्यवस्था उत्पादन, व्यापार, तकनीक, वित्त, ऊर्जा और श्रम जैसे आर्थिक कारकों के विश्व-स्तरीय रिश्तों का एक अत्यंत जटिल जाल होती है। संयुक्त राष्ट्र की बहुस्तरीयता भी कोई महज नैतिक आदर्श या सुविधाजनक व्यवस्था नहीं, बल्कि उसी जाल का संस्थागत रूप है।

ट्रंप इस जाल को काटकर अपना एक नया “शॉर्टकट” बनाना चाहते हैं, पर इतिहास में शॉर्टकट व्यवस्था नहीं बनाते, केवल अराजकता पैदा करते हैं। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में इसके असंख्य उदाहरण मौजूद हैं।

ट्रंप की मूर्खता का आलम यह है कि वे नोबेल शांति पुरस्कार देने वाले देश नार्वे से धमकी के बल पर पुरस्कार “ऐंठने” को भी “अमेरिका को फिर से महान” बनाने का कोई नुस्ख़ा मान बैठे हैं।

दरअसल, बल प्रयोग पर भरोसा करने वालों का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वे मानते हैं कि कोरा बल “निर्माण” भी कर सकता है। उन्हें यह अहसास नहीं होता कि बल से अधिकतम ध्वंस संभव है, निर्माण नहीं।

नई विश्व-व्यवस्था तभी बनती है जब उत्पादन और तकनीक के नए केंद्र उभरते हैं, व्यापार के नए मार्ग स्थिर होते हैं, वित्तीय शक्ति का नया अनुशासन जन्म लेता है, और दुनिया के देशों के ज़ेहन में वैधता का कोई नया प्रतीकात्मक रूप बन चुका होता है।

ट्रंप की घोषणाएँ इनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं करतीं—वे तो इन सबको एक सिरे से नकारती हैं। वे नई व्यवस्था की ज़मीन नहीं बनातीं; वे केवल पुराने ढाँचे को और अधिक कमजोर करती हैं।

अपने ‘MAGA’ कार्यक्रम के तहत ट्रंप जिस “नई विश्व-व्यवस्था” को खुद गढ़ना चाहते हैं, वह उसी निर्माण-प्रक्रिया में केवल बाधा बन सकती है। जिस तरह नैटो के सदस्य देश चीन की ओर झुकने लगे हैं, वर्षों के विरोध के बाद भी कनाडा चीन में एक विकल्प देख रहा है, और चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना को जिस प्रकार दुनिया में समर्थन मिल रहा है—ये सब प्रमाण हैं कि ट्रंप की नीतियाँ ही अमेरिका के मित्रों को उससे दूर धकेल रही हैं।

इसीलिए यदि यह ‘शांति-निकाय’ कभी बन भी गया तो उसके स्थायित्व की कोई गारंटी नहीं होगी। वह शुद्ध रूप से एक विघटनकारी निकाय होगा—एक ऐसी संरचना जो स्वयं अपने भीतर अस्थिरता, अविश्वास और विद्रोह के बीज लिए होगी।

जिस व्यवस्था की नींव साझा आर्थिक-ऐतिहासिक ज़मीन पर नहीं, बल्कि किसी एक शक्ति के स्वेच्छाचार पर रखी जाती है, वह व्यवस्था नहीं—एक सामयिक ज़ोर-ज़बर्दस्ती होती है।

ट्रंप की पैंतरेबाज़ी इतिहास की धारा को नहीं मोड़ सकती। वह केवल शोर पैदा कर सकती है।

अंत में हम फिर एंगेल्स के कथन को ही दोहराएँगे: “ख़ून और तलवार की नीति” कुछ समय तक सफल लग सकती है, पर उसका विफल होना लाज़िमी है। अंतिम विजय हमेशा उन्हीं शक्तियों की होती है जिनके पीछे इतिहास की वास्तविक ज़मीन होती है। और आज की दुनिया में वह ज़मीन किसी एक की नहीं—अनेकों की है। दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं, बहुध्रुवीय है।

ट्रंप जिस महल का नक्शा बना रहे हैं, उसके लिए इस दुनिया में रत्ती भर ज़मीन नहीं बची है—न किसी के पिछवाड़े में, न किसी के कथित “प्रभाव क्षेत्र” मे !

ट्रंप का यह महल शेखचिल्ली का सपना है । इतिहास की मिट्टी पर अब उसका निर्माण तो दूर, उसके नक़्शे को उकेरना भी संभव नहीं होगा ।


बुधवार, 14 जनवरी 2026

ट्रंप की सनक या अमेरिकी साम्राज्यवाद का असल रूप !

 



-अरुण माहेश्वरी

ट्रंप ने आज सारी दुनिया को जैसे किसी हुक पर टांग कर रख दिया है । सामान्य बुद्धि का कोई भी आदमी, जो खास तौर पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के विगत 80 साल में दुनिया की एक निश्चित प्रतीकात्मक व्यवस्था के दायरे में सोचने का अभ्यस्त हो चुका है, ट्रंप के टैरिफ युद्ध से लेकर एक राष्ट्रपति दंपत्ति का खुले आम अपहरण और दुनिया के किसी भी कोने में सैनिक हस्तक्षेप करने की रणनीति को पूरी तरह से समझ ही नहीं पा रहा है । महाशक्तियों द्वारा अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में पूर्ण वर्चस्व बनाने का कथित मुनरो डाक्ट्रिन, जिसे अभी ट्रंप के नाम पर डोनरो डाक्ट्रिन कहा जाने लगा है, उससे भी ट्रंप की वर्तमान रणनीति की कोई संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती है ।      

हमारे सामने अभी मूल प्रश्न यह है कि ट्रंप की वर्तमान आक्रामक वैश्विक नीति क्या सिर्फ एक व्यक्ति की अनियंत्रित सनक है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह अमेरिका में अगले संतुलित बुद्धि के राष्ट्रपति के आने तक की समस्या भर है या यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का असल, अब तक छिपा कर काबू में रखा गया रूप है जो अभी हमें सीधे विश्व की लकानियन प्रतीकात्मक (Symbolic), छविमूलक (Imaginary) और रीयल (Real) की गांठ के अंदर की उस कसमसाहट का साक्षी बना रहा है, जिसमें यह विश्व-व्यवस्था अपनी समग्रता की छतरी के नीचे तार-तार होकर फटती हुई दिखाई दे रही है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी कानून-आधारित विश्व व्यवस्था मूलतः संप्रभु राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र, और परमाणु प्रतिरोध (डेटरेंस) के संतुलन एक प्रतीकात्मक संरचना रही है, जिसके प्रति सभी संप्रभु राष्ट्रों के साझा मौन समर्थन के बल पर युद्ध का पूर्ण-विनाशकारी ‘रीयल’ खुल कर खेल नहीं पाता है । इधर-उधर बल का प्रयोग होता रहा है, पर वह कुछ इस प्रकार हुआ है ताकि इस प्रतीकात्मक संरचना के दबाव से काफी हद तक नियंत्रित हो जाए ।  

पर अब ट्रंप तो इस प्रतीकात्मक अनुबंध को ही खुले आम चुनौती देते हुए अपनी मनमर्जी के नियमों की रचना करने पर उतारू हैं। ट्रंप का राजनीतिक आचरण हमें केवल एक व्यक्ति का अहंकार नहीं, बल्कि उस अमेरिकी दैत्याकार शक्ति का सभी आवरणों को चीर कर प्रकट होना प्रतीत होता है, जिसे कई दशकों तक पाल-पोस कर तैयार करने पर भी संस्थागत विवेक के जरिये  ढँक कर रखा जा रहा था। पिछले तमाम दशकों से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की छवि को दुनिया के सबसे ताकतवर इंसान के रूप में गढ़े जाने के बावजूद किसी राष्ट्रपति ने उस सर्वशक्तिमानता को अपने चरित्र में इतने आक्रामक स्वरूप में नहीं ढाला जैसा ट्रंप अभी करते दिखाई देते हैं । वे हर डर से मुक्त, नियमों से परे हैं और अपने को “अमेरिका” का पर्याय मान चुके हैं । अपनी इस आत्म-छवि से कि जैसे वे खुद ही अमेरिका है, उन्हें ऐसा लगता है कि मानो वे जो चाहें, कर सकते हैं !

दरअसल, मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के अनुसार, प्रमाता की छवि, प्रतीकात्मक जगत और इनके इतर यथार्थ (रीयल) की गांठ के अंदर के तनाव में विस्फोटक मोड़ तब आता है जब उसका छविमूलक अहंकार रीयल की भूमिका को अनियंत्रित खुला छोड़ देता है। इससे अमेरिकी सत्ता की राक्षसी शक्ति उसके राष्ट्रपति को, अर्थात् उसके प्रतिनिधि को राजनीति के शर्तों के परे साक्षात राक्षस बना देती है । 

मानव-संहार और पूर्ण-प्रभुत्व की लालसा के राक्षसी तंत्र के यथार्थ से निर्मित ट्रंप के लिए डर मानव जीवन का अवांछित सत्य नहीं, बल्कि राजनीति का एक वांछित, जरूरी और सक्रिय हथियार हो गया है। वे विश्व राजनीति में नाभिकीय हथियारों से उत्पन्न अस्तित्वगत संकट के आतंक को सुनियोजित ढंग से तेजी से उभार रहे हैं, जिसे हिटलर की पराजय के बाद की प्रतीकात्मक व्यवस्था ने वर्षों से दबाकर रखा है । नाभिकीय विनाश, अनियंत्रित युद्ध, मानव सभ्यता मात्र के अंत की आशंका के इस चुनौतीपूर्ण रीयल का अब ट्रंप प्रत्यक्ष धमकी के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यही कारण है कि ट्रंप के वक्तव्यों और कार्रवाइयों में शांति, कूटनीति या नैतिक तर्क जैसी चीजें हास्यास्पद हो जाते हैं । वे अपनी राक्षसी शक्ति के रीयल से दुनिया की प्रतीकात्मक व्यवस्था को पूरी तरह से निरस्त कर देना चाहते हैं।

उनके लिए ‘गोल्डन डोम’ जैसी अमेरिका को सुरक्षित करने की अवधारणाएँ किसी तकनीकी श्रेष्ठता से अधिक, एक मनोवैज्ञानिक संरचना हैं। यह विश्वास कि अमेरिका स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित कर सकता है, और शेष विश्व को असुरक्षा में धकेल सकता है, रीयल पर अपने नियंत्रण का एक कोरा भ्रम है। इसी भ्रम से उत्पन्न विश्वास के साथ वे समग्र वैश्विक परिस्थिति (टोपोलॉजी) में असंतुलन पैदा कर रहे है। इस परिस्थिति में चीन और रूस जैसी महाशक्तियां भौंचक है, पर इसका कारण जितना उनकी सामरिक तैयारियों में कमी नहीं है, उससे बहुत ज्यादा उन पर वर्तमान प्रतीकात्मक व्यवस्था का आत्मानुशासन या बंधन है जो उन्हें रीयल के जोखिम से सतर्क बनाता है । वे यह तय नहीं कर पा रहे लगते है कि उनका मुकाबला एक वास्तविक युद्ध-रणनीति से है या यह महज एक अमेरिकी राष्ट्रपति का आत्मघाती उकसावा है ! हमारी नजर में चीन और रूस में यह अनिर्णय की स्थिति ही ट्रंप की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य है जिसका लाभ ट्रंप को उसके टैरिफ युद्ध, वेनेजुएला के तेल पर कब्जे और अभी ईरान तक में अपने हितों को साधने में मिल रहा है । 

इस पूरे संदर्भ में किसी के भी दिमाग में हिटलर की ऐतिहासिक स्मृतियां उभर सकती है । हिटलर ने भी ट्रंप की भांति ही प्रतीकात्मक व्यवस्था को ध्वस्त कर अपनी ताकत के रीयल को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करना चाहा था। लेकिन आज के रीयल की विनाशकारी क्षमता असीमित है, उसका विस्फोट किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं रह सकता, वह पूरी मानव जाति को निगल सकती है। हिटलर के हाथ में तब वह ताकत नहीं लगी थी । 

लकानियन समग्रता की भाषा में कहें तो, आज की दुनिया एक ऐसे बोरोमियन विन्यास में फँसी हुई है जिसमें प्रतीकात्मक, छविमूलक और रीयल की गाँठ ढीली हो चुकी है। ट्रंप इस गाँठ को और कसने की बजाय उसे ऐसे झटके से खींच रहे हैं कि उसमें से रीयल अलग से बाहर निकल आए, और वह अपना वर्चस्व स्थापित कर लें । उन्हें इस बात की जरा भी फिक्र नहीं है कि इस गांठ के खुलने का अर्थ है कि प्रतीकात्मक और छविमूलक, वर्तमान की पूरी संरचना ही बिखर जायेगी । वे सचेत रूप में इसे बिखेरना चाहते हैं, बिना यह सोचे कि इसका अंतिम अंजाम क्या होगा । इसी राजनीति के तहत वे नहीं चाहते कि रूस-चीन धुरी अपनी शक्ति का संतुलित प्रदर्शन भी करें । वे उसे डरा कर निष्क्रिय रखना चाहते हैं और कम से कम अपने प्रभाव क्षेत्र में अपने हिसाब का एक नया संसार गढ़ लेने पर उतारू हैं । चीन और रूस को परोक्ष रूप में यह लालच भी दे रहे हैं कि क्यों न वे भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में अपने रीयल के अनुरूप नया विश्व गढ़ लें । रीयल को इस प्रकार, लगातार उकसाने का अर्थ है विश्व को समग्र-विस्फोट के कगार पर ले जाना । इसकी उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है।

इसलिए ट्रंप द्वारा पैदा की जा रही समस्या को द्वंद्वात्मक रूप में समझने की जरूरत है । यह न तो केवल ट्रंप की निजी सनक है, न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद की कोई सुविचारित, अजेय रणनीति। यह अमेरिकी शक्ति का वह नग्न रूप है, जो अपने ही छविमूलक अहंकार में डूबकर अपनी प्रतीकात्मक सीमाओं को नकार रहा है। यही कारण है कि यह राजनीति जितनी दूसरों के लिए घातक है, उतनी ही अंततः स्वयं अमेरिका के लिए आत्मघाती भी हो सकती है। डर से क्षणिक प्रभुत्व तो स्थापित किया जा सकता है, पर कोई नई स्थायी विश्व-व्यवस्था तैयार नहीं हो सकती जिसका सपना ट्रंप देख रहे हैं । रीयल की स्वतःस्फूर्त चुनौती जहां प्रगति का वाहक बनती है, वहीं उसे हथियार बनाने की नीति अंततः उस स्वार्थ, शक्ति और हिंसा से लबरेज, अनियंत्रित रीयल को उनमुक्त कर देती है, जिसे सभ्यता ने सदियों की मेहनत से निर्मित प्रतीकात्मक व्यवस्था से बाँध रखा है और जिसे काबू में रखने के लिए अभी सिर्फ पचासी साल पहले द्वितीय विश्वयुद्ध में तकरीबन बारह करोड़ से ज्यादा लोगों की कुर्बानियां दी गई थी।

ट्रंप की कार्रवाइयां अमेरिकी साम्राज्यवाद की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से "सनक" या सिर्फ ट्रंप तक सीमित करना भी सही नहीं है। अमेरिकी इतिहास में मुनरो डाक्ट्रिन से लेकर अभी की ट्रंप की  हेमिस्फेरिक डोमिनेंस (प्रभावक्षेत्र पर वर्चस्व) की प्रवृत्ति लंबे समय से मौजूद है। 2025 की अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी में "फ्लेक्सिबल रियलिज्म" का उल्लेख इसी दिशा में इशारा करता है, जो अमेरिका पर दुनिया के प्रबंधन के बोझ को कम करते हुए अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देता है । यही ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ (मागा) की नीति के मूल में है । वेनेजुएला में निकोलस मदुरो का अपहरण और ग्रीनलैंड पर कब्जे की बातें एक नई तरह के "नग्न साम्राज्यवाद" को दर्शाती हैं, जहां अमेरिका खुले तौर पर प्राकृतिक संसाधनों और क्षेत्रीय प्रभुत्व पर अपने को केंद्रित कर रहा है।  पर यही अंतरराष्ट्रीय कानून और गठबंधनों को कमजोर भी कर रहा है। इस प्रकार, यह अमेरिकी सत्ता की एक निरंतरता ही है, न कि सिर्फ एक व्यक्ति का अहंकार। 

पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भी इराक, अफगानिस्तान में जैसे हस्तक्षेप किए, ट्रंप इसे बिना किसी वैचारिक आवरण के कर रहे हैं । इसे अभी की भाषा में ‘ट्रांजैक्शनल रिलेशन्स’ कहा जाता है। 

हमें याद रखना चाहिए कि साम्राज्यवाद अमेरिकी विदेश नीति के डीएनए में है, और ट्रंप इसे ही बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने ला रहे हैं। अगर चीन और रूस जैसी शक्तियां संयम बरतती रहीं, तो ट्रंप की रणनीति कामयाब हो सकती है । लेकिन इन सबसे वैश्विक विस्फोट का जोखिम हमेशा बना रहेगा।