शनिवार, 31 अगस्त 2019

प्रोफेसर रोमिला थापर का अपमान ज्ञान के जगत के अपमान से कम नहीं है

-अरुण माहेश्वरी



प्रोफ़ेसर रोमिला थापर से जेएनयू प्रशासन ने उनका सीवी, अर्थात् उनके अकादमिक कामों का लेखा-जोखा माँगा है ताकि वह उनको दिये गये प्रोफ़ेसर एमिरटस के पद पर पुनर्विचार कर सके ।

जाहिर है कि यूनिवर्सिटी की यह माँग उनके द्वारा किसी प्रकार की जाँच या अपने रेकर्ड को अद्यतन करने का प्रस्ताव नहीं है । यह सीधे तौर पर भारत के एक श्रेष्ठ शोधकर्ता, दुनिया में प्रतिष्ठित इतिहासकार और एक प्रखर और निडर बुद्धिजीवी का आज के सत्ताधारियों के द्वारा किया जा रहा खुला अपमान है ।

प्रोफेसर थापर दुनिया के उन चंद इतिहासकारों में एक हैं जिनके भारतीय इतिहास के प्राचीन काल के तमाम शोधों को सभ्यता और आबादी संबंधी आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रविधियों तक ने पूरी तरह से पुष्ट किया है । हमें यह कहने में ज़रा भी हिचक नहीं है कि भारतीय इतिहास के प्राचीनकाल के बारे में प्रोफेसर रोमिला थापर के शोध कार्यों के बिना आज तक हम सचमुच अपने राष्ट्र के इतिहास के संबंध में बैठे-ठाले गप्पबाजों की कपोल-कल्पनाओं के अंधेरे में ही भटकते रहते । कोई हमें हज़ारों वर्षों से जंगलों में रहने वाले जीव-जंतुओं की श्रेणी में बताता रहता, तो इसके विपरीत कोई हमें हज़ारों साल पहले ही विज्ञान की अब तक की सभी उपलब्धियों का धारक, ‘विश्वगुरु’ होने के मिथ्या गौरव के हास्यास्पद अहंकार में फँसाये रखता, जैसा कि अभी किया जा रहा है ।

इन सबके विपरीत, यह प्रोफेसर थापर के स्तर के इतिहास के लगनशील शोधकर्ताओं का ही कर्त्तृत्व है कि हम आज दुनिया की एक प्राचीनतम, भारतीय सभ्यता के तमाम श्रेष्ठ पक्षों को ठोस और समग्र रूप में वैश्विक संदर्भों में देख-परख पा रहे हैं ।

प्रोफेसर थापर का व्यक्तित्व और कृतित्व शुरू से ही भारत में आरएसएस की तरह की पोंगापंथी हिन्दुत्ववादी शक्तियों के लिये नफरत का विषय रहा है । उनकी युगांतकारी पुस्तकें, ‘भारत का इतिहास’, ‘Ashoka and the Decline of Mauryas’, ‘The Aryan : Recasting Constructs’ हमारे इतिहास के विकृतिकरण की हर मुहिम के रास्ते की सबसे बड़ी बाधाओं की तरह काम करती रही हैं । भारत में आर्यों के विषय में उन्होंने जिन पुरातात्विक, मानविकी, भाषाशास्त्रीय और जनसांख्यिकीय साक्ष्यों आदि के आधार पर सालों पहले जो तमाम सिद्धांत पेश किये थे, उन्हें आबादियों की गतिशीलता के बारे में अध्ययन के सर्वाधिक नवीन और वैज्ञानिक, जेनेटिक (आनुवंशिक) जाँच के औज़ारों से किये गये अध्ययनों ने भी सौ फ़ीसदी सही साबित किया है ।

इसके विपरीत, कुछ पश्चिमी पौर्वात्यवादियों, संघी प्रचारकों और आत्म-गौरव की उनकी झूठी, काल्पनिक अवधारणाओं से प्रभावित लोग अपने प्रतिक्रियावादी सामाजिक उद्देश्यों के लिये शुद्ध माँसपेशियों और आवेग की शक्ति से  इतिहास का मनमाना पाठ तैयार करने में लगे हुए हैं । इनकी गलत भविष्य दृष्टि ही अतीत के प्रति इनके तमाम गलत पूर्वाग्रहों के मूल में काम कर रही है ।

प्रोफेसर रोमिला थापर का काम न सिर्फ अपने गहन शोध कार्यों से इनके कोरे कल्पना-प्रसूत इतिहास के निष्कर्षों को खारिज करता है, बल्कि इतिहास को देखने-समझने की प्रो. थापर की वैज्ञानिक दृष्टि, जो अतीत के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण नज़रिये की कमियों को बताने वाली इनकी कई पुस्तकें मसलन् ‘The Past as Present’ , ‘History and Beyond’ आदि से जाहिर होती है, इतिहासकारों की तमाम नई पीढ़ियों के लिये प्रकाश स्तंभ का काम कर रही है ।

इसके अलावा प्रो. थापर ने हमेशा प्रकृत अर्थों में एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका अदा की है । हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘The public intellectual in India’ में भी उनके योगदान को काफी सराहा गया है ।

भारत की एक ऐसी, लगभग किंवदंती का रूप ले चुकी वयोवृद्ध, सत्तासी वर्षीय रोमिला थापर से उनके अकादमिक कामों का लेखा-जोखा माँगना सचमुच एक विश्वविद्यालय के प्रशासन की अज्ञता और उसके दर्पपूर्ण व्यवहार का चरम उदाहरण है । यह ज्ञान के क्षेत्र को नष्ट-विनष्ट कर देने के वर्तमान सता के मद का निकृष्ट उदाहरण है ।

इसकी जितनी निंदा की जाए कम है ।



गुरुवार, 29 अगस्त 2019

यह आर्थिक संकट खास राजनीति से जुड़ा हुआ है

-अरुण माहेश्वरी


काला धन और सफ़ेद धन का फ़र्क़ यही है कि जिस धन में से सरकार के राजस्व का शोधन कर लिया जाता है, वह काले से सफ़ेद हो जाता है । एक कच्चा तेल है और दूसरा परिशोधित ।

चीन के चार आधुनिकीकरण से जुड़े औद्योगीकरण के इतिहास पर यदि ग़ौर करें तो पायेंगे कि उन्होंने विदेशी निवेश पर मुनाफ़े को पूरी तरह से कर मुक्त करके, अर्थात् सौ फ़ीसदी मुनाफ़ा अपने घर ले जाने का अधिकार देकर अपने यहाँ रेकर्ड विदेशी निवेश को आकर्षित किया था । इसके पीछे तर्क यह था कि निवेश से जुड़ी औद्योगिक गतिविधियाँ स्वयं में चीनी गणराज्य और उसकी जनता के लिये भारी मायने रखती हैं । वह खुद में समाज में किसी राजस्व से कम भूमिका अदा नहीं करता है ।

भारत में रिलायंस के औद्योगिक साम्राज्य के विस्तार के इतिहास को देखेंगे तो पायेंगे कि दशकों तक यह कंपनी तत्कालीन आयकर क़ानून का लाभ उठा कर शून्य आयकर देने वाली कंपनी बनी रही थी । तब कंपनी की आय के पुनर्निवेश में आयकर की राशि को पूरी तरह से समायोजित करने का अधिकार मिला हुआ था । इसीलिये मुनाफ़े की राशि पर कर देने के बजाय उसने उसके पुनर्निवेश का रास्ता पकड़ा ।

कहने का तात्पर्य यह है कि सफ़ेद धन हो या काला धन हो, किसी भी तर्क से यदि पूँजी के रूप में उसकी भूमिका को बाधित किया जाता है तभी वह धन मिट्टी में गड़ा हुआ धन हो जाता है । अन्यथा, पूँजी के रूप में उसकी सामाजिक भूमिका में दूसरा कोई फ़र्क़ नहीं होता है ।

कहना न होगा, जिस अर्थ-व्यवस्था में निवेश का संकट पैदा हो गया हो, उसमें हर प्रकार के धन को पूँजी में बदलने का उपक्रम ही इस संकट से निकलने का एक सबसे फ़ौरी और अकेला उपाय होता है ।

अब यह किसी भी सरकार पर निर्भर करता है कि अर्थ-व्यवस्था के बारे में उसका आकलन क्या है और उसकी प्राथमिकता क्या है । वह निवेश के विषय को किस रूप में देखती है ! वह सिर्फ अपनी आमदनी को लेकर चिंतित रहती है या समग्र रूप से आम जनता के जीवन-जीविका के बारे में सोच रही है !

नोटबंदी और जीएसटी से लेकर मोदी सरकार की अब तक की पूरी कहानी तो यही कहती है कि जनता की आमदनी का विषय इस सरकार के सोच में सबसे अंतिम पायदान की चीज है ।

सरकार की आमदनी भी जब पूँजी-निवेश का रूप नहीं लेती है, जैसा कि मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल में हो रहा है, और वह तमाम फिजूलखर्चियों और आयुधों की ख़रीद में ख़त्म हो जाती है, तो संकट दुगुना हो जाता है । भारत अभी एक तानाशाही निज़ाम के द्वारा तैयार किये गये इसी दोहरे संकट की चपेट में है ।

‘ईज आफ़ डूइंग बिजनेस’ का मसला सिर्फ लाल फ़ीताशाही की तरह का प्रक्रियागत मसला नहीं है । आदमी का मजबूरी में, जीने मात्र के लिये उद्यम करना एक बात है, जैसा कि सभी लोग करते ही है । लेकिन पूँजीवाद का अर्थ है मुनाफ़े के लिये, अतिरिक्त मुनाफ़े के लिये उद्यम की वासना पैदा करना । इसके साथ ही आदमी की अपनी स्वच्छंदता का भावबोध जुड़ जाता है जो सभ्यता के जनतांत्रिक चरण का व्यक्ति-स्वातंत्र्य का नया मूल्यबोध तैयार करता है ।

सत्ता में राजशाही की तरह का फासीवादी रुझान पूँजी पर आधारित इस पूरे आर्थिक और विचारधारात्मक ढाँचे के अस्तित्व के लिये संकट पैदा करने लगता है । मोदी के भारत में इसके लक्षणों को बहुत साफ देखा जा सकता है ।

‘ईज आफ़ डूईंग बिज़नेस’ के नाम पर उठाये गये इस सरकार के सारे कदम व्यापार के जोखिमों को, खास तौर पर सरकारी दंड-विधान के ख़तरों को काफी बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं । अपनी ताक़त का थोथी प्रदर्शन करने के लिये मोदी कहते थे कि वे लाखों इंस्पेक्टरों का काला धन रखने वालों के खिलाफ शिकारी कुत्तों की तरह प्रयोग करेंगे । यहाँ तक कि मोदी की एकाधिकारवादी राजनीति भी अर्थजगत में ख़ौफ़ को बढ़ाने का कम काम नहीं कर रही है । समग्र रूप से किसी भी प्रकार की आपदा के डर का माहौल तमाम आर्थिक गतिविधियों को स्थगित कर देने के लिये काफी होता है ।

इन सबसे अर्थ-व्यवस्था में जो संकट तैयार होता है, उसे कोई भी, जैसा कि रिजर्व बैंक ने कल ही किया है, एक चक्रक ( साइक्लिक) संकट बता कर शुतरमुर्गी मुद्रा अपना सकता है, लेकिन सच यही है कि भारत का वर्तमान संकट माँग और आपूर्ति में समायोजन से जुड़ा अर्थ-व्यवस्था का चक्रक संकट नहीं है । इसका सीधा संबंध मोदी की राजनीतिक सत्ता से जुड़ा हुआ है, माँसपेशियों के बल पर शासन के उनके राजनीतिक दर्शन से जुड़ा हुआ है । इसमें उनकी कश्मीर नीति को इस दिशा में उनके अंतिम योगदान के रूप में देखा जा सकता है ।

इसीलिये हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि इस संकट का समाधान राजनीति में है, न कि महज आर्थिक लेन-देन की पद्धतिगत व्यवस्थाओं या नौकरशाही की गतिविधियों में । इतिहास का सबक है कि तानाशाहियां आर्थिक संकट की परिस्थिति में पैदा होती है और तानाशाहियां आर्थिक संकट को पैदा करती है ।

न्यायपालिका पर मँडराता संकट उसकी अपनी पहचान का संकट है

—अरुण माहेश्वरी


सेवानिवृत्ति के दो दिन पहले अनायास ही, बिना किसी आधार के, पी चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया मामले में घूसख़ोरी और रुपयों की हेरा-फेरी का प्रमुख अपराधी घोषित करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जज सुनील गौड़ ने कल खुद सरकार से घूस के तौर पर एक अपीलेट ट्राइबुनल के अध्यक्ष का पद लिया है । चिदंबरम मामले में सरकार के रुख को देख कर तो लगता है कि वह उन्हें अंत में ‘राष्ट्र के अस्तित्व के लिये ख़तरनाक’ कह कर भी जेल में बंद रखेगी, जैसा कि देश के कई प्रमुख बुद्धिजीवियों को रखे हुए है । थोथी प्रक्रियाओं की जंजीरों से बंधा न्याय अपने सत्व को गंवा कर कोरे कुतर्क की श्रेणी में पहुंच जाता है । जाहिर है कि ऐसी स्थिति में हमेशा की तरह क़ानून अपनी अंधता का प्रदर्शन करेगा ।


मुंबई हाईकोर्ट के एक जज सारंग कोतवाल ने एलगार परिषद - भीमा कोरेगांव मामले में सामाजिक कार्यकर्ता वेरोन गोनसाल्वे से इस बात की सफ़ाई माँगी है कि उनके घर पर तालस्ताय के विश्व क्लासिक ‘वार एंड पीस’ की प्रति क्यों पड़ी हुई थी !

सुप्रीम कोर्ट के जज अरुण मिश्र ने अभिव्यक्ति की आज़ादी की तरह के नागरिक के मूलभूत संवैधानिक अधिकार को भी शर्त-सापेक्ष बताया है । वे अमित शाह के बेटे जय शाह के द्वारा ‘द वायर’ पर किये गये मुक़दमे के एक प्रसंग में ‘द वायर’ की याचिका को स्वीकारते हुए भी ‘द वायर’ को धमका कर प्रकारांतर से अमित शाह को आश्वस्त रहने का संकेत भेज रहे थे ।

और, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सीताराम येचुरी को कश्मीर जाने की अनुमति देते हुए भी उनकी नागरिक स्वतंत्रता को अनुलंघनीय मानने से इंकार किया और उस पर भी कुछ शर्तें लाद दी है ।

एक दिन में भारतीय न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तरों से पतन के इतने लक्षणों का सामने आना किसी भी न्याय-प्रेमी भारतवासी के कान खड़े कर देने के लिये काफी है । चंद रोज़ पहले कोलकाता की अदालत के एक मजिस्ट्रेट ने शशि थरूर की गिरफ़्तारी का वारंट इसलिये जारी कर दिया क्योंकि उन्होंने खुद उपस्थित हो कर अपनी उस बात पर सफ़ाई नहीं दी कि वे भारत को ‘हिंदू पाकिस्तान’ नहीं देखना चाहते हैं !
बहरहाल, यह एक वाजिब सवाल हो सकता है कि हमारे लोकतंत्र के स्तंभ माने जाने वाले विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका अथवा प्रेस का ही अपना  खुद का सत्य क्या होता है ? क्या हमारे लोकतंत्र की दुनिया की सचाई के बाहर भी इनके जगत का अपना-अपना कोई स्वतंत्र, स्वाधीन सत्य भी होता है ?

जब भी हम किसी चीज की विशिष्टता की चर्चा करते हैं, वह विशिष्टता आखिरकार इस दुनिया के बाहर की कोई चीज नहीं होती । वह इस दुनिया के तत्वों से ही निर्मित होती है । वह अन्य चीजों से कितनी ही अलग या पृथक क्यों न हो, उनमें हमेशा एक प्रकार की सार्वलौकिकता का तत्व हमेशा मौजूद रहता है । उनकी विशिष्टता या पृथकता कभी भी सिर्फ अपने बल पर कायम नहीं रह सकती है । इसीलिये कोई भी अपवाद-स्वरूप विशिष्टता उतनी भी स्वयंभू नहीं है कि उसे बाकी दुनिया से अलग करके देखा-समझा जा सके ।

यही वजह है कि जब कोई समग्र रूप से हमारे लोकतंत्र के सार्वलौकिक सत्य से काट कर उसके किसी भी अंग के अपने जगत के सत्य की पवित्रता पर ज्यादा बल देता है तो कोरी प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है । इनकी अपवाद-स्वरूपता में भी हमेशा लोकतंत्र के सत्य की सार्वलौकिकता ही किसी न किसी रूप में व्यक्त होती है । इसीलिये जब एक ओर तो लोकतंत्र मात्र का ही दम घोट देने की राजनीति चल रही हो और दूसरी ओर उसके संघटक तत्वों के अपने जगत की स्वतंत्रता और पवित्रता का जाप किया जाता हो — यह मिथ्याचार नहीं तो और क्या है !

न्यायपालिका हो या इस दुनिया के और क्षेत्रों के अपने जगत का सत्य, वह उसी हद तक सनातन सत्य होता है जिस हद तक वह उसके बाहर के अन्य क्षेत्रों में भी प्रगट होता है । अर्थात जो तथ्य एक जगत को विशिष्ट या अपवाद-स्वरूप बनाता है, उसे बाकी दुनिया के तथ्यों की श्रृंखला में ही पहचाना और समझा जा सकता है। इनमें अदृश्य, परम-ब्रह्मनुमा कुछ भी नहीं होता, सब इस व्यापक जगत के के तत्वों को लिये होता है ।

यह सच है जीवन के हर क्षेत्र के अपने-अपने जगत के सत्य अपनी अलग-अलग भाषा में सामने आते हैं । साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र के अपने भाषाई रूप होते हैं तो कानून के क्षेत्र के अपने, राजनीति के क्षेत्र के अपने । अर्थात, अपने को अन्यों से अलगाने के लिये वे अपनी खास भाषा पर निर्भर करते हैं, जिसका उन जगत में प्रयोग किया जाता है और निरंतर विकास और संवर्द्धन भी किया जाता है । लेकिन जिसे जीवन का सत्य कहते हैं — यथार्थ — वह तो सर्व-भाषिक होता है । वह एक प्रकार का जरिया है जिससे आप प्रत्येक विशिष्ट माने जाने वाले क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । वही सबको आपस में जोड़ता है । अन्यथा सच यह है कि किसी भी क्षेत्र की अपनी खुद की खास भौतिक लाक्षणिकताएँ बाकी दुनिया के लिये किसी काम की नहीं होती है । उनसे उस क्षेत्र की अपनी तार्किकता, उनके होने की संगति भी प्रमाणित नहीं होती । इन लाक्षणिकताओं से सिर्फ यह जाना जा सकता है कि बाहर की दुनिया के सत्य ने उस जगत विशेष को किस हद तक प्रभावित किया है । इनसे उस जगत की अपनी क्रियाशीलता या कार्य-पद्धति का अनुमान भर मिल सकता है । इस दुनिया में जिस काम को पूरा करने के लिये उन्हें नियोजित किया गया है, उसे हम इन लक्षणों से देख सकते हैं । लेकिन इनका कुछ भी अपना नैसर्गिक या प्रदत्त नहीं होता । इनका सत्य अपने संघटक तत्वों को एक क्रम में, अपनी क्रियाशीलता की एक श्रृंखला में जाहिर करता है । न्यायपालिका के आचरणों की श्रृंखला दुनिया में उसकी भूमिका को जाहिर करती है । इस प्रकार एक लोकतांत्रिक दुनिया के अखिल सत्य के एक अखंड राग में ये सारी संस्थाएं महज बीच-बीच के खास पड़ावों की तरह है, अपनी एक खास रंगत के बावजूद उसी राग का अखंड हिस्सा ।
इकबाल का शेर है — 'मौज है दरिया में / वरु ने दरिया कुछ भी नहीं ।'

सत्य को असीम और खास प्रजातिगत,  दोनों माना जाता है । उसकी खास क्षेत्र की विशिष्टता उसके अपवाद-स्वरूप पहलू को औचित्य प्रदान करते हैं, और बहुधा उस क्षेत्र के कारोबारियों के विपरीत एक नई समकालीन आस्था और विश्वास की जमीन तैयार करने का काम भी करती है । लेकिन हर हाल में वह इस व्यापक दुनिया के सच को ही प्रतिबिंबित करती है ।

यही वजह है कि मार्क्स अपने दर्शनशास्त्रीय विश्लेषण में समाज में संस्कृति, न्याय, कानून और विचार के तत्वों के ऊपरी ढांचे को उसके आर्थिक आधार से द्वंद्वात्मक रूप में जुड़ा हुआ देखने पर भी अंतिम तौर पर आर्थिक आधार को ही समाज-व्यवस्था का निर्णायक तत्व कहने में जरा सा भी संकोच नहीं करते । इसे दुनिया के इतिहास ने बार-बार प्रमाणित किया है ।

हमारे यहां न्यायपालिका के सच को हमारी राजनीति के सच से काट कर दिखाने की कोशिश को इसीलिये हम मूलतः अपने लोकतंत्र के सत्य को झुठलाने की कोशिश ही कहेंगे । आरएसएस की तरह की एक जन्मजात वर्तमान संविधान-विरोधी शक्ति के शासन में सरकार के द्वारा संविधान की रक्षा की बातें मिथ्याचार के सिवाय और कुछ नहीं हो सकती हैं ! 
 
सचमुच, आज न्यायपालिका के सँभलने का समय आ गया है । उसकी चारदीवारियों में अब हर जगह सांप्रदायिक फ़ासिस्टों की विवेकहीन विक्षिप्तता की गूंज-अनुगूँज सुनाई देने लगी है । यह इसी प्रकार, अबाध रूप से जारी रहा तो कब हमारी न्यायपालिका भी राज्यपाल सत्यपाल मलिक की तरह के बेवक़ूफ़ और बड़बोले, थोड़ी से सत्ता पर फुदकने वाले सत्ता के दलालों का एक बड़ा जमावड़ा बन कर रह जायेगी, पता भी नहीं चलेगा ।

यह समय है जब न्यायपालिका को नये सिरे से संविधान के प्रति अपनी निष्ठा को दोहराते हुए अपने सच्चे कर्त्तव्यों की सुध लेनी चाहिए ।

इन नकारात्मकताओं के साथ ही इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में धारा 370, 35ए, कश्मीर के राज्य के दर्जे की समाप्ति, उसका बँटवारा, नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन, प्रेस की स्वतंत्रता आदि से जुड़े सभी सवालों को संविधान पीठ को सौंप कर भारतीय संविधान के मूलभूत जनतांत्रिक और संघीय ढांचे की रक्षा की एक नई संभावना पैदा की है । देखना है कि सुप्रीम कोर्ट फासीवादी सत्ता का कोई प्रतिरोध कर पाता है या नहीं !

तंत्रालोक में अभिनवगुप्त लिखते हैं :
स्वात्मन: स्वात्मनि स्वात्मक्षेपो वैसर्गिकी स्थिति :
(स्वयं में स्वयं के द्वारा स्वयं का क्षेप ही विसर्ग है ।)

यह सुप्रीम कोर्ट की अपनी पहचान की रक्षा की परीक्षा का समय है ।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष पर सरकार का पंजा : सरकार ने खुद को ही नि:स्व किया है


-अरुण माहेश्वरी

रिजर्व बैंक से अंतत: एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ रुपये केंद्र सरकार ने लेकर दिवालिया हो रही निजी कंपनियों के तारणहार की भूमिका अदा करने और चंद दिनों के लिये अपने खुद के वित्त में सुधार करने का जुगाड़ कर लिया है ।

दो दिन पहले ही वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों को सत्तर हज़ार करोड़ रुपये नगद देने और एनबीएफसी को अलग से हाउसिंग क्षेत्र में निवेश के लिये बीस हज़ार करोड़ देने की घोषणा की है । इसके अलावा, इसी साल, महीने भर बाद सितंबर से ही 36 रफाल लड़ाकू विमानों की पहली किश्त की डिलेवरी शुरू होगी जिसमें सरकार को बचे हुए लगभग उनसठ हज़ार करोड़ रुपये का भुगतान करना है । अर्थात् इन तीन मदों में ही सरकार पर लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त ख़र्च आना है । प्रत्यक्ष राजस्व संग्रह में कमी, जीएसटी से संग्रह में कमी और राज्य सरकारों के प्रति केंद्र की बढ़ती हुई देनदारी के चलते सरकार पर जो अतिरिक्त बोझ आया हुआ है, उन सबके लिये सरकार के पास रिजर्व बैंक की इस राशि से सिर्फ तीस हज़ार करोड़ बचेगा । इस पर भी उद्योग जगत अपनी गिद्ध-दृष्टि गड़ाए हुए हैं ।

अर्थात्, इन एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ में से सरकार को एक पैसा भी कृषि क्षेत्र के लिये या जन-हितकारी अन्य किसी भी काम के लिये अतिरिक्त मिलने वाला नहीं है । प्रतिरक्षा की कुछ खास ख़रीदों के अलावा बाक़ी रुपया बैंकों और उद्योग जगत के घाटों की पूर्ति में हवा हो जाने वाला है ।पिछले बजट में सरकार ने हूबहू यही एक लाख सत्तर हजार करोड़ का घाटा छोड़ा था । 

इस प्रकार, रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष को कम करके और उसके मुनाफे को लेकर सरकार ने एक प्रकार से अपनी आपदा-नियंत्रण शक्ति के साथ समझौता किया है, जिसका भारत की अन्तरराष्ट्रीय बाजार में साख पर निश्चित प्रभाव पड़ेगा ।

आगे देखने वाली चीज रहेगी कि अन्तरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियाँ मोदी सरकार के इस बदहवास कदम का किस प्रकार मूल्याँकन करती है । इसका निश्चित असर भारत में विदेशी निवेश के हर रूप पर पड़ेगा । बजट में घोषित सोवरन बांड की स्कीम को तो सरकार पहले ही ठंडे बस्ते में डाल चुकी है । अब रिजर्व बैंक की पतली हालत उसकी संभावना को और भी नष्ट करने के लिये काफी है ।

भारत में विदेशी निवेश पर गहरे असर की आशंकाओं के कारण ही अब तक रिजर्व बैंक के अंदर से ही इसका विरोध किया जा रहा था । लेकिन अंतत: सरकार ने विमल जालान कमेटी से सिफ़ारिश करवा कर और अपने कठपुतले गवर्नर के ज़रिये इस कोष को हस्तगत कर ही लिया ।

विमल जालान कमेटी ने अपनी सिफ़ारिश में इस बात को खास तौर पर नोट किया है कि भारत दुनिया की एक सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थ-व्यवस्था है, इसीलिये सरकार अपने केंद्रीय बैंक से एक प्रकार की तात्कालिक लेने का यह जोखिम उठा सकती है । जालान कमेटी का यह तर्क कितनी बालूई ज़मीन पर टिका है, इसे भारतीय अर्थ-व्यवस्था में विकास की दर में आए भारी गतिरोध को देख कर कोई भी बहुत आसानी से समझ सकता है ।

लेकिन सरकार निरुपाय थी । जिस प्रकार उसके सामने अपने दैनंदिन ख़र्च उठाने की समस्या पैदा हो रही थी, उसमें कश्मीर के महँगे राजनीतिक खेल तक के लिये धन जुटाना उसके लिये समस्या बन सकता था । भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा हथियारों का ख़रीदार है । भारत की इसी सचाई पर उसकी सारी कूटनीति भी टिकी हुई है । ऐसे में रिजर्व बैंक का यह रिजर्व कोष ही उसके लिये डूबते को तिनके का सहारा बचा हुआ था । अब इसका प्रयोग करके सरकार ने खुद को और ज्यादा नि:स्व और भारत को बुनियादी रूप से काफी कमजोर किया है ।

नोटबंदी और कश्मीर नीति की तरह ही इसे भी भारत की तबाही के दूरगामी प्रभाव वाले मोदी सरकार के एक और कदम के रूप में ही देखा जाना चाहिए । वैसे बड़ी पूँजी से जुड़े जिन लोगों को इससे कुछ तात्कालिक लाभ होंगे, वे निश्चित तौर पर इसे मंदी-निवारक रामवाण औषधि का प्रयोग बता कर कुछ दिनों तक इसकी प्रशंसा का कीर्तन जरूर करेंगे ।

शनिवार, 24 अगस्त 2019

कश्मीर में कार्रवाई का आख़िर इनका लक्ष्य क्या है ?


-अरुण माहेश्वरी

अभी के समय का उनका यह कथन दुश्मनों के लिये कश्मीर के मुद्दे का नये सिरे से अन्तरराष्ट्रीयकरण करने का एक अच्छा बन सकता है ।

1947 के बाद से ही कश्मीर का विलय भारत में कभी विचार का कोई मुद्दा नहीं रहा है । बाद के दिनों में अलगाववाद और आतंकवाद जरूर मुद्दे रहे हैं । मोदी सरकार की दलील थी कि कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद धारा 370 की वजह से हैं ।

लेकिन अब, 5 अगस्त की कार्रवाई के एक पखवाड़े के बाद कहा जा रहा है कि धारा 370 को हटा कर कश्मीर के भारत में विलय के काम को पूरा कर लिया गया है । अब न आतंकवाद की चर्चा है और न अलगाववाद की ।

कोई यह नहीं दावा कर रहा है कि 5 अगस्त को धारा 370 के अंत और कश्मीर को सेना के सुपुर्द करके वहाँ से आतंकवाद और अलगाववाद को ख़त्म कर दिया गया है या किया जा रहा है ।

आज इन मुद्दों को गौण करके कश्मीर के भारत में विलय के उस मुद्दे को प्रमुखता दी जा रही है जो पहले कभी था ही नहीं । भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के बाद तो पाकिस्तान ने भी प्रकारांतर से भारत के अधिकार क्षेत्र में आने वाले कश्मीर को भारत का अंग मान लिया था ।

यह इस सरकार के एक अजीब से असंगत सोच का तीसरा बड़ा उदाहरण है । नोटबंदी के वक़्त मोदी ने कहा था देशसे सारा काला धन ख़त्म हो जायेगा । नक़ली मुद्रा औरआतंकवाद की भी कमर टूट जायेगी । लेकिन चंद रोज़ बाद ही इन मुद्दों को भुला कर दूसरी बातें दोहराई जाने लगी । डिजिटलाइजेशन प्रमुख हो गया। बैंकों की अपार आमदनी का ढिंढोरा पीटा जाने लगा । काला धन के मूल लक्ष्य को एक सिरे से ग़ायब कर दिया गया ।

इसी प्रकार, जीएसटी को आज़ादी के जश्न की तरह मनाया गया । दावा किया गया कि सरकार ने पूरी तैयारी करके इस एक कर के ज़रिये भारत की कर प्रणाली की सारी जटिलताओं को ख़त्म कर दिया है । लेकिन आज हालत यह है कि जीएसटी में जैसे हर रोज़ कोई न कोई परिवर्तन लगा रहता है । दो साल पूरे हो चुके है, चीज़ें सुलझने बजाय उलझती जा रही है । 17 जुलाई 2017 के जश्न का आज कोई भूल कर भी चर्चा नहीं करता है ।

जिस आधार पर कोई कदम उठाया जाता है, चंद दिनों बाद ही जब उस गलत कदम के दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं तब उसके मूल कारणों को भुला कर दूसरी बातें रटना इस सरकार का एक मूलभूत चरित्र साबित हो रहा है । यह इसकी विवेक-हीनता से उत्पन्न अहंकार का ही एक नमूना है ।  

दरअसल, मोदी और उनकी संघ मंडली की यह समस्या उनकी मूलभूत राजनीति की समस्या है । यह एक गलत, भटकी हुई और उन्मादपूर्ण राजनीति की समस्या है । वे घोषित रूप से तो भारत को एकजुट और मज़बूत करने की बात करते हैं, लेकिन सारे काम इसे अंदर से तोड़ने और कमजोर करने के करते हैं । जो राजनीति अपने घोषित लक्ष्यों से संगति नहीं रखती है, वह राजनीति कभी सही राजनीति नहीं हो सकती है ।

उनके ऐसे सभी उद्भट क़दमों के पीछे उनकी गलत एकात्मवादी राजनीति के तर्क काम कर रहे हैं । इन पर कोई भी विचार उस राजनीति के दायरे में मुमकिन नहीं है, बल्कि उससे बाहर एक सही, भारत के संघीय ढाँचे और धर्म-निरपेक्षता पर आधारित राजनीति के आधार पर ही किया जा सकता है ।

जैसे किसी पागल आदमी के इलाज के लिये उसे सुधार गृह में रखा जाता है और सामान्य तौर पर बीमार आदमी को अस्पताल में, वैसे ही सांप्रदायिक और एकाधिकारवादी उन्माद की शिकार सरकार का इलाज सामान्य तरीक़े से संभव नहीं है । इनकी राजनीति को पराजित करके ही देश को इनके इन तमाम कृत्यों से बचाया जा सकता है । ये जब तक सत्ता में रहेंगे, उन्माद के ऐसे नित नये उदाहरण पेश करते रहेंगे ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

मंदी और राजनीति-शून्य आर्थिक सोच की विमूढ़ता


-अरुण माहेश्वरी




अति-उत्पादन पूँजीवाद के साथ जुड़ी एक जन्मजात व्याधि है । इसीलिये उत्पादन की तुलना में माँग हमेशा कम रहती है । यही वजह है कि पूंजीवाद में हर एक चक्र के बाद एक प्रकार की संकटजनक परिस्थिति सामने आती ही है ।

लेकिन पूँजीवाद के इस चक्रिक संकट की चर्चा से भारत में अभी की तरह की मंदी की व्याख्या करना शायद अर्थनीति संबंधी सबसे जड़ बुद्धि का परिचय देना होगा ।

पूँजीवाद के इस संकट के कथन से सन् 1929 की महामंदी की कोई व्याख्या नहीं हो सकती है । वह इसे नहीं बताती है कि क्यों 1929 की तरह की डरावनी परिस्थिति दुनिया में बार-बार पैदा नहीं होती है ?

पूँजीवाद सिर्फ अति-उत्पादन ही नहीं करता है , वह उतनी ही गति से अपने उत्पादों की नई माँग भी पैदा करता है । नित नये उत्पादों से बाजार को पाट कर उपभोक्ताओं में उनकी लालसा पैदा करता है ।

माँग का संबंध अर्थनीति के सिर्फ भौतिक जगत से नहीं, आबादी के चित्त में उसकी क्रियात्मकता, उस जगत के अक्श से होता है । इसे ही पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया की द्वंद्वात्मकता कहते हैं ।

माल और उसके प्रति आदमी की लालसा के बीच की दूरी को पाटने के क्रम में ही अर्थ जगत में सक्रियता बनी रहती है ।

जब पूँजीवाद माल के प्रति लालसाओं को पैदा करने में असमर्थ होता है, अर्थजगत मंदी के भँवर में एक प्रकार से अंतहीन स्तर तक धँसता चला जाता है ।

आदमी में लालसाओं का संबंध उसकी आंतरिक ख़ुशियों से, भविष्य के प्रति उसकी निश्चिंतता और अपने रोज़गार के प्रति आश्वस्ति से होता है । सबसे अच्छा उपभोक्ता सबसे उन्मुक्त और उल्लसित मनुष्य ही हो सकता है ।

किसी भी वजह से डरे, दबे हुए और अस्तित्वीय चिंता में डूबे आदमी में कोई लालसा नहीं रहती है ।

1929 की महामंदी के अनुभवों की व्याख्या करते हुए जॉन मेनार्ड केन्स ने आर्थिक मंदी को आबादी के मनोविज्ञान से जोड़ते हुए कहा था कि जब यह मनुष्यो के मनोविज्ञान में पैठ जाती है तो इसे निकालना बहुत सख़्त होता है । इसके लिये वर्षों के आश्वस्तिदायक परिवेश की ज़रूरत होती है ।

कहना न होगा, भारत की अभी की मंदी बिल्कुल वैसी ही है जिसका सीधा संबंध सामाजिक मनोविज्ञान से है । इसके मूल में मोदी शासन, मोदी की तुगलकी नीतियाँ, घर की स्त्रियों के धन तक को खींच कर निकाल लेने का उनका अश्लील उत्साह, दमन और उत्पीड़न के प्रति गहरा आग्रह और सरकारी दमन-तंत्र के मनमाने प्रयोग की स्वेच्छाचारी नीतियाँ हैं ।

अर्थात्, अभी की भारत की मंदी की, जिसमें पार्ले जी के स्तर के सस्ते बिस्कुट का उत्पादन भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, कोई शुद्ध अर्थनीतिक व्याख्या संभव नहीं है । इस मंदी का सत्य अर्थनीति में नहीं, राजनीति में, समाज-नीति में निहित है ।

इसकी कोई भी शुद्ध आर्थिक व्याख्या, जितने भी गंभीर आँकड़ों के आधार पर की जाए, संतोषजनक नहीं हो सकती है । जन चित्त सिर्फ अर्थनीति से नहीं बनता है । इसमें अर्थनीति की निर्णायकता का तर्क भी इसलिये तात्कालिक दृष्टि से बेकार हो जाता है क्योंकि क्षितिज से मूलगामी आर्थिक परिवर्तन का विकल्प एक सिरे से ग़ायब है ।

आज भारत की मंदी से लड़ाई एक बड़े राजनीतिक संघर्ष की माँग कर रही है । जब तक राजनीति में कोई ऐसा मुक़ाम तैयार नहीं होता है, जो लोगों को उनकी दासता की भावना से मुक्त करके उल्लसित कर सके, इस मंदी से मुक्ति लगभग असंभव जान पड़ती है ।

इस मंदी से मुक्ति के लिये कृषि क्षेत्र और आम लोगों को मामूली राहतें देने वाले पैकेज की बातें सचमुच अर्थशास्त्रियों के सोच की सीमाओं को ही दर्शाती है । आज की मंदी पर अर्थशास्त्रियों की मंत्रणाएं विचार नहीं, विचार की कोरी मुद्राएँ लगती हैं । 1929 का अंत विश्वयुद्धों और उसके बाद के विश्व राजनीतिक भूचाल के रूप में सामने आया था, वैसे ही यह मंदी हमारे क्षेत्र में एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का कारक बने तो वह आश्चर्यजनक नहीं होगा । वातावरण में उन काली घटाओं के संकेतों को आसानी से पढ़ा जा सकता है ।

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

अर्थ-व्यवस्था के संकट का समाधान अर्थ-नीति के बाहर, राजनीति में खोजना होगा ।

आर्थिक तबाही को सुनिश्चित करने वाला जन-मनोविज्ञान !
-अरुण माहेश्वरी


चुनाव में मोदी की भारी जीत लेकिन जनता में उतनी ही ज्यादा ख़ामोशी ! मोदी जीत गये, भले जनता के ही मत से, लेकिन विडंबना देखिये कि वही जनता उनकी जीत पर स्तब्ध है !

2019 में मोदी की जीत सांप्रदायिक और राष्ट्रवादी उन्माद में होश खो चुके लोगों का एक अपराध था, और इस जीत पर उनकी स्तब्धता इस अवबोध की अभिव्यक्ति कि उन्हें जिता कर लोगों ने जैसे खुद को ही दंडित किया है ।

लोग दुखी, पीड़ित और त्रस्त हैं, लेकिन मोदी को जिता कर अपने ही अंदर के इस दुख, विरोध और प्रतिवाद के भाव से इंकार कर रहे हैं, बल्कि उसका दमन कर रहे हैं, उसकी हत्या, और आज भी 2014 के अपने मूलभूत पाप का तर्क खोज रहे हैं ।

कह सकते हैं कि अभी लोग विपक्ष को अस्वीकार कर वास्तव में अपने सत्य को ही अस्वीकार कर रहे हैं ।

मनोविश्लेषण में आत्म-दंड के ऐसे मामलों की बहुत चर्चा मिलती हैं । जाक लकान का एक प्रसिद्ध मामला था -ऐमी का मामला, जिस पर उनके कई सिद्धांत टिके हुए हैं । ऐमी ने अपने वक़्त की पैरिस की एक प्रसिद्ध नायिका पर छुरे से प्रहार किया था ।

उस नायिका में ऐमी अपनी हसरतों, अपनी कामनाओं को मूर्त रूप में देखती थी और महज इसीलिये वह उससे ईर्ष्या करने लगी थी । वह खुद अपने कारणों से या अपनी परिस्थितियों के कारण उस स्थिति में पहुँचने में असमर्थ थी । उसकी मौजूदगी ऐमी को अपनी कल्पना में खुद के लिये जैसे एक ख़तरा लगने लगी थी। इसीलिये उसने मौक़ा देख कर उस नायिका पर पागल की तरह वार कर दिया ।

बाद में, मनोविश्लेषण में पाया गया कि वह वास्तव में ऐसा करके खुद को ही दंडित कर रही थी । उसने अपने को उस नायिका से पूरी तरह जोड़ लिया था। एक पिछड़ी हुई विचारधारा की चपेट में आए लोगों ने अपने से ज्यादा शिक्षित, प्रगतिशील और विकसित सोच के लोगों को घसीट कर धराशायी कर दिया, यह जंगली उन्माद अब पाँच साल बाद देख रहा है कि उसकी कीर्ति स्वयं को दंडित करने के अलावा कुछ साबित नहीं हुई है। वह स्तब्ध है । वह लगभग पलायनवादी विक्षिप्तता में फँसती जा रही है ।

बेहाल अर्थनीति आज जानकारों की चिंता का विषय है, लेकिन इसके दुष्प्रभावों के भोक्ता आम लोग सांप्रदायिक विद्वेष और ‘राष्ट्रवाद’ का धतूरा पी कर मानों किसी परम मोक्ष को साधने में लगे हैं । वे इस सच को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं । भारतवासी ऐसी खुद की बुलाई हुई विपत्तियों के दुर्योग को आँख मूँद कर अस्वीकारने की कला में माहिर है । वे शर्म में अपना मुँह छिपाये घूम रहे हैं । मुँह छिपाये मोदी और उनके कुनबे के कोरे तांडव को बस देख रहे हैं । श्री राम के वंशजों की कथाएं सुन रहे हैं !

कहना न होगा, यही वैराग्य का जन-मनोविज्ञान हमारी अर्थ-व्यवस्था के चरम पतन को सुनिश्चित करने के लिये काफी है । जान मेनार्ड केन्स ने आर्थिक मंदी को जन-मनोविज्ञान का परिणाम बताया था, हम इसे आज साफ देख रहे हैं । अब तो मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के जश्न से ही जनता में नई लालसाओं का जोश पैदा होगा ; अर्थनीति की दिशा पलटेगी ।

अर्थ-व्यवस्था के इस चरम संकट का समाधान अर्थ-नीति के बाहर, राजनीति में खोजना होगा ।

शनिवार, 17 अगस्त 2019

आंख खोलने वाली फिल्म — द ग्रेट हैक


—अरुण माहेश्वरी


आज नेटफ्लिक्स पर दो घंटे का एक प्रकार का वृत्त चित्र देखा — The Great Hack  । 2016 में ट्रंप के चुनाव और फिर इंगलैंड में ब्रेक्सिट पर हुए जनमत-संग्रह में डाटा विश्लेषण के काम में लगी एक कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका (सीए) के कामों पर केंद्रित फिल्मनुमा वृत्तचित्र । इन दोनों मामलों में ही कैम्ब्रिज के कामों को यूरोप और अमेरिका की अदालतों में चरम अपराधपूर्ण पाया गया और अब तो उस कंपनी का रहस्यमय ढंग से नामो-निशान ही जैसे मिट गया है । इसके खिलाफ अपराधी मामलों में इसके अंदर के ही तमाम लोग मुखबिर बन गये थे ।

लोगों के व्यवहार का अध्ययन, एक दो नहीं, एक साथ लाखों लोगों के नितांत निजी व्यवहार का अध्ययन । अर्थात् एक देश की बड़ी आबादी के प्रत्येक सदस्य का संपूर्ण मनोवैज्ञानिक अध्ययन । अकेले सीए के पास अमेरिका के कुल आठ करोड़ सत्तर लाख लोगों के सारे डाटा उपलब्ध थे ।

गूगल, फेसबुक, अमेजन, टेस्ला आदि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की पूंजी है उनके पास उपलब्ध लोगों के बारे में डाटा का विशाल खजाना । इनके लिये आदमी ही इनका माल है । वे आदमी संबंधी सूचनाओं का नाना रूप में इस्तेमाल करके, यहां तक कि बेच कर भी खरबों डालर का अपना कारोबार चलाते हैं । दुनिया में जितने ऑनलाइन ऐप तैयार किये जाते हैं, वे सभी इन जानकारियों के आधार पर ही होते हैं जिनसे आम लोगों की जरूरतों का पता सिलिकन वैली के ऐप तैयार करने वालों को रहता है ।

बहरहाल, आदमी के व्यवहार से जुड़े जो डाटा अब तक उपभोक्ता मालों की बिक्री आदि के उद्देश्य से प्रयुक्त हो रहे थे, कैम्ब्रिज एनालिटिका में एलेक्सांद्र निक्स, ब्रिटनी काइसर, नाइगल फरागो, क्रिस्टोफर वाइले आदि ने उनका इस्तेमाल ट्रंप के चुनाव में और फिर ब्रेक्सिट में इतने बड़े पैमाने पर किया कि उन्होंने एक झटके में लोगों की राय को विकृत करके पासा पलट दिया । इनका भंडाफोड़ तब हुआ जब पॉल ओलिवर नाम के एक व्यक्ति ने खुद के बारे में कैम्ब्रिज एनालिटिका (सीए) के द्वारा जुटाये गये डाटा के खिलाफ मुकदमा करके यह स्थापित किया कि डाटा का अधिकार किसी भी व्यक्ति का अपना मूलभूत अधिकार है, इसके मनमाने इस्तेमाल की किसी को भी अनुमति नहीं मिल सकती है । उसने सीए को अपने बारे में डाटा के दुरुपयोग का अपराधी साबित कर दिया । बाद में तो अमेरिकी सिनेट और ब्रिटेन की पार्लियामेंट्री कमेटी के सामने फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग को भी सीए के साथ उनके संबंधों पर सफाई देने के लिये बुलाया गया था ।

सीए ने अमेरिकी चुनाव के लिये जिस प्रकल्प पर काम किया था उसका नाम था — प्रोजेक्ट एलामो । ब्रिटनी काइसर और उसके साथी अपने को डाटा साइंटिस्ट कहते हैं । ब्रिटनी 2015 के नवंबर महीने में ट्रंप से मिली थी । किसी समय में वह ओबामा के साथ काम कर रही थी । उनके फेसबुक पेज को देखती थी । लेकिन बाद में शुद्ध रूप से पैसों की खातिर ही उसने बिल्कुल विरोधी पक्ष के लिये काम करना शुरू कर दिया । कैम्ब्रिज एनालिटिका की बिजनेस डाइरेक्टर बन गई ।

सीए के इस समूह ने लोगों के बारे में सभी आनलाइन स्रोतों से सूचना एकत्रित करके उसे इतना विकसित कर लिया था जिसमें एक व्यक्ति को परिभाषित करने के लिये उनके पास पांच हजार डाटा प्वायंट, अर्थात् उसके चरित्र से जुड़ी पांच हजार विशेषताओं से लेकर सत्तर हजार डाटा प्वायंट तक इकट्ठे हो जाते हैं । वे उनके आधार पर किसी भी समूह के हर आदमी के व्यक्तित्व को जैसे पूरी तरह से परिभाषित कर सकते थे । इन सूचनाओं के आधार पर ही सीए ने आबादी के निश्चित समूहों में उन लोगों की सिनाख्त कर ली जो अपने मत पर दृढ़ नहीं होते हैं और जिन्हें थोड़े से प्रयासों से अपने पक्ष में लिया जा सकता है । अपनी इन्हीं सूचनाओं के विश्लेषण से वे यह भी समझ जाते हैं कि वे कौन सी बातें है जिन पर उन व्यक्तियों को भ्रमित करके उन्हें अपने पक्ष में किया जा सकता है । और फिर व्हाट्स ऐप आदि के जरिये वे उन लोगों के पास उन्हीं भ्रामक सूचनाओं की बमबारी शुरू करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं ।

ट्रंप के चुनाव के वक्त बिल्कुल आखिरी वक्त में उन्होंने 'Defeat Crooked Hillary' का एक जोरदार उन्मादित अभियान चलाया था जिसने ट्रंप को हिलैरी पर बढ़त दिला दी ।

इस फिल्म में अमेरिका के सामरिक ठेकों की कंपनी एससीएल का उल्लेख आता है, जिसके एलेक्सांद्र निक्स नें ब्रिटनी काइसर आदि को साथ में लेकर चुनावों को प्रभावित करने के इस धंधे में, कैम्ब्रिज एनालिटिका में अपने को लगा दिया और देखते-देखते उनकी कंपनी को खरबों डालर की कंपनी कहा जाने लगा ।


सीए पर यूरोपियन पार्लियामेंट की तरफ से यह अभियोग लगाया गया था कि इस कंपनी ने जनतंत्र और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता को नष्ट करने की साजिश की है । फेसबुक का जुकरबर्ग दावा कर रहा था कि उनका उद्देश्य लोगों के बीच संपर्क साधना है, उससे कहा गया कि तुम लोगों को जोड़ते नहीं, तोड़ते हो । सीए के साथ फेसबुक के संबंध के लिये उस पर भारी जुर्माना लगाया गया और वह फिर कभी अपने डाटा का सौदा इस प्रकार न करे, इसके लिये चेतावनी भी दी गई ।

इस फिल्म को देख कर हम अपने देश में प्रशांत किशोर की तरह के पेशेवरों की भारत के चुनावों में भूमिका को कुछ हद तक समझ सकते हैं । मोदी ने पिछले दिनों भारत में सरकारी मशीनरी के जरिये भी आम नागरिकों के डाटा इकट्ठा करने की कोशिश की थी । आधार कार्ड को अनिवार्य बनाने के पीछे भी मोदी सरकार का पूरा रवैया यही था । इससे यह भी पता चलता है कि पार्टियों का पारंपरिक, निरंतर चलने वाला बहु-स्तरीय प्रचार अभियान महज चुनावों में जीत की दृष्टि से क्रमशः कितना व्यर्थ बना दिया जा रहा है । पार्टी के परंपरागत कार्यकर्ता का भी इसके चलते भारी अवमूल्यन हुआ है । 

आज जिस प्रकार भारत की तमाम पार्टियों के नेतागण भाजपा में जा रहे हैं, उनके पीछे भी इसी प्रकार की शरारतपूर्ण डाटा एनालिसिस की भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता है । कौन किस बिंदु पर दब सकता है और बीजेपी में जा सकता है, इसकी सूचना आज बीजेपी के दफ्तर में उसके अध्यक्ष की उंगलियों पर रहता हो तो कोई अचरज की बात नहीं है । 2014 के मोदी के चुनाव में भी सीए की भूमिका की बात कुछ हलकों से उठाई जाती रही है ।

इस फिल्म में ही एक प्रसंग में कहा गया है कि डाटा संग्रह और उनके प्रयोग के क्षेत्र में जिस पैमाने पर और जिस तेजी से अभी काम हो रहा है, उसमें आने वाले समय में हर महत्वपूर्ण मौके पर आम लोगों को भ्रमित करने के लिये कोई न कोई कैम्ब्रिज एनालिटिका निश्चित तौर पर मौजूद रहेगा, भले ही बाद में इस प्रकार के दुष्प्रचार का शिकार बनने के लिये किसी भी राष्ट्र को पछताना पड़े ।         

गुरुवार, 15 अगस्त 2019

क्रिप्टो करेंसी और राज्य


-अरुण माहेश्वरी 

देखते-देखते क्रिप्टो करेंसी, अर्थात् तमाम राष्ट्रीय सरकारों की जद से मुक्त ऐसी सार्वलौकिक करेंसी के चलन पर विचार और क्रिया का सिलसिला शुरू हो गया है जो मुद्रा को क्रय-विक्रय के लेन-देन में मध्यस्थता की अपने मूलभूत भूमिका के अतिरिक्त उस पर लाद दिये गये बाक़ी  सभी राजनीतिक कर्त्तव्यों से आज़ाद कर दे रही है । 

मूल्यवान धातु का मुद्रा के रूप में इस्तेमाल तो आज बाबा आदम के ज़माने की बात लगती है । व्यापारियों के बीच आपसी लेन-देन के लिये हुंडी-पुर्ज़ों के प्रयोग से राष्ट्रों के केंद्रीय बैंक के भुगतान के शपथ पत्र के रूप में काग़ज़ की मुद्रा तक की यात्रा में मुद्रा पर लगभग हमेशा राज्य का एक बोझ लदा रहता है । भुगतान को सुनिश्चित करने वाला राज्य का शपथ पत्र काग़ज़ के नोट को अतिरिक्त शक्ति प्रदान करता था । लेकिन अब स्वयं मुद्राओं के वैश्विक बाजार के कारण मुद्रा पर राज्य का नियंत्रण एक विचार का विषय हो गया है । यह किसी न किसी रूप में खुले बाजार का माल बन चुकी है । 

जब मुद्रा की धातु का कोई मायने नहीं रह गया, तब राज्य की विश्वसनीयता प्रमुख हो गई थी । अब वह क्रमश: बाजार के विषय का रूप लेने लगी । यहीं से मुद्रा के मामले में राज्य की भूमिका के अंत के एक नये दौर का प्रारंभ हुआ । माल के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के द्वैत का रहस्य अब विनिमय के साधन के ठोस रूप से क्रमश: सांकेतिक रूप की दिशा में प्रगट होने लगा । काग़ज़ की मुद्रा प्लास्टिक मुद्रा से होते ह्ए अब पूरी तरह से अदृश्य डिजिटल मुद्रा, क्रिप्टो करेंसी का रूप ले रही है । 

बिटकायन को तो इस प्रकार की आभासित मुद्रा (crypto currency) का तत्त्वमूलक जनक कहा जा सकता है । बिटकायन को न किसी राज्य का समर्थन है और न किसी भारी-भरकम बहुराष्ट्रीय निगम का । उसका आधार है ब्लाक चेन की वह तकनीकी प्रणाली जिसमें कोई भी लेन-देन गोपनीय नहीं रहता है । आदान-प्रदान की श्रृंखला जहाँ भी टूटती है, उसे चिन्हित करके उसके लिये ज़िम्मेदार व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है और उस टूटी हुई श्रृंखला को बाक़ायदा जोड़ा जा सकता है । इस प्रकार, इस क्रिप्टो करेंसी में लेन-देन को हमेशा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी किसी राज्य अथवा कंपनी की न होकर उन सभी लोगों की एक सामूहिक ज़िम्मेदारी होगी जो इसके ज़रिये लेन-देन की श्रृंखला में स्वेच्छा से शामिल होंगे । अर्थात्, मुद्रा का स्वरूप कुछ भी क्यों न हो, अंतत: भुगतान के लिये जो उसका प्रयोग करेगा, भुगतान न होने पर वही, उन लोगों का समुदाय उसके लिये ज़िम्मेदार होगा । चूँकि तकनीक ने इस प्रकार के ताने-बाने को असीम बना दिया है, इसीलिये इसका प्रसार किसी भी राज्य की भी सीमा का मोहताज नहीं होगा । राज्य या कंपनियाँ इस लेन-देन के जगत के बीच में अपनी भूमिका के ज़रिये बैंकिंग का जो कारोबार कर रही थी, बिटकायन उस कारोबार के मुनाफ़े को ख़त्म करके इस मुद्रा को उसके बोझ से भी मुक्त कर देता है । 

इस प्रकार की क्रिप्टो करेंसी से जुड़े दो पहलू है । पहला तो इसका वह तकनीकी आधार है, ब्लाक चेन प्रणाली वाला, जो इसके व्यापक वैश्विक चलन को संभव बनाता है और दूसरा इसका एक वैचारिक-दार्शनिक स्वरूप है जो इसे राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त करके एक स्वतंत्र आर्थिक समुदाय की संरचना के आधारभूत तत्त्व का रूप प्रदान करता है । 

मज़े की बात यह है कि आज की दुनिया में इस क्रिप्टो करेंसी के तत्त्वों को लेकर न जाने कितने प्रकार के प्रयोग किये जा रहे हैं । खास तौर पर ब्लाक चेन प्रणाली का इसका तकनीकी आधार सारी दुनिया के राष्ट्रीय राज्यों को जहाँ बेहद आकर्षित कर रहा है, वहीं इसके बिटकायन की तरह के राज्यों के जज से पूरी तरह मुक्त सामुदायिक आर्थिक व्यवहार का विचारधारात्मक पहलू राष्ट्रीय राज्यों में उतना ही भारी विकर्षण भी पैदा कर रहा है । 

आज उसकी तकनीक के आकर्षण के चलते भुगतान के न जाने कितने सरकारी, ग़ैर-सरकारी डिजिटल प्लेटफ़ार्म तैयार हो रहे हैं । कहा जाता है कि चीन में तो बाजार में भुगतान के लिये कार्ड प्रणाली लगभग ख़त्म हो गई है । भारत में हर मामले की तरह, इस मामले में भी कोई साफ़ दृष्टि नहीं होने से, जो भी हो रहा है, आधे-अधूरे तरीक़े से ही हो रहा है । सरकार की ओर से भुगतान के देशी-विदेशी और सरकारी डिजिटल प्लेटफ़ार्म का ज़ोर-शोर से प्रचार चल रहा है ; सरकारी भीम ऐप और रुपे के अलावा नोटबंदी के समय का बदनाम पीटीएम, अमेजन वैलेट, गूगल पे आदि चल ही रहे हैं । अब अन्तरराष्ट्रीय पैमाने पर ऐपल और फ़ेसबुक के तरह के संस्थान अपनी अन्तरराष्ट्रीय करेंसी तक चलाने की तैयारी कर चुके हैं । लेकिन इन सबके प्रति, खास तौर पर इनकी तार्किक परिणति क्रिप्टो करेंसी के प्रति, भारत सरकार का रुख़ क्या होगा, यह अभी तक भारी विवाद का विषय बना हुआ है । इसी विवाद के चलते पिछले दिनों अति-उत्साही वित्त सचिव सुभाष गर्ग को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था । 

बहरहाल, वर्तमान भारत सरकार को इस पूरे प्रसंग में एकमात्र जो चीज सबसे अधिक आकर्षित कर रही है, वह है इससे जुड़ी हुई ब्लाक चेन तकनीक - अर्थात् वह तकनीक जो इसमें शामिल होने वाले देश के प्रत्येक नागरिक के समूचे आर्थिक व्यवहार के बारे में सरकार को सूचित कर सकती है । मोदी सरकार इसे समाज पर अपने पूर्ण प्रभुत्व की स्थापना के एक कारगर हथियार के रूप में देखने की वजह से ही इसके प्रति काफी ज्यादा आकर्षित है । 

मोदी ने जब अपना नोटबंदी का तुगलकी फ़ैसला लिया था कि इससे पूरा काला बाहर निकल आयेगा, तभी उस अभियान के ही एक अनुषंगी के रूप में उन्होंने डिजिटलीइजेशन का नारा दिया; आधार कार्ड की अनिवार्यता पर बेजा बल देना शुरू किया । ब्लाक चेन प्रणाली से एक ओर जहाँ सूचनाओं के केंद्रीकरण और सामाजिक यथार्थ की सठीक जानकारी किसी भी राज्य के नीतियों के लिये ज़रूरी सांख्यिकी की ज़रूरत पूरी हो सकती है, वहीं इतनी सूक्ष्म, व्यक्तिगत स्तर की सूचनाओं के आधार पर राज्य का दमनतंत्र बेहद मारक साबित हो सकता है । 

लेकिन बिटकायन की तरह की राज्य-विहीन क्रिप्टो करेंसी इस मामले में, प्रत्येक नागरिक के आर्थिक व्यवहार पर राज्य के प्रभुत्व को तोड़ता है, इसीलिये 
कोई भी राज्य उसे अपनाने के लिये तैयार नहीं है । यह एक ऐसा ज़रिया है जो सूचनाओं के चरम केंद्रीकरण की तकनीक से ही सत्ता के चरम विकेंद्रीकरण का आधार तैयार करता है । इसीलिये दुनिया का हर राज्य इसके प्रति जितना आकर्षित है उतना ही शंकित भी है । 

ऐसे में, ऐपल, गूगल या फ़ेसबुक की तरह की विशालकाय कंपनियों के द्वारा तैयार किये जा रहे क्रिप्टो करेंसी के नये साम्राज्य आज पूँजीवाद के विकास के एक बिल्कुल नये स्वरूप को हमारे सामने रख रहे हैं ।

यह किसी भी चीज के विकास का वह चरम रूप है, जब उसमें ऐसे स्फोट होते हैं, जो उसके गुणात्मक रूप से भिन्न स्वरूपों को प्रकट करने लगता है । जैसे भ्रूण वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव भ्रूण के विकास के एक चरण में आंतरिक दबाव से जब मस्तिष्क की झिल्ली फटती है, तभी उससे होने वाले स्फोट के चलते शरीर के अलग-अलग अंगों के बीच एक प्रकार का तारतम्य क़ायम होता है । 

आज क्रिप्टो करेंसी से जुड़े विषयों पर चर्चा की स्थिति यह है कि इसके जन्म से जुड़े तमाम मूलभूत तकनीकी प्रयोग तो अमेरिका के सिलिकॉन वैली में चल रहे हैं, लेकिन इसके व्यवहारिक प्रयोग के सारे कर्मकांड चीन और भारत की तरह के देशों में किये जा रहे हैं । अमेरिकी आदमी आज भी अपनी जेब में चेकबुक लेकर घूमना पसंद करता है और जापानी नगद मुद्रा ही चाहते हैं । लेकिन चीन और भारत डिजिटल मुद्रा के लिये तो जरूर आकुल-व्याकुल है, पर उसकी एक अनिवार्य तार्किक परिणति, बिटकायन की तरह की सामुदायिक आभासित मुद्रा के विचार से बुरी तरह परेशान है । 

दुनिया के विकसित राज्य अपने नागरिकों के निजी आर्थिक व्यवहार से पहले से जितना अवगत है, उससे अधिक जानकारी की उन्हें अभी ज़रूरत नहीं लग रही है । नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन वहाँ के राज्य के मूलभूत जनतांत्रिक विन्यास के विपरीत है । जनतंत्र और नागरिकों की स्वतंत्रता ने ही इन राज्यों की लगातार प्रगति को अब तक सुनिश्चित किया है । 

लेकिन चीन और भारत की प्रयोगशालाओं में इस नई तकनीक के बल पर सत्ता के केंद्रीकरण के जो कारनामें चल रहे हैं, उन पर उनकी बराबर नजर बनी हुई है । उन्होंने भारत को नोटबंदी का प्रयोग करने के लिये प्रेरित किया और इसके आर्थिक दुष्परिणामों को देख कर अपने लिये ज़रूरी शिक्षाएँ प्राप्त कर लीं । इसीप्रकार, वे डिजिटलाइजेशन के अंध-अभियान की परिणतियों को देखना चाहते हैं । 

बहरहाल, भारत की दशा इन मामलों में सबसे विचित्र है । आज भारत की सत्ता पर ऐसे तत्वों का क़ब्ज़ा है, जिन्हें सिर्फ अपने हाथ में अंतहीन सत्ता की कामना है । सत्ता के प्रयोग की उनकी अगर कोई अवधारणा है तो वह हिटलर के नाज़ीवाद की अवधारणा के अलावा कुछ नहीं है । ऐसे में, मुद्रा के स्वरूप के विकास से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक-दार्शनिक पहलू उनके विचार के दायरे से कोसों दूर है । ये तभी तक इसके प्रति आग्रहशील हैं, जब तक इसमें इन्हें अपने एकातिमवादी राज्य की दमन की ताक़त में वृद्धि की संभावना दिखाई देती है । अगर इससे अपने वर्चस्व के हित नहीं सधते हैं, तो जाहिरा तौर पर इसके विकास के प्रति इनका कोई आग्रह भी नहीं हो सकता है । यही वजह है कि इस विषय पर इनका रुख़ दुविधाओं से ग्रस्त आधा-अधूरा ही रहेगा, जैसा आज नजर आ रहा है ।

बुधवार, 14 अगस्त 2019

हिटलरशाही के प्रतिरोध की राजनीति साधनी होगी


-अरुण माहेश्वरी 


आज़ादी की 73वीं सालगिरह पर सभी मित्रों को हार्दिक बधाई  । 

आज का दिन अपने देश की एकता और अखंडता के प्रति अपनी निष्ठा को दोहराने का दिन है । आज उन सभी देशवासियों को गले लगाने का दिन है जिनके मन वर्तमान शासन की विभाजनकारी नीतियों और अन्यायपूर्ण दमन के कारण दुखी है । 

आज खास तौर पर अपने कश्मीरी भाइयों के प्रति एकजुटता का संदेश देने का दिन है । उन्हें यह विश्वास दिलाने का दिन है कि शासन के किसी भी अन्याय के विरुद्ध लड़ाई में वे अकेले नहीं हैं । उनके न्यायपूर्ण संघर्ष में भारत के सभी जनतंत्रप्रिय, शांतिप्रिय और देशभक्त लोग उनके साथ खड़े हैं । 

सिर्फ कश्मीर नहीं, पूरे देश में जिस नग्नता के साथ भाजपा पूरे  राजनीति ढाँचे पर ज़बर्दस्ती अपना एकाधिकार क़ायम करने की मुहिम में लगी हुई है, विपक्ष की सभी पार्टियों तक को तहस-नहस कर आत्मसात कर लेने के साम-दाम-दंड-भेद के तमाम उपायों का प्रयोग कर रही है और प्रतिवाद की हर आवाज़ों कुचल देने पर आमादा है, इसके बाद कम से कम इतना तो साफ़ हो जाना चाहिए कि भारत के इस कठिन काल में राजनीति का अब तक चला आ रहा स्वरूप अब कारगर नहीं रह गया है । 

कश्मीर में बेलगाम ढंग से सेना के इस्तेमाल ने इस संकट को उसके बिल्कुल चरम रूप में सामने रखा है । 

कहना न होगा, यह भारत के संघीय ढाँचे को पूरी तरह से रौंद कर वे एकात्मवादी ढाँचे के निर्माण का अभियान है ।एकात्मवादी राज्य, जो आरएसएस का हमेशा का साध्य रहा है, और जिसे भारतवासियों ने हमेशा ठुकराया है, सिर्फ संघीय ढाँचे से जुड़ी सत्ता के विकेंद्रीकरण स्वरूप का अंत नहीं है, यह उस बहुलता का अंत है, जो किसी भी समाज में जनतंत्र से जुड़ी स्वतंत्रता की भावना और उसके रचनात्मक स्फोट का कारक माना जाता है । 

महात्मा गांधी स्वतंत्रता को मनुष्य का प्राण कहते थे । हमारे शास्त्रों में भी स्वातंत्र्य को ही शिव और मोक्ष कभी ककहा गया है । इसका अभाव आदमी को अज्ञान के पाश से बाँधता है, उसे ग़ुलाम और तुच्छ बनाता है ।सत्ता और पूँजी की इजारेदारी से डरा हुआ दमित समाज सिवाय उन्माद, विक्षिप्तता और पागलपन के अपने को व्यक्त करने की शक्ति को ही गँवा देता है । 

यही स्वतंत्रता का हनन ही शक्तिवानों में बलात्कार और ग़रीबों में ढोंगी बाबाओं के चमत्कार की काली फैंटेसी से जुड़ी सामाजिक संस्कृति का मूल है । 

आज की दुनिया में अमेरिका सबसे शक्तिशाली और संपन्न राज्य है तो इसीलिये क्योंकि अमेरिका एक आज़ाद-ख़याल संघीय गणराज्य है । वहाँ जिस हद तक इजारेदारी है, उसी हद तक वह राष्ट्र कमजोर भी है । अन्यथा, वहां इजारेदारी पर अंकुश का मोटे तौर पर एक सर्वमान्य विधान है । 

अमेरिकी जीवन में उन्मुक्तता, जो संसाधनों की भारी फ़िज़ूलख़र्ची के रूप में भी व्यक्त होती है, ही उस देश के लोगों की रचनात्मकता के मूल में भी है । इसीलिये वह दो सौ साल से भी ज़्यादा काल से दुनिया का नेतृत्वकारी राज्य है । 

रूस और चीन उसके कोई विकल्प नहीं हैं । 

स्वातंत्र्य चेतना के मामले में भारत रूस और चीन से कहीं आगे रहा है । हमारी यही आंतरिक शक्ति तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी हमें आगे बढ़ने और न्यायपूर्ण समाज के लक्ष्य को पाने का हौसला देती रही है । 

दुर्भाग्य है कि अब उसे भी योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया जा रहा है, अर्थात् हमारी अपनी तमाम संभावनाओं को ही ख़त्म किया जा रहा है ; हमें अपनी नाना-स्तरीय ग़रीबी से निकलने के रास्तों को और भी सख्ती से बंद कर दिया जा रहा है । 

आज भारतीय अर्थ-व्यवस्था और जीवन जिस प्रकार के मूलभूत संकट में फँसा हुआ दिखाई दे रहा है, अगर कोई इसका समाधान समय की मरहम में देख कर शुतुरमुर्ग की तरह बालू में सिर गड़ाये बैठा हुआ है, जैसा अभी की केंद्रीय सरकार बैठी हुई है, तो वह कोरी आत्म-प्रवंचना का शिकार है । 

आज का दिन भारतीय संघ की रक्षा हाकी प्रतिज्ञा का दिन है । एकात्मवादी हिटलरशाही निज़ाम के प्रतिरोध की राजनीति में ही भावी ख़ुशहाल भारत की संभावनाएँ निहित है । आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है, प्रतिरोध की नई राजनीति को साधने की । 

जय हिंद ।

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

प्रधानमंत्री जी के नाम एक खुला पत्र



आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

कल रात हम काफी देर तक 'नेटफ्लिक्स' पर सीरिया और गाजा के बारे में वृत्त चित्रों को देख रहे थे । आतंक, हत्या, खून-खराबे और भारी गोला-बारूद के बीच वहां चल रही जिंदगी के दिल दहला देने वाले उन दृश्यों को सचमुच हम पूरा देख ही नहीं पायें । डर और खौफ की बिल्कुल वही अनुभूति जो कभी विश्व युद्धों के दौरान यूरोप के लोगों में पैदा हुई होगी और जिसने डर से जुड़ी काफ्कास्क्यू की तीव्र अनुभूति और मृत्युमुखी मनुष्य के जीवन-सत्य पर आधारित अस्तित्ववाद के दर्शन को जन्म दिया, अपनी रीढ़ में हमने एकबारगी उसी की तीव्र सिहरन को महसूस किया । दोनों वृत्त चित्रों को आधे में ही रोक दिया ।

प्रधानमंत्री जी ! सन् 1857 के कत्लेआम के बाद जलियांवाला बाग के एक डायर ने हमारे पूरे राष्ट्र को हमेशा के लिये झकझोर कर रख दिया था, वहां सीरिया और गाजा में तो हम आम लोगों पर दनादन गोलियां बरसाते डायरों की कतार की कतार को देख रहे थे । और हम देख रहे थे कि कैसे आम लोग उन्हीं भीषण गोलाबारियों के बीच अपने बच्चों को बड़ा कर रहे थे, बंदूक के माप से बढ़ते हुए बच्चों की लंबाइयों को माप रहे थे ।

संभव है, कोई दूसरा समय होता तो हम इन वृत्त चित्रों को वैसे ही देख लेते, जैसे दुनिया के लोगों ने इराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी बमबारियों को कोरी आतिशबाजियों की तरह देख कर उनका आनंद लिया था । लेकिन इन वृत्त चित्रों में, सिर्फ आसमान से बरसते गोलों और उनके धमाकों की आग की चमक नहीं थी, यहां तो बाकायदा शहरों के गली-मुहल्लों की बस्तियों में ढहा दिये गये मकानों के खंडहरों के बीच मनुष्यों के समाजों के सफाये के वे जीवंत दृश्य थे जो द्वितीय विश्वयुद्ध के काल की कहानियों पर बनी फिल्मों में ही हम देखते रहे हैं ।

प्रधानमंत्री जी, भारत ने अपने जीवन-काल में विभाजन के दंगों में जीवन की ऐसी त्रासदियों के रूपों को देखा था, लेकिन कोई राज्य अपने ही लोगों को पागलों की तरह गोलियों से भुन रहा हो, उसका सबसे नग्न रूप जलियांवाला बाग हत्याकांड में ही देखने को मिला था । इसीलिये सीरिया और गाजा के वृत्त चित्रों को देख कर हम वास्तव में कांप उठे थे । मृत्यु के मुहाने पर मनुष्यों के सत्य से ऐसी मुठभेड़ हमें सिर्फ डरा रही थी, सिर्फ डरा रही थी ।

प्रधानमंत्री जी, कोई कह सकता है, हम कमजोर दिल के लोग हैं । हमें उसमें सीरिया के आम लोगों और फिलिस्तीनियों की बहादुरी के आदर्शों को देखना चाहिए । लेकिन वास्तव में हम तो उनमें कोई बहादुरी नहीं, आदमी की पस्ती और मृत्यु के सामने आत्म-समर्पण की लाचारी की करुण कहानी के अलावा और कुछ नहीं देख पा रहे थे । वे, जो कह रहे थे, हम डर नाम की चीज नहीं जानते, वे डर से ही अपने डर को काटने की कथित बहादुरी का प्रदर्शन कर रहे थे । वे 'डर नहीं जानते', क्योंकि वे सिर्फ डर को ही जी रहे थे !

हम यहां इराक, अफगानिस्तान के विध्वंस को सह गये थे, क्योंकि तब हम शायद उनसे अपनी धड़कनों पर कोई दबाव नहीं महसूस कर रहे थे । सीरिया और गाजा को भी हम अभी उसी तरह झेल सकते थे । लेकिन कल रात सचमुच नहीं झेल पा रहे थे । हमें यही लग रहा था कि सीरिया और गाजा अब हमसे दूर नहीं है । न हिटलर, मुसोलिनी ही कोई सुदूर अतीत लग रहे थे ।

कश्मीर की स्थिति की कल्पना से हम अनायास ही उन तमाम विध्वंस लीलाओं को, नागरिक जीवन की उस नारकीय दुर्दशा को बिल्कुल अपने देश के अंदर महसूस करके आतंकित थे । हम एक स्वाधीन देश के लोग, जिन्होंने न जाने कैसी-कैसी लड़ाइयों से अपनी आजादी को अर्जित किया है, हम किसी को भी गुलाम बनाने, कुचल-मसल डालने के कुत्सित भावनात्मक आवेग के चौतरफा दिख रहे दृश्य से भी बुरी तरह विचलित हो गये थे । हम नहीं चाहते कि हमारे देश के किसी भी अंश के लोगों को हम सीरिया और गाजा की तरह की परिस्थितियों में जीने के लिये मजबूर करें ।

प्रधानमंत्री जी, सचमुच हम अपने देश में इस आसन्न संकट की आहट सुन कर बुरी तरह डर गये थे । जन-जीवन पर राज्य के नग्न दमन और खुफियातंत्र का खौफ हम जैसे प्रत्यक्ष देख पा रहे हों !

बहरहाल, कल ही प्रधानमंत्री जी, आपने कश्मीर में अपनी कार्रवाई के संदर्भ में राष्ट्र को संबोधित किया था । सबसे अच्छी बात थी कि आपके भाषण के साथ फौजी वर्दी और बूटों की आहट जैसी कोई चीज जुड़ी हुई नहीं थी । उनके साथ न कहीं किसी फौजी की बंदूक की चमक ही दिखाई दे रही थी । आप अपनी बात अब भी किसी विजयी के अंदाज में भुजाएं फड़काते हुए नहीं बोल रहे थे । आपकी सारी मुद्राएं आश्वस्तिदायक लग रही थी । आप अपनी हमेशा की फैसनेबुल पोशाक में, पूरे मेकअप के साथ चमक रहे थे । इसीलिये सचमुच डरा नहीं रहे थे ।

लेकिन हम यही कहेंगे कि प्रधानमंत्री जी, आप जो दलील दे रहे थे कि धारा 370 की वजह से वह सब अटका हुआ था, जिनकी कश्मीर के लोगों के जीवन में सुधार के लिये सख्त जरूरत हैं — वे दलीलें तथ्यों के किसी भी मानदंड पर कहीं टिकती नहीं लग रही हैं । ज्यादा विस्तार में जाने के बजाय, यही कहना काफी होगा कि मानव विकास के मानकों पर भारत के करीब 16 राज्य ऐसे हैं, जो कश्मीर से काफी पीछे हैं । कई मामलों में तो आपका गुजरात भी कश्मीर का मुकाबला नहीं कर पा रहा है ।

बहरहाल, हम अभी आपके इस कदम के औचित्य-अनौचित्य की बहस को उठाना नहीं चाहते । लेकिन यह जरूर कहेंगे कि यह आपका और आपके राजनीतिक परिवार का एक सबसे पुराना एजेंडा था, इतना ही उसे सही साबित करने के लिये काफी नहीं है । बल्कि कई बार ऐसे मौके आएं, जब आप सबने इन एजेंडों को त्याग कर ही जनता का मत चाहा था ।

प्रधानमंत्री जी, हम यह मानते हैं कि अभी भारत के बहुसंख्यक लोगों मंम हिंदू सांप्रदायिक उन्माद अपने चरम पर है । लेकिन उन्माद अन्ततः उन्माद ही है । यह व्यक्ति में स्वस्थ नागिरक मूल्यों का स्खलन है, मान्य सम्मानपूर्ण मानवीय व्यवहारों से इंकार की जिद है । यह स्वयं में किसी भी राष्ट्र की आंतरिक संहति के बिखराव का प्रमाण है । इसे आधार बना कर किसी भी राष्ट्र का निर्माण नहीं, सिर्फ उसका विध्वंस ही किया जा सकता है ।

इन्हीं तमाम कारणों से, प्रधानमंत्री जी, हमारा आपसे करबद्ध निवेदन हैं कि आप अपने इस कदम पर पुनर्विचार करके राष्ट्र में शांति और एकता के प्रति अपनी मानवीय भावनाओं का परिचय दीजिए और तत्काल जम्मू और कश्मीर को उसका राज्य का दर्जा वापिस करके उसके साथ वास्तव में भारत के एक अभिन्न अंग की तरह का व्यवहार कीजिए ।

यकीन मानिये, यदि आज के चरण में भी आप इस प्रकार की उदारता और बड़े दिल का परिचय देते हैं, तो इतिहास आपको एक विवेकवान, जागृत शासक के रूप में ही याद करेगा । आपको भारत को महा-विध्वंस के कगार से खींच लाने का श्रेय देगा ।

सविनय

आपका
अरुण माहेश्वरी 
09.08.2019 


मंगलवार, 6 अगस्त 2019

पुण्य प्रसून क्यों किसी 'उद्धारकर्ता' के झूठे अहंकार में फंस रहे है ?

—अरुण माहेश्वरी


कल रात ही धारा 370 को हटाये जाने के बारे में पुण्य प्रसून वाजपेयी की लंबी, लगभग पचास मिनट की वार्ता को सुना ।

अपनी इस वार्ता में उन्होंने घुमा-फिरा कर, कश्मीर के भारत में विलय से जुड़े इतिहास और आरएसएस के धारा 370 विरोधी 1950 के ज़माने से चले आ रहे अभियान के बारे में तथ्यों का एक सम्मोहनकारी आख्यान पेश करने के बाद अंत में बड़ी उदारता से लोगों से कहा कि अब सारे तथ्य आपके सामने हैं,  यह आप पर है कि आप अपने लिये कौन सा पक्ष चुनते हैं ! जहां तक खुद के पक्ष का सवाल था, उन्होंने मोदी जी को इस बात पर बधाई दी कि सालों के विवादास्पद विषय का उन्होंने एक समाधान कर दिया ।

यद्यपि, यह समाधान कोई समाधान है या समस्या की जटिलता को एक और नया आयाम देने का एक नया बिंदु भर है,  इस पर उन्हें भी संदेह था,  लेकिन इस संदेह को उन्होंने ठीक वैसे ही कश्मीर के युवाओं के ‘सुंदर’ भविष्य के सपनों के ‘आसरे’ खारिज करने की भी कोशिश की, जिस प्रकार संसद में अमित शाह कर रहे थे और कश्मीर को 'बाकी भारत' की तर्ज पर 'स्वर्ग' बना देने का आश्वासन दे रहे थे !

इसके पहले कि हम पुण्य प्रसून वाजपेयी की अन्य बातों पर गौर करें, उन्हें थोड़ा सा कश्मीर की सच्चाई के उनके द्वारा अछूते एक पहलू, बल्कि हमारी जान में सबसे महत्वपूर्ण पहलू, के बारे में बताना उचित समझते हैं । वे इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में कश्मीर पहला ऐसा राज्य था जहां भूमि सुधार का काम सबसे पहले और बिल्कुल क्रांतिकारी तरीके से हुआ था । कश्मीर के भारत में विलय के प्रति शेख अब्दुल्ला ने इसी एक कदम के जरिये वहां की जनता के व्यापक समर्थन को सुनिश्चित किया था । यह भूमि-सुधार महज कोई पका-अधपका खयाली पुलाव नहीं था, भारत के शेष भागों के 'जमींदारी उन्मूलन' की तरह का, बल्कि एक ठोस जमीनी हकीकत थी । इसीलिये अब्दुल्ला के इस कदम का कश्मीर के जन-जीवन पर इतना गहरा असर हुआ था कि आज तक कश्मीर शायद अकेला राज्य है जहां के प्रत्येक निवासी के पास अपना घर और अपनी जमीन भी है ।

कश्मीरी जीवन की यही वह शक्ति रही है, जिसने उन सभी कठिन कालों में भी वहां के लोगों को जीने के साधन प्रदान किये हैं, जिन कालों में नाना कारणों से सैलानियों ने कश्मीर से अपना मुंह मोड़ लिया था । कांग्रेस और वाजपेयी के शासन काल में एक बार, लगभग चौदह साल (1987-2001) तक कश्मीर में भारत से सैलानियों का जाना बिल्कुल रुक गया था । लेकिन तब भी कश्मीर के लोग इस धरती से उठ नहीं गये थे । उस कठिन काल में भी जीने के साधन उनके पास प्रकृति, अपनी जमीन और घर के बल पर हमेशा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहे ।

फिर भी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि कश्मीर के लोगों और  नौजवानों की आंकांक्षाओं का वही कोई अंतिम पड़ाव नहीं है, और न हो सकता है । निश्चित तौर पर ऊंची से ऊंची शिक्षा के जरिये अपनी उपलब्धियों से वह देश-विदेश में अपने को स्थापित करना चाहता है, आधुनिक जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं को पाना चाहता है । यह पूरी तरह से अपेक्षित, न्यायसंगत और इतिहासृसंगत भी है ।

हमारे कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि जीने के जो साधन कश्मीर के निवासियों को अब तक ताकत देते रहे हैं और जो उनकी कश्मीरियत वाली प्राणी सत्ता के गठन और अस्तित्व के मूल तत्व रहे हैं, उन्हें विकास और नई संभावनाओं की मरीचिका में फंसा कर उनसे छीन लेने के खतरों से भरी कोई भी पेशकश या सिफारिश पर विचार के पहले क्या उन्हें कश्मीरियों के वास्तविक हितों की कसौटी पर परख कर देखने की जरूरत नहीं है ?  क्या यह सवाल उठाने की जरूरत नहीं है कि इसमें कश्मीरियों का कितना हित है और उनके संसाधनों पर गिद्ध दृष्टि लगाये हुए कॉरपोरेट जगत और उनके राजनीतिक दलालों का कितना हित है ?

अर्थनीति के तथाकथित तर्क के अनुसार संभव है, चू कर कुछ लाभ नीचे के लोगों को भी मिल जाएं । विकास की अंधी दौड़ में लोगों को उतारने का यही तो सारी दुनिया का आजमाया हुआ फार्मूला है । लेकिन यहां कश्मीर में तो शुरू में ही धारा 35 ए को हटाने की सिफारिश करके, उन लाभों को लूटने के लिये भी नीचे से लोगों को लाने की व्यवस्था की जो सिफारिश की गई है, वह ऐसे विभ्रमों को भी तोड़ने के लिये काफी है । फिर क्यों, वाजपेयी इस सवाल को उतना तूल नहीं देना चाहते ! यह तब है जब वे इस सच्चाई से भी वाकिफ है कि स्थानीय हिस्सेदारों के साथ मिल कर कश्मीर में अभी भी अनेक पांच सितारा होटल आदि काम कर रहे हैं और जहां अधिक से अधिक कश्मीरी ही काम कर रहे हैं ! क्या आज कश्मीरी भागीदारों की जगह भारत के अन्य हिस्सों के राजनीतिक भागीदारों का लालच उमड़ रहा है ?

पुण्य प्रसून पर आगे आने के पहले थोड़ा और भटकते हुए हम कहना चाहते हैं कि विकास की मरीचिका के पीछे दौड़ने का यह पूरा मामला मूलतः किसी आईने में दिखने वाली सामने की छवियों के विभ्रम से बच्चे का खुद को जोड़ लेने अथवा 'दूर के सुहावने ढोल' की तरह के सम्मोहन में फंसने की तरह का मामला ही होता है । यदि कोई अपने को अपने से बाहर की किसी छवि से जोड़ लेता हैं तो संभव है वह ऐसी चीजें कर सकता है, जो पहले नहीं कर पाता था । लेकिन ऐसा करने की उसे एक कीमत देनी पड़ती है । वह एक ऐसी छवि में फंस जाता है, जो बुनियादी रूप से उससे बाहर की होती है, अलग है । इस प्रकार वह मिथ्या छवि वास्तविक यथार्थ की नहीं, एक प्रकार के मिथ्या यथार्थ बोध के संघटनकारी की भूमिका अदा करती है ।

पुण्य प्रसून शायद विषय के इस पहलू को कोई महत्व नहीं देना चाहते, जबकि हमारी नजर में सही विश्लेषणमूलक पत्रकारिता की भूमिका ऐसी छवियों के मिथ्याभास को तोड़ने की ही होती है । आदमी का ज्ञान प्रकृति के वशीभूत पशु से ज्यादा स्वतंत्र होता है, लेकिन जो चीज इस ज्ञान को हमेशा सीमित करती है, वह है इसमें यथार्थ का अभाव । इस अभाव के अभाव को दूर करके ही ज्ञान और यथार्थ के बीच की दूरी को कम किया जा सकता है ।

हेगेल की एक बहुत प्रसिद्ध उक्ति है — शब्द यथार्थ की हत्या है । अर्थात् जीवन का जो भी यथार्थ शब्द के रूप में आपके सामने ढल कर आता है, वह बेहद आंशिक होने के नाते, यथार्थ की हत्या का कारक होता है, वह हमेशा एक धोखे के सिवाय कुछ नहीं होता है । इसी प्रकार फ्रायड अपने मनोविश्लेषण में रोगी के अहम् से निकली बातों को शुद्ध धोखा मानते थे और मनोविश्लेषण को उससे दूर रहने की सिफारिश करते थे । उनके शिष्य जॉक लकान का प्रसिद्ध कथन था — अभाव का अभाव ही यथार्थ होता है ।

पुण्य प्रसून के इस पूरा ऐतिहासिक आख्यान में जो केंद्रीय बात एक सिरे से गायब है, और जो इसका सबसे बड़ा अभाव है, वह है इसमें भारत की तरह के एक विविधताओं से भरे देश में संघीय ढांचे के महत्व की बात । यह विविधता का तत्व किसी की कामना मात्र से एकता के सूत्र में नहीं बदल सकता है, इसीलिये विविधता में ही एकता के लिये सारी दुनिया में राज्य के संघीय ढांचे की, और देशों के बीच आपसी संबंधों में संप्रभुता, स्वतंत्रता की बात की जाती है ।

भारत को अमेरिका बना देंगे के सपने दिखा कर अमेरिका की अधीनता को मान लेने का नुस्खा, इस उत्तर-औपनिवेशिक समय में, उपनिवेशवादियों के 'सभ्यता के प्रसार' के पवित्र अभियान की तरह बेहद कुत्सित नुस्खा है, जिसे ठुकराने के लिये सारी दुनिया के लोगों की कुर्बानियों की बात को यहां कहने की जरूरत नहीं है । पुण्य प्रसून शायद नहीं समझ रहे हैं कि कश्मीरियों के कल्याण की उनकी पवित्र भावना इससे बेहतर नहीं सुनाई दे रही है ।

मनोविश्लेषण में रोगी के मन की बात को बिना किसी अपेक्षा के अधिक से अधिक सुनने पर बल दिया जाता है । शुद्ध रूप से सुनने पर, बिना किसी स्मृति अथवा विश्लेषक की कामना को बिना बीच में लाए सुनने पर । यही सभ्यता की समस्याओं के समाधान में जनतंत्र का भी प्रमुख सूत्र, उसकी शक्ति है । लेकिन यहां तो कश्मीरियों की बात को सुनने की कोई बात ही नहीं है, उन्हें तो जेलों में या अपने घरों की चारदीवारियों में बंद कर दिया गया है, संचार के सारे साधनों से काट दिया गया है, और हम 'महामुनि' उन्हें इतिहास का, और बाकी भारतवासियों की कामना का पाठ पढ़ा कर उनकी मुक्ति का रास्ता दिखाने का नाटक कर रहे हैं !

वाजपेयी जी ! आरएसएस सत्तर साल से एक विषय को दोहरा रहा है, इसीलिये इस विषय पर उनकी कार्रवाई का कोई औचित्य नहीं हो जाता है ! यह तो 'हिंदू ही राष्ट्र है' और 'भारत को अपनी पुण्य भूमि न मानने वाले भारत के नागरिक नहीं हो सकते हैं' की तरह की उनकी उन मूलभूत निष्ठाओं से जुड़ा, भारत में मुसलमानों की हैसियत को पूरी तरह से समाप्त कर देने का उनके जन्म के साथ जुड़ा एक बुरा राजनीतिक एजेंडा भर है । यह भारत का राजनीतिक एजेंडा न था, न आज बन सकता है, क्योंकि भारत आज भी एक संघीय राज्य है । आज अपने उस मूल एजेंडा पर अमल की शक्ति से उस बुराई में किसी भी प्रकार की अच्छाई पैदा नहीं हो जाती है । क्या किसी जनतांत्रिक और धर्म-निरपेक्ष विश्लेषक को इस बात को भूल कर ऐसे विषय पर राय देनी चाहिए ?

हमें यह देख कर आश्चर्य होता है कि पुण्य प्रसून इस विषय पर अपनी वार्ता में भारत के संघीय ढांचे के पहलू के महत्व को पूरी तरह से गौण बना देते हैं, जबकि वही इस पूरे विषय का केंद्रीय मुद्दा है । राज्य के संघीय ढांचे के बजाय, एकीकृत ढांचे की ओर बढ़ना वैविध्यमय भारत को एकजुट रखने वाले सबसे प्रमुख तत्व का विरेचन है ।

इसीलिये केंद्र के इस कदम पर अपनी पहली टिप्पणी में ही हमने लिखा कि “कश्मीर संबंधी जो धाराएँ भारतीय जनतंत्र और संघीय ढाँचे का सबसे क़ीमती गहना थी, उन्हें उसके शरीर से नोच कर सरकार हमारे जनतंत्र को विपन्न और बदसूरत बना रही है । कश्मीर की जनता के साथ तो यह ऐसी बदसलूकी है कि यदि इसी तरह चलता रहा तो आगे कश्मीर घाटी में चिराग़ लेकर ढूँढने पर भी शायद भारत के साथ रहने की आवाज़ उठाने वाला कश्मीरी नहीं मिलेगा ।

“कश्मीर को भारत से जोड़ने वाली धारा की समाप्ति का अर्थ है कश्मीर को भारत से तोड़ने वाली राजनीति को मान्यता । मोदी सरकार ने बिल्कुल यही किया है । कश्मीर के बारे में यह प्रयोग केंद्रीकृत शासन के लक्षण हैं जो आगे नग्न तानाशाही की शासन प्रणाली के रूप में ही प्रकट होंगे । मोदी जी ने अपनी दूसरी पारी का प्रारंभ संविधान की पोथी पर माथा टेक कर किया था, लेकिन अभी तीन महीनें बीते नहीं है, उसी संविधान की पीठ पर वार किया है । भारतीय राज्य का संघीय ढाँचा ही हमारे वैविध्यपूर्ण राष्ट्र की एकता की मूलभूत संवैधानिक व्यवस्था है । इसे कमजोर बना कर राष्ट्र के किसी भी हित को नहीं साधा जा सकता है । कश्मीर के विषय में की गई घोषणा हमारे पूरे संघीय ढाँचे के लिये ख़तरे का खुला संकेत है ।”

1971 में बांग्लादेश के उदय से प्रमाणित हुआ था कि सिर्फ धर्म किसी राज्य के गठन का आधार नहीं हो सकता है । अब भारत का संघी शासन यह प्रमाणित करने में लगा है कि धर्म-निरपेक्षता भी राष्ट्र की एकता की गारंटी नहीं हो सकती है ।

अफसोस है कि पुण्य प्रसून वाजपेयी के लिये इन बातों का कोई मूल्य नहीं है ! वे एक सांप्रदायिक उन्माद में फंसी जनता की भावनाओं की तो कद्र कर रहे हैं, लेकिन उत्पीड़ित कश्मीर के जनों और भारत के भविष्य के प्रति उदासीन, परोपकार के थोथे आदर्श की श्रेष्ठता के भाव बोध में डूब रहे हैं !

थोड़ा अवांतर होने पर भी, हम यहां पुण्य प्रसून की तर्ज पर ही जाक लकान के एक कथन के अपने काव्य रूपांतरण को रखना चाहेंगे -

सत्य और हम

हम जहां पहुंचते है
उसका तर्क हमसे छूटता जाता है
जैसे छूट गया है
हिटलर के यातना शिविरों में
जहरीली गैस की घुटन से निकला
अस्तित्ववाद का सच
जैसे कैदखाने की दीवारों में सामने आया
स्वतंत्रता का सच
जैसे बुद्धि जब काम न करे
तब हमारी प्रतिबद्धताओं का सच
जैसे परपीड़क रति के
आदर्शीकरण का सच
जैसे आत्म हत्या से
अपने मुकाम को पाने की
आदमी की कामना का सच
जैसे जीवन से इंकार का
शब्दों का सच ।

सच को हम जान तो सकते हैं
लेकिन बदलना,
एक नई सच्ची यात्रा के मुहाने पर आना
लगता है
हमारे वश में नहीं है ।

(जॉक लकान के कथन पर आधारित)
 







यह कश्मीर को भारत में मिलाने का नहीं, उससे अलग करने का निर्णय है

-अरुण माहेश्वरी


कश्मीर संबंधी जो धाराएँ भारतीय जनतंत्र और संघीय ढाँचे का सबसे क़ीमती गहना थी, उन्हें उसके शरीर से नोच कर बीजेपी हमारे जनतंत्र को विपन्न और बदसूरत बना रही है ।

कश्मीर की जनता के साथ तो यह ऐसी बदसलूकी है कि यदि इसी तरह चलता रहा तो आगे कश्मीर घाटी में चिराग़ लेकर ढूँढने पर भी शायद भारत के साथ रहने की आवाज़ उठाने वाला कश्मीरी नहीं मिलेगा ।

कश्मीर को भारत से जोड़ने वाली धारा की समाप्ति का अर्थ है कश्मीर को भारत से तोड़ने वाली राजनीति को मान्यता । मोदी सरकार ने बिल्कुल यही किया है ।

कश्मीर के बारे में यह प्रयोग केंद्रीकृत शासन के लक्षण हैं जो आगे नग्न तानाशाही की शासन प्रणाली के रूप में ही प्रकट होंगे । मोदी जी ने अपनी दूसरी पारी का प्रारंभ संविधान की पोथी पर माथा टेक कर किया था, लेकिन अभी तीन महीनें बीते नहीं है, उसी संविधान की पीठ पर वार किया है ।

भारतीय राज्य का संघीय ढाँचा ही हमारे वैविध्यपूर्ण राष्ट्र की एकता की मूलभूत संवैधानिक व्यवस्था है । इसे कमजोर बना कर राष्ट्र के किसी भी हित को नहीं साधा जा सकता है । कश्मीर के विषय में की गई घोषणा हमारे पूरे संघीय ढाँचे के लिये ख़तरे का खुला संकेत है ।

यह राष्ट्रीय एकता पर तो यह एक प्रत्यक्ष कुठाराघात साबित होगा । यह भारत-विरोधी अंतरराष्ट्रीय ताक़तों को पूरे भारत में खुल कर खेलने का अवसर प्रदान करेगा ।

नोटबंदी की तरह ही कश्मीर के प्रयोग आरएसएस की विचारधारा के कुत्सित ठोस रूप है । इतिहास-बोध शून्य राजनीति का इससे बुरा दूसरा उदाहरण संभव नहीं है । बहुत से बुरे विचार भी जब तक महज विचार रहते हैं, बहुतों को आकर्षित करते हैं । अर्थात् प्रभाव की उनकी क्षमता तब भी बची रहती है । लेकिन उन पर अमल करने के बाद वे सिर्फ और सिर्फ बुराई के मूर्त रूप रह जाते हैं । कहना न होगा, नोटबंदी ने मोदी सरकार की अर्थनीति को पंगु किया, अब कश्मीर से उसकी राजनीति पर भी लकवा मारेगा । यह बुरी राजनीति आगे इनके भविष्य को ही बर्बाद करेगी ।

अभी सरकार जिस प्रकार के खुले दमनकारी रास्तों को अपना रही है, इसके बाद भारत की राजनीति शायद वह नहीं रह सकती है, जो अब तक रही है ।

यह सभी राजनीतिक दलों के लिये एक बड़ी चुनौती का समय है । जनतंत्र और संघीय ढाँचे की रक्षा की लड़ाई भारत की जनता की नई गोलबंदी से ही संभव होगी ।