-अरुण माहेश्वरी
ईरान पर अमेरिका-इज़रायल के हमले के वर्तमान चरण में हम एक बार फिर यह दोहराना चाहते हैं अमेरिका की संपूर्ण मध्यपूर्व की नीति के केंद्र में उसके पेट्रोडालर, सामरिक रणनीति, हथियार -उद्योग और इज़रायल के विस्तारवाद को बढ़ावा देना तो हैं ही , पर इसकी क्रियाशीलता को साम्राज्यवाद की आंतरिक गति के नियमों से, उसकी विवशतामूलक पुनरावृत्ति (compulsive pattern) की संरचना से भी समझने की जरूरत है ।
अमेरिका के इस युद्ध में एक ऐसी गहरी पुनरावृत्तिमूलक संरचना दिखाई देती है, जो हर थोड़े दिनों के अंतराल पर संकट के नए चक्र के साथ उसके समाधान को किसी न किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई में खोजा करती है ।
अमेरिका का वियतनाम युद्ध (1954–1975), अमेरिका का इराक़ युद्ध (2003–2011), अफ़ग़ानिस्तान युद्ध (2001–2021 ) और अब फिर, इस युद्ध के पाँच साल के अंदर ही यह ईरान युद्ध । इन सबमें एक मनोरोगी के क्रमशः बढ़ते हुए तनाव की वह प्रवृत्ति बार-बार दिखाई देती है जो अपने अहम् के सामने चुनौती की कल्पना से अधिक से अधिक उग्र होता चला जाता है । साम्राज्यवाद विश्व पर अपने प्रभुत्व के क्षय की आशंका से और अधिक शक्ति-प्रदर्शन की कोशिश करता है ।
फ्रायडियन भाषा में कहें तो यह केवल शक्ति का प्रयोग नहीं, बल्कि शक्ति के खोने के भय से पैदा हुई एक ऐसी मृत्युमुखी पुनरावृत्ति है जिसमें हर अगला कदम पहले से अधिक जोखिमपूर्ण हो जाता है। अहम् की तरह ही साम्राज्य तभी सबसे अधिक खतरनाक दिशा में बढ़ता है जब उसे अपने अंत की आहट सुनाई देने लगती है। ऐसे समय में प्रमाता का व्यवहार विवेकपूर्ण नहीं रहता; वह अपनी घटती हुई प्रभुता को स्वीकार करने के बजाय उसे हिंसक रूप से पुनर्स्थापित करना चाहता है।
ट्रंप की राजनीति में हमें अवसादग्रस्त मनोरोगी की इसी विडंबना का चरम रूप दिखाई देता है। वे सत्ता में इस वादे के साथ आए थे कि अमेरिका को अंतहीन युद्धों से बाहर निकालेंगे, MAGA का नारा दिया और यह भी वादा किया कि मध्यपूर्व में अमेरिका की अनावश्यक उलझनों को कम करेंगे। परंतु धीरे-धीरे वे एक पतनशील व्यवस्था की अवसादपूर्ण राजनीति के जुएसॉंस के अधिक उग्र रूप में फंसते दिखाई देने लगे । यह शीत युद्ध के काल के वियतनाम युद्ध से लेकर आज तक के सभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों का वंशानुगत रोग है और ट्रंप उससे जरा भी निकलने के बजाय इस death-drive की तार्किक परिणति, आत्म-हत्या तक चले जाने की दिशा में बढ़ते जा रहे हैं ।
ट्रंप बार-बार युद्ध रोकने, बातचीत, मोहलत, और समझौते की भाषा बोलते हैं; लेकिन उसी के साथ वे सैन्य जमावड़े, कठोर अल्टीमेटम, धमकियों और बड़े हमलों की संभावना को भी बढ़ाते हैं। उनका इस प्रकार दो अतियों के बीच पेंडुलम की तरह डोलना केवल एक रणनीतिक अस्पष्टता या झांसापट्टी नहीं है; यह उस विभाजित मानसिकता का संकेत है जिसमें युद्ध से बचना भी चाहा जाता है और युद्ध के बिना प्रभुता की कल्पना भी असंभव लगती है।
यही कारण है कि हर “दो सप्ताह”, “तीन सप्ताह”, “अंतिम चेतावनी”, “कूटनीतिक अवसर” जैसी ट्रंप की बात के भीतर एक गहरे सैन्य विस्तार की तैयारी भी छिपी रहती है। जॉक लकान कहते हैं कि जब विश्लेषण की प्रक्रिया में मनोरोगी बिल्कुल संयत व्यवहार के जरिये विश्लेषक को बरगलाने की कोशिश करता है, तभी वह सबसे अधिक शातिर दिमाग़ के साथ पेश आता हुआ होता है । साम्राज्य जब वार्ता की भाषा बोलता है तभी वह युद्ध की तैयारी कर रहा होता है, और जब युद्ध की भाषा बोलता है, उसे अपनी कमजोरी का भय सता रहा होता है।
इसलिए ईरान के साथ कोई भी संभावित संघर्ष केवल कुछ हफ़्तों की बमबारी या मिसाइलबाज़ी तक सीमित नहीं रह सकता। उसका एक लंबे ज़मीनी युद्ध, प्रॉक्सी युद्ध, होर्मुज से लेकर रेड सी तक पर क़ब्ज़े की लड़ाई, पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की लपटों का उठना पिछले पचास साल के अमेरिकी युद्धों के इतिहास की पृष्ठभूमि में उसके मृत्युमुखी उद्दीपन की अनिवार्य पुनरावृत्ति है।
पर आज की परिस्थितियों में जब दुनिया साफ़ तौर पर एकध्रुवीय नहीं रही है । ट्रंप के टैरिफ़ युद्ध की घनघोर विफलता ने इस सत्य को प्रमाणित कर दिया है। चीन, रूस, ब्रिक्स का उदय, खाड़ी क्षेत्र की बदलती राजनीति, और स्वयं नाटो के सदस्य देशों की इस लड़ाई से घोषित दूरी, मध्यपूर्व की नई कूटनीतिक व्यवस्थाएँ और अमेरिका की पुरानी शैली की एकध्रुवीय शक्ति की सीमा को उजागर करते हैं । यह परिस्थिति अवसादग्रस्त अमेरिका को मृत्यु की ओर छलाँग लगाने की दिशा में प्रेरित करने के लिए यथेष्ट है । यह ईरान युद्ध को केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद के वाटरलू में नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था के एक नए सत्य के उद्घाटन की घटना का रूप दे रही है जिसके दीर्घ अंत के बीच से साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद के पूरी तरह से अंत की घोषणा होगी ।
इसीलिए ईरान के साथ अमेरिका का यह संघर्ष अब केवल एक और युद्ध नहीं है, यह उस पूरी विश्व-व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें अमेरिका दशकों से एक प्रकार की निर्णायक शक्ति की भूमिका निभाता रहा है।
हम पुनः यह कहना चाहेंगे कि रोगग्रस्त प्रमाता के विश्लेषण की तरह ही किसी साम्राज्य का अंत हमेशा उसकी बाहरी हार से नहीं होता; वह अपने ही पुनरावृत्तिमूलक भय और हिंसा से भीतर से टूटता है। वह जितना अधिक अपने प्रभुत्व को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करता है, उतना ही अधिक वह अपनी सीमाओं को उजागर करता है। विश्लेषक उसे एक नए सत्य पर टिका कर उसे अपने अंदर के इस प्रेत से मुक्त करता है । साम्राज्य के मामले में ऐसा “विश्लेषक” कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि इतिहास की नई बहुध्रुवीय शक्तियाँ और संघर्षरत राष्ट्र होते हैं।
इसी अर्थ में ईरान का प्रश्न केवल ईरान का प्रश्न नहीं है; यह उस बिंदु का नाम है जहाँ अमेरिका को स्वयं अपने संकट का सम्मुख खड़ा कर दिया जा रहा है।
इस संकट के बीच से एक नई विश्व-व्यवस्था उभरेगी जिसमें संप्रभु राष्ट्रों के बीच संबंध केवल सैन्य धमकी, प्रतिबंधों, और एकतरफा हस्तक्षेप पर आधारित न होंगे, बल्कि परस्पर सम्मान , समानता, बहुध्रुवीयता और नए प्रकार के कूटनीतिक शील पर आधारित होंगे ।
यह प्रक्रिया सहज नहीं होगी; इसमें युद्ध, अस्थिरता और भारी विनाश की संभावना रहेगी, और इसीलिए हम ईरान युद्ध के जल्द और आसान हल को अभी नहीं देख पा रहे हैं। परंतु इतिहास में बार-बार ऐसा हुआ है कि किसी पुरानी व्यवस्था का अंत उसकी सबसे उग्र हिंसा के बीच से ही होता है। हिटलर अपनी शक्ति के चरम प्रदर्शन के बाद ही खत्म हुआ करते हैं।
आज अमेरिका को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वह एक मृत्यु-उद्दीपन (death drive) के चक्र में फँस चुका है । यह एक ऐसा चक्र है जिसमें हर अगला सैन्य कदम उसे अपने अंत के और निकट ले जायेगा ।
आज अमेरिका को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वह मृत्यु-उद्दीपन (death drive) के एक ऐसे चक्र में फँस चुका है जिसमें हर अगला सैन्य कदम उसे अपने अंत के और निकट ले जायेगगा । वह जितना अधिक अपनी खो रही शक्ति को फिर से पाने के लिए हाथ-पैर मारता है, उतना ही अधिक ऐतिहासिक परिस्थितियों और अपनी सीमाओं, अपनी आंतरिक विघटनशीलता के दलदल में धँसता चला जाता है । इसीलिए ईरान के विरुद्ध यह युद्ध केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि उस साम्राज्य की आत्म-विनाशकारी विवशतामूलक पुनरावृत्ति का एक और चरण है, जो अब अपने अंतिम और सबसे खतरनाक रूप में प्रवेश कर चुका है।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि साम्राज्य कई बार शत्रु के हाथों नहीं, अपने ही मृत्यु-उद्दीपन में फँस कर समाप्त होते हैं। जुएसॉंस जब स्वातंत्र्य और संकुचन के संतुलन से कट जाता है, तब वह शांत चित्त की गति के बजाय उच्छृंखल आत्म-विनाश का कारक बन जाता है।


