शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

क्यों दुनिया की बड़ी-बड़ी डिजिटलाइजेशन से जुड़ी कंपनियों के लिये भारत का गिनिपिग की तरह इस्तेमाल किया गया?

नये साल की पूर्व बेला में प्रधानमंत्री से हमारा सवाल
-अरुण माहेश्वरी



आज सारी दुनिया के अर्थशास्त्री, सभी देशों की सरकारें खुर्दबीन के साथ भारत में नोटबंदी के इस ‘भूतो न भविष्यति’ वाले  कदम के अंतिम परिणामों की जांच कर रहे हैं। मोदी जी ने भले ही ताली बजा कर यह ऐलान कर दिया हो कि वे तो चुहिया की तलाश में निकले थे और किसानों का दाना खाने वाली ‘चुहिया’ उन्हें मिल गई ; वे बेहद खुश है।

मोदी जी के लिये हर चीज का मानदंड उनकी निजी खुशी-नाखुशी हो सकती है, लेकिन दुनिया को उनके ऐसे सुख-दुख से कोई मतलब नहीं है ! वे तो सबके सब मोदी जी की इस महान कृपा के लिये उनके प्रति अंतर से आभारी है कि उन्होंने बिना मांगे ही भारत की तरह के एक विशाल और अभी तेज गति से विकसित हो रहे राष्ट्र को नये डिजिटल युग के अर्थशास्त्रीय-समाजशास्त्रीय अध्ययन का एक गिनिपिग (परीक्षण की चीज) बना दिया।

आज के समय को दुनिया में ‘नया डिजिटल युग’ कहा जा रहा हैं। गूगल कंपनी के कार्यकारी अध्यक्ष एरिक स्मिथ और उसके निदेशक जेर्ड कोहेन की प्रसिद्ध किताब है - The New Digital Age। 2013 में प्रकाशित इस किताब में आज के समाज और इसके भावी रूप के अवलोकन और भविष्यवाणी पर बहुत चर्चा होती है। इसका पहला वाक्य ही इस कथन से शुरू होता है कि ‘‘मनुष्यों द्वारा निर्मित विरल चीजों में एक इंटरनेट एक ऐसी चीज है जिसे खुद मनुष्य सचमुच नहीं समझता है।’’ (The Internet is among the few things humans have built that they don’t truly understand.)

और, आगे पूरी 260 पन्नों की यह किताब ‘इतिहास में सब-कुछ तहस-नहस कर देने वाले इस सबसे बड़े प्रयोग, इंटरनेट’ के परिणामों के नाना रूपों का आख्यान है। लेकिन इस प्रसिद्ध किताब की सारी कथाएं विकसित देशों में इंटरनेट और डिजिटलाइजेशन के क्रमिक प्रसार से जुड़ी कथाएं है। दुनिया में किसी के पास भी इस बात के कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है कि एक विकासमान गरीब देश में किसी सरकार द्वारा आम लोगों पर डिजिटलाइजेशन को जबर्दस्ती लादने के क्या परिणाम हो सकते हैं ।

हमारे प्रधानमंत्री ने मुफ्त में ही दुनिया के ऐसे सभी अध्येताओं, संगठनों और सरकारों को वे सारे प्रत्यक्ष आंकड़े मुहैय्या कराने का काम कर दिया है जिनसे अब वे अपने समाजों में डिजिटलाइजेशन के बारे में अधिक ठोस रूप में विचार करके विवेक-संगत नियम और नीतियां अपना सकेंगे। और, साथ ही साम्राज्यवादी देशों को तो दुनिया पर अपना वर्चस्व कायम करने में इस नई तकनीक के सटीक प्रयोग की रणनीति तैयार करने के लिये बहुत जरूरी तथ्य आसानी से मिल जायेंगे !

आज बहुत याद आ रही है कार्ल मार्क्स के उन लेखों की जो उन्होंने ‘उपनिवेशों के बारे में’ लिखे थे। इसमें 1953 का एक लेख है - चीन और यूरोप की क्रांति। चीन में अंग्रेजों की तोप के बल पर भारी मात्रा में किये गये अफीम के निर्यात से उत्पन्न परिस्थिति के बारे में मार्क्स लिखते हैं, ‘‘यह दावा विचित्र और विरोधाभासों से भरा लग सकता है कि यूरोप के लोगों का अगला विद्रोह और राज्य-व्यवस्था में जनतांत्रिक स्वतंत्रता ओर आर्थिक दृष्टि से शासन की बेहतर व्यवस्था के लिये चल रही लड़ाइयों का अगला दौर बहुत कुछ उन घटनाओं पर निर्भर करेगा जो आजकल यूरोप से बिल्कुल भिन्न - ‘दैवी-साम्राज्य’ (चीन-अ.मा.) - में घट रही है।"

इस लेख में मार्क्स ने चीन के खिलाफ अफीम युद्ध से चीन के व्यापार संतुलन के बुरी तरह से बिगड़ जाने और 1840 के बाद इंगलैंड को दिये जाने वाले राज्य कर , स्वदेशी उद्योगों के विनाश तथा भ्रष्ट नौकरशाही की बदौलत जनता में पैदा हो रही बगावतों तथा जनता को और विपत्ति से बचाने के लिये करों की उगाही को रोक देने की वहां के सम्राट की आज्ञप्ति का पूरा लेखा-जोखा पेश किया है। इसी सिलसिले में वे लिखते हैं कि ‘‘अब जब इंग्लैंड चीन में बगावतों का कारण बना है, सवाल उठता है कि वक्त आने पर इस प्रकार की बगावत का इंग्लैंड पर और इंग्लैंड के जरिये पूरे यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? इस सवाल का हल मुश्किल नहीं है। ’’

कहने का तात्पर्य यही है कि डिजिटलाइजेशन का आरोपण करने की कोशिश से किसी भी समाज में कैसी अफरा-तफरी मच सकती है और वह अंत में वह किस प्रकार की आर्थिक तबाही की ओर बढ़ सकता है, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के लोगों की बली चढ़ा कर सारी दुनिया को इन बातों को जान-समझ लेने का मौका दिया है। भारत को इस प्रकार गिनिपिग बनाने के इस अपराध की निंदा के लिये हमारे पास तो कोई शब्द नहीं है। नये डिजिटल युग के पश्चिम के सभी पुरोधा उनकी इस सेवा के लिये उन्हें हमेशा याद रखेंगे !

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

नरेन्द्र मोदी जनतंत्र में शासन के लिये उपयुक्त व्यक्ति नजर नहीं आते

-अरुण माहेश्वरी


नोटबंदी को लेकर भारत सरकार के प्रशासन की जो भद हुई है, उसे बिल्कुल सही मनमोहन सिंह ने एक भारी प्रबंधकीय विफलता कहा था। इसने नरेन्द्र मोदी की प्रशासनिक क्षमता पर फिर एक बार गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये हैं। हम कूटनीति के क्षेत्र में, सीमा पर पाकिस्तान की करतूतों से निपटने के सामरिक रणनीति के क्षेत्र में इनकी विफलताओं को पहले ही देख चुके हैं। सारी दुनिया जान गई है कि यह वह गरजने वाला बादल है, जो बरसा नहीं करता, क्योंकि इसे अपनी ही वास्तविकता का ज्ञान नहीं है।

लेकिन सबसे बुनियादी सवाल तो यही है कि क्या शासन के किसी भी सिद्धांत में गर्जना का कभी कोई वास्तविक स्थान होता है ? राजसत्ता के चरित्र के अध्येताओं ने हमेशा उसे एक ऐसे सामाजिक उपकरण के रूप में ही देखा है, जो अदृश्य शक्ति के रूप में सर्वत्र मौजूद रहने पर भी, बिल्कुल प्रकट और चाक्षुस रूप में कम से कम दिखाई देती है। बहुत कम मामलों में ही उसका कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप प्रकट होता है। पर्दे के पीछे से एक अदृश्य शक्ति के रूप में यह सदा-सर्वदा अपना काम करने के अहसास को बनाये रखती है।

राजसत्ता के अस्तित्व की यही स्वाभाविकता है। इसकी शक्ति का प्रदर्शन हमेशा इसप्रकार किया जाता है ताकि उसका कभी भी प्रयोग न करना पड़े। जब कहीं स्थिति के काबू के बाहर होने का अंदेशा होता है तो हम देखते है सेना का रूट मार्च कराया जाता है, ताकि लोगों में एक डर व्यापे और वे कानून को अपने हाथ में न लें। ताकत का ऐसे प्रदर्शन का मतलब ही है उसके प्रयोग न करने की स्थिति बनी रहे। और भी अच्छे प्रशासन की बड़ी पहचान राजसत्ता की ताकत को बिना प्रदर्शित किये काम निकालने की होती है। सिर्फ लोगों के मन में राजसत्ता के होने का अहसास भर जीवित रहे। यह एक प्रकार से बल के प्रदर्शन से भी इंकार का रास्ता है। राजसत्ता के प्रयोग से बचने के लिये सत्ता की ताकत के प्रदर्शन की कोशिश। और इससे भी एक कदम आगे, सत्ता की ताकत के प्रदर्शन से ही बचने की कोशिश। नकार का भी नकार।

लेकिन हमारे मोदी जी का स्वभाव तो ऐसे सभी नकारों से, अपने को अधिक से अधिक अदृश्य बनाने वाले नकारों के नकार वाला है। वे इवेंट मैनेजर है। जब तक किसी चीज का पूरे ढोल-धमाके के साथ प्रदर्शन न किया जाए तब तक तो उन्हें उस चीज के होने तक का विश्वास नहीं होता है। और ऐसे प्रदर्शन में भी वे खुद को हमेशा नाटक के केंद्र में हमेशा एक महानायक के रूप में पेश किये बिना संतुष्ट नहीं हो सकते हैं। वे पर्दे के पीछे से नहीं, मंच पर तेज प्रकाश के वृत्त में पूरे मेकअप में अपनी सारी झुर्रियों को छिपाते हुए चिर युवा दिखने पर यकीन रखते हैं। वे सर्जिकल स्ट्राइक करे या न करे, लेकिन उसका ढोल जरूर पीटेंगे और कुछ इस तरह कि लगे जैसे वह करिश्मा हमारी सेना ने नहीं, खुद प्रधानमंत्री ने अपने हाथ से किया है।

काले धन पर हाल की ‘नोटबंदी’ वाली सर्जिकल स्ट्राइक तो और भी अद्भुत है। 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के नोट को कागज का एक टुकड़ा घोषित करने के शौर्य प्रदर्शन से लेकर कैशलेस, लेस कैश की तरह की अजूबी बातों और अभी हाल में लॉटरी से कुछ लोगों को पंद्रह हजार रुपये दिलाने में ही नहीं, बल्कि आम लोगों को दूसरों का रुपया मार कर बैठ जाने की महान सीख देने के मामले में भी वे जिस प्रकार किसी विज्ञापन के मॉडल वाले उत्साह का परिचय देते रहे हैं, उसकी सचमुच किसी राष्ट्रप्रधान के व्यवहार में कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

2014 के लोकसभा चुनाव के वक़्त बाबा रामदेव और आरएसएस के कुछ लोगों ने देश से आयकर ख़त्म कर देने का एक प्रस्ताव दिया था और इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने ट्रांजेक्शन टैक्स, अर्थात, हर लेन-देन पर कर लगाने का प्रस्ताव दिया था । मोदी जी ने आयकर तो नहीं हटाया लेकिन डिजिटलाइजेशन के कार्यक्रम को अपना कर उन्होंने लेन-देन पर एक प्रकार का ऐसा कर लगाने का कार्यक्रम अपना लिया है जो सरकारी ख़ज़ाने में जाने के बजाय अधिकांश निजी कंपनियों के ख़ज़ाने में जायेगा । इनके साथ रिजर्व बैंक की रुपे स्कीम को भी शामिल किया गया है, लेकिन उससे भी सरकारी राजस्व में योगदान नहीं होगा । मोदी-जेटली जोड़ी के इस अभियान में पेटीएम की तरह की विदेशी मिल्कियत की कंपनी और सभी देशी-विदेशी बैंक और कई निजी कंपनियाँ बड़े उत्साह के साथ लग गयी हैं । किसी भी सरकार की कॉरपोरेट के दलाल की ऐसी नग्न भूमिका में कल्पना तक करना नामुमकिन है । संसद से मुँह चुराने वाले नरेन्द्र मोदी विपक्ष पर संसद को न चलने देने का आरोप लगा रहे हैं । यहाँ भी वे एक झूठ बात को बार-बार दोहरा कर सच बनाने की चालाकी में लगे हुए दिखाई देते हैं ।

मोदी जी में प्रशासन के लिये जरूरी सूक्ष्म बुद्धि का यह अभाव ही बताता है कि वे जनतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन के लिये एक अनुपयुक्त व्यक्ति हैं। वास्तविकता के विपरीत अपनी महत्वाकांक्षाओं की धुन में वे कुछ ऐसे निर्णय लेते हैं जिनसे उत्पन्न तनावों से एक तेज गति से चलने वाला सामाजिक नाटक शुरू हो जाता है। जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है, इस नाटक के प्रमुख पात्रों की उच्चाकांक्षा और जीवन के अवरुद्ध यथार्थ के बीच एक चौड़ी खाई पैदा होती जाती है। नेता की महत्वाकांक्षा के परिणामों को तब कोई भी स्वीकारने के लिये तैयार नहीं रहता। सिर्फ आम लोग ही नहीं, खुद नेता के अनुयायी भी। और यह खाई बढ़ते-बढ़ते फल यह होता है कि आकांक्षाएं जितनी ज्यादा और तेज गति से चलती है, पीछे उपलब्धियां उतनी ही कम, घिसटती रह जाती हैं।

 ‘टेलिग्राफ’ में एक खबर छपी थी – ‘करेंसी ‘कुलियों’ के रूप में सेना की तैनाती’ । इस खबर में विस्तार से बताया गया था कि पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर के साल्बनी करेंसी प्रिंटिंग प्रेस में भारतीय वायुसेना के 120 जवानों को तैनात किया गया है, ताकि यहां छप रहे नोटों को वे देश के सभी इलाकों में जल्दी से पहुंचा सके। इसी प्रकार मध्यप्रदेश के देवास के प्रेस में भी सेना के जवानों की टुकडि़यां तैनात की गई है। पहले तक यह काम बैंकों और हवाई सेवाओं के कर्मचारी कर रहे थे। आज इस काम में शत्रु से लड़ने के लिये प्रशिक्षित सेना के जवानों को लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हें लड़ाई का प्रशिक्षण मिला हुआ है, नोटों की छपाई का नहीं। आज वे शुद्ध रूप में कुली का काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में सेना के एक अधिकारी की बात को उद्धृत करते हुए कहा गया है - ‘‘आज सैनिक कुली बन गये हैं। हम कायिक श्रम करते हैं देश के शत्रुओं से लड़ने के लिये। अब सरकार ने हमें इस काम में लगा दिया है।’’
यह सिलसिला एक महीने से चल रहा है। वे अब तक नोटों से भरे जहाजों की तकरीबन एक सौ फेरियां लगा चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एयर चीफ मार्शल अरूप राहा, जो जल्द ही सेवानिवृत होने वाले है और जो लड़ाकू विमान के पायलट रहे हैं, आज अपने सैनिक जीवन की अंतिम वेला में वे नोटों की ढुलाई की तदारिकी कर रहे हैं। इसीप्रकार, उनकी जगह कमान संभालने के लिये आने वाले एयर मार्शल बिरेन्दर सिंह धानोआ भी लड़ाकू विमानों की योजनाओं और युद्ध की रणनीति से जुड़े व्यक्ति हैं, उन्हें भी अब वायुसेना प्रमुख के पद पर आने के बाद नगदी की ढुलाई के काम की देख-रेख में लगना पड़ेगा। अभी चंद दिन पहले ही अपने एक लेख, ‘सरकार के स्वेच्छाचार के दुष्परिणामों का डर’ में हमने सिविलियन कामों के लिये सेना के लगातार दुष्प्रयोगों के खतरों की ओर गंभीरता से संकेत किया था।

मोदी जी की प्रशासनिक क्षमताओं की यही सचाई है। ऐसे गर्जन-तर्जन वाले नेता किसी भी राष्ट्र को उन्मादित करके ज्यादा से ज्यादा आत्म-विध्वंस की ओर ले जा सकते हैं, स्थिर रह कर समाज के सकारात्मक निर्माण को दिशा नहीं दे सकते। यही दुनिया के तानाशाहों का इतिहास है। मोदी जी अपवाद नहीं साबित होंगे।

आज देश भर में बिड़ला और सहारा समूह द्वारा खुद मोदी जी को घूस दिये जाने को लेकर जोरों से चर्चा चल रही है। इसे सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने उठाया था जिस पर अभी सुनवाई चल रही है। फिर इससे जुड़े सारे कागजातों को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की विधान सभा में पेश किया। और अब विपक्ष के नेता राहुल गांधी हर जन सभा में इसे जोर-शोर से उठा रहे हैं। राहुल के तेवर और उनकी जनसभाओं में उमड़ती भीड़, और दूसरी ओर इस विषय पर मोदी जी की खामोशी को देख कर यह साफ है कि अब मोदी जी के नीचे से जमीन खिसकने लगी है। रविशंकर प्रसाद ने मोदी जी को गंगा की तरह पवित्र बताया है । लेकिन उनकी इस टिप्पणी के साथ ही चारों ओर गंगा के मैली होने बात की गूंज सुनाई देने लगी है। लोग कहने लगे हैं कि अगर गंगा मैली न होती तो उमा भारती उसे साफ करने के लिये क्यों अरबों रुपये ख़र्च कर रही है ?

काला धन / सफेद धन


(2)

-अरुण माहेश्वरी


अगर सफेद धन से तात्पर्य अर्जित धन से राज्य के राजस्व की अदायगी के बाद बचा हुआ धन है तो प्रमुख सवाल पैदा होता है कि राज्य को राजस्व क्यों और कितना ?

समाज के संगठन में राज्य की भूमिका को अनिवार्य माना जाता है। यह भी सच है कि आज के समाज की संरचना प्राचीन काल की तरह की सरल संरचना नहीं है। यह एक जटिल संरचना है। साधनों के बढ़ने के साथ-साथ इस आधुनिक काल में राज्य नामक संस्था ने इस प्रकार अपने पैर पसार लिये है कि आज हालत यह है कि कभी जिस राज्य को व्यक्ति के जीवन में जरूरी और महत्वपूर्ण माना जाता था, वहीं आज नये युग के विचारक मनुष्य का भविष्य उस राज्य के पूरी तरह से अवलोप में देखते हैं।

मा​र्क्स ने तो वर्गों में विभाजित समाज में राज्य को पूरी तरह से बालूई आधार पर खड़ा देखा था। आज यह सच है कि राज्य में सुधार ही मनुष्य के सामाजिक संघर्षों का सबसे प्रमुख एजेंडा है। लेकिन राज्य का भविष्य नागरिकों के संदेह के घेरे में है।

कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि राज्य का विषय कोई ऐसा पवित्र विषय नहीं है जिसपर सवाल नहीं उठाये जा सकते या नहीं उठाये जाने चाहिए। बल्कि आज तो नागरिक की जागरुकता राज्य के बरक्स उसके नजरिये से तय होती दिखाई देती है।

और, व्यक्ति की संपत्ति का अधिकार एक ऐसा मसला है, जो कितना भी विवादास्पद क्यों न माना जाए, उसका एक सीधा संबंध आदमी के जीवन में सुख, शांति और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। कंगालियत सिर्फ भौतिक जीवन को ही नहीं, आदमी के मनोजगत को भी संकुचित करती है। राज्य का जन्म लोगों की आपसी ईष्‍​र्या और द्वेष को काबू में रखने के लिये हुआ, लेकिन वर्गों में विभाजित समाज में उसकी भूमिका स्वत: संपत्तिवानों के हितों की रक्षा बन गया। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के बाद ही राज्य के कत्‍​र्तव्यों में समानता और स्वतंत्रता की तरह की बातों का समावेश हुआ है।

इसीलिये, आज जब राज्य अपने नागरिक को समानता और स्वतंत्रता का अधिकार तो दूर की बात, उसके जीवन के न्यूनतम सुख और शांति के आधार की भी रक्षा न करें तो वह राज्य अपने बने रहने के नैतिक औचित्य को गंवा देता है। नमक कानून तोड़ने के लिये गांधी जी का डांडी मार्च अंग्रेजों के औपनिवेशिक राज्य की राजस्व की अनैतिक मांग के खिलाफ मार्च था।

इस पूरे संदर्भ में, मोदी सरकार ने काला धन के नाम पर भारत के आम लोगों के घरों की मामूली संपत्तियों पर डाका डाला है। बैंकों के जरिये उसे काला धन वालों को ही सौंपने का ाड़यंत्र रचा है।  इसने काला धन के खिलाफ लड़ाई को न सिर्फ नैतिक रूप से कमजोर किया है, बल्कि अंग्रेजों की तरह भारत के लोगों के धन की निकासी करके स्विस बैंकों में अपने काले धन को जमा कराने वालों को सौंपने की तरह का गर्हित अपराध किया है।

यह लोगों पर डिजिटलाइजेशन का एक जजिया कर और लगा रही है। वह कर भी कुछ बड़ी कंपनियों के पास जायेगा। इस प्रकार,  भारत के आम लोगों में आधुनिकता की हर मुहिम के प्रति नफरत के बीज बोने का काम किया है। अर्थात, आने वाली पीढि़यों के भविष्य को भी नुकसान पहुंचाया है।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

काला धन/ सफेद धन

-अरुण माहेश्वरी






अर्थशास्त्र की किसी क्लासिक किताब में धन के ऐसे विविध-रंगी रूपों की कोई चर्चा नहीं मिलती। धन की चर्चा होती है, सामाजिक-आर्थिक संबंधों के निरूपण के एक महासत्य, ‘परमशिव’, ब्रह्म तत्व के रूप में! यह काला-सफेद का मसला तो महज एक सरकारी मसला है, सरकारों के राजस्व से जुड़ा मसला। राजस्व दिया हुआ हो तो सफेद, नहीं तो काला। अन्यथा, सामाजिक जीवन में उसकी भूमिका में शायद ही कोई फर्क आता है !

ऊपर से, जब सरकार विकास के पूंजीवादी रास्ते से प्रतिबद्ध हो, सामाजिक विषमता को ही समाज की गति का चालक मानती हो, तब तो शुद्ध रूप से राजस्व से जुड़े इस विषय का व्यापक मेहनतकश जनता के हितों से बहुत कम ही संबंध रह जाता है। उल्टे, जब हम देखते है कि उद्योगपतियों, राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, और दूसरे बड़े लोगों के बीच की चीज के इस खेल में जबर्दस्ती आम लोगों के घरों के धन को छीन लिया जाए या उसे अचल कर दिया जाए, तब तो यह पूरा खेल आम लोगों के खिलाफ एक सीधे युद्ध के अलावा और कुछ नहीं रह जाता है।

मोदी जी से सीधा सवाल किया जाना चाहिए कि आपके इस अभियान से कैसे आम जनता की भलाई होगी जबकि आप बड़े पूंजीपतियों की भलाई की कसम खाये हुए है ; जब आप डिजिटलाइजेशन से जनता के हर लेन-देने से उन्हें कमीशन दिलाने की जुगत में है ; जब आप जनता को मिलने वाली हर रियायत के सख्त विरोधी है ; जब आप खाद्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की तरह के विषयों को आम लोगों का मौलिक अधिकार मानने के बजाय इन सबसे जुड़े कामों को पूरी तरह से मुनाफे के आधार पर चलाए जाने के पक्षधर है।

कहना न होगा, मोदी जी का यह तथाकथित काला धन विरोधी अभियान एक बेहद काले मन का आम लोगों के खिलाफ सिर्फ एक दुरभिसंधिमूलक अभियान है।

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

इस विपत्ति भरे साल के अंतिम दिन की ओर बढ़ते वक्त :

-अरुण माहेश्वरी



लोग सोच रहे हैं, 30 दिसंबर के बाद पूछेंगे - क्या खत्म होगया काला धन ?

अगर नहीं, तो कुछ लोग अभी से चौराहे की तलाश भी करने लगे हैं !

वे नहीं जानते कि आप जिनको चौराहे पर लाना चाहते हैं, वे तो कैशलेस-लेसकैश-डिजिटलाइजेशन का जाप करते-करते तूफानी गति से बेनामी संपत्ति की दिशा में, बहुत दूर बेपत्ता (गुम) हो गए हैं। अब काला धन की धूल छान कर क्या मिलेगा ?

वे तो कंगारू की तरह उछल-उछल कर, शतरंज के घोड़े की ढाई घर वाली चाल से चलते हैं। सचमुच यह उन ज्ञानियों का एक अनोखा खेल है, जो यह मान कर चलते हैं कि किसी भी रहस्य को एकाएक प्रकट नहीं करना चाहिए। रहस्यात्मक विधियों का निरूपण एक ही स्थान पर न कर अलग-अलग संदर्भों में किया जाए ताकि सामान्य जनों के पल्ले कुछ न पड़े और जानकार लोग उन कडि़यों को जोड़ कर इनका रहस्य-भेदन कर सके।

फिर भी, कम से कम इतना तो साफ हो ही चला है कि एक सही चीज गलत जगह पर जितना नुकसान करती है, गलत चीज सही जगह पर उससे बहुत ज्यादा नुकसान करती है। काला धन को खत्म करने के सही काम में नोटबंदी के गलत कदम ने देश को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया है।

बहरहाल, गीता में कहा गया है - असत् वस्तु की सत्ता नहीं होती और नित्य वस्तुओं का विनाश नहीं। अभी यही कहा जा सकता है कि युद्ध शुरू हो चुका है। कोई कितना ही माया जाल क्यों न रचे, परिवर्तन का नया संयोग बनने लगा है।



गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

अब सेना नोटों की ढुलाई का काम भी कर रही है !


-अरुण माहेश्वरी



आज के ‘टेलिग्राफ’ में एक विस्तृत खबर है - करेंसी ‘कुलियों’ के रूप में सेना की तैनाती (Soldiers on duty as currency ‘coolies’) । इस खबर में विस्तार से बताया गया है कि पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर के साल्बनी करेंसी प्रिंटिंग प्रेस में भारतीय वायुसेना के 120 जवानों को तैनात किया गया है, ताकि यहां छप रहे नोटों को वे देश के सभी इलाकों में जल्दी से पहुंचा सके। इसी प्रकार मध्यप्रदेश के देवास के प्रेस में भी सेना के जवानों की टुकडि़यां तैनात की गई है।

खबर में बताया गया है कि पहले तक यह काम बैंकों और हवाई सेवाओं के कर्मचारी कर रहे थे। आज इस काम में शत्रु से लड़ने के लिये प्रशिक्षित सेना के जवानों को लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हंि लड़ाई का प्रशिक्षण मिला हुआ है, नोटों की छपाई का नहीं। आज वे शुद्ध रूप में कुली का काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में सेना के एक अधिकारी की बात को उद्धृत करते हुए कहा गया है - ‘‘आज सैनिक कुली बन गये हैं। हम कायिक श्रम करते हैं देश के शत्रुओं से लड़ने के लिये। अब सरकार ने हमें इस काम में लगा दिया है।’’ (”Soldiers are coolies today”, one officer admitted. “We do physical labour, but to fight against enemies of the country. Now the government has ordered us to do this,” he said)

यह सिलसिला एक महीने से चल रहा है। वे अब तक नोटों से भरे जहाजों की तकरीबन एक सौ फेरियां लगा चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एयर चीफ मार्शल अरूप राहा, जो जल्द ही सेवानिवृत होने वाले है और जो लड़ाकू विमान के पायलट रहे हैं, आज अपने सैनिक जीवन की अंतिम वेला में वे नोटों की ढुलाई की तदारिकी कर रहे हैं। इसीप्रकार, उनकी जगह कमान संभालने के लिये आने वाले एयर मार्शल बिरेन्दर सिंह धानोआ भी लड़ाकू विमानों की योजनाओं और युद्ध की रणनीति से जुड़े व्यक्ति हैं, उन्हें भी अब वायुसेना प्रमुख के पद पर आने के बाद नगदी की ढुलाई के काम की देख-रेख में लगना पड़ेगा।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस काम में किस प्रकार वायु सेना की शक्ति जाया की जा रही है, क्योंकि उनके लोगों को नोटों की छपाई होने तक के लिये बेकार बैठे रहना पड़ता है। इसके अलावा सेना के ये विमान जितना बोझ उठा सकते हैं, उससे बहुत कम बोझ के साथ उनको उड़ना पड़ता है। और तो और, इस काम के लिये लेह या थोइसे की तरह के दूर दराज के इलाकों में सेना के जवानों को ले जाने के लिये लगने वाले हवाई जहाजों को इस काम से एक बार के लिये हटाया गया है।

अभी चंद दिन पहले ही अपने एक लेख, ‘सरकार के स्वेच्छाचार के दुष्परिणामों का डर’ में हमने सिविलियन कामों के लिये सेना के लगातार दुष्प्रयोगों के खतरों की ओर गंभीरता से संकेत किया था। यहां उस टिप्पणी को ‘टेलिग्राफ’ की इस रिपोर्ट के साथ फिर एक बार पढ़े जाने की जरूरत है। उसमें हमने लिखा था -
“आज नोटबंदी के कारण वैसे ही समूचा जन-जीवन अस्थिर है। ऊपर से इस सरकार ने सभी स्थापित संस्थाओं की मर्यादाओं को भी दाव पर लगा दिया है। जजों की नियुक्ति के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ मोर्चा खोल कर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक स्थायी तनाव बना हुआ है। इसके अलावा, घरेलू सुरक्षा और सीमा की सुरक्षा की तरह के हर मामले में राजनीतिक और कूटनीतिक सूझबूझ की कमी के चलते इस सरकार की सेना पर बढ़ती हुई भारी निर्भरशीलता के बहुआयामी खतरे हैं। यह एक ओर जहां सेना को अलग, नये शक्ति केंद्र के रूप में विकसित कर सकती है, वहीं सेना के लगातार मनमाने दुष्प्रयोग से भारत में सिविलियन और नागरिक सत्ताओं के बीच एक ऐसे तनाव के बीज डाल सकती है, जिससे अब तक का भारत पूरी तरह से अपरिचित रहा है।

“वैसे ही, सेना और सरकार के बीच एक लंबे अर्से से वेतन आयोग की सिफारिशों और वन रैंक वन पेंशन (ओरोप) की तरह के मुद्दों पर अंदर ही अंदर एक तनाव बना हुआ है। अब तक के वेतन आयोगों की सिफारिशों से सेना संस्थान कभी भी खुश नहीं रहा है। सभी सेना-प्रमुखों ने पिछले मसलों का बिना हल किये सेना के बारे में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को अभी लागू न करने की मांग की है। सेना की ओर से वेतन आयोग में अपने प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठती रही है, लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने उसे स्वीकृति नहीं दी है। पिछले दिनों जब दिवाली के मौके पर नेताओं ने जवानों के प्रति उद्गार व्यक्त करते हुए उन्हें दीवाली की भरपूर बख्शीश देने की बात कही तो उस पर बाज हलकों से तीखी प्रतिक्रिया आई थी कि क्या जवानों को बख्शीश के नाम पर भीख देने की बात कही जा रही है !

“अगर यह सब इसी प्रकार चलता रहा तो वह समय ज्यादा दूर नहीं है जब कोई भी सेनाध्यक्ष उठ कर खुले आम सरकार के फैसलों में सामरिक तर्क के अभाव के नाम पर उसे चुनौती दे सकता है। नागरकोट हमले के बाद खुद सेना प्रमुख दलबीर सिंह नागरकोट पहुंचे थे। अब तक उन्होंने वहां के सैनिक शिविर की सुरक्षा की स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहा है, लेकिन वे निश्चित तौर पर देख रहे होंगे कि लाल फीताशाही की जकड़नों ने इन शिविरों की क्या दुर्दशा बना रखी है। ऐसे में, शासक दल की पसंद के जजों की तलाश की तरह ही सरकार अपनी पसंद के सेना के अधिकारियों की तलाश की अंधी दौड़ में लग जाती है तो उससे कौन सा नया संकट पैदा हो सकता है, इसका सही-सही अनुमान लगाना अभी कठिन है। हाल में सीबीआई के प्रमुख के पद पर गुजरात कैडर के उस आईपीएस अधिकारी की अस्थायी नियुक्ति की गई है जिसने मोदी सरकार के इशारे पर गुजरात में गोधरा कांड की पहली तफ्तीश की थी। इस प्रकार, जब सरकार का संचालन राजनीतिक विवेक और सूझबूझ के बजाय अज्ञान और तुगलकी सनक से किया जाने लगे तो उससे कई प्रकार की विकृतियों के पैदा होने की आशंका बनी रहती है।

“कहना न होगा, भारत-पाक सीमा पर बने हुए तनाव और कश्मीर की समस्या के प्रति मोदी सरकार के कोरा शौर्य-प्रदर्शन वाले इस रुख में ऐसे सभी खतरे निहित हैं।

“इस पूरे संदर्भ में हाल में पश्चिम बंगाल के 19 टोल नाकों पर अचानक हुई सेना की कार्रवाई और उससे उठा विवाद और भी ज्यादा तात्पर्यपूर्ण दिखाई देने लगता है। इस विषय पर संसद में बयान देते हुए सरकार की ओर से कहा गया कि यह सेना की एक सामान्य कार्रवाई है। भारत के और भी कई स्थानों पर यही व्यायाम किया गया है ताकि किसी भी ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ के वक्त सेना अपना काम कर सके। सरकार का यह बयान कितने खतरनाक संकेतों से भरा हुआ है, इसे कोई भी आसानी से समझ सकता है। राष्ट्रीय आपातकाल में सेना की भूमिका का क्या अर्थ है ? क्या यह प्रत्यक्ष तौर पर घरेलू प्रशासन में सेना की भूमिका को आमंत्रण देने की तरह नहीं है ? ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और नोटबंदी की तरह के मोदी जी के अब तक के सभी सनकी कदमों को देखते हुए, जिनके मूल में अपने अहम की तुष्टि ज्यादा दिखाई देती है, सेना की इस कार्रवाई में अगर कोई किसी प्रकार के नये आंतरिक आपातकाल के अशनि संकेत देखता है, तो इसे कोई अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता है।

“कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध कृति ‘लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर’ में एक जगह फौज के बार-बार इस्तेमाल किये जाने के बारे में वे लिखते हैं -‘‘ इस प्रकार फौजी बारिक और पड़ाव का दबाव फ्रांसीसी समाज के मस्तिष्क पर डालकर उसे ठंडा कर देना ; इस प्रकार तलवार और बंदूक को समय-समय पर न्यायाधीश और प्रशासक, अभिभावक और सेंसर बनने देना, उन्हें पुलिसमैन और रात के संतरी का काम देना; इस प्रकार फौजी मूंछ और फौजी वर्दी को समय-समय पर, ढिंढोरा पीट कर, समाज की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता एवं समाज का उपदेष्टा घोषित करना - यह सब करने के बाद क्या अंत में यह लाजिमी न था कि फौजी बारिक और पड़ाव, तलवार और बंदूक, मूंछ और वर्दी को एक दिन यह सूझ पैदा होती कि क्यों न अपने शासन को सर्वाच्च घोषित करके एक ही बार समाज का उद्धार कर दिया जाये तथा नागरिक समाज को अपना शासन आप करने की चिंता से सब दिनों के लिए मुक्त कर दिया जाये ?’’

https://www.telegraphindia.com/1161223/jsp/nation/story_126343.jsp#.WFzVUFV97IU

नरेन्द्र मोदी जनतंत्र में शासन के लिये उपयुक्त व्यक्ति नजर नहीं आते

-अरुण माहेश्वरी



नोटबंदी को लेकर भारत सरकार के प्रशासन की जो भद हुई है, उसे बिल्कुल सही मनमोहन सिंह ने एक भारी प्रबंधकीय विफलता कहा था। इसने नरेन्द्र मोदी की प्रशासनिक क्षमता पर फिर एक बार गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये हैं।

हम कूटनीति के क्षेत्र में, सीमा पर पाकिस्तान की करतूतों से निपटने के सामरिक रणनीति के क्षेत्र में इनकी विफलताओं को पहले ही देख चुके हैं। सारी दुनिया जान गई है कि यह वह गरजने वाला बादल है, जो बरसा नहीं करता, क्योंकि इसे अपनी ही वास्तविकता का ज्ञान नहीं है।

लेकिन सबसे बुनियादी सवाल तो यही है कि क्या शासन के किसी भी सिद्धांत में गर्जना का कभी कोई वास्तविक स्थान होता है ? राजसत्ता के चरित्र के अध्येताओं ने हमेशा उसे एक ऐसे सामाजिक उपकरण के रूप में ही देखा है, जो अदृश्य शक्ति के रूप में सर्वत्र मौजूद रहने पर भी, बिल्कुल प्रकट और चाक्षुस रूप में कम से कम दिखाई देती है। बहुत कम मामलों में ही उसका कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप प्रकट होता है। पर्दे के पीछे से एक अदृश्य शक्ति के रूप में यह सदा-सर्वदा अपना काम करने के अहसास को बनाये रखती है।

राजसत्ता के अस्तित्व की यही स्वाभाविकता है। इसकी शक्ति का प्रदर्शन हमेशा इसप्रकार किया जाता है ताकि उसका कभी भी प्रयोग न करना पड़े। जब कहीं स्थिति के काबू के बाहर होने का अंदेशा होता है तो हम देखते है सेना का रूट मार्च कराया जाता है, ताकि लोगों में एक डर व्यापे और वे कानून को अपने हाथ में न लें। ताकत का ऐसे प्रदर्शन का मतलब ही है उसके प्रयोग न करने की स्थिति बनी रहे। और भी अच्छे प्रशासन की बड़ी पहचान राजसत्ता की ताकत को बिना प्रदर्शित किये काम निकालने की होती है। सिर्फ लोगों के मन में राजसत्ता के होने का अहसास भर जीवित रहे।  यह एक प्रकार से बल के प्रदर्शन से भी इंकार का रास्ता है। राजसत्ता के प्रयोग से बचने के लिये सत्ता की ताकत के प्रदर्शन की कोशिश। और इससे भी एक कदम आगे, सत्ता की ताकत के प्रदर्शन से ही बचने की कोशिश। नकार का भी नकार।

लेकिन हमारे मोदी जी का स्वभाव तो ऐसे सभी नकारों से, अपने को अधिक से अधिक अदृश्य बनाने वाले नकारों के नकार वाला है। वे इवेंट मैनेजर है। जब तक किसी चीज का पूरे ढोल-धमाके के साथ प्रदर्शन न किया जाए तब तक तो उन्हें उस चीज के होने तक का विश्वास नहीं होता है। और ऐसे प्रदर्शन में भी वे खुद को हमेशा नाटक के केंद्र में हमेशा एक महानायक के रूप में पेश किये बिना संतुष्ट नहीं हो सकते हैं। वे पर्दे के पीछे से नहीं, मंच पर तेज प्रकाश के वृत्त में पूरे मेकअप में अपनी सारी झुर्रियों को छिपाते हुए चिर युवा दिखने पर यकीन रखते हैं। वे सर्जिकल स्ट्राइक करे या न करे, लेकिन उसका ढोल जरूर पीटेंगे और कुछ इस तरह कि लगे जैसे वह करिश्मा हमारी सेना ने नहीं, खुद प्रधानमंत्री ने अपने हाथ से  किया है।

काले धन पर हाल की ‘नोटबंदी’ वाली सर्जिकल स्ट्राइक तो और भी अद्भुत है। 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के नोट को कागज का एक टुकड़ा घोषित करने के शौर्य प्रदर्शन से लेकर कैशलेस, लेस कैश की तरह की अजूबी बातों और अभी हाल में लॉटरी से कुछ लोगों को पंद्रह हजार रुपये दिलाने में ही नहीं, बल्कि आम लोगों को दूसरों का रुपया मार कर बैठ जाने की महान सीख देने के मामले में भी वे जिस प्रकार किसी विज्ञापन के मॉडल वाले उत्साह का परिचय देते रहे हैं, उसकी सचमुच किसी राष्ट्रप्रधान के व्यवहार में कल्पना भी नहीं की जा सकती है।


मोदी जी में प्रशासन के लिये जरूरी सूक्ष्म बुद्धि का यह अभाव ही बताता है कि वे जनतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन के लिये एक अनुपयुक्त व्यक्ति हैं। वास्तविकता के विपरीत अपनी महत्वाकांक्षाओं की धुन में वे कुछ ऐसे निर्णय लेते हैं जिनसे उत्पन्न तनावों से एक तेज गति से चलने वाला सामाजिक नाटक शुरू हो जाता है। जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है, इस नाटक के प्रमुख पात्रों की उच्चाकांक्षा और जीवन के अवरुद्ध यथार्थ के बीच एक चौड़ी खाई पैदा होती जाती है। नेता की महत्वाकांक्षा के परिणामों को तब कोई भी स्वीकारने के लिये तैयार नहीं रहता। सिर्फ आम लोग ही नहीं, खुद नेता के अनुयायी भी। और यह खाई बढ़ते-बढ़ते  फल यह होता है कि आकांक्षाएं जितनी ज्यादा और तेज गति से चलती है, पीछे उपलब्धियां उतनी ही कम, घिसटती रह जाती है।

मोदी जी की प्रशासनिक क्षमताओं की यही सचाई है। ऐसे गर्जन-तर्जन वाले नेता किसी भी राष्ट्र को उन्मादित करके ज्यादा से ज्यादा आत्म-विध्वंस की ओर ले जा सकते हैं, स्थिर रह कर समाज के सकारात्मक निर्माण को दिशा नहीं दे सकते। यही  दुनिया के तानाशाहों का इतिहास है। मोदी जी अपवाद नहीं साबित होंगे।  

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

मेहषाणा में राहुल की जबर्दस्त सभा का अर्थ

-अरुण माहेश्वरी


आज गुजरात के मेहषाणा में राहुल गांधी के पूरे भाषण को सुना और मेहषाणा की सभा में हुई भीड़ का नजारा देखा।

आज के ही आनंदबाजार पत्रिका में वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल का राहुल गांधी पर एक लेख है - ‘वही है विपक्ष का चेहरा, बीजेपी ने भी यह समझ लिया है’।

जो लोग जयंत घोषाल को जानते है, वे इस बात को जानते हैं कि दिल्ली के सत्ता के गलियारों की खबरों के बारे में एक खोजी पत्रकार के रूप में उनकी कुछ अलग हैसियत रही है। संसद के सेंट्रल हॉल की गपशप के बीच से सूत्रों को निकाल कर अक्सर वे ऐसी ही कुछ अलग, लेकिन चटपटी खबरें बनाते रहते हैं, जिन्हें फेंकू बता कर उड़ाया नहीं जा सकता है।

अपने इस लेख की शुरूआत उन्होंने 2014 के चुनाव के वक्त राहुल गांधी से हुई अपनी एक बात के उल्लेख से किया है, जिसे घोषाल के अनुसार उस वक्त राहुल ने उन्हें लिखने से सख्त मना कर दिया था, लेकिन अब आज की परिस्थिति में वे उसे प्रकाशित करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। इसमें, उनके अनुसार, राहुल गांधी ने उन्हें तुगलक रोड के अपने घर में उनसे कहा था कि हल लड़ तो रहे हैं, लेकिन इस बार मोदी को हराना असंभव लगता है। उन्होंने इसकी वजह यह बताई कि दरअसल हम किसी यथार्थ के खिलाफ नहीं लड़ रहे है, हम एक भयंकर होलोग्राम के खिलाफ लड़ रहे हैं। होलोग्राम का मतलब है एक प्रकार की ज्यामितीय माया। सत्य नहीं, परासत्य जो सत्य की तरह का भ्रम पैदा करता है।

राहुल गांधी ने कहा कि अभी वोट के समय, जब मैं अपनी पार्टी के सेनापति की भूमिका में हूं, मेरी इस बात के प्रचार से हमारे लोगों में निराशा फैलेगी, इसीलिये अभी इसे प्रकाशित मत कीजियेगा।

आज मोदी को सत्तासीन हुए अढ़ाई साल बीत गये हैं। जयंत घोषाल लिखते है - आज लगता है जैसे वह hologram अब hollow gram में बदल गया है। शुरू में धीरे-धीरे प्रकृति के नियम के अनुसार उस माया का क्षरण हो रहा था। नोटबंदी के फैसले ने अब तेजी के साथ मोदी-विरोधी राजनीतिक क्षेत्र का तेज गति से विस्तार कर दिया है। और घोषाल के अनुसार, इस क्षेत्र पर अधिकार के जितने भी दावेदार क्यों न हो, राहुल ही आज उस दौड़ में सबसे आगे हैं। इस बात को अब भाजपा के लोग भी अंदर ही अंदर समझने लगे हैं, भले ही वे इसे खुले आम न स्वीकारें।

बहरहाल, आज गुजरात में राहुल की मेहषाणा की सभा जयंत घोषाल के लेख की सचाई का ही बयान कर रही थी। परिस्थितियां ही नेता तैयार करती है, इतिहास का यह नियम फिर एक बार काम करना शुरू कर चुका है। मोदी के दिन खत्म होने को है और उसके विकल्प तैयार होने लगे हैं।

http://www.anandabazar.com/editorial/now-bjp-also-understand-the-rahul-gandhi-is-the-opposition-face-1.535074

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

नोटबंदी पर फ्रंटलाइन का नया अंक : इस विषय के सभी पक्षों को विस्तार से समझने की एक कुंजी की तरह है


-अरुण माहेश्वरी

आठ नवंबर को जब से मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की, हम अपनी फेसबुक वाल और अपने ‘चतुर्दिक’ ब्लाग पर इसके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक आयामों पर लगातार लिखते चले आ रहे हैं। मोदी जी की घोषणा के बाद सरकार की ओर से प्राय: हर रोज एक नई घोषणा की जाती रही, और उन पर भी हम अपनी प्रतिक्रिया देते रहे। इस दौरान, हर बीतते दिन के साथ इस घोषणा के जो व्यवहारिक परिणाम दिखाई देने लगे, उनसे भी लगातार हमारी आशंकाएं सही साबित होती रही और हमने भरसक उन सबको सामने लाने की कोशिश की। इस बीच कुछ नामी-गिरामी अर्थशास्त्रियों और जीवन के दूसरे क्षेत्रों की हस्तियों ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी, इसके पक्ष में भी कुछ लोगों ने कलम उठाई या अपनी बातें कही, उन सब पर भी हम लगातार संवाद करते रहे।



इन सबके बावजूद, जब हमने ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका के ताजा, 23 दिसंबर के अंक को देखा तो हम पत्रकारिता के इस स्तर से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। यह अपने आप में एक अनोखा अंक है, जिसमें तकरीबन बीस लेखों, रिपोर्टों और साक्षात्कारों की पूरे 100 पृष्ठों की सामग्री के जरिये भारत की अर्थ-व्यवस्था और आम जनता के जीवन को पूरी तरह से झकझोर देने वाले इस तुगलकी फैसले के तमाम पक्षों को जिस प्रकार खोल कर रखा गया है, वह इस अंक को एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय अंक बना देता है। यही वजह है कि हमें इस अंक की सामग्री पर किंचित विस्तार के साथ अलग से चर्चा करना बहुत समीचीन जान पड़ता है।

इसका पहला लेख वी श्रीधर का है ‘व्यथित राष्ट्र’ (A nation in agony)। किसी स्टैडियम की सीढि़यों पर बैठे दिहाड़ी मजदूर दूर से अहंकार से भरे मोदी जी को जाते हुए निराश निगाहों से देख रहे हैं, इसकी एक तस्वीर के साथ सजाया गया यह लेख बताता है कि कैसे मोदी की काला धन पर की गई इस सर्जिकल स्ट्राइक ने गरीब लोगों के जीवन को बुरी तरह से बिखेर कर रख दिया है। यह एक ऐसा कदम है जिसमें एक झटके से गरीबों की आमदनी और संपदा को अमीरों के पास इस प्रकार पहुंचा दिया गया है जिसकी आजादी के बाद से अब तक दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती है। श्रीधर के इस लेख में आम लोगों के जीवन पर ढाये गये इस कहर की कई कहानियों को समेटा गया है। कैसे गरीबों के घरों की शादियां रुक गई; पकी फसल को काट कर घर लाना मुश्किल होगया ; छोटे-मंझोले कल-कारखाने बंद हो गये ; तांबे की चीजों के शहर मुरादाबाद, गंजी के कपड़ों के शहर तिरुपुर, साइकिल, खेल के सामान वगैरह बनाने वाले शहर लुधियाना, चूडि़यों के शहर फिरोजाबाद, गुड़ के शहर मांड्या आदि तमाम जगहों पर मुर्दानगी छा गई। मोदी, जेटली और उर्जित पटेल की त्रिमूर्ति के ढाये इस कहर ने हजारों मजदूरों को शहरों से भाग कर फिर से गांव में पनाह लेने के लिये मजबूर किया। और सर्वोपरि, पूरा देश बैंकों के सामने कतारों में खड़ा भारी यातना और अपमान के घूट पीता रहा। श्रीधर ने अपने लेख में बहुत कायदे से नोटबंदी की मार के इन सारे पहलुओं को रखा है।

इसमें दूसरा लेख है वैंकिटेश रामकृष्णन का - राजनीतिक गुलाटियां (Political Rollercoaster) । मोदी जी ने नोटबंदी की घोषणा के साथ ही जितनी राजनीतिक गुलाटियां खाई, यह भी अपने आप में एक नायाब घटना है। पहले कहा गया कि इससे काला धन निकल जायेगा, अमीरों की नींद उड़ेगी और गरीब चैन की बंशी बजायेंगे। फिर काला धन की जगह सारा जोर कैशलेस पर चला गया। फिर आया लेस कैश। और अब वे कहने लग गये हैं कि हम तो काला धन बंद कर रहे थे और विपक्ष संसद को। नोटबंदी के लक्ष्यों के बारे में गिरगिट की तरह रंग बदलते मोदी जी के कारनामों से जनता की व्यग्रता और पीड़ा लगातार बढ़ती गई और इसके राजनीतिक परिणामों के तौर पर जो बेचैनी पैदा हुई है, वह किसी भी देश को एक भारी विस्फोटक स्थिति की ओर ले जा सकती है। रामाकृष्णन के लेख में इन सबका बहुत सही ढंग से विश्लेषण किया गया है। मोदी जी के इस कदम ने संघ परिवारियों के अंदर भी जो तनाव पैदा किया है, उसकी एक झलक इस लेख से देखने को मिलती है।

वी. वैंकटेश ने इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं की जांच की है। उन्होंने खास तौर पर इस बात को नोट किया है कि 1978 में इस प्रकार का जो कदम उठाया गया था, वह एक अध्यादेश के माध्यम से उठाया गया था। इस बार तो वैसी बिना किसी वैधानिक तैयारी के यह काम किया गया है, जिसके आगे सुप्रीम कोर्ट में क्या परिणाम होंगे, अभी से पूरे निश्चय के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता है।

जयति घोष ने ‘मुद्रा और सामाजिक अनुबंध’ (Money and social contract) शीर्षक लेख में कहा है कि इस कदम से हम एक ऐसे पथ की ओर कदम बढ़ा चुके हैं, जो हमारा चुना और जाना हुआ पथ नहीं है। एक गरीब आदमी के जीवन में डिजिटलाइजेशन का क्या असर पड़ सकता है, इसकी अभी कल्पना नहीं की जा सकती है। अभी तो इसने सबकों कंगाल सा बना दिया है। मुद्रा में विश्वास की कमी से लोगों के मानस पर क्या असर पड़ता है, वे कैसे अपनी विपत्ति के दिनों के लिये सोना आदि की तरह की चीजों पर भरोसे की ओर आकर्षित हो सकते हैं, इन विषयों को जयति घोष ने अपने लेख में उठाया है।


इसमें एक बहुत महत्वपूर्ण साक्षात्कार है उत्सा पटनायक का, जिसका शीर्षक दिया गया है - सरकार ने सबसे गरीब लोगों से उनकी मजूरी और काम चलाने लायक पूंजी छीन ली। श्रीमती पटनायक ने इसमें बताया है कि मोदी जी का यह कदम बताता है कि कैसे पेशेवर अर्थशास्त्रियों की जगह झोला छाप किस्म के लोगों की सलाह पर चलने के कारण मोदी जी ने इस प्रकार का एक आत्मघाती कदम उठाया है। जनता से खुद के रुपये खर्च करने का अधिकार स्वेच्छाचारी ढंग से छीन लिया गया है और सरकार कह रही है कि इसे सामान्य होने में काफी समय लग सकता है। उत्सा पटनायक ने इससे कृषि पर पड़ने दुष्प्रभाव का भी विस्तार से विवेचन किया है।

उत्सा पटनायक के कृषि क्षेत्र संबंधी कथन को ही पुष्ट करती है आर. रामकुमार, वी. श्रीधर और जी.टी.सतीश  की रिपोर्टें है - ‘ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर रोक’ और ‘नीचे के स्तर पर बर्बादी’। इसी में वैंकिटेश रामकृष्णन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलू में मची तबाही पर, अक्षय देशमान ने लुधियाना में धान की खेती, टी. के. राजलक्ष्मी ने रोहतक में थोक व्यापार के संकट, प्रफुल्ल दास ने उड़ीसा के कांधामल में आदिवासियों के आंसू, सुशांत तालुकदार ने असम के नलबाड़ी में निराशा के बीजों आदि की जो तमाम रिपोर्टें शामिल की गई है, वे सब नोटबंदी से पैदा हुई गरीब जनता की जिंदगी की जमीनी सचाई को सामने लाती है।


इसीप्रकार  तमाम गांव और शहरों की स्थिति और उनमें उठ रही आवाजें इस अंक की बाकी सामग्री में सुनने को मिलती है। यह पूरे 100 पन्नों की सामग्री है जिसमें अर्थनीति के बारीक तकनीकी मुद्दों से लेकर जनजीवन की ठोस सचाइयों के लगभग सभी पक्षों को समेटा गया है।

फ्रंटलाइन के इस अंक की जितनी तारीफ की जाए, कम है।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैशलेस और आतंकवाद


नरेंद्र मोदी और भाजपा के उन सभी नेताओं के लिये कुछ जरूरी जानकारी जो धड़ल्ले से इस झूठ को फैला रहे हैं कि नोटबंदी और कैशलेसनेस से आतंकवाद ख़त्म हो जायेगा :

1. मुंबई में 26/11 के भयंकर आतंकवादी हमले का एक प्रमुख अपराधी कसव के सर्वाधुनिक स्मार्ट फोन में अमेरिका के वीआईपी लोगों को कहीं भी रुपया उपलब्ध कराने वाले 'कैलफोनेक्स' का लिंक था । पाकिस्तान के 'मनीग्राम' और इटली के 'वेस्टर्न यूनियन' द्वारा इस लिंक के मार्फ़त आनलाइन रुपया ट्रांसफ़र हुआ था । हेडली और कसव को एक भी रुपया नगद नहीं दिया गया था ।

2. हाफ़िज़ सईद का लस्करे तैयबा भारत में आतंकवादी गतिविधियों के लिये जो रुपये इकट्ठा करता है, वह नगदी नहीं होता है । सभी प्रकार के आतंकवादी संगठनों में सारे आर्थिक लेन-देन आनलाइन ही हुआ करते हैं ।

3. पिछले दिनों फ्रांस में आतंकवादी हमलों की बहुत दर्दनाक घटनाएँ घटती रही है । शार्ली हाब्दो को हम कभी भूल नहीं सकते जब आतंकवादियों ने इस पत्रिका में छपे कार्टूनों के लिये उसके दफ़्तर में घुस कर संपादक सहित सब लोगों की हत्या कर दी थी । इसी प्रकार वहाँ के नीस शहर में एक कन्सर्ट कार्यक्रम में ट्रक के नीचे कुचल कर 84 लोगों की हत्या कर दी गई थी । इसी प्रकार ब्रसेल्स के बेल्जियम में आतंकवादियों के हमले हुए । ये वे देश है जहाँ लगभग 92 प्रतिशत लेन-देन कैशलेस होता है । लेकिन आतंकवादियों के हमलों को कहीं भी रोका नहीं जा सका था ।

4. जाहिर है, कैशलेस से आतंकवाद का मुक़ाबला करने की बात एक कोरा झूठ है और भाजपा के सारे नेता प्रधानमंत्री के सुर में सुर मिला कर हमेशा इस झूठ को रटते रहते हैं ।

एस गुरुमूर्ति की आंकड़ेबाजी वाला मानवद्रोही अर्थशास्त्र

- अरुण माहेश्वरी



पिछले दिनों राज्य सभा टीवी पर मैं मनोनीत सांसद और अर्थशास्त्री नरेन्द्र जाधव की बातों को सुन कर सिर पकड़ कर बैठ गया था। आंकड़ेबाजी की वह निष्ठुरता सचमुच देखते बनती थी, जब वे नोटबंदी से आम जनता के जीवन में पैदा हुए भूचाल को जरा भी तरजीह नहीं दे रहे थे, और कोरी आंकड़ेबाजी, कि बैंकों में इतना रुपया आ जाने से आगे ब्याज की दरों में गिरावट आयेगी जो प्रकारांतर से आर्थिक विकास के दूरगामी अच्छे फल देगी, की तरह की प्रवंचक सौदागरों की भाषा में खिलखिलाते हुए बोलते जा रहे थे। तब हमें बार-बार मनमोहन सिंह द्वारा उद्धृत मैनार्ड केन्स की बात याद आ रही थी कि ‘दूरगामी’ काल में तो हम मृत होंगे।

बहरहाल, नरेन्द्र जाधव की उन सारी बकवासों की तीखी आलोचना करते हुए हमने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी -‘ये खुशफहमियों की फेरीवालें’। और हमने कहा था कि ‘‘भारी उत्साह से बयान की जा रही अपनी इस पूरी कहानी में बड़ी चालाकी से वे इस प्रमुख बात को छिपा लेते हैं कि अर्थ-व्यवस्था में किये जा रहे इन तमाम प्रयोगों का सारा बोझ देश के ग़रीब मज़दूरों, किसानों और जिन्हें अर्थ-व्यवस्था के अनौपचारिक हिस्से से जुड़े लोग कहा जाता है, उनके सिर पर लाद दिया जा रहा है । पहले से ही उनकी परेशानियों से भरी ज़िंदगी को पूरी तरह से तबाह करके उन्हें भुखमरी की दिशा में ठेल दिया जा रहा है ।“

आज हमने इंडिया टीवी पर आरएसएस के अर्थशास्त्री कहे जाने वाले एस गुरुमूर्ति का ऐसा ही एक रेकर्ड किया हुआ चार दिन पहले का साक्षात्कार सुना। यहां भी वहीं खिलखिलाहट और वैसी ही कोरी आंकड़ेबाजी। गुरुमूर्ति भी बता रहे थे कि जीडीपी के 13 प्रतिशत तक नगदी की राशि के बढ़ जाने से अर्थ-व्यवस्था को नुकसान का रोना रो रहे थे और कह रहे थे कि ‘इसीके कारण अभी देश में रोजगार-विहीन विकास हो रहा है। संपत्तियों के दाम तो तीन सौ प्रतिशत बढ़ गये, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ा। नगदी में मौजूद काला धन काली अर्थ-व्यवस्था को बढ़ावा देता है।’

गुरुमूर्ति रोजगार-विहीन विकास के लिये भारत में नगदी की मात्रा को जिस प्रकार कोस रहे थे, उसे सुन कर पता चल रहा था कि कितने सुचिंतित ढंग से ये लोग भारत की जनता को ठगने के काम में लगे हुए हैं। सारी दुनिया की अर्थ-व्यवस्था में ‘रोजगार-विहीन विकास’ की प्रवृत्ति को संयुक्त राष्ट्र संघ ने आज नहीं, लगभग दो दशक से भी ज्यादा समय पहले देख लिया था। और, जाहिर है कि वैश्वीकरण के इस दौर में, भारतीय अर्थ-व्यवस्था का भी विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जितना जुड़ाव बढ़ेगा, उसमें वे सारी प्रवृत्तियां निश्चित तौर पर उसी अनुपात में आयेगी, जैसी दुनिया के दूसरे हिस्सों में देखी जा रही है। इस मामले में, नि:संकोच, विकसित देशों की वर्तमान सचाई को ही भारत के भी आज और भविष्य का सच कहा जा सकता है।

लेकिन, दुनिया में शायद आज तक किसी भी अर्थशास्त्री ने इसके लिये नगदी करेंसी के अनुपात को कभी अपने विचार का विषय तक नहीं बनाया है। संघ के अर्थशास्त्री गुरुमूर्ति कहते हैं नगदी की मात्रा में वृद्धि ही भारत की ऐसी सारी बीमारियों की जड़ में हैं। थामस पिकेटी जैसे जाने-माने अर्थशास्त्री ने अपने अध्ययन में पूंजीवाद के अंतर्गत आय के असमान वितरण के साथ ही संपत्तियों के मसले को अपना खास विषय बनाया है। उन्होंने भी इसमें नगदी की किसी विशेष भूमिका का कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है। लेकिन अकेले गुरुमूर्ति ने यह खोज की है कि पूंजीवाद, उससे जुड़ा ऑटोमेशन और सूचना तकनीक के कारण सारी दुनिया के वाणिज्य का संकेंद्रण नहीं, नगदी करेंसी अर्थ-व्यवस्था में रोजगार-विहीनता की तरह की बीमारियों के मूल में हैं।

हमने अपनी एक टिप्पणी में कहा था कि नरेन्द्र मोदी नगदी-विहीनता का कुछ इस प्रकार प्रचार कर रहे हैं, मानो नगदी-विहीनता का अर्थ होता है शोषण-विहीनता और इसी के आधार पर, अर्थशास्त्र की दुनिया में मोदी की इस महान खोज के लिये हमने उन्हें नोबेल पुरस्कार का हकदार बताया था ! अब गुरुमूर्ति के बारे में भी हमारा कहना होगा कि आज की आर्थिक दुनिया की सारी बीमारियों की जड़ नगदी मुद्रा नामकी चीज में निहित है, इस खोज के लिये क्यों न उन्हें भी नरेन्द्र मोदी के साथ इस साल के नोबल पुरस्कार का संयुक्त-अधिकारी माना जाए! नगदी की जगह आप प्लास्टिक मनी का प्रयोग करने लगिये, देखिये अर्थ-व्यवस्था की सारी बीमारियां रातो-रात रफ्फू-चक्कर हो जायेगी !

कोरी आंकड़ेबाजी कितनी अमानवीय और जीवन की सचाई से दूर होती है, इसको लेकर दुनिया में अर्थनीतिशास्त्र के क्षेत्र में आंदोलनात्मक स्तर की बहसें चलती रही है। सत्तर के दशक में फ्रांस के विश्वविद्यालयों में अर्थनीतिशास्त्र के अध्ययन को कोरी आंकड़ेबाजी से मुक्त करने का छात्रों का बड़ा आंदोलन चला था, जिसकी प्रमुख दलील ही यह थी कि आंकड़ेबाजी एक प्रकार से अर्थनीति संबंधी चिंतन को आत्मलीनता की बीमारी का शिकार बनाने का उपक्रम होता है। इसकी चपेट में पड़ा हुआ अर्थनीतिविद जीवन की ठोस वास्तविकताओं से कटा हुआ ऐसी बकवासों में फंसा जाता है, जो कभी भी मनुष्यों के किसी काम की नहीं हुआ करती है। इसीलिये उन्होंने अर्थनीति को उसकी आत्मलीनता (Autism) से मुक्त कराने का नारा दिया था।

नरेन्द्र जाधव और एस गुरुमूर्ति की तरह के संघी अर्थशास्त्री, जो आज मोदी की इस भारत के लोगों को प्रताडि़त करने वाली नोटबंदी की नीतियों की हिमायत में उतरे हुए हैं, ऐसे ही मानव-द्रोही आंकड़ेबाज अर्थशास्त्रियों की श्रेणी में आते हैं जिनको कतारों में खड़े लोग, एक-एक पैसे को तरसते मजदूर, किसान और बंद होते छोटे और मंझोले कारखानें, तेजी से गहरा रही मंदी की काली छाया कहीं दिखाई नहीं देती है। दिखाई देते हैं - भविष्य में ब्याज की दरों में कटौती, जिसके बारे में रिजर्व बैंक ने अभी किसी प्रकार की प्रतिश्रुति देना तक उचित नहीं समझा है। उन्हें हंसते हुए इस बात को कहने में जरा भी संकोच नहीं होता कि आगामी मार्च महीने तक अर्थ-व्यवस्था में कुछ परेशानियां बनी रहेगी लेकिन बाद में सब धीरे-धीरे सामान्य हो जायेगा।

इनकी तुलना में हमें उन छोटे और मंझोले कारखानों के मालिकों, मंडियों के व्यापारियों और किसानों की बातें बहुत ज्यादा सच लगती है जो चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि मोदी जी ने यह जो धक्का मारा है, इसके जख्मों से उबरने के लिये एक-दो साल भी कम पड़ेंगे।  

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

क्या मोदी जी में औपनिवेशिक शासकों के प्रेत ने प्रवेश कर लिया है ?

 -अरुण माहेश्वरी



सचमुच यह देख कर हैरत होती है कि भारत में जब नोटबंदी के कारण इतनी अफरा-तफरी मची हुई है, तब विदेशी अखबार इसके प्रति लगभग पूरी तरह से उदासीन बने हुए हैं। चंद रोज पहले ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका में, नोटबंदी के लगभग पचीस दिन बाद, 3 दिसंबर के अंक में, ‘मोदी का घपला’ शीर्षक से एक छोटी सी टिप्पणी छपी थी, जिसे अपनी टिप्पणी के साथ हमने शेयर किया था। फिर और मित्रों ने भी उसे काफी साझा किया। उसके बाद से अब तक ‘इकोनोमिस्ट’ भी इस विषय पर चुप हैं। इसके अलावा गार्जियन, न्यूयार्क टाइम्स, या दूसरे अखबार भी ऐसी ही कोई छोटी-मोटी टिप्पणी के बाद शांत पड़े हैं।

भारत के लोगों के लिये जीवन-मरण का प्रश्न बनी हुई इस इतनी बड़ी घटना पर विदेशी पत्रकारों और अर्थशास्त्रियों की यह खामोशी हमें न सिर्फ हैरान करती है, बल्कि इस सारे मसले को बिल्कुल नये रूप में देखने के लिये भी मजबूर करती है। हमें लगता है कि जैसे सीरिया में चल रहा कत्ले आम, पूरे मध्यपूर्व के देशों के  धूलिसात हो जाने का खतरा या अफगानिस्तान, पाकिस्तान में रोज आतंकवादियों के बमों से लोगों का मरना पश्चिम के अखबारों के लिये कोई विशेष अर्थ नहीं रखता, क्या भारत में नोटबंदी भी उनकी नजर में कुछ वैसा ही नहीं है, जिसमें भारत के गरीब लोगों की भारी परेशानियां उनके लिये कोई मायने नहीं रखती ?

पश्चिम के लोगों का खास तौर पर दक्षिण एशिया के देशों के बारे में हमेशा से कुछ इसी प्रकार का नजरिया रहा है कि यहां के लोग इस धरती पर महज एक भार है। इनके न रहने में ही सार है। गुन्नार मिर्डल ने अपने तीन खंडों वाले बृहद ग्रंथ, ‘एशियन ड्रामा’ (1982) में इन देशों को सड़े हुए देश बताया था। उसने लिखा था कि औपनिवेशिक जंजीरों से मुक्ति के बाद भी दक्षिण एशिया के देशों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में कोई फर्क नहीं आया है। सिर्फ आबादी में वृद्धि की दर तेज हुई है। (The only major change has been the recent rapid acceleration in the rate of population increase)



पश्चिम वालों का दक्षिण एशिया को देखने का यह नजरिया उनके खास उपनिवेशवादी शासकों के रवैये को दर्शाता है। भारत में अंग्रेजों का दो सौ साल तक शासन रहा, उस शासन के दौरान हर दूसरे साल हजारो-लाखों लोग अकाल और महामारियों की चपेट में खत्म होते रहे, लेकिन भारत की जनता को उसकी गरीबी और जहालत से कैसे मुक्त किया जाए, इस पर उन्होंने न कभी कोई शोध-अनुसंधान किया और न ही कभी इनके जीवन में सुधार का कोई नीतिगत ढांचा तैयार किया। भारत के लोगों के जीवन और जीविका के सवाल उनके सांस्कृतिक पुरातत्ववादियों की रुचि के विषय होते थे, जो इनकी एक अजीबो-गरीब रूढ़ प्रकार की तस्वीर भर पेश करके पश्चिम के लोगों के अहम की तुष्टि किया करते थे।

भारत की तरह के पिछड़े हुए देशों की ओर उनका ध्यान सिर्फ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, शीतयुद्ध के काल में गया, जब कम्युनिज्म का मुकाबला करने के अपनी विदेश नीति के हितों में उन्होंने इन देशों की सुध लेना जरूरी समझा। इस मामले में हम सोवियत संघ को भी उनसे अलग नहीं रख सकते हैं, जिसने अपने विदेश नीति के हितों के लिये भारत जैसे देशों के साथ सहयोग तो किया, लेकिन भारतीय समाज और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के समाजों की समस्याओं के बारे में वैज्ञानिक अध्ययन के लिये शोध कार्यों के मामले में वे भी बहुत ज्यादा उत्साहित कभी नहीं रहे।


इस तुलना में, आजादी की लड़ाई के बीच से खुद भारत के इतिहासकारों और अर्थशास्त्रियों की एक पूरी पीढ़ी सामने आई, भारत के अपने सांख्यिकी संस्थानों, योजना आयोग आदि संस्थानों का गठन हुआ और विश्वयुद्ध के बाद की विश्व परिस्थिति में गुट-निरपेक्ष देशों के नेता के रूप में भारत सरकार ने अपने स्वाधीन विकास की एक रूपरेखा तैयार की। इसका एक फौरी लाभ तो यह हुआ कि अकाल भारत से सदा के लिये विदा हो गये । जाहिर है, पश्चिमी उपनिवेशवादियों के बुनियादी औपनिवेशिक रुख के कारण ही भारत में हर प्रकार की विदेशी सहायता को भी हमेशा बेहद संदेह की नजर से देखा जाता था। बुल्गारिया के लेखक टिबर मेंडे की किताब, ‘फ्राम एड टू रीकोलोनाइजेशन’ (1972) की भारत में लोकप्रियता का हमें आज भी स्मरण है।



इस सिलसिले में हमें फिर गुन्नार मिर्डल की बात याद आती है, जब वह लिखता है कि इधर के सालों में, जब से दक्षिण एशिया के प्रति पश्चिम में कुछ रुचि बढ़ी है, इन विकसित देशों के शोधार्थियों का दक्षिण एशिया के प्रति नजरिया एक बाहरी व्यक्ति का नजरिया रहा है। मिर्डल उनके इस बाहरीपन को इन देशों के वस्तुनिष्ठ अध्ययन के लिये वरदान मानते हुए कहते है कि इस नजरिये में वही फर्क है, जैसे दांत के दर्द के प्रति एक रोगी के नजरिये और एक डाक्टर के नजरिये में फर्क होता है। वे मानते हैं कि संभव है, बाहरी व्यक्ति की दृष्टि में उथलापन हो, लेकिन दृष्टि का उथलापन तो इन देशों के अन्दुरूनी व्यक्ति की दृष्टि में भी हो सकता है।

बहरहाल, हमारी समझ में मूल बात रोग की पहचान और उसके निदान के प्रति डाक्टर की निष्ठा और संजीदगी में है। और, सभी उपनिवेशों के लोगों के जीवन का अनुभव इस बात का गवाह है कि उपनिवेशवादियों का बाहरीपन कभी भी उपनिवेशों की जनता के प्रति सहानुभूति और संजीदगी का परिचय नहीं दे सकता है। ऐसे चिकित्सक से कैसे कोई किसी भलाई की उम्मीद रख सकता है !

आज नोटबंदी के सिलसिले में हमारे दिमाग में ये सारी बातें अकारण ही नहीं आ रही है। इस पूरे विषय में हमें जो सबसे अधिक परेशान करने वाली बात लग रही है, वह है मोदी जी और उनकी पार्टी का भारत के लोगों की दुर्दशा के प्रति एक बाहरी व्यक्ति की तरह का निष्ठुरता से भरा उदासीनता वाला नजरिया। इनके सारे तर्कों से, डिजिटलाइजेशन, कैशलेस आदि की तरह की बातों से, भारतीय जीवन के बारे में इनकी पूरी समझ के ब्यौरों से एक बात साफ है कि उनमें भारत के लोगों और उनके जीवन के प्रति लगभग एक वैसा ही नफरत का भाव भरा हुआ है, जैसा कि पश्चिम के औपनिवेशिक मानसिकता वाले लोगों का है। इस देश के करोड़ों गरीब लोगों के जीवन से उनका रत्ती भर भी सरोकार नहीं है। सब नष्ट हो जाए, पश्चिम एशिया के देशों की तरह यह देश भी धूलिसात हो जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ विकास का वह मॉडल कायम हो जाए, जिसे पश्चिम के लोगों ने एक आदर्श मॉडल मान रखा है, और जिसे इन्होंने अपने प्राणों में बसा रखा है !



मोदी जी का त्राहिमाम करते लोगों के प्रति जो निर्दय, औपनिवेशिक शासकों वाला भाव है, वह शायद इसलिये भी है क्योंकि वे जिस राजनीतिक विचारधारा की उपज है, वह विचारधारा उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत के लोगों की आजादी की लड़ाई के विरोध के अंदर से पैदा हुई है। यही वजह है कि हमें आज कांग्रेस, वामपंथी और दूसरी सभी पार्टियां, जिनकी जड़ें किसी न किसी प्रकार से भारत की आजादी की लड़ाई में रही है, मोदी पार्टी की तुलना में हर लिहाज से ज्यादा बेहतर और उचित जान पड़ती है। भ्रष्टाचार आदि के मामले तो भारत का हर आदमी जानता है कि बीजेपी किसी भी दूसरी पार्टी से इस मामले में दो कदम आगे ही है, कम नहीं। वर्ना हजारों करोड़ रुपये के खर्च से मोदी जी सत्ता पर न आए होते ! लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि आज मोदी पार्टी बन चुकी बीजेपी ने वस्तुत: भारत में औपनिवेशिक शासकों की पार्टी का रूप ले लिया दिखाई पड़ता है।

इसीलिये, हमने एक मित्र Harsh Deo की पोस्ट पर, जिसमें उन्होंने यूपी में अमित शाह की सांसे फूलने की बात कही है, लिखा है कि बीजेपी को हराना आज अंग्रेजों को हराने के समान है। यही वह बिन्दु है, जहां भारत के लोगों की आज की दुर्दशा के प्रति पश्चिमी मीडिया की उदासीनता और भारत सरकार की निष्ठुरता में हमें साफ तौर पर एक मेल दिखाई देता है।





गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

सौ सौ चूहे खायके बिल्ली हज को चली


(प्रधानमंत्री के एक उजड्ड कदम की प्रशंसा में स्वपन दासगुप्त के लेख पर एक प्रतिक्रिया)


-अरुण माहेश्वरी

आज के सभी अखबारों की सुर्खियों में यह खबर छाई हुई है कि राहुल गांधी को लोक सभा में इसलिये नहीं बोलने दिया जा रहा है क्योंकि वे प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार के ऐसे विस्फोटक तथ्यों को सदन में रखने वाले हैं जिनसे प्रधानमंत्री का ‘बैलून फट जायेगा’। ‘आनंदबाजार पत्रिका’ में  प्रधानमंत्री के ऐसे कुछ अपराधों की सूची भी दी गई है कि उन्होंने आदित्य बिड़ला समूह से 25 करोड़ रुपये की घूस ली ; सहारा समूह से 40 करोड़ लिये ; गुजरात में 20 हजार करोड़ का गैस भ्रष्टाचार किया ; अडानी समूल को 200 करोड़ का जुर्माना माफ करवा दिया ; और ई वालेट कंपनियों की मदद की। जब अखबारों में ऐसी खबरे छाई हुई हैं तभी आज के ‘टेलिग्राफ’ में भाजपाई सांसद और संविधान विशेषज्ञ राजीव धवन के शब्दों में एक खींसे निपोड़ने वाले पत्रकार स्वपन दासगुप्त का लेख छपा है - बेहतरी के लिये परिवर्तन ( Change for the better)। इसमें उन्होंने लिखा है ‘‘ इतिहास में ऐसे समय आते हैं जब जनतंत्र में भी परिवर्तन को लाने के लिये डंडे का प्रयोग करना पड़ता है।’’ (There are times in history when it becomes necessary to force change, even in a democracy by wielding a stick.)

अपने लेख में दासगुप्त जीवन के उन छोटे-छोटे अनुभवों का हवाला देते हैं कि कैसे एक भारतीय आदमी जीवन में हमेशा छोटी-छोटी बेइमानियों के चक्कर में रहता है। हीथ्रो हवाई अड्डे पर कस्टम ड्युटी से जुड़ी ऐसी ही एक भारतीय की बेईमानी की कहानी कहते हुए दासगुप्त ने लिखा है कि जब उन्होंने इस किस्से को एक अंग्रेज को बताया तो वह अवाक रह गया। और दासगुप्त को सबसे चौंकाने वाली बात यह लगी कि वह अंग्रेज "जीवन में कभी भी कानून का पालन न करके किसी प्रकार की बेईमानी करने की सोचता भी नहीं है।"

दासगुप्त अपने इस महान आत्मज्ञान की पोल खुद ही अपने लेख में इतिहास के उस अध्याय का वर्णन करके खोल देते हैं, जब वे भारत में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया के शासन का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि ‘‘कंपनी के अधिकारियों नेे भ्रष्टाचार और घूसखोरी के जो विषाणु इस समाज में डाल दिये थे वे कंपनी के शासन के अंत और रानी के शासन के बाद भी जीवित रह गये हैं।’’ (The corruption and venality the Company’s officials injected into society outlived its dissolution and the direct rule of the Crown.)

कहने का तात्पर्य यह है कि जिन अंग्रेजों ने छूत के इस रोग को हमारे समाज को दिया, स्वपन दासगुप्त उनसे ही सीखने की, ‘‘ कानून का पालन न करके किसी प्रकार की बेईमानी करने की सोच तक न पाने की’’ की सीख लेने का नुस्खा दे रहे हैं।

चौतीस साल पहले, 1982 में गुन्नार मिर्डल का तीन खंडों में महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुआ था ‘एशियन ड्रामा’। मिर्डल ने इसमें भारत सहित दक्षिण एशिया के दूसरे देशों को सड़े हुए देश ( Soft State)  कहा था। उसमें साफ शब्दों में यह भी कहा गया था कि
‘‘दक्षिण एशिया में आज जो नाटक चल रहा है, वह तेजी से अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। तनाव बढ़ रहा है : आर्थिक, सामाजिक ओर राजनीतिक तनाव।
’’कुछ अंश तक हम सभी इस नाटक में भागीदार हैं।’’
(The action in this drama is speeding towards a climax. Tension is mounting : economically, socially, and politically.
To some degree all of us are participants in this drama.)

और, भ्रष्टाचार और दुराचार के नोटबंदी वाले इस चरम मुकाम पर, जब कॉरपोरेट के हित में एक प्रधानमंत्री पूरी नग्नता के साथ उतर कर आम जनता की सारी संपदा को जबर्दस्ती लूट कर उनकी तिजोरियों की ओर ठेल देने पर आमादा है ; जब अलि एक्सप्रेस की तरह की एक चीन में स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी के नियंत्रणाधीन पेटीएम, या अंबानी के जियो पे या ऐसी ही दूसरी निजी कंपनियों और बड़े-बड़े पूंजीपतियों के कर्जोंं को माफ करने के काम में लगी हुई बैंकों के खजाने में देश के घरों में जमा सारे धन को पहुंचा कर नाटक यह किया जा रहा है कि इससे देश का ‘आत्मिक उत्थान’ होगा, इसके रंध्र-रंघ्र में फैल चुके भष्टाचार के जीवाणुओं का नाश होगा, तब इस नाटक के पीछे के मिथ्याचार को क्या कहा जायेगा ! यह व्यक्ति को मार कर उसे जीवन के जंजाल से मुक्त कराने का धार्मिक प्रवंचना का खेल नही तो और क्या है ?

और, स्वपन दासगुप्ता इस काम के लिये सरकार के द्वारा जनता के खिलाफ 'डंडे का इस्तेमाल करने' का अधिकार की मांग कर रहे हैं ! इसे कहते हैं, हिटलरशाही की अगवानी करने वाले एक बिक चुके बुद्धिजीवी की बौद्धिक कसरत। ये तमाम प्रकार के दलालों के समूह बनायेंगे एक ईमानदार भारत ! दासगुप्त ने नोटबंदी को एक सबसे दुस्साहसी कदम कहा है, हम इसे उसी का पर्यायवाची, एक सबसे उजड्ड कदम कहेंगे।



बुधवार, 14 दिसंबर 2016

ये खुशफहमियों के फेरीवाले !


-अरुण माहेश्वरी

कुछ आंकड़ेबाज अर्थशास्त्री नोटबंदी से ग़रीब लोगों की ज़िंदगी में मची हुई तबाही को यह कह कर हंस के उड़ा रहे हैं कि इससे दूरगामी परिणाम अच्छे मिलेंगे । वे बताते हैं इससे बैंकों के पास काफी रुपया इकट्ठा हो जायेगा । बैंक व्याज की दरों को कम कर पायेगी। होम लोन लेने वालों को सहूलियत मिलेगी । रीयल स्टेट में भारी तेज़ी आयेगी । और सामयिक तौर पर अर्थ-व्यवस्था को धक्का लगने पर भी वह तेज़ी के साथ फिर से पटरी पर लौट कर भागने लगेगी ।

भारी उत्साह से बयान की जा रही अपनी इस पूरी कहानी में बड़ी चालाकी से वे इस प्रमुख बात को छिपा लेते हैं कि अर्थ-व्यवस्था में किये जा रहे इन तमाम प्रयोगों का सारा बोझ देश के ग़रीब मज़दूरों, किसानों और जिन्हें अर्थ-व्यवस्था के अनौपचारिक हिस्से से जुड़े लोग कहा जाता है, उनके सिर पर लाद दिया जा रहा है । पहले से ही उनकी परेशानियों से भरी ज़िंदगी को पूरी तरह से तबाह करके उन्हें भुखमरी की दिशा में ठेल दिया जा रहा है ।

दूसरी इस बड़ी बात को भी छिपाया जा रहा है कि उनके बताये लाभों में देश के किसान-मज़दूरों का कोई स्थान नहीं है । आज सारी दुनिया में अधिक से अधिक ऑटोमेशन पर टिके विकास को रोजगारविहीन विकास के रूप में चिन्हित किया जा रहा है । क्या इन महोदयों के 'दूरगामी' लाभ का तात्पर्य यही है कि इससे एक झटके में बहुत बड़ी संख्या में रोज़गारों को ख़त्म करके ऑटोमेशन के रास्ते को सुगम बनाया गया है ?

तीसरी जिस प्रमुख बात पर चर्चा करने से वे क़तरा रहे हैं, वह है किसानों की बात । नोटबंदी ने कृषि अर्थ/व्यवस्था को सबसे बड़ा नुक़सान पहुँचाया है । क्या वे इस बात की गारंटी करेंगे कि भारत की बैंकिंग प्रणाली जो अब तक कृषि क्षेत्र से धन की निकासी का औपनिवेशिक ढंग का काम करती रही है, वह अब कृषि क्षेत्र में निवेश का काम करने लगेगी ? वे सहकारी बैंकों के बारे में भी चुप्पी साधे हुए हैं जो सीधे तौर पर किसानों के हितों को साधते रहे हैं । इस नोटबंदी के साथ ही इन कृषि क्षेत्र के सहकारी बैंकों को क्यों पंगु बना दिया गया ?

आज राज्य सभा टीवी पर राज्य सभा के मनोनीत सदस्य डा. नरेंद्र जाधव की नोटबंदी के दूरगामी सुफल के बारे में झूठी खुशफहमियों को सुन कर हमारे मन में तत्काल ये सवाल उठे । वे राज्य सभा टीवी पर अपने साक्षात्कार के वक़्त बहुत खिलखिला रहे थे । वे आंकड़ों से जुड़ी संवेदनहीनता को मूर्त कर रहे थे ।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दाव पर लगी है मोदी जी की नैतिकता, न कि विपक्ष की !


-अरुण माहेश्वरी

नोटबंदी के आज 33वें दिन भी टेलिविजन चैनल एटीएम मशीनों पर भारी भीड़ के उमड़ने के दृश्य दिखा रहे हैं। मोदी जी के मांगे हुए पचास दिनों में अब सिर्फ सत्रह दिन बचे रह गये हैं। लेकिन स्थिति में सुधार के बजाय ऐसा लगता है जैसे मोदी जी ने पूरे राष्ट्र को एक अजीब से घुमावदार रास्ते पर उतार दिया है जिसमें 8 नवंबर को पचास दिन के बाद का जो स्वर्णिम काल बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा था, अब जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, वह और दूर, और दूर जाता दिखाई देने लगा है। जाहिर है, एक ऐसा सपना जो कभी पूरा नहीं होता ! 

गंतव्य जितना दूर हो रहा है, इसी अनुपात में जनसभाओं में मोदी जी की तालियां, उनका उछलना और कूट ढंग से हंसना बढ़ता जा रहा है। वे विरोधियों को नाना प्रकार की अजीबोगरीब नैतिक चुनौतियां दे रहे हैं। कहते हैं, हमारे इस अभियान का विरोध करने के पहले दस लोगों को कैसलेश होने की महत्ता के बारे में समझाओं। नहीं तो क्या हक है तुम्हें काला धन के हमारे अभियान के खिलाफ बोलने का ! पहले अपने गरेबां में झांको, अपनी आत्म-समीक्षा करो और फिर देश और समाज की नीतियों के बारे में कुछ कहने का हक हासिल करो। 

‘अंतहीन आत्म-समीक्षा’ के चक्रव्यूह में फंसा कर आदमी से किसी भी सार्वजनिक विमर्श में शामिल होने का हक छीन लेना, सभी आततायी शासकों का हमेशा का एक आजमाया हुआ फार्मूला है। जैसे, हम जानते हैं, कई पार्टियों का मध्यवर्गीय नेतृत्व अपने मध्यवर्गीय अनुयायियों को हमेशा टुटपुंजियापन से मुक्त होने ओर डीक्लास होने की एक अंतहीन नैतिक कसरत में उलझा कर रखता है। जैसे हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध जीवन भर अपने आत्म-संघर्ष में उलझे रहे और बाद में जब लोगों ने उनके इस आत्म-संघर्ष को ही अपने संघर्ष की पताका बना लिया तो साहित्य जगत के नेता डा. रामविलास शर्मा ने उन्हें मध्यवर्ग की ‘दुर्बलता’ से उपजे अस्तित्ववाद से जोड़ कर अपनी कलम की निब तोड़ दी। उन्होंने यहां तक लिख दिया कि जिस दुर्बलता के चलते फ्रांस हिटलर का जरा सा भी प्रतिरोध नहीं कर पाया, वह इसी अस्तित्ववाद की पैदाईश थी।  

बहरहाल, आज विपक्ष के लिये जरूरत मोदी जी की किसी नैतिक चुनौती को जरा सा भी तवज्जो देने के बजाय इस सरकार को होश में लाने के लिये जोरदार आंदोलन की है। दाव पर लगी हुई है मोदी जी की नैतिकता। जरूरत है, आम लोगों की विपत्ति पर हंस रहे प्रधानमंत्री को सच का आईना दिखाने की है। बहस को किसी अंजाम तक पहुंचाने की, नोटबंदी के पक्षधरों को शर्मसार करने की है। यह समय तेज-तर्रार भाषणों से कहीं ज्यादा तेज और एकजुट कार्रवाइयों का है। मोदी जी रोज जन-सभाओं में एकतरफा भाषणों से अपने प्रकार का बहस-बहस वाला खेल खेल ही रहे हैं। इसका सही प्रत्युत्तर भी संसद के बाहर ही दिया जा सकेगा। 










रविवार, 11 दिसंबर 2016

मोदी जी के इस महा घपले पर फिर एक बार ...

-अरुण माहेश्वरी



भारत में नोटबंदी के क़दम को दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका 'इकोनॉमिस्ट' ने अपने ताज़ा अंक (3 दिसंबर) में अच्छे उद्देश्य से बर्बादी लाने वाला एक अधकचरा कदम बताया है । ‘इकोनोमिस्ट’ के इस लेख में दुनिया के उन देशों का उल्लेख है जिनकी सरकारें ऐसी कार्रवाई करके अपने देशों को बर्बाद कर चुकी हैं । आज तक एक भी देश को ऐसे क़दम से कोई लाभ नहीं हुआ है । "फिर भी मोदी ने उनसे कोई सबक़ नहीं लिया और एक ऐसा घपला कर दिया जिससे उसके घोषित उद्देश्यों के पूरा होने पर भी देश को अनावश्यक नुक़सान होगा ।"

'इकोनॉमिस्ट' ने मोदी जी को ऐसी अफ़रा-तफरी मचाने वाले क़दम को वापस लेने की भी सलाह दी है । इसमें उनके इस प्रकार के बयानों का मज़ाक़ उड़ाया गया है कि धनी लोग नींद की गोलियों के लिये भाग रहे हैं और ग़रीब चैन की बंशी बजा रहे हैं । साफ शब्दों में कहा गया है कि पचास दिन की प्रतीक्षा के बाद भारत में कोई स्वर्ग नहीं उतरने वाला है । इस टिप्पणी के अंत में इस बात पर संतोष व्यक्त किया गया है कि भारत में उत्तर कोरिया की तरह तानाशाही नहीं है । यहाँ के लोग चुनावों में मोदी के द्वारा मचाई गयी इस अफ़रा-तफरी का पूरा जवाब देंगे ।

ग़ौर करने लायक बात यह है कि 8 नवंबर को घोषित नोटबंदी पर 'इकोनॉमिस्ट' की लगभग महीने भर बाद, शायद यह पहली प्रतिक्रिया थी ।

इसीप्रकार, लगभग एक महीने बाद रिजर्व बैंक ने भी इस विषय पर अपनी चुप्पी को तोड़ा है। हांलाकि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इस कदम को एक सुचिंतित कदम बताया है, लेकिन इसके प्रभाव से अपनी मौद्रिक नीतियों को दूर रखना ही उचित समझा है । 7 दिसंबर तक, नोटबंदी के बाद बैंकों में साढ़े ग्यारह लाख करोड़ नगद जमा हो चुके थे, लेकिन उम्मीद के विपरीत आरबीआई ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में कोई परिवर्तन नहीं करने का निर्णय लिया है । अर्थात, आरबीआई का यह साफ़ अनुमान है कि आज बैंकों के पास जो रुपया इकट्ठा हो रहा है वह एक नितांत सामयिक मामला है । करेंसी की आपूर्ति में थोड़ी सी सहूलियत होने के साथ ही यह पूरी राशि कपूर की तरह बैंकों से उड़ जायेगी ।

इसीलिये नोटबंदी से बैंकों में लाई गई राशि से आरबीआई अपनी नीति में किसी प्रकार के दीर्घकालीन प्रभाव के परिवर्तन करने के पक्ष में नहीं है । बैंकों में नगदी की भरमार की सामयिक समस्या से निपटने की सारी ज़िम्मेदारी उसने बैंकों के ही सिर पर मढ़ दी है । अब ब्याज की दरों को गिराने अथवा बढ़ाने से जुड़ा सारा जोखिम सभी बैंकों को खुद पर लेना होगा । इसमें आरबीआई की उनको कोई मदद नहीं मिलेगी ।

सुनने में आया था कि आरबीआई ने सरकार को बाज़ार को स्थिर करने के लिये बाज़ार से तीन-चार लाख करोड़ रुपये उठाने की एक योजना लागू करने का प्रस्ताव दिया था । लेकिन ऐसी किसी भी मार्केट स्टैबिलाइजेशन स्कीम को लाने के लिये सरकार को संसद की मंज़ूरी की ज़रूरत पड़ेगी । जब मोदी जी खुद संसद से भाग रहे हैं, आयकर विधेयक का काँटा अभी अटका हुआ ही है, तब एक और ऐसी वित्तीय स्कीम के लिये संसद में जाने की हिम्मत जुटाना इस सरकार के वश में नहीं है । इसीलिये आरबीआई ने भी बैंकों को उनकी जमा राशि पर किसी प्रकार का लाभ देने से इंकार कर दिया है ।

आरबीआई ने इसके साथ ही इतना जरूर स्वीकारा कि नोटबंदी का विकास की गति पर धक्का लगा है,  जीडीपी में वृद्धि की दर में 0.5 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। लेकिन इससे मुद्रा-स्फीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसके बारे में उसने कोई आकलन नहीं किया है ।

नोटबंदी के महीने भर बाद आरबीआई का यह रुख़ मोदी सरकार के नोटबंदी के 'क्रांतिकारी' क़दम के मुँह पर एक बड़ा तमाचा है । सबको अब यही लग रहा है कि अंततोगत्वा यह क़दम भारत की जनता के जीवन में तबाही लाने वाला और एक विकासमान अर्थ-व्यवस्था में अंतर्घात करने वाला क़दम साबित होगा जिसके दुष्प्रभाव से कोई नहीं बचेगा, बैंक भी नहीं । इसमें लाभ होगा सिर्फ पेटीएम आदि की तरह की कुछ ग़ैर-बैंकिंग निजी वित्तीय कंपनियों को ।

अब नोटबंदी को मोदी जी ने पेटीएम जैसी कंपनियों के हित में कैसलेश का अभियान बना दिया है । वे 'कैशलेस' का ऐसे उत्साह के साथ प्रचार करते हैं जैसे नगदी-विहीनता का अर्थ है 'शोषण-विहीनता' ! अर्थशास्त्र की इस अभिनव खोज के लिये क्या मोदी जी नोबेल पुरस्कार के हक़दार नहीं है ?

हाल में मुरादाबाद में अपने एक भाषण में मोदी जी जो तमाम असंलग्न बातें कह रहे थे, उनसे बार-बार उनके व्यक्तित्व का परस्पर-विरोधी चरित्र ही खुल कर सामने आ रहा था। सब जानते हैं, बड़े इजारेदार पूंजीपति तो इनकी आस्था के विषय है। अन्यथा मुकेश अंबानी ने उनकी पीठ पर हाथ न रखा होता। और मध्यवर्ग पूंजीवाद का आधार होने के नाते, मोदी जी अपने को उसका प्रतिनिधि मानते हैं। लेकिन जिसे मध्यवर्ग की राजनीतिक शक्ति कहते हैं, विवेक और बुद्धि के विचारों की शक्ति, उसके प्रति मोदी जी वैर-भाव भी रखते हैं। मध्यवर्ग रहे, लेकिन अपनी ऐतिहासिक राजनीतिक-सामाजिक भूमिका की विशिष्टता को छोड़ कर, मोदी-मोदी का जाप करने वाली भक्तों की फौज के रूप में। मोदी जी पूंजीवाद के चौखटे में किसानों, दलितों की सेवा करना चाहते हैं और इस चक्कर में कभी-कभी ऐसी मुद्राएं भी अपना लेते हैं जिन्हें देख कर वामपंथियों का भी सर चकराने लगे। लेकिन, सर्वोपरि, वे भारत के लंपट राजनीतिज्ञों के ही भाजपा नामक एक गिरोह के प्रतिनिधि है, जो हमेशा सत्ता में आकर राजकोष से अपने लिये लौटरियां निकलवाने की फिराक में रहा करते हैं।

जाहिर है, इतनी सारी परस्पर-विरोधी भूमिकाओं को निभाने वाले मोदी जी की सरकार भी उतनी ही परस्पर-विरोधिताओं से भरी होगी। वह हमेशा अंधेरे में तीर चलाने के लिये अभिशप्त है। कभी इस ओर दौड़ती है, कभी उस ओर। कभी इस वर्ग को पकड़ती है, तो कभी उसको। मोदी जी सबके हितैषी बनना चाहते हैं, जो मुमकिन नहीं है। इसीलिये वे एक प्रकार से समूचे भारत को चुरा कर उसे फिर से भारतवासियों को लौटाने और सबको कृत-कृतार्थ करने का खेल खेल रहे हैं।

नोटबंदी से उन्होंने देश भर के लोगों के धन पर दिन-दहाड़े डाका डाल कर उन्हें भिखारियों की तरह बैंकों के सामने कतार में खड़ा कर दिया और अब किश्तों में उनके धन को उन्हें दे रहे हैं; अपनी दयालुता की डुगडुगी बजवा रहे हैं। भारत को इस प्रकार अपने अधीन करके फिर उसे भारत को ही लौटाने के इस मायावी लेन-देन के बीच हम देख रहे हैं कि कमीशन के तौर पर कुछ प्रतिशत पेटिएम, रिलायंस, अडानी, माल्या की तरह के लोगों और कंपनियों और देशी-विदेशी बैंकों की जेबों में अलग से पहुंचा दिया जा रहा है।

कहना न होगा, यह और कुछ नहीं, बाज की तरह ऊंची उड़ान का धोखा देने वाले एक कौंवे की छुद्र उड़ान जैसा है जो अंत में अपने चंद खैर-ख्वाहों की जेब गर्म करने में ही अपनी बहादुरी समझता है। मुरादाबाद में भारत का प्रधानमंत्री लोगों को खुले आम अनैतिकता का पाठ भी पढ़ा रहा था। वह आम लोगों को कह रहा था कि दूसरों के रुपये मार कर बैठ जाओ। ‘बड़े लोग अब गरीबों के पैरों पर गिरे हुए हैं !’ लाईन में खड़े लोगों का, और आम भारतवासियों का मजाक उड़ाते हुए कह रहे थे अब तो भिखारी भी कार्ड से भीख लेने लगा है। मुरादाबाद के भाषण में उनमें समा रहा डर भी बोल रहा था, जब उन्होंने अपनी ‘फकीरी’ के हवाले से कभी भी झोला उठा कर चल देने की बात कही।

अभी की स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री लोगों से कह रहे है पेटीएम या दूसरी प्लास्टिक मनि का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करो। दूसरी ओर आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल लोगों से नगदी का ज्यादा इस्तेमाल करने के लिये कह रहे हैं ताकि नयी करेंसी बाज़ार में चलन में आ सके । सवाल उठता है कि क्या सरकार सचमुच पूरी तरह से दिशाहीन हो चुकी है ?

रोजाना की जाने वाली एक के बाद एक नई घोषणाओं के साथ अरुण जेटली ने कार्ड के ज़रिये भुगतान के बारे में कई प्रकार की छूट देने की घोषणा की है । जाहिर है कि नोटबंदी के संदर्भ में सरकार का अब पूरा ध्यान इस बात पर है कि नगदी की रक्षा करो । नगदी बचाने के चक्कर में दी जा रही रियायतों से सरकार के राजस्व पर जो अतिरिक्त भार आयेगा, क्या इसका कोई हिसाब किया जा रहा है ? नोटबंदी पर पड़ रहे ख़र्च में यह एक और अतिरिक्त बोझ जोड़ दिया गया है । तब क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि मोदी जी ने अपनी सनक के लिये देश के राजस्व को कितने रुपये का नुकसान पहुंचाया है जो सरासर एक आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है।


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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

कैसलेशनेस पर एक अवांतर दार्शनिक चर्चा


-अरुण माहेश्वरी



कार्ल मार्क्स ने ‘पूंजी’ के पहले खंड के पहले अध्याय में ही पण्य (माल) और उसके मूल्य के विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा है कि वस्तु में मूल्य उसमें लगने वाले श्रम की मात्रा से उत्पन्न होता है ; श्रम ही है जो प्रत्येक माल में जरूर पाया जाता है 1 । वे यह भी कहते है कि माल एक रहस्यमयी वस्तु इसलिये है क्योंकि मनुष्यों के श्रम का वह सामाजिक स्वरूप उनको अपने श्रम के उत्पाद का वस्तुगत लक्षण प्रतीत होता है 2 । इसके साथ ही उन्होंने एक बहुत उल्लेखनीय बात कही थी कि ‘‘ श्रम से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं के मूल्यों के परिमाण केवल सांयोगिक  ढंग से निर्धारित होते हैं।3 ('प्रतीत' और 'सांयोगिकता' पर जोर हमारा)

मार्क्स के इस कथन में हमें गौर करने की बात यह लगती है कि उन्हें माल श्रम के उत्पाद के वस्तुगत लक्षण की ‘प्रतीति’ (men’s labour appears to them as …) की तरह ही पण्य के मूल्य का निर्धारण भी महज एक ‘संयोग’ (accident) की तरह प्रतीत हुआ था।

पण्य के बाद ही मार्क्स ‘पूंजी’ के प्रारंभ में विनिमय (Exchange) से अपने तात्पर्य को बताते हुए तीसरे अध्याय में ‘मुद्रा या मालों का चलन’( Money, Or the Circulation of Commodities) के बारे में आते हैं। कहना न होगा, यह मुद्रा ही है, जो हमारे आज के भारत के संकट का एक चर्चित, मूल विषय बनी हुई है। वे मुद्रा के बारे में लिखते हैं कि ‘‘इसका मुख्य काम यह है कि वह पण्यों को उनके मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए सामग्री प्रदान करे।’’4

इसप्रकार, इस पूरे क्रम में देखें तो पायेंगे कि मुद्रा का मुख्य काम है श्रम के उत्पाद की वस्तुगत ‘प्रतीति’ के ‘सांयोगिक’ मूल्यों की अभिव्यक्ति की सामग्री प्रदान करना। अर्थात मुद्रा एक (श्रम के उत्पाद की) प्रतीति पर घटित (मूल्य के) संयोग की वस्तुगत अभिव्यक्ति है। गौर करने की चीज है, प्रतीति और संयोग, दोनों ही मनुष्यों के रहस्य-जगत की चीजें हैं, उनके अन्तर्मनोजगत की चीजें। और मुद्रा है इन रहस्यों की एक ठोस अभिव्यक्ति !

समय-समय पर मुद्रा के रूप बदलते रहे हैं, यह सब जानते हैं। पहले यह तांबा-सोना-चांदी की होती थी। तुगलक ने चमड़े की मुद्रा भी चलाई। फिर कागज की चल पड़ी, सोने के समतुल्य भंडार के आधार पर। केन्स ने उसे सोने आदि की तरह की किसी भी मूल्यवान वस्तु के समतुल्य-भंडार की बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर दिया। इससे कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा। और, अब तो दुनिया में प्लास्टिक मनि का चलन हो रहा है। हमारे मोदी जी उसकी ओर कुछ इस प्रकार लपक रहे हैं मानो आदमी की प्रगति का राज उसकी मुद्रा में ही छिपा हुआ है !

हम जब ऊपर की चर्चा के संदर्भ में इस प्लास्टिक मनि पर सोचते हैं तो लगता है कि अब तक की सभी मुद्राओं के जरिये ‘प्रतीति’ और ‘संयोग’ की जिन अरूप परिघटनाओं को एक ठोस रूप दिया गया है, अब क्रमश: आदमी इन सभी अरूपताओं को अरूपताओं के ही, अर्थात मनुष्यों के कल्पना संसार तक में ही सीमित रखना चाहने लगा है। यह वास्तविक अर्थ-संसार के रहस्यमय, मनुष्यों के मनोजगत के कार्य-व्यापारों में पूर्ण रूपांतरण की एक बहुत ही दिलचस्प लेकिन असंभव सी कोशिश दिखाई देती है।

इसे अर्थनीतिशास्त्र का एक ऐसा उपक्रम भी कहा जा सकता है जिसमें आर्थिक सोच-विचार के बीच से मनुष्यों के भौतिक अस्तित्व को पूरी तरह से निष्क्रमित कर दिया जाएगा !

आप क्या कहेंगे इस पूरे उपक्रम को ! कृत्रिम बुद्धि वाले उत्पादन-यंत्रों के जमाने का एक पूरी तरह से कृत्रिम अर्थशास्त्र ! मनुष्य रहित अर्थशास्त्र ! द्रोन और मनुष्य रहित तमाम हथियारों के बल पर विश्व-प्रभुत्व की राजनीति से जुड़ा अर्थशास्त्र ! एक शब्द में, अन्तर्बाह्य, हर स्तर पर एक संपूर्ण ‘मानव-द्रोही’ अर्थशास्त्र ! 
हमारे मोदी जी को जीवन का ऐसा मानव-द्रोही रूप सचमुच बहुत लुभाता होगा ! अपनी फकीरी के हवाले से वे यही तो कह रहे हैं कि मुद्रा को लेकर लोगों में क्यों है इतना उन्माद ! हर उन्माद का सबसे डरावना पहलू तो यही होता है कि आप जितना उसकी तह में जायेंगे, उतना ही कम आपके हाथ कुछ लगेगा। लेकिन मोदीजी को हम क्या कहें। हम तो उनकी तरह साधु-संत है नहीं, जिनके लिये जीवन फानी होता हैं ! हमारा सच तो यह है कि यह उन्माद ही हमारा जीवन है। हम मरना नहीं चाहते, कि जीते जी मृत्यु का उत्सव मनाने लगे!

बहरहाल, हमारा मित्रों से यही अनुरोध है कि हमारी इस अवांतर किस्म की दार्शनिक चर्चा को अभी की नोटबंदी से जोड़ कर कत्तई न देखा जाए, क्योंकि तब यह कतारों में मर रहे और नगदी के अभाव में जीवन के लिये तरस रहे लोगों की त्रासद सचाई से मुंह मोड़ने की एक अमानवीय कोशिश ही कही जायेगी। सच यह है कि पण्य को श्रम की एक ‘प्रतीति’ और उसके मूल्य को महज ‘संयोग’ बनाने वाले पूंजीवादी तंत्र ने ही मनुष्य के जीवन को तमाम प्रकार की जड़-पूजाओं (fetishisms) से लाद रखा है। मोदी जी इस तंत्र के एक मुचे हुए पुर्जे भर है। वे संसार को मिथ्या साबित करने वाले इस खेल पर तालियां बजा सकते हैं, हम तो सिर्फ दुख और गुस्सा ही जाहिर करेंगे।

संदर्भ :
1. “As values, all commodities are only definite masses of congealed labour time.”…The secret of the expression of value, namely, that all kinds of labour are equal and equivalent, because, and so far as they are human labour in general, cannot be deciphered, until the notion of human equality has already acquired the fixity of a popular prejudice.
2. A commodity is therefore a mysterious thing, simply because in it the social character of men’s labour appears to them as an objective character stamped upon the product of that labour;
3. Its discovery, while removing all appearance of mere accidentality from the determination of the magnitude of the values of products,
4. The first chief function of money is to supply commodities with the material for the expression of their values,

इस टिप्पणी के पहले दो पैरा का किंचित स्पष्टीकरण -

यह अर्थ-शास्त्र के दो प्रमुख विषयों के संबंध के बारे में है । एक है माल और दूसरा है मुद्रा । माल अर्थात लोगों के उपयोग में आने वाली ऐसी चीज जिसके उत्पादन में आदमी की श्रम शक्ति लगती है । इसी श्रम शक्ति के निवेश को आम तौर पर माल के मूल्य का कारण माना जाता है । श्रम शक्ति ही एक ऐसी चीज है जो हर प्रकार के माल में कमोबेस पाई जाती है । अर्थशास्त्रियों का एक तबक़ा यह मानता है कि किसी भी माल का मूल्य उसमें लगने वाली श्रम शक्ति के परिमाण से तय होता है । इसी तरह से यह भी लोगों को लगता है कि माल के वस्तु रूप में ही उनका सामाजिक श्रम व्यक्त होता है । 

लेकिन मार्क्स कहते है कि माल के मूल्य में श्रम शक्ति की भूमिका होने के बावजूद सिर्फ वही बाज़ार में उसके विनिमय मूल्य को तय नहीं करती है । पूँजीवादी बाज़ार में माल के मूल्य का आधार कोई एक संघटक तत्व नहीं, बल्कि वह ऐसे ही, एक संयोग की तरह, सुविधा के अनुसार तय कर दिया जाता है । 

इस प्रकार, माल में सामाजिक श्रम की अभिव्यक्ति की 'प्रतीति' और माल के मूल्य के निर्धारण में एक प्रकार की 'संयोगिकता', मैंने अपनी टिप्पणी में इन दो चीज़ों को, जो ठोस नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मगत अवधारणाएँ है, उन्हें अपनी बात का आधार बनाया है । और इसी क्रम में 'मुद्रा' का प्रसंग आ जाता है जिसके ज़रिये मालों के मूल्य को अभिव्यक्ति मिलती है । 

इसी सिलसिले में हम देखते हैं कि सामाजिक श्रम के व्यक्त रूप की प्रतीति माल और उसके संयोगिक मूल्य की तरह की अवधारणामूलक चीज़ें बाज़ार में मुद्रा की तरह की एक ठोस चीज के ज़रिये व्यक्त होती है । अरूप चीज़ों का ठोस रूप । 

इसी आधार पर हमने यहाँ मुद्रा के अब तक के अनेक रूपों से लेकर प्लास्टिक मनि तक की यात्रा का जिक्र किया है जिसे अरूप चीज़ों की ठोस अभिव्यक्ति के बजाय अधिक से अधिक अरूप अभिव्यक्ति की दिशा में ही बढ़ने की कोशिश कहा गया है । 


आगे की बातें, अर्थ-चिंतन से मनुष्य की सत्ता को अलग रखने और कृत्रिम बुद्धि के आज के युग के साथ इस कोशिश के मेल की बातें तो शायद साफ़ है ।