बुधवार, 15 सितंबर 2021

हिंदी के बेडौल अपराध साहित्य की एक नजीर -- 'पिशाच'

 —अरुण माहेश्वरी 



पिछली 29 अगस्त को वीडियो पत्रकार अजित अंजुम ने अपने यूपी चुनाव और किसान आंदोलन संबंधी कवरेज के बीच अचानक ही हिंदी के हाल में प्रकाशित एक ‘क्राइम थ्रिलर’ ‘पिशाच’ पर चर्चा की । इसके लेखक संदीप पालीवाल के साथ ही उनके एक मित्र विनोद कापड़ी भी चर्चा में शामिल थे । ये तीनों टेलिविजन के न्यूज रूम के मित्र हैं और नॉवेल भी टेलिविजन के न्यूज रूम में पसरे हुए हाई सोसाइटी के लोगों के उच्च स्तरीय अपराधी कृत्यों (सोच) की ही एक कहानी कहता है । विनोद कापड़ी ने उपन्यास पढ़ा था और उनका कहना था कि इसका गठन कुछ ऐसा है कि कोई भी इसे एक सांस में पढ़ जायेगा । मतलब कथा की रोचकता वाला पहलू इसमें भरपूर है । 

बहरहाल, उनकी चर्चा सुन कर ही मन में पहली बार हिंदी के किसी क्राइम थ्रिलर को पढ़ने की इच्छा जगी । हिंदी में आम भाषा में इन्हें जासूसी उपन्यास कहते हैं और हमारा दुर्भाग्य-सौभाग्य कुछ भी कहे, हममें इनको पढ़ने की कभी कोई रुचि नहीं जगी थी। यहां तक कि इस क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय कहे जाने वाले लेखक सुरेन्द्रमोहन पाठक के भी किसी उपन्यास को हमने उलट-पुलट कर तक नहीं देखा है । बांग्ला में सत्यजीत राय ने इस क्षेत्र में कुछ अपने प्रकार का काम किया था । उनका फेलुदा बांग्ला साहित्य का भी एक लोकप्रिय चरित्र है । वहां ऐसा ही दूसरा चरित्र है व्योमकेश बक्शी । पर हिंदी में ऐसे किसी जासूसी चरित्र की चर्चा नहीं सुनी । अंग्रेजी में आर्थर कोनन डोयल के शार्लोक होम्स को सारी दुनिया जानती है । उतनी ही लोकप्रिय है अगाथा क्रिस्टी की हत्या-रहस्य की कथाएँ । 

बहरहाल, हिंदी के साहित्य के पाठक की जासूसी उपन्यासों में कोई रुचि पैदा न होना अपने आप में एक गहरी खोज का विषय हो सकता है । प्रेमचंद के पहले की अय्यारी और तिलिस्म की रोमांचक कथाओं का जिक्र इसीलिये आता है कि उसने हिंदी-उर्दू का जो एक पाठक वर्ग तैयार किया था, उसे प्रेमचंद ने अपने सामाजिक, यथार्थवादी आदर्श के उपन्यासों से विस्थापित करके साहित्य के पाठक में तब्दील कर दिया । और कहना न होगा, इसके साथ ही समाज से अपराध और दंड निकल नहीं गए, पर अय्यारी का कथित लेखन साहित्य चर्चा से बाहर हो गया । मानो यथार्थवादी साहित्य ने उसके पाठकों को खींच कर उस लेखन के प्राणों को ही सोख लिया । साहित्य के पाठक के लिए तो उसका अस्तित्व ही खत्म हो गया । प्रेमचंद के साथ ही हिंदी में जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय आदि आदि बड़े-बड़े उपन्यासकारों की एक बाढ़ आई और हिंदी समाज उनके मोटे-मोटे उपन्यासों में उसी प्रकार डूब गया जैसा कि आज भी जासूसी उपन्यासों के पाठक उनमें डूबे हुए पाए जाते हैं । उस काल में साहित्य की दुनिया में सेक्स और सुरसुराहट पैदा करने वाले प्रेमप्रसंगों को लेकर जो प्रयोग किए गए उन्हें साहित्यालोचना में चाकलेटी साहित्य से लेकर साड़ी-जम्परवादी साहित्य आदि कई नामों से साहित्य के अपेक्षाकृत तिरस्कृत कोने में धकेल कर उन प्रवृत्तियों के गंभीर आकलन की जरूरत को ही जैसे रोक दिया गया । इसीलिए एक ऐसे साहित्यिक परिवेश से संस्कारित हम जैसे हिंदी के पाठक-लेखक के लिए जासूसी उपन्यास का जगत पूरी तरह से अनजान रहा । हमें लगता है कि आज तक भी हिंदी साहित्य जगत की इस स्थिति में कोई फर्क नहीं आया है । इसीलिए जासूसी कहे जाने वाले उपन्यासों के रहस्य-रोमांच के संधान का, उनकी समीक्षा का कोई सठीक ढांचा भी विकसित नहीं हुआ है । इनके रहस्य-रोमांच को सायास और यांत्रिक रूप में गढ़ी हुई ऐसी किस्सागोई के खाते में खतिया दिया जाता है जिनका उद्देश्य पाठक को नितांत सामयिक उत्तेजना देने के अलावा कुछ नहीं होता है । साहित्य में रहस्य-रोमांच के जिस बिंदु से आम तौर पर समय की करवट के सूक्ष्म संकेत मिला करते हैं, व्यक्ति के आत्मिक जगत में उसके आलोड़न की ध्वनि पैदा होती है, रोमांच का ऐसा अर्थपूर्ण, संक्रमण के संकेतों से भरा बिंदु कथित जासूसी उपन्यासों से गायब होता है । कुल मिला कर हिंदी के जासूसी उपन्यासों का एक प्रकार का उथलापन और कृत्रिमता ही शायद इसे गंभीर साहित्यिक अन्वीक्षा की नजर से बाहर की चीज बना देता है । 

बहरहाल, मनुष्य की किसी भी क्रिया को लेकर यदि हमें कोई खास सैद्धांतिक कसौटी तैयार करनी हो, वह भले जासूसी उपन्यास के रूप में हो क्यों न दिखाई दे, यह जरूरी होता है कि उस कसौटी की भी अपनी एक आंतरिक संहति हो । महज अपने उद्देश्यों की घोषणा करके कोई भी मानव विज्ञान मनुष्य के व्यवहार के अर्थ से जुड़े सवालों से बच नहीं सकता है । अन्यथा उसे उसके अस्तित्व मात्र से ही इंकार करना होगा, अर्थात् कहना होगा कि हिंदी में जासूसी उपन्यास जैसी कोई चीज ही नहीं है । 

जीवन के सत्य के उद्घाटन की तरह ही लेखन के सत्य का उद्घाटन एक सतत प्रक्रिया है । इसी के चलते अक्सर हमें लगने लगता है कि जैसे पदार्थ का सत्य उसमें ही द्वंद्वात्मक रूप में कैद रहता है । किसी भी लेखन का जो उद्देश्य होता है, उसकी प्राप्ति के लिए वह कभी भी अपने उद्देश्य की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता है । और यही वह बिंदु होता है जहां साहित्य के आलोचक की भूमिका का सवाल पैदा होता है । यह उसका दायित्व होता है कि वह जो लिखा जा रहा है, उसके घोषित उद्देश्यों से परे जाकर उसमें सत्य की खोज करे । उसके पेशे की जरूरत के नाते ही उसके पास चीजों को परखने वे औजार होते हैं जिनसे वह लेखन के प्रकट रूप से यह तय कर पाता है कि जीवन के रहस्य का उद्घाटन उसे कहां और कितना प्रभावित कर रहा है । अपराधशास्त्र का उद्देश्य भी सत्य की तलाश होता है । अपराध के सत्य को स्थापित करना अगर न्याय तंत्र की जरूरत है, तो अपराधी के सत्य को पाना साहित्य और मानवशास्त्र का विषय है और इस आधार पर भी जासूसी उपन्यास और साहित्य लेखन के बीच एक अभिन्न संबंध बन जाता है । जीवन के महाकाव्य के रूप में उपन्यास की संरचना की मांग है कि वह अपराध और अपराधी के सत्य की एक समग्र, संशलिष्ट तस्वीर पेश करे । जासूसी उपन्यास जब महज किसी पुलिस इंस्पेक्टर की तरह अपराध के सत्य पर ही सिर गड़ाये रहता है, अपराधी का सत्य उसके दायरे से एक सिरे से गायब हो जाता है, तब उस लेखन की अहमियत पुलिस की जांच रिपोर्ट से अधिक नहीं रहती है । 

जीवन तमाम विस्मयों से भरपूर होता है । लेखक अपने चरित्र पर उन विस्मयों के प्रभाव को देखता है । पर लेखन में जो आता है, वह हमेशा चरित्रों पर निर्भर नहीं करता । कोई भी चरित्र अपनी मर्जी से जीवन के सामान्य ढांचे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता, लेखक ही उसे किसी खास रंग में रंग कर उससे सीमाओं का उल्लंघन करवाता है । यही बात साहित्य और आलोचक के संबंध पर भी लागू होती है । आलोचक को साहित्य के सत्य की तलाश में लेखक से अपने स्तर पर एक संवाद करना होता है । जब हम देखते हैं कि जासूसी उपन्यासों पर विचार का कोई स्वयं में विकसित ढांचा उपलब्ध नहीं है तो यह जरूरी है कि हम उपन्यास साहित्य में उसके स्थान और योगदान के साथ ही अपनी कसौटियों की सीमाओं की भी चर्चा करे । साहित्य आलोचना का काम किन्हीं स्थापित मानदंडों का प्रचार करना नहीं है, बल्कि हमेशा उनके पुनर्विचार की दिशा में बढ़ना है । किसी भी नए विषय को छूने का तात्पर्य भी यही है, अपने पूर्व के मानदंडों पर पुनर्विचार । बिना उसके उपेक्षित-तिरस्कृत क्षेत्रों को अपने विचार के दायरे में लाना मुश्किल है । 

अपराध हो या अपराधी, उनकों अपने सामाजिक संदर्भों से काट कर विचार संभव नहीं है । दुनिया में ऐसे समाज की कल्पना संभव नहीं है जिसके अपने लिखित अथवा अलिखित विधायी कानून नहीं होते हैं । और कोई भी समाज ऐसा नहीं होता जिसमें किसी न किसी रूप में इन कानूनों का अतिक्रमण न होता हो । इन अतिक्रमणों से ही अपराध परिभाषित होते हैं । शत-प्रतिशत आज्ञाकारी, समूह के नियमों का पूरी तरह से पालन करने वाला मनुष्य एक शुद्ध मानवशास्त्रीय, ‘वैदिक’, कल्पनाप्रसूत, मूलतः मिथकीय अवधारणा है, जिसके दबाव में बाकी सारी सामाजिक अवधारणाएं तैयार हुआ करती है, पर वह स्वयं में कोई इंगित वहन नहीं करता है । मनुष्य के यथार्थ और प्रतीकात्मक जगत को जानना है तो उसकी सामाजिकता को जानना होता है और समाज स्वयं में अपराध और दंड के बीच के संबंधों के अलावा क्या है ? दंड विधान ही अपराध और अपराधी को सामाजिक विषय बनाता है ।

अपराध-कथा समाज के सच की कथा ही होती है और दुनिया का कोई भी यथार्थवादी साहित्य अपराध और दंड के विषय के बिना तैयार ही नहीं हो सकता है । इसीलिये अपराध कथा हमेशा गंभीर लेखकीय विश्लेषण का विषय भी होती है । इसके अलावा, कोई भी लेखक अपने सीमित अनुभव से यह दावा नहीं कर सकता है कि उसने चरित्र को उसकी सामाजिक समग्रता में व्यक्त कर दिया है, अर्थात् समाज में सक्रिय तमाम ताकतों, प्रवृत्तियों के समुच्चयों को उसने जान लिया है । लेखक चरित्र के संबंधों के तनावों को भांप कर उनका सभ्यता के स्तर पर एक सामान्यीकरण करता है जिसमें चरित्र की नैसर्गिकता और उसके प्रतीकात्मक जगत का मिलन बिंदु साफ नजर आने लगता है । यही साहित्य का साध्य है । इसी अर्थ में विश्लेषणमूलक लेखन मानवशास्त्र का ही एक रूप है जिसकी कथा में उन द्वंद्वों के संकेत मिलते हैं जो किसी भी समाज के सामने बड़े सवाल पेश किया करते हैं । 

अपराध और साहित्य, अपराध साहित्य और हिंदी आलोचना, अपराध और अपराधी, अपराधी और दंड, दंड और समाज के इस पूरे संदर्भ में जब हम संजीव पालीवाल के उपन्यास ‘पिशाच’ को देखते हैं तो सबसे पहली बात जो जेहन में आती है, वह यह कि किसी भी अपराध की जांच का और उसके लेखन का भी लक्ष्य होता है — अपराधी की आत्म-स्वीकृति । इसे अपराध शास्त्र की वह प्रमुख कुंजी माना जाता है जिससे अपराधी दंड का भागीदार बन कर समाज में लौटता है । लेकिन ‘पिशाच’ का पूरा ढांचा ही इसके अपराधी रैना दुबे उर्फ काली के ऐलानिया कबूलनामे पर टिका हुआ है । अपराध-स्वीकृति इसमें जांच या लेखन का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक प्रस्थान बिंदु है । लक्ष्य है समाज के एक हिस्से के सच को उजागर करना । 

सरे आम, टेलिविजन चैनल पर हत्यारा खुद ही अपने सारे अपराधों की कहानी पेश करता है । अपराधों की जांच के लिए जिम्मेदार सरकारी जांच ऐजेंसी (इंस्पेक्टर समर) तो उस चैनल के पीछे-पीछे सिर्फ घिसटती हुई दिखाई देती है । अर्थात् सत्य के उद्घाटनकर्ता की भूमिका को लगभग शुरू में ही खत्म करके जासूसी उपन्यासों के रोमांचकारी रहस्योद्घाटन के प्रमुख स्रोत को बंद कर दिया जाता है । उपन्यास के अंत में एक पंक्ति में अनायास ही रैना दुबे के पिता रवि दुबे यह कहते हैं कि ये सारे खून उसने किये हैं । उनका यह कथन एक अवांतर क्षेपक और जैसे दौड़ते हुए अपराध-कथा में रहस्योद्घाटन के विस्मय का लाभ पा लेने की हास्यास्पद कोशिश सा लगता है ।  अपराध की जांच-रिपोर्ट और उपन्यास की कथा, दोनों लिए ही कोई ऐसी स्वीकारोक्ति का कोई महत्व नहीं है । 

कहना न होगा, ‘पिशाच’ का यह आत्म-स्वीकृतिमूलक ढांचा ही इसे रहस्य-रोमांच पर टिके अपराध साहित्य के दायरे से बाहर कर देता है । अब इस पर यदि विचार हो सकता है तो सिर्फ एक ऐसे चरित्र की कहानी मान कर विचार किया जा सकता है जो 28 साल पहले, बचपन में एक कवि के द्वारा बलात्कृत होने के भाव को अपने अंदर पाले हुए थी और आश्चर्यजनक रूप में इतने सालों की लंबी तैयारी करके वह न सिर्फ उस कवि की बल्कि और भी कई बलात्कारियों की सुनियोजित नृशंस हत्या का तांडव करती है ।

फ्रायडियन नजरिये से विचार करे तो पहली नजर में ही कोई भी इसे एक हिस्टेरिक चरित्र की कहानी कह देगा । उस पर बलात्कार हुआ या नहीं या उसने किसी की हत्या भी की या नहीं, पर वह अपनी कल्पना में एक ऐसी पूरी कहानी गढ़ लेता है जिसमें उसका परिवेश, उसके संबंध में आने वाले व्यक्ति अजीब प्रकार से उसे बिल्कुल नंगे दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें देख कर वह बौरा जाती है । मनोविश्लेषण में यह माना जाता है कि सामाजिक यथार्थ का सबसे नग्न रूप किसी पागल के व्यवहार में ही प्रकट होता है जो सत्य और अनुभूति की मध्यस्थता करने वाले प्रतीकात्मक संजाल को तोड़ कर अलग हो चुका होता है । हिस्टेरिक दौरों में वह उन तमाम चीजों को बिल्कुल साक्षात देखने लगता है जो कभी घटित ही नहीं हुआ, फिर भी घटित होने की संभावनाओं से भरा हुआ सत्य होता है और उसके बल पर ही चरित्र अपनी एक पूरी कहानी बुन लेता है । फ्रायड की यह मान्यता थी कि किसी भी मनोविश्लेषक के लिए विश्लेषण की सही दिशा पकड़ने के लिए सबसे पहली शर्त होती है कि वह मनोरोगी की अपने अहम् से निकली हुई, अर्थात् अपने पक्ष में कही गई बातों को एक सिरे से खारिज करता हुआ आगे बढ़े । उसे जरा भी मूल्य देने का अर्थ होता है शुरू में ही विश्लेषण को गलत दिशा में मोड़ देना । 

‘पिशाच’ में यथार्थ के जिस विश्लेषण को कथा का विषय बनाया गया है वह विश्लेषण ऐसे ही मूलभूत दोष से दूषित है । इसीलिये इसमें शुरू से ही किसी नए अवबोध के रोमांच की कोई संभावना नहीं रहती है । लेखन का उद्देश्य महज तात्कालिक उत्तेजना देने की किस्सागोई तक सीमित रह जाता है । शर्लोक होम्स की तरह छोटी-छोटी चीजों से विषय के रहस्य के अनपेक्षित पक्षों को उजागर करने की प्रखर अन्तर्दृष्टि का परिचय पाने की भी कोई संभावना नहीं बचती, क्योंकि लेखक तो अपराधी के आत्म-कथन को ही ध्रुव सत्य मान कर दोहरा भर रहा होता है । 

काली अचानक 28 साल बाद ही क्यों बलात्कारियों के प्रति नफरत से भर कर इतनी संवेदनशील हो जाती है कि अपनी पहचान के सभी बलात्कारियों का सिर कलम कर देने के अभियान में उतर पड़ती है, ऐसी अवास्तविक कहानी की सच्चाई को काली में नहीं उसके बाहर से देखने की जरूरत थी । तब जाहिर होता कि कैसे जीवन की घटनाएँ और परिवेश में होने वाली उथल-पुथल से आदमी इस कदर पागल हो जाता है कि वह अपने वर्तमान जीवन की सारी बलाओं के लिए पंडित नेहरू को जिम्मेदार मानने लगता है ! ‘पिशाच’ की कहानी ऐसे भक्तों की कहानी से जरा भी भिन्न नहीं है । पर लेखक उसे सच मान कर पेश करता है और इसके चलते इस कथा में आने वाले तमाम जाने-पहचाने चरित्र भी कहानी के ताने-बाने से खुल कर सामने आने के बजाय और ज्यादा रहस्यमय हो कर रह जाते हैं । पूरा उपक्रम रहस्योद्घाटन का नहीं, रहस्योत्पादन का उपक्रम बन जाता है । टेलिविजन के न्यूजरूम के ब्यौरे भी इसमें कथा के बेडौलपन के चलते अर्थहीन से हो जाते हैं ।           

शायद हिंदी के जासूसी और सस्ते पाकेटबुक्स उपन्यासों का ऐसा ही सत्यकथाओं वाला उथलापन उन्हें किसी भी गंभीर साहित्यिक समीक्षा का विषय बनने से रोकता है । 


रविवार, 12 सितंबर 2021

एक विमर्श से खुलती गाँठों की कहानी

अरुण माहेश्वरी


 

‘सत्य हिंद’ वेब पोर्टल पर ‘आशुतोष की बात’ कार्यक्रम में दो दिन पहले की एक लगभग डेढ़ घंटा की चर्चा को सुना जिसका शीर्षक था — ‘हिंदुत्व पर बहस से डरना क्यों’ । संदर्भ था ‘विश्व हिंदुत्व को ध्वस्त करने’ के विषय में दुनिया के कई विश्वविद्यालयों का एक घोषित अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार । 


इस चर्चा में आशुतोष के अलावा जिन चार लोगों ने हिस्सा लिया उनमें दो, नरेन्द्र तनेजा और राहुल देव के भाजपा के पक्ष के रुझान को हर कोई जानता है । नरेन्द्र तनेजा ने तो खुद स्वीकारा कि वे भाजपा के अंदर के व्यक्ति है और पूरी बहस में अपनी दलीलों की प्रामाणिकता के तौर पर तर्क के बजाय अपनी इस स्थिति के प्रयोग से कोई परहेज भी नहीं कर रहे थे । राहुल देव की पहचान हमेशा से सत्ता के गलियारों में घूमने वाले पत्रकार की रही है । आज जब लंबे सात साल से केंद्र में भाजपा की सरकार है तब उनमें भाजपा में सारे गुण खोज लेने की प्रवृत्ति की प्रबलता के लक्षण न दिखने का कोई कारण नहीं है । 


बाकी दो थे —  अभय दुबे और विनोद अग्निहोत्री । दोनों ही जाने-माने पत्रकार और साफ तौर पर सांप्रदायिकता विरोधी सेकुलर विचारों के ऐसे व्यक्ति हैं जो अक्सर यथार्थ-परकता के दबाव में अपने विचारधारात्मक तात्त्विक औजारों को एक बार के लिए परे रखते हैं, पर किसी भी मौके पर भाजपा-आरएसएसस के छल-छद्म और उनकी विभाजनकारी राजनीति के मिथ्याचारों पर से पर्दा उठाने से नहीं चूकते । 


जहां तक आशुतोष का सवाल है, उनकी हमेशा की एक वैचारिक पहचान होने पर भी जब वे ऐंकर की कुर्सी पर होते हैं, अपनी बातों को कुछ इस प्रकार के गदलेपन के साथ रखते हैं कि उसके धुंधलके में अन्य प्रतिभागियों की बातों पर ऐसी तिरछी रोशनी गिरती है, जो उनकी बातों के प्रकट रूप के लिए एक वेधक का काम करती है । आशुतोष के प्रस्तुतीकरण  की तरलता से ही प्रतिभागी अपने को कहीं ज्यादा खोलने के लिए उत्साहित होते हैं, और पूरी चर्चा के अंत में या तो बदले हुए या फिर हाथ मलते हुए दिखाई देने लगते हैं ।


ऐंकरिंग की यह एक कला है जो हिप्नोटाइज करने वाले खुली बहस के आमंत्रण से रोगी को अनायास ही उसके लक्षणों के मूल स्रोत के सामने खड़ा कर देता है । प्रतिभागी उससे कितना ग्रहण करते हैं कोई नहीं जानता, पर दर्शक-श्रोता के लिए प्रतिभागियों का सच मंच के प्रहसन में साफ दिखाई देने लगता है ।


बहरहाल, इस चर्चा का मूल विषय बन गया था — हिंदुत्व । हिंदुत्व की सावरकर की अवधारणा और हिंदुत्व के नाम पर आईटीसेल और आरएसएस के अनुषंगी संगठनों की वैचारिक-व्यवहारिक गतिविधियां । इस चर्चा में हमें प्रतिभागियों के बीच तीन बिंदुओं पर एक आम सहमति दिखाई दी । 


पहला, हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक चीज नहीं है । सावरकर ने हिंदुत्व की अवधारणा पेश की थी । आरएसएस की सावरकर से कितनी भी सहमति-असहमति क्यों न रही हो, पर उनकी यह हिंदुत्व की राजनीतिक धारणा आरएसएस के लिए एक बीज विचार के तौर पर हमेशा से रही है । उनके शासन का वर्तमान काल इसी बीज विचार की सीमाओँ और संभावनाओं की तस्वीर पेश कर रहा है । 


दूसरा, आरएसएस अपने जन्म के वक्त जो था, वह आज नहीं है । उसमें कैसा और कितना बदलाव आया है, इस पर सबकी अपनी-अपनी राय थी । लेकिन जहां तक उसके मूल स्वरूप में बदलाव का पहलू है, इसे सब आरएसएस की जमीनी गतिविधियों के बजाय उसके नेताओं की समय-समय पर अलग-अलग बातों के हवाले से बता रहे थे । हेडगेवार-गोलवलकर जिस भाषा में बात करते थे, हूबहू उसी भाषा में देवरस और भागवत नहीं बोलते हैं । पर साथ ही बहस में संघ के अंदर से पैदा होने वाली उग्रपंथी चुनौतियों के संदर्भ में प्रच्छन्न रूप से यह भी माना जा रहा था कि आरएसएस सावरकर के विचार और हेडगेवार-गोलवलकर की कार्यपद्धति से उत्पन्न अन्तरबाधाओं से अभिन्न रूप में ग्रसित है । 


तीसरा, प्रतिभागियों का मानना था कि भाजपा-आरएसएस के आकलन में पुरानी तात्त्विक बातें काम की नहीं बची है । वे जितनी पुरानी है आज का संघ उतना पुराना नहीं है ! वे आज देश की सत्ता पर है !


चर्चा में आम सहमति की इन तीन बातों के अलावा हिंदू धर्म आदि पर जो दिखावे की बातें हुई, उनका संघ के हिंदुत्व से कोई संबंध नहीं है, इसे तो शुरू में ही मान लिया गया था । ऐसे में उनके हवाले से  हिंदुत्व-विरोधी अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजकों को जान से मार देने तक की धमकियों और अपशब्दों पर पर्दादारी की कोशिश एक प्रकार का मिथ्याचार ही था । यह जो हो रहा है उससे इंकार तो प्रत्यक्ष से इंकार की तरह है । आज आरएसएस-भाजपा की कार्यपद्धति का यह एक सर्वज्ञात-सर्वमान्य रूप है । इसी संदर्भ में हमने देवदत्त पटनायक के एक साक्षात्कार को फेसबुक पर साझा किया है जिसमें उन्होंने अपने मिथकीय तत्त्वों के आधार पर जीवन में श्रीवृद्धि से जोड़ कर सनातन धर्म के सम्यक रूप को रखा है ।


हमारी नजर में ‘सत्य हिंदी’ की इस लंबी चर्चा में विषय को परखने का जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू एक सिरे से छूट गया, वह यह था कि एक जनतांत्रिक समाज में राजनीतिक दल, वह भले आरएसएस की तरह संस्कृति के नकाब में ही क्यों न काम करें, का मायने क्या है ? वे हमेशा खास वैचारिक-सामाजिक समूहों के समुच्चय होते हैं । पूरा राजनीतिक यथार्थ इनके एक समग्र समुच्चय से बनता है । इन सबके अपने कुछ आंतरिक अन्तर्विरोध होते हैं, तो अन्य समुच्चयों के साथ भी इनके संपर्क और अन्तर्विरोध होते हैं । इनके आधार पर ही वह समीकरण तैयार होता है जिससे पूरे समाज की द्वंद्वात्मक गति का रूप तैयार होता है । सवाल है कि इस द्वंद्व में आरएसएस-भाजपा का समुच्चय किसका प्रतिनिधित्व करता है ? क्या वे समन्वयवादी धर्म-निरपेक्षता के खिलाफ विभाजनकारी सांप्रदायिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करते ? क्या इनके इस सत्य को इनके चंद नेताओं के कुछ भाषणों से खारिज किया जा सकता है ? कोई भी राजनीतिक विश्लेषक अगर देख सकता है तो वह इन बातों से सिर्फ आरएसएस-भाजपा की मृत्यु के संकेतों को देख सकता है । इसके अलावा इन बातों का कोई दूसरा मायने नहीं हो सकता है । 

 

जो भी हो, ‘सत्य हिंदी’ की इस बहस के अंत में हमें राहुल देव जहां यह कहते हुए दिखाई दिये कि यह सब चुनाव का खेल है जिसके लिए सब प्रकार के विभाजनकारी हथकंडे अपनाए जाते हैं, तो नरेन्द्र तनेजा भाजपा के अंदर अपनी उपस्थिति का हवाला देते हुए यह विश्वास दिला रहे थे कि यकीन मानिये, भाजपा इस देश को तोड़ना नहीं, एक महाशक्ति के रूप में मजबूत करना चाहती है ! आरएसएस के सत्य को जो जानते हैं, वे यह जानते हैं कि यह अन्ततः एक गोपनीय संगठन है । ऐसे संगठनों का सच उन सभाओं में सामने नहीं आता है, जिनमें तनेजा की तरह के बौद्धिकों की भी उपस्थिति हुआ करती है ! अभय दुबे, विनोद अग्निहोत्री और खुद आशुतोष को अब और दलीलों की जरूरत नहीं रह गई थी ।