शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

मोदी-शाह के अवसान के संकेत


—अरुण माहेश्वरी


महाराष्ट्र में अन्ततः उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ही ली । प्रधानमंत्री की लाख कोशिशों के बाद भी देवेन्द्र फड़नवीस मुख्यमंत्री नहीं रह पाए ।

महाराष्ट्र का यह पूरा घटनाक्रम बीजेपी के लिये महज किसी ऐसे जख्म की तरह नहीं है जिसकी टीस से कभी-कभी आदमी का पूरा शरीर हिल जाया करता है । वास्तव में यह उसके लिये आदमी की कल्पना में जीवन की सजी हुई पूरी बगिया के उजड़ जाने की तरह का एक भावनात्मक विषय है । चुनाव परिणाम आने के साथ ही बीजेपी ने शिव सेना को अपने पैरों तले दबा कर रखने की अजीब सी पैंतरेबाजी शुरू कर दी थी । जब यह साफ हो चुका था कि बीजेपी अकेले बहुमत के आंकड़ें से काफी दूर है और चुनाव में विपक्ष के दलों को उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है, अर्थात् जनता के रुख में पहले की सरकार के प्रति समर्थन कम हो रहा है, तब भी खुद नरेन्द्र मोदी ने अपने इस महत्वपूर्ण सहयोगी दल से बिना कोई बात किये एकतरफा घोषणा कर दी कि देवेन्द्र फडनवीस ही महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे । यह तब किया गया जब मोदी, शाह और सारी दुनिया को यह पता था कि शिव सेना के साथ भाजपा के रिश्ते में चुनाव के पहले से ही भारी तनाव चल रहा है ।

मोदी-शाह महाराष्ट्र के जरिये दुनिया को यही संदेश देना चाहते थे कि उनके मतों में कमी और विपक्ष की अप्रत्याशित सफलता के बावजूद राजनीति में उनकी धमक और पकड़ जरा भी कम नहीं हुई है । सीबीआई-ईडी-आईटी की उनकी डंडे की ताकत का कोई मुकाबला नहीं है । वे यहां से अपनी छाती को और भी चौड़ा करके सभी संवैधानिक संस्थाओं, बल्कि अदालतों तक भी अपने पूर्ण वर्चस्व को स्थापित करने के अभियान को और तेज करना चाहते थे । लेकिन इसके विपरीत भारत के संघीय ढांचे के राजनीतिक सत्य के सामने आने की संभावनाएं भी हम देख पा रहे थे जब शिव सेना ने शुरू से ही मोदी की इस एकतरफा घोषणा का विरोध करते हुए सत्ता में आधी-आधी भागीदारी की मांग पूरी ताकत से उठानी शुरू कर दी । मोदी-शाह ने शिव सेना के तेवर और उसकी मराठावाद की राजनीतिक पृष्ठभूमि  को पढ़ने में भारी चूक की । शिव सेना ने मोदी-शाह को खुली चुनौती दी और कहना न होगा, अंत में, शिव सेना ने सचमुच हवा से फुला कर रखे गये मोदी-शाह के बबुए में सूईं चुभाने का काम कर दिया ।

सीबीआई, ईडी,आईटी और अदालत तक को प्रभावित कर लेने की मांसपेशी की ताकत से इतराये हुए मोदी-अमित शाह अहंकार में यह भूल गये थे कि विचार से कहीं ज्यादा शारीरिक बल और अंतहीन वासनाएं ही आदमी के मतिभ्रम का प्रमुख कारण हुआ करती है । राज्यपालों के जरिये धोखे से अपनी सरकार बनवाने की उनकी पैंतरेबाजी के अतीत के अनुभव महाराष्ट्र में उनके लिये मददगार साबित नहीं हुए । तड़के सुबह चोरी-छिपे फड़नवीस को मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण कुल मिला कर राजनीतिक कदाचार और बेईमानी की एक और नजीर ही बना रह गया । उल्टे, देवेन्द्र फडनवीस और एनसीपी के अजित पवार के पूरे नाटक ने उद्धव ठाकरे की ताजपोशी को एक नया राजनीतिक औचित्य प्रदान किया और महाराष्ट्र में शिव सेना के नेतृत्व में तीन दलों के गठजोड़ की सरकार का बनना खुद में एक राजनीतिक संघर्ष का रूप ले लिया । इस गठजोड़ की सरकार के गठन के प्रति वहां की जनता में अन्यथा जो उदासीनता देखने को मिलती, उसे राजभवन की साजिश की कहानी ने एक तीव्र उत्साह में बदल दिया । शिव सेना, एनसीपी, कांग्रेस और वाम के बीच की एकता जैसे एक लड़ाई की आग में तप कर फ़ौलादी होती चली गई ।

फडनवीश को शपथ दिलाने के बारे में राज्यपाल के स्वेच्छाचार को जब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तब दो दिनों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का वह एक साधारण और अपेक्षित फैसला ही मोदी-शाह की पूरी भाजपा को अब जैसे पंगू बना देने का सबब बन चुका है । जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, उनके लिये यह कोई मामूली जख्म नहीं है । अपने पतन के दौर में प्रवेश कर चुकी भाजपा की राजनीति सांप्रदायिक विभाजन के अलावा चुनाव में हार कर भी अपनी सरकार बना लेने की तिकड़म में सिमटती जा रही है । आगे इस प्रकार की तिकड़म की संभावनाओं के अंत की कल्पना ही उसके लिये जानलेवा अवसाद का कारण बन सकती है । सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम निर्णय कानून की अपनी कायिक और आत्मिक, दोनों जरूरतों से संगतिपूर्ण था । अदालत की अपनी मर्यादा और लोकतंत्र के प्रति उसका दायित्व, दोनों का निर्वाह इसी प्रकार संभव था ।

एक दिन बाद ही विधान सभा में किसके साथ कितने विधायक है का परीक्षण कराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुए तीव्र राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए फडनवीस के लिये इस्तीफा देने के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया था । भाजपा घोड़ों की खरीद-बिक्री के कुछ और नये किस्सों से अपने को और भी कलंकित करती उसके पहले ही फडनवीस का इस्तीफा ही बुद्धिमत्ता थी और भाजपा ने कम से कम उस बुद्धमत्ता का परिचय दिया ।

महाराष्ट्र में विपरीत विचारों के दलों के बीच मोदी-शाह विरोधी यह एकता भारत की भावी राजनीति का एक बड़ा संकेत है । इस सरकार ने अपना एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करके जन-कल्याण की दिशा में काम करने का निर्णय लिया है । इसके साथ ही हमें यह भी उम्मीद है कि यह सरकार भीमाकोरेगांव के दलित आंदोलन में झूठे मामले बना कर फँसाये गये भारत के कुछ श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को न्याय दिलाने और उस मामले के असली अपराधियों को दंडित करने में भी अपनी मूलभूत जनतांत्रिक निष्ठाओं का परिचय देगी । उनका यह कदम भारत के सभी बुद्धिजीवियों की अभिव्यक्ति की आजादी पर इन दिनों पड़ रहे दबावों को कम करने में एक बड़ी भूमिका अदा करेगा ।

सोमवार, 25 नवंबर 2019

'हमारी सीमा आकाश तक है’


—अरुण माहेश्वरी


महाराष्ट्र में अजित पवार की जालसाजी, राष्ट्रपति शासन, रातो-रात फडनवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री की शपथ दिलाये जाने के बारे में सुप्रीम कोर्ट में जब बहस चल रही थी, तब भारत सरकार के वकील तुषार मेहता अपनी हमेशा की टेक के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को उसकी हैसियत और सीमा की याद दिलाते हुए कुछ इस प्रकार की दलील दे रहे थे मानो यह सब राजनीति के क्षेत्र का मामला है, सुप्रीम कोर्ट को इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए ; सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ दूसरे कानूनी विषयों पर ध्यान देना चाहिए । इस पर सुनवाई कर रही बेंच के एक सदस्य ने नाराजगी के स्वर में कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कोई सीमा नहीं है, ‘वह आकाश तक जाती है ।’

न्यायाधीश महोदय का यह कथन न्याय विवेक के उस बहुत ही बुनियादी सिद्धांत की पुनरुक्ति थी जो किसी लिखित-अलिखित शब्द या परिपाटी का मुहताज नहीं होता । वह मूलतः संविधान के निदेशक सिद्धांतों से निदेशित होता है । लेकिन कहने की बात और वास्तविकता में सिर्फ इसीलिये बहुत फर्क हुआ करता है क्योंकि निदेशक सिद्धांतों से चालित होने के नाम पर किसी प्रकार के न्यायिक स्वेच्छाचार को बल न मिले, इसीलिये न्याय खुद अपनी परिपाटियां तैयार करता हुआ उनकी चौखट के बंधन को अपना कर चला करता है, वही उसके लिये सुविधाजनक हुआ करता है । और, इस प्रकार असीम आकाश में नहीं, न्याय कुछ सुनिश्चित दायरों में ही काम करने का अभ्यस्त हो जाता है । यह उसके घर की अपनी चौखट की तरह है जिसमें वह अपने को निश्चिंत और सुरक्षित पाता है ।

न्याय प्रणाली की खुद की सुविधा के लिये तैयार कर ली गई इन चौखटों के चलते ही इस क्षेत्र में उसी प्रकार की एक पूरी विचारधारा की नींव पड़ जाती है जैसे पितृसत्ता की विचारधारा खास सामाजिक मर्यादाओं को नारियों के लिये अलग से न सिर्फ सुविधाजनक बल्कि अनिवार्य भी बता कर नारियों की ‘पवित्रता’ को मान कर चलने पर बल दिया करती है ।

सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के प्रतिनिधि वकील आजकल कमोबेस वैसे ही सुप्रीम कोर्ट के लिये हमेशा एक प्रकार के शुचितावाद का झंडा उठाये रहते हैं, जबकि वे खुद एक ऐसी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसने लगता है, शासन की शुचिता और नैतिकता को पूरी तरह से अमान्य करके चलने की शपथ ले रखी है ।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महोदय ने आकाश तक फैली अपनी सीमा की घोषणा करके अदालत के कमरे में तो अपने नैतिक तेज का परिचय दिया, लेकिन व्यवहार में, अर्थात् इस मामले विशेष में न्याय देने के मामले में भी क्या वे अपनी इस स्वतंत्र उड़ान की क्षमता का परिचय दे पाएं, यह विचार का एक महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर जरूर गौर किया जाना चाहिए । इस बात की जांच की जानी चाहिए कि जब सारी दुनिया जानती है कि इस मामले में महाराष्ट्र के एनसीपी के नेता अजित पवार ने एक प्रकार की जालसाजी करके एनसीपी के विधायकों के हस्ताक्षरों के साथ फडनवीस को समर्थन की चिट्ठी राज्यपाल को सौंपी थी, तब क्या आकाश तक अपनी पहुंच रखने का दावा करने वाला सुप्रीम कोर्ट इस मामूली अपराधपूर्ण साजिश के तथ्यों को ही देख पाने की अपनी क्षमता का परिचय दे पा रहा है ?

उसके विपरीत, जब अदालत में राष्ट्रपति शासन को हटाए जाने के औचित्य के विषय को उठाया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल यह कह कर कि वह अभी राज्यपाल की कार्रवाई पर विचार नहीं कर रहा है, खुद ही अपनी सीमा बांध ली । आकाश तक पहुंच की बात एक क्षण में जैसे कोरी लफ्फाजी में बदल गई ।
यह सच है कि इस खास मामले में समय का एक पहलू भी न्याय से ही जुड़ा हुआ पहलू है । अपराधी तो खुद समय ही चाहते हैं ताकि वे अरबों रुपये खर्च करके आराम से विधायकों की खरीद कर सके । इस प्रकार की घोड़ों की खरीद-बिक्री को रोकना भी न्याय का एक जरूरी अंग है । इसीलिये सुप्रीम कोर्ट किसी दूसरी बात में उलझना नहीं चाहता है । उन दूसरी बातों पर विचार के लिये उसे कुछ अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ सकती है ।

फिर भी इस मामले में, अब सुप्रीम कोर्ट के सामने एनसीपी के नये नेता के चयन और उद्धव ठाकरे को उसके 54 विधायकों के समर्थन के शपथ पत्र के अलावा रात के बारह बजे से लेकर सुबह छः बजे के अंदर आनन-फानन में राजभवन से लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय के कार्यालय की नग्न साजिशाना गतिविधियों के तथ्य इतने साफ हैं कि न्यूनतम जनतांत्रिक और संवैधानिक निष्ठा के आधार पर ही उन पर तत्काल एक निश्चित राय सुनाई जा सकती है ।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट सहित भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं के अभी के हालात को देखते हुए शायद कोई भी सुप्रीम कोर्ट से इस प्रकार की प्रखरता और तत्परता की उम्मीद नहीं करता है । सुप्रीम कोर्ट तत्काल विधानसभा में शक्ति परीक्षण का आदेश दे दें, उसे इस अनैतिक साजिश में भागीदार राज्यपाल की मर्जी पर न छोड़े, इसे ही सब अपना अहोभाग्य मानेंगे । अन्यथा, आज के निराशापूर्ण माहौल में लोग इस आशंका से भी इंकार नहीं करते हैं कि ‘आकाश तक अपनी सीमा’ का दावा करने वाला सुप्रीम कोर्ट सोलिसिटर जैनरल का उपदेश मान कर इस विषय में अपनी असमर्थता की बात करता हुआ कन्नी काटने लगे !

सभी प्रकार के लकीर के फकीर, यथास्थितिवादियों का यह जाना हुआ रूप होता है कि वे रोग के कारणों को शरीर की सीमा की हद तक तो देखने के लिये तैयार रहते हैं लेकिन शरीर के बाहर के पर्यावरण की तरह के विषयों पर जाने से कतराते हैं । आदमी के शरीर के तमाम रोगों का कोई संबंध उसके परिवेश, बाहर के दबावों से पैदा होने वाले तनावों से भी होता है, जो शरीर के अंगों को प्रभावित किया करता है, उस ओर रुख करना उनके पेशे की नैतिकता के बाहर का विषय होता है । कानून अपने दायरे के बजाय जब तक विचारधारा के व्यापक दायरे में — मानव कल्याण, स्वतंत्रता और समानता के दायरों में — विचरण करने की जोहमत नहीं उठायेगा, आकाश तक अपनी सीमा का उसका दावा हमेशा खोखला बना रहेगा । तब बार-बार तात्कालिक शासन के दबाववश बाबरी मस्जिद के बारे में आए हुए फैसलों की तरह के उद्भट फैसलें भी आते रहेंगे !

बहरहाल, कल सुबह साढ़े दस बजे तक की प्रतीक्षा की जानी चाहिए । कल के फैसले से पता चलेगा कि इस मामले की बेंच के विचार की सीमा कितनी दूर तक है !     


शनिवार, 23 नवंबर 2019

महाराष्ट्र के वर्तमान घटना-क्रम के खास सबक


—अरुण माहेश्वरी


फासीवाद जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है, महाराष्ट्र में यह सत्य फिर एक बार नग्न रूप में सामने आया है । ऐसा साफ लगता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसा कर रखे गये शरद पवार के भतीजे अजित पवार को रातों-रात, मानो बंदूक़ की नोक पर राज्यपाल के सामने लाकर तानाशाह की इच्छा पूरी की गई है । एक दिन शाम को शरद पवार ने शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी की लंबी बैठक के बाद यह घोषणा करते हैं कि तीनों दलों में यह पूर्ण सहमति बन गई है कि शिव सेना के उद्धव ठाकरे तीनों दलों की सरकार के मुख्यमंत्री होंगे और कल ही राज्यपाल के सामने सरकार बनाने के प्रस्ताव को रख दिया जायेगा । उसी दिन आधी रात के अंधेरे में, जब सारे लोग नींद में सोये हुए थे, महाराष्ट्र के राज्यपाल ने देवेन्द्र फडनवीस और एनसीपी के अजय पवार को बुला कर उन्हें मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री के पद की शपथ दिला दी और दिल्ली से प्रधानमंत्री मोदी ने भी बधाई संदेश दे दिया । महाराष्ट्र के राज्यपाल को अब एनसीपी के विधायकों के हस्ताक्षरों की ज़रूरत नहीं रही, अजित पवार का होना ही काफ़ी था !

यह बात क्रमशः साफ होती जा रही है कि आज केंद्र सरकार के पास विध्वंस के अलावा रचनात्मक कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं बचा है । अर्थनीति तो पटरी से पूरी तरह गिर चुकी है । अब उससे दुर्घटना के बाद सुनाई देने वाली सिर्फ़ मौत और चीख-पुकार का हाहाकार सुनाई देगा । इसी प्रकार की सार्विक आर्थिक तबाही को फासीवाद के जन्म सी सबसे मुफीद जमीन माना जाता है । केंद्र सरकार पूरी तत्परता से उसी जमीन को तैयार करने में लग गई है ।इसी सार्विक तबाही पर पनपता है । देश के कोने-कोने में अराजकता फैला कर सीधे सेना के बल पर शासन की भी तैयारियां की जा रही है । अमित शाह जिस प्रकार से संसद के मंच तक से पूरे देश में असम की तरह के एनआरसी के विफल और अराजक प्रकल्प को लागू करने की बातें कह रहे हैं, यह भी केंद्र की इसी विध्वंसक नीति का सबूत है । कश्मीर को उसी अराजकता की मूल भूमि के रूप में तैयार करके रख दिया गया है ।

आरएसएस के राम माधव ने पिछले दिनों सारी दुनिया में दक्षिणपंथी तानाशाहों के उदय से उत्साहित हो कर कहा था कि अब भारत में भी  मोदी को सत्ता पर रहने के लिये चुनावों की ज़रूरत नहीं बची है । जनता की राय के विपरीत मोदी सत्ता पर बने रहेंगे । महाराष्ट्र में इसे ही कर के दिखाया जा रहा है । चुनाव की पूरी मशीनरी, मसलन् चुनाव आयोग और अदालतों के दुरुपयोग और ईवीएम में कारस्तानियों के बावजूद अब मोदी चुनावों में हर जगह और बुरी तरह से हारेंगे और हर बार वे महाराष्ट्र की तरह ही जनता को हरायेंगे । यह अंतत: चुनावों के ही अंत की दिशा में बढ़ने का सूचक है ।

अभी चैनलों पर भाजपा के भोपूं पूरी बेशर्मी से राजनीति में राजसत्ता और पैसों के दुरुपयोग और तानाशाही का गुणगान करते हुए पाए जायेंगे । फासिस्टों के ये भोंपू राजनीतिक वार्ताओं के लंबे सिलसिलों को ही राजनीति-विरोधी बतायेंगे और सत्ता पर जबरन क़ब्ज़े की साज़िशों को राजनीति का श्रेष्ठ रूप । इनके झांसे में कुछ विवेकवान लोग भी यह कहते हुए पाए जायेंगे कि कांग्रेस दल ने राजनीति में तत्काल निर्णय लेने के महत्व को नहीं समझा, इसी का उसे खामियाजा चुकाना पड़ रहा है । ये लोग मानो राजनीतिक दलों की आपसी नीतिगत वार्ताओं को राजनीति के बाहर की चीज समझते हैं ।

यह सच है कि राजनीति की गुगली के महाउस्ताद माने जाने वाले शरद पवार क्या खुद अपने ही लोगों की गुगली से मात हो गए !  जो राजनीति को फासिस्ट चालों से बाहर नहीं देख पाते हैं, वे शरद पवार के साथ हुए इस धोखे में भी एक चाल देख सकते हैं । इनमें खास मोदी भक्त भी शामिल है जो अक्सर निरपेक्षता के मुखौटे में अनैतिकताओं के पक्ष में खड़ें पाए जाते हैं ।

कुछ महाराष्ट्र के पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को गड्ड-मड्ड करते हुए आज भी भाजपा-शिव सेना के चुनाव-पूर्व समझौते की बात को दोहराते पाये जाते हैं । महाराष्ट्र में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला था इसे जानते हुए भी वे कहते हैं कि वहां जनता ने बीजेपी को हराया नहीं था । उन्हें शिव-सेना-भाजपा का चुनाव-पूर्व समझौता याद है लेकिन वे इस समझौते की शर्तों को कोई महत्व नहीं देना चाहते जिसमें सत्ता की बराबरी की भागीदारी एक प्रमुख शर्त भी जिसे भाजपा ने अस्वीकार कर दिया और एक प्रकार से खुद ही शिव सेना-भाजपा के गठजोड़ को तोड़ दिया था । और यही वजह थी कि शिव सेना के साथ कांग्रेस और एनसीपी के समझौते में इतना लंबा वक्त लगा था । जिन्होंने साथ चुनाव नहीं लड़ा, उन पर जब साथ मिल कर सरकार चलाने की जिम्मेदारी आती है तो आपसी समझ कायम करने और जनता के प्रति जवाबदेही का सम्मान करने के लिये ही ये वार्ताएं जरूरी हो जाती है । अब अगर कोई कहे कि भाजपा ने शिव सेना के बिना चुनाव लड़ा होता तो उसे अकेले बहुमत मिल जाता, तो इस प्रकार के कोरे कयास पर क्या कहा जा सकता है । शिव सेना को तो 2014 के चुनाव में भाजपा को छोड़ कर अकेले चुनाव लड़ के अभी से काफी ज्यादा सीटें मिली थी ।

दरअसल, सच्चाई यही है फासीवाद के बारे में जनतांत्रिक नैतिकताओं के दायरे में रह कर कभी भी कोई सटीक विश्लेषण नहीं कर पायेगा । आज तो स्थिति यह कि भारत के समूचे विपक्ष को कश्मीर के राजनीतिज्ञों की तरह अपने बारे में जघन्यतम कुत्सा प्रचार, व्यापक पैमाने पर दमन, गिरफ्तारियों और यहां तक की अपहरण और हत्याओं की हद तक जा कर सोचने के लिये तैयार रहना चाहिए । अन्यथा वह अपनी हर रणनीति में ऐसे ही धोखों का सामना करते रहने के लिये अभिशप्त होगा । सभी चुनावी संघर्षों को आगे फासीवाद-विरोधी जन संघर्षों का रूप देना होगा । व्यापकतम जन-कार्रवाई ही फासीवाद के प्रतिरोध का एक मात्र तरीक़ा है ।

(23.11.2019, 13.55)

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

इलेक्टोरल बॉंड यानी ब्लैक मनि के उत्पादन और खपत, दोनों का एक नायाब औज़ार


-अरुण माहेश्वरी



इलेक्टोरल बॉंड के बारे में कोई जितना सोचेगा, वह भारत में तैयार की गई इस रहस्यमय और नायाब चीज से हैरान रह जायेगा । भाजपा के चार्टर्ड अकाउंटेंट छाप अर्थशास्त्रियों के द्वारा तैयार की गई सचमुच यह ऐसी अनोखी चीज है, जिसे ब्लैक मनि के धंधे का अगर कोई अन्तर्राष्ट्रीय नोबेल पुरस्कार हो, तो वह भी दिया जा सकता है ।

बताया जा रहा है कि अकेले भाजपा को इन बॉंड से इस दौरान छ: हज़ार करोड़ से ज़्यादा रुपये मिल चुके हैं । भाजपा की आमदनी का एकमात्र स्रोत इलेक्टोरल बॉंड नहीं है । पार्टी को चलाने के लिये पैसे बटोरने के उनके जो दूसरे परंपरागत स्रोत रहे हैं, भाजपा ने उनमें से शायद ही किसी स्रोत को बंद किया होगा ।

तब किसी के भी मन में यह स्वाभाविक सवाल उठना चाहिए कि आख़िर भाजपा ऐसा क्या कर रही है कि उसे इतने, हज़ारों-हजारों करोड़ रुपये की ज़रूरत पड़ रही है ? यह सवाल भाजपा के भी सभी स्तर के लोगों, आरएसएस वालों के भी दिमाग़ में उठना चाहिए कि आख़िर इतने रुपयों का हो क्या रहा है ? भाजपा का वर्तमान नेतृत्व यह किस प्रकार के गोरख धंधे में लगा हुआ है ?

यह बॉंड खुद में एक रहस्य इसलिये है क्योंकि जानकारों का कहना है कि इलेक्टोरल बॉंड के ज़रिये कंपनियों ने भाजपा को उतने रुपये नहीं दिये हैं, जितने दिखाए जा रहे हैं । यह तो काले को सफ़ेद और सफ़ेद को काला करने में उस्ताद सीए फ़र्मों का एक करिश्मा है जिसके ज़रिये भाजपा सरकारों ने घूस के तौर पर जो अरबों रुपये वसूले थे, काले धन के उस विशाल ख़ज़ाने को इलेक्टोरल बॉंड के ज़रिये सफ़ेद बना दिया है ।

इसके अलावा, भाजपा ने इन बॉंड के ज़रिये पूँजीपतियों के लिये एक ऐसा ज़रिया तैयार कर दिया ताकि वे अपनी कंपनियों से पैसे निकाल कर उन्हें कंगाल बना कर अपने खुद के घरों को भर सके । कहते हैं कि भाजपा के दलाल बाज़ार से सिर्फ़ दस प्रतिशत क़ीमत पर ये इलेक्टोरल बॉंड ख़रीदा करते हैं । बाक़ी की नब्बे प्रतिशत राशि बॉंड देने वालों को ब्लैक मनि बना कर लौटा दी जाती है ।

इसके साथ ही धंधेबाज़ लोग बांड ख़रीद कर दस प्रतिशत ज़्यादा क़ीमत पर भी भाजपा के दलालों को बॉंड बेच रहे थे । भाजपा ने बेनामी शेल कंपनियों के संजाल के लिये इसके जरिये आमदनी का एक नया रास्ता तैयार कर दिया । अर्थात् बेनामी कंपनियों के खिलाफ अभियान चलाने का दिखावा करने वाले ही वास्तव में उनके फलने-फूलने का रास्ता बना रहे हैं !

इस प्रकार, जिस पार्टी की सरकार डिजिटलाइजेशन के ज़रिये बाजार से ब्लैक मनि को ख़त्म करने की बातें कर रही थी, वहीं पार्टी खुद इलेक्टोरल बॉंड की ख़रीद के ज़रिये हर रोज़ ब्लैक मनि तैयार करने के काम में लगी हुई है । और इसके साथ ही, इनके ज़रिये घूस के रुपयों को अपने खातों में जमा करके ब्लैक मनि को खपाने का काम कर रही है !

इस हिसाब से देखें तो बहुत मुमकिन है कि इलेक्टोरल बॉंड के ज़रिये जुटाये गये भाजपा के छ: हज़ार करोड़ में से वास्तव में भाजपा को सिर्फ़ छ: सौ करोड़ रुपये ही मिले हो, बाक़ी से घूस के रुपयों का जमा-खर्च किया गया हो ।

इसीलिये, कुल मिला कर भारत के इलेक्टोरल बॉंड को किसी शासक दल द्वारा इजाद किया गया ब्लैक मनि की धंधेबाजी का दुनिया का सचमुच का एक नायाब औज़ार कहा जा सकता है । इससे पता चलता है कि मोदी-शाह की भाजपा किस प्रकार के धंधेबाज़ों के एक गिरोह का रूप ले चुकी है । आज जब देश में निवेश का भारी अकाल पड़ा हुआ है, उस समय कंपनियों को दरिद्र बनाने के इस हथियार ने निवेश को कितना प्रभावित किया है, इसका सही-सही अनुमान लगाना कठिन है । लेकिन संकट में फँसी हुई कंपनियों से रुपये निकाल कर भाग खड़े होने वालों के लिये इलेक्टोरल बॉंड निश्चित तौर पर किसी वरदान से कम महत्वपूर्ण नहीं साबित हुआ होगा ।

बुधवार, 20 नवंबर 2019

महाराष्ट्र में भारतीय राजनीति का टूटता हुआ गतिरोध


—अरुण माहेश्वरी



शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी के बीच कई अंतरालों में वार्ताओं के लंबे दौर के बाद अब लगता है, जैसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने के रास्ते की बाधाएं कुछ दूर हो गई है । कौन मुख्यमंत्री होगा, कौन उप-मुख्यमंत्री और कौन कहां कितने समय तक रहेगा, इन सबका खाका अब जल्द ही सामने आ जायेगा, जिन्हें राजनीति की जरूरी बातों के बावजूद सबसे प्रमुख बात नहीं माना जाता है । यद्यपि इधर के समय में भाजपा की कथित ‘चाणक्य’ नीति के तमाम चाटुकार विश्लेषक राजनीति के विषयों को महज सत्ता में पदों की बंदरबाट तक सीमित करके देखने के रोग के शिकार हैं ।   

कांग्रेस और शरद पवार के बीच का रिश्ता तो बहुत पुराना है, दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं । लेकिन इनके साथ शिव सेना का जुड़ना उतना सरल और सहज काम नहीं था । शिव सेना की राजनीति का अपना एक लंबा इतिहास रहा है । उसका कांग्रेस-एनसीपी से मेल बैठना अथवा कांग्रेस-एनसीपी का शिव सेना से मेल बैठना तभी संभव था जब दोनों पक्ष समय की जरूरत के पहलू को अच्छी तरह से समझ लें और अपने में एक ऐसा लचीलापन तैयार कर लें जो इस नये प्रयोग के महत्व को आत्मसात करने में सक्षम हो ।

राजनीति में जिसे कार्यनीति कहते हैं, उसका मूल लक्ष्य यही होता है कि अभिष्ट की दिशा में आगे बढ़ने के रास्ते की बाधाओं को, जो आपके बाहर की होती है तो आपके अंदर की भी हो सकती है, वक्त की जरूरतों को समझते हुए दूर किया जाए । किसी के भी सोच में समय की भूमिका को अवसर देने का इसके अलावा दूसरा कोई तरीका नहीं होता है ।

शैव गुरू अभिनवगुप्त तंत्रशास्त्र में व्यक्ति के द्वारा अपनी चेतना और ऊर्जा के विस्तार के प्रयत्नों में मदद देने के लिये जिस पद्धति के प्रयोग करने की बात कहते हैं उसमें बहुत साफ शब्दों में कहते हैं कि कि किसी के भी अपने संस्कारों में बिना किसी प्रकार की बाधा बने उसे थोड़ा नर्म हो कर झुकने की जगह दी जानी चाहिए, ताकि अंत में उसके अंतर की बाधा को उखाड़ कर उसके स्वतंत्र प्रवाह को संभव बनाया जा सके । किसी भी कार्यनीति का मूल अर्थ ही यही होता है ।

प्रसिद्ध मनोविश्लेषक जॉक लकान ने अपने चिकित्सकीय कामों में मनोरोगी के साथ एक ही बैठक में सब कुछ तय कर देने के बजाय कई अंतरालों में अनेक बैठकों की पद्धति पर बल दिया था । उनका मानना था कि एक झटके में कोई काम पूरा करने के बजाय रुक-रुक कर करने से रोगी के बारे में कहीं ज्यादा जरूरी सामग्री मिला करती है । संगीत में बीच में किसी धुन को तोड़ कर अकसर ज्यादा असर पैदा होता है, वही कलाकार का अपना कर्तृत्त्व कहलाता है । एक तान में शुरू से अंत बजाते जाना उबाता है । किसी के पास एक से गीतों के दो टेप होने पर जब उसकी उम्मीद के अनुसार एक के बाद दूसरा गीत एक ही क्रम में नहीं आता है, तो वह उसे हमेशा चौंकाता है ।

लकान किसी को भी उसके आचरण के बारे में,  नीति-नैतिकता के बारे में भाषण पिलाने, अर्थात् उपदेशों से उसके ‘संस्कारों‘ को दुरुस्त करने से परहेज किया करते थे । आदमी के अंतर की बाधाओं से पार पाने के लिये, बैठक के अगले सत्र के लिये अपने को तैयार करने का रोगी को मौका देने के लिये इस प्रकार के अंतरालों का प्रयोग बहुत मूल्यवान होता है । बैठकों के लंबे सिलसिले के वातावरण में हमेशा एक प्रकार का तनाव बना रहता है, क्योंकि यह सिलसिला कब खत्म होगा, कोई नहीं जानता है । लेकिन यही तनाव वास्तव में कई नयी बातों को सामने लाता है और वार्ता में शामिल पक्षों के अंदर के बाधा के चिर-परिचित स्वरूप को खारिज करके आगे बढ़ने का रास्ता बनाता है । यह वक्त की जरूरत को आत्मसात करने की एक प्रक्रिया है । इसके अंतिम परिणाम सचमुच चौंकाने वाले, कुछ परेशान करने वाले और कभी-कभी पूरी तरह से अनपेक्षित होते हैं ।

यही वजह है कि कांग्रेस-एनसीपी और शिव सेना के बीच बैठकों का सिलसिला हर लिहाज से राजनीतिक तौर पर एक उचित और जरूरी सिलसिला कहलायेगा । राजनीतिक शुचिता के मानदंडों पर भी यही उचित था । इसमें किसी शार्टकट की तलाश पूरे विषय के महत्व को आत्मसात करने के बजाय एक शुद्ध अवसरवादी रास्ता होता, जैसा कि आज तक भाजपा करती आई है । पीडीपी जैसी पार्टी के साथ सत्ता की भागीदारी में उसने एक मिनट का समय जाया नहीं किया था । पूरा उत्तर-पूर्व आज भाजपा की इसी अवसरवादी राजनीति के दुष्परिणामों को भुगत रहा है, वह पूरा क्षेत्र एक जीवित ज्वालामुखी बना हुआ है ।

महाराष्ट्र के चुनाव पर इस लेखक की पहली प्रतिक्रिया थी कि “ हवा से फुलाए गए मोदी के डरावने रूप में सुई चुभाने का एक ऐतिहासिक काम कर सकती है शिव सेना । पर वह ऐसा कुछ करेगी, नहीं कहा जा सकता है !”

लेकिन सचमुच, यथार्थ का विश्लेषण कभी भी बहुत साफ-साफ संभव नहीं होता है । किसी भी निश्चित कालखंड के लिये कार्यनीति के स्वरूप को बांध देने और उससे चालित होने की जड़सूत्रवादी पद्धति ऐसे मौक़ों पर पूरी तरह से बेकार साबित होती है ।यह कार्यनीति के नाम पर कार्यनीति के अस्तित्व से इंकार करने की पद्धति किसी को भी कार्यनीति-विहीन बनाने, अर्थात् समकालीन संदर्भों में हस्तक्षेप करने में असमर्थ बनाने की आत्म-हंता पद्धति है ।

यह शिव सेना के लिये इतिहास-प्रदत्त वह क्षण है जिसकी चुनौतियों को स्वीकार कर ही वह अपने को आगे क़ायम रख सकती है । एक केंद्रीभूत सत्ता इसी प्रकार अपना स्वाभाविक विलोम का निर्माण करती है ।

रविवार, 10 नवंबर 2019

महाराष्ट्र में शिवसेना एनसीपी की सरकार — सिद्धांत और व्यवहार की इस अनोखी गुत्थी पर एक नोट


—अरुण माहेश्वरी




अभी जब हम यह लिख रहे हैं, कांग्रेस कार्यसमिति महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी की सरकार को समर्थन देने, न देने के सवाल पर किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचने के लिये मगजपच्ची कर रही है । यह ‘मगजपच्ची’ शब्द ही इस बात का सूचक है कि जो भी समस्या है, उसे राजनीतिक व्यवहार की समस्या कहा जाए या एक सैद्धांतिक समस्या, कोशिश उसका एक भाषाई समाधान पाने की है ।

व्यवहारिक समस्या यह है कि महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना का गठबंधन ऐतिहासिक कारणों से ही अभी साथ-साथ आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं रह गया है । इसके पीछे ऐतिहासिक कारण यही है कि ये दोनों अपने को हिंदुत्ववादी कहने पर भी अलग-अलग दल हैं और इनमें शिवसेना मराठा पहचान के प्रतिनिधित्व पर अपनी इजारेदारी कायम करना चाहती है । अर्थात् सिर्फ हिंदुत्व नहीं, मराठावाद, जय महाराष्ट्र, मराठा जातीयतावाद का इन्हें अलगाने वाला मुद्दा एक जीवित मुद्दा है । मोदी के हिंदू, हिंदी, हिंदुस्थान के दबाव की स्वाभाविक उत्पत्तियों का एक रूप ।

पिछले लोकसभा चुनाव के समय जब बहादुर मोदी-शाह के दिल कांप रहे थे, उद्धव ठाकरे ने चाणक्य से राज्य में सत्ता की बराबर भागीदारी का करार लिया था । ‘कल की कल देखेंगे’ वाली चालाक बुद्धि ने तब जान बचाने के लिये हर कुछ के लिये हामी भर दी थी । लोक सभा चुनाव ने उनके अंदेशे को सही साबित किया और मोदी-शाह जोड़ी को फूल कर कुप्पा होने में क्षण भर का भी समय नहीं लगा । मीडिया तो गैस भरने का ही पैसा ले रहा था । मान लिया गया था कि हरियाणा और महाराष्ट्र में मोदी-शाह के घोड़े दौड़ेंगे । विपक्ष मैदान से गायब है, मीडिया रोज इसकी कहानियां सुना रहा था । लेकिन लोगों के दुखों से ही नित नई कहानी गढ़ी जाती है, इस साधारण बात की ओर किसी का ध्यान नहीं था । जनतंत्र में पक्ष-विपक्ष अंततः जनता तय करती है, और देखते-देखते पार्टियों के बड़े-बड़े महल वीरान खंडहरों में बदल जाते हैं, इन सचाइयों को सब भूल चुके थे ।

बहरहाल, हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह ही बीजेपी अपनी अपेक्षाओं के मानदंड पर बुरी तरह से पराजित हुई । हरियाणा में तो उसे अपनी मदद के लिये अमित शाह के जाल में फंसा दुखियारा अजय चौटाला मिल गया, लेकिन महाराष्ट्र में पहली बार शिव सेना के लिये अपने सपनों को पर देने के लिये जरूरी खुला आसमान मिल गया ।

अहंकार में डूबे मोदी ने पहले से ही फडनवीस को मुख्यमंत्री घोषित करके शिव सेना से वार्ता के दरवाजे बंद कर दिये थे । अब आज शिव सेना एनसीपी और कांग्रेस के सहयोग से अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही है । इस प्रकार महाराष्ट्र में खास मराठा राजनीति का सूत्रपात होने जा रहा है ।

एनसीपी खुद को इस मराठा राजनीति की हमेशा की एक स्वाभाविक मगर धर्म-निरपेक्ष संघटक शक्ति मानती रही है, इसलिये शिव सेना के साथ जाने के लिये उसे बहुत ज्यादा भाषाई मशक्कत करने की जरूरत नहीं है । इस मामले में थोड़ा सा पेचीदा मसला कांग्रेस के लिये जरूर है ।

दरअसल, राजनीतिक कार्रवाई का सैद्धांतिक निरूपण एक बहुत दिलचस्प विषय हुआ करता है । सिद्धांतों का राजनीतिक व्यवहारिक निरूपण तो इसलिये साधारण बात होती है कि उसमें जो भी किया जा रहा है, उसे पहले से ही बता दिया गया है । उसमें छिपा हुआ या लाक्षणिक प्रकार का कुछ नहीं होता है । चमत्कारों की संभावना तो लक्षणों में हुआ करती है जो यथार्थ में उतरने के पहले तक हवा में कहीं छिपे होते हैं । राजनीति का सौन्दर्यशास्त्र इसी में है । इसीलिये एक समय में अपने एक लेख में हमने हरियाणा के ‘आया राम गया राम’, लालू और मायावती की भूमिकाओं के सिलसिले में राजनीति के सौन्दर्यशास्त्र की चर्चा की थी जो चमत्कारी ढंग से असंभव को संभव बना कर राजनीति के गतिरोधों को तोड़ने और आगे का रास्ता बनाने का काम किया करती है।

आज कांग्रेस के सामने मूलतः जितनी एक सैद्धांतिक समस्या है, उतनी व्यवहारिक नहीं । जब महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम आए थे, 24 अक्तूबर को ही फेसबुक पर इस लेखक की पहली प्रतिक्रिया थी —
“ हवा से फुलाए गए मोदी के डरावने रूप में सुई चुभाने का एक ऐतिहासिक काम कर सकती है शिव सेना । वह ऐसा कुछ करेगी, नहीं कहा जा सकता है !”

इसके साथ ही आगे अपने एक लेख में लिखा था कि “सचमुच, यथार्थ का विश्लेषण कभी बहुत साफ-साफ संभव नहीं होता है । यथार्थ के अन्तर्विरोध कई अन्य अन्तर्विरोधों के समुच्चयों से घटित होते हैं, जिनका अलग-अलग समुच्चयों के स्वरूप पर भी असर पड़ता हैं। जनता के बीच कोई रहेगा और शासन की छड़ी कोई और , दूर बैठा तानाशाह घुमायेगा, जनतंत्र के अंश मात्र के रहते भी इसमें दरार की संभावना बनी रहती है। लड़ाई यदि सांप्रदायिकता वनाम् धर्म-निरपेक्षता की है तो तानाशाही वनाम् जनतंत्र की भी कम नहीं है । बस यह समय की बात है कि दृश्यपट को कब और कौन कितना घेर पाता है ।

“किसी भी निश्चित कालखंड के लिये कार्यनीति के स्वरूप को बांध देने और उससे चालित होने की जड़सूत्रवादी पद्धति ऐसे मौक़ों पर पूरी तरह से बेकार साबित होती है ।यह कार्यनीति के नाम पर कार्यनीति के अस्तित्व से इंकार करने की पद्धति किसी को भी कार्यनीति-विहीन बनाने, अर्थात् समकालीन संदर्भों में हस्तक्षेप करने में असमर्थ बनाने की आत्म-हंता पद्धति है । इस मामले में शिव सेना जन-भावनाओं के ज़्यादा क़रीब, एक ज़रूरी राजनीतिक दूरंदेशी का परिचय देती दिखाई पड़ रही है । यह शिव सेना की राजनीति के एक नये चरण का प्रारंभ होगा, भारत की राजनीति में उसकी कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका का चरण ।

“यह शिव सेना के लिये इतिहास-प्रदत्त वह क्षण है जिसकी चुनौतियों को स्वीकार कर ही वह अपने को आगे क़ायम रख सकती है । ऐसे समय में कायरता का परिचय देना उसके राजनीतिक भविष्य के लिये आत्म-विलोप के मार्ग को अपनाने के अलावा और कुछ नहीं होगा । समय की गति में ठहराव का मतलब ही है स्थगन और अंत । कोई भी अस्तित्व सिर्फ अपने बूते लंबे काल तक नहीं रहता, उसे समय की गति के साथ खुद को जोड़ना होता है ।

“एक केंद्रीभूत सत्ता इसी प्रकार अपना स्वाभाविक विलोम, स्वयंभू क्षत्रपों का निर्माण करती है । बड़े-बड़े साम्राज्य इसी प्रकार बिखरते हैं । यह एक वाजिब सवाल है कि क्यों कोई अपनी गुलामगिरी का पट्टा यूँ ही लिखेगा ! ऐसे में विचारधारा की बातें कोरा भ्रम साबित होती हैं ।”

सचमुच, महाराष्ट्र में इस बार न सिर्फ़ मोदी-शाह को, बल्कि सेना, पुलिस के साथ ही सीबीआई, ईडी, आईटी आदि की सम्मिलित राजनीतिक दमन की शक्ति को भी ललकारा गया है । हाल-फिलहाल इनमें न्यायपालिका का भी शुमार हो चुका है ।

कहना न होगा, यहीं से पूरे विषय का परिप्रेक्ष्य भी बदल जाता है । बात बीजेपी-आरएसएस के वृहत्तर विचारधारात्मक परिवार से बाहर निकल जाती है । मसला फासीवादी तानाशाही के प्रतिरोध और प्रतिकार का आ जाता है ।

किसी भी कार्यनीति का हर मसला इसी प्रकार अंततः एक ऩई भाषाई संरचना का मसला ही हुआ करता है । जैसे मनोरोगी में कुछ बेकार के विचारों से होने वाले काल्पनिक दर्द के निवारण के लिये ज़रूरत सिर्फ़ इस बात की होती है कि दमित विचारों को नये संकेतकों की श्रृंखला से जोड़ दिया जाए ताकि वह चीजों को एक प्रकार के नये तर्जुमा के जरिये पढ़ सके । यही इलाज है, तमाम राजनीतिक सिद्धांतकारों को भी उनकी अपनी जड़ीभूत लाक्षणिक मानसिकता के रोग से मुक्त कराने का । यद्यपि इस क्रम में इस बात का खतरा हमेशा प्रबल रूप से बना रहता है कि उसके शरीर के बाक़ी अंग कहीं नष्ट न हो जाए । इसके लिये आगे की अतिरिक्त मेहनत और रणनीति को तैयार करने की जरूरत रहती है, जो किसी भी राजनीतिक पार्टी का दैनन्दिन काम हुआ करता है ।

देखना है कांग्रेस कार्य समिति कैसे इसे संभालती है । अब तक एनसीपी और कांग्रेस शिव सेना के प्रति जिस प्रकार के लचीलेपन का परिचय दे रही है, वह स्वागतयोग्य है । देश की पूर्ण तबाही के मोदी के एकाधिकारवादी राज से मुक्ति का रास्ता कुछ इसी प्रकार तैयार होगा ।

(11 नवंबर 2019, अपरान्ह डेढ़ बजे )

शनिवार, 9 नवंबर 2019

आधुनिक समाज के कानूनी विवेक को नहीं, कब्जे की वास्तविकता को सुप्रीम कोर्ट ने तरजीह दी है

—अरुण माहेश्वरी 


न्याय, सद्भाव, मानवीय मर्यादा और सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति समानता के नाम पर सुनाये गये अयोध्या के फैसले में कहा गया है कि

1. बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को गिरा कर नहीं किया गया है । उसके नीचे मिलने वाले ढांचे 12वीं सदी के हैं जबकि मस्जिद का निर्माण 15वीं सदी में किया गया था ।

2. 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर राम लला की मूर्ति को बैठाना गैर-कानूनी काम था ।

3. 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना कानून के शासन के उल्लंघन का एक सबसे जघन्य कदम था ।

4. बाबरी मस्जिद पर शिया वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया ।

5. निर्मोही अखाड़े के दावे को भी खारिज कर दिया गया है ।

6. विवादित जमीन पर सिर्फ दो पक्ष, सुन्नी वक्फ बोर्ड और राम लला विराजमान के दावों को विचार का विषय माना गया ।

7. चूंकि विवादित स्थल पर 1857 से लगातार राम लला की पूजा चल रही है और उस जमीन पर हिंदुओं का कब्जा बना हुआ है, इसीलिये विवादित 2.77 एकड़ जमीन को रामलला विराजमान के नाम करके उसे केंद्र सरकार को सौंप दिया गया जिस पर मंदिर बनाने के लिये केंद्र सरकार एक ट्रस्ट का गठन करेगी । केंद्र सरकार तीन महीने के अंदर ट्रस्ट का गठन करके उस ट्रस्ट के जरिये मंदिर के निर्माण की दिशा में आगे बढ़े । उस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा का एक प्रतिनिधि रखा जाए ।

8. चूंकि 1992 में मस्जिद को ढहा कर मुसलमानों को उनकी जगह से वंचित किया गया, और चूंकि मुसलमानों ने उस मस्जिद को त्याग नहीं दिया था बल्कि 1949 तक वहां नमाज पढ़ी जाती थी, इसीलिये सुन्नी वक्फ बोर्ड को केंद्र सरकार अथवा उत्तर प्रदेश सरकार अयोध्या में ही एक प्रमुख और उपयुक्त स्थान पर 5 एकड़ जमीन मस्जिद के निर्माण के लिये देगी, ताकि मुसलमानों के साथ हुए अन्याय का निवारण हो सके ।

इस प्रकार इस फैसले में मूलत: कानून की भावना को नहीं, ‘कब्जे की वास्तविकता’ को तरजीह दी गई है । यद्यपि इस फैसले में ‘ न्याय, सद्भाव, मानवीय मर्यादा और सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति समानता’ की दुहाई दी गई है, लेकिन इस प्रकार की किसी विवेकशील प्रक्रिया पर पूरा जोर देने के बजाय कानून को घट चुकी घटनाओं को मान कर चलने का एक माध्यम बना दिया गया है । यह एक प्रकार से राजनीति के सामने कानून का आत्म-समर्पण कहलायेगा । यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने इस अभियोग से बचने के लिये ही धारा 142 का इस्तेमाल करते हुए मुसलमानों को पहुंचाए गये नुकसान की भरपाई की बात कही है । 

शनिवार, 2 नवंबर 2019

अगला हफ़्ता सुप्रीम कोर्ट के नाम होगा

-अरुण माहेश्वरी



सुप्रीम कोर्ट का जज दूध पीता बोधशून्य बच्चा नहीं होता  जिसे अपनी शक्ति का अहसास नहीं होता है। राजनीति के बजाय वह अपनीकुर्सी की नैतिकता से भी बंधा होता है  वह सरकार में थोड़े समय के लिये आए नेताओं का दास नहीं होता है  प्रेमचंद की ‘नमक का दरोगा’ कहानी को कमतर नहीं समझना चाहिए  यह आदमी के अहम् से जुड़ा पहलू है जिसे छोड़ कर वह अपनी पहचान को लुप्त कियाकरता है  

इसीलिये सत्ता के दलाल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे जब सुप्रीम कोर्ट को सरकार के इशारों पर नाचने वाले कठपुतले की तरह चित्रित कर रहे थेवे कर्नाटक के भ्रष्ट मुख्यमंत्री येदीरप्पा जैसे ही दिखाई दे रहे थे जो अमित शाह को सुप्रीम कोर्ट का भगवान समझते हैं  

सुप्रीम कोर्ट को इस हफ़्ते भारतीय राष्ट्र और प्रशासन के बारे कुछ दूरगामी महत्व के फ़ैसले सुनाने हैं  बाबरी मस्जिद का मामला हैराफ़ेल की ख़रीद की जाँच कावित्त विधेयकों को धन विधेयकों के रूप में पारित कराके राज्य सभा के साथ धोखाधड़ी का और कश्मीरका भी मामला है  

मोदी पहले ही भारत की शक्ल सूरत बिगाड़ चुके हैं  इसके सर के ताज जम्मू और कश्मीर को खंडित कर चुके हैं  राम मंदिर को लेकर वे इसी बिखराव को जनमन में स्थाई करने की फ़िराक़ में हैं  सत्ता पर एकाधिकार और भ्रष्टाचार का चोली दामन का संबंध हुआ करता है  वित्त विधेयक और राफ़ेल की ख़रीद इसी के प्रतीक हैं  कश्मीर का विषय भारत के संघीय ढाँचे और नागरिक अधिकारों के हनन काअर्थात् हमारे संविधान की आत्मा से जुड़ा मुद्दा बन गया है  इसे आतंकवाद से निपटने की क़ानून और व्यवस्था की बात भर नहीं समझा जा सकता है  

मोदी अभी आदतन विदेश यात्रा पर हैं  जब भी भारत में कुछ कठिन बातें होने की होती हैंविदेश चले जाना उनकी फ़ितरत बन चुका है 

नोटबंदीजीएसटी के वार से अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने वाले मोदी अभी आरसीईपी पर हस्ताक्षर करके भारत की अर्थ-व्यवस्था कोपूरी तरह से विदेशियों को सौंप देने का कुकर्म करने की फ़िराक़ में हैं  उन्हें एशियान की बैठक(2-4 नवंबरमें भारत को सुर्ख़ियों में रखनेकी सनक है। सुर्ख़ियों में ही तो उनके प्राण बसते हैं !

बहरहालहमारी नज़र आगामी हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट पर होगी  हरीश साल्वे की बातों में इस सच को ज़रूर नोट किया था कि जजों कीअपनी विचारधारा नाम की भी कोई चीज़ होती है  लेकिन न्याय और सत्य अभी भारत की नियति से जुड़ गये हैं  भारत का खंडित मुकुटभी इसकी गवाही दे रहा है  हमें इसी न्याय और सत्य की  स्वतंत्र भूमिका का इंतज़ार रहेगा  

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

क्या शिव सेना इतिहास की चुनौती को स्वीकार कर आगे बढ़ेगी या बीजेपी के दरवाज़े पर बंधे पालतू जीव की भूमिका अपनायेगी !


-अरुण माहेश्वरी


महाराष्ट्र के हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों पर हमारी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि “महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की जीत बताती है कि जनता के दुख और ग़ुस्से की आवाज़ को दबाने में मोदी सरकार अब भी सफल है ।”

लेकिन बहुत जल्द ही वहाँ की राजनीति ने एक नई करवट लेनी शुरू कर दी । चुनाव परिणामों का असली सच अब सीटों की संख्या के बजाय राजनीतिक दलों की गतिविधियों से ज़ाहिर होने लगा । लेकिन इसके पीछे भी सीटों के संख्या तत्व की ही प्रमुख भूमिका थी । बीजेपी-शिवसेना दोनों की ही सीटों में कमी आई थी । ख़ास तौर पर अमित शाह के सुर में सुर मिला कर पूरा मीडिया जिस प्रकार इस शासक गठबंधन को दो सौ के पार और बीजेपी को अकेले बहुमत के क़रीब पहुँचा दे रहा था, वह कोरी कपोल कल्पना साबित हुआ । कुछ सीटों पर तो लोगों ने बीजेपी की तुलना में नोटा के पक्ष में ज्यादा मत दिये । कांग्रेस और एनसीपी, दोनों की सीटें बढ़ी । बीजेपी बहुमत के लिये ज़रूरी 144 के आँकड़े से काफ़ी पीछे सिर्फ 105 में सिमट कर रह गई ।

इस प्रकार, सच यही था कि बीजेपी महाराष्ट्र में पराजित हुई थी, लेकिन सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के खेल के आज की राजनीति के सबसे बड़ी उस्ताद जोड़ी मोदी-शाह ने बीजेपी की ‘ऐतिहासिक’ जीत का गीत गाना शुरू कर दिया, फडनवीस को दुबारा मुख्यमंत्री बनने की बधाइयाँ भी दी जाने लगी ।

यही वह बिंदु था, जहां से चीजें बदलने लगीं । बीजेपी शिवसेना के बिना सत्ता से बहुत दूर थी, लेकिन मोदी-शाह ने उसे अपना ज़रख़रीद गुलाम मान कर उसके अस्तित्व से ही इंकार का रास्ता अपना लिया था । उनका यह रवैया अकारण नहीं था । हरियाणा में साफ़ तौर पर पराजित होने पर भी दुष्यंत चौटाला नामक जीव जिस प्रकार इस जोड़ी के चरणों में गिर कर उन्हें अपनी सेवाएँ देने के लिये सामने आ गया था, उससे अपनी अपराजेयता के बारे में भ्रम का पैदा होना बिल्कुल स्वाभाविक था । यह उनकी मूलभूत राजनीतिक समझ भी है कि अब ‘मोदी बिना चुनाव लड़े ही भारत की सत्ता पर बने रहने में समर्थ है ।’

ऐसे मौक़े पर ही जब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अमित शाह के साथ सत्ता के आधे-आधे बँटवारे की बात उठाई, तभी इस बात के संकेत मिल गये थे कि जो मोहभंग जनता के स्तर पर इन चुनावों से जाहिर हुआ था,  राजनीतिक दलों के स्तर पर भी उसकी दरारें दिखाई देने लगी हैं । जनता तो मोदी-शाह को ठुकरा चुकी है, बस इस सच को राजनीतिक दलों के पटल पर प्रतिध्वनित होना बाक़ी था । उद्धव ठाकरे की बातों से उसके संकेत मिले थे । मोदी-शाह की महाबली वाली झूठी छवि को तोड़ने का ऐतिहासिक क्षण तैयार हो रहा था । साफ़ लग रहा था कि हवा से फुलाए गए मोदी के डरावने रूप में सुई चुभाने का एक ऐतिहासिक काम कर सकती है शिव सेना । पर वह ऐसा कुछ करेगी,यह पूरे निश्चय के साथ कहना मुश्किल था ।

बहरहाल, जब महाराष्ट्र के राज्यपाल से मुख्यमंत्री फड़नवीस और शिवसेना के नेता अलग-अलग मिले, यह साफ लगने लगा था कि मोदी के माया जाल को तोड़ने में शिव सेना की भूमिका कितनी ही संदेहास्पद क्यों न लगे, वह सच साबित हो सकती है ।

सचमुच, यथार्थ का विश्लेषण कभी बहुत साफ-साफ संभव नहीं होता है । यथार्थ के अन्तर्विरोध कई अन्य अन्तर्विरोधों के समुच्चयों से घटित होते हैं, जिनका अलग-अलग समुच्चयों के स्वरूप पर भी असर पड़ता हैं। जनता के बीच कोई रहेगा और शासन की छड़ी कोई और, दूर बैठा तानाशाह घुमायेगा -- जनतंत्र के अंश मात्र के रहते भी इसमें दरार की संभावना बनी रहती है। लड़ाई यदि सांप्रदायिकता वनाम् धर्म-निरपेक्षता की है तो तानाशाही वनाम् जनतंत्र की भी कम नहीं है । बस यह समय की बात है कि दृश्यपट को कब और कौन कितना घेर पाता है ।

किसी भी निश्चित कालखंड के लिये कार्यनीति के स्वरूप को बांध देने और उससे चालित होने की जड़सूत्रवादी पद्धति ऐसे मौक़ों पर पूरी तरह से बेकार साबित होती है ।यह कार्यनीति के नाम पर कार्यनीति के अस्तित्व से इंकार करने की पद्धति किसी को भी कार्यनीति-विहीन बनाने, अर्थात् समकालीन संदर्भों में हस्तक्षेप करने में असमर्थ बनाने की आत्म-हंता पद्धति है । इस मामले में शिव सेना जन-भावनाओं के ज़्यादा क़रीब, एक ज़रूरी राजनीतिक दूरंदेशी का परिचय देती दिखाई पड़ रही है । यह शिव सेना की राजनीति के एक नये चरण का प्रारंभ होगा, भारत की राजनीति में उसकी कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका का चरण ।

यह शिव सेना के लिये इतिहास-प्रदत्त वह क्षण है जिसकी चुनौतियों को स्वीकार कर ही वह अपने को आगे क़ायम रख सकती है । ऐसे समय में कायरता का परिचय देना उसके राजनीतिक भविष्य के लिये आत्म-विलोप के मार्ग को अपनाने के अलावा और कुछ नहीं होगा । समय की गति में ठहराव का मतलब ही है स्थगन और अंत । कोई भी अस्तित्व सिर्फ अपने बूते लंबे काल तक नहीं रहता, उसे समय की गति के साथ खुद को जोड़ना होता है । 

एक केंद्रीभूत सत्ता इसी प्रकार अपना स्वाभाविक विलोम, स्वयंभू क्षत्रपों का निर्माण करती है । बड़े-बड़े साम्राज्य इसी प्रकार बिखरते हैं । यह एक वाजिब सवाल है कि क्यों कोई अपनी गुलामगिरी का पट्टा यूँ ही लिखेगा ! ऐसे में विचारधारा की बातें कोरा भ्रम साबित होती हैं ।

अब तक की स्थिति में एनसीपी और कांग्रेस शिव सेना के प्रति जिस प्रकार के लचीलेपन का परिचय दे रही है, वह स्वागतयोग्य है । देश की पूर्ण तबाही के मोदी के एकाधिकारवादी राज से मुक्ति का रास्ता बहुत जल्द, शायद इसी प्रकार के नये समीकरणों से तैयार होगा ।