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शनिवार, 19 मई 2018

फासीवाद क्या है : एक विचार


-अरुण माहेश्वरी

फेसबुक पर एक मित्र शशिकांत ने राजनीति विज्ञानी डा. लारेंस ब्रिट की एक टिप्पणी लगाई थी जिसमें उन्होंने फासीवाद के चौदह लक्षणों को गिनाते हुए बताया था कि फासीवाद क्या है । उनके अनुसार ये लक्षण है -
1.शक्तिशाली और सतत जारी राष्ट्रवाद ;2. मानव अधिकारों और उनकी  स्वीकृति के प्रति नफ़रत ;3. एकजुटता की वजह के रूप में शत्रुओं/बलि के बकरों की शिनाख्त ;4. सेना की सर्वोच्चता ;5. अनियंत्रित लैंगिक भेदभाव ;6. नियंत्रित जन संचार;7. राष्ट्रीय सुरक्षा की सनक;8. धर्म और राजनीति का घाल-मेल;9. कॉरपोरेट सत्ता का सरंक्षण; 10. श्रमिकों की शक्ति का दमन;11. बुद्धिजीवियों और कलाओं का तिरस्कार;12. अपराध और सजा के प्रति जुनून;13. अनियंत्रित याराना पूंजीवाद और भ्रष्टाचार;14. छलपूर्ण चुनाव ।
इसमें जिस एक प्रमुख लक्षण की ओर उन्होंने ध्यान नहीं दिया, वह है एक व्यक्ति और दल की तानाशाही । इसके अलावा उन्होंने फासीवाद को तात्विक रूप में न पूंजीवादी बताया और न कुछ और । ‘सतत जारी राष्ट्रवाद’ की ऐतिहासिक निरंतरता को यदि आप पूंजीवाद से जोड़ना चाहे तो भले जोड़ ले, लेकिन आज तक की दुनिया ने इतना तो बता ही दिया है कि राष्ट्रवाद किसी खास शासन व्यवस्था से ही बंधा नहीं है । (देखें - ‘अपने-अपने राष्ट्रवाद’ - https://chaturdik.blogspot.in/2018/02/blog-post_12.html?m=1 ) पूंजीवाद की विश्वात्मकता में तो राष्ट्रवाद तो एक निहायत प्रारंभिक और अंतरिम विचारधारा है । पूंजीवादी माल की प्रकृति में ही राष्ट्रों की सीमाओं को तोड़ने की प्रवृत्ति शामिल है ।

पूंजीवाद को अगर हम सिर्फ अतिरिक्त मूल्य पैदा करने वाली उत्पादन प्रणाली मानेंगे तो अलग बात है । यह अतिरिक्त मूल्य के सामाजिक उत्पादन को पूंजीपति के द्वारा हड़प लेने की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है । कहा जा सकता है कि इसी अतिरिक्त मूल्य को राज्य के नियंत्रण में ला कर एक समतावादी समाज के निर्माण में लगाना समाजवाद है । इन सबके विपरीत, राजशाही जनता के धन पर राजा और दरबार का अधिकार मानती रही है, समाज में असमानता को स्थायी बनाती है, राजा ईश्वर का स्थान ले लेता है ।

ऐतिहासिक तौर पर पूंजीवाद सामंतवाद के खिलाफ व्यक्ति स्वातंत्र्य के झंडे के साथ आया । जैसा कि हमने पहले ही कहा है, इसकी अपनी विश्वात्मकता की खूबी रही कि इसमें एक दौर राष्ट्रवाद का दौर रहा, लेकिन मूलत: यह एक विश्व-व्यवस्था है । इसे ही टेढ़े-मेढ़े रास्ते से इतिहास का आगे बढ़ना कहते हैं । पूंजीवाद के जो असमाधेय अन्तरविरोध है उनमें सबसे प्रमुख यही है कि उत्पादन का तो सामाजीकरण होता है, लेकिन उत्पादन के साधनों की निजी मिल्कियत बनी रहती है । इसीलिये पूंजी की स्वतंत्रता को पूंजीवाद में अनिवार्य तौर पर सबसे पवित्र और अनुलंघनीय माना जाता हैं ।

गौर करने की बात यह है कि पूंजीवाद के इसी बुनियादी अन्तरविरोध से उसमें समय-समय पर नाना प्रकार के संकट पैदा होते हैं । मार्क्स ने समाजवाद-साम्यवाद की स्थापना के जरिये इसी अन्तरविरोध के समाधान का रास्ता बताया था । लेकिन यह भी इतिहास की ही विडंबना है कि संकट में फंसे पूंजीवाद की स्थिति का लाभ उठा कर प्राचीन साम्राज्यों वाली राजशाही की शासन प्रणाली, फासीवाद के रूप में उठ खड़ी होती है । इसके लिये पूंजी की स्वतंत्रता पवित्र नहीं होती है । हिटलर ने उन सभी उद्योगपतियों को भी यातना शिविरों की सैर करवाई या देश छोड़ने के लिये मजबूर किया, जिन्होंने हिटलर के उदय में खुल कर सहयोग किया था । नाजियों के पतन के बाद न्युरेमबर्ग में चले मुकदमे के दस्तावेजों में उन सबकी गवाहियां मौजूद है । हिटलर के काल की जर्मन अर्थ-व्यवस्था पूरी तरह से कमांड अर्थ-व्यवस्था थी । वह पूंजीवादी नहीं थी । (देखें - ‘हिटलर और व्यवसायी वर्ग’ , - https://chaturdik.blogspot.in/2014/03/blog-post_6.html?m=1) हमारे अनुसार फासीवाद संकटग्रस्त पूंजीवाद का राजशाही किस्म का, तानाशाही निदान है ।

इसके अलावा खुद पूंजीवाद के अंदर भी जन-कल्याणकारी राज्य की परिकल्पनाओं से आम जनता पर पूंजीवाद के संकटों के बोझ को कम करने के उपाय किये जाते हैं । इससे यह भ्रम पैदा होता है कि मानो पूंजीवाद भी पूंजी की स्वतंत्रता का हनन करता है । लेकिन यह उसके अस्तित्वीय संकट की एक अभिव्यक्ति भर है, उसकी तात्विक सचाई नहीं ।


दुनिया में फासीवाद के उदय की परिस्थितियों उसके तमाम लक्षणों पर थोड़ी सी गहराई से सोचने पर ही इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि फासीवाद उत्पादन के आधुनिक साधनों और प्रणाली के युग में प्राचीन राजशाही शासन व्यवस्था और उससे जुड़े सामंती मूल्यों का बलात् प्रत्यावर्त्तन है । हर फासिस्ट शासन प्राचीन साम्राज्यों की तरह के ‘गौरवशाली’ राष्ट्र के झंडे के साथ आता है और राजा के रूप में तानाशाह की स्थिति ईश्वर की तरह की मानी जाती है । सारी सत्ता को एक व्यक्ति में न्यस्त कर दिया जाता है । आरएसएस के यहां यह बाकायदा संयुक्त हिंदू परिवार का कर्त्ता है । मोदी के पास जितनी ज्यादा सत्ता होगी, हर संघी उतना ही खुश और उतना ही बड़ा भक्त होगा । यह पूंजीवाद कत्तई नहीं है, जिसमें कम से कम संपत्ति की स्वतंत्रता को अनुलंघनीय और पवित्र माना जाता है । फासिस्टों के लिये किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं होता है । चूंकि यह स्वातंत्र्य की मानव इतिहास की मूल गति के विरुद्ध है, इसलिये इसमें स्वाभाविकता नामकी कोई चीज नहीं है । यह बलात् तत्वों से निर्मित परिघटना है । यह पूंजीवाद का स्वाभाविक विस्तार नहीं है । उसका स्वाभाविक विस्तार तो समाजवाद है । स्वाभाविक रूपांतरण ।

शुक्रवार, 11 मई 2018

'मार्क्सवाद सर्वशक्तिमान है'

(‘हस्तक्षेप’ में इसका शीर्षक है - ‘अग्निपुंज उनके विचार’ )

—अरुण माहेश्वरी

(आज के ‘राष्ट्रीय सहारा’ के ‘हस्तक्षेप’ का चार पृष्ठीय अंक कार्ल मार्क्स के जन्म के दो सौ साल की पूर्ति के अवसर पर मार्क्स पर केंद्रित अंक है । इस अंक की सामग्री को देखते हुए इसे आज के समय के संदर्भ में मार्क्स पर केंद्रित एक काफी महत्वपूर्ण और संग्रहणीय अंक कहा जा सकता है । इसमें जिन लोगों के लेखों को लिया गया है, उनके नाम है - डा. अमर्त्य सेन, प्रभात पटनायक, प्रकाश करात, रामचंद्र गुहा, इरफान हबीब, डी पी त्रिपाठी और अजय तिवारी । इनके साथ ही हमारा भी एक लेख शामिल है । इनके अलावा इसी मौके पर ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका में प्रकाशित उस लेख का हिंदी अनुवाद भी इसमें प्रकाशित किया गया है जो इधर काफी चर्चित हुआ है । ‘इकोनोमिस्ट’ के उस लेख पर हम अपने ब्लाग ‘चतुर्दिक’ में पहले ही चर्चा कर चुके हैं ।
यहां हम अपने लेख को और इस पूरे अंक के लिंक को मित्रों से साझा कर रहे हैं )




लेनिन ने मार्क्स के बारे में अपने प्रसिद्ध निबंध 'मार्क्सवाद के तीन स्रोत तथा तीन संघटक तत्व' (1913) में लिखा था कि “मार्क्स की प्रतिभा इस बात में निहित है कि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध किये, जिन्हें मानवजाति के प्रमुखतम चिंतक पहले ही उठा चुके थे ।” और इसी क्रम में उन्होंने लगभग धर्मशास्त्र की भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा कि “मार्क्स की शिक्षा सर्वशक्तिमान है, क्योंकि वह सत्य है ।”

अभी लेनिन के इस कथन के 105 साल बाद मार्क्स के जन्म के दो सौ साल पूर्ति के समारोह में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी लेनिन की इसी बात को दोहराया कि 'मार्क्सवाद सर्वशक्तिमान है क्योंकि वह सत्य है' ।

विश्व पूंजीवाद की सबसे प्रमुख पत्रिका 'इकोनोमिस्ट' ने इस मौके पर प्रसारित अपने एक लेख 'मार्क्स पर पुनर्विचार : दूसरी बार, प्रहसन' में मार्क्स की विफलताओं का आख्यान लिखने के बावजूद उसे डावोस का, जहां हर साल दुनिया के पूंजीपतियों और अर्थशास्त्रियों का जमावड़ा हुआ करता है, मसीहा बताया है । उदार जनतंत्रवादियों को 'इकोनोमिस्ट' ने चेतावनी दी है कि मार्क्स ने पूंजीवाद के जिन दोषों को बताया था उन्हें समझ कर तुम सुधरो, अन्यथा मार्क्स अपने विचारों के साथ, वो कितने ही फालतू और खतरनाक क्यों न हो, तुम्हें अपदस्थ करने के लिये हमेशा मौजूद है । अर्थात 'इकोनोमिस्ट' ने भी मार्क्स की तमाम विफलताओं का ब्यौरा देने के बावजूद प्रकारांतर से उनकी इस जगत की परिघटना में सार्वलौकिक उपस्थिति को एक सत्य माना है ।

अल्लामा इकबाल की बीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध की प्रसिद्ध शायरी है - ‘इबलीस की मजलिस-ए-शुरा’ ( शैतान के परामर्श-मंडल की बैठक)। इसमें शैतान को उसका एक सलाहकार (तीसरा मुशीर) प्रसंगवश कहता है -
‘‘रूह-ए-सुल्तानी राहे बाकी तो फिर क्या इज्राब
है मगर क्या उस यहूदी की शरारत का जवाब ?’’
(साम्राज्य का गौरव यदि बाकी रहा तो फिर  डर किस बात का, लेकिन उस यहूदी की शरारत का क्या जवाब है?)
उस यहूदी का आगे और हुलिया बताता है कि -
‘‘वो कलीम बे-तजल्ली, वो मसीह बे-सलीब
नीस्त पैगंबर व लेकिन दर बगल दारद किताब’’
(वह प्रकाशहीन आप्त कथन, वह बिना सलीब का मसीहा, नहीं है पैगंबर वह पर उसकी बगल में उसकी किताब है)

इकबाल की शैतानों की मजलिस में जिस खुदा के बिना नूर के ही कलमा कहने वाले, बिना सलीब के मसीहा और पैगंबर न होने पर भी बगल में एक किताब दबाए यहूदी पर चिंता जाहिर की जा रही थी, वह कोई और नहीं कार्ल मार्क्स ही था। वही मार्क्स, जिसकी प्रेरणा से  कभी इकबाल ने ही लिखा था -
‘‘जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर नहीं रोजी
उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो’’ ।

इसीलिये जब आज कोई मार्क्स की विफलताओं का जिक्र करता है कि वे फलाना बात को नहीं देख पाएं, फलाना चीज को नहीं समझ पाएं, उनके विचारों के आधार पर तैयार हुई समाजवादी सरकारें पूरी तरह से बेकार साबित हुई, यहां तक कि उनके अनुयायियों के राज्यों ने ही गैर-समानतापूर्ण समाज के विकास का, पूंजीवाद का रास्ता पकड़ लिया आदि, आदि तो इस पर सबसे पहला सवाल यही उठाया जाना चाहिए कि किसी भी विचार की सफलता या विफलता से आपका तात्पर्य क्या है ? संसदीय जनतंत्र की तमाम विफलताओं के बावजूद उसी रास्ते पर सदियों तक ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन कम्युनिस्ट विचारों के समाजवादी प्रकल्पों की विफलता का मतलब है कि अब उन विचारों पर अमल की कोई कल्पना करना भी अपराध है ! यह एक प्रकार की रूढ़ि नहीं तो और क्या है ? जो चल रहा है, उससे इतर सोचना सबसे बड़ा गुनाह है ! अर्थात अच्छाई का अपना कोई स्वायत्त सत्य नहीं होता, वह महज किसी बुराई के खिलाफ एक लड़ाई होती है ! इसीलिये रूढ़िवाद मार्क्सवाद को खारिज करके विचारों के क्षितिज के ही बाहर कर देने की जिद में हैं, न कि मार्क्सवाद के निरंतर सामाजिक प्रयोगों की निष्ठा में ।

कौन नहीं जानता कि गणित के न जाने कितने प्रमेय बिना किसी सटीक सिद्धांत (उपपत्ति) पर पहुंचे ही सदियों तक गणितज्ञों को प्रेरित करते रहते हैं और साल-दर-साल के निरंतर प्रयत्नों के बाद ही उनकी कोई त्रुटिहीन उपपत्ति मिल पाती है । लेकिन इसके चलते कभी भी उन प्रमेयों को बिना प्रयत्नों के त्याग नहीं दिया जाता है । उसी प्रकार राजनीति और मानव के समाज-विज्ञान के क्षेत्र में भी मानव मुक्ति के किसी भी प्रमेय को त्याग देने में कोई बहादुरी नहीं है । इसके विपरीत इन प्रयत्नों में विफलताओं की शिक्षाओं और उनके तात्पर्यों की प्रक्रिया में ही मानव प्रगति के प्राण बसते हैं । कम्युनिस्ट विचारक एलेन बाद्यू ने अपनी पुस्तक 'कम्युनिस्ट परिकल्पना' में सही कहा है कि “यदि किसी भी परिकल्पना को त्याग नहीं दिया गया है तो उसकी विफलताएं ही उस परिकल्पना के सत्य का इतिहास कहलाती है ।”

कम्युनिस्ट परिकल्पना के बारे में बाद्यू कहते हैं कि व्यवहारिक राजनीति में विचार के सत्य के साथ ही संगठनों और कामों का महत्व होता है । सिर्फ कुछ नामों, मार्क्स, लेनिन, माओ के जाप या क्रांति, समाजवाद, सर्वहारा आदि की बड़ी-बड़ी बातों और जनवादी केंद्रियता, सर्वहारा की तानाशाही की तरह के सिद्धांतों के बखान से कुछ हासिल नहीं होता है । उल्टे इन सबके अतिशय प्रयोग से ये राजनीति में और भी खोखले और महत्वहीन होते जाते हैं । इनमें से अधिकांश चीजें तो कोरे प्रचार के लिये, अपनी हवा बांधने भर के लिये भी होती है । दैनंदिन वास्तविक राजनीति में इन खास प्रकार की बातों की कोई स्वीकृति नहीं है । इनसे सिर्फ इतना पता चलता है कि इनसे जुड़े सत्य का काम जारी है । अन्यथा व्यवहारिक राजनीति के लिये इनका कोई मायने नहीं है ।

इसीलिये मार्क्सवाद के व्यवहारिक प्रयोगों के बारे में माओ त्से तुंग की इस बात का सबसे अधिक महत्व है कि 'साम्राज्यवादियों और प्रतिक्रियावादियों का एक ही तर्क हैं कि जीवन में परेशानी पैदा करो, विफल हो जाओ और फिर परेशानी पैदा करो । लेकिन मुक्तिकामी जनता का तर्क है कि लड़ो, विफल हो, फिर विफल हो, फिर लड़ो, जब तक विजयी नहीं हो जाते । मुक्ति हासिल नहीं कर लेते ।'

समाजवाद की विफलताओं को मार्क्स और मार्क्सवाद की विफलताओं के रूप में देखने के बजाय मार्क्स के द्वारा शोषणविहीन समाज के निर्माण की जो दिशा दिखाई गई, उस दिशा में यात्रा के इतिहास के चरणों के रूप में उन्हें लिया जाना चाहिए । धर्मशास्त्रीय शब्दावली में ही हम कह सकते है कि विमर्श की दृढ़ता ही पूजा है । परमेश्वराभेदप्रतिपत्तिदाढर्यसिद्धये पूजाक्रिया उदाहरणीकृता । कम्युनिस्ट राजनीति में निवेदित प्राण क्रिया और सारे कारको को एक समतावादी समाज की दिशा में देखने के भाव में ही रहने का अभ्यस्त होता है । कह सकते हैं कि उसके लिये कर्त्ता, कर्म, करण, अपादान, सम्प्रदान और अधिकरण आदि के भेद भेद नहीं रहते, अभेद हो जाते हैं ।

अगर मनुष्यता के इतिहास को उसकी मुक्ति के इतिहास की दिशा देनी है तो मार्क्सवाद ही उस पथ का सर्वशक्तिमान, सार्वलौकिक सत्य है । यह किसी खास सामाजिक परिवर्तन का निश्चित  स्वरूप नहीं, उस परिवर्तन के नियम का सिद्धांत है । और इसीलिये, आज भी जब कहने के लिये दुनिया में पुराने प्रकार का एक भी समाजवादी राज्य नहीं रह गया है, मार्क्स की शिक्षाएं पूंजीवाद के तमाम झंडाबरदारों को हमेशा अपने पर लटक रही तलवार की तरह सताती रहती है ।

http://rashtriyasahara.com/mpaper.aspx?eddate=12-may-2018&edcode=17

मंगलवार, 8 मई 2018

क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश को सच को छिपाने की बीमारी है ?

फासीवाद के आगमन का क्लासिक संकेत
-अरुण माहेश्वरी


भारत के मुख्य न्यायाधीश पर संसद में महाभियोग के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में कल जो हुआ उससे फिर एक बार यही पता लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में अभी जो चल रहा है, उसमें काफी कुछ अस्वच्छ और अस्वस्थ है । और, इन सबके मूल में दूसरा कोई नहीं, खुद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा है ।

दीपक मिश्रा को सच को छिपाने और गलत कामों में शामिल होने की पुरानी आदत है, इसके कुछ प्रमाण सामने आने के बाद से ही प्रकट रूप में यह सिलसिला शुरू हुआ और इसके साथ ही उनके इस्तीफे की मांग भी उठने लगी । सीबीआई के पास ओड़ीसा हाईकोर्ट के एक जज की टेलिफोन पर बातचीत का पूरा लेखा उपलब्ध है, जो प्रेस में भी आ चुका है, जिसमें वह जज लखनऊ स्थित एक ट्रस्ट, प्रसाद एडुकेशन ट्रस्ट के मेडिकल कालेज के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च जज से आदेश निकलवा देने की सौदेबाजी कर रहा था । सीबीआई के लिये यह प्रमाण काफी था जिसके आधार पर वह दीपक मिश्रा पर एफआईआर करके जांच शुरू कर सकती थी । लेकिन मोदी सरकार ने न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर को हर प्रकार के संदेह से परे रखने के लिये इस मामले की जांच करने के बजाय सीबीआई के हाथ लगे इन सबूतों का प्रयोग दीपक मिश्रा को ही पिंजड़े का तोता बनाने और उनके जरिये अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने में शुरू कर दिया ।

उधर दीपक मिश्रा ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सबसे पहले तो खुद पर लग रहे आरोपों की जांच को खुद ही रोक दिया और फिर मोदी कंपनी से जुड़े सभी संवेदनशील मामलों को मोदी की पसंद और मुट्ठी के जजों को देना शुरू कर दिया । सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की खुली आपत्ति के बावजूद जज लोया की संदिग्ध हत्या के मामले को खुद के नेतृत्व की बेंच में लेकर उपलब्ध तथ्यों की बिना जांच किये इस मामले पर आगे और जांच की जरूरत से इंकार कर दिया और इस प्रकार अमित शाह को इस अपराध से मुक्त कर दिया ।

इसी बीच दीपक मिश्रा पर ओड़िशा में सरकार से एक जमीन का हथियाने के लिये झूठा शपथपत्र दाखिल करने का मामला भी सामने आया ।

इन तमाम तथ्यों, दीपक मिश्रा की गर्दन सरकार के हाथ में फंसे होने की सचाई और उनकी दूसरी मनमानियों को देखते हुए भारत में विपक्ष की सभी पार्टियों ने यह जरूरी समझा कि न्यायपालिका की स्वच्छता को बनाये रखने के लिये ही इस न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हटाना होगा। इसी उद्देश्य से विपक्ष ने मिल कर राज्य सभा में उनके विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया । लेकिन, कानून और संसदीय मर्यादाओं के प्रति पूरी तरह से बेपरवाह मोदी और उनके कठपुतले, राज्य सभा के अध्यक्ष वैंकय्या नायडू ने विपक्ष के नोटिश पर बिना विचार किये एक दिन में उसे खारिज कर दिया ।

वैंकय्या नायडू के इस असंवैधानिक कदम के खिलाफ ही कांग्रेस दल के दो सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जिस पर सुप्रीम कोर्ट के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने एक दिन सुनवाई की और दूसरे दिन ही इस मामले की आगे सुनवाई के लिये पांच जजों की एक संविधान पीठ का गठन कर दिया गया ।

कल (8 मई को) सुप्रीम कोर्ट में जब संविधान पीठ के सामने कांग्रेस के सांसदों की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने पहला सवाल उठाया कि इस संविधान पीठ का गठन किस आदेश के आधार पर किया गया है ? क्या न्यायाधीश चेलमेश्वर ने ऐसा करने का कोई न्यायिक फैसला सुनाया था ? अन्यथा और किसने और कैसे इसका गठन किया है ? सुप्रीम कोर्ट के नियम के अनुसार पांच सदस्यों की संविधान पीठ के गठन के लिये किसी न्यायिक फैसले का होना जरूरी है । इसे सिर्फ प्रशासनिक निर्णय से गठित नहीं किया जा सकता है । मुख्य न्यायाधीश के पास बेंच गठन करने का प्रशासनिक अधिकार होता है, वह न्यायिक अधिकार नहीं है ।

मजे की बात यह है कि पांच जजों की इस संविधान पीठ को सुशोभित कर रहे जजों के पास इतना सा भी नैतिक बल और ईमानदारी नहीं थी कि वे इस पीठ के गठन के पीछे के फैसले के बारे में याचिकाकर्ता को अवगत करा दें, जबकि किसी भी मामले से जुड़े हर न्यायिक फैसले की जानकारी को पाना हर याचिकाकर्ता का मूलभूत संवैधानिक अधिकार होता है । उन्होंने कपिल सिब्बल को इस जानकारी को देने से साफ इंकार कर दिया । और, सिब्बल ने इसी आधार पर अपनी याचिका वापस ले ली क्योंकि मामले से जुड़े किसी भी न्यायिक फैसले के बारे में अंधेरे में रह कर उनके लिये अपनी दलीलें पेश करना मुमकिन नहीं था । मुख्य न्यायाधीश के दिमाग के फितूर की उपज इस महान संविधान पीठ ने तत्काल याचिका को खारिज कर न्यायपालिका की नैतिकता के बजाय दीपक मिश्रा की रक्षा के अपने पवित्र कर्त्तव्य का पालन किया !

यह सब देख कर यही लगता है कि आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च पद पर ऐसा व्यक्ति बैठा हुआ है जिसका खुद किसी प्रकार की पारदर्शिता पर विश्वास नहीं है और दुर्भाग्य से वह मोदी की तरह के एक तुगलक के हाथ का गुलाम भी है । संसदीय जनतंत्र के रास्ते फासीवाद के उदय की परिस्थिति का यह एक क्लासिक संकेत है ।


शनिवार, 5 मई 2018

कार्ल मार्क्स के जन्म के दो सौ साल और 'विमर्श का उल्लास'

-अरुण माहेश्वरी


कार्ल मार्क्स के जन्म-स्थान जर्मनी के त्रियेर में कल उनके जन्म के 200 साल पूरे होने पर उनके घर के सामने पांच मीटर ऊंची एक मूर्ति की स्थापना की गई । इस घर में उन्होंने अपनी उम्र के प्रारंभिक 17 साल गुजारे थे । त्रियेर शहर को यह मूर्ति चीन की सरकार की ओर से भेंट की गई है ।

त्रियेर शहर की सिटी कौंसिल के सामने जब चीन की ओर से इस भेंट का प्रस्ताव आया था, उसे लेकर कौंसिल में काफी बहस हुई थी और अंत में 42-7 मतों से चीन की इस भेंट को स्वीकारने का फैसला किया गया ।

कल जब त्रियेर में इस मूर्ति की स्थापना हुई उस समय भी बड़ी संख्या में त्रियेर के नागरिक वहां उपस्थित हुए थे और ‘पूंजीवाद मुर्दाबाद’ तथा ‘हर तानाशाह का पिता’ की तरह के परस्पर-विरोधी नारे भी लगाए जा रहे थे ।
और कहना न होगा, ‘विमर्श के उस उल्लास’ के बीच भी मननशील मार्क्स उस मूर्ति में ऐसे लग रहे थे मानो अभी-अभी पुस्तकालय से निकल कर इस दुनिया को अपने अंतर की गहराइयों में उतार कर इसके दृश्य-अदृश्य, सब रूपों का अवगाहन कर रहे हो ।

मूर्ति के विमोचन के वक्त त्रियेर के मेयर वोफाम लेब ने कहा कि ऐतिहासिक विवादों को हमें स्वीकारना चाहिए । राइनलैंड-पैलेतिनेत राज्य के प्रधानमंत्री ने इस मौके पर कहा कि - हां, हम अपने शहर के इस बेटे के साथ हैं । दोस्ती के प्रतीक के रूप में इस उपहार को स्वीकार करके भी हम खुश हैं ।

गौर करने की बात है कि मार्क्स के जन्म के 200 सालों की पूर्ति पर ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका ने भी मार्क्स के बारे में एक लंबा लेख ‘मार्क्स पर पुनर्विचार : दूसरी बार, एक प्रहसन (Reconsidering Marx Second time, farce) जारी किया है जिसमें अपेक्षित रूप में ही मार्क्स को लगभग कोसते हुए भी उनकी तमाम कमियों के बावजूद उन्हें पूंजीवाद के संकट के काल में किसी ऐसे ईश्वरीय दूत की तरह पेश किया गया है जो भले दुनिया की किसी समस्या का समाधान न दे सके, लेकिन असहाय मनुष्य उसकी शरण में पहुंचने के लिये मजबूर हो जाता है । ‘इकोनोमिस्ट’ ने आज की दुनिया में मार्क्स के इस ‘पूज्य’ रूप को पूंजीवादी उदारवाद के लिये खतरे की सबसे बड़ी घंटी बताया है जिसकी शरण में जाकर लोग उसके द्वारा सजाये गये इस बाग को नष्ट कर सकते हैं । ‘इकोनोमिस्ट’ के इस लेख का अंतिम पैराग्राफ है - “ आज का सबसे बड़ा सवाल है कि क्या उन उपलब्धियों को (पूंजीवाद की उपलब्धियों को -अ.मा.) फिर से दोहराया जा सकता है । पूंजीवाद का विरोध बढ़ रहा है - सर्वहारा की एकजुटता के बजाय आम आक्रोश के रूप में ज्यादा । अभी के उदारवादी सुधारक इन संकट को समझने और इनका समाधान खोजने के मामले में अपने पूर्ववर्तियों से दुखदायी तौर पर हीन साबित हो रहे हैं । उन्हें मार्क्स के जन्म की 200वीं जयंती का इस्तेमाल करके उस महान व्यक्ति से अपने को फिर से परिचित करना चाहिए - इस व्यवस्था के जिन गंभीर दोषों को उन्होंने जबर्दस्त ढंग से पकड़ा था, सिर्फ उनको समझने के लिये ही नहीं, बल्कि इस बात को याद रखने के लिये भी कि यदि वे इन दोषों का मुकाबला नहीं कर पाते हैं तो उनके सामने आगे कितनी बड़ी तबाही खड़ी है । “

(Today’s great question is whether those achievements can be repeated. The backlash against capitalism is mounting—if more often in the form of populist anger than of proletarian solidarity. So far liberal reformers are proving sadly inferior to their predecessors in terms of both their grasp of the crisis and their ability to generate solutions. They should use the 200th anniversary of Marx’s birth to reacquaint themselves with the great man—not only to understand the serious faults that he brilliantly identified in the system, but to remind themselves of the disaster that awaits if they fail to confront them.)

जाहिर है, विश्व पूंजीवाद की प्रमुख पत्रिका ‘इकोनोमिस्ट’ ने स्वाभाविक तौर पर मार्क्स को ऐसे देवदूत के रूप में याद किया है जो संकट के वक्त किसी भूत की तरह लोगों पर सवार हो कर दुनिया की वर्तमान ‘सुंदर बगिया’ को तहस-नहस कर देने का कारण बन सकता है ।

हमें मार्क्स को केंद्र में रख कर दिखाई दे रहे इस पूरे विवाद में ‘विमर्श का वह उल्लास’ नजर आता है जिसके परिवेश में हमारे अभिनवगुप्त के अनुसार सभी आचरण साधक को उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ाते हैं । (प्रत्येकं बहु प्रकारं निरूढि:) । जहां अपूर्णता होती है, वहां यदि फलवत्ता नहीं होती, तो पूर्णता में फल की कल्पना भी नहीं होती । इसीलिये अभिनव ने निश्चय की उपलब्धि को निरूढ़ि कहा है, रूढ़ियों के बंधनों से मुक्ति की प्रक्रिया । इसमें फिर भक्ष्या-भक्ष्य के, शुद्ध-अशुद्ध के विवेचन का पचड़ा नहीं होता है । (यथा यथा भवति तथैव आचरेत्, न तु भक्ष्यशुद्ध्यादिविवेचनया) । (तंत्रसारः, चतुर्थमाह्निकम्)   हम ऐसे विमर्श के उल्लास का स्वागत करते हैं ।

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (33)


-अरुण माहेश्वरी
फायरबाख के आधिभौतिक भौतिकवाद से मुक्ति

(आज कार्ल मार्क्स के जन्म के 200 साल पूरे हो गये हैं । काफी दिनों के अंतराल पर फिर एक बार हम मार्क्स के जीवन के बारे में अपने प्रकल्प पर लौट रहे हैं, जिसे हमने उनके द्विशताब्दी वर्ष के प्रारंभ में शुरू करने का बीड़ा उठाया था । हमने इसकी कई किश्ते लिखी, लेकिन नाना कारणों से यह आठ महीने पहले बीच में ही छूट गया । इसके मूल में इस विषय की अपनी विशेष जरूरतों का एक दबाव भी रहा, जिसे हम पूरी तरह से व्याख्यायित नहीं कर सकते हैं । किसी भी लेखन के साथ लेखक के अपने संतोष-असंतोष का सवाल अनिवार्य तौर पर जुड़ जाता है। जो भी हो, देखते-देखते पूरा साल बीत गया । अब फिर हम मार्क्स के 201वें जन्मदिन से इसे आगे बढ़ाने की कोशिश करना चाहते हैं। इतने दिनों के अंतराल के बाद एक ऐसे लेखन से तालमेल बैठा पाना किसी भी पाठक के लिये कितना कठिन हो सकता है, इसे हम समझ सकते हैं । इसके लिये हम सभी पाठकों से क्षमा-प्रार्थी है । अंतिम किश्त 13 अगस्त के दिन जारी की गई थी । इसके बाद दिल्ली प्रवास की मजबूरी और दूसरे तात्कालिक विषयों के दबाव को न टाल पाने की अपनी प्रकृति के कारण भी इस जरूरी काम में व्यवधान आते गये । हमारा लिखना तो बदस्तूर पुरदम जारी रहा, लेकिन यही विषय छूटता चला गया । अब फिर एक बार, कुछ और तैयारियों के साथ साहस जुटा कर इस काम को शुरू कर रहा हूँ । आगे और व्यवधानों की संभावनाओं से इंकार नहीं कर सकता, लेकिन यथासंभव कोशिश रहेगी कि भले रुक रुक कर ही क्यों न हो, यह काम जारी रहे । बूंद-बूंद से ही समुद्र नहीं तो घड़ा ही भर जाए तो वह शायद कुछ काम का साबित हो जाए । )

पिछली किश्त में हम मार्क्स-एंगेल्स की कृति 'पवित्र परिवार' के बारे में चर्चा कर रहे थे । मार्क्स की सर्वहारा विश्वदृष्टि की आधारशिला को तैयार करने में इस कृति की एक अहम भूमिका थी । फिर भी यह मार्क्स के विचारों के पूरे महल के निर्माण में एक प्रकार का नींव का पत्थर ही थी । अभी इस पर उनकी इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का और वैज्ञानिक साम्यवाद के मूलभूत सिद्धांतों का निरूपण होना बाकी था । अब तक भी मार्क्स, एंगेल्स अपने पूर्वजों, जिन्हें कहा जा सकता है अपने गुरुओं के प्रभाव के दायरे से निकल कर अपनी स्वतंत्र विश्व-दृष्टि को प्राप्त करने से काफी दूर थे । अभी वे पुराने प्रभावों से मुक्ति के लिये जूझ रहे थे ताकि विचार के अपने नये वृत्त में प्रवेश कर सके । अब भी अपने और पूर्ववर्ती सिद्धांतकारों के बीच के फर्क की सीमा-रेखा निर्धारित नहीं कर पाए थे । इनमें खास तौर पर हम फायरबाख का उल्लेख कर सकते हैं। फायरबाख के पुराने प्रकार के भौतिकवादी दर्शन की कमजोरियों से मार्क्स, एंगेल्स मुक्त नहीं हो पाये थे इसीलिये वे अपने को फायरबाख का अनुयायी और उनके अर्वाचीन विचारों के 'सच्चे मानवतावादी' समर्थक कहा करते थे ।
लुडविग फायरबाख

लेकिन यह सच है कि इसके साथ ही वे मूलगामी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी विचारों की दिशा में, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की दिशा में कदम बढ़ा चुके थे । उनके द्वारा प्रयुक्त पदावली में नये अर्थ दिखाई देने लगे थे । बहुत तेजी के साथ उनमें पहले के भौतिकवाद के आधिभौतिक चरित्र और उसकी आंतरिक असंगतियों के प्रति असंतोष दिखाई देने लगा था ।

'भौतिकवाद का आधिभौतिक चरित्र' ! अर्थात प्रकृति की प्राथमिकता को इस हद तक निर्णायक मान लेना जिसमें चेतना की कोई भूमिका ही न रहे, ईश्वरीय नियतिवाद का ही प्रतिरूप — प्रकृति-पूजा का नियतिवाद !

हमारे भारतीय दार्शनिक अभिनवगुप्त बिल्कुल इसी बिंदु पर अपने को सांख्य दर्शन के प्रकृतिवाद से अलग करते हैं और सांख्य दर्शन को विज्ञान-शून्य कहते हैं । उन्होंने लिखा कि क्षोभ के उदय होने से ही विभिन्न कार्यों का उदय होता है । बिना वैषम्य आये, कार्य की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि कारण ही उत्पन्न नहीं रहता। जड़ कारण क्षोभ के बिना कार्यान्तर की उत्पत्ति नहीं कर सकता । अतः उनके अनुसार सीधे प्रकृति से उत्पत्ति मानना बुद्धिमानी नहीं है और इसीलिये उन्होंने अपने तंत्रालोक में साफ शब्दों में कहा कि सांख्य दर्शन का गुणों की उत्पत्ति का सिद्धांत इस विज्ञान से शून्य हैं ।
“क्षुब्धात प्रधानात कर्त्तव्यान्तरोदयः । न अक्षुब्धादिति । क्षोभः अवश्यमेव अन्तराले अभ्युपगन्तव्य इति सिद्धं सांख्यापरिदृष्टं पृथरभूतं गुणतत्वम् ।” (तंत्रसारः, अष्टममाह्निकम्, द्वितीय खंड, चौखंभा सुरभारती प्रकाशन, पृष्ठ — 36-37)

फायरबाख के चिंतन में इसी क्षोभ के तत्व की, द्वंद्वात्मकता की अनुपस्थिति के कारण मार्क्स उनके काल्पनिक चिंतन और सर्वहारा के यथार्थ दृष्टिकोण के बीच के मूलभूत फर्क को देखने लगे थे । 1845 के अप्रैल में मार्क्स ने “ फायरबाख पर थिसिस“ शीर्षक अपने दो पन्ने के नोट में फायरबाख के दार्शनिक विचारों पर कटु विचार व्यक्त किये थे । उनके इस नोट को वस्तुतः फायरबाख से उनकी स्वतंत्रता का घोषणापत्र कहा जा सकता है ।

इसके पहले कि हम 'पवित्र परिवार' के कुछ खास पक्षों, मार्क्स की खंडन-मंडन की अनोखी शैली पर ठोस रूप से गौर करे, हमें अपने गुरुओं से मुक्ति की श्रृंखला में ब्रुनो बावर के साथ मार्क्स के संबंधों की पृष्ठभूमि पर कुछ विस्तार से विचार करना उचित लगता है । इससे उनके स्वतंत्र चिंतक के रूप में निर्माण के प्रारंभिक बिंदुओं की हमें और भी अच्छी समझ हासिल हो सकती है । अभिनवगुप्त कहते हैं कि साधक का शाम्भवयोग, अर्थात उसका स्वयं शिव में रूपांतरण तभी संभव है जब वह गुरुमंत्रों के जाप (आणवयोग) और ज्ञान की विभिन्न धाराओं से प्रभाव ग्रहण करता हुआ (शाक्तयोग) से आगे बढ़ कर सीधे अपने शिव से संबंध जोड़ लेता है (शांभवयोग) । उसके बाद मंत्रों का जाप या पूजा-पाठ अथवा कोरी पुनरुक्ति उसे जहर समान लगने लगते हैं । इसीलिये जरूरी है कि मार्क्स के निर्माण का कोई भी आख्यान उनकी अपने गुरुओं से मुक्ति की प्रक्रिया के आख्यान को छोड़ कर नहीं लिखा जा सकता है ।

बहरहाल, बर्लिन में प्रवास के काल में डाक्टर्स क्लब की बैठकबाजियों में ब्रुनो बावर के साथ मार्क्स की मुलाकातों पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं । 1839 से 1841 के बीच जब मार्क्स अपने शोध पत्र की तैयारियां कर रहे थे, उस समय ब्रुनो बावर उनके सबसे करीबी मित्र और सलाहकार हुआ करते थे । बाइबल की मूलगामी आलोचना और हेगेल के दार्शनिक विचारों के प्रति एक समझौताहीन धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण की वजह से उन दिनों वे काफी लोकप्रिय हो चुके थे । मार्क्स से उनकी जब मुलाकात हुई तब वे बर्लिन विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र के विभाग में अस्थायी लेक्चरर थे । मार्क्स ने 1836 में उनके लेक्चर सुने थे । डाक्टर्स क्लब में तो मुलाकात थी ही ।

ब्रुनो बावर

बावर को 1839 में कुछ छुद्र धर्मशास्त्रियों की आलोचना करने की वजह से बर्लिन विश्वविद्यालय से हटा कर बॉन भेज दिया गया था । मार्क्स ने 1841 के अप्रैल महीने में अपना शोध पत्र जमा कराके बॉन में बावर से मिले थे । लेकिन 1842 में बावर को बॉन विश्वविद्यालय से भी हटा दिया गया और इसके साथ ही मार्क्स की भी शिक्षा जगत में जाने की संभावना खत्म हो गई । बावर वापस बर्लिन लौट गये और मार्क्स कोलोन शहर में आए जहां चंद रोज पहले ही शुरू हुए अखबार ह्राइनेशे ताइतुंग (Rheinische Zeitung) 'ह्राइनिश समाचार पत्र' से जुड़ गये ।

इस काल में प्रशिया के राजा की मृत्यु के बाद अनुदारवादियों का दबदबा बढ़ा हुआ था और इसीलिये राजनीति के क्षेत्र में तीखी वैचारिक टकराहटें दिखाई दे रही थी । मार्क्स ह्राइनेशे ताइतुंग के जरिये उस दौर के राजनीतिक विचारधारात्मक संघर्ष में पूरे उत्साह से शामिल हो गये । और इसके साथ ही शैक्षणिक दुनिया से दूर मार्क्स एक तीखी दृष्टि संपन्न राजनीतिक टिप्पणीकार के रूप में उभर कर सामने आ गये । शैक्षणिक जगत पीछे छूट गया ।

जहां तक बावर का सवाल है, 1839 के बाद से ही मार्क्स को लिखे गये उनके पत्रों से पता चलता है कि उन्होंने अपने से मार्क्स के अभिभावक की भूमिका अपना ली थी । दिसंबर 1939 में मार्क्स को लिखे अपने  एक पत्र में वे मार्क्स की लेखनी के तीखे तेवरों को देख कर यह चिंता जाहिर कर रहे थे कि कहीं मार्क्स एक प्रकार के बुद्धि-विलासी न बन जाए । वे हेगेल की कृति 'साइंस आफ लॉजिक' में प्राणी-सत्ता से सार-तत्व में संक्रमण की बात में दोष की चर्चा करते हुए साथ में यह सलाह भी दे रहे थे कि पहले तुम अपने शोध-प्रबंध के काम को पूरा कर लो । जब मार्क्स ने अपना शोध-प्रबंध जमा किया, तब भी बावर ने उनसे कहा था कि वह अपने किसी भी चीज को देख कर नाहक उत्तेजित न हो । मार्क्स ने 6 अप्रैल 1839 को अपना शोध-पत्र जमा करते हुए दर्शन विभाग के डीन से एक पत्र में निवेदन किया था कि उनके प्रबंध की जांच में विलंब न किया जाए । मजे की बात यह रही कि 6 अप्रैल को मार्क्स के जमा करने के नौ दिनों बाद ही, 15 अप्रैल को मार्क्स को विभाग की ओर से डाक्टरेट का डिप्लोमा भेज दिया गया ।

उन दिनों मार्क्स पर बावर का प्रभाव इस तथ्य से जाहिर होता है कि अपने शोध प्रबंध के प्राक्कथन में उन्होंने दर्शनशास्त्र के हवाले से लिखा था कि वह उन सभी स्वर्ग के और धरती के देवताओं से नफरत करता है जो “मानवीय आत्म-चेतना को सबसे बड़ा ईश्वरीय वरदान के रूप में देखने से इंकार करते हैं ।” (MECW, Vol.1. page – 30)
(Philosophy makes no secret of it. The confession of Prometheus — In simple words, I hate the pack of gods (Aeschylus, Prometheus Bound).— is its own confession, its own aphorism against all heavenly and earthly gods who do not acknowledge human self-consciousness as the highest divinity.)

हेगेल के बारे में बावर के अध्ययन इसी 'आत्म चेतना' पद का एक केंद्रीय स्थान था । बावर जिसे 'विशिष्टता' अथवा 'सार्वलौकिकता' को हासिल करने की प्रक्रिया कहते हैं उसमें यह आत्म ही विशेष और सार्वलौकिकता के बीच की द्वंद्वात्मक खाई को धारण करता है । यह आदमी की एक प्रकार की तन्मयता है, जिसमें खास ही सार्वलौकिकता का रूप ले लेता है । मननशील व्यक्ति ही उन गुणों को आयत्त कर पाता है जिसे हेगेल एक प्रकार का परम भाव (absolute spirit) कहते हैं । एक तन्मयीभाव, महाभाव । बावर ने जिसे आत्म चेतना का अनंत विकास कहा था उसमें बाह्य ऐतिहासिक यथार्थ की प्रगति भी व्यक्त होने लगती है जिसे व्यक्ति अपनी उपलब्धि समझने लगता है । हमारे यहां अनुभवगुप्त इस तन्मयीभाव को कैवल्य (एक निश्चय) को अधिगत करने का महाप्रयास कहते हैं (विद्याधिपते, अनुभवस्तोत्रे महान संरम्भः) और कहते हैं कि बिना किसी दुराग्रह के इसके अनुरूप आचरण करना चाहिए, निश्चय करना ही निरूढ़ि है।(एवं विधे यागादौ योगान्ते च पञ्चके प्रत्येकं बहु प्रकारं निरूढ़िः यथा यथा भवति तथैव आचरेत्)

बहरहाल, बावर की इस 'आत्म चेतना' की अवधारणा में खुद को हेगेल से अलग दिखाने की उनकी महत्वाकांक्षा भी काम कर रही थी । हेगेल के चिंतन के इसी पहलू की वजह से संरक्षणवादी हेगेलपंथी मानते थे कि हेगेल के चिंतन में एक अलौकिक ईश्वर का स्थान बना हुआ था । बावर ने उनकी स्थिति को याद करते हुए 1840 में लिखा था कि “हेगेल के शिष्य विचारों के साम्राज्य में एक अनश्वर ईश्वर की तरह के किसी पिता की छाया में रह रहे थे । इन विचारों को उनके गुरु ने उन्हें विरासत में सौंपा था ।”   (Bruno Bauer, The Trumpet of last judgement against Hegel the atheist and anti-Christ, An Ultimatum, Lawrence Stepelevich, Lewisten, Edwin Mellen Press,1989, (1841), page- 189-190 ; Stedmen Jones,  उपरोक्त – page – 92-92)

(क्रमशः)     

मंगलवार, 1 मई 2018

हमारे समय के प्रमुख वामपंथी सार्वजनिक बुद्धिजीवी डा. अशोक मित्रा नहीं रहे

—अरुण माहेश्वरी

डा. अशोक मित्रा हमारे बीच नहीं रहे । आज सुबह कोलकाता के एक अस्पताल में 90 साल की आयु में लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया ।

डा. मित्रा का जाना अपनी मनीषा में एक अर्थशास्त्री, राजनेता, वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार, पत्रकार, स्तंभकार से लेकर मजदूर और किसान तक के मनोभावों को एक साथ जीने और उन्हें बेलाग और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने वाले हमारे समय के एक प्रमुख सार्वजनिक बुद्धिजीवी के जाने की तरह है । उनके पास यदि पुस्तकों से मिले ज्ञान का अकूत खजाना था तो 'कविता से लेकर जुलूस तक' पसरे हुए जीवन के आवेग और उच्छल उत्साह की भी कोई कमी नहीं थी । अपने समय के प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर अपनी बात को पूरे अधिकार के साथ कहने में वे जरा भी विलंब नहीं करते थे । अपनी पुस्तक ‘Terms of Trade and Class Relations (1977)’ को, जिसे हिंदी में मैकमिलन ने 'विनिमय की शर्तें और वर्ग संबंध'(1982) शीर्षक से प्रकाशित किया था, उन्होंने उन लोगों को समर्पित किया था 'जिन्होंने आस्था नहीं खोई' ।

उनकी यह पुस्तक सत्तर के दशक के उस जमाने में परंपरागत अर्थशास्त्रीय चर्चाओँ को उसकी रूढ़िबद्धता से निकालने की एक महत्वपूर्ण कोशिश थी । आज के समय के सबसे लोकप्रिय अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने जिस प्रकार आय और संपत्ति के बटवारे में गैर-बराबरी के विषय को अभी अर्थशास्त्र के केंद्र में स्थापित करने का महत्वपूर्ण काम किया है, हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि डा. मित्र ने तभी अपनी उस पुस्तक में इस बात को स्थापित किया था कि परिसंपत्ति और आय के वितरण में असमानता के सवाल को केंद्र में बिना रखे अर्थनीति संबंधी चिंतन निर्रथक है । उन्होंने बाजार के दोषों को उजागर करते हुए यह कहा था कि वह अर्थनीति की समस्याओं की कोई रामवाण दवा नहीं है । बाजार-पूजक अर्थशास्त्र पर उनका आरोप था कि उनके यहां यह सवाल उठाना भी निषिद्ध है कि आखिर बाजार में मांग के अवयव क्या है । मांग का चरित्र भी समाज की वर्गीय सचाई को, जनता की क्रय शक्ति और उनकी आर्थिक स्थिति को जाहिर करता है । वर्गों में विभाजित समाज विक्रेता और क्रेता में विभाजित समाज होता है । किसी की क्रय शक्ति का ज्यादा और किसी का कम होना अकारण नहीं होता है । मालों की कीमतें आय के वितरण का साधन है और कीमतों में वृद्धि हमेशा विक्रेताओं के पक्ष में आय में वृद्धि को सुनिश्चित करती है ।

ऐसे तमाम मानकों पर सरकारी नीतियों को परखने के कारण ही डा. अशोक मित्र की तरह के अर्थशास्त्री सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बने रहने के बावजूद प्रतिष्ठानों को जड़ होकर मृत होने से बचाने के कारक की भूमिका अदा करते रहे और इस प्रकर तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी नाउम्मीदी को निराशा के बजाय एक अलग प्रकार के साहस में बदलने की भूमिका अदा करते रहे ।

डा. मित्रा विश्व बैंक, भारत सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकारों के अलावा 1977 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के गठन के बाद शुरू के सबसे उपलब्धिपूर्ण दस साल तक पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री और बाद में राज्य सभा के सांसद भी रहे । लेकिन यह सच है कि प्रशासनिक संस्थानों से इतने लंबे जुड़ाव के बावजूद डा. मित्रा के चिंतन पर सांस्थानिक जड़ता कभी हावी नहीं हुई, बल्कि वे उन विरल लोगों में थे जिनके जरिये संस्थाएं भी अपनी गतिशीलता को बनाये रखती है । आज जब हम भारत की संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं तो यह डा. मित्रा की तरह के लोगों का ही कर्त्तृत्व है जो आज तक इनकी सामाजिक प्रासंगिकता को किसी न किसी रूप में बनाये हुए हैं ।

डा. मित्रा नियमित और विपुल लिखने वाले अर्थशास्त्री और लेखक थे । कोलकाता के सबसे लोकप्रिय आनंदबाजार समूह के अखबार, 'आनंदबाजार पत्रिका' और 'टेलिग्राफ' के पृष्ठों पर वर्षों तक उनके लेख प्रकाशित होते रहे । उनका स्तंभ 'कलकत्ता की डायरी' तो इतना लोकप्रिय हुआ था कि उसके लेखन को पुस्तकाकार में भी काफी सम्मान और चाव के साथ पढ़ा जाता है । भारत में आर्थिक-सामाजिक विषयों की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका 'इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली ' के भी वे काफी वर्षों तक नियमित लेखक और स्तंभकार रहे । अंग्रेजी और बांग्ला, दोनों भाषाओं में उनकी पैठ के तो उनके वैचारिक विरोधी भी मुरीद रहे हैं । हम भी उन सौभाग्यशालियों में थे जिन्हें उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने और उनके साथ विचार-विमर्श करने के कुछ अवसर मिले थे।

डा. मित्रा इधर के दो-चार सालों से काफी बीमार चल रहे थे, इसीलिये समसामयिक विषयों पर उनकी टिप्पणियां पढ़ने को नहीं मिल रही थी । अभी के कठिन समय में उनके जैसे एक प्रखर बुद्धिजीवी का चला जाना निश्चित तौर पर भारत के बौद्धिक जगत की एक बड़ी क्षति है । डा. मित्रा की पत्नी गौरी का निधन दस साल पहले ही हो गया था । आज उनकी स्मृतियों के प्रति हम गहरी श्रद्धा के भाव से नमन करते हैं ।             

विकल्प गर्भ में स्थापित हो चुका है

अरुण माहेश्वरी


जो लोग संघियों के खुद को सांत्वना देने वाले इस प्रचारमूलक सवाल को अक्सर दोहराते रहते हैं कि 2019 में उनका कोई विकल्प कहां है, यह पोस्ट उन मासूम जनों के लिये है :

1. कोई भी नई चीज तभी नजर आती है जब वह ठोस रूप में सामने आ चुकी होती है । उसके पहले तक हर चीज हवा में होती है — अदृश्य, गर्भ में रूप ग्रहण करती हुई । काल के निश्चित संयोग पर ही वह पूर्ण आकार ग्रहण करके सामने आती है । जब तक 2019 के चुनाव नहीं हो जाते, तब तक उन अधिकांश लोगों को, जो दृश्य की सीमा के परे देख पाने में असमर्थ हैं, वह नजर नहीं आयेगा ।

2. गर्भ से निकल कर बाहर आने के पहले, प्रचार तंत्र की झूठी स्कैन रिपोर्टों के प्रभाव से मुक्त हो कर, स्वतंत्र रूप से इस अदृश्य को खुद देख पाने के लिये जरूरी है कि आपमें लक्षणों को पढ़ने की कूव्वत हो । इसके लिये इतिहास के बनते हुए ठोस क्रम पर नजर डालने की जरूरत है ।

3. अब तक यह साफ है कि 2019 के चुनाव में मोदी के खिलाफ विपक्ष के दलों की अधिकतम एकता कायम होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है । विपक्ष की सभी राजनीतिक पार्टियों में, यहां तक कि शिव सेना और तेलुगु देशम की तरह की एनडीए के अंदर की पार्टियों में भी मोदी-विरोधी मोर्चे में शामिल होने की समझदारी कायम हो चुकी है । वामपंथी भी अब अपनी दुविधाओं से मुक्त हो गये हैं । और विपक्ष की एकता का अर्थ क्या है इसे यह अकेला तथ्य ही बता देने के लिये काफी है कि 2014 में भाजपा को सिर्फ 31 प्रतिशत मत मिले थे, और अन्य दलों को 69 प्रतिशत ।

4. विपक्ष की एकता मात्र कितना बड़ा करिश्मा कर सकती है इसे पिछले दिनों यूपी के गोरखपुर और फूलपुर सहित अनेक उपचुनावों में देखा जा चुका है । जिस गुजरात विधान सभा में भाजपा को 2012 में राज्य की 182 सीटों में 115 सीटें मिली थी, वह 2017 में घट कर सिर्फ 99 रह गई, बहुमत से सिर्फ सात सीटें ज्यादा । इसके लिये उन्होंने पूरी केंद्र सरकार और अरबों-खरबों के संसाधनों को झोंक दिया था । अर्थात, मोदी के कार्यकाल में भाजपा के पास पूंजीपतियों से सबसे अधिक रुपये जरूर आए हैं, लेकिन जनता के बीच उनकी साख में लगातार गिरावट आई है । मोदी आज की राजनीति के सबसे बड़े उपहास के चरित्र हैं ।

5. इसके अलावा राहुल गांधी को लगातार गालियां देते हुए उन्हें 'पप्पू' बताने के संघी प्रचार का भी एक असर है कि लोगों को विपक्ष के पास मोदी के स्तर के मूढ़ शासक का भी कोई विकल्प नहीं दिखाई देता है । हांलाकि गुजरात चुनाव के बाद से इस मामले में भी स्थिति थोड़ी बदली है । जो मोदी-शाह कांग्रेस-मुक्त भारत का शोर मचा रहे थे, उनके आका मोहन भागवत ने ही खुद को उस ढेंचूपन से अलग कर लिया है ।

6. राहुल गांधी और कांग्रेस आने वाले दिनों में कैसे एक राष्ट्रीय विकल्प के केंद्रीय स्थान को ज्यादा से ज्यादा घेरते जायेंगे, इसे आगे आने वाले प्रमुख राजनीतिक घटना क्रमों से बड़ी आसानी से देखा जा सकता है । हम जब चुनावी विकल्प की बात कर रहे हैं तो राजनीतिक घटना-क्रम से हमारा तात्पर्य भी चुनावी घटना-क्रम ही होता है । अभी चंद रोज में कर्नाटक के चुनाव होने वाले हैं । उसके बाद 2019 के पहले मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़ और राजस्थान के चुनाव होंगे । इन चारो चुनावों में मोदी को चुनौती देने वाली पार्टी अकेले कांग्रेस ही है । यदि इन सब में कांग्रेस विजयी होती है तो 2019 तक आते-आते वह स्थिति बन जायेगी, जब पूरी मोदी कंपनी को राहुल गांधी और कांग्रेस का भूत नींद में भी सताने लगेगा । और आज जो तमाम संघी 'विक्लपहीनता' की काल्पनिक छाया तले चैन से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, तब उनके होश उड़ते देर नहीं लगेगी । लेकिन तब तक बाजी प्रायः उनके हाथ से निकल गई होगी !

7. इसीलिये, 'विकल्प नहीं है' की बातें संघियों के लिये चैन की जगहें भर हैं जिन्हें उनका दलाल मीडिया उनके लिये हर रोज तैयार किया करता है । मोदी कंपनी इस मौज में रहें और बचे हुए दिनों में कुछ और देशों की यात्रा कर आएं तो कोई हर्ज नहीं है । लेकिन इन पांच सालों में इन्होंने भारत के साधारण लोगों को जितना सताया है, उसका हिसाब लेने का समय बहुत दूर नहीं है । यह तय है कि उनके दिन लद गये हैं और समग्र परिस्थिति में उनके विकल्प का गर्भ पड़ चुका है, बस चुनाव के मुहुर्त पर उसे जन्म ले कर धरती पर उतरना बाकी है । 


 

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

यह भारतीय राजनीति की अनंत संभावनाओं का संकेत है !

हैदराबाद में सीपीआई(एम) में येचुरी की लाइन की जीत पर :

—अरुण माहेश्वरी


हैदराबाद में सीपीआई(एम) की बाईसवीं कांग्रेस (18-22 अप्रैल 2018) में जो हुआ, वह कोई साधारण बात नहीं है । आज के जिस दौर में हम राजनीति में सिर्फ शरीर की शक्ति, छप्पन इंच, संख्या बल और जिसकी लाठी उसकी भैंस के तत्व के 'खुला खेल फर्रूखाबादी' को देखने के अभ्यस्त हैं, राजनीति में विचार, विवेक, तर्क और चेतना शक्ति की भूमिका को ही हम भूलते जा रहे हैं, उस दौर में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद सीताराम येचुरी की अल्पमत की लाइन का विजयी होना, सिर्फ सीपीआई(एम) में तर्क और विवेक की, राजनीति के यथार्थ-बोध और विचारधारात्मक लक्ष्यों के बीच संगति की विजय की घटना नहीं है, यह राजनीति मात्र के लिये सामान्य रूप से एक उल्लेखनीय बात है ।

सीपीआई(एम) के वयोवृद्ध, चौरानबे वर्षीय नेता अच्युतानंदन, जो पार्टी के स्थापनाकर्ताओं में जिंदा दो नेताओं में से एक हैं, ने पार्टी की इस कांग्रेस के अनुभव के बाद कहा कि “1964 में हमने एक राजनीतिक सदिच्छा के साथ सीपीआई से अलग हो कर सीपीआई(एम) की यात्रा शुरू की थी और आज फिर मैं यह कह सकता हूं कि हम वैसी ही राजनीतिक सदिच्छा के साथ कामरेड सीताराम येचुरी के नेतृत्व में सांप्रदायिक फासीवाद के विरूद्ध जनता की व्यापकतम लड़ाई की दिशा में उतरने के लिये तत्पर हैं ।”

सीपीआई(एम) में पिछले कई सालों से एक खास प्रकार की संकुचित 'क्रांतिकारी' समझ से चिपके लोगों का बहुमत रहा है, जो देश के राजनीतिक यथार्थ से पूरी तरह से कट कर अपनी क्रांतिकारी पृथकता की साधना में आत्मलीन होते जा रहे थे । राजनीति में नाना प्रकार के गठजोड़ों-मोर्चों और सरकारों के खट्टे-मीठे अनुभवों के बाद अंत में वह सिर्फ वामपंथी शक्तियों के संकुचित मोर्चे में ही अपने लिये सुख-चैन की जगह देखने लगा था । संसदीय जनतंत्र में काम करने के अपने इतने सालों के समृद्ध अनुभवों को नकारते हुए वह खुद को देश के राजनीतिक नक्शे से ही लगभग अलग करता जा रहा था ।

जाहिर है कि यह भी अपने प्रकार का एक अलग क्रांतिकारी भोगवाद था, यथार्थ राजनीति के जगत के क्लेशों से दूर रहते हुए राजनीतिक योगियों का भोगवाद । 'किंचित्तकर्त्तृत्व', थोड़े से कर्त्तृत्व की संकुचितता से उत्पन्न अल्पज्ञता से लिपटा भोगवाद । कम्युनिस्ट राजनीति के शास्त्रों से ही इसके पक्ष में नाना प्रकार के तर्कों और मारक-मंत्रों को ढूंढ लिया जाता था । मसलन्, 'संसदवाद' से लेकर 'नव-उदारवाद' तक के रोगों से बचने और उनके ताड़न का तर्क । सीपीआई(एम) में यह सिलसिला खास तौर पर सन् 1996 से शुरू हुआ था जब 'बूढ़े (ज्योति बसु) को प्रधानमंत्री बनने का मोह सता रहा है' की तरह के तिरस्कार के क्रांतिकारी भाव-बोध के साथ ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया और एक प्रकार से, प्रकारांतर से सीपीआई(एम) को भारत की सत्ता की लड़ाई से अलग कर लिया गया था । फिर 2004 में यूपीए-1 के काल में एक और मौका आया, लेकिन इस बार भारत को अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्त रखने और इस प्रकार 'नव-उदारवाद' के छूत के रोग से पार्टी को बचाने के उत्साह में उससे अलग हो कर भारत में वामपंथ की गिरावट के एक नये आख्यान की रचना का सिलसिला शुरू किया गया । पुन:, मोदी के सत्ता में आने के बाद, जब यह साफ दिखाई दे रहा है कि यह एक फासीवादी ताकत का सत्ता पर आना है, यह सिर्फ पूंजीवादी जनतंत्र की एक विकृति नहीं है, फिर भी फासीवाद में भेदों की भ्रांतियों से उसके खिलाफ जनता के व्यापक एकजुट संघर्ष की अहमियत से इंकार की कोशिश की जाने लगी । इस प्रकार अपने ही खोल में दुबके रहने के तर्क ढूंढे जाते रहे ।

हैदराबाद कांग्रेस में जाने के पहले तीन दिनों तक कोलकाता में सीपीआई(एम) की केंद्रीय कमेटी इसी सवाल पर सिर गड़ाये बैठी रही थी कि इस लड़ाई में कांग्रेस दल के साथ कोई भी ताल-मेल किया जायेगा या नहीं ? और, हैदराबाद कांग्रेस के लिये जो राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन का प्रस्ताव बहुमत से पारित किया गया, उसमें पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी की राय के विरुद्ध यही कहा गया कि कांग्रेस दल के साथ कहीं किसी प्रकार का कोई ताल-मेल नहीं होगा । हमारी नजर में यह भारत में वामपंथी राजनीति के लिये किसी आत्महंता राजनीति की तरह था ।

बहरहाल, इस बात का पूरा श्रेय सीताराम येचुरी को जाता है कि कोलकाता में उनके मत को मिले इतने बड़े झटके के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी । देश के लगभग 15 प्रदेशों में पार्टी के राज्य सम्मेलनों में घूम-घूम कर उन्होंने अपने विचारों को पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के सामने व्याख्यायित करने की कोशिश की । और देखा गया कि हैदराबाद में पार्टी कांग्रेस में जाने के पहले उसके राजनीतिक प्रस्ताव में देश भर से लगभग आठ हजार संशोधन आए जिनमें से अधिकांश संशोधन इसी बात पर थे कि 'कांग्रेस दल के साथ कोई प्रकार का तालमेल नहीं होगा' की बात को प्रस्ताव से हटा दिया जाए । इसी का परिणाम हुआ कि पार्टी के बिल्कुल नीचे के स्तर से उठी इस भारी आवाज की अहमियत की उसके शीर्ष पर बैठे क्रांतिकारी श्रेष्ठिजन अवहेलना नहीं कर सके । सीताराम येचुरी बहुमतवादियों की सारी किलेबंदी के बावजूद न सिर्फ फिर से पार्टी के महासचिव चुन लिये गये, बल्कि फासीवादी भाजपा के खिलाफ जनता के व्यापकतम राजनीतिक मोर्चे की लाइन भी, जिसमें देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के साथ तालमेल रखना भी शामिल है, विजयी हुई ।

यह फैसला भारत में वामपंथ के पक्ष में आगे कितना कारगर होगा, इसके पीछे तो दूसरे भी अनेक पहलू काम करेंगे । लेकिन सीपीआई(एम) में जिस प्रकार से शुद्ध रूप में तर्क और विवेक के बल पर एक राजनीतिक लाइन अपने को स्थापित करने में सफल हुई है, यह परिघटना भारतीय राजनीति की अनंत संभावनाओं के बारे में किसी को भी आशान्वित कर सकता है । इसीलिये हम इसे भारत की राजनीति की एक बहुत महत्वपूर्ण घटना मानते हैं । सीपीआई(एम) से जुड़ा हर कार्यकर्ता इस पर गर्व करने का हकदार है ।  

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

‘चीनम् शरणम् गच्छामि’


-अरुण माहेश्वरी

अभी पूरी मोदी सरकार चीन की ओर रुख किये हुए है। मोदी खुद आगामी पांच हफ्तों में दो बार चीन जा रहे हैं शी जिन से इस महीने अनौपचारिक मुलाकात करेंगे और फिर जून के महीने में औपचारिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल ने तो चीन को अपना दूसरा घर ही बना रखा है यहां तक कि चीन के चक्कर में सुषमा स्वराज का लगभग विस्मृत हो रहा विदेश मंत्री पद भी फिर से दृष्टि के दायरे में गया है प्रधानमंत्री के जाने के पहले ही वे चीन पहुंच चुकी है  

चीन ने साल भर पहले जब दुनिया के तकरीबन सत्तर से ज्यादा राष्ट्रों को साथ लेकर अपनी वन बेल्ट वन रोड (ओबोर) परियोजना के प्रारंभ का ऐलान किया था, तब मोदी पर ट्रंप सवार थे वे उनमें अपनी छवि देख रहे थे अपने राष्ट्रवाद की जीत ट्रंप के माध्यम से वे अपने दक्षिणपंथ के भविष्य का रास्ता खोज रहे थे इसके अलावा, डोकलाम का संकट भी गया कुल मिला कर, मोदी जी ने अपनी क्षेत्रीय श्रेष्ठता के चक्कर में चीन के उस प्रकल्प में शामिल होने के प्रस्ताव का कोई दाम नहीं लगाया उल्टे उसे भारत-विरोधी लामबंदी तक बताने की कोशिश की गई  

किसी महाशक्ति के डर से नहीं, शुद्ध रूप से परस्पर आर्थिक हितों के आधार पर राष्ट्रों के बीच वैश्विक सहयोग के ओबोर के उस प्रस्ताव से अलग रहने का वास्तविक अर्थ तो यह था कि आज की दुनिया के राष्ट्रों के बीच के गैर-बराबरी और अन्यायपूर्ण संबंधों से भारत का चिपके रहना यह हमारी आजादी की लड़ाई के मूल्यों के विपरीत आरएसएस के विचारों के अनुकूल होने के साथ ही हमारे समग्र हितों के विरुद्ध था एक प्रकार से प्रत्यक्ष तौर पर साम्राज्यवादियों के सहयोगी की भूमिका अदा करना था

हर कोई जानता है कि दुनिया में राष्ट्रों के बीच संबंधों का यदि  बराबरी और न्याय के आधार पर पुनर्विन्यास करना चाहते हैं तो किसी को भी इस विश्व के ढांचे और इसके लिये काम कर रही विचारधारा की संरचना के बाहर जाकर विचार करना होगा चीन ने अपने ओबोर प्रकल्प के जरिये तकरीबन सात ट्रीलियन डालर की लागत से दुनिया के राष्ट्रों को जोड़ कर आज से एक अलग दुनिया के विकल्प की दिशा में, भले छोटा ही क्यों हो, कदम उठाने की पेशकश की थी जो है उसी से बंधे रहना प्रभुत्वशालियों की अधीनता को स्वीकारने से भिन्न कुछ नहीं होता है उसे तोड़ने में कमजोरों की मुक्ति होती है कमजोरों के अपने शील का भी यही तकाजा है  

आगामी 2019 में ओबोर के विषय पर ही चीन में जो अनेक राष्ट्रों की सभा होने वाली है, अभी लगता है कि उस सभा में शिरकत करने का मोदी सरकार मन बना रही है तमाम ओहदाधारियों का चीन की दिशा में प्रस्थान उसके संकेत भी देता है लेकिन मोदी के बारे में सबसे बड़ी परेशानी का सबब यह है कि इनका कोई भी काम सुविचारित नहीं होता है संघ की पाठशाला में अज्ञान की उपासना के इन्हें जो संस्कार मिले हैं, वही इनके स्वतंत्र सोच के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है इसीलिये एक प्रकार का तदर्थवाद उनके सोच का स्थायी और लगभग असाध्य सा रोग बन चुका है इनके पास  विश्व के समग्र ताने-बाने में अपने देश के कल्याण की निर्विकल्प दृष्टि और दिशा का सर्वथा अभाव है  

जैसे आंतरिक नीतियों के मामले में भी इन्हें सांप्रदायिक और जातिवादी विद्वेष फैलाने से जरा भी परहेज नहीं होता, जबकि कसमें खाते हैं राष्ट्रीय एकता और अखंडता की ! उसी प्रकार, हमेशा नितांत क्षणिक और तात्कालिक लाभ उठाने के दांव-पेंचों के बाहर ये कुछ भी नहीं सोच पाते हैं हरेक चुनाव के साथ, वे भले किसी पंचायत के चुनाव हो, या नगरपालिका या विधान सभा या लोक सभा की एकाध सीट के चुनाव हो, ये तमाम नीतिगत मसलों पर भी गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं  

आंतरिक राजनीति के क्षेत्र में तो मुमकिन है कि इस प्रकार के प्रति क्षण रूप बदलने वाले  अवसरवाद से यदा-कदा कुछ तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिल जाते हैं, लेकिन कूटनीति का क्षेत्र ऐसा है जिसमें आपको पूरी तरह से स्वतंत्र और सार्वभौम राज्यों से व्यवहार करना पड़ता है इसमें आपके चरित्र की इस प्रकार की अविश्वसनीयता आपकी पूर्ण विफलता को ही सुनिश्चित करती है मोदी की विदेश नीति इसीलिये अब तक एक पूरी तरह से विफल विदेश नीति रही है जिसमें आज पड़ौसी मुल्क हो या दुनिया के दूसरे हिस्सों के मुल्क, भारत को कोई भी अपना विश्वासयोग्य सहयोगी नहीं मानता है  

चीन के प्रस्ताव के प्रति भारत की अब तक की उदासीनता को चीन ने भारत सरकार की एक विसंगति समझ कर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इसके विपरीत उसने भारत के सभी पड़ौसी देशों को धीरे-धीरे अपने विश्वास के दायरे में ले लिया यहां तक कि भारत ने जिस भूटान की सार्वभौमिकता की रक्षा के नाम पर डोकलाम में भैरव नृत्य किया था, उसने भी भारतीय दम-खम की असलियत को देख लिया अभी तो डोकलाम भारत सरकार के एजेंडे से ही बाहर हो गया है  


कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि भारत का चीन के साथ संबंधों का बढ़ना निश्चित तौर पर इस दुनिया, और खास तौर पर एशिया के राजनीतिक नक्शे को काफी प्रभावित करेगा साम्राज्यवादियों की जकड़ को थोड़ा ढीला करेगा लेकिन इन संबंधों के सुफल किसी भी प्रकार के तदर्थवाद के बजाय एक सुचिंतित नीति को अपनाये जाने पर टिके हुए हैं अन्यथा, यदि इनके पीछे आंतरिक राजनीति में अपनी दुर्दशा से निकलने के लिये कोई नई और अल्पजीवी चमक पैदा करने की मंशा काम कर रही हो तो मोदी सरकार का चीन की ओर चल रहा यह अभियान एक नाटक भर साबित होगा चीन के प्रस्तावित एक नये विश्व में भी आपकी उपस्थिति को कोई भी एक भरोसेमंद उपस्थिति के रूप में नहीं देख पायेगा और कुल जमा यह होगा कि इस विश्व में आपका अलग-थलगपन और ज्यादा बढ़ जायेगा। मोदी की नाटकीयताओं में इस बात का पूरा खतरा है