रविवार, 29 मई 2016

और महावीर प्रसार द्विवेदी !


आज के ‘टेलिग्राफ’ में ‘The Emperor of all Maladies’ के प्रसिद्ध लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी की एक नई किताब ‘The Gene : An intimate history’ की एक समीक्षा प्रकाशित हुई है।

हमने इस किताब को देखा नहीं है, लेकिन ‘टेलिग्राफ’ की समीक्षा में उससे एक उद्धरण है - “illness might vanish but so might identity. Grief might be diminished but so might tenderness. Traumas might be erased but so might history.”
(रोग दूर हो सकते हैं, वैसे ही आदमी की पहचान भी। कष्ट कम हो सकते हैं, वैसे ही कोमलता भी। आघात खत्म हो सकते हैं, वैसे ही इतिहास भी।)

ओरहन पामुक अपने उपन्यास ‘My name is red’ में एक जगह लिखते हैं - ‘‘नुक्स से ही अंदाज पैदा होता है।’’

ऐब ही आदमी की पहचान है।

याद आती है, अंबर्तो इको की बात। वे उपलब्ध भाषा की तुलना फासीवाद से करते हैं। कहते हैं, फासीवाद बोलने से रोकता नहीं, बोलने को थोपता है। प्राप्त भाषा का विन्यास इतना घातक हैं कि वह अपने अंदर गुलाम बना लेती है। उपलब्ध भाषा से छल करके, एक प्रकार की गैर-ईमानदारी और स्वस्थ तथा मुक्तिदायी चालाकी से साहित्य पैदा होता है।

कहना न होगा, भाषा के मानकीकरण पर अतिरिक्त जोर साहित्य का आखेट है। और महावीर प्रसाद द्विवेदी !

Close the history with respect

राष्ट्रपति ओबामा की वियतनाम यात्रा के संदर्भ में हमारे पुराने संस्मऱण -



अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अभी वियतनाम की यात्रा पर गये थे । वहां उनका भारी स्वागत हुआ। चालीस साल पहले तक जो अमेरिका वियतनाम को नेस्तनाबूद कर देने की लड़ाई में उतरा हुआ था, आज उसी का राष्ट्रपति उस धरती पर जाकर वहां के लोगों से सीधे बात कर रहा है। वह कहता है कि हम दो देशों के अनुभव से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है। सीख सकती है कि लोगों के हृदय बदल सकते हैं। हम अपने अतीत के बंदी होकर नहीं रह सकते।
ओबामा की इन बातों से अनायास ही अढ़ाई साल पहले की हमारी वियतनाम यात्रा की यादें ताजा होगई। उस यात्रा के बाद हमने जो लिखा था, आज उसे मित्रों से साझा करके बहुत अच्छा लग रहा है।
9 अक्तूबर 2013 को हम वियतनाम पहुंचे थे और वही से 17 अक्तूबर 2013 को हमने यह पोस्ट लिखी थी - जनरल जियाप, वियतनाम और इतिहास का प्रश्न। हम जब वियतनाम में थे, तभी वहां वियतनाम युद्ध के किवंदंती नायक जनरल जियाप की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार की सरकारी रश्में पूरी हो रही थी। वह टिप्पणी इस प्रकार थी -

जनरल जियाप, वियतनाम और इतिहास का प्रश्न

आठ अक्तूबर को हम हो चि मिन्ह शहर पंहुचे । चार दिन पहले ही वियतनाम के मुक्ति युद्ध के एक किंवदंती पुरुष जनरल जियाप की १०२ साल की उम्र में मृत्यु हुई थी । सोच रहे थे कि वियतनाम में शोक का माहौल होगा । प्रकृत अर्थ में वियतनाम को पूरी तरह आज़ाद हुए ४० साल भी पूरे नहीं हुए हैं । सन् '७५ में ही तो उसका एकीकरण हुआ, तमाम विदेशी सेनाएँ वियतनाम की धरती से पूरी तरह हटीं और इस नवोदित स्वतंत्र राष्ट्र को शांति से जीने का मौक़ा मिला ।

जनरल जियाप इस राष्ट्र के उन चंद नायकों में एक थे, जिनकी बदौलत तक़रीबन दो सौ साल बाद वियतनाम विदेशी सैनिकों के जुएँ से पूरी तरह आजाद हो पाया था । ख़ास तौर पर दियेन बियेन फू की जिस लड़ाई में दुनिया के इतिहास में पहली बार गोरों की किसी सेना को ग़ैर-गोरों की सेना के हाथों लड़ाई के मैदान में धूल चाटनी पड़ी थी, उस लड़ाई में फ़्रांसीसी सेना के ख़िलाफ़ वियतकांग के सैनिकों की कमान जनरल जियाप के हाथ में ही थी ।

'बर्फ़ में ढंके ज्वालामुखी', हो चि मिन्ह के शब्दों में 'युवती की तरह ख़ूबसूरत' जनरल जियाप का एक और नाम था - लाल नेपोलियन । माओ के गुरिल्ला युद्ध में दीक्षित जियाप जानते थे कि ज़मीनी लड़ाई में व्यापक जनता के सहयोग से अधुनातन सेना के भी छक्के छुड़ाये जा सकते हैं । हांलाकि तब तक द्रोण की तरह के आकाश से निशाने पर अचूक वार करने की तकनीक आज के जितनी विकसित नहीं हुई थी ।

दियेन बियेन फू उत्तर-पश्चिम वियतनाम की घनी पहाड़ियों के बीच किसी कटोरे जैसी घाटी है, जिसे फ़्रांसीसी सेना ने उसके पहाड़ी घेरे की वजह से ही अपने लिये सबसे सुरिक्षत समझा था । उन्हें यक़ीन नहीं था कि इन पहाड़ों को चीर कर कोई उन पर हमला कर पायेगा । द्वितीय िवश्वयुद्ध में जापानियों ने यहाँ एक मज़बूत हवाईपट्टी बनाई थी, और फ़्रांसीसियों को इस पट्टी पर भी बहुत भरोसा था कि कुमुक और उसके लिये रसद को पंहुचाने में उनको कोई परेशानी नहीं होगी ।

लेकिन जियाप ने कहा कि जब बकरी इन ऊँची पहाड़ियों के शिखरों पर चढ़ सकती है तो आदमी भी चढ़ सकता है । और यदि एक आदमी चढ़ सकता है तो हज़ारों की फ़ौज भी चढ़ सकती है । गुरिल्ला युद्ध के इन बुनियादी सोच के साथ जियाप ने शत्रु को औचक पकड़ने की नेपोलियन की रणनीति को जोड़ा । पहाड़ों से लेकर घाटी तक खंदकों का जाल बिछा कर फ़्रांसीसी सेना के बिल्कुल निकट तक घेरेबंदी कर ली और जब नियत समय पर हल्ला बोला तो फ़्रांसीसी सेना के बेहतर हथियार, अमेरिकी एम-२४ टैंकों के परखचे उड़ते दिखाई दिये । दियेन बियेन फू में पराजित फ़्रांस वियतनाम छोड़ कर जाने और १९५४ के जेनेवा कांफ्रेंस पर हस्ताक्षर करने के लिये मजबूर हुआ ।

सामरिक नेतृत्व के अलावा जनरल जियाप वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व के भी अंग थे ।

ऐसे जनरल जियाप की मृत्यु पर पूरे वियतनाम में शोक के माहौल के बारे में हमारा अनुमान ग़लत नहीं था । लेकिन हो चि मिन्ह शहर में ऐसा कोई वातावरण न देख कर दूसरे दिन हमने मेकांग डेल्टा की यात्रा के अपने टूरिस्ट गाइड थामस से बात छेड़ दी । जियाप के शोक की बात सुनते ही उसने बताया कि अब तक उनके प्रति श्रद्धांजलि का कार्यक्रम हनोई में चल रहा था । अगले दिन, अर्थात १० अक्तूबर से १२ अक्तूबर तक हो चि मिन्ह सिटी में चलेगा । इस दौरान शहर के रीयूनिफिकेशन प्रासाद में उनकी तस्वीर पर बड़ी संख्या में शहर और गाँव के कतारबद्ध लोग फूल चढ़ायेंगे । इसके बाद हनोई में उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा ।

थामस से बात करने से पता लगा कि वह एक पढ़ा-लिखा, राजनीतिक तथ्यों का जानकार नौजवान है । उसने ट्रैवलिंग के पेशे में स्नातक किया है, और इसी नाते अपने देश के इतिहास से जुड़े तथ्यों की पूरी जानकारी रखता है । इसीलिये और विषयों पर भी बात शुरू हो गयी । मैंने उससे पूछा कि वियतनाम पर अमेरिकियों ने जो ज़ुल्म किये, उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, फिर भी अमेरिका ही वियतनाम में अधिक से अधिक निवेश कर रहा है और यहां की सरकार भी उसका सबसे अधिक स्वागत करती है ।

हमने चीन-वियतनाम संबंधों और १९७९ में इनके बीच के सीमा-संघर्ष की बात भी उठाई ।

एक शैलानी से १९७९ के चीन-वियतनाम संघर्ष की बात सुन कर थामस बेहद हैरान होगया।

उसने कहा, हम वियतनाम के लोग भी कभी उस घटना का ज़िक्र नहीं करते । हमारे लिये १९७५ ही युद्ध का अंतिम इतिहास है । इसके साथ ही उसने यह जोड़ा कि वियतनाम सरकार की यह साफ़ राय है कि इतिहास को सम्मान के साथ बंद कर दिया जाना चाहिए । ' Close the history with respect.' इतिहास के प्रति पूरा सम्मान है, लेकिन उसे वर्तमान पर बोझ नहीं बनने देना चाहिए । अर्थात इतिहास की सीख और शिक्षा का मान होने पर भी वह एक बंद अध्याय है ।

हो चि मिन्ह शहर में देखे युद्ध के अवशेषों के संग्रहालय और जनरल जियाप की कीर्तियों के प्रति वहाँ के लोगों के गहरे सम्मान के बावजूद आज वियतनाम युद्ध की स्मृतियों से कोसों आगे निकल चुका है । पूरे वियतनाम में चल रहा आधुनिक निर्माण का महायज्ञ भी इसी सच्चाई का बयान कर रहा है ।

हमारे जैसे अति प्राचीन इतिहास के तमाम अवशेषों के बोझ से दबे राष्ट्र के लिये भी ससम्मान इतिहास की विदाई की इस छोटी सी बात का क्या कम महत्व है ?



इस पोस्ट पर कई मित्रों ने टिप्पणियां की थी लेकिन उदय प्रकाश जी की टिप्पणी तीखी और विस्तृत भी थी। उन्होंने लिखा -
Uday Prakash :" लेकिन समस्या यह भी है कि हाल फिलहाल (१ ९ ७ - ७ ९) का विएतनाम जैसा इतिहास हमारे पास नहीं है . फिर ग्लोबल कार्पोरेट एकानामी गरीब-वंचित लोगों को , भले ही विकास के ज़रिये लूट और संहार के माध्यम से , बेहतर आर्थिक सुविधा, चैरिटी और चांस, लाटरी, अपराध और जुए से श्रम-मुक्त कमाई मुहैय्या करती है , जो पुरानी समाजवादी व्यवस्था नहीं कर सकी, इसलिए इसे फिलहाल बेहतर माना जाने लगा है. इस 'बेहतरी का भ्रम' वे लोग और फैला रहे हैं, जो पुरानी अर्थ-व्यवस्था में 'मध्यवर्गीय' और इस नयी अर्थ-व्यवस्था में 'नव-अमीर' हो चुके हैं. ट्रेवेल एजेंसी चलाने वाले लोग, जैसा थामस है या काल सेंटर्स में काम करते एम् एन सी के युवा जिस सर्विस क्लास से आते हैं , वह पुराने मज़दूर वर्ग का नया अनुवाद नहीं है.
फिर आपने एक जगह यह लिखा है :
' हांलाकि तब तक द्रोण की तरह के आकाश से निशाने पर अचूक वार करने की तकनीक आज के जितनी विकसित नहीं हुई थी '
इसका आशय समझ में नहीं आया. क्या अगर ड्रोन की तकनीक उस समय होती , तो क्या जन . जियाप की अगुआई के बावजूद विएतनाम युद्ध हार जाता ?
अभी का उदाहरण लें. अफगानिस्तान में ड्रोन के इस्तेमाल के बावज़ूद अमेरिकी-नाटो फौजें वापस लौट रही हैं . अफगानिस्तान एक दूसरा उदाहरण है, जिसे अभी तक कोई कोलोनियलाइज नहीं कर सका. ब्रिटेन, रूस और अब अमेरिका .
आज सुबह ही अमेरिका के एक दोस्त से बात हो रही थी . शट डाउन इसीलिए है कि 'विकास' और 'बाज़ार' का रास्ता भयावह आर्थिक विषमता और सामाजिक असंतुलन के हालात पैदा कर रहा है. चाहे ओबामा हों या राहुल या मोदी या कोई कम्युनिस्ट, आज गरीबों की बात करने, उनके पक्ष में बोलने के लिए सभी मज़बूर हैं. ..और अगर इतिहास का अंत कहीं हो रहा है , तो यही वह जगह है, जहां पहले के लेफ़्ट और राइट के बीच की विभाजक रेखा धुंधलॆ हो चुकी है. बल्कि मिट चुकी है।"

इसके साथ ही उदयप्रकाश जी ने यह आग्रह किया था कि

Uday Prakash : Arun Maheshwari ji ..is bahas ko aage baDhaayaa jaaye ..!

हमने भी उन्हें लिखा - बहुत ज़रूरी बातें आपने उठाई है । इन पर पूरी गंभीरता से चर्चा होगी । आज हम लौट रहे है ।


इसके बाद ही फिर कोलकाता लौट कर 20 अक्तूबर को हमारी पोस्ट थी -

“उदय जी,

‘जनरल जियाप, वियतनाम और इतिहास का प्रश्न’ पर आपकी तीखी और सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद। खास तौर पर आपका आग्रह कि ‘इस बहस को आगे बढ़ाया जाए’ और भी अच्छा लगा।

फेसबुक का अर्थ ही है दूरदराज बैठे मित्रों के साथ एक जीवंत सार्थक विमर्श, एक वर्चुअल गोष्ठी। लेकिन अक्सर सुचिंतित टिप्पणियां भी ‘समझदारों’ की लाइक्स और ‘उत्साहियों’ की अजीबो-गरीब, आशय-खोजी नोक-झोंक और फब्तियों से आगे नहीं जा पाती। अनोखे प्रकार के उकसावेबाजों की धमाचौकड़ियों का नजारा दिखाई देने लगता है। फिर भी, आश्वस्ति की बात यह है कि इस पूरी अराजकता में भी एक व्यवस्था है; इसके जरिए मुद्दे की बात दूसरे किसी भी माध्यम की तुलना में कम दूरी तक नहीं जाती है।

बहरहाल, अपनी टिप्पणी में उठाये गये विषयों पर बहस को आगे लेजाने का मेरा आग्रह भी किसी से कम नहीं है। इसलिये और भी क्योंकि लेखक हमेशा प्रचारक नहीं होता। वह हमेशा किसी विमर्श का अंशीदार ही हो सकता है।

ट्रैवल गाईड थॉमस की बातों में एक नये ‘उपभोक्ता’ की लिप्सा की छाया देखकर आपका बरसना खास तौर पर बहुत प्रिय लगा। लेकिन ‘Close the history with respect’ वाली उसकी बात का मेरे लिये बिल्कुल भिन्न संदर्भ था। मेरे दिमाग में वियतनाम और समाजवाद के अलावा बौद्ध धर्म का तर्कप्रधान और मध्यममार्गी पहलू भी काम कर रहा था। बुद्ध का एक प्रमुख कथन की धर्म का बेड़े की तरह इस्तेमाल करो, पार उतरने के लिये न कि उसे बोझ बना कर ढोने के लिए।

‘‘धर्म कोलोपम है। यह निस्तार के लिये है, ग्रहण के लिए नहीं। इसीलिये जो ज्ञानी है, उनको धर्म का परित्याग करना चाहिए, अधर्म का भी।‘‘

अंध-परंपरा से मुक्त निरीक्षण के लिये प्रेरित करने वाली नैतिकता और आध्यात्मिकता की तर्कसम्मत और हृदयग्राही व्याख्या ही बौद्धों की शक्ति थी जो मार्क्सवादियों को भी आकर्षित करती रही है। आनंद को कहे बुद्ध के अंतिम शब्द थे : ‘‘सब संस्कार अनित्य है। अपने निर्माण के लिए बिना प्रमाद यत्नशील हो। तुम अपने लिए स्वयं दीपक हो। ‘अत्तदीपा विहरथ‘ - दूसरे का सहारा न ढूंढ़ो।‘‘

उदय जी, वियतनाम का अपने ‘पुनर्निर्माण में बिना किसी प्रमाद’ के लगने और ‘इतिहास को ससम्मान विदा करने’ की थॉमस की उक्ति को हम अपनी जिद से खारिज नहीं कर सकते। बौद्ध धर्म तापसों का धर्म नहीं है। दुनिया ने आधुनिक तापसों का एक सबसे विभत्स रूप कंबोडिया के पौल पॉट में देखा है।

अब हम दूसरी बात पर आते हैं - ‘‘हांलाकि तब तक द्रोण की तरह के आकाश से निशाने पर अचूक वार करने की तकनीक आज जितनी विकसित नहीं हुई थी।‘‘
आपने लगभग क्षेपक की तरह, कुछ अवांतर ढंग से ही आए इस वाक्य को बहुत सही पकड़ा है। मैं जानता हूं कि यह वाक्य अनायास ही नहीं लिखा गया था। बिल्कुल आशयपूर्ण था और आपने एकदम सही, इससे हमारे आशय को साफ करने की मांग की है।

जहां तक वियतनाम की मुक्ति युद्ध में जीत अथवा हार का सवाल है, इस वाक्य से उसका कोई संबंध नहीं है। हम उत्तर-औपनिवेशिक काल में रह रहे हैं। जब दुनिया में कहीं भी उपनिवेशवाद कायम नहीं रह सका, मुक्ति की आकांक्षा का दमन नहीं हो सका तो फिर वियतनाम में क्या होता !

यहां संकेत सिर्फ युद्ध के खास-खास तरीकों की सीमाओं और संभावनाओं की ओर है। इसका प्रमुख आशय आज के समय में गुरिल्ला युद्ध के रास्ते की सीमाओं की ओर संकेत करना है। इस बारे में अफगानिस्तान का आपका उदाहरण सही नहीं लगता। इराक को तबाह करके अमेरिका लौट गया, तो इसे युद्ध के मैदान में अमेरिका की पराजय नहीं कहा जा सकता। भारत के माओवादी ‘तापसों‘ की रणनीति का भी एक सवाल है।
हमने अपनी टिप्पणी में कहा है कि दुनिया के इतिहास में पहली बार युद्ध के मैदान में गोरों की सेना यदि कहीं गैर-गोरों के हाथों पराजित हुई तो वह वियतनाम है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि दुनिया में और कहीं राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष नहीं हुए या उपनिवेशवादियों को उपनिवेशों को आजाद करके भागना नहीं पड़ा। किसी भी रणनीति की सफलता देश-काल की परिस्थितियों, इतिहास और भूगोल के भी सवालों से निरपेक्ष नहीं हो सकती।

इन तमाम बातों के बाद भी आपकी यह बुनियादी चिंता कि विकास से वास्तविक तात्पर्य क्या है, पूरी तरह जायज है और इसपर हमें आगे खुल कर बात करने की जरूरत है।

अमेरिकी ‘शट डाउन’ का प्रसंग एक भिन्न प्रसंग है। 17 दिन बाद उनकी इस आंतरिक राजनीतिक समस्या का समाधान होगया है। चूंकि मामला अमेरिका का है, जहां घटने वाली हर चीज के अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव होते हैं, इसीलिये इसपर इतनी बात हो रही है। लेकिन अकेली इस घटना ने अमेरिकी जनता के सामने उनके सिनेटरों की पोल खोल दी है। स्थिति यह बतायी जा रही है कि लोग इस मामले में अपने सिनेटरों के चरित्र को देख कर यह कह रहे हैं कि इनमें से अधिकांश को आगामी चुनाव में छांट कर बाहर कर देना चाहिए। हेल्थ केयर का सवाल अमेरिकी मतदाताओं के लिये एक बेहद संवेदनशील प्रश्न है। इसपर एक सैद्धांतिक रुख अपना कर ओबामा ने निश्चित तौर पर अपने विरोधियों को बुरी स्थिति में डाला है।“

आज ओबामा की वियतनाम यात्रा और उनके भाषणों के संदर्भ में फेसबुक पर अपनी पोस्ट और उस पर हुई थोड़ी सी बहस को स्मरण करना अच्छा लग रहा है। उम्मीद है, मित्रों को भी यह सार्थक लगेगा।





मंगलवार, 24 मई 2016

ईरान में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के जमाने के कामों को आगे बढ़ाया


-अरुण माहेश्वरी

प्रधानमंत्री ईरान गये। हमारे पुराने फारस, सन् 2000 ईस्वी पूर्व के आर्यामा या आई-यार्मा में, अर्थात ‘आर्यों के स्थान’ में और पश्चिम वालों के पर्शिया में। एक समय यह फारस ही हमारा पिछवाड़ा हुआ करता था। लेकिन इधर सात समंदर पार से भी दूर लगने लगा था।

अब पश्चिम ने अपनी नाकेबंदी तोड़ी, तो फारस का दरवाजा दुनिया के लिये एक बार फिर खुल गया है। इसमें प्रवेश के लिये सारी दुनिया के नेताओं की कतार में शामिल होकर हमारे प्रधानमंत्री भी वहां पहुंच गये।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति हसन रूहानी के बीच दोनों देशों के बीच संपर्क की बात चली। चाहबहार बंदरगाह का विषय तो आना ही था। दक्षिणपूर्व ईरान में ओमान की खाड़ी में चाहबहार बंदरगाह एक ऐसा बिंदु है जहां से पाकिस्तान की दखलंदाजी को दरकिनार कर सीधे अफगानिस्तान, रूस और मध्य एशिया से परिवहन के संपर्क को साधा जा सकता है। ‘90 के जमाने में भारत ने ही ओमान, ईरान, उज़्बेकिस्तान, कज़ाखिस्तान, तुर्कमेनिस्तान को लेकर अश्बागात संधि के अन्तर्गत इस बंदरगाह के एक हिस्से को तैयार किया था। अब उसने इस संधि में शामिल होने का निर्णय किया है । भारत ने और निवेश करके इस बंदरगाह को आगे और विकसित करने की इच्छा जाहिर की। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में जब इसके करारनामे पर हस्ताक्षर किये जा रहे थे, उसी मौके पर हमारे प्रधानमंत्री ने गालिब का एक फारसी शेर पढ़ा -

‘‘ज़नूनत गर्बे नफ़्से ख़ुद तमाम अस्थ
जे काशी पे बाँ काशाँ ऩीम गाम अस्थ।’’

(मन में ठान ले तो काशी और काशाँ (ईरान का एक शहर) के बीच की दूरी आधा कदम भर रह जायेगी।)

प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से इस शेर को सुन का राष्ट्रपति रूहानी धीमे से मुस्कुरा रहे थे। और, कहते हैं कि उनके पीछे खड़े इराक के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ अपने साथी को कुहनी मार रहे थे।

प्रधानमंत्री ने अपनी इस यात्रा में ईरान के साथ भारत के प्राचीन संबंधों की जरूर कई मर्तबा दुहाई दी होगी। रूहानी ने भी भारत को अपना पुराना दोस्त कहा। लेकिन रूहानी यह कहने से नहीं चूके कि आज जो हो रहा है, वह पश्चिम की नाकेबंदी के खत्म होने की बदौलत ही हो रहा है।

हाल में हम कश्मीर गये थे। कहते हैं कि कश्मीर का भूगोल, वहां की आबोहवा, और वहां के लोग भी ईरान से बहुत मिलते-जुलते हैं। आल्प्स-हिमालय के भंजतंत्र (फोल्ड सिस्टम) में बसा ईरान उत्तर और दक्षिण में एलबुर्ज और जर्गस के ऊंचे पर्वतों से घिरा हुआ है जिसके मध्य का पठार ठीक उसी प्रकार चार हजार फुट की ऊंचाई पर है, जैसे हमारा श्रीनगर। इतिहास में ईसापूर्व सोलहवीं सदी में ईरान की एलाम की प्राचीन सभ्यता और उसकी समकालीन मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा की सिंधु घाटी की सभ्यता को उत्तर से आए घोड़े पर सवार आर्यों ने समान रूप से रौंद कर अपने अधीन कर लिया था और इन दोनों देशों के ही मूल निवासी बन गये। जरतुश्त धर्म और भारत के वैदिक धर्म में तथा अवेस्था और वेदों में अनोखी समानताएं हैं। भारत की तरह ही ईरान भी कई धर्मों का, ईसाई, बौद्ध और जरत्शु धर्म का मिलन-स्थल रहा। हमारे कश्मीर के कई सुदूर पहाड़ी अंचलों की भाषा पश्तो है, इंडो-ईरानियन मूल की एक प्रमुख भाषा। सेब, चेरी, खुबानी, अंजीर, तरबूज, अंगूर जो ईरान में सबसे अधिक पैदा किये जाते हैं, तो हमारे यहां कश्मीर भी इन्हीं चीजों के लिये विख्यात है। इसीप्रकार, कालीन, दरियां, और हस्तकला की दूसरी कारीगरियों के मामले में भी ईरान और कश्मीर में अनोखा साम्य है। और, आर्यों की कद-काठी तो अपनी जगह है ही। ईरान में अरबों की जीत के साथ इस्लाम आया, और कश्मीर ने भी हिंदू राजा होने के बावजूद पूरी तरह से इस्लाम को अपना लिया। इतना फर्क जरूर रहा कि ईरान ने इस्लाम के शिया पंथ को अपनाया, जबकि कश्मीर सहित अन्यत्र सुन्नी पंथ को ही ज्यादातर अपनाया गया। इसीलिये फारस कभी सूफियों के लिये मुफीद जगह नहीं रही। भारत के लोग यहां से आए महमूद गजनवी और नादिरशाह के शैतानी किस्सों को काफी जानते हैं।

बहरहाल, ईरान कभी हमारा पड़ौसी भले रहा हो, आज नहीं है। इसीलिये मोदी जी की ईरान यात्रा पर हम निश्चिंत थे कि उन पर पड़ौसियों पर धौंस जमाने का भूत सवार नहीं हो पायेगा। मोदी जी जिस संघ की पाठशाला से तैयार हुए हैं, उसके गुरू गोलवलकर अपने पूर्वजों की ‘तेजस्वी वृत्ति’ का बड़ी शान से जिक्र करते हुए कहते थे कि ‘‘हमारे लोगों में यह कहने का साहस था कि जो हमारी स्वभावसिद्ध समाज-व्यवस्था को नहीं मानता वह म्लेच्छ है।’’ यह साहसी ‘तेजस्विता’ राजनय में क्या गुल खिलाती है, इसे हम पड़ौसी मुल्कों के साथ अपने संबंधों में इधर आई तेज गिरावट में देख सकते हैं। ईरान के साथ हमारी प्राचीन संस्कृति की साझा विरासत के बाद उसके दूसरी दिशा में बढ़ जाने पर उसके प्रति इस प्रकार की ‘तेजस्वी’, ‘म्लेच्छों’ वाली समझ कितनी बेहुदा होती, इसे आसानी से समझा जा सकता है।

कहने का तात्पर्य यही है कि ईरान में मोदी जी ने सन् ‘90 में शुरू किये गये कामों को ही आगे बढ़ाने की बात की। वहां वे ‘कांग्रेसी-विहीन भारत’ के झूठे आवेश से बचे रहे और उन्होंने संघी तेवर को तरजीह नहीं दी। उसी सीमा तक उनकी यह यात्रा सफल भी हुई।

शुक्रवार, 20 मई 2016

पश्चिम बंगाल के चुनाव


-अरुण माहेश्वरी

पश्चिम बंगाल के चुनाव पर पहले भी कुछ लिखने से बचता रहा। अब परिणामों के बाद भी कुछ खास लिखने का मन नहीं कर रहा।

ऐसा नहीं है कि ये चुनाव इतने ढर्रेवर प्रकार के थे कि इनमें किसी की कोई विशेष दिलचस्पी नहीं हो सकती थी। उल्टे, इनमें नाटकीय तत्वों की कोई कमी नहीं थी। सबसे बड़ी चीज तो कांग्रेस और वाममोर्चा का अघोषित गठबंधन था। ‘अघोषित’ इसलिये क्योंकि कुछ लोगों को यह अवैद्य संबंधों के किस्म की नापाक सी चीज लग रही थी, जिसे खुले आम स्वीकार लेने पर उनके सतीत्व पर आंच आ सकती थी। लेकिन, ‘घोषित -‘अघोषित’ कुछ भी क्यों न हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसमें राजनीतिक सिद्धांतकारों की हैरत के वे सारे उपादान मौजूद थे जिन पर आगे भी लगातार टीका-टिप्पणियों के जरिये दफ्ती की तलवारें भांजते हुए वे अपने राजनीतिक आदर्शों की लड़ाई का अभ्यास चला सकते हैं।

इसके अलावा, शारदा, नारदा, फ्लाईओवर, सिंडिकेट की तरह के विषय भी कम दिलचस्प नहीं थे। बांग्ला चैनलों पर इन विषयों की एक साथ बाढ़ सी आ गई थी।  यह एक ऐसा नजारा था कि शायद कइयों को किसी अतियथार्थवादी (surrealist) चित्र की तरह लगने लगा। इसे यथार्थ माने या कोई नया विभ्रम, समझ के परे होगया। चुनाव के बाद तो अब डंके की चोट कहा जा रहा है कि ये सब अविद्या से उत्पन्न जगत-मिथ्या के सदृश थे - ‘बंगाल में भ्रष्टाचार है ही नहीं’।

बहरहाल, सवाल उठता है कि अगर यह सब जगत-मिथ्या ही था तो इस जगत का ‘ब्रह्म सत्य’ क्या था ? चुनाव परिणामों को देख कर तो लगता है, यह सारा जगत जिस एक ब्रह्म सत्य की माया के रूप में सामने आया वह वही पुराना वाममोर्चा का चौतीस साल का शासन और सीपीएम का सांगठनिक जंजाल ही था। आज भले वह शासन अतीत का विषय हो और सीपीएम का संगठन महज किसी मृतक का कंकाल। लेकिन इसमें शक नहीं कि पांच साल पीछे के अतीत की छाया और कंकाल का रूप ले चुके संगठन का डर ही इस चुनाव पर छाये रहे। यह चुनाव नहीं गोया, अतीत में गहरे जाकर उसे पोछ डालने का आज भी जारी उपक्रम भर था। परास्त और लुप्त हो चुके वाममोर्चा को ही फिर एक बार हराया गया।

दरअसल, सिर्फ पश्चिम बंगाल की ही बात क्यों की जाए ! जब पूरे भारत को हजारों साल पहले के अतीत में घुस कर उसे मिटाने के काम में नियोजित करने की योजनाएं बन रही है, तब पश्चिम बंगाल के लोगों के लिये तो पांच साल पहले की बात अतीत नहीं, एक जीवित सचाई है। पिछले पांच सालों में न सिर्फ उसी दौर के शुरू किये गये प्रकल्पों पर कुछ काम किये गये, बल्कि उसी दौर की अन्य वैचारिक विरासतों को भी, जिंदा या मुर्दा, बाकायदा ढोया गया। जो फ्लाईओवर गिरा, उसका प्रारंभ उसी काल में हो चुका था, तो टाटा को राज्य से अलविदा भी उसी काल में किया जा चुका था। वाममोर्चा सरकार ने अपने नये भूमि कानून को पारित करके भी उस पर अमल नहीं किया। बनिस्बत, जिस क्रांतिकारी भूमि सुधार मंत्री रज्जाक मोल्ला ने उस पर अमल में सबसे बड़ी बाधा पैदा की, वही आज तृणमूल की जमात में शामिल हो कर उसकी क्रांतिकारिता के बिल्ले को चमका रहा है।

कुल मिला कर, पांच साल बाद भी पश्चिम बंगाल वहीं खड़ा था, जहां पहले था। और इसके साथ ही यथार्थ या विभ्रम, किसी भी रूप में क्यों न हो, उसके राजनीतिक जीवन के मुद्दे भी वे ही रह गये, जो पांच साल पहले थे। ठहरे हुए पानी की तलछट के तौर पर कुछ गंदगियां जरूर पैदा हुई, लेकिन उनसे बाकी और कुछ नहीं बदला। पांच साल पहले जो पराजित हुआ था, वह किसी भी रूप में मिटा नहीं था। फलत:, न टाटा वापस आयें और न औद्योगीकरण का कोई दूसरा रास्ता बना।

ऐसे में, जब चुनाव के ऐन मौके पर कांग्रेस और वाममोर्चा का गठबंधन बना, तो एक बार के लिये लगा था कि शायद यह किसी जादूई चिराग का काम करें और अतीत के छायाभास से चल रहे एक निरर्थक युद्ध का अंत हो। कुछ हलकों द्वारा नीम अंधेरे नीम उजाले के रहस्य में लिपटे इस गठबंधन से अतीत को विदा करके चुनावों को वर्तमान की नई जमीन पर लड़े जाने की उम्मीद लगाई जा रही थी। लगा था कि यह जादूई चिराग किसी नई राह को रौशन करेगा - जब आज पर रोशनी गिरेगी तो अतीत सचमुच व्यतीत होगा, जिसे जाना तो जा सकता है लेकिन फिर से जिंदा नहीं किया जा सकता। हेगेल के शब्दों में ‘‘स्वर्ग का उल्लू तभी उड़ान भरता है जब रात के रंग गहराने लगते हैं।’’(The owl of Minerva takes its flight only when the shades of night are gathering.)

लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गाड़ी वहीं अटकी रह गई, जहां पांच साल, बल्कि उसके भी पहले अटक गई थी। ये चुनाव परास्त को ही एक बार फिर परास्त करके, मृत को ही फिर एक बार मार कर शव-साधना से शक्ति अर्जित करने की तंत्रविद्या का उल्लास भर बन कर रह गये। औद्योगीकरण से तात्पर्य समग्र जीवन का एक रूपांतरण होता है, इस सत्य की साधना में वाममोर्चा के बलिदान ने उस मार्ग को इतना कठिन कर दिया है कि आगे कौन, कब और कैसे इस दिशा में कोई कदम बढ़ा पायेगा, यह सवाल आज भी भविष्य के अंधेरे में ही है। ये चुनाव इस दिशा में बढ़ने की संभावना पैदा कर पायेंगे, इस पर यथेष्ट संदेह के कारण ही इसके परिणाम पश्चिम बंगाल के राजनीतिक जीवन में कोई घटना नजर नहीं आते।

गुरुवार, 12 मई 2016

कश्मीर में बीते तीन दिनों के बाद

कश्मीर में बीते अब तक के तीन दिनों के बाद -

हम कश्मीर आए हैं । शुद्ध शैलानी के तौर पर । मनुष्य समाजों द्वारा अपनी गढ़ी हुई और हमेशा बदलती अस्मिताओं से जुड़े तमाम मसलों को दरकिनार करते हुए, देखने, जानने और उपभोग करने की मनुष्य की शुद्ध प्राणी-सत्ता की नैसर्गिकता के साथ । और, कहना न होगा, इन तीन दिनों में ही, सालों से कथित तौर पर धधक रहे इस 'भू-स्वर्ग' पर इस प्रकार आना हमें बहुत ही मोहक लग रहा है ।

श्रीनगर, गुलमर्ग,पहलगाम  - कहीं भी जैसे तिल धरने की जगह नहीं है । गुलमर्ग में गंडोला से चौदह हज़ार फ़ुट की ऊँचाई पर बर्फ़ के पहाड़ों तक जाने के लिये हज़ारों लोगों की इतनी लंबी लाईन थी कि हमें तो मन मसोस कर ही रह जाना पड़ा । किराये पर लिये गये ग़म बूट और प्लास्टिक के यूज एंड थ्रो वाले सस्ते से हाथ के मोज़े किसी काम न आ सके ।

सिर्फ पर्यटन के लिये कश्मीर में पहुँच रहे ये लाखों लोग बिना किसी दूसरे स्वार्थ के, न धर्म-कर्म से किसी मोक्ष की प्राप्ति के लिये या न किसी वैज्ञानिक शोध-अनुसंधान के लिये, महज अपनी कुछ मूलभूत मानवीय आकांक्षाओं की तृप्ति के लिये, यहाँ आ रहे हैं । जिस क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में देश और दुनिया के तमाम कोनों से शुद्ध मानवीय अंत:करण के साथ लोगों का आना हो, वही क्षेत्र दरअसल भू-स्वर्ग कहलाने का हक़दार हो सकता है । कश्मीर आज हमें इसीलिये सचमुच भू-स्वर्ग लग रहा है ।

कश्मीर का प्राकृतिक सौन्दर्य तो पहले भी था और आज भी है । लेकिन कितने साल हो गये, मनुष्यों की स्वार्थपूर्ण अस्मिताओं और वर्चस्व- प्रतिवर्चस्व के खेल ने इसे आतंक से भरा एक नर्क बना रखा था । अभी इन वादियों से ख़ौफ़ के बादल कुछ छँटे हुए दिखाई दे रहे हैं । शैलानियों के साथ स्थानीय लोगों की अंतरंगता इतनी साफ़ है कि उस पर धर्म और मज़हब के भेद-भाव की कोई छाया देखना भी किसी पाप से कम नहीं है । और, साथ ही ध्यान देने की बात यह भी है कि हमें कश्मीर भारत के दूसरे किसी भी हिस्से से रंच मात्र भी भिन्न नहीं लग रहा है ।

वही ग़रीबी, वही विषमता, वैसा ही भ्रष्टाचार और शहरों में वैसी ही गंदगी, जो पूरे भारत में हैं, समान रूप से कश्मीर में भी है । और स्वाभाविक तौर पर यहाँ भी आम आदमी के दिलो-दिमाग़ में इनसे मुक्ति की उतनी ही प्रबल इच्छाएँ भी है । समान रूप से हक़ों की लड़ाइयाँ और वैसा ही सरकारी दमन भी है । हमारे टैक्सी ड्राइवर के शब्दों में अब्दुल्ला-मुफ़्ती-उमर फारूक- यासीन मल्लिक-गिलानी की राजनीतिक दुकानदारियां हैं और सीआरपी के कैंपों की तरह ही पत्थरबाजों की गिरोहबंदी भी है । देश-व्यापी समानताओं की इसी पृष्ठभूमि में, राजनीतिक नैतिकता-अनैतिकता के प्रश्नों से परे, यहाँ की पीडीपी-भाजपा सरकार भी है ।

कश्मीर की यह स्वाभाविक लय ही है कि पिछले दिनों जब यहाँ एनआईटी में कुछ बाहरी छात्रों ने तिरंगा फहराने को लेकर एक संघी-छाप राष्ट्रवाद का विवाद पैदा करने की कोशिश की तो उससे शुद्ध क़ानून और व्यवस्था के एक मसले के तौर पर निपटा गया । यहाँ तक कि कश्मीरी पंडितों के एक बड़े समूह ने भी ऐसे तिरंगाधारी झूठे राष्ट्रवादियों की कड़ी भर्त्सना की ।

एक पर्यटक के नाते हम इस स्वाभाविकता की लय का बाक़ायदा लुत्फ़ ले पा रहे हैं ।

कहते है पर्यटन तो यथार्थ को किसी दूरस्थ खिड़की से देखना होता है । लेकिन धरती की ऐसी समंजित तस्वीर को देख कर ही तो कल्पना चावला ने अंतरीक्ष से कहा था कि आह, इस खूबसूरत पृथ्वी पर स्वार्थों की कितनी मार-काट मची हुई है ! पर्यटकों के अंतर में बसी यह सुंदरता की तस्वीर ही शायद असुंदरता से नफ़रत का भाव पैदा कर सकती है !

कश्मीर के इन हालात को देख कर हमारा यह विश्वास दृढ़ हो रहा है कि  शायद अकेले 'पर्यटनवाद ज़िंदाबाद' के नारे से ही इस भू-स्वर्ग की अपनी हमेशा की ख्याति को फिर से पाया जा सकता है । कश्मीर कोई अजूबा नहीं है । यह अकल्पनीय प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ अपने अंतर में मानव-मानव को मिलाने वाली सबसे पवित्र भूमि की संभावनाओं को छिपाये हुए हैं ।

कश्मीर ज़िंदाबाद !

सोनमर्ग की यात्रा के अनूठे अनुभव के बाद : सचमुच देखना भी क्या चीज़ है !


-अरुण माहेश्वरी


आज सोनमर्ग के अभिभूत कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों के अनुभव के बाद फ़ेसबुक पर जब हमने कुछ चुनिंदा तस्वीरों को पोस्ट किया तो उसके साथ लिखा कि "सोनमर्ग के ग्लेशियर्स की यह यात्रा अपने में एक ऐसा अनुभव था जिसे बयान करना मुश्किल है । हम सचमुच इस समय किसी और ही दुनिया में चले गये थे । ये तस्वीरें उस अनुभव का अंश ही बयान करती हैं -"।

दूर-दूर तक फैली सफ़ेद झक्क पहाड़ियों का एक अनंत विस्तार, उस पर तेज़ बारिश से छाई हुई एक पारदर्शी धुँध, तेज़ हवा और कड़ाके की ठंड । इसमें स्लेजिंग के तखतों के साथ दौड़ते-भागते लोग, घोड़ेवालों की गहमा-गहमी और चार बॉंस पर टांग दी गई हवा में फड़फड़ाती प्लास्टिक की सीटों के कमज़ोर से शेड के नीचे चाय, काफ़ी, कहवा और न जाने क्या खाने-पीने की चीज़ें बेचने को आतुर आदमी के कर्मोद्दम का एक दूसरा ही लुभावना नज़ारा । ऐसे एक प्राकृतिक और कर्मरत मनुष्य के सौन्दर्य के योग से बने अभावनीय दृश्य में से अपनी पसंद की कुछ चुनी हुई तस्वीरों को साझा करते हुए इसके अलावा और क्या कहा जा सकता था कि जो देखा, जो अनुभव किया, उसका शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता है । यह सचमुच कुछ ऐसा ही था जैसे कोई अपने प्रियतम को देख कर जिस तृप्ति का अहसास करता है, उसे कभी भी पूरी तरह से शब्दों से, यहाँ तक कि किसी आलिंगन से भी व्यक्त नहीं कर सकता है । प्रेम करके वह सिर्फ़ इस समग्र अनुभूति के चौखटे में सामयिक तौर पर अपने को रख देता है, लेकिन उस देखने के समग्र अहसास को ख़ारिज नहीं कर पाता है ।

सचमुच, कोई विचार या चेतना की कितनी ही बात क्यों न कर लें, आदमी के शब्दों से पहले उसके सामने हमेशा दृश्य ही आया करता है । देख कर ही तो हम अपने चारों ओर की दुनिया में अपनी जगह खोज पाते हैं । हम शब्दों से भले उसे व्यक्त करें, लेकिन शब्द उस चारों ओर के परिवेश का विकल्प नहीं बन सकते । क्या यही वजह नहीं है कि हमारे देखने और जानने के बीच का संबंध हमेशा काफी हद तक अपरिभाषित ही रहता है ! सरियलिस्ट कलाकार मैगरिटा ने अपनी एक कला कृति में दृष्ट और शब्द के बीच के फ़र्क़ को 'सपनों की कुंजी' (Key of dreams) कहा है ।

हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि देखने की क्रिया में आदमी के अपने चयन का एक पहलू भी काम करता रहता है । हम वही देखते है जिसकी ओर अपनी नज़र डालते हैं । जिस बात ने बर्फ़ की चादर में ढंके इन जन-शून्य अनंत पहाड़ों को देख कर  हमें सबसे ज़्यादा परेशान किया वह यह थी कि हमारे देखने का तात्पर्य तो हमेशा यह भी होता है कि हमें भी देखा जा रहा हैं । अन्य की नज़रों से दो-चार होने से ही तो यह पता चलता है कि हम इस दृश्य- जगत के अंग है । जब हम कहते है कि हम उस जगह को देख रहे हैं, तो प्रकारांतर से यह भी कहते है कि वहाँ से हमें भी देखा जा सकता है । लेकिन एक ऐसे दृश्य के अनंत विस्तार से साक्षात्कार, जिसमें हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि वहाँ से हमें देखने वाला कोई दूसरा नहीं है, तब इसके सिवाय दूसरी कोई अनुभूति पैदा नहीं हो सकती है कि जैसे हम 'किसी और ही दुनिया में आ गये हैं ।'

सामने मनुष्यों का कोई संसार नहीं, सायं-सांय करती बर्फ़ीली तेज़ हवा में जैसे कोहरे में लिपटी कोई अंतहीन सफ़ेद चादर फड़फड़ा रही है । यहाँ दृष्टि के आदान-प्रदान की कोई गुंजाइश भी नहीं है । ऐसे में हमारे पास कहने और जानने के लिये खुद के ही शब्दों के आंशिक सत्य के अलावा और क्या रह जाता है? जीवन के शायद इसी, एकतरफ़ा संवाद के सच को ही सभी प्रकार के रहस्यवाद की जड़ कहा जा सकता है । ऐसे में शब्दों की तुलना में तस्वीरों से, भले ही फ़ोटोग्राफ़ी से ही क्यों न हो, बनाये गये बिंब बहुत ज़्यादा सार्थक लगने लगते हैं ।

फ़ोटोग्राफ़ी को भी सिर्फ़ चीज़ों को दर्ज करने की कोरी यांत्रिकता कहना उचित नहीं है । हर बिंब की तरह ही इससे रचे गये बिंब भी अक्सर अपने विषय की सीमाओं के पार जाने की सामर्थ्य रखते हैं । इसमें भी तमाम बिंबों की तरह ही देखने की एक दृष्टि निहित रहती है । जैसे हमारे इन साझा किये गये फ़ोटोग्राफ़ में 'पर्यटनवाद जिंदाबाद' की दृष्टि बहुत साफ़ तौर पर देखी जा सकती है ।

हम जानते है कि बिंब अक्सर कुछ पहले से अनुपस्थित चीज़ों के निर्माण के लिये बनाये जाते है । लेकिन परवर्ती समय में उनसे यह पता चलने लगता है कि कोई चीज़ या व्यक्ति एक समय कैसे दिखते थे, या घुमा कर कहे तो किसी चीज़ या व्यक्ति को एक समय में दूसरे कैसे देखते थे । और इसीसे आगे  बिंब या प्रतिमा को गढ़ने के पीछे के नज़रिये की सिनाख्त होती है ।

इस कश्मीर यात्रा के प्रारंभ से ही हमारा सारा ज़ोर तमाम प्रकार की अस्मिताओं के सवालों को दरकिनार करके मनुष्य की अपनी प्राणी-सत्ता के साथ, शुद्ध रूप में एक पर्यटक की तरह इस यात्रा का लुत्फ़ उठाने और मानव-मानव के मिलन की अकूत संभावनाओं से भरे इस भू स्वर्ग को महसूस करने पर रहा । सोनमर्ग के ग्लेशियर्स के इन अनूठे अनुभवों के आह्लाद ने हमारे इस मिशन को और भी पूरा किया । अब और एक दिन श्रीनगर में बिता कर हम फिर दिल्ली होते हुए इन वादियों को अलविदा कहके कोलकाता में अपनी दुनिया में लौट जायेंगे ।

उन सभी मित्रों को धन्यवाद जो किसी न किसी रूप में हमारी इस सम्मोहक यात्रा के साक्षा बनें । 

मंगलवार, 10 मई 2016

कश्मीर की घाटियों में 'धर्म चर्चा' का एक समानांतर वैचारिक यात्रा वृत्तांत -जगदीश्वर चतुर्वेदी की रवीन्द्रनाथ, मार्क्सवाद और धर्म संबंधी हाल की कुछ पोस्ट की प्रतिक्रिया में

कश्मीर की घाटियों में 'धर्म चर्चा' का एक समानांतर वैचारिक यात्रा वृत्तांत
-जगदीश्वर चतुर्वेदी की रवीन्द्रनाथ, मार्क्सवाद और धर्म संबंधी हाल की कुछ पोस्ट की प्रतिक्रिया में

-अरुण माहेश्वरी

जगदीश्वर जी, गुलमर्ग से पहलगाम के रास्ते में एक जाम में फँस कर आपके रवीन्द्रनाथ और धर्म विषयक लंबे लेख को पूरा पढ़ गया था । उसमें रवीन्द्रनाथ की धर्म चर्चा के संदर्भ में कतिपय मार्क्सवादियों और क्रांतिकारियों पर भी टीका-टिप्पणियाँ की गई थी । तभी, रास्ते से ही आपके लेख पर फेसबुक में मैंने एक छोटी सी टिप्पणी की थी और रवीन्द्रनाथ की बौद्धिक संरचना के गठन में भारतीय उपनिषदों की भूमिका को समझने पर ज़ोर दिया था ।

कोई भी बड़ा विचारक रातों-रात या जन्मजात बड़ा नहीं होता है । उसके पूरे वैचारिक व्यक्तित्व के विकास का अपना एक क्रम होता है । वह लगातार अपनी ही कई पूर्वधारणाओं को ख़ारिज करता हुआ कैसे विचार के नये क्षितिज खोलता है, उसी में उसका बड़प्पन निहित होता है । मैंने अपनी उस तात्कालिक प्रतिक्रिया में लिखा था -

"अभी पहलगाम के रास्ते में जाम में यह पूरा लेख पढ़ गया । पहलगाम पहुँच कर होटल में स्थिर होकर इस विषय पर जरूर आज कल में ही लिखूँगा । रवीन्द्रनाथ बचपन से ही औपनिषदिक ब्रह्म-चिंतन के परिवेश में संस्कारित हुए थे । उनकी यह पूरी चिंतन प्रणाली वेदांत की दीर्घ धारा से नि:सृत है । यह हेगेलियन भाववाद से ज़रा भी भिन्न नहीं है । हेगेल का परम विचार ही वेदांत का ब्रह्म दर्शन है । इस भाववादी द्वंद्ववाद में मानव मन की गहराइयों के प्रवेश के सारे उपादान मौजूद है । बिना इस द्वंद्वात्मकता के मनुष्य को समझा ही नहीं जा सकता है । मार्क्सवादी दर्शन ने इस द्वंद्ववाद को पूरी तरह से अपनाया है । इसीलिये एक विचारधारा के रूप में उसमें हर प्रकार के जड़सूत्रवाद से लड़ने की आंतरिक शक्ति और सामर्थ्य है । हेगेल के भाववादी द्वंद्ववाद से मार्क्सवादी भौतिकवादी द्वंद्ववाद में जो बुनियादी फर्क है, वह मानव जीवन पर उससे स्वतंत्र भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव को लेकर है । मार्क्सवाद उसके प्रभाव की प्रमुखता को स्वीकारने के कारण उसे बदलने की सचेत कार्रवाइयों पर बल देता है । इसीलिये वह क्रांतिकारी भी है । इसीलिये सही कहा गया है कि मार्क्स ने हेगेल को, जो सिर के बल खड़ा था, पैर के बल खड़ा किया, लेकिन उसे ठुकराया नहीं था, बल्कि अपनाया था । इससे वेदांत के साथ हमारे व्यवहार का भी दिशा-निर्देश मिल सकता है ।
"बहरहाल, शांति से रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक पृष्ठभूमि को उसके मूल से समझना और भी ज्यादा दिलचस्प है और कब और कैसे खुद रवीन्द्रनाथ उसका अपने लेखन और चिंतन में अतिक्रमण  करते हैं , यह भी देखने की चीज है । और यह तभी संभव हुआ है क्योंकि रवीन्द्रनाथ मूलत: एक लेखक थे और बदलते हुए मानव जीवन का संधान उनके लेखन कर्म का अभिन्न हिस्सा था ।
"रवीन्द्रनाथ का महत्व इसमें है कि वे एक साहित्यकार है जिनके पास गहरे तात्विक विषयों में प्रवेश की अन्तरदृष्टि होने के नाते उनकी रचनाएँ बेहद स्थाई महत्व की होती है । यह संयोग दुनिया में बहुत कम मिलता है । इस मामले में उनकी तुलना श्रेष्ठ मार्क्सवादी लेखकों से ही की जा सकती है । अगर वे लेखक न होते तो उनके वैचारिक भाषणों का दूसरे अनेक आध्यात्मिक गुरुओं से शायद ही कोई विशेष मान होता । "

जहाँ तक रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक पृष्ठभूमि और उनके चिंतन के विकास के क्रम का सवाल है , उनकी 150वीं जयंती पर अपने लेख 'रवीन्द्रनाथ की आध्यात्मिक पर आधारित विश्वदृष्टि' में मैंनें काफी विस्तार से, उनकी रचनाओं और लेखों के सिलसिलेवार उद्धरणों के साथ चर्चा की है । फेसबुक की बदौलत, इस रवीन्द्र जयंती के मौक़े पर हमने परसों ही उसे अपने ब्लाग के ज़रिये मित्रों से साझा किया था ।

आज सुबह-सुबह, इसी से जुड़ी आपकी एक और टिप्पणी 'मार्क्स और धर्म' को फेसबुक पर देखा । मार्क्स अपने वैचारिक जीवन के प्रारंभ के कई वर्षों तक जिस एक विषय से जूझते रहे थे, वह विषय धर्म ही था । जब तक उन्होंने इस विषय से जुड़े तमाम दार्शनिक और सामाजिक पक्षों को खंगाल कर पूरी तरह से जान नहीं लिया, वे अपने परवर्ती चिंतन की दिशा में एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा पाये थे । मार्क्स के बारे में अध्ययन का स्वयं में यह एक बेहद दिलचस्प पहलू है । हमने इसकी गहराई से पड़ताल करके 'उत्तरगाथा' पत्रिका में धर्म के विषय में चली एक बहस को समेटते हुए उसी पत्रिका में एक लंबा लेख लिखा था - 'धर्म और मार्क्स' । उस बात को काफी साल बीत चुके हैं । जहाँ तक मुझे याद है उस बहस में भी हिंदी के कई नामी-गिरामी लेखकों ने हिस्सा लिया था, जैसे आपने अपने लेख में उदयप्रकाश की बातों का हवाला दिया है । हमारा वही लेख हमारी किताब 'चतुर्दिक 2, धर्म, संस्कृति और राजनीति' का पहला लेख है । उस लेख के क्रम में जो बात हमारे सामने आई, वह यही थी कि धर्म के प्रति मार्क्स के दृष्टिकोण और अन्य घोषित नास्तिकतावादियों के दृष्टिकोण में कुछ बुनियादी फर्क है । इसके अलावा हमने यह भी पाया कि जब कोई व्यक्ति किसी विषय को पूरी गहराई में जाकर उसे आद्योपांत जान लेता है, तभी वह उस विषय से पूरी तरह से मुक्त भी हो जाता है । मार्क्स सालों तक इस विषय से जूझते रहे और जब वे इसके सारे रहस्य को भेद कर राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन और अपने द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन के विकास की दिशा में बढ़ गये तो फिर कभी उन्होंने धर्म के विषय की ओर मुड़ कर देखा तक नहीं । यह खुद में एक बहुत दिलचस्प तथ्य ही नहीं है, बल्कि पूरे मानव चिंतन को दी गई उनकी एक सबसे बड़ी सौग़ात है । उन्होंने मनुष्य को धर्म नामक तत्व से सदा के लिये मुक्ति पाने का एक सैद्धांतिक आधार प्रदान कर दिया । मार्क्स के बाद धार्मिक विमर्श कोई अंतिम विमर्श नहीं, बल्कि मानव चिंतन के विकास की एक और कड़ी भर बन कर रह गया, जिसके हज़ारों सालों के एकाधिपत्य को देखते हुए आप एक काफी महत्वपूर्ण कड़ी जरूर कह सकते हैं ।

बहरहाल, रवीन्द्रनाथ और धर्म के विषय में आपके लेख की उत्तेजक टिप्पणियों ने मुझे धर्म और मार्क्सवाद के अलावा भारतीय चिंतन में धर्म के स्थान के बारे में अभी कुछ लिखने के लिये उत्तेजित किया था । अपनी उक्त तात्कालिक प्रतिक्रिया में हमने यही कहा था कि आगे यात्रा में फ़ुर्सत निकाल कर इस विषय पर कुछ विस्तार से लिखना चाहूँगा । रवीन्द्रनाथ और उपनिषदों के बारे में हमारी बात तो उनकी 150वीं जयंती पर लिखे गये लेख में आ ही गई है । इसी प्रकार 'मार्क्स और धर्म' लेख में इस विषय पर मार्क्स के दृष्टिकोण पर काफी विस्तार से लिखा जा चुका है । अब रही बात 'भारतीय चिंतन में धर्म' की ।

'पर्यटनवाद जिंदाबाद' के नारे के अपने सुख और इसकी गहमा-गहमी के बीच स्वाभाविक यही था कि हम एक प्रकार की विचार-शून्य आध्यात्मिकता की शरण में चले जाते । लेकिन पता नहीं क्यों , आपके लेख का विषय इस परिवेश में भी हमें घेरे रहा है और अभी तो इस पर सोचना एक प्रकार के प्रीतिकर भटकाव जैसा लग रहा है । संभव है, इसमें शायद इस कश्मीर घाटी का भी कुछ अपना योगदान भी है । क्योंकि जब श्रीनगर की एक पहाड़ी के शिखर पर दूर से ही हमने शंकराचार्य के भव्य मठ की झलक देखी, तभी हमारे दिमाग़ में इस घाटी में बस गये भारत के एक श्रेष्ठतम दार्शनिक, तांत्रिक, सौन्दर्यशास्त्री, तर्कशास्त्री, संगीतकार, कवि और नाटककार अभिनवगुप्त और उनके शैवमत और अद्वैत की भव्यता की भी याद आगई थी ।

आज दुनिया के प्रसिद्ध मार्क्सवादी दार्शनिक स्लावोय जिजेक किसी भी संक्रमण के बिंदु को एक ऐसी घटना के रूप में देखते है जो सिर्फ नये भविष्य का ही निर्माण नहीं करती, बल्कि उलट कर अतीत की गहरी गुहा में जा कर उसके भी पूरी तरह से एक नये आख्यान की रचना करती है । इस प्रकार संक्रमणकारी घटना अतीत की भी पुनर्रचना करती है, तमाम पूर्व-धारणाओं को नये सिरे से परिभाषित करती है । जिजेक इसे हेगेल की शब्दावली में एक 'परम प्रत्यावर्तन '(Absolute Recoil) कहते हैं और सबसे अधिक ग़ौर करने लायक बात यह है कि वे इसी 'परम प्रत्यावर्तन' में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नये रूप को स्थापित करने का दावा करते हैं । अभिनवगुप्त का 'प्रत्याभिज्ञान' भी तो बिल्कुल यही, एक प्रत्यावर्तन ही तो था । उन्होंने भी संक्रमण को सिर्फ वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि अतीत तक गहरे धस कर वर्तमान के तमाम संदर्भों को नए रूप में परिभाषित करने की शक्ति के रूप में देखा था । मज़े की बात यह है कि अभिनवगुप्त के इसी दर्शन से, परिवर्तन के बिंदु से अर्जित शक्ति और बौद्ध दर्शन के वज्रयान के योग से आगे उनकी तंत्र विद्या का विकास हुआ - इस शक्ति ने सिद्धि और विभूति के ज़रिये चमत्कारी तंत्र विद्या को जन्म दिया । अभिनवगुप्त के 'तंत्रलोक' में परिवर्तन के संयोग का यह बिंदु, जहाँ से जीवन और विचार का एक नया लोक उद्घाटित होता है, संभोग के क्षण में बदल जाता है । स्त्री को पुरुष की शक्ति का केंद्र बना कर उसमें प्रवेश से वे पुरुष की आत्मोपलब्धि, खुद के पुनर्राविस्कार की तांत्रिकता का शास्त्र तैयार करते है, और हम जानते ही हैं कि परवर्ती समय में इस तंत्र विद्या के तहत स्त्री के शरीर के साथ कितने प्रकार के विकट और विकृत प्रयोगों का एक सिलसिला हमारे यहाँ शुरू हो जाता है । सचमुच यह देख कर आश्चर्य होता है कि जिजेक भी अपने दार्शनिक विमर्श में बेहिचक पोर्नोग्राफ़ी के प्रसंगों का धड़ल्ले से प्रयोग करने के लिये काफी बदनाम है !

बहरहाल, धर्म संबंधी चर्चा के क्रम में अभिनवगुप्त, उनके 'प्रत्याभिज्ञान' और तंत्रविद्या और जिजेक तथा उनके 'परम प्रत्यावर्तन ' और पोर्नोग्राफ़ी की इस अनायास और किंचित अप्रासंगिक सी दिखाई दे रही चर्चा के बावजूद जब हम भारतीय चिंतन के संदर्भ में धर्म की स्थिति के बारे में सोचते हैं तो यह उतनी अप्रासंगिक भी नहीं जान पड़ती है । 'प्रत्याभिज्ञान' का एक दार्शनिक पहलू था और तंत्र विद्या के रूप में उसका एक भ्रष्ट कर्मकांडी रूप सामने आया था । कमोबेस इसी प्रकार भारतीय चिंतन में भी धर्म का कोई एक ही निश्चित रूप नहीं रहा है -दर्शनशास्त्रीय स्तर पर भी और कर्मकांडी स्तर पर भी । उपरोक्त चर्चा के प्रारंभ से ही एक बात तो साफ़ है कि रिलीजन या वर्च्यूज के जिस अर्थ में आज धर्म को देखा जाता है, वैसा सुदूर अतीत में न पश्चिम में था और न ही भारतीय चिंतन में । एक लंबे काल तक दोनों जगह धार्मिक और दार्शनिक विमर्श के बीच कोई फर्क नहीं था । वह मनुष्य की पारलौकिक ही नहीं, इहलौकिक जिज्ञासाओं के भी केंद्र में था । हेगेल का 'परम विचार' तक कहीं न कहीं ईश्वर से जुड़ता था और व्यवहार के धरातल पर राज्य के संचालक के नाते राजा में ईश्वर के अंश को देखता था । इसप्रकार कहीं भी धर्म का कोई एक रूढ़ स्वरूप नहीं रहा है ।

कुमारिल के 'मीमांसा सूत्र' का पहला वाक्य ही है - 'अथातो धर्म-जिज्ञासा' - अर्थात धर्म के स्वरूप के बारे में जिज्ञासा । उनकी इस धर्म-जिज्ञासा में वेदों का सबसे केंद्रीय स्थान था । उनके यहाँ धर्म का मतलब है वैदिक आदेश-निर्देश, वैदिक यज्ञ और  इनसे भी महत्वपूर्ण है वैदिक विधि-निषेध । इसे आदमी के मंगल का अंतिम, अत्यांतिक मार्ग माना गया, तमाम संदेहों और प्रश्नों से परे । स्वर्गादि शुभ फलों के प्रदाता वैदिक यज्ञों के रूप में जब वे धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हैं तो उससे यही जाहिर होता है कि दूरदर्शितापूर्ण कार्यों से वांछित फल की प्राप्ति ही धर्म है, बशर्ते इसे प्राप्त करने में वैदिक विधि-निषेधों का बाक़ायदा पालन किया गया हो । मसलन्, आदमी को चोट पहुँचाना अवांछनीय है, इसीलिये शत्रु को चोट पहुँचाना भी धर्म नहीं है । इस धर्म को श्रुति के द्वारा विधि-निषेधों से जाना जा सकता है ।

इस प्रकार साफ़ है कि मीमांसक कुमारिल की धर्म की अवधारणा में ईश्वर या किसी रहस्यवादी धार्मिक भावावेश का कोई स्थान नहीं था । इसमें किसी प्रकार के संवेगों, रहस्यात्मकता भावों या बुद्धि या विचारों का भी कोई ख़ास स्थान नहीं था । यह मूलत: श्रुति-आदेशों के निष्ठापूर्ण पालन से जुड़ा हुआ कार्य था । इसमें अहिंसा का एक स्थायी तत्व जरूर था, जो जीने और जीने दो की मानव जीवन की एक बुनियादी शर्त थी । वेदों पर इसकी निर्भरशीलता सिर्फ विधि-निषेधों के ज्ञान के लिये थी, और किसी वजह से नहीं । शत्रु की हत्या से एक व्यक्ति को तात्कालिक सुख मिलने पर भी वैदिक आदेशों से वर्जित होने के कारण उससे भविष्य में अनिवार्यत: दुख पैदा होगा, इसीलिये उसे उन्होंने धर्म के बाहर ही रखा था ।

कहने का मतलब यह है कि धर्म के इस रूप में किसी प्रकार के रहस्यवाद के लिये कोई जगह नहीं थी । मुझे लगता है, वेदों और धर्म के इस रूप के संबंधों की मोटे तौर पर एक तुलना आज के संविधान और उसके क़ानूनी प्राविधानों से की जा सकती है । परवर्ती स्मृतियों में धर्म के इस विचार का नाना प्रकार की नैतिकताओं और सद्गुणों के रूप में विकास होता चला गया । इस मामले में स्थिति यहाँ तक चली गई थी कि यदि कोई कार्य वांछित है, जिसकी बुद्धि और विवेक अनुमति देता है, तो उसकी पुष्टि वेदों अथवा स्मृति पुराणों में न होने पर भी इस बिनाह पर उसे धर्म माना जाने लगा कि उसका उल्लेख वेदों में हैं, लेकिन वह हमें दिखाई नहीं दे रहा है ।

इस प्रकार, भारतीय चिंतन में वैदिक आदेशों के पालन, सत्य और अहिंसा के नैतिक सद्गुणों और आत्म- ज्ञान की यौगिक क्रियाओं के रूप में धर्म संबंधी अवधारणाओं के विकास की अपनी यह एक अलग और लंबी कहानी है जिसे हम आज तक 'मानव धर्म' के रूप में दोहराते रहते हैं । लेकिन भारतीय पुराणों में भागवत पुराण इस विषय के एक और ही नये पहलू को सामने लाता है । इसमें ईश्वर भक्ति और उपासना के पहलू को धर्म के एक सर्वप्रमुख पहलू के रूप में रखा जाता है । भागवत में कहा गया है कि ईश्वर की 'अहैतुक' और 'अप्रतिहत' भक्ति ही धर्म है । यह भारतीय दर्शन के इतिहास में धर्म के बारे में विचार की एक बिल्कुल नई दिशा कही जा सकती है । ईश्वर भक्ति को न उत्पन्न करने वाले धर्म को इसमें 'निष्फल धर्म' बताया गया है । वैदिक आदेशों से चालित धर्म को तात्कालिक सुख का प्रदाता बताया गया । स्थायी और परम सुख तो सिर्फ ईश्वर भक्ति से हासिल किया जा सकता है । इसे वैदिक धर्म से उत्कृष्ट माना गया ।

भागवत के पहले श्लोक में ही 'परम सत्य' की आराधना की गई है , जो परमेश्वर ही है । इसे ही ब्रह्मन, परमात्मन् आदि कई नामों से पुकारा जाने लगा । इस अरूप ब्रह्मन में एक मायावी शक्ति को, तमाम प्रकार की सृष्टियों की शक्ति को देखा जाने लगा । भागवत में कई जगह परमेश्वर की चर्चा शुद्ध चैतन्य के रूप में की गई है । इस प्रकार, परमेश्वर का आंतरिक सत्य, उसका शुद्ध चैतन्य रूप, उसकी बाहरी सत्ता 'माया' और अन्य तमाम जीवों में अधिष्ठित उसकी सत्ता के एक त्रिगुणात्मक रूप में ब्रह्मन को देखा गया । इसके साथ ही दिक्-काल से मुक्त वैकुण्ठ की कल्पना की गई जहाँ इस परमेश्वर का वास है । और, परम सत्य, जिसे परम सत्ता कहा गया, उसके सगुण रूपों की कल्पनाओं से उस पूरे धर्म व्यवसाय की पैदाईश होती है जो मंदिरों, मठों, गिरजाघरों और मस्जिदों की तरह के नये वर्चस्वकारी सत्ता केंद्रों के विकास तक जाता है , जिसे हम धर्म के शुद्ध कर्मकांडी रूप में आज अपने जीवन में देखते हैं ।

जगदीश्वर जी, इस चर्चा का सिर्फ यही मतलब है कि आपने अपने लेख में जिस प्रकार से भारतीय चिंतन में धर्म के एक साधारण और सर्वकालिक रूप की चर्चा करते हुए उसे अपनाने की बात की है , वह यथार्थ में बिल्कुल भी वैसा सुनिश्चित नहीं है, न भारतीय चिंतन की परंपरा में और न ही हमारे जीवन की ठोस वास्तविकता में । यदि हम इसकी चर्चा 'मानव धर्म' की अवधारणा के रूप में करना चाहे तो आज के राष्ट्रीय  राज्य में इस धर्म का अकेला वैदिक ग्रंथ राज्य का संविधान होता है । मनुष्य के सामाजिक आचरण उसके आदेशों - निर्देशों से चालित होते हैं । चूँकि हम राष्ट्रीय जनतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे है, इसलिये हम अपने संविधान की बात करते है । इसे ही यदि आप वैश्विक संदर्भ में देखना चाहे तो इसमें एक ओर आज की पूँजीवादी वैश्विकता के क़ायदे- क़ानून है और दूसरी ओर मार्क्सवादी अन्तरराष्ट्रीयतावाद है, पूरे मानव जीवन और सोच- विचार को बिल्कुल नये रूप में ढालने की शक्ति का विचार - जीवन के क्रांतिकारी रूपांतरण का विचार, वास्तविक संक्रमणकारी विचार । हमारे अनुसार तो आज के समय में परम प्रत्यावर्तन किसी धर्म से नहीं, इस नये सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी प्रत्यय और इससे जुड़े लगातार प्रयोगों से ही मुमकिन है ।

जगदीश्वर जी, एक प्रवाह में, पहलगाम की परम शांत वादियों में, धर्म की तरह के विषय पर हमने यह एक काफी लंबी यात्रा कर ली है । मैं नहीं जानता इसमें कितना कह पाया हूँ, कितना नहीं । और प्रामाणिकता के पहलू तो अलग है ही । कोलकाता लौट कर अपने इस नोट पर ज्यादा प्रामाणिक तथ्यों के साथ काम करने की कोशिश करूँगा । फिर भी अपने इस नोट को तमाम मित्रों से उसी प्रकार साझा कर रहा हूँ, जिस प्रकार पिछले पाँच दिनों से इन वादियों की ख़ुशगवार तस्वीरों को साझा करता रहा हूँ । सचित्र यात्रा वृतांत के साथ इस प्रकार की विचार-यात्रा के सुख भी कम नहीं हैं । उम्मीद है मित्रों भी कुछ ऐसा ही लगेगा ।

इस प्रकार की वैचारिक उत्तेजना देने के लिये आपको बहुत धन्यवाद ।