शनिवार, 25 जनवरी 2020

कैसे निस्तार होगा मोदी का इस संकट से !

—अरुण माहेश्वरी

आज ही हमने मोदी जी के उस भाषण को देखा जो उन्होंने बीजेपी मुख्यालय में पार्टी के नए अध्यक्ष जे पी नड्डा की स्वागत-सभा में दिया था । इस पूरे भाषण में उनकी भाव-भंगिमाएं अजीब प्रकार से बुझी-बुझी सी दिखाई दे रही थी ।

जो मोदी कल तक हमेशा अपनी संघ के प्रचारक की भूमिका को पीछे रख कर प्रधानमंत्री की गरिमा को खास महत्व देते थे, हमेशा 130 करोड़ भारतवासियों के नाम पर बोला करते थे, इस भाषण में वे पूरी तरह से बीजेपी के कार्यकर्ताओँ, बल्कि अंध भक्तों पर ही अपना पूरा भरोसा जाहिर कर रहे थे ।

सवाल उठता है कि अचानक मोदी 130 करोड़ भारतवासियों से मुंह क्यों चुराने लगे हैं ? क्यों वे सभी भारतवासियों की एक समग्र छवि का आज सामना नहीं कर पा रहे हैं ?

मोदी देश-विदेश में घूम-घूम कर हमेशा अपनी उदार और जनतात्रिक छवि का खूब ढिंढोरा पीटते थे । अपने को नेहरू से बड़ा जनतांत्रिक बताना तो उनका खास शगल था । लेकिन आज न सिर्फ भारत के मीडिया में, बल्कि सारी दुनिया के प्रमुख मीडिया में मोदी को भारत में जनतंत्र के लिये एक बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किया जाने लगा है । अपने को हमेशा मीडिया के प्रिय के रूप में पेश करने की कोशिश में रहने वाले मोदी ने इसी भाषण में यह भी कहा कि उन्हें अब मीडिया की कोई जरूरत नहीं है । अर्थात् मीडिया के चेहरे पर लिखे हुए सवालों का मुकाबला करने में भी वे आज अपने को पूरी तरह से असमर्थ पा रहे हैं ।

आखिर आदमी की अपने बारे में कोई धारणा बनती कैसे हैं ? वह अन्यों के माध्यम से ही, अपने चारों ओर के परिवेश के जरिये ही बनती है । लेकिन जब वह अन्य ही उसे अपना शत्रु नजर आने लगता है, तब वास्तव में आदमी का अपना ही पूरा अस्तित्व हिलने लगता है ।

मोदी ने अपने जिन लक्ष्यों की बड़ी-बड़ी बातों से अपने अहम् को दुनिया के सामने रखा था, वह अब नागरिकता संबंधी उनके पैदा किये गये विवाद के कारण ही जैसे पूरी तरह से बिखरने लगा है । अर्थात् 2014 के बाद मोदी के व्यक्तित्व को बनाने वाले सारे पहलू यहां आकर अब तार-तार हो कर इस प्रकार बिखरने लगे हैं जिससे उनके पूरे अस्तित्व पर ही सवाल पैदा हो जा रहे हैं ।

मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले पांच सालों में नोटबंदी की तरह के तुगलकीपन से अपनी तात्विक सचाई का एक परिचय दिया था, लेकिन लोग उसे झेल गये, क्योंकि खुद उन्होंने ही बाद में उसके प्रति एक मौन अपना कर एक प्रकार से उसे अपनी भूल मान लिया । नोटबंदी के प्रति एक क्रमिक उदासीनता, उसके पक्ष के संघी तर्कवागीशों से एक दूरी और अरुण जेटली की तरह के कुतर्की के न रहने से उनकी ध्वस्त हो रही छवि को फिर से उभरने में भारी मदद की । कालक्रम में नोटबंदी उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह से परिभाषित करने वाली कोई घटना नहीं रह गई, वे एक स्वाभाविक शासक की छवि में लौट आए । यद्यपि आज तक भी वे आर्थिक मामलों में अपनी कमियों से उबर नहीं पाए हैं, लेकिन उसके मूल में भी नोटबंदी से पैदा हुई परिस्थितियों की बाधा ही काम कर रही है । उनके सामने विकल्प सिकुड़ गये हैं ।

बहरहाल, बड़ी मुश्किल से काबू में आया मोदी का संघी उद्भटता का रोग 2019 के चुनाव के बाद एक बार फिर बुरी तरह से जोर मारने लगा । कश्मीर के प्रति नफरत और अंत में नागरिकता संबंधी सिनाख्तीकरण की उनकी हिटलरी परियोजना ने फिर से एक बार दुनिया के सामने उनके सच को पूरी तरह से खोल कर रख दिया है । ऐसे अस्वाभाविक कदमों को ही मनोरोगियों की वह फिसलन कहते है जिनसे उनका रोग जाहिर हुआ करता है ।
कोई भी मनोविश्लेषक आदमी की ऐसी चूकों, यहां तक कि जुबान की फिसलनों पर अपनी तीखी नजर रखता है और उससे उसके मूल रोग को पकड़ कर जब उसके सामने पेश करता है, आदमी का अस्तित्व हिल जाता है और उसे अपनी छवि के हित का स्मरण कराते हुए सुधार के रास्ते पर लाना संभव होता है ।

मोदी नोटबंदी के बाद तो फिर अपनी काम्य छवि में लौट आएं, लेकिन इस बार, इस नागरिकता के सवाल पर उनकी वापसी के रास्ते की बाधा बहुत बड़ी हो गई है । इसमें 2019 के चुनाव में उनकी अनपेक्षित जीत के अहंकार के अलावा इसमें एक बड़ा कारण सरकार में उनके साथ अमित शाह जैसे पेचीदा साथी का होना है । इससे उनका अहम् उनकी कांक्षित छवि से कहीं ज्यादा भारी हो गया है । अमित शाह उन्हें राज्य सत्ता की दमन की ताकत के बल पर पासा पलट देने का भरोसा दिलाते रहने के लिये काफी है ।

यहां तक कि नागरिकता कानून पर जब असम में शुरू में ही जोरदार प्रतिक्रिया हुई तो अमित शाह ने इस कानून के दायरे से उस क्षेत्र को बाहर रखने की कागजी धोखाधड़ी से चीजों का संभाल लेने का उन्हें भरोसा दिलाया ।
पर धोखा धोखा ही होता है । कई बार वह धोखेबाज के खुद के लिये ही धोखे का रूप ले लेता है । नड्डा को सभापति पद सौंपने के वक्त मोदी ने एक ही सलाह दी कि वे इस ‘टोली’ पर ज्यादा समय जाया न करें । ‘टोली’ से उनका तात्पर्य वह जनता थी जो अभी लाखों की संख्या में देश के हर शहर, कस्बे और गांव में सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरी हुई है । जनतंत्र में जिस जनता को ही माई-बाप माना जाता है, मोदी-शाह अपने नए अध्यक्ष से कहते हैं — उसी की परवाह मत करो !

सिगमंड फ्रायड कहते थे कि विक्षिप्त आदमी सबसे पहले अपने ऊपर नजरदारी रखने वाले पिता को मृत मान कर चलता है । वह अपने मालिक की मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि उसे पहले ही मृत मान लेता है । वह एक प्रकार से निश्चेष्ट सोया हुआ अपने को दिलासा देता रहता है कि मैं अपने नित्य कर्मों का, पूजा-अर्चना के सारे कामों का पूरी निष्ठा से पालन करता हूं,  दूसरे सभी कामुक पचड़ों से दूर हूं ! उसकी दशा उस सैनिक की तरह की होती है जो वास्तविक मृत्यु से बचने के लिए युद्ध के मैदान में मृत पड़े होने का अभिनय किया करता है । जॉक लकान के अनुसार, मृत्यु से इस प्रकार के धोखे का मतलब ही है खुद जड़ीभूत हो जाना, जिंदा रहते हुए मर जाना । जुनून में यह जड़ता एक आम लक्षण है ।

आज अमित शाह को अपने बगल में पा कर मोदी संघी विक्षिप्तता की इसी जड़ता के शिकार जान पड़ते हैं । वे किसी की सुनने के लिये तैयार नहीं है । न जनता की न व्यापक अन्तरराष्ट्रीय जनमत को प्रतिबिंबित करने वाले मीडिया की । उनकी छवि दुनिया के सामने एक डरावनी संवेदनशून्य लाश की तरह की होती जा रही है ।

हम नहीं जानते वे उनके संपूर्ण अस्तित्व को ललकारने वाली इन परिस्थितियों का कैसे मुकाबला करेंगे । उनके विचलन की गूंज-अनुगूंज चारों दिशाओं से सुनाई देने लगी है । जिन चीजों से वे अपने व्यक्तित्व को साध रहे थे वे सब अब तार-तार हो कर उनकी पूरी छवि को खत्म कर देने का खतरा पैदा करने लगे हैं । वे जिन महान लक्ष्यों की बात किया करते थे, जो किसी न किसी रूप में उनके अहम् में भी बोला करता था, वे सब बिखर से गये हैं । यह उनके ही तनावों, अस्वाभाविक व्यवहारों, असमंजस, और संकट से निकल जाने की उनकी आधारहीन कल्पनाओँ से बार-बार जाहिर होता है । चारों ओर से उन्हें ललकारा जा रहा है ।

कहना न होगा, यही जन-दबाव न सिर्फ आज देश के सामने पैदा किये जा रहे संकट का अंतिम इलाज है, बल्कि यदि मोदी कंपनी इसे सकारात्मक रूप में ले तो यह उनका खुद का भी इलाज साबित हो सकता है । वैसे अभी तो उनका मर्ज लाइलाज नजर आता है । देश जरूर इस प्रक्रिया में अपने पर भूत बन कर मंडरा रहे इस विभाजनकारी संघी खतरे से निकलने का राजनीतिक रास्ता पा लेगा । भारत किसी विक्षिप्त तानाशाह की जगह नहीं है, यह स्वतंत्र, जनतांत्रिक और सेकुलर उसूलों पर दृढ़ता से चलने वालों की ही जगह है, यह भी फिर से एक बार साबित होगा ।   

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

नड्डा पता नहीं इस प्राणहीन जीव के बोझ को कैसे ढोयेंगे !

-अरुण माहेश्वरी



बीजेपी में नये अध्यक्ष आ गये हैं — अमित शाह की जगह जे पी नड्डा ।

बीजेपी में यह परिवर्तन एक ऐसे समय में हुआ है, जब वह एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रही है । एक ऐसे दौर से जब चंद महीनों पहले की 2019 के चुनावों की भारी सफलता के ठीक बाद ही चरम अहंकार में उसका ब्लड प्रेसर तेजी से बढ़ता हुआ ऐसी जगह पहुंच गया जब आदमी की जिंदगी पर खतरा छा जाता है । बीजेपी को भी सचमुच इससे लकवा मार गया है और वह लगभग एक संवेदनशून्य प्राणी में तब्दील हो चुकी है ।

नड्डा को सभापति पद सौंपने के वक्त मोदी ने उन्हें एक ही सलाह दी कि वे इस ‘टोली’ पर ज्यादा समय जाया न करें ।

‘टोली’ से मोदी का क्या तात्पर्य था ? उनका इशारा उस जनता की ओर था जो अभी लाखों की संख्या में देश के हर शहर, कस्बे और गांव में सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरी हुई है ।

जनतंत्र में जिस जनता को ही माई-बाप माना जाता है, मोदी-शाह कंपनी अपने नए अध्यक्ष से कहते हैं — उसी की परवाह मत करो !

मोदी-शाह का यह नजरिया ही उनकी जुनूनी विक्षिप्तता और बीजेपी को उनके द्वारा एक डरावनी लाश में तब्दील कर देने का सबसे ज्वलंत प्रमाण है ।

देश के कोने-कोने में इतने भारी विरोध प्रदर्शनों से लगभग निष्फिक्र हो कर अभी दिल्ली में अमित शाह आदि जिस प्रकार ढर्रेवर रूप में अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं, जिस प्रकार इन चुनावों में भी शुद्ध  सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने हमेशा के काम में लगे हुए हैं, उससे ही इनकी जुनूनी विक्षिप्तता नग्न रूप में सामने आ जाती है ।

सिगमंड फ्रायड कहते है कि ऐसी विक्षिप्तता में फंसा हुआ आदमी सबसे पहले अपने ऊपर नजरदारी रखने वाले पिता को मृत मान कर चलता है । वह अपने मालिक की मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि उसे पहले ही मृत मान लेता है ।

ऐसा व्यक्ति एक प्रकार से निश्चेष्ट सोया पड़ा हुआ अपने को दिलासा दिया करता है कि मैं अपने नित्य कर्मों का, पूजा-अर्चना के सारे कामों का पूरी निष्ठा से पालन करता हूं,  दूसरे सभी कामुक पचड़ों से दूर हूं ! उसकी दशा उस सैनिक की तरह की होती है जो वास्तविक मृत्यु से बचने के लिए युद्ध के मैदान में मृत पड़े होने का अभिनय किया करता है ।
मृत्यु से इस प्रकार के धोखे का मतलब ही है खुद जड़ीभूत हो जाना, जिंदा रहते हुए मर जाना । जुनून में यह जड़ता एक आम लक्षण है ।   आज की बीजेपी में ये सारे लक्षण बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे हैं ।

ऐसे समय में ही इस जोड़ी ने पार्टी के प्रति अपने एक और कर्त्तव्य का पालन करके, उसे एक नया अध्यक्ष दे कर, जैसे अपने एक और महान दायित्व का निर्वाह कर लिया है !

नड्डा यह पद पा कर खुश है क्योंकि जो भी है, मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है !

लेकिन, कहना न होगा, ऐसी सारी कवायदें अब बीजेपी को जिंदा रखने में कामयाब नहीं हो सकती है । वह अब किसी के लिये भी सिर्फ एक डरने-डराने की मुर्दा चीज रह गई है, आशा देने वाली कोई जीवित वस्तु नहीं है । श्मशान के कुछ कापालिक ही, जिन्हें यहां आरएसएस के घुटे हुए स्वयंसेवक भी कहा जा सकता है, अब इसके चारों ओर नाचेंगे, कूदेंगे । विवेकवान सामान्यजन तो इस डरावनी मुर्दानगी से दूरी रखना ही बेहतर समझेगा । 

बुधवार, 22 जनवरी 2020

अमित शाह की ‘क्रमकेलि’

( टेलिग्राफ में उड्डासक मुखर्जी के लेख पर आधारित)


—अरुण माहेश्वरी

आज के ‘टेलिग्राफ’ में उड्डालक मुखर्जी का एक अद्भुत लेख है — ‘समरूपता के प्रति अमित शाह का लगाव : कुटिल नीति’ (Amit Shah’s love for symmetry : The crooked line)

अपने इस लेख में श्री मुखर्जी ने बात शुरू की है संसद में अमित शाह की उस उक्ति से — ‘क्रोनोलोजी समझियें’, जो लाइन आजकल काफी चर्चा में है । अब देश भर में सड़कों पर उतरे हुए लोग भी उन्हें उनकी क्रोनोलोजी, उनकी वंश परंपरा समझा रहे हैं !

बहरहाल, श्री मुखर्जी ने ‘सीएबी, एनपीआर और एनआरसी’ वाली अमित शाह की इस क्रोनोलोजी को एक प्रकार की बासी बात बताया है, क्योंकि इसे तो पहले ही खुद मोदी ने 2047 तक भारतीय गणतंत्र की पूरी सूरत को ही बदल डालने के अपने जिनोम (वंशानुक्रम) प्रकल्प से कह दी थी । मुखर्जी ने इस क्रोनोलोजी शब्द की लैटिन भाषा से व्युत्पत्ति का ब्यौरा देते हुए कहा है कि एक प्रकार की सपाटता और समरूपता का तत्व इसमें अन्तरनिहित होता है । सर्वाधिकारवादी एकसूत्रता । सारी लाक्षणिकताओं, सारी शक्तियों को एक जगह मिला देने का सर्वाधिकारवाद । मुखर्जी ने नाजी जर्मनी और अन्य प्रभुत्ववादी सोच के स्थापत्य तक में इस सोच की छाप का उल्लेख किया है और व्यंग्यकार पीटर फ्रैंकलिन के एक लेख के हवाले से कहा है कि  ऐसे शासनों ने ही “आधुनिक कला परंपरा के कुछ सबसे बदसूरत पक्षों को जिंदा रखा था — सभी गैर-योजनाबद्ध, जैविक और स्थानीय चीजों के प्रति तिरस्कार के भाव को ।”

“अपनी प्रकट अराजकता के आतंक को ढंकने के लिये ही सर्वाधिकारवादी नैतिकता स्थापत्य की विशालता के प्रति अपनी निष्ठा का प्रयोग करती है । फ्रैंकलिन पाठकों को बताते हैं कि अडोल्फ हिटलर ने एक इतनी विशालकाय इमारत के रूप में नए बर्लिन के निर्माण की योजना बनाई थी जिस पर बादल और बारिस के जरिये उसका अपना ऋतुचक्र होगा ।”

मुखर्जी लिखते हैं कि हिंदुत्व की तकनीक अभी अपना मौसम बनाने तक तो नहीं गई है, लेकिन उसके 2989 करोड़ की सरदार पटेल के मूर्ती, 790 फुट की 2500 करोड़ की राम की मूर्ति के चमत्कारों से हिटलर भी हैरान हो जाता ।

मुखर्जी कहते हैं कि क्रोनोलोजी से जुड़ी समरूपता की अवधारणा इसीलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें राजनीतिक कल्पनाशीलता को सर्वाधिकारवादी शासन के सौन्दर्य में तिरोहित कर दिया जाता है । मोदी का यह वंशानुक्रम तय करने का प्रकल्प आधुनिकतावादी लाइन पर न सिर्फ पूरी तरह सपाट बल्कि आत्माविहीन और दासता का प्रकल्प है ।

इस लेख का अंतिम हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण है जिसमें मुखर्जी ने ‘Inside Hitler’s Bunker : The Last Days of the Third Reich’ पुस्तक के एक अंश को क्रम और अराजकता और इनकी परस्पर अदला-बदली से निकलने वाली शिक्षा के रूप में उद्धृत किया है । इसमें पुस्तक के लेखक योआखिम फेस्ट हिटलर के बंकर के अंदर पैदा हो रही घुटन भरी दहशत का ब्यौरा देते हैं — “जेनरेटरों की लगातार गड़गड़ाहट. डीजल और पेशाब की गंध, ..धुंधली रोशनी, जैनरलों और नाजी अधिकारियों की अंतहीन बैठकें जिनके बीच-बीच में संदेशवाहकों की  अधिक से अधिक बुरी खबरें”। मुखर्जी लिखते हैं — “हिटलर के राइख का पतन निश्चित रूप में सर्वनाशी रहा होगा । फेस्ट ने जिस कुशलता से इस विध्वंस के दृष्य और इसकी ध्वनियों को लिखा है वह किसी भी निरंकुश शासक की अंतिम नियति है । एक गलत समरूपता से प्रतिबद्ध, अनुशासन और अधिकार की बीमार मानसिकता का शिकार वह अपने अंतिम घंटों में, अराजकता से भस्मीभूत, अपने अंतिम दंड को पा रहा था ।”

सचमुच, उड्डालक मुखर्जी की इस शाह-छाप क्रोनोलोजी, अर्थात् क्रम की चर्चा ने अनायास ही हमें कश्मीरी शैवमत के क्रम संप्रदाय वालों की ‘क्रमकेलि’ का स्मरण करा दिया जिसमें शक्ति का अति महात्म्य बताया जाता है । आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे अपने मुक्तिदायी प्रत्यभिज्ञादर्शन से जोड़ने के लिये ‘क्रममुक्ति’ की बात की थी जिसमें किसी भी क्रमबद्ध संस्करण को किसी एक उपाय से बांधने के विरुद्ध नाना उपायों, उपायवैविध्य की बात कही गई थी । मोदी-शाह की ‘क्रमकेलि’ को, चाहे तो, कुछ इस प्रकार भी समझा जा सकता है । यहां हम टेलिग्राफ के इस लेख का लिंक मित्रों से साझा कर रहे हैं :

https://www.telegraphindia.com/opinion/the-caa-npr-nrc-is-reminiscent-of-nazi-germany-in-many-aspects-with-amit-shah-and-adolf-hitler-sharing-some-similar-goals/cid/1738469?ref=opinion_home-template

बुधवार, 15 जनवरी 2020

असंभव की साधना के राजनीति के मूल सत्य को आज प्रमाणित करने की घड़ी आ चुकी है

—अरुण माहेश्वरी



नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन ने इसी बीच भारत को सचमुच बदल डाला है । देश भर में इस आंदोलन में कूद पड़ी ऊर्जस्वित महिलाओं ने तो जैसे राजनीति के टाट को ही उलट दिया है । सिर्फ छः महीने पहले पूर्ण बहुमत से चुन कर आए मोदी और उनके शागिर्द शाह का आज देश के आठ राज्यों में तो जैसे प्रवेश ही निषिद्ध है और पूरे देश में एक भी ऐसा राज्य नहीं बचा है जहां वे भारी विरोध की आशंका से मुक्त हो कर निश्चिंत हो कर घूम-फिर सकते है । यहां तक कि बाहर के देशों में भी मोदी आज एक अवांछित व्यक्ति हैं । हर जगह उनके लिये काले झंडे और मोदी गो बैक के नारे प्रतीक्षा कर रहे हैं ।

दुनिया के राजनीतिक इतिहास में यह आंदोलन लगभग उसी प्रकार से स्वयं में एक विरल घटना के रूप में सामने आया हैं, जैसे कभी भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अपने आप में एक विरल संघर्ष था । तमाम परिवर्तनकारी राजनीतिक घटनाक्रमों की खूबी यही है कि वे न किसी अन्य आंदोलन की अनुकृति होते हैं और न उन्हें दूसरी किसी जगह हूबहू दोहराया जा सकता है । ये विज्ञान के प्रयोग या गणित के समीकरण नहीं हैं जिन्हें बार-बार दोहरा कर एक ही परिणाम हासिल किया जा सकता हैं । दुनिया के राजनीतिक घटना-क्रमों में किसी भी काल में कितनी ही एकसूत्रता क्यों न दिखाई दे, हर घटना अपने में अद्वितीय ही होती है ।

इसीलिये भारत में पूरे देश के पैमाने पर अभी जो लहर उठी है, वह भी अद्वितीय है । मोदी ने अपने शासन के इस दूसरे दौर में अपनी बुद्धि के अनुसार आजादी के अधूरे कामों को पूरा करने के इरादों से राज्य के धर्म-निरपेक्ष चरित्र को बदलने का जो संघी खेल कश्मीर से शुरू किया था, उसीका अब कुल जमा परिणाम यह दिखाई देता है कि आजादी की लड़ाई में ही अर्जित मूल्यों और संविधान के मूलभूत आदर्शों को हमेशा के लिये सुरक्षित कर देने के लिये पूरा भारत अब मचल उठा है । मोदी के जहरीले सांप्रदायिक इरादों और शाह की दमनकारी हुंकारों ने जैसे अंग्रेजों के शासन के बचे हुए दंश-बोध को देश के छात्रों, नौजवानों और खास तौर पर महिलाओं में जिंदा कर दिया है और जैसे तमाम देशवासियों में आजादी की लड़ाई का हौसला पुनर्जीवित होता जा रहा है ।

भारत का यह महा-आलोड़न स्वयं में विरल है, क्योंकि न यह किसी कैंपस विद्रोह की अनुकृति है और न ही किसी ‘अरब बसंत’ की तरह का कोरा विध्वंसक तूफान । हर बीतते दिन के साथ यह आंदोलन अपने अंदर एक नये भारत का निर्माण कर रहा है । यह आंदोलन हमारे संविधान के विस्मृत कर दिये गये, और आज फाड़ कर फेंक दिये जा रहे पन्नों को सहेज कर एकजुट और न्यायप्रिय भारत को नये सिरे से तैयार करने लगा हुआ है । इसीलिये, जो यह समझते हैं कि समय के साथ यह आंदोलन शिथिल हो जायेगा या यह किसी अंजाम तक नहीं जायेगा या इसे पाशविक दमन के बल पर कुचल दिया जायेगा — वे भारी मुगालते में हैं । इस आंदोलन में वाकई अनंत संभावनाएं है, इसकी गहराई और विस्तार का कोई ओर-छोर नहीं है और इसकी आंतरिक ऊर्जा अकूत है — इसके सारे संकेत इसी बीच मिलने लगे हैं ।

जो आंदोलन शुरू में असम के साथ ही भारत के चंद विश्वविद्यालयों के कैंपस से शुरू हुआ था, वह इसी बीच भारत के उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों के शहरों, कस्बों, गांवों और गली कूचों तक को पूरी तरह से अपनी जद में ले चुका है । बंगाल का कोई जिला केंद्र ऐसा नहीं है जहां रोजाना लाखों की संख्या में लोग प्रदर्शन न कर रहे हो । पूरा दक्षिण भारत आज इसके विरोध में उबल रहा है । पश्चिम में महाराष्ट्र, गोवा, और गुजरात में भी भारी प्रदर्शन चल रहे हैं । बिहार और उड़ीसा भी पीछे नजर नहीं आते । उत्तर प्रदेश का सच किसी से छिपा नहीं है । दिल्ली तो आंदोलन का एक केंद्र-स्थल बना हुआ है । हर रोज नये-नये क्षेत्रों में इसका उफान दिखाई देता है ।

देश के तकरीबन 16 राज्यों की सरकारों ने साफ ऐलान कर दिया है कि उनके राज्यों में नागरिकता कानून को लागू नहीं किया जायेगा । केरल सरकार ने तो सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाकर केंद्र सरकार को ललकारा है । इसी सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट भी अब अपनी नींद से उठने लगा है । हाल में उसने धारा 144 के प्रयोग और इंटरनेट सेवाओं पर रोक के बारे में एक ऐतिहासिक फैसला दे कर मोदी सरकार के मुँह पर एककरारी चपत मारी है । फिर भी मोदी और उनके लोगों की दशा बदहवास पागलों की तरह की बनी हुई है । कोई पागल ही तो अपने चारों ओर के इस कदर जलते हुए यथार्थ के प्रति इतना अंधा हो सकता है !

मोदी और उनके लोग अभी भी राजनीति की घृणित चालबाजियों और झूठे प्रचार की शक्ति पर भरोसा लगाये बैठे हैं । मोदी धोखेबाजी से छोटे-छोटे बच्चों के बीच अपने नागरिकता कानून के पक्ष में कहीं हाथ उठवा लेते हैं, तो कहीं उसके लोग पोस्टकार्ड से बच्चों का समर्थन लेने की कोशिश करते हैं । हद तो तब हो गई जब मिस्ड कॉल के जरिये समर्थन पाने के लिये कामुक बातें करने वालों के विज्ञापनों का सहारा लिया जाने लगा । गंदी से गंदी गालियाँ और कामुक बातें जिनके राजनीतिक प्रचार के औज़ार होंगे वे सिर्फ़ लिंचर्स और रेपिस्ट ही तैयार कर सकते हैं, इसके सबूत समाज में भी अब आए दिन देखने को मिल रहे हैं !

उनका कोई नेता कहता है कि ‘यदि किसी ने मोदी-योगी के विरुद्ध आवाज उठाई तो उसे जिंदा गाड़ दूंगा’, तो कोई कहता है ‘कुत्तों की तरह गोली मारूंगा’, ‘शहर फूंक दूंगा’, ‘नागरिकता कानून और एनआरसी का विरोध करने वालों का एक घंटे में सफाया कर दिया जायेगा’ । कुल मिला कर परिस्थिति इतनी खराब होती जा रही है कि आगे कोई भी सभ्य आदमी बीजेपी के नेताओं के बग़ल में खड़ा होने से कतराने लगेगा । वे तमाम प्रकार की बुराइयों के प्रतीक बन कर रह गये हैं । लेकिन मोदी-शाह को इसका होश ही नहीं है । कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे सत्ता के केंद्र में आकर अमित शाह ने मोदी को ही पूरी तरह से एक मज़ाक़ का विषय बना दिया है । मोदी अपनी जिन संघ वाली बुराइयों को पहले अंधेरे में रखना चाहते थे, उनकी इन कोशिशों को ही शाह ने प्रकाश में ला दिया है । कॉमेडी का मतलब ही होता है — छिपाने की कोशिश का खुला मंचन।

मोदी-शाह पूरी बेशर्मी से इस झूठ को दोहराते रहते हैं कि सीएए नागरिकता देने के लिये है, किसी की नागरिकता छीनने के लिये नहीं ! आज देश का हर समझदार आदमी जानता है कि इस क़ानून से धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच भेद-भाव की जो ज़मीन तैयार की गई है, वही तो शुद्ध वंचना है ।

केंद्र का गृह राज्यमंत्री किशन रेड्डी कहता है कि सीएए 130 करोड़ लोगों में से यदि एक को भी प्रभावित करेगा तो वे इस क़ानून को वापस ले लेंगे । उसे यह नहीं मालूम कि यह किसी एक को नहीं, सारे 130 करोड़ लोगों को, भारत के संविधान को प्रभावित करने वाला कानून है । और, जो चीज सबको समान रूप से प्रभावित करती है, उसके प्रभाव को किसी एक पर प्रभाव के ज़रिये नहीं समझा जा सकता है !

फासीवाद, नाजीवाद इटली और जर्मनी में किसी एक के विरुद्ध नहीं था । उसने इन देशों के प्रत्येक नागरिक के जीवन को प्रभावित किया था । राज्य के धर्म-निरपेक्ष चरित्र को नष्ट करके मोदी सरकार अपने हाथ में नागरिकों के बीच भेद-भाव करने का जो अधिकार लेना चाहती है, वही देश के हर नागरिक के जीवन को नर्क बनाने के लिये काफ़ी है ।

जेएनयू के छात्रों पर हमलों के लिये जिस प्रकार गुंडों और पुलिस का प्रयोग किया गया, उसने इनके नाजी चरित्र को और भी उजागर कर दिया । जिन्हें सताना है और जिनका सफाया करना है, उनका चिन्हीकरण करना नागरिकों पर जर्मन नाजियों के जुल्मों का पहला चरण था । जेएनयू में इन्होंने बाकायदा पहले से चिन्हित करके छात्रों के होस्टल के कमरों पर हमले किये थे । यूपी में योगी ने नागरिकता कानून के नियमों के बनने के पहले ही इस प्रकार का चिन्हीकरण का काम शुरू कर दिया है । कहना न होगा, सीएए-एनपीआर-एनआरसी का पूरा प्रकल्प ही राष्ट्र-व्यापी नाजी चिन्हीकरण के प्रकल्प के अलावा कुछ नहीं है । जिन्होंने भी सीएए-एनपीआर-एनआरसी को दमन और हत्या के त्रिशूल के रूप में देखा है, उन्होंने इसके सत्य की सही पहचान की है ।

बहरहाल, जैसा कि हमने शुरू में ही कहा है, राजनीति में कभी किसी फार्मूले के अनुसार कुछ भी घटित नहीं होता है । इसीलिये संघियों का नाजी प्रकल्प भी आगे बढ़ने के पहले ही मुंह के बल गिरने के लिये अभिशप्त है । भारत की अपनी वैविध्यमय विशेषता और इसका राजनीतिक इतिहास ही नाजीवादी प्रयोग की कब्र खोद देगा । देश व्यापी शांतिपूर्ण विद्रोह की शक्ल ले चुके इस आंदोलन की यही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी ।

सचमुच चिंतनशील राजनीति हमेशा एक असंभव की साधना है । सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता हमेशा जो चल रहा है उससे अलग परिस्थिति की संभावना के बारे में सोचते हैं । इसके विपरीत चालू राजनीतिक नेता तो सोचते ही नहीं है । जब भी आपको किसी राजनीतिक लेखन में कोरा दोहराव दिखाई दे, तो मान कर चलिये कि वह वास्तविकता में कोरा शब्दाडंबर और अंदर से खोखला होता है । वह घटिया किस्म की पत्रकारिता वाली टिप्पणी अथवा ड्राइंग रूप की गप से ज्यादा कुछ नहीं होता । इसी के आधार पर कोई भी सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और बैठे-ठाले राजनीतिक नेताओं के बीच फर्क कर सकता है । सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता यह मान कर चलते हैं कि कोई भी परिस्थिति अंतिम नहीं होती है और न उसमें परिवर्तन को किसी भी अन्य जगह के घटना-क्रम की नकल करके किया जा सकता है, जबकि चालू राजनीतिक नेता पुरानी बातों का ही पिष्टपेषण करते हुए भाषण झाड़ते रहते हैं ।

कहने का तात्पर्य यह है कि चिंतनशील राजनीति ही किसी भी ढर्रेवर जीवन से अलग सामूहिक संभावनाओं की नई दिशा खोलती है और नई परिस्थिति के निर्माण के सूत्र प्रदान करती है । वही तमाम मान ली गई प्रभुत्वशाली चीजों से हमें अलग करने का रास्ता सुझाती है । बस इसके लिये इतना ही जरूरी होता है कि राजनीति अपनी खुद की जड़ता से मुक्त हो कर बनती हुई नई संभावनाओं के क्षेत्र में प्रवेश करे । अपनी परंपरागत स्थिति से हट कर विमर्श की एक व्यापक प्रक्रिया में शामिल होना, और इस प्रकार एक असामान्य स्थिति की ओर बढ़ना राजनीति की सच्ची भूमिका की एक प्रमुख शर्त है । जो राजनीति ऐसा नहीं करती, वह इतिहास के कूड़े पर फेंक दिये जाने के लिये अभिशप्त विचारशून्य नेताओं की कोरी भीड़ होती है ।

जो भी यह कहता है कि शाहीन बाग में संविधान की रक्षा लड़ाई का अंत ग़ैर-राजनीतिक तरीक़े से ही संभव है, वह सचमुच महा मूर्ख है । राजनीति की असंभव की साधना के पहलू को उसने सिर्फ जोड़-तोड़ की धंधेबाजी के रूप में समझा है । लेकिन असल में, राजनीति के सच्चे मर्म को खुद को साबित करने की आज ही सबसे बड़ी चुनौती है । देश की प्रमुख धर्मनिरपेक्ष और जनतांत्रिक राजनीतिक ताक़तों का इस आंदोलन में शामिल होना ही इसके सकारात्मक विकास के लिये ज़रूरी है और सबसे अधिक उत्साहजनक बात है कि इसी बीच इसके सारे संकेत भी मिलने लगे हैं । राज्यों में बीजेपी की पराजय और तमाम गैर-बीजेपी सरकारों का इस आंदोलन में पूरी तरह से शामिल होते जान इसी बात को प्रमाणित करता है । विपक्ष की लगभग सभी पार्टियों ने इस आंदोलन के प्रति अपनी पूर्ण एकजुटता जाहिर की है । चुनावों की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के मैदान में भी मोदी-शाह-आरएसएस को पूरी तरह से पराजित करना इस ऐतिहासिक आंदोलन के युगांतकारी तार्किक अंत का एक अनिवार्य हिस्सा है ।

शनिवार, 11 जनवरी 2020

मीडिया का नया दौर और हिंदी पत्रकारिता

(राजकिशोर व्याख्यानमाला के लिए )

—अरुण माहेश्वरी


राजकिशोर की तरह के एक स्वातन्त्र्य चेता और पत्रकारिता के जगत में अपने एक अलग ही छंद के रचयिता पत्रकार की स्मृति में इस व्याख्यानमाला के लिये आयोजकों को आंतरिक धन्यवाद ।

आइये, हम सबसे पहले इस बुनियादी सवाल से ही अपनी बात शुरू करते है कि राजकिशोर हिंदी पत्रकारिता में किस खास चीज के सूचक थे ? उनके संपूर्ण व्यक्तित्व की वे कौन सी मौलिक विशेषताएं थी जो उन्हें अन्यों में एक विशिष्ट स्थान पर रखती थी ?

राजकिशोर कोलकाता में एसपी सिंह के नेतृत्व में मुख्यधारा की पत्रकारिता के बीच से उभरे थे, लेकिन जीवन के अंत तक जाते-जाते वे मुख्यधारा से तो लगभग पूरी तरह से अलग हो ही गये थे, और सोशल मीडिया के नये परिवेश में प्रवेश करने के बावजूद उसमें अपने को पूरी तरह से उतार नहीं पाए थे । अंतिम दिनों में जैसे थक कर ही अपने कुछ संपर्कों के सहयोग से वे एक छोटी सी समाचार पत्रिका का संपादन करने लगे थे । लेखक के रूप में उन्होंने कई सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर किताबें लिखी, संपादित भी की और यहां तक कि वर्धा में कुछ दिन रह कर अपनी बुद्धिवादी, कॉमनसेंस पर आधारित तर्कवादी यशपाल की शैली की तर्ज पर एक तथाकथित उपन्यास ‘सुनंदा की डायरी’ भी लिख डाला जिसमें धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, परिवार, राज्य, से लेकर स्त्री, जाति, दलित नक्सलवाद, सेक्स, साहित्य आदि तमाम विषयों पर वे अपने नजरिये को लगभग निष्कर्षवादी शैली में निर्द्वंद्व भाव से रखते चले गये । कहने का तात्पर्य यह है कि कोरी पत्रकारिता के वृत्त के बाहर एक लेखक-विचारक और कुछ हद तक एक्टिविस्ट बनने की मरीचिका में, सामान्य ज्ञान के दायरे से ही कुछ विशेष कह जाने के मोह में वे जीवन भर फंसे रहे ।

हमारे सामने सवाल है कि कैसे आप एक मुख्यधारा के पत्रकार के ऐसे, स्वतंत्र विचारक व्यक्तित्व की मरीचिका के पीछे भागने की परिघटना की व्याख्या करेंगे ? पत्रकारिता के सीधे-सपाटपन में किसी भी विषय के उस अन्तरप्रवाह में जाने का कोई आग्रह नहीं होता जिसमें विचारक किसी वस्तु सत्य के बजाय वस्तु रूप लेने के लिये प्रतीक्षारत लक्षणों के रहस्य में भटका करते हैं । जो अब तक सामने नहीं आया है, उसे यथार्थ की दरारों से जाहिर होने वाले लक्षणों से समझने की कोशिश किया करते हैं ।

हम राजकिशोर जी से व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं जुड़े जैसा महेश जी, शंभुनाथ जी जुड़े रहे, लेकिन उनकी गतिविधियों से, उनके खास प्रकार के समाजवादी नैतिकतावादी लेखन और परवर्ती दिनों में एक गांधीवादी एक्टिविस्ट बनने की कामनाओं और गतिविधियों पर नजर जरूर रखते थे । उनकी लेखनी की सफाई और तर्कों की पारदर्शिता खास तौर पर आकर्षित करती थी । लेकिन कई ऐसे मौके आए जब हमने लिख कर उनकी दृष्टि की सीमाओं पर सवाल भी उठाए थे ।

जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, उनके लेखकीय जीवन का प्रारंभ मुख्यधारा की पत्रकारिता से हुआ था । अर्थात वे अपने समय के एक प्रमुख मीडिया व्यक्ति थे । और मीडिया, जिसे जनतंत्र के चौथे स्तंभ की फैंटेसी के पर्दे के पीछे छिपा कर रखा जाता है, उसका सत्य कुछ इतना रहस्यमय है कि उसे मंच की रोशनी में लाने की कोई भी कोशिश सिर्फ किसी कॉमेडी का, कोरे प्रहसन का ही रूप ले सकती है । ऐसे मीडिया की अपनी नैतिकता पर किसी भी प्रकार के अटूट भरोसे की कैसी कारुणिक परिणतियां होती है, इसे मीडिया जगत के तमाम दिग्गजों की सच्चाई से जाना जा सकता है । आज सभी अखबारों और तमाम प्रकार के मीडिया में संपादक और मैनेजिंग डायरेक्टर के पदों का विलय इसी करुण सचाई का प्रकृत रूप है । अगर आपको इस यथार्थ को देखना है तो वह आपको उस फैंटेसी से, मीडिया की नैतिकता के सपने से निकल कर ही दिखाई दे सकता है । इस सपने से जाग कर ही हमारा उपस्थित यथार्थ की वास्तविकता से सामना हो सकता है ।

मीडिया जनतंत्र का चौथा स्तंभ है — यह बात शुद्ध रूप में एक क्लीषे है, कोरा पिष्टपेषण और किसी भी क्लिषे में फंसे रहना किसी भी विमर्श को निष्प्रयोजन बनाने के लिये काफी होता है । सच यही है कि मीडिया राजसत्ता का हिस्सा है । राजसत्ता के चरित्र की संगति में उसका चरित्र भी बदलता है । आज का मीडिया इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है । मीडिया का प्रयोग किसी को स्वतंत्र बनाने के लिये नहीं, उसे नाना बंधनों से बांधने के लिये होता है । मीडिया के जगत में जब कोई खुद स्वतंत्र रहना चाहता है, उसके जाति-च्युत कर दिये जाने का खतरा हमेशा बना रहता है । और कहने की बात नहीं है, जात-बाहर कर दिये जाने के बोध के जन्म से ही आदमी के सामने हमेशा एक नई चुनौती का वह क्षण पैदा होता है, जिसे स्वीकार कर आदमी खुद की स्वीकृति के एक नये बिंदु पर खड़े होने की कोशिश में लग जाता है, अथवा उस चुनौती से मुंह मोड़ कर वह एक मशीन का पुर्जा, वेतन का गुलाम बन कर जीता है ।

अभिनवगुप्त का एक प्रसिद्ध कथन है कि जो साधक जिस भुवन आदि की स्वरूपता के प्रति निष्ठा रखता है वह उसी रूप में सिद्धि प्राप्त करता है । पर जिसे शिवमय होना कहते हैं, जो विश्वमय और विश्वोत्तीर्ण, स्वातंत्र्य शक्ति से युक्त है, वह अलग है ।*     
 
बहरहाल, राजकिशोर के संदर्भ में, खास तौर पर हमें याद आती है वर्धा के अनुभवों पर उनके ब्लाग की एक टिप्पणी जिसमें वे लिखते हैं — “किसी पुस्तकालय में जाकर मैं अभिभूत हो जाता हूं । समझ में नहीं आता इस टुच्ची दुनिया में इतनी सुंदर चीज कैसे टिकी हुई है ।”
हमने उनकी इसी ‘टुच्ची दुनिया’ का सूत्र पकड़ कर तब अपने ब्लाग ‘चतुर्दिक’ में एक पोस्ट लगाई थी — स्वप्न और यथार्थ ।
राजकिशोर के कथन पर हमारी पहली पंक्ति थी — ‘टुच्ची दुनिया’ के बीच ‘इतनी सुंदर चीज’, अर्थात् हमारे सपनों की दुनिया !
और, हमने सपनों के बारे में औपनिषदकार शंकर की सपनों, स्वप्नानुभवों, स्वप्नों के मिथ्यात्व से लेकर समस्त जगत के मिथ्यात्व की तत्वमीमांसा और झूठ की ताकत के संदर्भ में अंबर्तो इको की इस बात का उल्लेख किया कि ‘इतिहास मुख्यत: भ्रमों का रंगमंच है । मार्क्स के ‘माल की अंधभक्ति’ (COMMODITY FETISHISM) से होते हुए तकनीक की स्वायत्तता के राज्य ‘टैक्नोपौली’ की चर्चा की ओर बढ़ गये जिसमें सामाजिक संस्थाओं और राष्ट्रीय जीवन के बजाय तकनीक का प्रभुत्व हुआ करता है — स्वायत्त, स्वयंसिद्ध, स्वयंसाध्य और सर्वव्याप्त तकनीक का प्रभुत्व । एक ऐसा काल जब आदमी की एक-एक हरकत, होठों की हर जुम्बिस, आंखों की हर झपकी, और सर्वोपरि दिमाग में उभरने वाली हर छवि का हिसाब रखने वाला एक विशालकाय उद्योग वाणिज्य के हित में आदमी को पूरी तरह से निचोड़ कर उसका पूरा सत निकाल लेने में लगा हुआ है । एक ऐसा समय, जब आपको लाखों प्रकार के ऐसे परस्पर गुंथे हुए एप्स से बांध दिया जा रहा है जब आपकी कोई भी गतिविधि सिर्फ आपके लाभार्थ नहीं रहेगी, वह इस विशाल टैक्नोपौली के महाकाय उद्योग के मुनाफे में निश्चित तौर पर योगदान करेगी ।

यह है आज के जीवन के सभी क्षेत्रों का वह एक सामान्य सत्य जिसके संदर्भ में हम यहां पुस्तकालय को देख कर विभोर हो उठने वाले राजकिशोर का स्मरण करते हुए अभी के मीडिया को, पत्रकारिता को पहचानना चाहते हैं । फेसबुक का मार्क जुकरबर्ग कहता है कि वह लोगों को ऐसी शक्ति प्रदान करना चाहता है जिससे वे अपनी इच्छानुसार जिसे चाहे और जो चाहे उसके साथ जुड़ सकते हैं । स्थिति यह है कि आज हर आदमी की पसंद को चिन्हित करके उसका अपना इंटरनेट का संसार बना दिया जा रहा है । हर एक की पसंदीदा चीजों की अपनी दुकानें तैयार कर दी जा रही है । लेकिन, कुल मिला कर हर किसी को शक्ति प्रदान करने के इस उपक्रम में उसे किसी एक विश्वकेंद्र से बांध दिया जा रहा है ।
निराला जी की पंक्तियां हैं —
विश्व सीमाहीन;
बांधती जाती मुझे कर-कर
व्यथा से दीन
...
कह रही हो हँस – पियो, प्रिय
पियो, प्रिय निरुपाय !
मुक्ति हूं मैं, मृत्यु में
आई हुई , न डरो ।

एक ऐसे समय में , राजकिशोर के बारे में हमारी टिप्पणी थी कि “आप पर लद कर न बोलने वाली पुस्तकों के पुस्तकालयों का निःशब्द निजी संसार अविश्वसनीय सुख और सुकून की जगह जान पड़े तो यह राजकिशोर या किसी भी पुस्तक प्रेमी की आत्म-केंद्रिकता या पलायनवाद नहीं, किसी भी बहाने व्यापार के चंगुल में न पड़ने का सत्याग्रह है । एक टुच्ची दुनिया में सुंदरता की तलाश, ‘सक्रिय पूंजीविहीनों’ की विजय का राग है ।”

हमें लगता है, आज का समय और उसमें राजकिशोर के क्रमशः खुद को अलग-थलग करते चले जाने के जीवन के लंबे सफर को अगर आप देखें, तो उपरोक्त बातों के ढांचे में सब चीजों को अच्छी तरह से पहचाना जा सकता हैं । यह आग्रह, अपनी स्वतंत्रता का अदम्य आग्रह ही है, जो अपने विकास के क्रम में उस परम स्थिति तक चला जाता है जहां व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द की दुनिया के अस्तित्व से ही इंकार करने लगता है, मौन के एक निःशब्द संसार में सिमट जाता है । यही आदमी की विक्षिप्तता भी कहलाती है जिसमें हम दुनिया के अनेक बुद्धिजीवियों, लेखकों को जीवन के एक काल में फंसा हुआ देखते हैं । पागल आदमी ही दुनिया के सारे बंधनों को अस्वीकारने के साहस का परम प्रतीक होता है, कह सकते हैं, नाउम्मीदी के साहस की एक विरूपित तस्वीर ।

लेकिन यही वह साहस होता है जो किसी भी नये विमर्श के मूल में होता है । यथार्थ से मुठभेड़ का क्षण । जैसा कि कहते हैं, फ्रायड के यहां वासना (desire) की समस्या कोई मनोवैज्ञानिक विषय नहीं थी, वह सुकरात की असमाधित कामना की तरह थी । सुकरात के लिये प्रश्न करना स्वयं में एक स्वतंत्र सत्य था, यह किसी का निजी सवाल नहीं था । ज्ञान की मान्य बातों को चुनौती देने वाली विद्रोही आलोचना का सुकरात हमेशा स्वागत करते थे । नाउम्मीदी का साहस ही जब प्रश्न उठाने के स्वतंत्र सत्य के रूप में सामने आता है, वह विचार की द्वांद्विक प्रक्रिया से जिंदगी की चुनौतियों के नये पथ का संधान देता है, आधुनिक विश्व में जिसके प्रतीक पुरुष हैं — कार्ल मार्क्स ।

अभिनवगुप्त के शब्दों में, अपने अंदर अपने द्वारा अपना क्षेप ही विसर्ग है । (स्वत्मनः स्वात्मनि स्वात्मक्षेपो वैसर्गिकी स्थितिः) । स्वयं को स्वयं में पाना ही सृजन है, अर्थात् अन्तर-बाह्य दबावों से मुक्त एक स्वतंत्र गति को हासिल करना ही रचना कर्म है ।

आज का भारतीय मीडिया तो व्यवसाय जगत के गुलामों का सबसे भौंडा रूप है । उसे जब एक नेता प्रेस्टीट्यूट कहता है, तो उसका आशय कुछ भी क्यों न हो, वह इस मीडिया की वास्तविकता को ही जाहिर कर रहा है । अभी तो यह मीडिया फासिस्ट शासक दल के भाड़े के गुंडों की भूमिका अदा कर रहा है । प्रश्न उठाना तो बहुत दूर की बात, मीडिया का मूल धर्म मानी जाने वाली तथ्यमूलक रिपोर्टिंग की बात तक को वह भूल चुका है । खास तौर पर हिंदी का मीडिया तो एक लिंचर्स मीडिया की भूमिका में हैं । सिर्फ एक समुदाय को नहीं, भारत के वैविध्यपूर्ण सत्य को भी वह आरएसएस के हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के एकात्मवादी तत्व की कालिख से पोतने में लगा हुआ है । हिटलर के विश्व विजय के सहयोगी की तरह ।

ऐसे समय में राजकिशोर की पत्रकारिता, उनका पूरा व्यक्तित्व मीडिया के वर्तमान परिदृश्य का सचमुच एक विलोम प्रस्तुत करता है । राजकिशोर ने बिल्कुल सही इस काल के संकेतों को पहचान कर अपने को एक छोटी सी पत्रिका के संपादन तक सीमित कर लिया था । लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि यहां तक आते-आते वे शायद अपनी उर्जा कहीं खो चुके थे, कहा जाए, थक से गए थे । इसीलिये वे अपनी पत्रिका को किसी नए गंभीर राजनीतिक विमर्श का मंच नहीं बना सके थे, बल्कि ऐसी पत्रिकाओं के कामचलाऊ प्रकार के मिश्रित ढांचे में ही अटक गए थे । उसे उनके पत्रकार जीवन का आखिरी, एक बुझ गये दीपक की बाती से निकल रहे घुएं का दौर कहा जा सकता है ।

बहरहाल, हमारी नजर में, राजकिशोर की स्वतंत्र लेखन की कामना का पहलू ही वह पहलू है जो किसी भी लेखक और पत्रकार के सार्थक कर्म का एक जरूरी आधार होता है । आज के समय की मुख्यधारा के मीडिया में भले इसकी कोई खास गुंजाइश न हो, लेकिन सोशल मीडिया ने वे अवसर पैदा किये हैं जहां से कोई भी अपने समय में अपनी लेखनी से हस्तक्षेप कर सकता है । राजकिशोर की सच्ची विमर्शकारी विरासत के लिये सोशल मीडिया की जमीन अब भारत में भी तैयार हो चुकी है ।

राजकिशोर का स्मरण करते हुए अंत में फिर एक बार मैं अभिनवगुप्त के कथन को दोहराते हुए अपनी बात खत्म करूंगा कि “स्वतंत्र आत्मा के अतिरिक्त मोक्ष नामक कोई तुच्छ या अतुच्छ पदार्थ नहीं है । मोक्ष कोई दूसरी वस्तु नहीं है । वह स्वरूप का विस्तार मात्र है । और स्वातंत्र्य ही विमर्श कहलाता है, वह इसका मुख्य स्वभाव है । विमर्श को छोड़ कर प्रकाश न संभव है न सिद्ध होता है ।”
 

*
“यो यदात्मकतानिष्ठस्तद्भावं स प्रपद्यते ।
व्योमादिशब्दविज्ञानात् परो मोक्षो न संशयः ।।

एक एवास्य धर्मोऽसौ सर्वाक्षेपेण वर्तते ।।
तेन स्वतन्त्र्यशक्त्यैव युक्त इत्याञ्जसो विधिः ।





बुधवार, 1 जनवरी 2020

सत्ता विमर्श की एक प्रस्तावना है नंदकिशोर आचार्य का नाटक ‘बापू’

(बापू को श्रद्धार्घ्य से शुरू हुआ यह नया साल क्या आगे के नये संघर्ष की दस्तक है !)

—अरुण माहेश्वरी




नटरंग पत्रिका के मार्च 2006 के अंक में प्रकाशित नंदकिशोर आचार्य जी के ‘बापू’ नाटक को पढ़ कर कोई यदि उस पर आरएसएस की सांप्रदायिक और कपटपूर्ण विचारधारा की लेश मात्र छाया भी देखता है तो वह सचमुच तरस खाने के योग्य ही कहलायेगा । ऐसी विमर्श-विरोधी जड़ता, जो सामान्यत: धार्मिक कट्टरता के अंधेरे कुएं से पैदा हुआ करती है, विचारवान बौद्धिकों में कैसे घर कर लिया करती है, उन्हें शुद्ध फतवेबाजों के स्तर पर उतार देती है, यह सचमुच अलग से विचार का एक बड़ा विषय है । विचारधारा द्वंद्वात्मक विकास की अपनी गति को गंवा कर चेतना के कैसे संकीर्ण और सख्त ढांचों को तैयार करती है, यह उसी का एक उदाहरण है ।

बहरहाल, आचार्य जी के इस नाटक पर चर्चा को हम इसीलिये इस प्रकार की कोरी फतवेबाजी की चुनौती के दायरे से अलग रख कर अपने विचार का विषय बनाना उचित समझते हैं क्योंकि विचार-विश्लेषण के लिये अपनाए जाने वाले लक्ष्य भी विश्लेषण को प्रभावित करते हैं, विषय के प्रति न्याय में बाधा तैयार करते हैं ।

‘बापू’ नाटक गांधी जी के अंतिम दिनों के अन्तरद्वंद्वों की एक कल्पना पर रचा गया ऐसा नाटक है जो किसी भी विचारधारात्मक आदर्श के क्रियान्वयन में उसके ठोस सामाजिक रूपों की सीमाओं से पैदा होने वाली चुनौतियों की अनिवार्यता की पृष्ठभूमि में गांधी जी की मनोदशा का एक चित्र खींचता है । जैसे किसी वृहत्तर आदर्श के किसी सीमित ठोस स्वरूप की अपनी विडंबनाएं होती है, वहीं इस विडंबना की किसी भी कथा की भी अपनी विडंबनाएं हुआ करती है, क्योंकि वह भी हर स्थिति में जीवन के यथार्थ के विशाल फैलाव से काट कर निकाले गये एक अत्यंत छुद्र अंश को ही लेकर चलती है । इस अंश की बायोप्सी से रोग और उसके फैलाव को पकड़ने का पहलू लेखक की अपनी दृष्टि की सामर्थ्य पर ही निर्भर करता है ।

इस नाटक के पूरे ढांचे में गांधी अपने ही कांग्रेस-परिवार में कटे हुए होने की अनुभूति के साथ स्वयं से, अर्थात् अपने खुद के आदर्श अहम् से संवाद करते हुए क्रमशः परिवार के उन अन्य सदस्यों के अवस्थान को टटोल रहे हैं ,जो सभी उनकी अपनी अपेक्षाओं के बिंदु हैं, अर्थात् ऐसे बिंदु है जहां से वे अपने अहम् के सच को टटोलते रहे हैं । आजादी और देश के बटवारे के वक्त गांधी में एक पीड़ा का बोध है जिसे वे संभव है कि अपने परिजनों के दिये हुए घावों की पीड़ा की तरह ही देखते है, लेकिन दुश्मनों के वार की तरह कत्त्ई नहीं । वे उनके बिछाए कील-कांटों से जख्मी है, लेकिन पीठ पर मारे गये छुरे से नहीं !

गांधी जी का आत्म-संघर्ष और आत्म-संताप भी इसमें साफ है जब वे कहते हैं — “कोई गंभीर पाप रह गया होगा मेरी आत्मा में — उसी से बह रहा होगा ये खून ।” यह कमोबेस एक प्रकार की ऐसी बदहवासी की दशा भी हो सकती है जिसमें आदमी की नजरों से एक बार के लिये दुनिया लुप्त हो जाती है, पूरा घटना-विकास गायब हो जाता है और वह अपने तथा अन्यों के बीच के भेद पर बिल्कुल कुछ बुनियादी प्रकार के सवाल खड़े करने लगता है । जिन भेद के प्रति आदमी अपने दैनन्दिन संबंधों में पूरी तरह से बेफिक्र रहता है, वे ही तब बड़े हो कर दिखाई देने लगते हैं । दरअसल इसे ही कला कृतियों का सत्य कहा जाता हैं — अनुभूतियों के कुछ खास तीव्र क्षणों में व्यक्त हुआ सत्य ।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि गांधी जी ने भारत की स्वतंत्रता के जश्न में भाग नहीं लिया था । वे देश में जगह-जगह लगे हुए दंगों की आग को बुझाने में लगे हुए थे । लेकिन आज तक शायद ही किसी ने यह कहा होगा कि भारत की स्वतंत्रता गांधी जी की कामना नहीं थी । जब वे स्वतंत्रता के जश्न में शामिल होने से इंकार करते हैं तो कोई इतिहास के तथ्यों की समग्रता से इंकार करते हुए कह ही सकता है कि इस स्वतंत्रता से उनका कोई सरोकार नहीं था ! लेकिन यह भी एक तथ्य है कि आजादी के बाद ही गांधी जी अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये एक दूसरा ही, हिंदू-मुस्लिम एकता के जरिये भारत और पाकिस्तान में मेल बैठाने का सपना देखने लगते हैं ।

दरअसल, सपने किस व्यक्ति की कामनाओं की पूर्ति करते हैं, सिगमंड फ्रायड ने इसका एक बहुत सटीक उत्तर दिया था कि सबसे पहले तो उसकी जिसकी कुछ कामनाएँ हुआ करती है, लेकिन वह अपनी कुछ कामनाओं से इंकार करता हुआ ऐसा व्यवहार किया करता है जैसे वह एक नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग-अलग व्यक्ति हो । ऐसे विभाजित व्यक्तित्व का एक रूप नहीं होता, वह अलग-अलग समय में अलग-अलग होता है । उनके हर व्यवहार में संगति हो, जरूरी नहीं होता । गांधी जी भी इसे समझते थे, वे अपने को कभी-कभी डिक्टेटर कहने के बावजूद मूलतः सामूहिक विचार-विमर्श के बीच जीने वाले व्यक्ति थे । इसीलिये कभी अपने को अन्यों पर आरोपित करते थे तो अक्सर अन्य की बातों को भी समान तरजीह दिया करते थे । कांग्रेस के नेतृत्व के साथ उनके व्यवहार में यह बार-बार प्रकट हुआ है । आजादी की लड़ाई की उनकी ‘संघर्ष, समझौता और फिर संघर्ष’ की पूरी कार्यपद्धति भी उनके व्यक्तित्व के इसी पहलू को प्रतिबिंबित करती है ।

कहना न होगा, व्यक्तित्व का ऐसा विभाजन ही अक्सर व्यक्ति के आत्मसंघर्ष का कारण भी बनता है । गांधी जी अपने जीवन को ही अपना संदेश कहते हैं । हिंसा, झूठ और नाना प्रकार के छद्म की प्रवृत्तियों से भरी दुनिया में वे अहिंसा और सत्याग्रह की प्रतिमूर्ति बनना चाहते थे । यह एक अपने प्रकार का जुनून भी था । ऐसे जुनून के साथ जीने वाले व्यक्ति के सामने प्रति पल यह सवाल पैदा होना कि वह जीवित है या मर चुका है, सबसे स्वाभाविक सवाल है । यही जुनूनी विक्षिप्तता का भी कारण बनता है जब वह अपने ही रचे संसार की सबसे प्रिय चीजों से भी पूरी तरह विरत रह कर अपने आदर्श के मूर्त होने की प्रतीक्षा में जीवन बिता देता है । कई खास मौकों पर वह निश्चेष्ट हो कर अन्य से अपने अभिष्ट काम को करने की अपेक्षाएं भी करता है ।

नंदकिशोर जी के नाटक में बार-बार गांधी स्थितप्रज्ञ होने की अपनी कामना को जाहिर करते है । और बार-बार पुनः अपनी अलग भूमिका के लिये मैदान में भी उतर पड़ते हैं ।

जैसा कि हमने शुरू में ही लक्ष्य किया है, इस पूरे नाटक में गांधी अकेले स्वयं से, अर्थात् अपने अहम् से बात कर रहे हैं । उन्होंने अपने खुद के लिये जीवन के जिन लक्ष्यों को तय किया उनकी सफलता-विफलता पर स्वयं से विमर्श कर रहे हैं । और इसी क्रम में उन बिंदुओं तक पहुंचते हैं जो उनकी अपेक्षाओँ के बिंदु है, उनके आंदोलन के तमाम सहयोगी है । वे उनकी नजरों में अपनी कल्पित छवि के आधार पर उन्हें समझने की भी कोशिश कर रहे हैं ।

इसीलिये इसमें नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, राजेन्द्र प्रसाद आदि सब  गांधी से अलग नहीं, बल्कि उनके अपने अहम् के संघटक तत्वों की तरह ही आते हैं, जैसा कि वे वास्तविकता में भी थे । इतिहास के कुछ खास क्षणों, जैसे कैबिनेट मिशन के बारे में इन सबकी समझ का इस नाटक में कोई ऐतिहासिक मूल्यांकन नहीं किया गया है ; अर्थात् वह नाटक का विषय नहीं है । इसमें इसके सभी पक्षों के ठोस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की जांच नहीं की गई है । बल्कि यह सब तत्कालीन भारतीय राजनीति के रंगमंच पर खेले जा रहे नाटक का एक ऐसा सत्य है, जो इसके सभी चरित्रों की जद के बाहर होता है । उस सच का एक मूर्त रूप है माउंटबेटन । गांधी अफसोस करते हैं कि सब उस माउंटबेटन की बात को मान ले रहे हैं ! लेकिन वह माउंटबेटन ही तो उस नाटक के चरित्रों का बाहरी सत्य है, ब्रिटिश राज का सच है, जिसके अधिकार की जमीन पर वह पूरा संघर्ष किया जा रहा है । गांधी अफसोस करते हैं, लेकिन वे जानते हैं सब उनके परमात्मा का खेल हैं । “मनुष्य योजनाएं बनाता है लेकिन उसकी योजनाओं की सफलता उस पर नहीं, बल्कि हम सबके भाग्य के सर्वोपरि निर्णायक ईश्वर पर निर्भर होती है ।”

इस नाटक में अपने ही लोगों के दिये गये घावों के संदर्भ में इतिहास के तथ्य के रूप में खास तौर पर कैबिनेट मिशन और उसके बारे में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्यों के फैसले की चर्चा की गई है जिसके बारे में बताया गया है कि गांधी जी उनसे जरा भी सहमत नहीं थे । यद्यपि इस बात में कितना तथ्य है और कितना नहीं, यह इस नाटक का विषय नहीं है । फिर भी यह एक सवाल रह जाता है कि कैबिनेट मिशन के बारे में ही गांधी के साथ कांग्रेस के बाकी नेतृत्व का ऐसा कैसा मतभेद था जिसने गांधी जी को इस हद तक ‘मर्माहत’ कर दिया था !

डी जी तेंदुलकर की किताब ‘Mahatma : The life of Mohandas Karamchand Gandhi’ के सातवें खंड में इस पर पूरे विस्तार से चर्चा है । 6-7 जुलाई 1946 के दिन इस विषय पर निर्णय के लिये मुंबई की भंगी कॉलोनी में कांग्रेस वर्किंग की बैठक के बाद एआईसीसी की बैठक हुई थी । तेंदुलकर लिखते हैं —
“कार्रवाई को शुरू करते हुए मौलाना आजाद ने पिछले छः सालों में, जब वे कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, देश के घटना-चक्र की एक समीक्षा पेश की । उनकी राय में भारत के इतिहास में ये छः साल अत्यंत महत्वपूर्ण थे और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर तथा भारत के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में हुए दूरगामी परिवर्तनों की ओर उन्होंने संकेत किया । देश आजादी के मुहाने पर था । इस लक्ष्य को पाने के लिये अब सिर्फ एक और कदम बाकी रह गया था ।

“नेहरू ने अध्यक्ष पद ग्रहण करते हुए कहा कि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रस्तावित संविधान सभा की योग्यता, अयोग्यता के आधार पर किसी प्रस्ताव को स्वीकारा या अस्वीकारा जाए । वह एक महत्वपूर्ण सवाल है, देश की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ सवाल । ...
आजाद ने इसके बाद ही वर्किंग कमेटी का 26 जून का प्रस्ताव पेश किया । ...समाजवादियों ने प्रस्ताव का विरोध किया और गांधी जी की प्रार्थना सभाओं के भाषणों को उद्धृत किया । इस प्रस्ताव के पक्ष में 7 जुलाई को एआईसीसी को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा था —


“मैंने अक्सर कहा है कि मनुष्य योजनाएं बनाता है लेकिन उसकी योजनाओं की सफलता उस पर नहीं, बल्कि हम सबके भाग्य के सर्वोपरि निर्णायक ईश्वर पर निर्भर होती है । आपकी तरह मैं यहां अधिकारपूर्वक नहीं आया हूं, बल्कि इसलिए आया हूं कि मुझे बर्दाश्त किया जाता है । मुझे बताया गया है कि कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के बारे में मेरी पहले की कुछ उक्तियों से जन-मानस में बहुत उलझन पैदा हो गई है । सत्याग्रही के नाते मैं हमेशा इस बात के लिए प्रयत्नशील रहता हूं कि सम्पूर्ण सत्य और केवल सत्य ही बोलूँ । मैं आपसे कुछ छिपाना नहीं चाहता । मानसिक दुराव से मुझे चिढ़ है । लेकिन भाषा अधिक से अधिक अभिव्यक्ति का एक अपूर्ण माध्यम ही है । कोई भी व्यक्ति अपनी भावना या विचार को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता । प्राचीन काल के ऋषियों और पैगंबरों को भी इस कठिनाई का सामना करना पड़ा था ।

“कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के विषय में मैंने जो कहा माना जाता है उसके सम्बन्ध में अखबारों में क्या प्रकाशित हुआ है यह मैंने नहीं देखा है । मैं सभी अखबार खुद नहीं पढ़ सकता । मेरे सहयोगी और सहायक जो कुछ मेरे सामने रख देते हैं उसी पर निगाह डाल कर मैं संतोष मान लेता हूँ । मैं मानता हूँ कि ऐसा करने से मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ है । अखबारों में जो कुछ प्रकाशित हुआ है उससे कुछ ऐसा भ्रम पैदा हो गया लगता है कि मैंने दिल्ली में एक बात कही और अब कुछ और कह रहा हूँ । दिल्ली के अपने एक भाषण में कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के बारे में मैंने यह अवश्य कहा था कि जहां पहले मुझे प्रकाश दिखाई देता था, वहां अब अंधकार दिखाई देता है । अब भी वह अंधकार छँटा नहीं है । शायद और भी घनीभूत हो गया है । अगर मुझे अपना रास्ता साफ दिखाई देता तो मैं कार्यसमिति से संविधान-सभा-विषयक प्रस्तावों को अस्वीकार करने को कह सकता था । कार्य-समिति के सदस्यों के साथ मेरे संबंधों को आप जानते हैं । बाबू राजेन्द्र प्रसाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बन सकते थे, लेकिन उसके बजाय उन्होंने चम्पारन में मेरा दुभाषिया और मुन्शी बनना पसन्द किया । फिर है सरदार ! उन्हें मेरी जी-हजूरी करने वाला कहा जाता है । उन्हें यह बुरा नहीं लगता । बल्कि वे इसे एक प्रशस्ति मान कर उछालते फिरते हैं । वे संघर्ष के अग्रदूत है । कभी वे पाश्चात्य ढंग की पोशाक पहनते थे और उसी ढंग से खाते-पीते थे । जबसे उन्होंने मुझसे नाता जोड़ा है, मेरा कहा उनके लिए ब्रह्मवाक्य बन गया है । लेकिन इस मामले में वे मुझसे सहमत नहीं है । उनका कहना है कि पहले मौकों पर जब आपकी सहज बुद्धि कुछ बात कहती थी तो आप उसका दलील से समर्थन करके हमारे दिल और दिमाग दोनों को संतुष्ट कर दिया करते थे, लेकिन इस बार आप ऐसा नहीं कर पा रहे हैं । उत्तर में मैंने उनसे कहा कि मेरा हृदय तो आशंकाओं से भरा हुआ है, लेकिन उसके लिए मैं कोई कारण नहीं ढूँढ पा रहा, अन्यथा मैं आपसे इन प्रस्तावों को बिल्कुल ठुकरा देने को ही कहता ।... लम्बे विचार-विमर्श के बाद वे लगभग सर्वसम्मत निर्णय पर पहुँचे हैं वह आपके सामने है । कार्य-समिति के सदस्य आपके विश्वस्त और परखे हुए सेवक हैं । ...आप सब तपे-परखे और पुराने योद्धा है । सिपाही खतरे से नहीं डरता । वह तो खतरे को देख कर उमंग से भर जाता है । अगर प्रस्तावित संविधान-सभा में दोष है तो उन्हें दूर करना आपका काम है । वह आपके लिए संघर्ष की चुनौती होनी चाहिए, अस्वीकार करने का कारण नहीं । मुझे इस बात से आश्चर्य है कि कल श्री जयप्रकाश नारायण ने कहा कि प्रस्तावित संविधान-सभा में शरीक होना खतरनाक है और इसलिए आपको कार्यसमिति का प्रस्ताव अस्वीकार कर देना चाहिए । जयप्रकाश नारायण जैसे तपे-परखे योद्धा से ऐसी निराशापूर्ण भाषा सुनने की आशा मैंने नहीं की थी । स्वर्गीय चौधरी रामभज दत्त के लिखे एक गीत की पंक्ति ने मुझे हमेशा बहुत प्रभावित किया है : “चाहे जन भले ही जाये, हार कभी ना मानेंगे” । मैं जाहता हूं कि आप इसी उत्साह से इस प्रस्ताव पर विचार करें । सत्याग्रही कभी हारता नहीं है । और न मैं सत्याग्रही से यह कहने की आशा करूँगा कि अंग्रेज जो कुछ करते है वह बुरा ही होती है । अंग्रेज जरूरतन बुरे नहीं है । अन्य किसी जाति की तरह अंग्रेजों के बीच भी अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोग हैं ।”(पृष्ठ — 145-146)

कैबिनेट मिशन और उस पर गांधी जी के मन-मस्तिष्क की ऊहापोह और कांग्रेस की कार्य-समिति के प्रति उनके विश्वास को बताने वाले इतने बड़े उद्धरण को यहां देने का उद्देश्य अलग से बताने की जरूरत नहीं है । गांधी जी के मन में सवाल थे, लेकिन अपने ही लोगों ने उन्हें जख्म दिये, मौलाना आजाद ने सच को छिपाया आदि की तरह के खुद के ठगे जाने का भाव, लेखक की कल्पना की पैदाईश हो सकते हैं, तथ्य इसकी ओर कोई साफ संकेत नहीं देते । गांधी जी ने अपने इस भाषण में भाषा की सीमा के बारे में बहुत सही संकेत दिया था । किसी भी लेखक के लिये यह जरूरी होता है कि वह चरित्र को उसकी भाषा की सीमा के परे जाकर पेश करें । और जाहिर हैं कि ऐसा करते हुए ही लेखक के अपने सोच का परिप्रेक्ष्य सहज ही चरित्र के चित्रण में भी प्रवेश कर जाता है । विश्लेषण विश्लेषक के सोच से अलग नहीं हो पाता है ।

बहरहाल, आचार्य जी के इस नाटक को पढ़ कर हमें अनायास ही आज के समय के प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रांसीसी दार्शनिक ऐलेन बदउ के नाटक L’Incident d’Antioche (एंटियोक की घटना) की याद आती है । अपने ब्लाग की टिप्पणियों के संकलन के पहले खंड की भूमिका, ‘विमर्श ही नाउम्मीदी का साहस, भैरव भाव है’ में हमने उस नाटक पर काफी विस्तार से चर्चा की थी और उसी प्रसंग में वहां गांधी जी के अंतिम दिनों के आत्म-संघर्ष का पहलू भी आ गया था ।

बाद्यू के उस नाटक की पृष्ठभूमि में ईसाई मिशन में लगे सेंट पॉल्स और पीटर के बीच एंटियोक में बाइबल की सार्वलौकिकता के विषय पर हुआ संघर्ष है । नाटक का मूल विषय यह है कि क्या किसी भी क्रांतिकारी को परंपरागत रूढ़ियों का पालन करते रहना चाहिए ? मसलन्, देवदूत पीटर को क्या पुराने यहूदी रीति-रिवाजों का पालन जारी रखना चाहिए ;  मसलन्, आज क्रांति-विमुख लोगों को बाजार अर्थ-व्यवस्था और संसदीय जनतंत्र की निर्विकल्पता से ही चिपके रहना चाहिए ? अथवा ईसाइयों ने यहूदी-विद्वेष का जो रास्ता अपनाया, या पौल पौट के खमेर रूज ने पुराने काल के समर्थकों के सफाये की जो नीति अपनाई, उस लाइन को अपनाया जाना चाहिए ? इस नाटक के एक अंश में क्रांति का नेता कमिउ क्रांति हो जाने के बाद कहता है — मेरा काम पूरा हो गया, अब चलता हूं ।

उसका साथी डेविड उससे कहता है कि आज जब काम करने का समय आया है, तभी तुम मूंह फेर रहे हो । तो कमिउ कहता है — “विजय के बाद जो बचता है वह है पराजय ।... फौरन पराजय नहीं, जो भी वर्तमान के साथ निबाह करके चलेगा उसकी धीरे-धीरे निश्चित पराजय ।...उस प्रकार की पराजय की शान को मैं तुम्हारे लिये छोड़ता हूं, किसी अहंकारवश या धीरज की कमी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिये क्योंकि मैं उसके लिये उपयुक्त नहीं हूं ।”

बाद्यू इसकी व्याख्या करते हुए एक जगह लिखते हैं कि उसने इसलिये नई सत्ता का त्याग किया क्योंकि कुछ लोग सिर्फ विध्वंस से प्यार करते हैं और चूंकि वह देख रहा है कि अब एक नये राज्य के पुनर्निर्माण का काम होगा, उस पुनर्निर्माण में उसे एक प्रकार के दोहराव की ऊब दिखाई देने लगती है, इसीलिये उसकी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती है । (Alain Badiou, The Communist Hypothesis, Verso, 2015, page – 15-17)

क्रांति का नेता कमिउ तैयार नहीं था पुनर्निर्माण की एक धीमी और निरंतर जारी उबाऊ प्रक्रिया के बीच से आने वाली अनिवार्य विफलता को अपनाने के लिये । लेकिन क्रांति की इस तात्त्विक सीमा के साथ ही, इस नाटक में उसकी विफलता का आगे एक और, दूसरा आख्यान  भी आता है, जब क्रांति के बाद के नये शासक डेविड की मां पौला उससे कहती है — 'तुम सत्ता छोड़ दो ।'

डेविड मां से कहता है कि 'तुम मेरी मां होकर प्रति-क्रांतिकारी काम क्यों कर रही हो', तो पौला उसे कहती है — “प्रति-क्रांति तुम हो । तुमने न्याय के सारे बोध को गंवा दिया है । तुम्हारी राजनीति कुत्सित है ।...सुनो । ...हमारी परिकल्पना, सिद्धांततः, यह नहीं थी कि हम एक अच्छी सरकार की समस्याओँ का समाधान करेंगे ।...हमने कहा था कि दुनिया एक ऐसी नीति के रास्ते पर चल सकती है जिसे बदला जा सकता है, राजनीति को ही खत्म कर देने वाली नीति । ...उस परिकल्पना के ऐतिहासिक स्वरूप को राजसत्ता ने निगल लिया है । एक मुक्तिदायी संगठन का राजसत्ता में विलय हो गया है । ...कोई भी सही नीति यह दावा नहीं कर सकती है कि वह अब तक किये जा चुके कामों की ही निरंतरता है । हमारा उद्देश्य एक बार और हमेशा के लिये उस चेतना को मुक्त कर देने का है जो न्याय, समानता को कायम करती है और राजसत्ता और दरबारों की साजिशों का हमेशा के लिये अंत करती है, और उस बची हुई जमीन का भी सफाया करती है जिससे पैदा होने वाली सत्ता की लिप्सा आदमी ऊर्जा के प्रत्येक रूप को लील लेती है ।”

...डेविड मां से कहता है — “दुनिया हमेशा के लिये बदल गई है । विश्वास करो । मेरी प्यारी मां तुम चीजों को नीचे से देख रही हो । तुम निर्णय लेने वालों में नहीं हो ।”

“पौला — यही पुरानी आजमाई हुई चाल है ।... जरूर तुम कुछ नया करोगे । तुम सूरज को भूरे रंग से रंग दोगे ।”

इसी सिलसिले में बौखला कर डेविड मां से पूछता है — कहो तो, तुम कौन हो ? ...तुम निश्चय ही हमें और शक्तिशाली बनने के लिये नहीं कह रही हो । बल्कि हमें सत्ता को त्याग देने, आने वाले लंबे काल के लिये उसे छोड़ देने के लिये कह रही हो ।
तो पौला कहती है, “मानव जाति की महानता सत्ता में नहीं है । बिना परों वाले दोपाये का खुद पर नियंत्रण हो, और वह, जो उतना संभव भी नहीं लगता,   प्रकृति के सभी नियमों, इतिहास के सभी नियमों के खिलाफ जाए और उस राह पर चले जिसमें हर व्यक्ति प्रत्येक के प्रति समान होगा । सिर्फ कानून में नहीं, भौतिक यथार्थ में भी।” (जोर हमारा)

इसपर डेविड कहता है, “ तुम इतनी पागल हो !”

पौला कहती है — “नहीं, मैं नहीं । मैं तुमसे कहूंगी सारे उन्माद को छोड़ो । तुम्हें बहुत धीर-स्थिर हो कर निर्णय करना है । जो भी व्यक्ति मरीचिका के पीछे भागता है, वह यह नहीं समझ सकता है । विजय और समग्रता के प्रति अपने आग्रह को भूल जाओ । वैविध्य के सूत्र को पकड़ कर चलो ।”

...“राजनीति का अर्थ एक राजनीतिक भविष्य दृष्टि के आधार पर इकट्ठा होना है ताकि आदमी राजसत्ता की मानसिक जकड़बंदी से मुक्त रह सके ।“ (वही, पृष्ठ – 15-22) (जोर हमारा)
(Our hypothesis was not, in theory, that we were going to resolve the problem of good government…We said that the world could stand the trajectory of a policy that could be reversed…Historical realization of that hypothesis was swallowed up by the state. A liberating organisation merged completely into the state…No correct policy can now argue that it is a continuation of the work that has already been done. Our mission is to unseal, once and for all, the consciousness that organises justice, equality, the end of states and imperial rackets, and the residual platform where the concern for power sucks in every form of energy…Ofcourse you’ii do something new. You’ii paint the surface of the sun grey…Power is not the mark of the human race’s greatness. The featherless biped must get a grip on himself and, unlikely as it seems, go against all the laws of nature and all the laws of history, and follow the path that means that anyone will be equal of everyone…For anyone who gives in to the passion for images, it is incomprehensible. Forget about the obsession with conquest and totality. Follow the thread of multiplicity…Politics means uniting around a political vision that escapes the mental hold of the state.)

बाद्यू के नाटक के इस पूरे प्रसंग का आचार्य जी के ‘बापू’ नाटक के संदर्भ में स्मरण शायद ही किसी को अप्रासंगिक लगेगा । आजादी की लड़ाई के दौर में हमेशा नेतृत्व की कमान थामे रहने वाला, खुद को डिक्टेटर तक कहने वाला नायक आजादी के ठीक बाद अपने को अकेला और नई राजसत्ता के खेलों में पूरी तरह से अनुपयुक्त पाता है, उनसे विरत हो जाता है । वह अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने आया था, उसे तोड़ दिया । अब आजाद भारत का नया राज्य बनेगा, नई जंजीरें तैयार होगी ।

सवाल है कि बापू उसमें क्यों शामिल होंगे ! कमिउ की तरह क्या वे नहीं देख रहे थे कि जीत के बाद आगे सिर्फ हार खड़ी प्रतीक्षा कर रही है — फौरन नहीं, धीरे-धीरे । इस पराजय को सबको मानना होगा क्योंकि यह निर्रथक पराजय नहीं होगी, एक प्रकार के स्वातंत्र्य से स्फूरित पराजय, जीवन में किंचित शांति लाने और राज्य को मजबूत करने वाली पराजय । गांधी इस पराजय के गौरव को दूसरों के लिये छोड़ने को तैयार थे, क्योंकि नाफरमानी के उनके विचार क्यों किसी के भी फरमान को मानने के लिये मजबूर होंगे ! वे आजादी की लड़ाई के उत्साह की समाप्ति के बाद की लोगों की तिरछी नजरों की कल्पना कर पा रहे थे और अपने को उन बुरी नजरों के वृत्त के बाहर रखना ही श्रेयस्कर समझते थे । उन्होंने अपने जीवन को ही अपना संदेश कह कर राजनीति मात्र को उस भविष्य दृष्टि का रूप देने की बात कही थी जो नैतिक स्वातंत्र्य के बल पर आदमी को राजसत्ता के मानसिक दबावों से मुक्त रहने की ताकत देती है, नाफरमानी की ताकत देती है, जैसा कि बाद्यू के नाटक में डेविड की मां पौला डेविड से कहती है । रूस में क्रांति के पहले लेनिन ने एक बार चिंतित हो कर त्रातस्की के पूछा था कि यदि क्रांति विफल हो जाती है तो क्या होगा, तो त्रातस्की का जवाब था, यदि क्रांति सफल हो जाती है तो क्या होगा ?

‘बापू’ नाटक में क्रांति और सत्ता विमर्श की इसी कहानी को गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बाबू के बीच बटवारे और हिंदू-मुस्लिम तनाव आदि के प्रसंगों में अपने प्रकार से पेश किया गया है । क्रांति और उसके बाद क्या ? — यह सामाजिक परिवर्तन के हर ऐतिहासिक संघर्ष के साथ जुड़ा हुआ एक चिरंतन प्रश्न है । किसी  भी ठोस सत्ता विमर्श का त्रिक इसमें एक नये राज्य के निर्माण की समस्याओं के योग से ही तैयार होता है । राजसत्ता-केंद्रित परिवर्तन का सबसे त्रासद पहलू वह होता है जब जनरोष आदमी के सामयिक क्रोध की तरह भड़कता है, लेकिन किसी विवेकपूर्ण परिणति तक जाने के बजाय कुछ मायनों में और भी पतन की दिशा में बढ़ जाता है ! गांधी भी इसे जानते थे । इसीलिये वे कैबिनेट मिशन के द्वारा प्रस्तावित संविधान-सभा को पूरी तरह से ठुकराने के बजाय आजमाने पर बल देते हैं । इधर के सालों में, अफ्रीका और मध्य एशिया के अरब वसंत (2010-2014) के तूफानी घटना क्रम को देख लीजिए अथवा सारी दुनिया में दक्षिणपंथ के नये उभार को, इस त्रासदी को समझना आसान हो जायेगा ।

‘बापू’ नाटक में कैबिनेट मिशन के बारे में गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं के बीच मतभेद की तरह के कथित ऐतिहासिक तथ्यों का इसलिये कोई विशेष महत्व नहीं है क्योंकि इस नाटक का उद्देश्य ही इतिहास का कोई नया प्रामाणिक आख्यान पेश करना नहीं है । यह सत्य, अहिंसा और राजसत्ता के लिये संघर्ष के विषय पर एक निरंतर विमर्श की प्रस्तावना है । यह विमर्श ही इन सभी विषयों पर आदमी के अंतर के शून्य को भरने का और मानव-कल्याण के समताकारी व्योम से उसके लय का, संगति बनाये रखने का अकेला साधन है ।

इसी मायने में यह नाटक हमारे समय का एक महत्वपूर्ण नाटक है ।

रविवार, 29 दिसंबर 2019

राजनीति पर एक अराजनीतिक गप


—अरुण माहेश्वरी


राजनीति के विषयों पर ड्राइंग रूम की थोथी गप किसे कहते है इसका एक क्लासिक उदाहरण देखा कल रात लल्लन टॉप पर राजदीप सरदेसाई और सौरभ द्विवेदी की लगभग दो घंटे की लंबी बातचीत में । यह वार्ता शायद कुछ दिन पहले हुई थी, लेकिन हमने उसे कल ही सुना । वे चर्चा कर रहे थे राजदीप की सद्य प्रकाशित किताब ‘2019 : मोदी ने कैसे भारत को जीता’ (2019 : How Modi Won India) के एक-एक अध्याय पर लल्लन टाप के किताबवाला कार्यक्रम में ।


जनतंत्र में राजनीति आम जनता और पार्टियों/नेताओं के बीच के संबंध का विषय होती है । कुछ खास राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में जनता अपना नेता चुनती है और अन्य को पराजित  करती है । खास परिस्थितियों के संदर्भ में ही जनता और नेता/पार्टी का परस्पर संबंध चुनावों का निर्णायक तत्व होता है । इसमें कोई नेता सिकंदर नहीं होता कि ‘आया, देखा और जीत लिया’ । इसीलिये जनतांत्रिक राजनीति की कोई भी चर्चा जब सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के पूरे संदर्भ को नजरंदाज करके की जाती है, तो वह कोरी हवाई होती है । ऐसी सार्वजनिक चर्चा अन्तत: एक प्रकार की ठकुरसुहाती में पर्यवसित होने के लिये अभिशप्त होती है क्योंकि इसमें जो घटित होता है, उसे ही परिस्थितियों के निश्चित परिणाम के तौर पर इस प्रकार पेश किया जाता है जिसमें विजयी सर्वगुणसंपन्न दिखाया जाता है और पराजित को एक अधम मूर्ख के सिवाय कुछ नहीं कहा जाता है ।


पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की लगातार 34 साल सरकार रही । इसमें 25 साल से ज़्यादा काल तक ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे । 2011 में जब वाम मोर्चा की पराजय हुई उसके ठीक पहले 2006 में उसे सबसे बड़ी विजय हासिल हुई थी । लेकिन हमने बंगाल में किसी पत्रकार की ऐसी कोई किताब नहीं देखी जिसमें ज्योति बसु की लगातार जीतों के लिये किसी ने उनके निजी करिश्मों या तिकड़मबाजियों की कहानियाँ सुनाई हो । और बुद्धदेव भट्टाचार्य की पराजय में भी किसी ने उनकी निजी पराजय देखी हो ।

भारत में अनेक सालों तक कांग्रेस दल की सरकार रही, जिसमें गांधी परिवार की हमेशा एक अहमियत रही, लेकिन किसी भी गंभीर पत्रकार ने इस परिवार के सदस्यों के निजी जीवन, उनके आचार-आचरण आदि को कांग्रेस की जीतों का मूल कारण बताने की कोशिश नहीं की है ।


यह सच है कि इतिहास का हर रूप घटित का ब्यौरा ही होता है । हेगेल की प्रसिद्ध उक्ति है कि स्वर्ग का उल्लू तभी उड़ान भरता है जब शाम ढल जाती है । लेकिन हर विषय में इस उड़ान की भी अपनी कुछ आंतरिक ज़रूरतें होती है । आप घटित के विवरण-विश्लेषण से जानना तो चाहते हैं मनुष्य के जैविक विकास को लेकिन चर्चा करने लगते हैं ब्रह्मांड के निर्माण की, वह नहीं चल सकता है । अर्थात् जिन चीजों का विषय से वास्तव में कोई संबंध नहीं होता, उन्हीं को लेकर गप्पबाजी में समय ज़ाया किया जाता है ।

 

फिर कहेंगे, यह राजनीतिक पत्रकारिता का सबसे न्यूनतम स्तर होता है जब पत्रकारिता विजयी नेताओं का ढोल बजाने और पराजित नेता को नाना प्रकार से दुत्कारने का अनैतिक रास्ता अपनाया जाता है । पत्रकारों का निजी मूल्यबोध ऐसी चर्चा से पूरी तरह से गायब होता है । यही वजह है कि इस चर्चा में राजदीप अपने पत्रकार जीवन की जिन बड़ी भूलों को स्वीकारते हैं वे सभी आज पराजित पार्टी कांग्रेस से जुड़ी हुई थीं । इसमें कांग्रेस के काल में मिली पद्मश्री की उपाधि को स्वीकारना भी शामिल है । इसे ही राजनीति पर एक अराजनीतिक और अवसरवादी चर्चा कहते हैं ।



यह चर्चा राजदीप की पुस्तक को केंद्रित थी । इससे उस पुस्तक के बारे में हमें यह समझने में ज़रूर मदद मिली कि उनकी यह किताब भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण क्षण का कोई गंभीर विश्लेषण नहीं, बल्कि उसके पात्रों को लेकर की गई हल्के क़िस्म की गप्पबाजी भर है ।

—अरुण माहेश्वरी

नागरिकता का संघी प्रकल्प हिटलर की किताब से ही चुराया गया एक पन्ना है

- अरुण माहेश्वरी





सब जानते हैं, एनपीआर एनआरसी का मूल आधार है । खुद सरकार ने इसकी कई बार घोषणा की है । एनपीआर में तैयार की गई नागरिकों की सूची की ही आगे घर-घर जाकर जाँच करके अधिकारी संदेहास्पद नागरिकों की सिनाख्त करेंगे और सभी को इस सिनाख्त के आधार पर पहचान पत्र दिये जाएँगे ।

यह पूरा प्रकल्प हुबहू हिटलर के उस प्रकल्प की ही नक़ल है जब 1939-45 के बीच हिटलर ने यहूदियों की पहचान करके उन्हें Jewish Badge जारी किये थे । यहूदियों के लिये हमेशा उन पीले रंग के बैज को पहन कर निकलना जर्मनी में बाध्य कर दिया गया था । जैसे यहाँ पर एनआरसी के बाद तथाकथित संदेहास्पद नागरिकों को साथ में अपना विशेष पहचान पत्र रखने के लिये बाध्य किया जायेगा । इससे हिटलर ने जब यहूदियों के जनसंहार की होलोकास्ट योजना पर अमल शुरू किया तो पीले बैज वालों को कहीं से भी पकड़ कर तैयार रखे गये यातना शिविरों में भेज देने में उसे जरा भी समय नहीं लगा ।


भारत में भी बिल्कुल उसी तर्ज़ पर डिटेंशन कैंप्स के निर्माण का काम शुरू हो गया है । इनकी योजना के अनुसार संदेहास्पद नागरिकों में भी आगे फ़ौरन मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम को अलग-अलग छांटा जाएगा । इनमें ग़ैर-मुस्लिम को तो नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत नागरिकता दे दी जाएगी और मुस्लिमों को डिटेंशन कैंप में भेज कर आगे उनके साथ जो संभव होगा, वैसा सलूक किया जाएगा ।


इस प्रकार, भारत में हिटलर के परम भक्त मोदी-शाह-आरएसएस ने हिटलर के कामों की हूबहू नक़ल करते हए ही अभी एनपीआर और इसके साथ सीएए और एनआरसी का पूरा जन-संहारकारी प्रकल्प तैयार किया है ।



गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

अरविंद सुब्रह्मण्यन की महा सुस्ती की थिसिस और उनके सोच की एक सीमा

-अरुण माहेश्वरी


भारत के पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यन के साथ एनडीटीवी के प्रणय राय की भारतीय अर्थ-व्यवस्था की वर्तमान स्थिति पर यह लंबी बातचीत कई मायनों में काफ़ी महत्वपूर्ण है । अरविंद ने हाल में इसी विषय पर तमाम उपलब्ध तथ्यों के आधार पर एक शोध पत्र तैयार किया है, भारत की महा सुस्ती : इसके कारण ? निदान ? (India's Great Slowdown: What happened? What's the way out ) इस बातचीत में उसी के सभी प्रमुख बिंदुओं की व्याख्या की गई है ।

अरविंद भारतीय अर्थ-व्यवस्था की वर्तमान स्थिति को सिर्फ़ एक प्रकार की सुस्ती नहीं, बल्कि महा सुस्ती (Great slowdown) कहते हैं । इसे वे जीडीपी, आयात और निर्यात, बिजली और औद्योगिक उत्पादन में, सरकार के राजस्व में तेज गिरावट के सारे सरकारी आँकड़ों के आधार पर ही वे इसे एक साथ चार प्रमुख बैलेंसशीट्स में घाटे की परिस्थिति का परिणाम बताते हैं ।

बैंक और एनबीएफसी, जो कॉर्पोरेट्स को उधार दिया करते हैं, वे घाटे में चल रहे है । उधार लेने वाले कारपोरेट घाटे में चल रहे हैं ; वे जितना मुनाफ़ा करते हैं, उससे ज़्यादा अपने क़र्ज़ पर ब्याज भर रहे हैं । सरकार के राजस्व में कमी आती जा रही है ; कारपोरेट और निजी आयकर के रूप में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष जीएसटी तक की राशि में लगातार गिरावट हो रही है । इससे सरकार की बैलेंसशीट, उसका बजट गड़बड़ाने लगा है । और, अंतिम, कर्ज देने की बैंक और एनबीएफसी की क्षमता में कमी से आम आदमी की आय प्रभावित हो रही है ; उसका बजट गड़बड़ाने से सामान्यतः: उपभोक्ता का विश्वास पूरी तरह से डोलने लगा है ।

अर्थात् बैंक, कारपोरेट, सरकार और उपभोक्ता - इन चारों की बैलेंसशीट में घाटे की स्थिति के कारण भारतीय अर्थ-व्यवस्था महा सुस्ती में धंसती जा रही है ।

इस स्थिति में भी विदेशी मुद्रा कोष आदि में कोई कमी न आने के कारण यह अर्थ-व्यवस्था जहां अब तक चरमरा कर पूरी तरह से ढह नहीं रही है, वहीं यह कोष अर्थ-व्यवस्था के दूसरे सभी घटकों की बुरी दशा के कारण आर्थिक विकास में सहायक बनने के बजाय सरकार के घाटे को बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा कर रहा है । यह विदेश व्यापार की कमाई से आया हुआ धन नहीं है । फलत: सरकार भी कारपोरेट की तरह ही ज़्यादा से ज़्यादा ब्याज चुका रही है ।

अरविंद सुब्रह्मण्यन का कहना है कि इस संकट से हम एक तात्कालिक और दीर्घकालीन रणनीति के ज़रिये निकल सकते हैं, बशर्ते सबसे पहले हमारे सामने सच की एक मुकम्मल तस्वीर आ जाए । मसलन्, उनका कहना है कि अभी भारत में सभी विषयों के आँकड़ों में फर्जीवाड़े के कारण किसी भी तथ्य पर विश्वास नहीं किया जा सकता है । जो जीडीपी सरकारी आँकड़ों के अनुसार 4.5 प्रतिशत है, वह वास्तव में तीन प्रतिशत से भी कम हो सकती है । यही स्थिति बाक़ी क्षेत्रों की भी है । न कोई बैंकों के एनपीए के आँकड़ों पर पूरा विश्वास कर सकता है और न सरकारी राजस्व घाटे के हिसाब पर ।

इसलिये अर्थ-व्यवस्था के उपचार के लिये सुचिंतित ढंग से आगे बढ़ने के लिये सबसे पहला और ज़रूरी काम यह है कि सरकार सभी स्तर के आँकड़ों को दुरुस्त करे और उनसे कभी छेड़-छाड़ न करे । अभी जितना घालमेल कर दिया गया है, उसे सुधारना सरकार के लिये भी एक टेढ़ी खीर साबित होगा, लेकिन इसका कोई अन्य विकल्प नहीं है ।

इसके अलावा सरकार अपने उन ख़र्चों पर लगाम लगाये जो उसके बजट में घोषित नहीं होते हैं, राजनेताओं की मनमर्ज़ी की उपज होते हैं ।

अरविंद ने कृषि क्षेत्र में किसानों को राहत देने और कृषि उत्पादन में वृद्धि के भी उन सभी उपायों को दोहराया है जिनकी तमाम विशेषज्ञ लगातार चर्चा करते रहे हैं । इसमें किसानों को सीधे नगद मदद देने और जेनेटिकली मोडीफाइड बीजों का प्रयोग करने आदि की भी चर्चा की गई है ।

अरविंद का कहना है कि अगर अभी भी सरकार ईमानदारी से काम शुरू करें तो वह फिर से गाड़ी को पटरी पर ला सकती है, बशर्ते कुछ तात्कालिक लाभ-नुक़सान को देख कर वह अपने सुधार के रास्ते से भटके नहीं । इसके लिये उन्होंने बैंकिंग के क्षेत्र में भी कई सुधार की सिफ़ारिश की है । इसमें निजी नये बैंकों का गठन भी शामिल है ।

हाल में आरबीआई के पूर्व अध्यक्ष रघुराम राजन ने कहा था कि अर्थ-व्यवस्था की वर्तमान दुर्गति के लिये नरेन्द्र मोदी और उनकी मंडली निजी तौर पर ज़िम्मेदार है । अरविंद सुब्रह्मण्यन ने भी सीधे नहीं, बल्कि घुमा कर इसी बात को कहा है । राजनीतिक लाभ के लिये सांख्यिकी के क्षेत्र में मोदी के द्वारा पैदा की गई अराजकता के अलावा उन्होंने यह भी बताया है कि नोटबंदी के बाद बैंकों के द्वारा रीयल स्टेट कंपनियों को उनके वित्तीय संकट से राहत देने के लिये भारी मात्रा में क़र्ज़ देने से उनके एनपीए में नाटकीय वृद्धि हुई है । अर्थात् नोटबंदी से बैंकों के पास इकट्ठा राशि को रीयल स्टेट की ओर ठेलने में भी मोदी व्यक्तिगत रूप में ज़िम्मेदार रहे हैं । लेकिन इस मामले में उनके नज़रिये में राजन की तरह की स्पष्टता नहीं है ।

बहरहाल, जिस सरकार का अस्तित्व ही तथ्यों के विकृतिकरण, झूठ और निरंकुशता पर टिका हुआ हो, उसके रहते हुए यह उम्मीद करना कि आँकड़ों को दुरुस्त कर लिया जायेगा, बजट के बाहर के खर्च नियंत्रित हो जायेंगे, भ्रष्टाचार ख़त्म हो जायेगा और वित्तीय संस्थाओं को स्वतंत्रता मिल जायेगी - यह अरविंद सुब्रह्मण्यन की बातों का सबसे बड़ा धोखा है ।

इसीलिये वर्तमान आर्थिक संकट के मूल में काम कर रही राजनीति की ओर संकेत करने में वे पूरी तरह असमर्थ रहे हैं । किसी भी नौकरशाह की राजनीति की ओर आँख मूँद कर चलने की मूल प्रवृत्ति ही उनके पूरे विश्लेषण के फ़ोकस को नष्ट कर देती है । यही वजह है कि वर्तमान महा सुस्ती के लक्षणों पकड़ने के बावजूद वे इसके मूल में काम कर रहे उस सत्य को पकड़ने में विफल होते हैं जो अर्थनीति के दायरे के बाहर स्थित है । वह रोग आज के शासक दल की राजनीति से पैदा हो रहा हैं । महा सुस्ती में वास्तव में राजनीति का यही सच प्रगट हो रहा है । इसकी गूंज ही महा सुस्ती से व्यक्त होती है । वे यह भी नहीं देख पाए हैं कि विदेशी मुद्रा कोष आदि के जिन व्यापक आर्थिक पक्षों के मज़बूत पहलू की वे चर्चा कर रहे हैं, वह भी इसी राजनीति के कारण किस नाटकीय क्षण में बालू की दीवार साबित होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन है । भारत में क्रमश: एक प्रकार की गृह युद्ध की विकसित हो रही परिस्थिति में दुनिया का कोई भी देश और व्यक्ति भारत में अपने निवेश को कब पूरी तरह से असुरक्षित मानने लगेगा, कहना कठिन है ।

बहरहाल, यह भविष्य की एक बात है, जिस पर निश्चयात्मक कुछ भी कहना सही नहीं है । यह अभी की दिशा के बारे में भविष्यवाणी हो सकती है, लेकिन स्वयं इस दिशा को तय करने वाली अन्य बातों को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है । 

हम यहाँ, इस पूरी बातचीत के लिंक को साझा कर रहे हैं :

https://youtu.be/mFE4rTq5HWA

रविवार, 22 दिसंबर 2019

मोदी संविधान के प्रति अपनी वफादारी का परिचय दें, न कि भारत के लोग

—अरुण माहेश्वरी



आज दिल्ली में मोदी जी की चुनावी रैली, पूरे देश में आग लगा कर एक आडंबरपूर्ण चुनावी रैली जलते हुए रोम में बंशी बजाने का ही एक बुरा उदाहरण था ।

इस रैली में मोदी क्या बोल रहे हैं, इस बात के पहले ही यह जान लेना जरूरी है कि वे कहां से बोल रहे हैं, उनकी प्रकट बदहवासी और अहंकार का स्रोत क्या था ? वे भारत के प्रधानमंत्री हैं और उनका प्रधानमंत्री होना ही उनके दिमाग में आरएसएस के प्रचारक के काल में भरे हुए जहर को उनके लिये सर्वकालिक परम सत्य बना देने के लिये काफी है । इसीलिये वे राष्ट्र-व्यापी इतने भारी आलोड़न से चिंतित होने के बावजूद उस जहर को ही उगलते रहने के जुनून में फंसे रहने के लिये अभिशप्त है ।

व्यापक जन-आक्रोश के दबाव में वे आदतन यह झूठ बोल गये कि एनआरसी के बारे में उनकी सरकार ने आज तक सोचा तक नहीं है । उनके प्रिय गृहमंत्री के बयानों को भारत के लोग लगातार सुनते रहे हैं । लेकिन नागरिकता कानून के संदर्भ में जब वे पड़ौस के तीन देशों के सताए हुए लोगों पर करुणा बरसा रहे थे तभी भारत के आंदोलनकारियों पर सांप्रदायिक जहर से बुझे वाणों से उन्होंने जिस प्रकार हमले किये उसने उनके अंतर की उस सचाई को जाहिर कर दिया जिसे बार-बार दोहराते रहना उनकी सांप्रदायिक प्रमादग्रस्त प्रकृति की मजबूरी है । एक प्रधानमंत्री और एक प्रचारक के रूप में प्रधानमंत्री के इसी विखंडित व्यक्तित्व की दरारों से उन्हें संचालित करने वाले उनके अचेतन के तत्त्व उझक कर सामने आ गये थे । यही तो उनका स्थायी भाव है ।

वे भारत के संविधान की शपथ खा कर हाथ में तिरंगा उठाए नागरिकता कानून के विरोधियों को पाकिस्तान की कारस्तानियों का विरोध करके अपनी सचाई को प्रमाणित करने की चुनौती दे रहे थे । बात-बात में पाकिस्तान का हौवा खड़ा करके भारत में इस्लाम-विरोधी भावनाओं को भड़काने के आरएसएस के पूरे इतिहास को देखते हुए क्या मोदी जी से यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि वे खुद तीन पड़ौसी मुल्कों में सताये हुए लोगों के प्रति दया भाव दिखाते हुए क्या भारत में इस्लाम-विरोधी जहर फैलाने का अपना पुराना खेल नहीं खेल रहे हैं ?

वे नागरिकता कानून को लागू न करने की घोषणा करने वाले राज्यों से कानून के विशेषज्ञों की सलाह लेने की बात कर रहे थे । उनसे पूछा जाना चाहिए कि इस संविधान-विरोधी कानून को लाने के पहले क्या उनकी सरकार ने किसी संविधान-विशेषज्ञ, बल्कि अपने ही कानून मंत्रालय तक की सलाह ली थी ? राज्य सभा में पी चिदंबरम सरकार से लगातार यह सवाल कर रहे थे कि क्या सरकार ने इस कानून की संविधान-सम्मतता के बारे में किसी से कोई विचार-विमर्श किया तो सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं था ।

जनता को बरगलाने के लिये भले आप केंद्र सरकार के कानून की अपार शक्ति का दिखावा कर सकते हैं, लेकिन सचाई यह है कि भारत एक संघीय राज्य है । इस कानून को अनेक राज्यों और संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर अभी फैसला आया नहीं है । इसीलिये इस कानून को इसके इसी रूप में लागू करवाने की बात अपने समर्थकों के हौसलों को बनाये रखने के लिये दी गई मोदी जी की गीदड़ भभकी के अलावा कुछ नहीं है ।

आज जरूरत आंदोलनकारियों को अपनी देशभक्ति का प्रमाण देने की नहीं है, मोदी जी को खुद भारत के संविधान के प्रति, उसकी धर्म-निरपेक्ष भावनाओं के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देने की जरूरत है । मोदी जी का सुरसा की तरह खिंचता चला गया बदहवासी से भरा यह भाषण असल में उन्हें ही कठघरे में खड़ा करता है ।     

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

अब इनके रोग की अंतिम तौर पर पहचान संभव होगी

(मोदी-शाह-संघ तिकड़ी के वर्तमान पर एक मनोविश्लेषणमूलक दृष्टिपात)
—अरुण माहेश्वरी



मोदी जी ने फिर एक बार कहना शुरू किया है — ‘मुझ पर यकीन करो’ । नोटबंदी के बाद गोवा में उनका रोना शायद ही कोई भूला होगा । यही रट थी — मुझ पर यकीन करो । पचास दिन की मोहलत दो, अगर मैं इसके सुफल नहीं बता सका तो आप है और यह चौराहा है, मेरा फैसला कर दीजिएगा । फिर जीएसटी के लिये तो इन्होंने आधी रात में यह कहते हुए जश्न मनाया था कि उन्होंने आजादी की नई लड़ाई जीत ली है ।

इसी प्रकार न जाने वे कितनी बातों का यकीन दिलाते रहे हैं । भारत को स्वच्छ बना देंगे, भ्रष्टाचार दूर करेंगे, बलात्कार खत्म कर देंगे, अर्थ-व्यवस्था को दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थ-व्यवस्था बना देंगे, किसानों को लागत से डेढ़ गुना एमएसपी, फाइव ट्रिलियन इकोनोमी और न जाने क्या-क्या ! लेकिन हर मामलें में वे यकीन के लायक साबित नहीं हुए । घुमा-फिरा कर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और पाकिस्तान-विरोधी थोथी बातें करके ये राष्ट्रवाद का भूत की शरण में जाकर किसी प्रकार अपनी रक्षा करते हैं !

बहरहाल, लोग इन सब बातों को अब अच्छी तरह से जान रहे हैं । फिर भी, मजे की बात यह है कि 2019 के चुनाव में मोदी अच्छी तरह से विजयी हुए । इस जीत के बाद से तो मोदी ने जैसे मान लिया कि लोग उनकी झूठ और विफलताओं को ही प्यार करते हैं ! लोकसभा चुनाव के बाद से ये अपने विश्वासघात की राजनीति की दिशा में और भी अधिक निर्द्वंद्व भाव से बढने लगे हैं । कश्मीर के बारे में उनकी कार्रवाई और अब नागरिकता कानून को लेकर किया जा रहा मजाक उनके इस मनमौजीपन के सबसे बड़े उदाहरण हैं ।

आइये ! आज हम मोदी के झूठ और उसके प्रति ‘जनता के यकीन’ के विषय पर थोड़ी भिन्न दृष्टि से रोशनी डालते हैं । दुनिया के सबसे प्रमुख मनोचिकित्सक सिगमंड फ्रायड की मनोविश्लेषकों को, जिन्होंने मनोरोगी का इलाज करने का जिम्मा लिया है, सबसे पहली हिदायत यह दी थी कि कभी भी रोगी की खुद के बारे में कही गई बात पर विश्वास मत करो । वे बातें सिर्फ रोगी के अहम् की तुष्टि के लिये होती है । तभी से फ्रायड की इस बात को मनोविश्लेषकों की दुनिया का एक मूलभूत सिद्धांत माना जाता है ।

फ्रायड के कामों को मनोविश्लेषण में आगे एक बिल्कुल नई, दर्शनशास्त्रीय ऊंचाई तक ले जाने वाले फ्रांसीसी मनोविश्लेषक जाक लकॉन ने इसी विषय पर एक पूरा नया विमर्श तैयार किया था — ‘मनोविश्लेषण में बातों और भाषा की भूमिका और इनका क्षेत्र’ । इसमें वे फ्रायड की बात को बुनियादी तौर पर मानते हुए भी कहते हैं कि रोगी की बातें ही मनोविश्लेषण का प्रमुख औजार होती है, बातें कितनी भी खोखली क्यों न हो, मूल चीज यह है कि वे जैसी दिखती है, उन्हें बिल्कुल वैसी ही नहीं समझना चाहिए ।... भले वे कुछ न कहती हो, लेकिन बातचीत संवाद के अस्तित्व को बताती है ;  भले जो साफ दिखता है उनमें उससे इंकार किया गया हो, लेकिन यही इस बात की भी पुष्टि है बात में सत्य होता है;  भले उनका मकसद छल करना हो, लेकिन वे अन्य की गवाही में विश्वास पर निर्भरशील होती है । मूल बात यह है कि विश्लेषक को इस बात की समझ होनी चाहिए कि बातें किस प्रकार काम किया करती है । बातों के महत्व को मान कर रोगी की हर थोथी बात के पीछे भागने से विश्लेषक को हासिल कुछ नहीं होगा, बल्कि वह खुद रोगी के संदर्भ में अपने अंतर में खोखला होता चला जायेगा क्योंकि मनोविश्लेषण रोगी के साथ विश्लेषक का एक परस्पर द्वंद्वात्मक संबंध भी कायम करता है ।

इसी सिलसिले में लकॉन विश्लेषकों के लिये एक बहुत ही महत्वपूर्ण और पते की बात कहते हैं । वे कहते हैं कि आदमी को उसकी नितांत निजी बातों में देखने अथवा जड़ समझने, इन दोनों के ही खतरे हैं । इन खतरों से तभी बचा जा सकता है जब आदमी की आत्म-मुग्ध बातों से इन दोनों चीजों, उसकी निजता और उसकी जड़ता, दोनों को ही किन्हीं खामोश पक्षों के रूप में फिर से जोड़ा जा सके । इसका एक ही डर है कि आदमी अपने बारे में एक पत्थर की मूर्ति की तरह की कल्पना करके उसमें फंस सकता है ; अर्थात् उसका अलगाव और मजबूत हो जाता है ।

लकॉन कहते हैं कि “विश्लेषक की कला इस बात में है कि वह  आदमी की खुद के बारे में निश्चित धारणाओं पर अपनी अंतिम राय को तब तक लटकाए रखे,  जब तक उसकी अंतिम अभिलाषाएं (मरीचिकाएँ) खुल कर सामने नहीं आ जाती । आदमी की इन बातों से ही उसके अपने अंत को पढ़ा जाना संभव हो सकता है ।”



अब देखिये, हमारे यहां एक ओर मोदी-शाह-आरएसएस है और दूसरी ओर है भारत की जनता, इनका विश्लेषण करके उन पर राय देने वाला विश्लेषक । हमारे देश के लोगों ने अब तक मोदी की सारी छल-कपट की बातों को देखा है, और आज भी देख रही है । लेकिन वह मोदी के बारे में अपनी अंतिम राय को आज तक लटकाए हुए हैं । पिछले छः सालों से ही मोदी के झूठ और छल के खिलाफ कई रूप में असंतोष जाहिर करने पर भी अब तक उसने उन पर अपनी अंतिम राय को स्थगित रख छोड़ा है । ऐसा लगता है जैसे लोग किसी सधे हुए कुशल मनोविश्लेषक की तरह यह सब देखते हुए भी मोदी-शाह-आरएसएस तिकड़ी की महत्वकांक्षाओं को, उनके अंदर की मरीचिकाओं को पूरी तरह से सामने आने देने का मौका दे रही है । अब वे क्रमशः और भी तेजी से अपने मूल रोग को व्यक्त करने लगे हैं जो उन्हें आरएसएस की पाठशाला से लगे हुए हैं ।

पहले पांच साल तक तो वे उन पर पर्दा डाले रहते थे । यहां तक कि कश्मीर में महबूबा मुफ्ती के साथ मिल कर सरकार बनाई । शुरू में तो पाकिस्तान सहित सभी पड़ौसी देशों से अच्छे संबंधों की बाते की । गोगुंडों की गतिविधियों पर मोदी ने कड़े शब्दों का प्रयोग किया । लेकिन जैसे-जैसे नोटबंदी, जीएसटी की तरह के मूर्खतापूर्ण कदमों से इनके अंदर का खोखलापन सामने आने लगा, इन्होंने परपीड़क राष्ट्रवादी उत्तेजना की आड़ तैयार करने के लिये पाकिस्तान, नेपाल आदि से संबंध बिगाड़ लिये । कुल मिला कर उनकी विक्षिप्तता का पूरा सच सामने नहीं आया था । और यही वजह रही कि जनता की भी इनके बारे में अंतिम राय स्थगित रह गई ।

कहना न होगा, आदमी की अपनी बातों और उसकी आंतरिक जड़ताओं के बीच से उसके सच को सामने लाने में भ्रम और स्थगित अंतिम राय के बीच की खाई अब मोदी-शाह-संघ के चरित्र को खोलने में अपनी भूमिका अदा करने लगी है ।

अब नागरिकता संशोधन कानून और नागरिकता रजिस्टर के बारे में मोदी-शाह जिस प्रकार की दलीलों से लोगों को आश्वस्त करना चाहते हैं, वे काम नहीं कर सकती है । कश्मीर, असम के लोगों और उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ किये गये विश्वासघात से आरएसएस की वह संविधान-विरोधी एकात्म सत्ता की फासिस्ट विचारधारा पूरी तरह से सामने आ रही है, जो मोदी सरकार की हर क्षेत्र में पंगुता और विफलता के मूल में है ।

अब कोई भी दुष्यंत कुमार के शब्दों में यह पूरे निश्चय से कह सकता है कि “उनकी अपील है कि उन्हें हम यकीं (मदद) करें, चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये।” मोदी-शाह-संघ की तिकड़ी पर जनता की अंतिम राय सुनाने की घड़ी अब शायद नजदीक आ रही है ।       

रविवार, 8 दिसंबर 2019

आरएसएस और उद्योग जगत के बीच प्रेम और ईर्ष्या के संबंध की क़ीमत अदा कर रही है भारतीय अर्थ-व्यवस्था


-अरुण माहेश्वरी



आज के टेलिग्राफ़ में उद्योगपतियों की मनोदशा के बारे में सुर्ख़ी की खबर है । “Why business is talking ‘wine’, not Dhanda”। (क्यों उद्योगपति ‘शराब’ की बात करते हैं, धंधे की नहीं )

पूरी रिपोर्ट उद्योगपतियों की आपसी बातचीत और उनके बयानों के बारे में है जिसमें घुमा-घुमा कर एक ही बात कही गई है कि उद्योग और सरकार के बीच विश्वास का रिश्ता टूट चुका है । कोई भी अपने व्यापार के भविष्य के बारे में निश्चिंत नहीं है । इसीलिये आपस में मिलने पर पहले जहां नये प्रकल्प के बारे में चर्चा होती थी, वहीं अभी नई शराब की चर्चा हुआ करती है ।

अर्थात् अभी उद्योग जगत के लोग उपभोग की चर्चा से अपनी-अपनी पहचान बना रहे हैं, न कि उत्पादन के उपक्रमों से । दुनिया की बेहतरीन से बेहतरीन चीजों का उपभोग ही जैसे इनकी ज़िंदगी का ध्येय बनता जा रहा है, अपनी रचनात्मक मौलिकता का इनमें कोई मोह नहीं बचा है ।

बहरहाल, इस रिपोर्ट का कुछ ज़ोर इस बात पर भी है कि वर्तमान सरकार ने ईडी, आईटी की तरह की एजेंसियों के चुनिंदा प्रयोग से डर का वातावरण तैयार करके समग्र रूप से उद्यमशीलता को कमजोर किया गया है ।

उद्योगपतियों का यही वह तबका है जो कभी राजनीति में मोदी के उत्थान पर अश्लील ढंग से उत्साही नज़र आता था । उन्हें भरोसा था कि मोदी व्यापार के माहौल को उनके लिये अनुकूल बनायेगा । उनके इस भरोसे का एक प्रमुख कारण यह था कि उन्हें आरएसएस पर भरोसा था और वे इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि मोदी आरएसएस का एक सच्चा प्रतिनिधि है ।

भारत में आरएसएस के इतिहास पर यदि कोई गहराई से नज़र डालें तो पता चलेगा कि किस प्रकार उसके कार्यकर्ताओं का प्रमुख हिस्सा उन छोटे दुकानदारों और व्यापारियों से आता था जो एक अर्थ में विफल व्यापारी हुआ करते हैं क्योंकि उनके पास औद्योगिक साम्राज्य बनाने की तरह की व्यापक दृष्टि ही नहीं होती थी । उनकी मामूली शिक्षा जीविका के लिये उन्हें छोटे-मोटे धंधों से बांधे रखती थी । और, अपनी इसी कमजोर स्थिति के कारण वे अक्सर किसी न किसी बड़े व्यापारी घराने के साये में ही पला करते थे ।

यही वजह रही कि आरएसएस के कार्यकर्ताओं को पालने वाले औद्योगिक घराने उन्हें सहज ही अपना दास मानते रहे हैं । अक्षय मुकुल की पुस्तक ‘Gita Press and the making of Hindu India’ में पूरे विस्तार के साथ संघी मानसिकता के सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति कोलकाता के मारवाड़ियों की उदारता का पूरा इतिहास दर्ज है ।

मुकुल ने इसे बिल्कुल सही मारवाड़ियों की अपनी पहचान के संकट से जोड़ कर विवेचित किया है। उनके शब्दों में, “उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के प्रारंभ में भारतीय पूंजीवाद में मारवाड़ियों के उदय के साथ दो महत्वपूर्ण, लेकिन परस्पर-विरोधी चीजें घटित हुई । पहली तो यह कि यह समुदाय ईर्ष्या और तिरस्कार का पात्र बन गया, उनको यूरोप के यहूदियों की तरह घनघोर स्वार्थी बता कर मज़ाक़ उड़ाया जाने लगा । दूसरा मारवाड़ियों में खुद में एक विचित्र सा पहचान का संकट पैदा होने लगा । वह आर्थिक रूप में एक ऐसा शक्तिशाली समुदाय था जिसका कोई सामाजिक मान नहीं था । उनकी सादगी भी उनको मान नहीं दिला पाई थी । ...धार्मिक और सामाजिक कामों में उनकी उदारता से उन्हें मान तो मिला लेकिन उसके अपने तनाव भी थे । धार्मिक और सामाजिक कामों के लिये उदारता से दान के आधार पर निर्मित सादा जीवन जीने वाला सार्वजनिक व्यक्तित्व ।”

मुकुल ने बिल्कुल सही पकड़ा है कि मारवाड़ियों की पहचान का संकट ही उन्हें आधुनिक बनाने के बजाय हिंदू धार्मिक क्रियाकलापों से जोड़ता चला गया । उनके बीच से ही गीताप्रेस गोरखपुर के स्थापनाकर्ता हनुमान प्रसाद पोद्दार सरीखे लोगों ने कोलकाता के मारवाड़ी परिवारों के चंदे पर ही हिंदू धर्म और सांप्रदायिकता के प्रचार-प्रसार का ताना-बाना तैयार किया था ।

कहने का तात्पर्य यही है कि औद्योगिक घराने अनेक ऐतिहासिक सामाजिक कारणों से ही अपने को आरएसएस और हिंदुत्व की विचारधारा के संगठनों का सरपरस्त मानते रहे हैं और इसी वजह से उनका इनकी स्वामिभक्ति पर काफी भरोसा भी रहा है । लेकिन समझने की बात यह है कि इस प्रकार की किसी की भी सरपरस्ती तभी तक कोई मायने रखती है जब तक जिसे पाला जा रहा है, उसके लिये उसकी ज़रूरत बनी रहती है । जब पलने वाले खुद शासक के आसन पर पहुँच जाते हैं, और अपने ‘सरपरस्तों’ के ही मालिक बन जाते हैं, तो दोनों के बीच पुराना रिश्ता नहीं रह सकता है, बल्कि एक नये तनाव से भरा भिन्न रिश्ता बन जाता है । यह नये मालिक की अपने पुराने मालिक के प्रति ईर्ष्या और नफ़रत पर आधारित रिश्ता होता है ।

जर्मनी में हिटलर के उदय और पूरे शासन का इतिहास भी इसका गवाह है कि हिटलर को आगे बढ़ाने में वहाँ के जिन तमाम उद्योगपतियों ने भरपूर मदद की थी, हिटलर ने सत्ता पर अपना पूर्ण अधिकार क़ायम कर लेने के बाद उन सबको चुन-चुन कर या तो यातना शिविरों में पहुँचाया या युद्ध के दौरान ही देश छोड़ कर भाग जाने लिये मजबूर किया । उद्योग की आज़ादी का कोई मूल्य नहीं रह गया था ।

इसी लेखक की किताब ‘आरएसएस और उसकी विचारधारा’ में एक पूरा अध्याय ‘आरएसएस और व्यवसायी वर्ग’ पर है जिसमें थोड़े विस्तार के साथ हिटलर और जर्मनी के उद्योगपतियों के संबंधों का इतिहास दिया गया है ।

प्रेम और ईर्ष्या का यह आरएसएस और व्यवसायी समुदाय के बीच का रिश्ता परस्पर की सामाजिक स्थिति और शक्ति में परिवर्तन के स्वरूप के साथ बनता-बिगड़ता रहता है । संघ के लोग व्यवसायी घरानों के निकट रहे हैं और स्वाभाविक रूप से उनकी अच्छी-बुरी करतूतों के बारे में उनकी अपनी ख़ास धारणाएँ भी रहती होगी । लेकिन, निकटस्थ व्यक्ति ही किसी भी सत्य के प्रति सबसे अधिक विभ्रांतियों से भरा हुआ पाया जाता है । बहुत निकटता से सत्य को उसकी समग्रता में देखा नहीं जा सकता है ।

कहना न होगा, यही वजह है कि आरएसएस के प्रतिनिधि मोदी जी और उनके निकट के लोगों में उद्योगपतियों के बारे में भारी भ्रांतियाँ भरी हुई हैं । वे न उन पर भरोसा कर पाते हैं और न पूरी तरह से अविश्वास ही । इसी वजह से ये पूरे व्यवसाय जगत के बारे में ही हमेशा दुविधाग्रस्त रहते हैं ।

विडंबना यह है कि भारत की अर्थ-व्यवस्था का बहुलांश निजी पूँजी की गतिविधियों पर ही निर्भर करता है । सरकार की किसी भी भ्रांति की वजह से उस क्षेत्र में यदि कोई गतिरोध पैदा होता है, तो यह तय है कि यह पूरी अर्थ-व्यवस्था के चक्के को जाम कर देने के लिये काफ़ी होगा । आज भारत के व्यवसाय जगत के बारे में मोदी जी की निजी भ्रांतियों की क़ीमत भारत की अर्थ-व्यवस्था को चुकानी पड़ रही है ।

रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन जब आज के आर्थिक संकट के लिये मोदी को निजी तौर पर ज़िम्मेदार बता रहे हैं, तो वह अकारण नहीं हैं । हिटलर का रास्ता औद्योगिक विकास का सही रास्ता कभी नहीं हो सकता है ।


बर्बरता किसी न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकती


—अरुण माहेश्वरी



हैदराबाद में बलात्कारियों के एनकाउंटर की पूरे देश में भारी प्रतिक्रिया हुई है । अभी हमारा समाज जिस प्रकार की राजनीति के जकड़बंदी में फंसा हुआ है, उसमें लगता है जैसे आदमी आदिमता के हर स्वरूप को पूजने लगा है । यह जन-उन्माद चंद लेखकों-बुद्धिजीवियों के विवेक पर भी भारी पड़ रहा है । पुलिस के द्वारा किये गये इस शुद्ध हत्या के अपराध को नाना दलीलों से उचित ठहराने की कोशिशें दिखाई दे रही है ।

संदर्भ से काट कर कही जाने वाली बात कैसे अपने आशय के बिल्कुल विपरीत अर्थ देने लगती है, इसके बहुत सारे उदाहरण इसमें देखने को मिल रहे हैं । मसलन्, ‘विलंबित न्याय न्याय नहीं होता’, कह कर भी अपराधी को पकड़ कर सीधे मार डालने को सच्चा न्याय बताया जा रहा है । अर्थात्, न्याय के लिये दी जाने वाली दलील से पूरी न्याय प्रणाली की ही हत्या कर देने की सिफारिश की जा रही है ।

इस घटना पर अपनी एक प्रतिक्रिया में हमने सऊदी अरब के रियाद शहर के कटाई मैदान, chop chop square का उल्लेख करते हुए वहां के सर्वाधिकारवादी तानाशाही शासन के साथ न्याय की आदिम प्रणाली, और हिटलर की गैर-जर्मन जातियों के लोगों को मसल कर खत्म कर देने के नाजीवादी न्याय दर्शन की चर्चा की तो कुछ मित्र हमें बताने लगे कि सऊदी में इसी आदिम न्याय प्रणाली के चलते बलात्कार नहीं के बराबर होते हैं और अपराध भी काफी कम पाए जाते हैं !


न्याय की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार की हमेशा ज़रूरत बनी रहेगी, लेकिन तत्काल न्याय का सोच ही एक आदिम सोच है । दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मानवशास्त्री लेवी स्ट्रास की “ ‘आदिम’ सोच और ‘सभ्य’ दिमाग” के बीच फर्क की स्थापना को ही एक प्रकार से दोहराते हुए हमने लिखा भी कि एक झटके में सब कुछ हासिल कर लेने का सोच ही आदिम सोच होता है । इसे सर्वाधिकार की आदिमता कहते हैं । समाज-व्यवस्था के प्रति वैज्ञानिक नजरिया कहीं गहरे और स्थिर निरीक्षण की माँग करता है । अगर सऊदी तौर-तरीक़ा ही आदर्श होता तो पूरी सभ्य दुनिया में फाँसी की सजा तक को ख़त्म कर देने की बात नहीं उठती । सारी दुनिया में chop chop squares होते । समय के साथ सऊदी में भी इसके खुले प्रदर्शन को सीमित करने की कोशिशें भी यही प्रमाणित करती है कि आदमी की खुली कटाई सजा का वीभत्स रूप है, आदर्श रूप नहीं । वैसे क्रुसीफिकेशन आज भी वहां सजा की एक मान्य प्रणाली है ।

न्याय और दंड के स्वरूप किसी भी समाज व्यवस्था के सच को प्रतिबिंबित करते हैं और वे उस समाज में आदमी के स्वातंत्र्य के स्तर को प्रभावित करते हैं । यह आपको तय करना है कि आपको ग़ुलाम आज्ञाकारी नागरिक चाहिए या स्वतंत्र-चेता मनुष्य । ग़ुलाम नागरिक अपनी रचनात्मकता को खो कर अंतत: राष्ट्र निर्माण के काम में अपना उचित योगदान करने लायक़ नागरिक साबित नहीं होता है । प्रकारांतर से वह राष्ट्र की प्रगति के रास्ते में एक बाधा ही होता है ।

लेवी स्ट्रास ने अपने विश्लेषण में यह भी बताया था कि आदिमता महज आदमी के शरीर की मूलभूत जरूरतों, मसलन् खाद्य और सेक्स आदि से जुड़ी चीज नहीं होती है । ‘टोटेमवाद और जंगली दिमाग’ लेख में उन्होंने यह दिखाया था कि “आदिम जरूरतों के अधीन रहने वाले इन लोगों में भी स्वयं से परे जाकर सोचने की क्षमता होती है । अपने इर्द-गिर्द के संसार, उसकी प्रकृति और अपने समाज को जानने की उनकी भी कोशिश रहती है । यहां तक कि इसके लिये वे बिल्कुल दर्शनशास्त्रियों की तरह बौद्धिक साधनों, अथवा एक हद तक वैज्ञानिक उपायों का भी प्रयोग करते हैं । ...लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह वैज्ञानिक चिंतन के समकक्ष होता है ।...यह उससे सिर्फ इसीलिये अलग होता है क्योंकि इसका लक्ष्य उद्देश्य बिल्कुल सरल तरीके न्यूनतम कोशिश से पूरे ब्रह्मांड की न सिर्फ एक सामान्य समझ बल्कि संपूर्ण समझ कायम करने की होती है । अर्थात् वह सोचने का वह तरीका है जिसमें यह मान कर चला जाता है कि यदि आप हर चीज को नहीं समझते है तो आप किसी चीज की व्याख्या मत कीजिए । वैज्ञानिक सोच जो करता है, यह उसके पूरी तरह से विरुद्ध है । वैज्ञानिक चिंतन कदम दर कदम चलता है, हर सीमित परिघटना की व्याख्या की कोशिश करता है, तब आगे की दूसरी परिघटना को लेता है ।...इसीलिये बर्बर दिमाग की सर्वाधिकारवादी महत्वाकांक्षाएं वैज्ञानित चिंतन की प्रणालियों से बहुत अलग होती है । यद्यपि सबसे बड़ा फर्क यह होता है कि यह महत्वाकांक्षा सफल नहीं होती है ।” 
   
कहना न होगा, अपराधियों को पकड़ कर गोली मार देने की बर्बरता न्याय के सभ्य तौर-तरीकों के सर्वथा विपरीत है । यह कभी भी किसी न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में सफल नहीं हो सकती है । दुनिया में राजशाही का इतिहास बर्बर नादिरशाही संस्कृति का भी इतिहास रहा है जब जनता में खून के खेल का उन्माद भरा जाता था । इसका सबसे जंगली रूप देखना हो तो नेटफ्लिक्स के ‘स्पार्टकस’ सीरियल को देख लीजिए । कैसे साधारण लोग और राजघरानों के संभ्रांतजन साथ-साथ आदमी के शरीर से निकलने वाले खून के फ़व्वारों का आनंद लिया करते थे । कैसे मार्कोपोलो सीरियल में कुबलाई खान लोगों की कतारबद्ध कटाई करके उनके अंगों को कढ़ाई में उनके ही खून में उबाला करता था । आधुनिक तकनीक के युग में राजशाही का नया रूप नाजीवाद और फासीवाद भी राष्ट्रवाद के नाम पर ऐसे ही खूनी समाज का निर्माण करता है । सभी प्रकार के बर्बर शासन तलवारों और बम के गोलों से मनुष्यों के विषयों के निपटारे पर यक़ीन करते रहे हैं ।

जनतंत्र इसी बर्बरता का सभ्य प्रत्युत्तर है । तलवार के बजाय क़ानून के शासन की व्यवस्था है । राजा की परम गुलामी की तुलना में नागरिक की स्वतंत्रता और उसे अधिकार की व्यवस्था है ।