सोमवार, 28 दिसंबर 2015

विचार का एक प्रमुख विषय : जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद

संगठन के विषयों पर सीपीआई (एम) का महाधिवेशन


-अरुण माहेश्वरी

संगठन के सवालों पर सीपीआई(एम) का महाधिवेशन (27 दिसंबर-31 दिसंबर 2015) कोलकाता में चल रहा है।

इस महाधिवेशन में लिये गये संगठन संबंधी नीतिगत निर्णयों के बारे में सही ढंग से तभी कोई बात हो सकती है, जब इसमें अपनाये गये दस्तावेज हर किसी को विचार के लिये उपलब्ध होंगे। लेकिन सीपीआई(एम) के मुखपत्र गणशक्ति और यहां के दूसरे स्थानीय अखबारों से तथा पार्टी के नेताओं के संवाददाता सम्मेलनों से अब तक जो बात सामने आई है, उसमें यह साफ तौर पर कहा गया है कि नये सिरे से सीपीआई(एम) को एक जन पार्टी के रूप में तैयार किया जायेगा।

अगर यह सच है तो यह प्रकारांतर से इस बात की स्वीकृति है कि 1978 के सलकिया प्लेनम में जन-क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण का जो नारा दिया गया था, उस पर अमल में अब तक पार्टी विफल रही है।

हम नहीं जानते, इस विफलता को किन तथ्यों और मानदंडों के आधारों पर आंका गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के संचालन के सबसे पवित्र और अनुलंघनीय सिद्धांत के रूप में ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ की दुहाई दी जाती रही है और जन-क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण के लिये भी इससे भिन्न किसी दूसरे सांगठनिक सिद्धांत का रास्ता नहीं अपनाया गया है। फिर आखिर यह विफलता क्यों ? कैसे जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद सिर्फ यहीं पर नहीं, बल्कि सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में कोरे केंद्रीयतावाद में तब्दील हो कर रह जाता है!

यह जितना सैद्धांतिक सवाल है, उतना ही एक दार्शनिक प्रश्न भी है। जनतंत्र की कोई भी प्रकृत अवधारणा उसे व्यापक जनता और समाज से काट कर कभी चरितार्थ नहीं हो सकती। विचार का कोई भी रूप जब व्यापक जनता से कट कर चंद चुने हुए लोगों के विशेषाधिकार का प्रश्न बन जाता है, वहीं से उसके जनतांत्रिक तत्व की हानि शुरू हो जाती है। पूंजीवादी जनतंत्र सच्चा जनतंत्र नहीं है, क्योंकि वह एक खास वर्ग के हितों से जुड़ा होता है।

जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के ‘जनतांत्रिक पहलू’ की सुरक्षा की पहली शर्त यह है कि वह महज पार्टी का अंदुरूनी विषय बन कर न रहे। पार्टी के संगठन में व्यापक समाज की दखलंदाजी को सुनिश्चित करके ही जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद में जनतंत्र चरितार्थ हो सकता है।

लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों का अब तक का अनुभव काफी हद तक इसके विपरीत रहा है। जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद संगठन का कोई जैविक सिद्धांत न होकर उसके संचालन का महज एक यांत्रिक सिद्धांत रहा है। यह मुट्ठीभर पार्टी सदस्यों और नेताओं का निजी मामला रहा है। इसके जरिये पार्टी के संगठन में व्यापक समाज की दखल के रास्ते कभी नहीं खुल पाये हैं।
यह रोग सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों में नहीं, भारत की दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों में भी समान रूप से बना हुआ है। ‘जनता के बीच सीधे अपनी बात न कह कर पार्टी फोरम पर बात करने’ की दलीलें हर पार्टी की ओर से बार-बार दोहराई जाती है।

जनतंत्र मात्र की क्रियाशीलता के अंदर के ऐसे अवरोधों को सारी दुनिया में महसूस किया जा रहा है और इसीलिये जनभागीदारी वाले जनतंत्र (Participatory Democracy) की अक्सर चर्चा की जाती है।

इस बीमारी को ठोस रूप में समझने के लिये एक इस तथ्य पर गौर किया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में लंबे काल से इतनी ताकतवर पार्टी होने के बावजूद उसका ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ इसके सभी स्तरों पर नेतृत्व में अपराधियों और समाज-विरोधियों के प्रभुत्व को रोकने में विफल रहा है। अगर व्यापक जनता और समाज की पार्टी के संगठन में कोई सीधी दखल होती, तो गोपनीय ढंग से पार्टी में अपराधियों की पैठ कभी संभव नहीं हो सकती थी।

इसीलिये, जैसे जनतंत्र को उसके पूंजीवादी तानाशाही के रूप से मुक्त करने की जरूरत है, वैसे ही क्रांतिकारी पार्टी को संगठन को व्यापक समाज से अलग, चंद लोगों, अर्थात पार्टी सदस्यों और नेताओं की तानाशाही से मुक्त करने की जरूरत है। जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद में जनतंत्र के तत्व की हिफाजत व्यापक जनता और समाज के जरिये होगी, न कि पार्टी के अंदर की बहसों में अल्पमत पर बहुमत की राय को स्वीकार कर चलने की किसी यांत्रिक प्रक्रिया से।

यह तभी होगा, जब हर पार्टी सदस्य को, वह पार्टी के अंदर बहुमत में हो या अल्पमत में, व्यापक जनता के बीच जाकर सीधे अपनी बात रखने की बाकायदा इजाजत होगी। हर पार्टी सदस्य की जनता के बीच सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार के अनुशासन की बाधा का कोई स्थान नहीं होगा।

हमारी राय में जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद में जनतंत्र के तत्व को इस प्रकार से सजीव बना कर न सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी अपने को वास्तव अर्थों में एक जनपार्टी बना पायेगी, बल्कि समाज के सामने राजनीतिक दलों के संगठन का एक प्रकृत जनतांत्रिक विकल्प पेश कर पायेगी। 

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

कन्वर्जेंस के समय में मीडिया

('तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुुक की इबारतें' पुस्तक का प्राक्कथन)

‘‘ प्रिंट की दुनिया आज भी हमारे बीच साफ तौर पर मौजूद है। हम यह नहीं कह सकते कि उसे हम पीछे छोड़ आए हैं। यह और भी लंबे अर्से तक बनी रह सकती है। भारत या ब्रिटेन में कुछ ज्यादा ही। लेकिन मुझे लगता है कि हम मोटे तौर पर इसे जान चुके हैं, हम इसमें बहुत ज्यादा अब प्रयोग नहीं कर सकते। ...आप इसपर कई प्रकार से सोच सकते हैं। मैं नहीं मानता कि हम डिजिटल युग में जाने का जोखिम इसलिए नहीं उठाते क्योंकि हम समझते हैं कि प्रिंट ही अच्छा है। बल्कि पत्रकारिता के लिहाज से सोचने पर डिजिटल दुनिया ही कहीं ज्यादा बेहतर लगती है। मेरा अनुभव है कि डिजिटल दुनिया में आप एक बेहतर पत्रकार हो सकते हैं। अन्यथा, आपके पिछड़ जाने का खतरा है। ...सचमुच संपादन के दौरान ही मुझे लगा कि अब डिजिटल दुनिया में घुस जाना होगा। यदि मैं गलत साबित होता हूं और प्रिंट कुछ और सालों तक बना रह जाता है, तो कोई बात नहीं, उसमें काम करना तो हमे आता ही है। ’’

ये शब्द है एलन रसब्रिजर के। ‘फ्रंटलाईन’ पत्रिका के 7 अगस्त 2015 के अंक में ‘गार्जियन’ अखबार के पूर्व संपादक एलन रसब्रिजर के साथ शशिकुमार की एक लंबी बातचीत प्रकाशित हुई है। ‘गार्जियन’ के जीवन में रसब्रिजर का लगभग दो दशकों का काल एक बेहद घटना-बहुल काल माना जाता है, जब ‘गार्जियन’ ‘न्यूयार्क टाइम्स’ जैसे अखबार के टक्कर में वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा ऑनलाईन समाचारपत्र बन गया। इसी काल में ‘गार्जियन’ का प्रिंट रूप भी बदला और अंत में तो वह पूरी तरह से ऑनलाईन, सोशल वेब पर चला गया। दुनिया को चौका देने वाले जूलियन असांज के विकिलीक्स में ‘गार्जियन’ की भागीदारी रही। लगातार सात सालों की मेहनत के बाद निक डेवीज द्वारा संचार माध्यमों में रुपर्ट मर्डक की अनैतिक गतिविधियों के भंडाफोड़ में भी गार्जियन की एक बड़ी भूमिका थी। और अभी अंत में, एडवर्ड स्नोडेन द्वारा अमेरिकी सुरक्षा एजेंशी के भंडाफोड़ की वजह से तो ‘गार्जियन’ को जन-सेवा का पुलित्जर पुरस्कार मिला। गार्जियन की ये सारी उपलब्धियां एलन रसब्रिजर के काल की ही रही है। रसब्रिजर ‘गार्जियन’ से इसी जून महीने में स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होगए और अभी एशियन कॉलेज आफ जर्नलिज्म (एसीजे) में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन का काम कर रहे हैं।

‘गार्जियन’ के स्तर के एक अखबार के साथ प्रिंट से लेकर ऑनलाईन, वेब की डिजिटल दुनिया की लंबी यात्रा के साक्षी रसब्रिजर जब डिजिटल में पत्रकारिता के भविष्य को देखते हैं तो यह अनायास ही नहीं है। वे कहते हैं कि ‘‘डिजिटल सिर्फ समाचारों के वितरण का एक और माध्यम भर नहीं है। ...मैं एसीजे में अध्यापन का काम करता हूं। वहां का पूरा जीवन ही डिजिटल है। वहां के छात्र इसके अलावा कुछ जानते ही नहीं है। ... इस नए माध्यम में किसी को इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं रहती है कि प्रिंट में क्या हो रहा है। तुलना तो सिर्फ प्रिंट जगत में डिजिटल से की जाती है। जाहिर है कि आगे ऐसे बहुत लोग होंगे जो प्रिंट के विचार से पूरी तरह मुक्त होंगे। प्रिंट कुछ मामलों में अतुलनीय है। लेकिन आने वाली दुनिया अलग होगी, जिसमें सिर्फ मीडिया नहीं, जीवन का हर क्षेत्र डिजिटल से प्रभावित होगा। इसीलिए इस पुरानी दुनिया से इस हद तक चिपके रहना कि कुछ भी क्यों न हो जाए, इस क्रांति के प्रभाव से पत्रकारिता बची रहेगी, मुझे भविष्य के बारे में कोई बुद्धिमत्तापूर्ण सोच नहीं लगता है।’’

शशिकुमार ने जब उनसे पूछा कि क्या इससे कहानी कहने के ढंग में बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा ? रसब्रिजर का जवाब था - ‘‘मैं इसके किसी सीधे-सपाट जवाब के जाल में नहीं पड़ना चाहता। कोई कैसे कह सकता है कि एक सीधी-सादी कहानी के दिन नहीं रहे। ...हमारे सामने चुनौती सिर्फ यह है कि हम अब सब कुछ कर सकते हैं। आपके करने की संभावनाओं की कोई सीमा नहीं रही है। कुछ लोगों को गुटकों में सूचना चाहिए तो कुछ है जो सूचना की अनंत गहराई तक पहुंचना चाहते हैं। ... हम भविष्य को किसी माप के अनुसार देखना नहीं चाहते। लोगों की इच्छा के माप से भी हम संचालित नहीं हो सकते।’’

इसप्रकार बात यहां तक चली जाती है कि क्या किसी भी कहानी का विस्तार या उसकी गहनता उसके कहने के माध्यम पर निर्भर करती है ? और, रसब्रिजर का जवाब है, ‘‘जरूर। मसलन यदि आप एनिमेशन को आईफोन पर फ्लैश में लाना चाहते हैं तो वह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप एनिमेशन के अनुसार फ्लैश का प्रयोग करते हैं या नहीं। यदि आप अफ्रीका में होंगे तो आपकी पत्रकारिता अलग होगी। वह संक्षिप्त पाठ पर आधारित होगी जिसमें कम से कम तस्वीरों का प्रयोग किया जायेगा, क्योंकि वहां इंटरनेट सुविधाओं में कमी के कारण डाउनलोडिंग में बहुत ज्यादा समय लग जाता है। ...अन्यथा मैंने स्मार्ट फोन पर लोगों को लंबे से लंबे लेखों को पढ़ते हुए देखा है।’’

“इसके अलावा, जिस माध्यम में संवाद की गुंजाइश नहीं होती, उसमें आप भाषण की तरह एकतरफा बोल सकते हैं। लेकिन इस डिजिटल माध्यम में तीखा लिखने पर तीखा प्रत्युत्तर भी तत्काल मिलेगा।“

रसब्रिजर इसी सिलसिले में बड़े निबंधकार साइमन जेन्किन का उल्लेख करते हैं। वे बताते हैं कि हम उनसे मांग करते हैं कि हमें बारह सौ के बजाय तीन सौ शब्दों में आपकी बात चाहिए, और दोपहर तक नहीं, सुबह-सुबह ; और यह भी जरूरी नहीं कि वह बहुत सुचिंतित हो। इसप्रकार, एक सवाल उठा कर उसपर बहस आमंत्रित करना भी एक प्रकार की पत्रकारिता है। इसका अपना एक अलग महत्व है। ‘‘कहने का अर्थ यह है कि एक पत्रकार को इन सब बातों के प्रति खुला नजरिया रखना होगा।’’

रसब्रिजर की यह बात कि ‘तकनीक और नयी संभावनाओं के प्रयोग को लेकर तमाम चीजों के प्रति एक बहुत ही खुले नजरिये’ की जरूरत है, वह प्रमुख बात है जिसे अपने प्रकार की इस फेसबुक डायरी की भूमिका में हम खास तौर पर रेखांकित करना चाहेंगे। लिखना लेखक की नैसर्गिकता है। लेकिन ऐसा करते हुए उसे हमेशा अपने समय की अनेक प्रकार की बाधाओं का मुकाबला करते रहना पड़ता है। लिखने की कई हसरतें पैदा होने के पहले ही खत्म हो जाती है। लोगों की पूरी जिंदगी गुजर जाती है, लेकिन वे यह नहीं जान पाते कि कैसे अपने लिखे को दूसरों के लिए प्रकाशित करें। अपने लेखन के प्रकाशन के लिए अब तक सिर्फ  लेखक होना ही यथेष्ट नहीं रहा है।

यह एक परिप्रेक्ष्य है, जिसमें फेसबुक की तरह के सामाजिक माध्यम अभिव्यक्ति के औजार के रूप में खास अर्थ रखते हैं। इसमें प्रश्न सिर्फ नई तकनीक के चयन का नहीं रहता है। यह लेखकीय अस्मिता से जुड़ा प्रश्न भी है। यद्यपि इन माध्यमों के प्रति भी सामाजिक-राजनीतिक सत्ताएं अभी जिसप्रकार सशंकित हैं और आए दिन इनपर लगाम कसने की उनकी चिंताएं सामने आती रहती है, इससे यही लगता है कि ये माध्यम भी क्रमश: एक निश्चित आम-सहमति की सीमा में ही काम करने का मंच प्रदान करेंगे। उन सीमाओं का उल्लंघन किसी को भी सामाजिक तिरस्कार से लेकर स्नोडेन की तरह सरकारी कोप का पात्र तक बना देगी। फिर भी, हमारे जैसे अभावों के समाज में आदमी की स्वतंत्रता भौतिक कारणों से ही जितनी सीमित है, उसमें फेसबुक की तरह के  खुले मंच से मिलने वाली प्रकाशन की सुविधा जैसे सालों की मुराद के पूरा होने की तरह महत्वपूर्ण हो जाती है।

खुद हमारा अनुभव है कि इस मंच का प्रयोग करके हम अनेक विषयों पर खुल कर अपने ऐसे विचारों को रख पाए हैं, जिनके लिए दूसरे परंपरागत माध्यमों पर जगह नहीं रह गयी है। इसकी साक्षी है यह फेसबुक डायरी भी।

इसके अलावा यह मंच अकेले व्यक्ति की मुखर सामाजिक भूमिका को सुनिश्चित करने वाला मंच है। सन् 2014 भारत में एक ऐसे लोकसभा चुनाव का समय रहा है जिसमें चुनावों के आज तक के इतिहास में सबसे ज्यादा रुपये खर्च किये गये थे। यह पत्रकारिता पर पेडन्यूज के पूर्ण ग्रहण का काल था। सत्ताधारी कांग्रेस दल और नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी के अलावा तीसरी किसी भी ताकत के लिए कहीं एक इंच जगह भी नहीं थी। खास तौर पर नरेन्द्र मोदी के भाजपा ने पानी की तरह अरबों रुपये बहा दिये थे। पूरा कॉरपोरेट जगत नग्न तौर पर नरेन्द्र मोदी के पक्ष में उतरा हुआ था और टेलिविजन के सारे चैनलों से सिर्फ मोदी-मोदी की रट लगाई जा रही थी। शुद्ध धन-बल से प्रचार की आंधी के मुकाबले में प्रतिवाद और प्रतिरोध की आवाज के लिये अगर कहीं कोई जगह बची थी तो वह एक हद तक सिर्फ फेसबुक की तरह के सोशल मीडिया में ही थी। हालांकि इस माध्यम पर भी ‘नमो’ समूह ने बेहद संगठित ढंग से हमला किया था, और विपक्ष की आवाज सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत पहल तक सीमित थी। खास तौर पर, वामपंथी राजनीतिक पार्टियों के लिए तो यह माध्यम तब तक कोरा अजूबा ही बना हुआ था। लेकिन फिर भी, दक्षिणपंथ के संगठित और मुखविहीन हमलों के खिलाफ फेसबुक पर एक-एक आदमी के जवाबी लेखन का भी अपना एक स्वरूप इसी के बीच से सामने आ रहा था।

हमारे जैसे फेसबुक पर सक्रिय लेखक ने जब साल के अंत में पूरे साल की अपनी इन गतिविधियों पर नजर डाली तो एकबारगी लगा कि कई अर्थों में साल भर की इन पोस्टों से एक वैकल्पिक सोच का खाका उभरता हुआ दिखाई देता है। इसीलिए लगा कि फेसबुक की भीत पर लगभग प्रतिदिन लिख कर हमने जो साल भर की फेसबुक डायरी तैयार की है, उसे डिजिटल के साथ ही प्रिंट में भी लाया जा सकता है। और इसप्रकार, रसब्रिजर की तरह के तमाम लोग पत्रकारिता में प्रिंट और डिजिटल की दो अलग दुनियाओं को लेकर जो विमर्श कर रहे हैं, उसके साथ ही प्रिंट और डिजिटल के संयोग के भी एक नए विमर्श की जमीन तैयार हो सकती है। क्योंकि, उन्हीं के अनुसार भारत और ब्रिटेन की तरह के देशों में इन दोनों दुनियाओं का सह-अस्तित्व दूसरे विकसित देशों की तुलना में कहीं ज्यादा लंबे काल तक बना रह सकता है। यह, कन्वर्जेंस का यह एक और नया प्रयोग भी कहला सकता है।

बहरहाल, सारी दुनिया में फेसबुक पर आज करोड़ों लोग सक्रिय हैं। लेकिन अब तक हमारी नजर में ऐसी दूसरी किसी फेसबुक डायरी की मिसाल नहीं आई है। इसीलिये इस बात की आशंका बनी हुई है कि हमारा यह प्रयास पाठक समाज से कितनी स्वीकृति पायेगा ! इसके बावजूद, शायद हमारे खुद के लेखन की खास प्रकृति के चलते, क्योंकि हमने कभी भी माध्यम की सीमाओं और संभावनाओं को मद्देनजर रखते हुए लेखन नहीं किया, हमें लगता है कि प्रिंट के पाठकों को इस प्रयोग को अपनाने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी।

इस काम को संभव बनाने में अनामिका प्रकाशन के पंकज शर्मा जी ने जो भूमिका अदा की, उसके लिए मैं उनका आभारी रहूंगा। फेसबुक के उन सभी मित्रों और फॉलोअर्स के प्रति भी आभारी रहूंगा जिनके चलते हम फेसबुक की भीत पर नियमित लिखने का उत्साह पाते रहे हैं।

सितंबर 2015                                                                                                     अरुण माहेश्वरी








‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें’


फेसबुक के सभी मित्रों से अपनी यह खुशी साझा करना चाहता हूं - अगले हफ्ते तक हमारी नई किताब ‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें’ प्रकाशित हो जायेगी।

लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों की यह किताब शायद अपने प्रकार की एक बिल्कुल नई और अनोखी किताब होगी। फेसबुक पर रोज-रोज लिख कर हम किस प्रकार अपने समय का एक इतिहास दर्ज कर रहे होते हैं, इस किताब से पता चलेगा। इसका महत्व शायद इसलिये भी होगा कि यह उस वर्ष 2014 का रोजनामचा है, जो भारत की राजनीति के एक तूफानी वर्ष के तौर पर हमेशा याद किया जायेगा। रोजनामचे में लेखक की अपनी आत्मगत उपस्थिति तो अनिवार्यत: होती ही है !

अनामिका प्रकाशन के पंकज शर्मा जी ने ऐसी एक अभिनव पुस्तक के प्रकाशन में जिस प्रकार के उत्साह और तत्परता का परिचय दिया है, वह सचमुच सराहनीय है। यह हार्ड बाउंड के साथ ही पेपरबैक में भी आयेगी। इसमें आए संदर्भों की लगभग चौदह पृष्ठ की सूची से प्रकाशक ने इसे और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। अभी तक उन्होंने इसके पेपरबैक की कीमत के बारे में कोई सूचना नहीं दी है। लेकिन पेपरबैक में जरूर ही किफायती मूल्य पर मिलेगी।

प्रकाशक का नाम व पता है :
Anamika Publishers and Distributors (Pvt) Ltd
4697/3, 21-A, Ansari Road,
Dariyaganj, New Delhi - 110 002
Phone : 011-23281655, 011-23270239
E Mail - anamikapublishers@yahoo.co.in

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

भाजपा के अनुसार भारत में जातिवाद का सच भी गढ़ा हुआ (manufactured) है

राज्य सभा का अधिवेशन आज भी रुका हुआ है। दो दिन पहले भारत के संविधान पर चल रही बहस के दौरान कांग्रेस नेता और पूर्वमंत्री कुमारी शैलजा ने समाज में जातिगत भेदभाव के सच को बताने के लिये गुजरात के एक मंदिर के अपने अनुभव को सदन में रखा था। सजल आंखों से उन्होंने बताया कि किस प्रकार द्वारका के एक द्वीप पर स्थित मंदिर में पूजा के वक्त पुजारी ने उनसे उनकी जाति के बारे में पूछा था। शैलजा ने कटाक्ष किया कि यह है -विकास का गुजरात मॉडल !
कुमारी शैलजा के बयान के दूसरे दिन ही मोदी सरकार के अति-उत्साही मंत्री अरुण जेटली सदन में कुछ कागजों के साथ हाजिर होगये। शैलजा के अनुभव को झुठलाते हुए उन्होंने द्वारकाधीश मंदिर की आगंतुकों की उस डायरी का उल्लेख करना शुरू कर दिया जिसमें खुद कुमारी शैलजा ने 23 जनवरी 2013 के दिन पुजारियों की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि ‘‘उनका अहोभाग्य था कि उन्हें भगवान कृष्ण का आशिर्वाद मिला।’’ जेटली ने मंदिर के इस रेकर्ड को सदन में रखने की पेशकश भी की। 
कुमारी शैलजा ने तत्काल जेटली की इस उत्साही खोज को खारिज करते हुए बताया कि उन्होंने द्वारकाधीश मंदिर की बात नहीं कही थी। वे द्वारका के एक द्वीप पर स्थित एक मंदिर की चर्चा कर रही थी। भाजपा के एक सांसद ने उन्हें याद दिलाया कि वे शायद बैत द्वारका मंदिर की बात कर रही है तो कुमारी शैलजा ने कहा कि हां, उसी मंदिर की बात है। 
बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। यह मंदिर एक द्वारकाधीश मंदिर से तीस किलोमीटर दूर एक अलग टापू पर स्थित है जहां नौका से जाना पड़ता है। 
मजे की बात यह है कि अति-उत्साही जेटली के शिष्य, भाजपा के एक दूसरे मंत्री पियूष गोयल ने जेटली की इस अनुपम खोज पर उछल कर कहा कि ‘‘गढ़ी हुई अन्य समस्याओं और गढ़े गये भेद-भाव (Manufactured problems and manufactured discrimination) का यह एक और उदाहरण है। 
कुमारी शैलजा के बयान और उस पर वित्त मंत्री जेटली का रवैया यह दिखाने के लिये काफी है कि मोदी सरकार अपने विरोधियों को अपमानित करने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। उन्हें यह कहने में भी कोई हिचक नहीं है कि भारत में जातिवादी भेदभाव की बात करना सच नहीं, बल्कि एक गढ़ा हुआ सच है ! वे एक पूर्व मंत्री के पीड़ादायी अनुभवों को झुठलाने के लिये मंदिरों के भी झूठे-सच्चे रेकर्ड पेश कर सकते हैं। 
जेटली आज भी अपने झूठ के लिये खेद प्रकट करके माफी मांगने के लिए तैयार नहीं है। अब भाजपा वालों का कहना है कि शैलजा ने इसके साथ ‘विकास के गुजरात मॉडल’ का उल्लेख क्यों किया ! अर्थात्, आने वाले समय में मोदी के कथित ‘विकास मॉडल’ की आलोचना की भी मनाही होगी !
सचमुच, संसदीय जनतंत्र की नैतिकताओं के साथ भाजपा का मेल बैठना इस मोदी जमाने में अब मुश्किल हो रहा है। लेकिन संतोष की बात यही है कि दिल्ली, बिहार और अब गुजरात की जनता ने यह बता दिया है कि इनके उत्पात के अब गिने-चुने दिन ही शेष है। इनके भविष्य की इबारतें जनता के दिलों पर लिखी जा चुकी है। 

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

बुराई का अंत और बुराई का प्रारंभ साथ-साथ

अरुण माहेश्वरी


आज संविधान दिवस की बहस के सिलसिले में लोक सभा में प्रधानमंत्री के भाषण को नहीं सुन पाया। कुछ न्यूज चैनलों पर उसकी क्लिपिंग्स देखी और उस पर कइयों की टिप्पणियों को भी सुना।

इसके पहले लोक सभा में राजनाथ सिंह का और राज्य सभा में अरुण जेटली का भाषण सुना था।

इन सबसे कुल मिला कर जैसी वैचारिक अराजकता का दृश्य दिखाई देता है, उससे अनायास ही हेगेल के तर्क शास्त्र में वर्णित उस स्थिति का खयाल आ जाता है कि कैसे कोई चीज बढ़ते-बढ़ते स्व-विरोधों के एक अनोखे संयोग में अपने अंत के साथ ही अपने उदय का संकेत देती है। एक परम विवर्तन। Absolute recoil । इस मामले में - एक बुराई के अंत के दृश्य से उसी बुराई का उदय।

शेक्सपियर के नाटक Troilus and Cressida के पांचवे अंक के दूसरे दृश्य में शेक्सपियर लिखते हैं :
O madness of discourse,
That cause sets up with and against itself !
Bi-fold authority ! where reason can revolt
without perdition, and loss assume all reason
Without revolt
(आह, विमर्श का पागलपन,/ कर्ता खुद के साथ और खुद के खिलाफ सामने आता है/दोहरी हैसियत ! जहां विवेक विद्रोह कर सकता है/ बिना विनाश के, और अंत सारे विवेक को धारण कर लेता है/बिना विद्रोह के)

इस नाटक के संदर्भ में ये पंक्तियां ट्रौयलस की उन स्व-विरोधी दलीलों के बारे में है जब ट्रौयलस को क्रेसीडा की बेवफाई का पता चलता है ; वह जो कहना चाहता है एक ही सुर में उसके पक्ष और विपक्ष की सारी दलीलें देने लगता है; उसके तर्क उसकी खुद की दलीलों के खिलाफ होते हैं लेकिन उन्हें खारिज नहीं करते, उसकी अतार्किकता तर्क को बिना खारिज किये तर्क का रूप लेने लगती है। एक कर्ता जो खुद अपने खिलाफ काम करता है, एक तर्क जो खुद के अस्वीकार से जुड़ जाता है।

यही है संविधान की मर्यादा और उसके नग्न उलंघन के बीच के संघी गोपनीय समझौते की सचाई !

इस सरकार के शासन के अंत तक यही नाटक जारी रहेगा। बुराई का अंत बुराई के प्रारंभ के साथ चलेगा। 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

पेरिस हमला और इसके बाद !

अरुण माहेश्वरी




तेरह नवंबर को पेरिस पर आतंकवादी हमले को यूरोप का 9/11 (11 सितंबर) कहा जा रहा है। सन् 2001 का 9/11 विश्व राजनीति का एक संदर्भ बिंदु बना जब यह कहा गया कि इसके बाद दुनिया वह नहीं रहेगी, जो तब तक थी। वह दुनिया की अकेली महाशक्ति पर सीधा हमला था। जो तालिबान खुद अमेरिका की उपज था, सोवियत संघ के पतन के बाद सोवियत संघ समर्थित  अफगानिस्तान की नजीबुल्लाह सरकार को हटा कर जिसे अफगानिस्तान की सत्ता सौंपी गई थी, उसीके खिलाफ महीने भर के अंदर अमेरिका ब्रिटेन को संग लेकर अपनी पूरी ताकत के साथ टूट पड़ा। तालिबान के सहयोगी अल कायदा के नेता बिन लादेन को, जिसने 9/11 की योजना बनाई थी, अमेरिका का एक नंबर दुश्मन घोषित किया गया। और देखते ही देखते, तीन महीने में तालिबान की जगह हामिद करजाई की सरकार बना दी गई। अफगानिस्तान अमेरिकी सेना के कब्जे में आगया।

इसके बाद सन् 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के पूरे इतिहास को हम जानते ही हैं। इराक पर कब्जा करने के बाद लगभग सात साल तक वहां प्रशासन को लेकर पश्चिम की ताकतें नाना प्रकार के प्रयोग करती रही। तभी 2010 में टूनिशिया से एक नये प्रकार का सरकार-विरोधी नागरिक आंदोलन शुरू हुआ, और देखते ही देखते वह अरब लीग के लगभग सभी देशों - मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन, सीरिया, अल्जीरिया, जार्डन, कुवैत, मोरक्को, सुडान, सऊदी अरबिया, ओमन, जिबोती, पश्चिमी सहारा - में फैल गया। पूरे मध्यपूर्व में तख्ता-पलट के अनोखे दृश्य दिखाई देने लगे। एक विशाल क्षेत्र में फैले इस एक प्रकार के गृह युद्ध को अरब वसंत के नाम से जाना जाता है। न जाने कितनी सरकारें उखाड़ कर फेंक दी गई, कितनी नई आई और फिर से उखाड़ दी गई। कई जगहों पर नागरिक स्वतंत्रता की मांगों को पूरी निष्ठुरता से कुचल दिया गया, तो कई जगहों की सरकारों ने इस तूफान का कहीं ज्यादा लचीलेपन से मुकाबला किया। लेकिन सच यह है कि अधिकांश स्थानों पर अरब वसंत के आंदोलन में भारी हिंसा का प्रयोग हुआ। अब तक लाखों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है।   

कुल मिला कर, यह बात सही साबित हुई कि कम से कम अरब देशों, इस्लामिक राष्ट्रों के लिए 9/11 के बाद दुनिया वह नहीं रही जो इसके पहले हुआ करती थी। पेट्रोडालर की समृद्धि का पूरा महल धराशायी हो गया। अरब भूमि पर अबाध रूप में पश्चिमी ताकतों के घोड़े दौड़ने लगे। उखाड़-पछाड़ के खूनी खेल में अमेरिका ने तालिबान और अल कायदा के कई नये छोटे-बड़े संस्करणों को जन्म दिया, जिनमें पिछले साल ही एक महादानव इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) पैदा हुआ, जो खलीफाओं के राज्य की वापसी के नारे और अमेरिकी हथियारों से लैस होकर सीरिया और उसके आस-पास के क्षेत्रों पर अपना कब्जा जमाता चला गया। थोड़े से दिनों में ही आतंकवाद के  अर्थशास्त्र ने इसे इतना ताकतवर बना दिया कि अब वह अपने पश्चिमी आकाओं के लिये भस्मासुर बन चुका है। भूमध्य सागर और टर्की के रास्ते सीरिया, लेबनान, इराक से शरणार्थियों के जत्थे पर जत्थे यूरोप की धरती पर पहुंचने लगे। दो महीने पहले ग्रीक के एक टापू कोस के तट पर सीरियाई बच्चे आयलन कुर्डी के शव ने पूरे यूरोप में शरणार्थियों के प्रति नजरिये पर एक नयी बहस की शुरूआत की थी। कई यूरोपीय देशों ने पश्चिम एशिया के शरणार्थियों को शरण देने के अपने इरादों की घोषणा की। 

लेकिन दो महीने भी नहीं बीते, 13 नवंबर को पेरिस पर हुए आतंकवादी हमले ने लगता है जैसे सारे दृश्यपट को फिर एक बार एक झटके में बदल दिया। जो यूरोप कल तक शरणार्थियों के प्रति भाव-विह्वल था, इस हमले ने शरणार्थियों को उनकी घृणा का सबसे बड़ा पात्र बना दिया। ‘मानवतावादी और सहनशील’ यूरोप की चारों दिशाओं से प्रतिशोध, प्रतिशोध और प्रतिशोध की गूंजे सुनाई दे रही है। हंटिंगटन का ‘सभ्यता का संघर्ष’ फिर सर पर चढ़ कर बोल रहा है। स्लावोय जिजेक की तरह का मार्क्सवादी कहे जाने वाला अध्येता कह रहा है -‘आइसिस के आतंकवादियों के बारे में किसी गहरी समझ की जरूरत नहीं है, उन्हें वही कहा जाना चाहिए जो वे हैं - इस्लामिक फासिस्ट। जिजेक के मूंह से हंटिंगटन बोलने लगा है। उसका साफ मानना है कि ये शरणार्थी हमेशा पश्चिमी जीवन शैली के शत्रु बने रहेंगे, कभी यूरोपीय समाज में घुल-मिल नहीं पायेंगे। एक रूसी लेखक का उद्धरण देते हुए जिजेक ने अपने लेख में लिखा है - 
‘‘ये लोग थके हुए, क्रुद्ध और अपमानित है। इन्हें यूरोपीय मूल्यों, जीवनशैली और परंपराओं, बहु-संस्कृतिवाद या सहिष्णुता का कोई ज्ञान नहीं है। वे कभी भी यूरोप के कानूनों को नहीं मानेंगे। ...इतनी समस्याओं के साथ वे जिन देशों में आ गये हैं, उनका वे कभी भी उपकार नहीं मानेंगे, क्योंकि इन्हीं देशों ने तो पहले उनके स्वदेश में खून की नदियां बहाई है।...एंजेला मर्केल आधुनिक जर्मन समाज और यूरोप की सौगंध लेकर समस्या के लिये तैयार हो रही है...यह झूठ और मूर्खता है।’’

जिजेक यहां तक कह जाते हैं कि शरणार्थियों को लेकर भी एक अर्थशास्त्र काम कर रहा है, जो उनके प्रति सहानुभूति से पेश आने की दलीलें तैयार करवाता है। जिजेक ऐसी सभी मानवतावादी बातों को छोड़ कर आइसिस का और भी भारी हिंसा से मुकाबला करने पर बल देते हैं। 

इसप्रकार, पेरिस पर हुए इस हमले को क्यों 9/11 के बाद की परिस्थिति का दूसरा अध्याय कहा जा रहा है, इसकी एक झलक हमें स्लावोय जिजेक की बातों से मिल जाती है। पहले से ही जिस अरब दुनिया की कमर को तोड़ दिया गया है, अब इस दूसरे चरण में और भी हिंसक उपायों से कभी सभ्यता का पालना कही जाने वाली बेबिलोनिया-मेसोपोटामिया की इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिये नेस्तनाबूद किया जायेगा। पश्चिम के लोग ‘अपने’ यूरोप की नाक के तले इन पिछड़े हुए ‘जंगली और बर्बर’ लोगों को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते ! इस पूरे क्षेत्र पर पश्चिमी देशों का प्रत्यक्ष शासन ही इनकी नियति है - ‘सभ्यता की रक्षा की अनिवार्य शर्त!’

पेरिस पर हमले के एक दिन पहले ही इराक में आतंकवादियों ने 26 लोगों की हत्या की थी, 60 को जख्मी किया। उसके एक दिन पहले लेबनान के बेरूत में 181 लोग इनके विस्फोटों से मारे गये। पाकिस्तान में पिछले महीने 107 लोग मरे। इसराइली आतंकवादियों ने पिछले महीने 56 फिलिस्तीनियों को मार डाला। लेकिन कहीं भी इन हत्याओं को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दी। ये आतंकवादी वही थे, जिन्होंने पेरिस पर हमला किया। लेकिन तब तक किसी को इसमें कोई इस्लामिक फासीवाद नहीं दिखाई दिया। लेकिन पेरिस पर हमले के साथ ही जैसे इस लड़ाई का पूरा चरित्र बदल गया। वैसे ही, जैसे 22 जून 1941 के दिन सोवियत संघ पर हिटलर के हमले के साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध का चरित्र बदल कर ‘जनयुद्ध’ होगया था !  पेरिस पर हमला सभ्यता पर हमला है ! अन्यथा, अब तक तो आइसिस का मामला बर्बरों का आपसी मामला और सभ्य देशों के हथियारों की बिक्री और आजमाईश का मामला भर था। 

यह है - 9/11 के बाद के अभियान के इस दूसरे चरण का लुब्बेलुबाब। जिजेक की तरह के चिंतकों को आतंकवादियों और शरणार्थियों का अर्थशास्त्र अच्छी तरह से समझ में आता है, लेकिन सामरिक-औद्योगिक गंठजोड़ के अर्थशास्त्र से वे आंख चुरा लेते हैं। पश्चिम एशिया के तेल भंडार से लेकर नाना प्रकार के खनिजों की खुली लूट के साम्राज्यवादी अर्थशास्त्र को वे बड़ी आसानी से ओझल कर देते हैं। पश्चिमी देशों पर लटक रही 2008 से भी बड़ी और घातक मंदी के अर्थशास्त्र को भी भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में 1929 की महामंदी थी। 

और, सभ्यता के मसलों को हथियारों और युद्ध के बल पर तय करने की यह मानसिकता पूरी मानव जाति के अस्तित्व के साथ कितना बड़ा खेल खेल रही है, इसका भी इन्हें जरा सा अहसास नहीं है। आज की दुनिया, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की, परमाणविक हथियारों, इस पूरी धरती का विनाश कर देने में सक्षम हथियारों की दुनिया है। जो आज भी इतिहास में बल प्रयोग की भूमिका से रोमांचित हैं, उन्हें इतिहास के वेग के वर्तमान दौर का अंदाज ही नहीं है। यह पूरी मानवता को तलवार की धार पर चलाने की तरह है। थोड़ी सी चूक हुई तो फिर इस ब्रह्मांड से मनुष्य नामक प्राणी का अस्तित्व ही खत्म हो सकता है। पूंजी का वैश्वीकरण हुआ है, लेकिन राजसत्ताओं का नहीं। राज्यों के बीच हिंसक प्रतिद्वंद्विता बनी हुई है। इसके खतरे के परिणामों का इन्हें अंदाज ही नहीं है। एक समय में रोजा लुक्सेमबर्ग ने कहा था - समाजवाद या बर्बरियत। लेकिन, सच यह है कि बर्बरियत भी तभी नसीब होगी जब मनुष्य नसीब वाला होगा ! 


गुरुवार, 12 नवंबर 2015

भाजपा की अन्तर्कलह के दिलचस्प संकेत


अरुण माहेश्वरी

भाजपा में आडवाणी समूह का प्रतिवाद अनायास ही भाजपा और संघ परिवार के बारे में विचार की बहुत दिलचस्प संभावनाओं से भरा दिखाई देता है।

भाजपा लंबे अर्से से संसदीय जनतंत्र के ढांचे में संविधान-सम्मत ढंग से सत्ता की एक प्रतिद्वंद्वी पार्टी के रूप में बनी हुई है, और आरएसएस इस ढांचे के बाहर का गोपनीय सत्ता-केंद्र है। इन दोनों के बीच पिछले लगभग 64 सालों से एक ऐसी संगति बनी हुई है जिसे ध्यान से देखें तो पायेंगे कि यह एक खास प्रकार की विश्रृंखलित संगति (broken symmetry) है। बिना किसी वास्तविक जैविक संपर्क की संगति; अतार्किक संगति। यह संगति वस्तुत: तभी प्रकट होती रही है जब भाजपा सत्ता पर होती है। उसी समय आरएसएस की एक गैर-संवैधानिक सत्ता-केंद्र वाली भूमिका प्रकट होने लगती है। अन्य दिनों में, दोनों अपने-अपने दड़बों में सिमटे होते हैं। भाजपा दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों की तरह संसद के अंदर और संसद के बाहर की गतिविधियों में लगी रहती है। और आरएसएस तो शुद्ध सांस्कृतिक संगठन की खाल ओढ़ लेता है।

आम तौर पर लोग कहते हैं कि ये दोनों संगठन अन्योनाश्रित है। यह बात एक सफेद झूठ और कोरे भ्रम के अलावा कुछ नहीं है। सत्ता में अपनी भागीदारी के दावे के लिये आरएसएस द्वारा फैलाये जाने वाला भ्रम। क्योंकि सत्ता के संघर्ष में तो भाजपा के अलावा दूसरी भी अनेक पार्टियां हैं। जब दूसरी किसी पार्टी को अपने लिये ऐसे किसी बाहरी, गोपनीय ढंग के संचालक-संगठन की जरूरत नहीं महसूस होती है, जो खास परिस्थितियों में संविधानेत्तर सत्ता-केंद्र के तौर पर उभर कर आ जाता है, अन्यथा अपनी किसी दूसरी पहचान के साथ गुम रहता है,  तब फिर भाजपा के लिये ही ऐसे बाहरी संगठन का आसरा क्यों जरूरी है ! अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों में कुछ लोग संगठन का काम देखते हैं, कुछ संसदीय संस्थाओं में भागीदारी का जिम्मा लिये होते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी कभी अपने को एक-दूसरे से स्वतंत्र समूह बताने की जरूरत नहीं होती है। वे सभी एक प्रकट संगति में काम करते हैं।

मसलन, सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों को ही लिया जाए। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री को संचालित करते हैं - गैर-संवैधानिक सत्ता-केंद्र की भूमिका अदा करते हैं। लेकिन कभी कोई यह नहीं कह सकता है कि प्रधानमंत्री की पार्टी और सोनिया गांधी की पार्टी अलग-अलग है।

इसीलिये, आरएसएस और भाजपा के बीच की संगति पूरी तरह से अतार्किक और विश्रृंखलित संगति दिखाई देती है। जब भाजपा सत्ता के बाहर होती है तो इनके बीच हितों की टकराहट का कोई नजारा देखने को नहीं मिलता। लेकिन जब-जब भाजपा सत्ता पर आती है, सत्ता पर अपने हक के साथ आरएसएस मैदान में उतर जाता है और समाज के सभी स्तरों पर अजीबो-गरीब तनाव के दृश्य दिखाई देने लगते हैं। शिक्षा के भगवाकरण से लेकर, राममंदिर, धारा 370, गोमांस आदि की तरह के विषयों पर बवाल शुरू हो जाते हैं, जिनसे घोषित तौर पर भाजपा नीत मोर्चे और सरकारें बचने की बात कहते रहते हैं।

जन संघ के समय में, ‘77 में जनता पार्टी की सरकार के वक्त आरएसएस की वजह से ही दोहरी सदस्यता का पूरा अतार्किक और अनावश्यक विवाद पैदा हुआ। यह उसी विश्रृंखल संगति का परिणाम था जो इन दोनों संगठनों के बीच बनी हुई है। बाद के दिनों में, वाजपेयी-आडवाणी के सत्ता-काल में भी आरएसएस के साथ उनका हमेशा एक तनाव बना रहता था। यहां तक कि जिस गुजरात को संघ की प्रयोगशाला कहा जाता है, वहां भी 2002 के दंगों के बाद क्रमश: देखा गया कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस के काबू में नहीं रहे। सिंघल-तोगडि़या कंपनी से उनके संबंध, बाबू बजरंगी और माया कोडनानी की तरह के अपराधियों को जेल जाने से बचाने के प्रति मोदी की उदासीनता के अंदर भी इसी तनाव की झलक मिलती है।

इस बार, 2014 के चुनाव में आडवाणी जैसे भाजपा के एक वरिष्ठ, कद्दावर नेता से बचने के लिए आरएसएस ने गुजरात के चौदह साल से महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का इस्तेमाल किया। मोदी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बेइंतहा साधन-संपन्न पूरा पैकेज था। मोदी को भी संघ का मोहरा बनना अपने लिए लाभदायी लगा। आडवाणी, जोशी की उम्र ने इनके काम को आसान कर दिया। मोदी विकास के नाम पर जीत गये, लेकिन उनके जीतने के बाद ही आरएसएस ने अपना हमेशा का घटिया सांप्रदायिक खेल शुरू कर दिया।

आज परिस्थिति यह हुई है कि एक विश्रृंखलित संगति वाले संगठन की गतिविधियों के कारण डेढ़ साल के अंदर ही मोदी की चमक का पूरा मुलम्मा उतर चुका है।  जिस व्यक्ति ने जादू की छड़ी घुमा कर भाजपा का मोदी पार्टी में कायांतर कर लिया, संघ की करतूतों ने इतने थोड़े से दिनों में उसकी हस्ती को हिला कर रख दिया है। चौदह साल तक जो व्यक्ति मुख्यमंत्री रहा, जो आज प्रधानमंत्री है, वह अचानक ही, आरएसएस को सत्ता का भागीदार बनाने के चक्कर में कोरा संघ प्रचारक दिखाई देने लगा। मोदी और उसके प्रमुख सिपहसलार अमित शाह की सूरत आज भाजपा के तेजी से पतन के लिये जिम्मेदार सबसे बड़े खलनायक की हो गई है। जनता के बीच मोदी-शाह का प्रतिनिधित्व करने वाले तत्व आरएसएस के अनपढ़, अज्ञानी गाली-ब्रिगेड के लोग है !

बहरहाल, इस पूरे प्रसंग में जो मूल बात हमें सबसे अधिक दिलचस्प लगती है,  वह आरएसएस और भाजपा के बीच के संबंध की ही बात है - एक अस्वाभाविक, अतार्किक और विश्रृंखलित संगति के संबंध की बात।

दरअसल जब भी कोई स्वतंत्र ढांचा तैयार किया जाता है, तो हमेशा उसकी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए उसके चारों ओर एक खाई खोदी जाती है ताकि उन अवांछित प्रभावों से उस ढांचे को बचाया जा सके, जो उसकी स्वतंत्रता को हानि पहुंचाने वाले होते हैं। यह बात हर चीज पर लागू होती है। व्यक्ति, परिवार और  संगठन पर ही नहीं, बल्कि विचारों के ढांचे पर भी। बेटे को उसके पैरों पर खड़ा करने के लिए बाप को उसे छोड़ देना पड़ता है। जब कोई संगठन अपने घोषित उद्देश्यों से भिन्न किसी उद्देश्य के लिए अपने से अलग किसी संगठन को तैयार करता है तो उसे उस खास उद्देश्य के लिये अपने ढंग से काम करने के लिये छोड़ दिया जाता है। वह उस उद्देश्य विशेष के लिये जरूरी अपने विकास के तर्कों और तत्वों को अपनाता है। यहां तक कि विचारों के ढांचों में भी, हर धारणा को खुद अपनी संगति बनानी होती है।

लेकिन आरएसएस के साथ दिक्कत यह है कि वह ऐसे लालची बाप की तरह है जो बेटे को संपन्न देख कर उसपर लद कर उसे चूसना चाहता है और उसकी दरिद्रता के दिनों में उसे अपने से परे करके, स्वतंत्र जूझने के लिये छोड़ देता है। या उसकी दशा उस महाजन की तरह की है जो मौका देखकर अपने सूद को वसूलने के लिये उत्पात मचाया करता है। संघ ने जब अपने राजनीतिक सरोकारों को शुरू में ही जन संघ और बाद में भाजपा के सुपुर्द कर दिया और खुद को आत्मिक जगत के विषयों तक सिमटा लिया, तो फिर क्यों बार-बार अनुकूल मौकों पर उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं सर उठाने लगती है ! जो संगठन संसदीय जनतंत्र के ढांचे में पनप रही भाजपा नामक परिघटना से बाहर रहा है, वह जब अचानक ही अवतरित होकर बिल्कुल अलग प्रकार के उत्पात मचाना शुरू कर देता है, तो कुछ मिला कर जो अराजक, विश्रृंखल स्थिति पैदा हो सकती है, आज भाजपा उसी के परिणामों को भोग रही है।

हर परिस्थिति के विकास के अपने लक्षण होते हैं। और लक्षणों के साथ ही कुछ ऐसी चीजें भी होती है जिनके प्रभाव को रोक कर आगे बढ़ा जाता है। आरएसएस की बाबा आदम के जमाने की आइसिस-छाप, धर्म पर आधारित सामाजिक समझ के प्रभाव को रोक कर ही संसदीय जनतांत्रिक ढांचे में भाजपा अपना स्थान बना पाई है। अब फिर उसपर आरएसएस के विचारों का बलात-आरोपण इस पार्टी के ढांचे में कैसे-कैसे तनाव पैदा कर सकता है, आज के भाजपा के संकट में हम उसे आसानी से देख सकते है।

इसीलिये, इस संकट का अंतिम तार्किक परिणाम या तो आरएसएस के बलाघात से भाजपा के टूट कर बिखर जाने में हो सकता है या आरएसएस और भाजपा के रिश्तों में स्थायी दरार में। अगर सामयिक तौर पर इन परिणतियों को किसी प्रकार से टाल भी दिया गया तो भी यह दोनों संगठनों की कोशिकाओं के विकृतिकरण का, उन्हें प्राणघाती असाध्य रोग का शिकार बना देगा। शत्रुध्न सिन्हा, भोला सिंह, सी. पी. ठाकुर, आडवाणी, जोशी, शांता प्रसाद और यशवंत सिन्हा के प्रतिवाद के समूहवृंद में अक्सर भाजपा पर लद जाने वाले इस अलग प्रकार के संविधानेत्तर-सत्ता केंद्र के दबाव की चरमराहट की ध्वनि को आसानी से सुना जा सकता है। जो विचारों में विस्मृत हो चुका होता है, वह फिर जब अचानक यथार्थ में लौटता है तो कुछ लोगों में उसकी इस आकस्मिक वापसी से एक अलग प्रकार का सम्मोहन भी पैदा होता है। ऐसे लोग ही भाजपा के इस संकट से उद्धार में आरएसएस की कोई सकारात्मक भूमिका देख सकते हैं। वरना, जो इस संकट के मूल में है, उसे ही इसके निदान का कारण समझना सिवाय एक भ्रम के और कुछ नहीं हो सकता।


रविवार, 8 नवंबर 2015

बिहार के चुनाव परिणाम पर कुछ टीपें

-अरुण माहेश्वरी

शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ, आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर सँभल गई
आज हमें फ़ैज़ साहब की इन पंक्तियों को गाते रहने की इच्छा हो रही है ।

2019 में इस ग़ज़ल की और पंक्तियों को गाया जायेगा -
... दर्द का चाँद बुझ गया, हिज्र की रात ढल गई । '

सारे टीवी चैनल्स बिकाऊ है । चैनलों को ख़रीदने के मामले में आगे भी भाजपा दूसरी सभी पार्टियों की तुलना में ज्यादा ताक़तवर रहेगी । इसीलिये आगे के तीन साल तक टीवी चैनल लगातार झूठ उगलने के लिये अभिशप्त रहेंगे ।
अरुण शौरी ने मोदी के बारे में सही कहा है कि उनके पास अर्थ-व्यवस्था की कोई समझ नहीं है । आर्थिक मामलों में मोदी विफल रहेंगे लेकिन अख़बारों और चैनलों की हेडलाइन्स को लगातार ख़रीदते रहेंगे । मोदी-शाह की यह प्रवंचक कार्यनीति उनके लिये और पूरी भाजपा के लिये आत्म-प्रवंचना साबित होगी ।
मोदी ने कांग्रेस-मुक्त भारत की बात से अपनी शुरूआत की थी और सच यह है कि भाजपा-मुक्त भारत से अपनी पारी का अंत करेंगे । अमित शाह ने अपने लोगों से जीत का अभ्यास करने की बात से शुरूआत की और सच यह है कि उनका अंत लगातार हार को सहने की वास्तविकता से होगा ।

भाजपा के प्रवक्ता सभी चैनलों पर कह रहे हैं कि पार्टी हार के कारणों पर विचार करेगी ।
सवाल है - कौन सी पार्टी ? भाजपा या मोदी पार्टी ?
मोदी-शाह जोड़ी तो भाजपा को हड़प चुकी है । अगर भाजपा को इस हार पर विचार करना है तो उसे एक नया जन्म लेना होगा ; मोदी-शाह जोड़ी को इतिहास के कूड़े पर फेंकना होगा ; और आरएसएस से अपने को यथासंभव दूर करना होगा । क्या भाजपा के लिये यह कभी भी संभव है ?
कहना न होगा, बिहार चुनाव का यह बिंदु भारत में भाजपा के पूरी तरह से अप्रांसगिक होते जाने के प्रारंभ का बिंदु साबित होगा ।

मोदी समूह का बार-बार एक ही भूल को दोहराते रहना ही उसकी नियति है ।
टीवी चैनलों पर अक्सर कुछ टिप्पणीकार बड़ी मासूमियत से यह सवाल करते पाये जाते हैं कि बार-बार मूंह की खाने के बावजूद यह पार्टी एक ही गलती को बार-बार दोहराती क्यों है? मसलन्, मोदी ने दिल्ली में जो भूलें की, हूबहू उन्हीं भूलों को उसने दिल्ली में क्यों दोहराया ? अथवा भाजपा को जिन भूलों की वजह से कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश में इतनी कीमत चुकानी पड़ी, वही भूलें उन्होंने फिर बिहार में क्यो कीं ?
क्या कहेंगे इन टिप्पणीकारों की मासूमियत को ? क्या वे यह नहीं जानते कि कोई भी घटना तब एक नियम का रूप ले लेती है जब उसे बार-बार दोहराया जाता है। पहली बार में कोई घटना किसी नियम का संकेत नहीं देती। घटनाओं की नियम-विहीन सी नजर आती श्रृंखलाओं के बीच से एक नियमित श्रृंखला को पाया जा सकता है ; विचारों के बार-बार दोहराव से विचारधारा को पहचाना जा सकता है।
जैसे, आजाद भारत में सांप्रदायिक दंगों के इतिहास में एक खास ढर्रा देखा गया है। पिछले लोक सभा चुनाव के पहले ही दंगों और सांप्रदायिक तनावों की एक पूरी श्रृंखला देखी गई। इन अनुभवों के आधार पर ही तो यह अनुमान लगाया जाता है कि यदि उत्तर प्रदेश का प्रशासन चौकन्ना न रहा तो उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव के पहले बड़े पैमाने पर दंगे होंगे। बिहार में भी सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कम कोशिश नहीं की गई।
जाहिर है कि दंगों की घटनाओं की यही श्रृंखला भाजपा को बाकायदा एक सांप्रदायिक पार्टी बनाती है। सांप्रदायिक राजनीति का यह नियम उसके कामों और विचारों, दोनों में जाहिर होता है। भाजपा के चरित्र के मूल में उसकी विचारधारा है, लेकिन जैसे इतिहास के नियम कर्ता के बजाय उसके कार्यों से तैयार होते हैं, वैसे ही भाजपा की ठोस सांप्रदायिक पहचान उसकी भड़काऊ और दंगाई गतिविधियों से बनती है।
यही वजह है कि पार्टियों से जुड़ी किसी भी घटना की व्याख्या करने वाले पंडितों के लिए यह जरूरी होता है कि वह उनकी गतिविधियों की श्रृंखला की व्याख्याओं से जाहिर होने वाली विचारधारा को ठोस रूप में जाने। विचारधारा को तरजीह न देने वाले या न जानने वाले व्याख्याता ही इसप्रकार के निरर्थक, मासूम से सवाल कर सकते हैं।
एक मित्र ने लिखा कि “भाजपा के कुछ वर्तमान और भूतपूर्व नेता आज मन की बात बोल रहे हैं ,भाजपाई होकर भी विपक्षी से दिख रहे हैं तो हमें अच्छा लगता है, सूट करता है।ज़रा सोचिये अगर ये मंत्री या ऐसे ही कुछ बना दिये गए होते पहले ही, इनके अहम को चोट नहीं पहुँचाई गई होती, इनकी पूछ होती तो क्या ये मन की बात बोलना पसंद करते या बोलते तो वह उस कोटि की होती,जैसी कि मोदीजी की आकाशवाणी पर होती है।और आज जो मोदीजी की जयजयकार कर रहे हैं, कल मान लो उन्हें बाहर कर दिया जाए तो वे भी खरी-खरी बात कहने लगेंगे,इसलिए मौक़े के मुताबिक़ बोलनेवालों और जो हमेशा एक सा कड़ुवा बोलते हैं,उनमें आज भी हमें फ़र्क़ करना चाहिए।“
हमारा कहना है - जब कोई विचार कहीं से भी आता है तो वह किसी न किसी लक्षण का भी सूचक होता है। किसी भी वजह से क्यों न हो, वह एक दरार तो दर्शाता ही है। इससे यह मिथक दरकता है कि मोदी-शाह नेतृत्व चुनौती-विहीन है। आज हमें ये नेता संदिग्ध लग सकते हैं, लेकिन जब ऐसे ही विचारों का दोहराव होगा तो यही बाते उस पार्टी के अन्दर एक ‘ऐतिहासिक जरूरत’ मानी जाने लगेगी। जो चीज प्रथमत: कुछ समझ में नहीं आती, अजीब सी लगती है, वही क्रमश: चेतना में रूपांतरित होती है। चेतना के बनने का रास्ता हमेशा इसीप्रकार पहले चीज की गलत पहचान से ही पैदा होता है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले उदय प्रकाश ने अपना सम्मान लौटाया। बहुतेरे ऐसे थे, जिन्होंने उनके इरादों पर संदेह किया। उनके बाद नयनतारा सहगल, फिर अशोक वाजपेयी - संदेहास्पदकता का भाव कमजोर होने लगा। और आज, उसे ही सब एक ‘ऐतिहासिक जरूरत’ समझ रहे हैं। इसीलिये देखने की जरूरत है कही जाने वाली बातों की सत्यता को, न कि कौन कह रहा है उसके व्यक्तित्व को।
सचमुच, भाजपा के प्रवक्ताओं के मुंह से ‘विकास’ एक अपशब्द की तरह लगने लगा है।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

मिथ्या चेतना का घटाटोप और आलोचना

अरुण माहेश्वरी


‘लहक’ के पिछले (अगस्त-सितंबर 2015 के) अंक में विनोद शाही ने अपनी टिप्पणी  ‘साहित्य की स्वायत्तता और मार्क्सवाद’ के जरिये हमसे साहित्य की स्वायत्तता के बारे में जवाब मांगा है। मोटे तौर पर उनका मानना है कि एक तो भौतिक जगत है जिसके अपने नियम, कायदे-कानून, इतिहास और भूगोल है, जिनके दायरे में वह चलता है। इसके समानान्तर साहित्य का एक अपना अन्तर्जगत, अपना प्रभामंडल है। ‘‘साहित्य के पास जो इतिहास-बोध होता है - वह समकालीन सामाजार्थिक रिश्तों का उत्पाद भर नहीं होता। इसके साथ-साथ वह एक तरह के ‘जीवन’ के अब तक के इतिहास की हमारी चेतना में मौजूदगी का उत्पाद भी होता है। आप इस क्षण को नहीं जीते हैं, आप अपने भीतर इतिहास के उस अपार समृति-कोष को भी जीते हैं - जो वंश दर वंश हमें नैसर्गिक तौर पर ‘अचेत’ रूप में उपलब्ध कराया जाता है। साहित्य की ‘आंतरिक स्वायत्तता’ का एक स्रोत यह ‘नैसर्गिक इतिहास बोध’ होता है।’’

विनोद शाही ने अपने लेख में साहित्य की इस ‘आंतरिक’ या ‘बाह्य’ स्वायत्तता के लिये बड़ी मासूमियत से मार्क्स का अनुमोदन लेते हुए मार्क्स की ‘ईश्वर के प्रतीकार्थों’ वाली कथित व्याख्याओं की याद दिलाई है। कहते हैं - ‘‘मनुष्य के सुख-दुख मूलक संघर्षों का मुकाबला करने के लिए ईश्वर के रूप में ‘स्वायत्त’ चेतना का प्रतीक गढ़ा गया था।’’

चूंकि विनोद जी ने अपने इस ‘स्वायत्तता-तत्व’ के लिये कार्ल मार्क्स का अनुमोदन लेने की कोशिश की है, इसलिए उनके जवाब का सबसे आसान तरीका तो यह है कि इस प्रसंग में मार्क्स की कुछ बहुचर्चित उक्तियों को उद्धृत करके ही हम अपने काम की इतिश्री कर लें। मसलन, मार्क्स, एंगेल्स के ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ के इस अंश को ही लिया जा सकता है जिसमें वे कहते हैं :

‘‘क्या यह समझने के लिए गहरी अन्तर्दृष्टि की जरूरत है कि मनुष्य के विचार, मत और उसकी धारणाएं - संक्षेप में, उसकी चेतना उसके भौतिक अस्तित्व की अवस्थाओं, उसके सामाजिक संबंधों और उसके सामाजिक जीवन के प्रत्येक परिवर्तन के साथ बदलती जाती है।
‘‘विचारों का इतिहास इसके सिवा और क्या साबित करता है कि जिस अनुपात में भौतिक उत्पादन में परिवर्तन होता है, उसी अनुपात में बौद्धिक उत्पादन का स्वरूप परिवर्तित होता है ? हर युग के प्रभुत्वशाली विचार सदा उसके शासक वर्ग के ही विचार रहे हैं।
‘‘जब लोग समाज में क्रांति लाने वाले विचारों की बात करते हैं तब वे केवल इस तथ्य को व्यक्त करते हैं कि पुराने समाज के अंदर एक नए समाज के तत्व पैदा हो होगए हैं और पुराने विचारों का विघटन अस्तित्व की पुरानी अवस्थाओं के विघटन के साथ कदम मिला कर चलता है।
‘‘प्राचीन दुनिया जिस समय अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी, उस समय प्राचीन धर्मों को ईसाई धर्म ने पराभूत किया था। जब अठारहवीं शताब्दी में ईसाई मत बुद्धिवादी विचारों के सामने धराशायी हुआ, उस समय सामंती समाज ने तत्कालीन क्रांतिकारी बुर्जुआ वर्ग से अपनी मौत की लड़ाई लड़ी थी। धर्म-स्वातंत्र्य और अंत:करण की स्वतंत्रता की बातें ज्ञान जगत में मुक्त होड़ के प्रभुत्व को ही व्यक्त करती थीं।
‘‘कहा जायेगा कि ‘‘यह ठीक है कि इतिहास के विकासक्रम में धार्मिक, नैतिक, दार्शनिक, राजनीतिक और कानून संबंधी विचार बदलते आए हैं; लेकिन धर्म, नैतिकता, दर्शन, राजनीति और कानून तो सदा इस परिवर्तन से बचे रहे हैं।
‘‘इसके अलावा स्वाधीनता, न्याय, आदि ऐसे शाश्वत सत्य भी है , जो हर सामाजिक अवस्था में समान रूप से लागू होते हैं। लेकिन कम्युनिज्म उन्हें नए आधार पर प्रतिष्ठित करने के बजाय सभी शाश्वत सत्यों को खत्म कर देता है, वह समस्त धर्म और समस्त नैतिकता को मिटा देता है; इसलिए कम्युनिज्म विगत इतिहास के समस्त अनुभवों के विपरीत आचरण करता है।’’
‘‘इस आरोप का सार-तत्व क्या है? पिछले प्रत्येक समाज का इतिहास वर्ग विरोधों के विकास का इतिहास है, उन वर्ग विरोधों का, जिन्होंने भिन्न युगों में भिन्न रूप धारण किया था।
‘‘पर उन्होंने चाहे जो भी रूप धारण किया हो, पिछले सभी युगों में एक चीज हर अवस्था में मौजूद थी - समाज में एक हिस्से द्वारा दूसरे हिस्से का शोषण। अत: यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि विगत युगों की सामाजिक चेतना, अनेकानेक विविधताएं और विभिन्नताएं प्रदर्शित करने के बावजूद , किन्हीं सामान्य रूपों या सामान्य विचारों के दायरे में गतिशील रही है, जो वर्ग विरोध के पूर्ण रूप से विलुप्त होने के पहले पूरी तरह नहीं मिट सकते।
‘‘कम्युनिस्ट क्रांति समाज के परंपरागत संपत्ति संबंधों से आमूल संबंध-विच्छेद है ; फिर इसमें आश्चर्य क्या कि इस क्रांति के विकास का अर्थ है समाज के परंपरागत विचारों से आमूल संबंध-विच्छेद।’’

इसीप्रकार, मार्क्स की कृति ‘जर्मन विचारधारा’ तथा मार्क्स, एंगेल्स के अनगिनत पाठों से ऐसे तमाम उद्धरण निकाल कर रखे जा सकते है जहां वे यह साफ तौर पर कहते हैं कि विचारों का वास्तव में अपना कोई इतिहास नहीं होता। हमने अपने लेख ‘आलोचना के कब्रिस्तान से’ में ‘जर्मन विचारधारा’ से मार्क्स के एक कथन को उद्धृत किया था :

‘‘आदमी के दिमाग में बनने वाले काल्पनिक बिंब भी अनिवार्यत: उस भौतिक जीवन प्रक्रिया के संस्करण है, जिन्हें अनुभव द्वारा परखा जा सकता है और जो भौतिक पूर्वाधारों से संबद्ध है। नैतिकता, धर्म, तत्व मीमांसा, विचारधारा तथा चेतना के तदनुरूपी बाकी सभी रूप अब स्वतंत्रता का नकाब ओढ़े नहीं रह सकते। उनका कोई इतिहास, कोई विकास नहीं है; परंतु मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन तथा अपने भौतिक संसर्ग के विकास से अपने इस वास्तविक अस्तित्व को और साथ ही अपने चिंतन और चिंतन के परिणामों को भी बदलता है। जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता बल्कि चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है। निरीक्षण की पहली विधि के प्रस्थान बिंदु में चेतना को सजीव व्यक्ति मान कर चला जाता है; दूसरी विधि में स्वयं वास्तविक सजीव मनुष्य, जो वास्तविक जीवन के अनुरूप है, वही प्रस्थान बिंदु है तथा चेतना को पूरी तरह से उसकी चेतना मात्र माना जाता है।’’

एंगेल्स फ्रांज मेहरिंग के नाम अपने प्रसिद्ध पत्र में कहते हैं -‘‘विचारधारा एक प्रक्रिया है, जिसे यह सही है कि तथाकथित चिंतक चेतन रूप से संपन्न करता है पर मिथ्या चेतना के साथ। उसे प्रेरित करने वाली असल प्रेरक शक्तियां उसे अज्ञात रहती है। अन्यथा वह विचारधारात्मक प्रक्रिया ही न होगी। इसलिए वह झूठी या प्रतीयमान प्रेरक शक्तियों की कल्पना कर लेता है। चूंकि यह चिंतन की प्रक्रिया है, इसलिए इसका रूप एवं विषय वस्तु भी वह अपने या अपने पूर्ववर्तियों के विशुद्ध चिंतन से प्राप्त करता है। वह केवल चिंतन सामग्रियों को लेकर काम करता है, जिसे बिना जांच-परख के ही वह चिंतन-फल के रूप में स्वीकार कर लेता है और चिंतन से स्वतंत्र किसी अधिक दूरवर्ती स्रोत की छानबीन नहीं करता। वस्तुत: यही उसके लिए सहज मार्ग है, क्योंकि सारे कार्य में चिंतन की मध्यस्थता होने के कारण उसे वह अंतत: चिंतन पर आधारित ज्ञात होता है। ’’

उम्मीद है, विनोद शाही ने जिस ‘नैसर्गिक इतिहास बोध’ से उत्पन्न ‘स्वायत्त साहित्य’ की बात की है, उसमें ‘साहित्य’ से उनका तात्पर्य वैचारिक उत्पादों की श्रेणी की ऐसी ही एक चीज है। और, मार्क्स-एंगेल्स के उपरोक्त इतने लंबे उद्धरणों को कोई भी यदि ध्यान से पढ़ेगा तो इनमें ऐसे, ‘जीवन के अब तक के इतिहास की हमारी चेतना में मौजूदगी के उत्पाद’ को लेकर विनोद शाही की उन सभी शंकाओं का भरपूर उत्तर मिल जायेगा, जो उन्होंने मार्क्स के ही हवाले से हमारे सामने रखी है।

इसके बावजूद, हम विषय को मार्क्स-एंगेल्स के इस प्रकार के कथनों के उद्धरण पर ही खत्म नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि ऐसा करने पर हमारे गूढ़-रहस्य संधानी विद्वान को लग सकता है कि यह तो मार्क्सवाद के सामान्य ज्ञान मात्र से निकाले गये सरल निष्कर्ष हैं। अर्थात एक प्रकार का निगमनात्मक तर्कदोष (deductive fallacy)!

कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र कहता है - ‘‘विगत युगों की सामाजिक चेतना, अनेकानेक विविधताएं और विभिन्नताएं प्रदर्शित करने के बावजूद , किन्हीं सामान्य रूपों या सामान्य विचारों के दायरे में गतिशील रही है’’ ; ‘जर्मन विचारधारा में मार्क्स कहते हैं -‘‘ नैतिकता, धर्म, तत्व मीमांसा, विचारधारा तथा चेतना के तदनुरूपी बाकी सभी रूप अब स्वतंत्रता का नकाब ओढ़े नहीं रह सकते।“ फ्रांज मेहरिंग को एंगेल्स लिखते हैं -‘‘ विचारधारा एक प्रक्रिया है, जिसे यह सही है कि तथाकथित चिंतक चेतन रूप से संपन्न करता है, पर मिथ्या चेतना के साथ।’’ (जोर हमारा)

हम अपनी बात को इस प्रश्न पर केंद्रित करना चाहते हैं कि जिस चीज को ऊपर के उद्धरणों में ‘सामान्य रूपों या सामान्य विचारों के दायरे’, ‘नकाब’ या ‘मिथ्या चेतना’ आदि कहा गया हैं, वे आखिर है क्या ? क्योंकि यही तो है जिनकी वजह से मार्क्स-एंगेल्स का कहना है कि ऐसे भ्रम पैदा होते हैं जिसमें विचारधारा के सारे कार्य अंतत: चिंतन पर आधारित ज्ञात होने लगते हैं! जीवन के ठोस यथार्थ से स्वतंत्र, ‘आंतरिक तौर पर स्वायत्त’! और यही वह आधार है जिसपर हमारे विनोद शाही जी का ‘साहित्य की स्वायत्तता’ का पूरा महल खड़ा होता है।

इस विषय की गहराई से जांच करने के लिये यदि हम मार्क्स की चिंतन प्रक्रिया के सिर्फ एक विषय पर अपने को केंद्रित करें तो हमारा मानना है कि हम यह जान पायेंगे कि जिसे मार्क्स-एंगेल्स चिंतन का एक ‘दायरा’, ‘नकाब’ या ‘मिथ्या चेतना’ बता रहे हैं, वह मूलत: क्या है ? यह विषय है - ‘पण्यों की जड़पूजा’ (commodity fetishism) का विषय, जिसे हम, भले अपनी सुविधा के लिये ही कहीं- कहीं, ‘पण्यों की जड़पूजा’ के बजाय ‘मालांधता’ कहना ज्यादा पसंद करेंगे।

मार्क्स की ‘पूंजी’ का पहला अध्याय है -पण्य और द्रव्य (Commodities and Money)। और इसमें सबसे पहले पण्य को अपने विचार का विषय बनाते हुए उन्होंने जो पहला वाक्य लिखा है, वह है -‘‘जिन समाजों में उत्पादन की पूंजीवादी प्रणाली व्याप्त है, उनमें धन ‘पण्यों के विशाल संचय’ के रूप में सामने आता है और उसकी इकाई होती है एक पण्य।’’

पण्य आदमी के बाहर की एक ऐसी वस्तु जो अपने गुणों के कारण उसकी किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति करती है, वह आवश्यकता भले ‘पेट से पैदा हुई हो या कल्पना से’। कोई वस्तु सीधे हमारे काम में आ सकती है या हमारे काम में आने वाली दूसरी वस्तु के उत्पादन में भी काम में आ सकती है। हर उपयोगी वस्तु में नाना गुण होते हैं और इसीलिए वह नाना प्रकार से हमारे उपयोग में आ सकती है।

मार्क्स कहते हैं कि ‘‘वस्तुओं के विभिन्न उपयोगों का पता लगाना इतिहास का काम है। इसीप्रकार इन उपयोगी वस्तुओं के परिमाणों के सामाजिक दृष्टि से मान्य पैमानों की स्थापना करना भी इतिहास का ही काम है। इन पैमानों की विविधता का मूल आंशिक रूप से तो इस बात में हैं कि मापी जाने वाली वस्तु नाना प्रकार की होती है और आंशिक रूप से प्रचलित ढर्रों (मान्यताओं) में निहित है।’’
‘‘किसी वस्तु की उपयोगिता उसे उपयोग मूल्य प्रदान करती है। लेकिन यह उपयोगिता कोई हवाई चीज नहीं है। वह चूंकि पण्य के भौतिक गुणों तक सीमित है, इसलिए पण्य से अलग उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। इसीलिए पण्य जहां तक भौतिक है, उसका उपयोग मूल्य है।’’

इसी क्रम में मार्क्स आगे लिखते हैं कि किसी भी पण्य का गुण इस बात से स्वतंत्र होता है कि उसके उपयोगी गुणों का इस्तेमाल करने के लिए कितने श्रम की आवश्यकता होती है। लेकिन उपयोग मूल्य का हमेशा एक माप होता है, वह निश्चित परिमाणात्मक होता है। यह उपयोग मूल्य चरितार्थ होता है केवल उपयोग या उपभोग के जरिये। और उसके इसी भौतिक आधार से हम जिस समाज पर विचार करने जा रहे है उसमें उसका विनिमय मूल्य उत्पन्न होता है।

गौर करने की बात यह है कि पण्य का विनिमय मूल्य कोई स्थाई मूल्य नहीं होता। यह समय और स्थान के अनुसार हमेशा बदलता रहता है। इसीलिये विनिमय मूल्य अपने आप में एक सांयोगिक तथा पूरी तरह से सापेक्ष चीज प्रतीत होती है। इसप्रकार, ऐसा विनिमय मूल्य जो पण्य के अपने मूल्य से अभिन्न रूप में जुड़ा हुआ है, - यह खुद में एक अन्तर्विरोधी बात लगने लगती है। जो सांयोगिक है, समय और स्थान के सापेक्ष है, वह किसी पण्य के अपने स्थायी मूल्य से कैसे जुड़ा हो सकता है !

और यहीं से मार्क्स कदम-ब-कदम पूंजी के एक अबूझ से, अमूर्तनताओं, संयोगों और सापेक्षताओं के एक प्रकार के प्रेत-संसार की ओर अपनी यात्रा शुरू कर देते हैं। वे पाते हैं कि विभिन्न पण्यों के उपयोग मूल्य को यदि दरकिनार कर दिया जाएं तो जो एक चीज सभी पण्यों में समान रूप से पाई जाती है वह यह कि वे सभी श्रम के उत्पाद है। ‘‘मूल्यों के रूप में तमाम पण्य घनीभूत श्रम-काल की निश्चित राशियां मात्र है।’’

मार्क्स मजे की बात यह देखते हैं कि इस समाज में यह श्रम भी कोई अपने आप में इकहरी चीज नहीं है। श्रम को उसके उपयोग मूल्य से अलग कर लेने पर वह अपने उत्पादों के भौतिक रूपों से भी अलग हो जाता है। अलग-अलग वस्तुओं में लगे श्रम की अलग-अलग सूरत होती है, लेकिन भौतिक वस्तु से अपने को अलग कर लेने पर हर श्रम की एक ही सूरत होती है - अमूर्त मानव-श्रम। पण्य के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य की तरह ही, जहां तक वह मूल्य के रूप में अपने को व्यक्त करता है, वहां तक उसमें वे गुण नहीं होते जो उपयोगमूल्य के सृजनकर्ताओं, कारीगरों आदि के नाते उसमें होते हैं।

ये अलग-अलग उत्पादक स्वतंत्र रूप से तथा निजी तौर पर जो विभिन्न प्रकार का उपयोगी श्रम करते हैं, उनके बीच का यह गुणात्मक अंतर विकसित होकर एक जटिल व्यवस्था - यानी सामाजिक श्रम-विभाजन बन जाता है। मार्क्स बताते हैं कि यदि हम उत्पादक क्रिया के विशेष रूप की ओर ध्यान न दें तो उत्पादक क्रिया मानव की श्रम शक्ति को खर्च करने के सिवा और कुछ नहीं है। उपयोग मूल्यों के परिमाण में वृद्धि होने का मतलब है भौतिक धन में वृद्धि।

इसप्रकार, जिसे हम पण्य कहते हैं वह वस्तु का भौतिक अथवा प्राकृतिक रूप और उसका मूल्य रूप, इन दो रूपों को धारण किये होता है। मूल्य की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती। वह केवल पण्य के साथ, पण्य के सामाजिक संबंधों के रूप में अपने को प्रकट कर सकता है।

आगे मार्क्स देखते हैं कि इस समाज में मूल्य अपने को एक और, द्रव्य (money) रूप में भी प्रकट करता है। मार्क्स कहते हैं कि पण्यों के मूल्य संबंधों के जरिये व्यक्त मूल्य अपनी सबसे सरल, लगभग अदृश्य रूप-रेखा से आरंभ करके कैसे आंखों को चौंधिया देने वाले द्रव्य रूप तक विकास करता है, यह एक सबसे महत्वपूर्ण पहेली और समझने लायक चीज है। वे बताते हैं कि पण्य के मूल्य का प्राथमिक रूप भिन्न प्रकार के दूसरे पण्य के साथ उसके मूल्य संबंध को व्यक्त करने वाले समीकरण में निहित है, अर्थात दूसरे पण्य के साथ विनिमय के संबंध में। लेकिन खुद में यह बात असंभव है कि इतनी असमान वस्तुएं कैसे किसी एक पैमाने से मापी जा सकती है, अर्थात उन्हें गुणात्मक रूप से समान बताया जा सकता है। इसप्रकार का समीकरण इन वस्तुओं की प्रकृति के लिये एक बाहरी चीज, परायी चीज है और इसलिए इसे सिर्फ व्यवहारिक उद्देश्य के लिए अपनाई गई एक ‘कामचलाऊ तरकीब’ कहा जा सकता है।

इसी संदर्भ में मार्क्स अरस्तू की उस प्रतिभा का लोहा मानते हैं कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों की अभिव्यक्ति में समानता का संबंध देखा। लेकिन अरस्तू जिस समाज में रहते थे, उसकी परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच’ क्या था। अरस्तू यह नहीं देख पाएं कि पण्यों में मूल्य का आरोपण करना हर प्रकार के श्रम को समान मानव-श्रम के रूप में और इसलिए समान गुण के श्रम के रूप में व्यक्त करने का ही एक ढंग है।

इस प्रकार की एक विस्तृत चर्चा के संदर्भ में मार्क्स ‘पण्यों की जड़पूजा और उसका रहस्य’ विषय पर चर्चा करते हैं, जिसपर हम विनोद शाही जी की ‘स्वायत्तता-चिंता’ के संदर्भ में विशेष तौर पर विस्तार से बात करना चाहते हैं। पूंजी में मार्क्स जिस प्रकार अपने मुद्दे के विषय पर आने के पहले वकीलों की ब्रीफ की तरह अपनी समझ के सारे नुक्तों को सुपरिभाषित करते हुए, किस पद को किस संदर्भ के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए इसकी एक पुख्ता नींव तैयार करते हैं और उसके आधार पर ‘पूंजी’ के विस्तृत विश्लेषण का अपना विशाल महल तैयार करते हैं, वह चीजों को देखने के मार्क्सवादी नजरिये को समझने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसीमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, पण्य की जड़पूजा, मालांधता का मुद्दा, जो किसी भी वैचारिक उत्पाद की आंतरिक स्वायत्तता के रहस्य को समझने में किसी के लिये भी मददगार हो सकता है।

इस विषय पर मार्क्स इसप्रकार प्रारंभ करते हैं -

‘‘पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आने वाली चीज मालूम होता है। किंतु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है। जहां तक वह उपयोग-मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव-आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है, और चाहे इस दृष्टिकोण से कि वे गुण मानव-श्रम के उत्पाद है, इसमें रहस्य की कोई बात नहीं है।... लेकिन जैसे ही वह पण्य के रूप में सामने आती है, वैसे ही वह मानो किसी इंद्रियातीत वस्तु में बदल जाती है। तब वह न सिर्फ अपने पैरों के बल खड़ी होती है, बल्कि दूसरे तमाम पण्यों के संबंध में सिर के बल खड़ी हो जाती है और अपने काठ के दिमाग से ऐसे-ऐसे अजीबोगरीब विचार निकालती है कि उनके सामने मृतात्माओं को बुलाने वाली प्रेत-विद्या भी मात खा जाती है।’’

इसमें वे आगे कहते हैं कि ’’देखने की क्रिया में तो हर सूरत में एक चीज से दूसरी चीज तक, बाह्य वस्तु से आंख तक, सचमुच प्रकाश जाता है। इस क्रिया में भौतिक वस्तुओं के बीच भौतिक संबंध कायम होता है। लेकिन पण्यों के बीच ऐसा कुछ नहीं होता। वह पण्यों के रूप में वस्तुओं के अस्तित्व का और वस्तुओं के बीच पाए जाने वाले उस मूल्य के संबंध का, जो कि उन वस्तुओं को पण्य बना देता है, उनके भौतिक गुणों से तथा इन गुणों से पैदा होने वाले भौतिक संबंधों से कोई ताल्लुक नहीं होता। वहां मनुष्यों के बीच कायम एक खास प्रकार का सामाजिक संबंध है जो उनकी नजरों में वस्तुओं के संबंध का अजीबोगरीब रूप धारण कर लेता है। इसलिए यदि उसकी उपमा खोजनी है तो हमें धार्मिक दुनिया के कुहासे से ढंके क्षेत्रों में प्रवेश करना होगा। उस दुनिया में मानव मस्तिष्क से उत्पन्न कल्पनाएं स्वतंत्र और जीवित प्राणियों जैसी प्रतीत होती है, जो आपस में मनुष्य जाति के साथ भी संबंध स्थापित करती रहती है। पण्यों की दुनिया में मनुष्य के हाथों उत्पन्न होने वाली वस्तुएं भी यही करती है। मैंने इसे जड़पूजा (अंधता - अ.मा.) का नाम दिया है ; श्रम से पैदा होने वाली वस्तुएं जैसे ही पण्यों के रूप में पैदा होने लगती है, वैसे ही उनके साथ यह गुण चिपक जाता है, और इसलिए यह अंधता पण्यों के उत्पादन से अलग नहीं की जा सकती।
‘‘...पण्यों के प्रति इस अंधता का मूल उनको पैदा करने वाले श्रम के अनोखे सामाजिक रूप में है।’’

कहना न होगा, अपनी कृति ‘पूंजी’ के तीनों खंडों में मार्क्स का आगे का पूरा उपक्रम पण्य के बजाय उसके प्रति इसी अंधता पर टिके सामाजिक-संबंधों के रूपों का पर्त-दर-पर्त विश्लेषण है। पण्य का सार-तत्व नहीं, उस सार-तत्व का एक प्रकार की अंधता पैदा करने वाला यह रहस्यमय, मायावी, बल्कि आकर्षक रूप - मार्क्सवाद इसी रूप के विस्तृत संजाल की व्याख्या का दर्शन है। वह पण्य के रूपों के रहस्य-जाल का उन्मोचन करता है। ठीक उसी प्रकार जैसे मनोविश्लेषक दार्शनिक स्लावोय जिजेक फ्रायड के बारे में कहते हैं कि फ्रायड का जोर स्वप्न के पीछे के सार-तत्व, उसके latent dream thought की व्याख्या नहीं था, बल्कि स्वप्न के रूप के रहस्य को उन्मोचित करना था।

और यही तो है वे ‘सामान्य रूपों या सामान्य विचारों के दायरे’, ‘नकाब’ या ‘मिथ्या चेतना’, ‘स्वायत्तताओं के कोटर’ जिनकी हमने इस लेख के शुरू में चर्चा की है और जो पण्यों के संसार के रूप की विशेषताएं हैं। जिस अनुपात में इस पण्यों के संसार के रूप की माया टूटेगी, उसी अनुपात में इन रहस्यों, अंधताओं पर से भी पर्दा उठता जायेगा। इसीलिये कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र कहता है -
‘‘कम्युनिस्ट क्रांति समाज के परंपरागत संपत्ति संबंधों से आमूल संबंध-विच्छेद है ; फिर इसमें आश्चर्य क्या कि इस क्रांति के विकास का अर्थ है समाज के परंपरागत विचारों से आमूल संबंध-विच्छेद।’’
इसप्रकार जाहिर है कि मार्क्सवाद के नाम पर जो यह समझते हैं कि वह शुद्ध पदार्थवाद है, वे शतप्रतिशत गलत है। यह तो पदार्थ कब, कैसे और क्यों कोई खास प्रकार का विनिमय-योग्य मूल्यवान रूप ग्रहण करता है, उस तंत्र के रूप की व्याख्या का सिद्धांत है। वैसे ही जैसे फ्रायड की विश्लेषण पद्धति स्वप्नों के पीछे के किसी सार-तत्व की तलाश की पद्धति नहीं है, बल्कि स्वप्नों के रहस्यमय, अतार्किक रूप के विश्लेषण की पद्धति है। पण्यों पर टिके सामाजिक संबंधों के रूप में भी कोरी अतार्किकताएं भरी हुई है, जिनका आकर्षण दुर्घटनाओं-संयोगों से बनने वाले मूल्यों के पैमानों पर आधारित कोरा रहस्य-रोमांच वाला आकर्षण है।

मार्क्स बताते हैं कि ‘‘पूंजी का परिचलन से उत्पन्न होना असंभव है और उसका परिचलन से बाहर भी जन्म लेना असंभव है। पूंजी का जन्म परिचलन के भीतर होते हुए भी उसके भीतर नहीं होना चाहिए।’’

यही है मालांधता का परिणाम। पण्यों की माया किसी सपने की माया से कम नहीं है, और जैसे फ्रायड अतार्किक स्वप्नों के लक्षणों के अध्ययन का एक पूरा शास्त्र गढ़ते हैं, मार्क्स ने बिल्कुल उसी प्रकार पूंजी के मूल चरित्र से बेखबर, इस मालांधता से पैदा होने वाले सामाजिक संबंधों और उसके सभी शास्त्रों के लक्षणों का अध्ययन किया था। लक्षण, अर्थात उसमें स्वाभाविक रूप से पड़ने वाली दरारें। मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि किसी भी ढांचे की इन दरारों से उस पूरे ढांचे के दरकने की प्रक्रिया को और कैसे कोई ढांचा इन दरारों को पाटने में सक्षम होता है, उसे भी देखने की दृष्टि है। कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र जब कहता है कि ‘‘आधुनिक उद्योग का विकास पूंजीपति वर्ग के पैरों के नीचे से उस जमीन को ही खिसका देता है जिसके आधार पर वह उत्पादन करता है और पैदावार को हड़प लेता है। अत: पूंजीपति वर्ग अपनी कब्र खोदनेवालों को पैदा करता है।’’ किसी भी ढांचे या रूप के लक्षण एक ऐसी चीज है जो खुद अपने जन्मदाता को नष्ट करती है।

‘पण्य की जड़पूजा’, मालांधता के इस बेहद दिलचस्प किंतु सबसे उत्तेजक पहलू पर स्लावोय जिजेक की उस चर्चा को हम यहां लाना चाहेंगे जिसमें वे इसकी तुलना फ्रायड के विश्लेषण की पद्धति से करते हैं। आम तौर पर यह माना जाता है कि फ्रायड लक्षणों का अध्येता था। उसने उन्मादग्रस्त आदमी के सोच, उसके सपनों के विश्लेषण से उसके रोग के लक्षणों की खोज की पद्धति विकसित की थी। लेकिन जिजेक अपने प्रसिद्ध लेख, ‘कैसे मार्क्स ने लाक्षणिकता का आविष्कार किया?’ (How did Marx invent the Symptom) में बताते हैं कि लक्षणों की खोज के जिस क्षेत्र को आम तौर पर फ्रायड का क्षेत्र माना जाता है, मार्क्स ने उसके पहले ही किसी भी सामाजिक परिघटना के लक्षणों के अध्ययन की पद्धति विकसित कर ली थी। मार्क्स और फ्रायड की पद्धति में समानता यह है कि दोनों ही किसी भी रूप के पीछे छिपे सार-तत्व के अंध सम्मोहन से बचते हैं : अपने विश्लेषण से वे जिस ‘रहस्य’ पर से पर्दा उठाते हैं वह किसी रूप (पण्यों के रूप, स्वप्नों के रूप) की आड़ में छिपा हुआ सार-तत्व नहीं है, बल्कि इसके विपरीत, खुद इस ‘रूप का रहस्य’ है।

मार्क्स इस बात का विश्लेषण करते हैं कि आखिर वह कौन सा रहस्य है जिसके जरिये श्रम पण्य में मूल्य का रूप ग्रहण कर लेता है ; आखिर क्या बात है कि श्रम अपने उत्पाद के पण्य रूप में ही अपना सामाजिक चरित्र ग्रहण करता है। ठीक उसी प्रकार जैसे फ्रायड इस बात का विश्लेषण करते है कि आखिर क्यों कोई किसी स्वप्न का अंतर्निहित विचार एक स्वप्न की तरह का रूप धारण करके अपने को प्रकट करता है। जबकि न श्रम का मूल्य से कोई सीधा संबंध होता है, न सपने का उसके कथित ‘अन्तर्निहित विचार’ से।

आम तौर पर फ्रायड के सिद्धांत का जिक्र करते समय हमेशा सपनों के पीछे एक कामुकता की बात कही जाती है, जैसे मार्क्स के पण्य के पीछे श्रम की बात। इसी हवाले से फ्रायड की आलोचना भी होती है क्योंकि खुद उसीके अनेक परीक्षणों से यह कामुकता वाली बात साबित नहीं, बल्कि खारिज होती रही है।

इसी सिलसिले में जिजेक कहते हैं कि इस बात के लिये फ्रायड की आलोचना उनके बारे में एक बुनियादी सैद्धांतिक भूल पर टिकी हुई है। इसमें सपने के ‘अंतर्निहित विचार’ (latent thought) को सपने के पीछे काम कर रही अवचेतन की कामना मान कर, उसे सपने की पहचान मान लिया जाता है। जबकि फ्रायड हमेशा इस बात पर बल देते हैं कि इस अंतर्निहित विचार में ‘अवचेतन जैसा कुछ नहीं है’, यह पूरी तरह से एक ‘सामान्य’ विचार है, जिसे आसानी से रोजमर्रे की भाषा में व्यक्त किया जा सकता है, जो आदमी की चेतन/चेतन-पूर्व स्थिति है; आदमी उससे बखूबी परिचित होता है, बल्कि कहीं ज्यादा ही परिचित होता है क्योंकि वह उसे हमेशा पीडि़त किये रहती है। लेकिन खास बात यह है कि एक विशेष परिस्थिति, जैसे निद्रावस्था में, वह सामान्य विचार पृष्ठभूमि में, चेतना से बाहर फेंक दिया जाता है, अवचेतन में आ जाता है, अर्थात सपनों के निर्माण की निश्चित ‘प्राथमिक प्रक्रिया’ में पड़ कर ‘अवचेतन की भाषा’ में रूपांतरित होजाता है। इसलिए, सपना किसी ‘अन्तर्निहित सोच’ से नहीं, बल्कि सामान्य चेतना के विस्थापन, संक्षेपण, शब्दों या ध्वनियों के सार-तत्वों के आकृतियों में निरूपण की तरह की प्रक्रिया से निर्मित रूप होता है। यदि हम ‘सपने के रहस्य’ को उसके प्रकट रूप के अन्तर्निहित सार से खोलना चाहेंगे तो हमें सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। और जो भी हाथ लगेगा वह बहुत ‘सामान्य’ सी बात होगी, अधिकांशत: ‘गैर-कामुक’ ; अवचेतन की तरह की बात तो कत्तई नहीं।

फ्रायड अपनी ‘स्वप्नों की व्याख्या’ (Interpretation of Dreams) में यह भी बताते हैं कि सपने की परिस्थिति में सामान्य विचार दब जाता है, अवचेतन की ओर भी नहीं जाता क्योंकि चेतन से अवचेतन का तार बीच में ही कहीं कट जाता है, और अवचेतन में पड़ी कोई दूसरी ही कामना उभर आती है, जिसका सपने के अंतर्निहित विचार से कोई संपर्क नहीं होता। विचारों की सामान्य श्रृंखला एक असामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से, सपने की बुनावट की प्राथमिक प्रक्रिया से गुजरती है, और उसपर अवचेतन की कोई बचपन से दबी हुई कामना छा जाती है। इस अवचेतन की ‘कामुक कामना’ को कभी भी ‘विचारों की स्वाभाविक श्रृंखला’ में नहीं बदला जा सकता, क्योंकि वह बिल्कुल शुरू से ही नैसर्गिक तौर पर दमित है, उसका कोई मूल नहीं है, वह सपनों की बुनावट की ‘प्राथमिक प्रक्रिया’ के तंत्र में मौजूद है। सपने का विषय (अवचेतन की कामना) सिर्फ अपने को सपने के स्वरूप में ही व्यक्त करता है। और इस स्वरूप में यह अवचेतन तत्व इतनी तेज गति से प्रकट होता है कि चेतना में उसका रूप गड्ड-मड्ड, एक न सुलझाई जा सके, ऐसी पहेली बन जाता है।

इसी के आधार पर फ्रायड कहते हैं कि सबसे पहले तो हमें सपनों को अर्थहीन ऐसी परिघटना के रूप में देखना होगा जो कोई दमित संदेश प्रेषित कर रही है। सपने के रूप की व्याख्या के जरिये हमें उस संकेत को पकड़ना होगा। और दूसरा, हमें सपने के पीछे के ‘छिपे हुए अर्थ’, अर्थात सपने के स्वरूप के पीछे छिपे हुए सार-तत्व के प्रति मोह से मुक्त होना होगा और खुद उस रूप पर ध्यान देना होगा, ‘स्वप्न-स्वरूप’ में जिसे ‘अन्तर्निहित स्वप्न-विचार’ ने धारण किया है।

मार्क्स की पण्य और पण्य की जड़पूजा, मालांधता की दीर्घ चर्चा, पण्य के मूल्य के निर्धारण में गहरे तक बैठी सांयोगिकता अर्थात अतार्किकता की लंबी चर्चा के बाद, सपनों के रूप के बारे में फ्रायड के विचारों पर की गई इस चर्चा पर यदि हम गंभीरता से गौर करें तो इन दोनों में एक अनोखा साम्य दिखाई देगा।

मार्क्स ने भी फ्रायड की तरह ही सबसे पहले पण्य के रहस्यमय रूप को तोड़ते हुए देखा कि उसका मूल्य बिल्कुल मनमाने ढंग से, कामचलाऊ आधार पर, सांयोगिक और सापेक्ष होता है। उसका कोई तार्किक पैमाना नहीं होता। वे पण्यों के मूल्य के रहस्य को भेदते हैं। लेकिन देखते हैं कि इस संयोग के तत्व को जान लेने भर से उस पद्धति को नहीं बदला जा सकता है जिसके जरिये श्रम-समय के मूल्य का निर्धारण किया जाता है। अर्थात, ‘‘मूल्य के परिमाण का श्रम-काल द्वारा निर्धारित होना एक ऐसा रहस्य है जो पण्यों के सापेक्ष मूल्यों के प्रकट उतार-चढ़ाव के नीचे छिपा रहता है। इससे यह तो पता लग जाता है कि श्रम से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं के मूल्यों के परिमाण केवल सांयोगिक ढंग से निर्धारित होते हैं, लेकिन इससे इस निर्धारित होने के ढंग में कोई तब्दीली नहीं आती।’’

मार्क्स कहते हैं कि इस रहस्य को भेदना ही यथेष्ट नहीं है। इसके बाद भी बहुत कुछ बचा रह जाता है। पूंजीवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र पण्य-रूप के रहस्य को तो भेद लेता है, लेकिन उसकी सीमा यह है कि वह अपने को पण्य-रूप के रहस्य के सम्मोहन से मुक्त नहीं कर पाता है। उसका ध्यान संपत्ति के स्रोत, श्रम पर अटका रह जाता है। वह पण्य-रूप के पीछे छिपे सार-तत्व को जानने में तो दिलचस्पी रखता है लेकिन स्वयं इस रूप के अपने रहस्य की व्याख्या नहीं कर पाता। यह वैसी ही एक पहेली बना रहता है, जैसे कोई सपना बना रहता है। सपने के अन्तर्निहित विचार को जान लेने पर भी हमारे लिये सपना एक सपना ही रहता है, मस्तिष्क में उभरने वाले अक्शों का एक ऐसा असंलग्न, अतार्किक रूप जिसकी कोई व्याख्या नहीं है। असल प्रश्न यही है कि क्यों कोई विचार अपने लिए इसप्रकार के रूप का आवरण ग्रहण करता है?

मार्क्स पूछते हैं कि ‘‘जैसेे ही कोई श्रम पण्य का रूप धारण करता है, क्या तभी श्रम का फल एक रहस्यमय रूप धारण नहीं कर लेता ? क्लासिकल राजनीतिक अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह रूप के उद्भव की इस प्रक्रिया पर ध्यान नहीं दे पाता है। ...उसने एक बार भी यह सवाल नहीं किया कि इस कथ्य ने यह खास रूप क्यों ग्रहण किया, अर्थात क्यों श्रम मूल्य से अभिव्यक्त होता है और क्यों श्रम का उसके समय के जरिये माप उत्पाद के मूल्य के परिमाण में व्यक्त होता है ?’’

स्लावोय जिजेक कहते हैं कि वैसे तो पण्य-रूप का मार्क्सवादी विश्लेषण एक आर्थिक विषय है, लेकिन इसने समाजवैज्ञानिकों, दार्शनिकों, कला इतिहासकारों की पीढि़यों पर गहरा प्रभाव डाला है। इसकी वजह यह है कि यह हमें एक ऐसा यंत्र प्रदान करता है जो ‘जड़पूजा’ या ‘अंधता’ में उलट-पुलट दिखाई देने वाले यथार्थ के सभी रूपों को साक्षात करने में हमें समर्थ बनाता है। यह कुछ ऐसा है जैसे पण्य-रूप की द्वंद्वात्मकता परिशुद्ध रूप में हमारे सामने उस प्रक्रिया का एक संस्करण पेश कर दें जिससे उन सभी परिघटनाओं के बारे में सैद्धांतिक समझ कायम करने की कुंजी मिल जाएं जिनका पहली नजर में राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र से सीधा कोई संबंध नहीं है, जैसे कानून, धर्म आदि। जाहिर है साहित्य भी एक ऐसा ही क्षेत्र है। इसप्रकार, जिजेक के शब्दों में ‘‘पण्य-रूप में खुद पण्य-रूप से कहीं ज्यादा तात्पर्य निहित है और यह ‘ज्यादा’ ही उसमें एक सम्मोहक आकर्षण पैदा करता है।’’

विनोद जी अपनी टिप्पणी में फ्रैंकफर्ट स्कूल के विद्वानों का जिक्र करते हैं। जिजेक ने भी इसी बिंदु पर फ्रैंकफर्ट स्कूल के फेलो ट्रैवलर्स जोन रैथल को उद्धृत किया है :
‘‘पण्य का बाकायदा विश्लेषण सिर्फ राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना की कुंजी नहीं है, बल्कि यह अमूर्त अवधारणामूलक चिंतन की पद्धति और उसके साथ ही पैदा हुए बौद्धिक और कायिक श्रम के बीच विभाजन की भी ऐतिहासिक व्याख्या प्रदान करता है।’’

जिजेक कहते है : उनके अनुसार, ‘‘दूसरे शब्दों में, पण्य-रूप के ढांचे में अनुभवातीत विषय का संधान संभव है। पण्य-रूप कांट के अनुभवातीत विषय की शरीर-रचना, उसके पंजर को पहले ही प्रस्तुत कर देता है - अर्थात अनुभवातीत श्रेणियों के उस संजाल को जिससे ‘वस्तुनिष्ठ’ वैज्ञानिक ज्ञान का एक पूर्व-ढांचा तैयार होता है। पण्य-रूप की यह विडंबना है कि यह अंतर-जगत की व्याधिमूलक परिघटना (pathological phenomenon) हमें ज्ञान के सिद्धांत के मूलभूत सवाल के समाधान की कुंजी देती है : वह वस्तुनिष्ठ ज्ञान जो सर्वकालिक महत्व का है।’’ जिजेक पूछते है - ‘यह कैसे संभव है ?’

रैथल के दर्शनशास्त्रीय चिंतन के इसी गड़बड़झाले की छानबीन करते हुए द्रव्य आदि की व्याख्या के बाद अंत में जिजेक मार्क्स के हवालों से ही दिखाते हैं कि जीवन के तमाम व्यापारों में मनुष्य एक व्यवहारिक अहंवादी (practical solipist), जीवन को मिथ्या समझने वाले व्यक्ति की ही भूमिका अदा करता है। वह तमाम विनिमयों में तर्क को दरकिनार करके चलता है। आदमी अपने लक्षणों को तभी भोग सकता है जब वह उसके तर्क को नहीं समझता।

इसीप्रकार आस्था का प्रश्न भी हमारी प्रभावी सामाजिक गतिविधियों में मूर्त होता है। मार्क्स की पूंजी में मुहावरे की तरह कहन के इस ढंग का बार-बार प्रयोग होता है कि ‘वह नहीं जानता, वह क्या कर रहा है’। कहना न होगा, पण्य की जड़पूजा अमूर्तताओं के जगत में व्याप्त अतार्किकता का पार्थिव आधार है। वह किसी ‘ईश्वरीय उपनिषद’ की देन नहीं है, मूलत: इसी व्यवहार जगत की उपज है।

इन सामाजिक और साहित्यिक-सांस्कृतिक लक्षणों के बल पर ही हम यह देख पाते हैं कि कैसे और किन परिस्थितियों में कोई अदना सा लेखक साहित्य जगत के ‘महापौर’ का रूप धारण कर लेता है। कैसे ‘साहित्य की स्वायत्तता’ की खुशफहमी साहित्य क्षेत्र की व्याधिमूलक परिघटना, उसके लक्षणों की उपज है। यही है, सारे तर्कों को दरकिनार कर साहित्य क्षेत्र में विनिमय के उपभोग का एक व्यवहारिक अहंवादी (practical solipist) तरीका।

यह तो है महापौर की प्रतिमा में जड़ीभूत परम तत्व की सूक्ष्म सिद्धांत चर्चा । यह इसलिये क्योंकि इस प्रतिमा के स्थूल रूप, इसके अंग-प्रत्यंग के ठोस वर्णन में अश्लीलता के ख़तरे तमाम हैं । फिर भी विनोद शाही जी को इस महापौर की निर्मिति में किये गये व्यय की ही अगर थाह पानी हो तो सिर्फ 'जगह' (सं. पीयूष दईया) और 'संसार का गुणगान' (सं.राजेंद्र मिश्र) शीर्षक अशोक वाजपेयी पर दो प्रशस्ति ग्रंथों को थोड़ी सी सजगता से देख लें  । दरबार के तमाम नवरत्नों और मनसबदारों को बादशाह की इबादत में सिर झुकाये एक क़तार में यहाँ जिस प्रकार खड़ा किया गया है, वह अरबों रुपये के सरकारी व्यय से 'लिफ़्ट पकड़ने के लिये हांफती साँसों' के कवि-कायांतर की पूरी कहानी के सूत्र थमा देते हैं । पहले पियूष दईया के ज़रिये अपनी मूर्ति की स्थापना की और दरबारियों को उनके सही स्थानों पर हमेशा के लिए साट देने की 'जगह ' बनाई और फिर कुछ नये- कुछ पुराने प्रशस्ति-पत्रों के ज़रिये आरती से मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा कर सबके लिये गणेश परिक्रमा से 'संसार (यानी अशोक वाजपेयी) का गुणगान' के कीर्तन का स्थायी प्रबंध किया गया ! दशकों तक भारत सरकार और एक राज्य सरकार के संस्कृति और शिक्षा मंत्रालयों में बेख़ौफ़ चले conflict of interests वाले पहाड़ समान भ्रष्टाचार की निर्मितियों की इस कहानी की विडंबना यह है कि इनको खोदने पर अंत में हासिल एक चूहा ही होता है । यही है - 'स्वघोषित महापौर कि विडंबना' ! और, प्रशस्तिकारों में 'व्यवहार के विभ्रम' की विडंबना ! - जिस पर ऊपर काफ़ी चर्चा हुई है । इस संदर्भ को और भी जानना हो तो रमेश चंद्र शाह के नाम मलयज के पत्रों के संकलन ' रंग अभी गीले हैं ' के लगभग हर पृष्ठ में आए अशोक जी के उल्लेखों को देख लीजिए । 'धुरी- विहीन' बौद्धिक ।  ''शासन को ऐसे लोग ही चाहिए । जैसे संतों में विनोबा, मास्टरों में नामवर सिंह, वैसे ही दफ्तरशाहों में अशोक वाजपेयी '' । जब केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला तो अशोक जी बुदबुदाये थे - अरे! यह चंद घोड़ों का मनसबदार चक्रवर्ती सम्राट बन गया ! 'इतना बड़ा तो यह न था !' 

कम्युनिस्ट घोषणापत्र में एक बड़ा अध्याय है ‘प्रतिक्रियावादी समाजवाद’ पर। इसमें ‘काल्पनिक समाजवादियों’ की सबसे बड़ी कमजोरी यही बताया गया है कि वे किसी न किसी रूप में यह विश्वास करते हैं कि एक ऐसा समाज बनाना संभव है जिसमें विनिमय के संबंध होंगे, बाजार के लिए उत्पादन होगा लेकिन उत्पादन के साधनों का मालिक और कोई नहीं खुद मजदूर होगा ‘ताकि उनका शोषण न होने पायें’। अर्थात वे एक ऐसी सर्वकालिक (universal) व्यवस्था का बनना संभव समझते हैं जिसमें कहीं किसी दरार के लक्षण नहीं होंगे, जो उस ढांचे को बिखेरने की भूमिका अदा करते हो।

मार्क्सवादी विश्लेषण पद्धति हमें सामाजिक लक्षणों की तरह ही सभी अधिरचना से जुड़े क्षेत्रों के लक्षणों की जांच के भी औजार प्रदान करती है, जैसा कि हमने मालांधता के मामले में देखा ; जैसा फ्रायड सपनों के रूप से मनोरोगों के लक्षणों की सिनाख्त की एक पद्धति तैयार करते हैं। हमारे अनुसार, साहित्य की मार्क्सवादी आलोचना की यही भूमिका हो सकती है, कथित साहित्य-संसार के स्वरूप के लक्षणों की पहचान कराना। वर्ना सारी भाव-भंगिमाओं के बावजूद आलोचना की दशा उन्हीं सामंती समाजवादियों की तरह की होगी जिनका ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ में खींचा गया यह चित्र बेहद संकेतपूर्ण है :

‘‘फ्रांस और इंगलैंड के अभिजातों की ऐतिहासिक स्थिति ऐसी थी कि आधुनिक पूंजीवादी समाज के खिलाफ पैंफ्लेट लिखना उनका पेशा बन गया। ...सामंती समाजवाद की उत्पत्ति इसी तरह हुई : कुछ रोना-धोना, कुछ व्यंग्यात्मक तीर चलाना, कुछ अतीत को प्रतिध्वनित करना, कुछ भविष्य का भय दिखाना ; कभी-कभी अपनी कटु व्यंग्यपूर्ण और पैनी आलोचना द्वारा पूंजीपतियों के मर्म-स्थल को चोट पहुंचाना ; किंतु आधुनिक इतिहास की प्रगति को हृदयंगम करने में अपनी संपूर्ण असमर्थता के कारण अपने प्रभाव में सदा हास्यास्पद रह जाना।
‘‘जनता को अपनी तरफ करने के लिए इन अमीर-उमरा ने सर्वहारा वर्ग की भीख की झोली को अपना झंडा बनाया। लेकिन जब-जब जनता उनके साथ हुई, उसने देखा कि उनके कूल्हों पर अभिजातों के वंश चिन्हों के ठप्पे लगे हुए हैं, और वह हंसी के जोरदार ठहाकों से उनका अपमान करती हुई उन्हें छोड़ कर चल दी।’’


इस लेख के प्रारंभ में हमने मार्क्स-एंगेल्स के जो चंद उद्धरण दिये थे, इस लंबी चर्चा के बीच से उनके मर्म की बातें, ‘चिंतन के दायरे’, ‘नकाब’ और ‘मिथ्या चेतना’ की बातें, जरूर साफ होगई होगी। और जहां तक बिनोद शाही जी की ‘ईश्वर के प्रतीकार्थों’ वाली बात है, उसका बहुत कुछ तो इस बुनियादी ‘जड़पूजा’ चर्चा से स्पष्ट हो जाना चाहिए। इसके अलावा, इसी लेखक ने धर्म के बारे में मार्क्स के विचारों पर एक लंबा लेख लिखा है जो हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘धर्म, संस्कृति और राजनीति’ में संकलित है, उस पर भी एक नजर डाली जा सकती है।

इतने सबके बाद भी यदि ‘स्वायत्तता’ का घटाटोप अपनी जगह कायम रहता है तो हम अपनी बात का अंत छांदोग्य उपनिषद की इंद्र और विरेचन की उस कहानी से करेंगे जिसके शुरू में प्रजापति कहते हैं,

‘‘आत्मा जो पापरहित है, अजर अमर है, दुख, बुभुक्षा, तृष्णारहित है, जिसका लक्ष्य और आदर्श परम सत्य है, उसीकी खोज की जानी चाहिए। उसी का बोध प्राप्त करने की इच्छा होनी चाहिए। जिसे आत्मा का बोध होगया, वह सभी लोकों और इच्छाओं को पागया।
देवों और असुरों दोनों ने इसे सुना फिर उन्होंने कहा : ‘आओ हम उस आत्मा को खोजे, जिसके बोध से मनुष्य सब लोकों और इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है।’
देवताओं में से इंद्र और असुरों में से विरेचन प्रजापति के पास गए। दोनों ने इस पवित्र ज्ञान को प्राप्त करने के लिए बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया।
तब प्रजापति ने दोनों से पूछा, ‘आप लोग कौन सी इच्छा को लेकर जी रहे हैं। दोनों ने बताया वे किस प्रकार की आत्मा की प्राप्ति की इच्छा के लिए जी रहे हैं।
तब प्रजापति ने इन दोनों को कहा : वह जो आंखों में दृष्टिगोचर है, वही आत्मा है जिसके संबंध में मैंने कहा है। वही अमर और भयरहित है। वही ब्रह्म है।
‘किंतु भगवन! जिसे हम जल और दर्पण में देखते हैं वह कौन है?
‘वस्तुत: वही इन सबमें दृष्टिगोचर है’, प्रजापति ने कहा। ‘जल के पात्र में देखो। आत्मा के बारे में तुम जो कुछ नहीं समझ पाते मुझे बताओ।’
तब दोनों ने जल के पात्र में देखा।
फिर प्रजापति ने उनसे कहा :‘तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?’
तब दोनों ने कहा : प्रभु हमें इसमें सब कुछ दिखाई दे रहा है। एक ऐसी आत्मा जो ठीक हम जैसी है। यहां तक कि बाल और नाखून भी हमारे जैसे ही है’।
तब प्रजापति ने उन दोनों से कहा : ‘तुम लोग स्वयं को आभूषणों एवं सुंदर वस्त्रों से अलंकृत करो और फिर जल के पात्र में देखो।’
तब दोनों ने अपने आप को सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित किया और जल के पात्र में देखा।
तब प्रजापति ने उनसे पूछा : ‘ आप लोगों को क्या दिखाई दे रहा है?’
दोनों ने उत्तर दिया : ‘ठीक वैसा ही जैसे कि हम हैं प्रभु, आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित।’
‘वही आत्मा है’, प्रजापति ने कहा। अमर और भयरहित है, वही ब्रह्म है।’
तब शांत हृदय के साथ उन दोनों ने प्रस्थान किया।
प्रजापति ने उन्हें जाते हुए देखा और कहा : ‘वे दोनों बिना कुछ समझे और आत्मा को जाने लौट रहे हैं। जिस किसी के पास भी वह उपनिषद होगा चाहे वे देव हो या असुर, उनका विनाश हो जायेगा।
तब विरोचन शांत हृदय के साथ असुरों के पास आया। उसने उन्हें इस उपनिषद के बारे में बताया : ‘स्वआत्मा को इसी पृथ्वी पर सुखी बनाना है। इसी की सेवा करनी है। जो अपनी आत्मा को इस पृथ्वी पर सुखी बनाता है जो उसकी सेवा करता है उसे दोनों लोक प्राप्त होते हैं।’
इसीलिए आज भी इस पृथ्वी पर उसके संबंधी उस व्यक्ति को अश्रद्धावान कहते हैं जो दाता नहीं है, जिसकी आस्था नहीं है जो यज्ञ नहीं करता, यही असुरों का उपनिषद है। वे मृतक के शरीर को भिक्षा में प्राप्त वस्त्रों तथा आभूषणों से सजाते हैं और इस बात को मानते हैं कि इससे वे दूसरा लोक भी जीत लेंगे।’’ ( देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, लोकायत, मैकमिलन, हिंदी संस्करण, पृष्ठ: 35-37)

अंत में, चारों वेदों के चार महामंत्र, ब्रह्मवाक्यों, तत्वमसी के घटाटोप को नमस्कार !

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है।





श्रीमान स्वपन दासगुप्त ! उदार हलके विचारों की लड़ाई लड़ते हैं और फासीवादी विचारवानों का सफाया करते हैं ! इन दो बातों के फर्क को क्या आप जानते हैं ?


(आज के ‘टेलिग्राफ’ में स्वपन दासगुप्त के लेख पर एक प्रतिक्रिया)
-अरुण माहेश्वरी

कहते हैं न कि जब हम किसी चीज को बिना जाने उसकी कमियों का बखान करने लगते हैं, तब हम किसी न किसी रूप में अपनी ही कमी का, अपने नजरिये की विकृतियों का बखान कर रहे होते हैं।

इसका एक क्लासिक उदाहरण है स्वपन दासगुप्त का यह लेख -‘‘ The Liberal world and its predetermined conclusions : Enemies of Liberty “(उदार दुनिया और उसके पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष : स्वतंत्रता के शत्रु)।
उनके लेख का निशाना साफ है - आज के भारत में असष्णिुता की परिस्थिति पर चल रही बहस। वे इसके लिये लंदन के कथित उदार जगत की एक कहानी गढ़ते हैं। बताते हैं कि फिलिस्तीनियों के ‘संघर्ष’ के इन पक्के समर्थकों ने गांधी और मंडेला की प्रशंसा की। लेकिन उगांडा के इदी अमीन और जिंबाब्वे के रोबर्ट मुगाबे को इन्होंने कभी नहीं स्वीकारा। उनके अनुसार, आज ऐसे ही घृणा के पात्रों की सूची में वे रूस के राष्ट्रपति पुतिन, सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद को रखे हुए हैं। इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू और उनकी लिकुड पार्टी को भी यह हलका कभी नहीं स्वीकारता।

अपने इस लेख में उदारों की ‘घृणा के पात्रों’ की सूची में उन्होंने एक और नाम जोड़ा है - टर्की में हाल के चुनाव में विजयी राष्ट्रपति रिजेप ताय्येप एर्डोवान का नाम। वे लिखते हैं कि पिछले जून महीने के चुनाव में वहां किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, उसकी तुलना में अब एर्डोवान की न्याय और विकास पार्टी (एकेपी) को साफ बहुमत मिलने से जाहिर हुआ कि टर्की के लोगों ने स्थिरता और देश को एक निश्चित दिशा में ले जाने के पक्ष में मत दिया है।

इसके साथ ही, दासगुप्ता ने अपने छिछले इतिहास ज्ञान को उजागर करते हुए एर्डोवान की इस जीत की तुलना 1980 में इंदिरा गांधी की जीत और 2014 में मोदी की जीत से की है। जाहिर है कि सन् ‘77 के जनता पार्टी के प्रयोग की विफलता से उत्पन्न अस्थिर राजनीतिक स्थिति और 2014 के वक्त लगातार दस सालों से चल रही एक स्थिर कांग्रेस सरकार की स्थिति में समानता सिर्फ वही व्यक्ति देख सकता है, जिसके पास ऐतिहासिक तुलनात्मकता का न्यूनतम बोध भी न हो !

बहरहाल, दासगुप्ता के लेख का मकसद यह नहीं, बल्कि उदार हलकों की संकीर्णता जाहिर करना है। उनका क्षोभ इस बात पर है कि एर्डोवान जीत गये, पर लंदन के उदारवादी हलके इस जीत को पचा नहीं पा रहे हैं। चैनल फोर का संवाददाता कहता है - ‘‘चुनाव स्वतंत्र हुआ लेकिन क्या सही हुआ ?’’ (Election was free but was it fair?) । ‘एर्डोवान विभाजनकारी है, टर्की में एकाधिकारवाद कायम कर सकता है।’ चुनाव के दौरान एकेपी के कुछ नेताओ ने वहां के उदारवादियों को धमकाया था - ‘देख लेंगे।’ दासगुप्त कहते हैं कि भारत में यह एक साधारण बात है, अमित शाह का ‘जुमला’, लेकिन हर देश के अपने-अपने मानदंड होते है!

इसी प्रसंग में वे कहते हैं कि टर्की में क्या हो रहा है, इसे लंदन में ‘गार्जियन’ का पाठक नहीं, भारत का आदमी ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है। ‘बीबीसी के एक संवाददाता ने इस चुनाव से असंतुष्ट टर्की के एक मनोचिकित्सक से पूछा कि तब क्या आप ‘देश छोड़ देंगी’ तो उसका जवाब था - ‘क्यों, यह हमारा देश है’।’
इसप्रकार, उदार हलकों में घृणा के पात्र समझे जाने वाले इदी अमीन, मुगाबे, नेत्यानाहू , पुतिन, बशर-अल-असद के बाद एर्डोवान जैसे ‘मासूम’, उदार हलकों के पूर्वाग्रहों के ‘शिकार’ चरित्रों की दासगुप्ता की इस कहानी का एक संकेत यह भी है कि जो लोग इनसे नफरत करते हैं, वे उनके देश के नहीं, ‘लंदन के उदार हलको’ की तरह बाहर के, अर्थात विदेशी है। जैसे आज शाहरुख खान पाकिस्तानी है !

बहरहाल, हम ‘नफरत के पात्रों’ के पक्ष में दासगुप्ता की इस दलील में शुरू से उनके मुवक्किल के रूप में हिटलर को भी तलाश कर रहे थे। लेकिन इस कहानी में हिटलर का प्रवेश सीधे नहीं हुआ है, कहानी के अंत में, घुमा कर हुआ है। लेख के अंत में वे आगामी 13 नवंबर को लंदन के वैंबले स्टैडियम में मोदी की सभा का उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि उदार तबकें इसकी तुलना न्यूरेमबर्ग में हिटलर की सभा से करेंगे।

इतिहास में घृणा के पात्रों के प्रति प्रीति जगाने के उनके इस उपक्रम की अंतिम पंक्ति है - ‘उदार हलके में सिर्फ एक मत, उनके अपने मत के लिए जगह है’।( In the liberal world, there is space for only one view - their own) ।

हम उनसे यही कहेंगे कि हिटलरों के जगत में मत-विरोध तो छोडि़यें, विरोध करने वाले के अस्तित्व मात्र के लिए भी कोई जगह नहीं होती है। विरोध से निपटने का उनका तरीका यहूदियों से निपटने के हिटलर के तरीकों से पैदा होता है। भारत में इसे ही डाभोलकर, पानसारे और कलबुर्गी पर आजमाया गया है। अखलाक को कुचल कर तमाम अल्पसंख्यकों को इसका संदेश पहुंचाया गया है। दलितों की हत्याओं से भी वही संदेश दिया जाता है।
स्वपन दासगुप्ता का यह लेख उनके उकसावेबाज चरित्र का ही एक प्रमाण है जिसके लिए एनजेएसी के बारे में टाइम्स नाउ की बहस के दौरान संविधानविद राजीव धवन ने उनकी खिलखिलाहट का तिरस्कार करते हुए कहा था - दासगुप्ता! बात कह कर हंसिये मत !