— अरुण माहेश्वरी
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोपों और उससे जुड़ी गिरफ्तारियों ने करोड़ों श्रद्धालुओं को स्तब्ध कर दिया है। यदि जांच अंततः इन आरोपों की पुष्टि करती है और यह सिद्ध होता है कि श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित धन का व्यवस्थित दुरुपयोग हुआ है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं होगी; यह उस संस्थागत संरचना पर भी गंभीर प्रश्न होगा जिसके अधीन इस मंदिर का संचालन किया जा रहा है।
सबसे पहले एक बुनियादी बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए। यह चोरी किसी हिंदू मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था में हुई चोरी नहीं है। भारत के हजारों मंदिरों में चढ़ावे से पुजारियों, सेवायतों और धार्मिक संस्थाओं का निर्वाह होता है। यदि वह स्थापित परंपरा और नियमों के अनुरूप है, तो उसे चोरी नहीं कहा जाता। चोरी तब कहलाती है जब श्रद्धा से समर्पित धन को नियमों के विरुद्ध निजी संपत्ति में बदल दिया जाए।
लेकिन अयोध्या का प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं रहा। इसका निर्माण एक विशाल राजनीतिक आंदोलन की परिणति के रूप में हुआ। इसे केवल भगवान राम के मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष राजनीतिक परियोजना के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसीलिए यहाँ जो कुछ घटित होता है, वह केवल धार्मिक घटना नहीं रह जाता; वह राजनीति, सत्ता और संस्थागत संस्कृति के प्रश्नों को भी जन्म देता है।
समाजशास्त्र का एक सामान्य सिद्धांत है कि संस्था का स्वरूप उसके संचालन के स्वरूप को भी प्रभावित करता है। संस्था जिस उद्देश्य से निर्मित होती है, जिस प्रकार की सत्ता-संरचना उसके भीतर स्थापित की जाती है और जिन प्रोत्साहनों पर उसका प्रशासन चलता है, वही उसकी कार्य-संस्कृति को आकार देते हैं।
भारत का दुर्भाग्य यह है कि सार्वजनिक जीवन का शायद ही कोई क्षेत्र भ्रष्टाचार के संकट से पूरी तरह मुक्त रहा हो। सरकारी संस्थाएँ, सार्वजनिक उपक्रम, अनेक प्रशासनिक निकाय और राजनीतिक संगठन बार-बार इसी समस्या से ग्रस्त पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई धार्मिक संस्था स्वयं एक प्रकार के अर्ध-सरकारी या राजनीतिक प्रतिष्ठान का रूप ग्रहण कर ले, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह भी उसी संस्थागत संस्कृति से प्रभावित नहीं होगी जो हमारे सार्वजनिक जीवन में पहले से व्याप्त है ?
यहीं से अयोध्या के राम मंदिर का प्रश्न एक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है।
प्राचीन हिंदू धर्म का ऐतिहासिक स्वरूप किसी एक केंद्रीय धर्मसत्ता पर आधारित नहीं रहा है। उसकी शक्ति उसकी बहुलता में रही है—असंख्य तीर्थ, असंख्य परंपराएँ, असंख्य संप्रदाय, स्थानीय देवस्थानों की स्वायत्तता और साधना के विविध मार्ग। उसके पास न कोई एक सर्वोच्च धर्माध्यक्ष रहा, न कोई एक अनिवार्य धार्मिक राजधानी और न ही एक केंद्रीकृत धार्मिक अनुशासन। यही उसकी ऐतिहासिक विशेषता रही है।
इसके विपरीत, आधुनिक राजनीतिक हिंदुत्व की परियोजना हिंदू समाज को एक केंद्रीय प्रतीक, एक केंद्रीय धार्मिक-राजनीतिक स्थल और एक प्रकार के आधिकारिक प्रतिनिधित्व के अंतर्गत संगठित करने का प्रयास करती दिखाई देती है। यह प्रक्रिया हिंदू धर्म के स्वाभाविक ऐतिहासिक विकास का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीति द्वारा निर्मित एक कृत्रिम केंद्रीकरण का प्रयास है।
और, हमारी नजर में यहीं सबसे बड़ा खतरा निहित है।
जब किसी बहुलतावादी लोकधर्म को सत्ता की केंद्रीय परियोजना में रूपांतरित किया जाता है, तब उसके भीतर भी वही प्रशासनिक तर्क प्रवेश करते हैं जो आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की पहचान हैं—सत्ता का केंद्रीकरण, संसाधनों का केंद्रीकरण, नियंत्रण का केंद्रीकरण, भाई-भतीजावाद और संरक्षण की राजनीति। श्रद्धा का स्थान प्रबंधन लेने लगता है, नैतिक अनुशासन की जगह प्रशासनिक अनुशासन आ जाता है, और धार्मिक उत्तरदायित्व की जगह राजनीतिक उत्तरदायित्व प्रमुख हो जाता है।
ऐसी स्थिति में यदि भ्रष्टाचार जन्म लेता है, तो उसे केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक विफलता कहकर टालना पर्याप्त नहीं होता। वह किसी न किसी रूप में उस संस्थागत रूपांतरण की भी अभिव्यक्ति बन जाता है जिसके द्वारा धर्म को राजनीति की भाषा में संगठित किया गया।
इसीलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह किसी हिंदू मंदिर में हुई चोरी भर नहीं है। यह उस मंदिर में हुई चोरी है जिसे राजनीतिक हिंदुत्व की केंद्रीय परियोजना का प्रतीक बनाया गया। यह टिप्पणी हिंदू धर्म पर नहीं, बल्कि धर्म के राजनीतिकरण पर है।
विडंबना यह है कि भगवान राम भारतीय सांस्कृतिक चेतना में मर्यादा, न्याय और धर्म के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। यदि उन्हीं के नाम पर निर्मित सबसे बड़े सार्वजनिक मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा पर प्रश्न उठने लगें, तो यह केवल धन के गबन का मामला नहीं रहता । यह उस दावे की भी परीक्षा है कि क्या राजनीति धर्म की रक्षा कर सकती है?
शायद इस घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि धर्म की सबसे बड़ी सुरक्षा उसके राजनीतिक अधिग्रहण में नहीं, बल्कि उसकी नैतिक स्वायत्तता में निहित होती है। जिस दिन कोई धार्मिक संस्था सत्ता का विस्तार बन जाती है, उसी दिन उसमें सत्ता की बीमारियों के प्रवेश का खतरा पैदा हो जाता है। और जहाँ सत्ता की संस्कृति का प्रवेश होता है, वहाँ श्रद्धा भी प्रशासनिक फ़ाइलों और राजनीतिक संरक्षण के बीच खोने लगती है।
यदि अयोध्या की यह घटना अंततः सिद्ध होती है, तो उसका सबसे गहरा संदेश यही होगा कि किसी भी धर्म की रक्षा राजनीति के द्वारा नहीं, बल्कि उस नैतिक चेतना के द्वारा होती है जो सत्ता से बड़ी होती है। जब सत्ता स्वयं धर्म का रूप धारण कर लेती है, तब सबसे पहले धर्म की आत्मा ही संकट में पड़ती है।
आगे के लिए कुछ सुझावः
इस संदर्भ में कुछ ठोस कदमों पर विचार किया जाना आवश्यक है।
सबसे पहले, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए—नियमित ऑडिट, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और स्वतंत्र निगरानी तंत्र के माध्यम से।
दूसरा, धार्मिक संस्थाओं के संचालन को राजनीतिक प्रभाव से यथासंभव मुक्त रखने की दिशा में स्पष्ट नीतियाँ बननी चाहिए, ताकि उनकी नैतिक स्वायत्तता बनी रहे।
तीसरा, यह भी विचार किया जा सकता है कि क्या ऐसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में पारंपरिक धार्मिक प्राधिकारों—जैसे शंकराचार्यों या अन्य मान्य आध्यात्मिक संस्थाओं—की अधिक भूमिका सुनिश्चित की जाए, ताकि संचालन का आधार राजनीतिक संरचना के बजाय धार्मिक उत्तरदायित्व और परंपरा पर टिका रहे।
चौथा, श्रद्धालुओं और समाज की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिससे जवाबदेही केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित न रहे। अंततः, धर्म के मूल नैतिक मूल्यों—ईमानदारी, सेवा और उत्तरदायित्व—को संस्थागत व्यवहार का आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि श्रद्धा और विश्वास की रक्षा केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में भी दिखाई दे।





