मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

एक दलील

 (अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध पर चर्चा के केंद्र में नई विश्व-व्यवस्था के उदय के प्रश्न को उठाने के पक्ष में):

 −अरुण माहेश्वरी



अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध पर इधर जो कुछ लिखा जा रहा है, उसमें अधिकांश केवल तत्काल दृश्य पर टिका होता है। कौन-सा मिसाइल हमला हुआ, किस बंदरगाह पर रोक लगी, किसने किस को कितना तबाह किया,  किस दिन वार्ता हुई, वार्ता में कौन से दांव-पेंच चले गए, ट्रंप-नेतन्याहू लगातार दगाबाजियों और कूटनीति के नाम पर बेसिर-पैर की बातों के एक नए इतिहास की रचना करते हुए कैसे कूटनीति मात्र की बारह बजा रहे है, किस दिन युद्धविराम टूटा, किस दिन तेल की कीमत बढ़ी—ये सब महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ हैं, पर फिर भी हमें हमेशा लगता है कि इन सब सतह की बातों को कहना ही यथेष्ट नहीं है । इन सबके पीछे सत्य के खास पैटर्न, अर्थात् घटनाक्रम की एक बड़ी प्रक्रिया का संधान जरूरी है । 

सतह का अपना महत्व है, पर केवल सतह से किसी घटनामूलक इतिहास को नहीं पढ़ा जा सकता। इतिहास को हमेशा उसकी गति में पढ़ना पड़ता है। वह गति होते जाने की प्रक्रिया (present continuous tense) में घटित होती है—यानी कुछ समाप्त नहीं होता है, पर समाप्ति की एक दिशा में जा रहा होता है; कुछ पूरी तरह बना नहीं है, पर निश्चित तौर पर बनने की एक दिशा में बढ़ रहा है।

यानी घटना को केवल “जो अभी हुआ” के रूप में नहीं, बल्कि “जो अभी हो रहा है और अपनी नियति की दिशा में बढ़ रहा है” के रूप में पढ़ना जरूरी है। वह कहती नहीं कि सब कुछ घट चुका है; वह यह कहती है कि संरचना अपने अंतस्थ सत्य (immanent truth) दिशा में चल रही है।

बहुत-से पाठकों को हमारा यह रूझान किसी विचारधारात्मक पूर्वाग्रह का  लक्षण लगता है, क्योंकि वे पत्रकारिता की उस आदत (भाषा) के ही अभ्यस्त हैं जिसमें केवल तात्कालिक तथ्य ही “वास्तविक” माने जाते हैं। पर हम इसे विचारधारात्मक पूर्वाग्रह नहीं, एक जरूरी विश्लेषणात्मक पद्धति समझते हैं जिसका उद्देश्य ही है − सतह पर उपस्थित वर्तमान को उसके भीतर क्रियाशील नियतिमूलक दिशा के साथ पढ़ना।

आज के प्रमुख मार्क्सवादी ऐलेन बाद्यू का दर्शन के जगत में प्रमुख योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने दर्शन को गणितीय तर्क पर आधारित किया । गणित किसी परिघटना का जीवित विकल्प नहीं होता पर वह उसकी नियति को निश्चयात्मक भाषा में व्यक्त करने की शक्ति रखता है। राजनीतिक तर्क के आधार पर हम किसी भी वास्तविकता को किसी प्रमेय की तरह नहीं कह सकते कि फलाँ विश्व-व्यवस्था आज यहां समाप्त हो गई, क्योंकि राजनीतिक यथार्थ वह सत्य है जिसमें किसी न किसी प्रकार का अवरोध, प्रत्यावर्तन, संधि, छल, पुनर्गठन और अपूर्णता की तरह के तत्त्व हमेशा उपस्थित रहते हैं।

इसके विपरीत, गणितीय तर्क हमें यह ठोस रूप में दिखा सकता है कि कोई भी संयुक्त संरचना किन मूल अवयवों से बनी है, उसके अंतर्विरोध कहाँ हैं, और उसकी सतही पूर्णता के नीचे कौन-सी विघटनकारी दिशा काम कर रही है। इस अर्थ में गणित वर्तमान का प्रतिरूप नहीं, बल्कि उसकी नियति का सूचक होता है। राजनीति के तर्क और गणित के दर्शन के बीच यह एक बुनियादी  फर्क है । राजनीतिक घटनाक्रमों पर गणित के तर्क से विश्लेषण की ओर बढ़ने का मतलब ही है कि उन घटनाक्रमों की नियति को हमेशा अपनी नजर के सामने रखते हुए विचार करना । 

ईरान-अमेरिका-इज़रायल युद्ध और उसके संदर्भ में एक नई विश्व-व्यवस्था की बात पर हम जिस प्रकार लगातार बल दे रहे हैं, उसे भी कुछ इसी प्रकार से देखने की जरूरत है । यद्यपि ऐसा सोचने के पीछे हमारी नजर में वर्तमान विश्व की आर्थिक-सामरिक और शक्तियों के संतुलन की संरचना का बनता-बिगड़ता वह ढांचा लगातार मौजूद रहता है जिसका संकेत साम्राज्यवाद की पतनशीलता के तमाम आर्थिक सिद्धांतकारों से लेकर हमारे यहां के खास रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी तक देते रहते हैं । प्रवीण साहनी तो 21वीं सदी के नए युद्ध-सिद्धांतों के आधार पर सारी दुनिया में 800 से ज्यादा सामरिक अड्डों वाले अमेरिका के सामरिक-वर्चस्व के अंत की और नई सभी राष्ट्रों की सुरक्षा की अविभाज्य प्रणाली वाली नई विश्व-व्यवस्था के उदय की सच्चाई को अपनी हर चर्चा के केंद्र में बराबर रखते हैं । 

अब हम ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के विषय पर आते हैं । इस युद्ध की वर्तमान स्थिति यह है कि 28 फरवरी से शुरू युद्ध के पहले चरण में ईरान ने अमेरिका का पराजित कर युद्ध विराम के लिए मजबूर कर दिया और अब इस्लामाबाद में शांति वार्ता का दूसरा दौर कभी भी शुरू हो सकता है । जो लड़ाई ईरान के संवर्धित यूरेनियम को केंद्र में रख कर शुरू हुई, वह पहले चरण में ही हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर केंद्रित हो गई और यह लड़ाई न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि इसने एक वैश्विक रूप ग्रहण कर लिया । अमेरिका-इजरायल सारी दुनिया में अलग-थलग पड़ गए, हार्मुज पर ईरान की सार्वभौमिकता एक अकाट्य सत्य बन गई और उसे खोलना विश्व-अर्थव्यवस्था की सबसे प्राथमिक जरूरत बन गई । ट्रंप जैसे विक्षिप्त जंगखोर को भी पता चल गया कि वह अपनी अपराजेयता का चाहे जितना खुद ही गुणगान क्यों न करें, दुनिया में एक भी देश का उसकी ताकत पर रत्ती भर भरोसा नहीं रहा है । खाड़ी के कुछ अमेरिका के गुलाम देशों और भारत की तरह की एपस्टीन के जाल में फंसी सरकारों के अलावा किसी को ट्रंप के साथ खड़ा होने तक गंवारा नहीं है । 

इसी दौरान अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच तनाव भी स्पष्ट रूप से उभरा है। ट्रंप ने नाटो से बाहर निकलने की धमकी दी है तो ईरान युद्ध के कारण ही यूरोपीय देशों को हथियार आपूर्ति में विलंब की आशंका जताई जा रही, और यूरोप के भीतर सामरिक स्वायत्तता तथा अमेरिकी सुरक्षा की विश्वसनीयता पर चर्चा तेज हो गई है। इसका अर्थ साफ है कि नाटो में दरार पैदा हो गई है भले ही वह अभी टूट कर पूरी तरह से बिखर न गया हो । 

दूसरी तरफ चीन, रूस और ईरान के बीच कुछ बुनियादी सामरिक मुद्दों और राष्ट्रों की सार्वभौमिकता तथा हॉर्मुज पर ईरान के सार्वभौमिक अधिकार की तरह के सवालों पर एक साझा समझ दिखाई देती है । यद्यपि इसका अर्थ यह नहीं है कि इन देशों के बीच एक समग्र विचारधारात्मक एकता बन गई है। पर घटनाएँ इस ओर संकेत कर रही हैं कि पश्चिम-प्रधान व्यवस्था के विरुद्ध एक वैश्विक व्यावहारिक समन्वय निर्मित हो रहा है। चीन और रूस ने हॉर्मुज़ से जहाजों के आवागमन पर उस यूएन प्रस्ताव को वीटो किया जिसे वे ईरान-विरोधी मानते थे । रूस के विदेश मंत्री लावरोव इसी महीने चीन पहुँचे जहाँ ईरान युद्ध और यूक्रेन दोनों पर चर्चा हुई । शी जिनपिंग ने रूस के साथ भरोसा और पारस्परिक समर्थन गहरा करने की बात कही और चीन पश्चिमी देशों के साथ बातचीत में मध्य-पूर्व में युद्धविराम तथा नौवहन की सुरक्षा पर अपनी कूटनीतिक भूमिका बढ़ा रहा है। यह सही है कि यह कोई स्वतःसिद्ध नया ब्लॉक नहीं है, लेकिन इतना तो साफ़ है कि पुरानी एकध्रुवीयता की भाषा में इस घटनाक्रम की व्याख्या कठिन होती जा रही है।

इस पर, अब यदि हम बाद्यू के गणितीय उदाहरण, विशेषतः अभाज्य संख्याओं (primary numbers) और संयुक्त संख्या (joint numbers) की संरचना की रोशनी में इसे देखें तो हमारे सामने इस घटनाक्रम का एक अलग रूपक उभरता है। अमेरिका-प्रधान विश्व-व्यवस्था को हम एक संयुक्त संख्या की तरह सोच सकते हैं: डॉलर-प्रभुत्व, नाटो-सुरक्षा, समुद्री नियंत्रण, पश्चिमी वित्तीय संस्थाएँ, तकनीकी वर्चस्व, और उदार वैधता की भाषा — इन सबका एक संयुक्त गुणनफल। लंबे समय तक यह संरचना दुनिया में अपने को पूर्ण, स्वाभाविक और अविभाज्य रूप में दिखाती रही है। पर जैसे गणितीय दृष्टि बताती है कि किसी भी संयुक्त संख्या के भीतर अभाज्य अवयवों की संरचना काम करती रहती है, वैसे ही आज की विश्व-व्यवस्था के भीतर ऐसे अवयव सक्रिय हो रहे हैं जिनका पुराने पश्चिमी समेकन में पूरी तरह से मेल नहीं हो पा रहा है । चीन, रूस, ईरान—इन तीनों को एक ही विचारधारा में बाँधना गलत है, तथापि इन्हें इस अर्थ में “संरचनात्मक अवयव” कहा जा सकता है कि ये पुरानी पूर्णता को अविभाज्य बने रहने नहीं दे रहे। कह सकते हैं कि यह एक दार्शनिक निष्कर्ष है, कोई शुद्ध तथ्यात्मक बयान नहीं। पर इस निष्कर्ष का आधार वह घटनामूलक रुझान है, जिसकी चर्चा हम इस संघर्ष के संदर्भ में हर रोज सुनते हैं।

जाहिर है कि यहीं हमारा नजरिया चालू पत्रकारिता के नजरिये से अलग हो जाता है। पत्रकारिता कहेगी कि आज वार्ता हुई, आज जहाज़ गुज़रे, आज युद्धविराम है, आज फिर अवरोध है, आज ट्रंप ने यह कहा, आज यूरोप ने वह कहा। और यह सब जरूरी भी है। लेकिन हम पूछते हैं कि  इन सब “आज” के भीतर कौन-सी दिशा काम कर रही है? रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी भी अपने कोण से बराबर वही सवाल कर रहे होते हैं । यदि अमेरिका हॉर्मुज़ की सुरक्षा के प्रश्न पर यूरोप से दबाव बनाना चाहता है, फिर उन्हीं यूरोपीय देशों को हथियार आपूर्ति में देर करता है, और साथ ही यूरोप ऊर्जा व रक्षा के वैकल्पिक ढाँचे सोचने लगता है, तो यह केवल समाचार नहीं रह जाता; यह एक ऐसी संयुक्त संरचना के भीतर दरार का संकेत बनता है जो अभी औपचारिक रूप से कायम है, पर पहले जैसी दृढ़ नहीं रही है।

इसी तरह ईरान युद्ध को केवल किसी सैन्य कार्रवाई या तेल की आवाजाही के मार्ग संकट की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं है। इस युद्ध ने एक साथ कई स्तरों पर अमेरिकी शक्ति की सीमाओं को उजागर कर दिया है। एक तरफ अमेरिका आर्थिक दबाव, प्रतिबंध, सैन्य समर्थन और समुद्री नियंत्रण के जरिये अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है, दूसरी ओर उसे पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली वार्ताओं, अंतरिम समझौते की चर्चा, और ईरान के साथ गहरे मतभेदों को मानते हुए अपनी रणनीति बनानी पड़ रही है । यह सही है कि अमेरिकी शक्ति अभी भी भारी है, लेकिन अब वह चुनौती-विहीन और सर्वशक्तिमान नहीं बची है। उसकी कोई भी कार्रवाई अब किसी स्थिर समाधान का कारक नहीं बची है । वह संकट को फैलाती भी है, उसे नया मोड़ भी देती है, पर सब कुछ किसी अस्थायी प्रबंधन से अधिक कुछ नहीं रहता है। उसके प्रबंधन की स्थिरता प्रतिदिन के हिसाब से अल्पजीवी साबित होती जा रही है । 

इस बिंदु पर बाद्यू के गणितीय दर्शन से हमें एक बहुत महत्त्वपूर्ण शिक्षा मिलती है। गणित हमें यह नहीं बताता कि कोई राजनीतिक सत्य आज ही विजयी हो गया है। पर वह यह निश्चयात्मक रूप में बताता है कि किसी भी संरचना के मूल अवयव क्या है और उसका विघटन किस दिशा में चल रहा है। जैसे “अभाज्य संख्याएँ अनंत हैं” का अर्थ केवल यह नहीं कि वे बहुत अधिक हैं, बल्कि यह है कि संख्या-जगत की संरचना कभी बंद नहीं होती, वैसे ही आज का भू-राजनीतिक संकेत यह है कि विश्व-व्यवस्था अब अमेरिका-नाटो के वर्चस्व की पूर्णता में बंद नहीं रह सकती। भले इसका अर्थ यह नहीं कि नया विश्व तैयार हो चुका है, पर इतना अवश्य है कि पुरानी पूर्णता अब अपनी पूर्ववत् सार्वभौमिकता खो रही है। हमारा मानना है कि ऐसे निष्कर्ष भले “आज की पुष्टि” नहीं करते लेकिन “आने वाली संरचना की रेखाएँ” जरूर पेश करते हैं।

इसीलिए सतह के स्थैर्य के भीतर उसकी ऐतिहासिक अस्थिरता को पढ़ने का प्रयास वैचारिक पूर्वाग्रह नहीं होता । जो लोग केवल तात्कालिक घटना को देखते हैं, वे कहते हैं: नाटो अभी है, डॉलर अभी है, अमेरिका अभी सबसे शक्तिशाली है, यूरोप अभी अलग नहीं हुआ, चीन-रूस-ईरान अभी एक नहीं हैं। यह सब तथ्यात्मक रूप से सही है। पर हम कहेंगे कि बिल्कुल इसी वर्तमान के भीतर भविष्य की दिशा काम कर रही है। present continuous का अर्थ ही यह है कि प्रक्रिया अपनी नियति को अभी से लिख रही है। यहाँ विश्लेषण का प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी संस्था औपचारिक रूप से खत्म हो गई, बल्कि यह कि कौन-सी संरचना अपनी पुरानी वैधता खोते हुए भी जड़त्व के बल पर चल रही है, और कौन-से नए अवयव अभी अधूरे रूप में उभर रहे हैं।

यही कारण है कि इस पूरे युद्ध और नई विश्व-व्यवस्था के प्रसंग को लिखते समय हम अपने आशय में स्पष्ट होते हुए भी किसी घोषणापत्र की भाषा से बचते हैं । हम नई विश्व-व्यवस्था के उदय की कसमसाहट का जिक्र करते हैं न कि उसके पूर्ण निर्माण का । जो कहते हैं कि  “कुछ भी नहीं बदला”, वह शुद्ध वैचारिक अंधता है। मार्क्सवादी दर्शन की तरह ही बाद्यू हमें सिखाते हैं कि जो हेगेलियन दर्शन घटना के घट जाने के बाद ही अपनी उड़ान के पंख फैलाता है, उसकी जगह यह भौतिकवादी द्वंद्वात्मक दर्शन घटना की दिशा में हमारे सोच को शामिल करता है । दर्शन इसी अर्थ में व्याख्या के बजाय परिवर्तन की भूमिका अपनाता है । 

बाद्यू के लिए सत्य किसी रिपोर्ट का नाम नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया का नाम है। गणित उसके लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह प्रक्रिया की नियति को निश्चयात्मक रूप में सोचने की शक्ति देता है। पत्रकारिता वर्तमान के धूल-धुएँ को दर्ज करती है, गणितीय-दर्शन उस धूल-धुएँ के भीतर चल रही संरचनात्मक रेखा को पकड़ने में सहायता करता है। 

इसीलिए हम फिर दोहरायेंगे कि ईरान-अमेरिका-इज़रायल युद्ध केवल एक क्षेत्रीय सैन्य संकट नहीं है । यह कथित अमेरिकी एकध्रुवीय विश्व की संयुक्त संख्या के भीतर काम कर रहे अभाज्य अंतर्विरोधों को सामने ला रहा है। यूरोप और अमेरिका के बीच तनाव, हॉर्मुज़ पर वैश्विक निर्भरता, ऊर्जा-व्यवस्था की अस्थिरता, चीन-रूस-ईरान का आंशिक समन्वय, और पश्चिमी संस्थागत वैधता की सीमाएँ—ये सभी मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि विश्व अब पुरानी एकध्रुवीय गणना में नहीं समा रहा। एक नया विश्व अभी निर्मित हो रहा है, पर उसकी भाषा अभी पूरी तरह बनी नहीं है । उसके घटकों में अभी आपसी विषमता हैं । लेकिन उसकी दिशा अब केवल अनुमान नहीं रही, एक संरचनात्मक संकेत बन चुकी है। 

यही वह जगह है जहाँ हम चालू पत्रकारिता से अपने को अलगाते हैं और पाठक का नियति से साक्षात्कार कराने वाली लेखन की present continuous शैली की दुहाइयां देते हैं । 





गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

प्रकृत मानवीय विकल्प के उभार तक यथास्थिति ही बनी रहेगी

 (पश्चिम बंगाल में एक अजीब सी विडंबना में फँसा मतदाता )


—अरुण माहेश्वरी 





बंगाल की राजनीति का आज का संकट केवल इस बात का संकट नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि इस बात का कहीं ज्यादा है कि जनता के सामने “विकल्प” किस रूप में उपस्थित है। लोकतंत्र में सामान्यतः माना जाता है कि सत्ता का विरोध स्वयं किसी नये विकल्प को जन्म देता है। लेकिन वास्तविकता हमेशा इतनी सरल नहीं होती। कई बार सत्ता का विरोध मात्र ही किसी और भी अधिक पतनशील, अधिक संकीर्ण और फासिस्ट शक्ति को भी जन्म देता है। ऐसी स्थिति में जनता के सामने यथास्थिति और एक अंधकारमय मिथ्या विकल्प के बीच चुनाव का संकट खड़ा हो जाता है।


पश्चिम बंगाल में आज कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। पिछले पंद्रह वर्षों से यहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। इस पूरे दौर में भ्रष्टाचार, स्थानीय गुंडागर्दी, पुलिस का राजनीतिक उपयोग, और व्यक्ति-केन्द्रित सत्ता-संरचना के तमाम निंदनीय रूप सामने आए हैं। इससे जनता में स्वाभाविक रूप से व्यापक असंतोष है। 


परंतु यह असंतोष सबसे दृश्य रूप में जिस शक्ति के पक्ष में जाता दिखाई देता है, वह बीजेपी का है । तृणमूल से भी कहीं ज्यादा भ्रष्ट, ग़ैर-लोकतांत्रिक और चरम सांप्रदायिक पार्टी । 



और बंगाल का एक बड़ा हिस्सा यह अनुभव करता है कि भाजपा तृणमूल का वास्तविक विकल्प नहीं, बल्कि उससे भी अधिक खतरनाक संभावना है।


यहीं आज के समय के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू की ‘घटना’ (event) संबंधी अवधारणा उपयोगी हो जाती है। बाद्यू के अनुसार कोई भी विकल्प केवल इसलिए सत्य नहीं हो जाता कि वह वर्तमान सत्ता का विरोध कर रहा है। सत्य का अर्थ है—एक ऐसी नयी संभावना जो परिस्थिति के भीतर दबे हुए सार्वभौमिक तत्व को सामने लाए और उसे आगे बढ़ाए। 


यदि कोई विकल्प वर्तमान से भी अधिक संकीर्ण, अधिक विभाजक और अधिक प्रतिक्रियावादी हो, तो वह सत्य का वाहक नहीं, बल्कि “अंधकारमय मिथ्या प्रमाता” (obscure subject) का रूप है। वह जनता की पीड़ा, असंतोष और क्रोध को अपने पक्ष में खींचता तो है, पर उसे किसी अधिक मानवीय दिशा में नहीं ले जाता। वह उसे और अधिक भय, घृणा, पहचान-आधारित राजनीति और मिथकीय आत्ममुग्धता की ओर मोड़ देता है।


बंगाल में भाजपा की भूमिका उसके अखिल भारतीय चरित्र के अनुरूप ही बिल्कुल इसी प्रकार की है। वह तृणमूल के भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध जनता के असंतोष का लाभ उठाना चाहती है, पर उसे किसी अधिक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष या समानतामूलक राजनीति की ओर नहीं ले जाती। वह उस असंतोष को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सत्ता के केंद्रीकरण और बहुसंख्यकवादी फासिस्ट राष्ट्रवाद की दिशा में ले जाने में लगी हुई है। इसीलिए वह तथाकथित विकल्प होते हुए भी प्रकृत विकल्प नहीं है। वह परिवर्तन की बात करती है, पर उसके परिवर्तन की दिशा पतनशील है।


ऐसी परिस्थिति में वाम मोर्चा और कांग्रेस ही संभावित सही विकल्प के रूप में दिखाई देते हैं। उनके भीतर अभी भी धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, वर्गीय समानता, शिक्षा, श्रम, किसान, सार्वजनिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक जीवन की वे परंपराएँ मौजूद हैं जो बंगाल की ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा रही हैं। 


परंतु विडंबना यह है कि यह सही विकल्प नाना कारणों से जनता के लिए दृश्य विकल्प नहीं बन पा रहा है । वह राजनीतिक रूप से इतना कमजोर हो चुका है कि उसे वोट देना बहुत से मतदाताओं को वोट को व्यर्थ करना लग सकता है। मतदाता सोचता है कि यदि उसने वाम को वोट दिया, तो उसका वोट विभाजित होगा और भाजपा को लाभ मिलेगा। 


इस प्रकार वाम की राजनीतिक अनुपस्थिति भाजपा को तृणमूल का विकल्प बना देती है, चाहे वह वस्तुतः कितना ही अंधकारमय मिथ्या विकल्प क्यों न हो! 


यहीं पर लकान की प्रमाता की इच्छा-संरचना की अवधारणा ( desire-structure of the subject) इस विडंबनापूर्ण परिस्थिति और इसके परिणाम की ओर सटीक इशारा कर सकती है । 


लकान के अनुसार प्रमाता की इच्छा कभी सीधी रेखा में नहीं चलती। वह एक संकेतक से दूसरे संकेतक तक, कई कल्पनाओं और विकल्पों के बीच भटकती रहती है। कई बार उसे लगता है कि वह किसी नये विकल्प की ओर बढ़ रहा है, जबकि वास्तव में वह उसी पुरानी संरचना में फँसा रहता है। इच्छा का मुक़ाबला कई बार ऐसा मिथ्या विकल्प से होने लगता है जो उसे अपनी जगह से हिलने नहीं देता। वह उसे चक्कर कटवाता है, पर कहीं पहुँचने नहीं देता।


पश्चिम बंगाल का मतदाता आज इसी वृत्ताकार गति में फँसा हुआ दिखाई देता है। वह तृणमूल से असंतुष्ट है, पर भाजपा को लेकर उससे भी अधिक भयभीत है। वह वाम को अधिक मानवीय विकल्प मान सकता है, पर उसे प्रभावी विकल्प नहीं मानता। इसीलिए उसकी इच्छा एक वृत्त बनाकर फिर उसी यथास्थिति की ओर लौट आती है जिससे वह स्वयं असंतुष्ट था । 


पश्चिम बंगाल का मतदाता परिवर्तन चाहता है, पर परिवर्तन के नाम पर उसके सामने जो सबसे बड़ा विकल्प उपस्थित है, वह उसे अपनी ही सांस्कृतिक-सामाजिक जमीन के विनाश के डर से जकड़ देता है। इसीलिए वह वापस उसी सत्ता को चुन लेता है जिसे वह भीतर से अस्वीकार करता है।


यह बंगाल के लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना है। यहाँ यथास्थिति इसलिए नहीं बची हुई है कि जनता उससे प्रेम करती है, बल्कि इसलिए बची हुई है कि जनता के सामने उपस्थित विकल्पों में वही तुलनात्मक रूप से कम बुरा दिखाई देती है। भाजपा जैसे विकल्प के रहते तृणमूल की पराजय नामुमकिन लगती है । 


लकान के शब्दों में कहें तो यहाँ “भटकाने वाला विकल्प” इच्छा को मुक्त नहीं करता, बल्कि उसे उसी बिंदु पर वापस ले आता है जहाँ से वह चली थी। भाजपा का विकल्प तृणमूल से मुक्ति का मार्ग नहीं बनता; वह तृणमूल को ही टिकाए रखने का माध्यम बन जाता है।


और, भाजपा का उभार जितना भाजपा की शक्ति का परिणाम है, उससे कहीं अधिक वह वाम की विफलता का परिणाम है। यदि वाम एक जीवित, संघर्षशील, विश्वसनीय और भविष्यसूचक विकल्प के रूप में वास्तविक दृष्यपट पर अपनी उपस्थिति को प्रमाणित कर पाता, तो बंगाल की राजनीति का पूरा संतुलन बदल सकता था। परंतु आज वाम वह एक “अदृष्ट विकल्प” है, सैद्धांतिक रूप से मौजूद, पर व्यवहार में अनुपस्थित। उसके छात्र नेता जनता की सेवा की आग से तप कर अपने को स्थापित नहीं कर पाए हैं।  


वाम की भाषा अभी भी जनता को यह अनुभव नहीं करा पा रही कि वह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। जब तक वह जनता के अनुभवों, असुरक्षाओं, बेरोज़गारी, ग्रामीण संकट, स्थानीय भ्रष्टाचार और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्नों को एक नए सार्वभौमिक फ्रेम में नहीं बाँधेगा, तब तक वह निष्ठावान प्रमाता (faithful subject) की जगह स्मृतिमुग्ध प्रमाता (nostalgic subject) बन कर रह जाएगा—ऐसा प्रमाता जो अपने गौरवशाली अतीत से तो जुड़ा है, पर वर्तमान में किसी नयी घटना को जन्म नहीं दे पा रहा।


ऐलेन बाद्यू के शब्दों में कहें तो इस स्थिति को कुछ इस प्रकार रखा जा सकता है कि इन्हीं कारणों से बंगाल में अभी कोई नयी ‘घटना’ नहीं हुई है। अभी तक ऐसा कोई राजनीतिक हस्तक्षेप सामने नहीं आया है जो जनता को यह महसूस करा सके कि वह तृणमूल और भाजपा दोनों के परे भी किसी तीसरी संभावना की वाहक हो सकती है। 


और जब तक ऐसी घटना नहीं होती, तब तक बंगाल का मतदाता उसी लकानियन वृत्त में घूमता रहेगा—असंतोष से भरा हुआ, पर परिवर्तन से भयभीत; विकल्प की तलाश में, पर मिथ्या विकल्पों से घिरा हुआ; और अंततः उसी यथास्थिति में लौटता हुआ जिसे वह स्वयं बदलना चाहता है। वह जानता है कि सामने उपस्थित विकल्प वस्तुतः विकल्प नहीं, बल्कि एक और भी अधिक संकीर्ण, अधिक विभाजक और अधिक दमनकारी व्यवस्था का संकेत है। भाजपा की ओर जाने का अर्थ तो उसके लिए अपने सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को ही नष्ट करना है। वह परिवर्तन चाहता है, पर परिवर्तन का दृश्य रूप उसे भयभीत करता है। इसीलिए वह फिर उसी यथास्थिति की ओर लौट आता है जिससे वह स्वयं असंतुष्ट था।


दरअसल, यह विडंबना केवल बंगाल की नहीं, बल्कि लोकतंत्र मात्र की एक बड़ी संरचनात्मक विडंबना है। जब कोई वास्तविक प्रगतिशील विकल्प लंबे समय तक जनता के सामने स्वयं को जीवित रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाता, तब जनता के सामने दो ही रास्ते बचते हैं—या तो वह प्रतिक्रियावादी विकल्प की ओर जाए, या फिर उसी व्यवस्था से चिपकी रहे जिससे वह स्वयं असंतुष्ट है। बंगाल में अभी यही हो रहा है। जब तक वाम जनता के भीतर एक नयी घटना, नयी भाषा, नयी आकांक्षा और नयी सामूहिकता की अनुभूति पैदा नहीं करेगा, तब तक बंगाल का मतदाता लकान की इच्छा की उसी वृत्ताकार गति में घूमता रहेगा—परिवर्तन की चाह के साथ, पर परिवर्तन के भय से बँधा हुआ।


इस अर्थ में बंगाल का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं है; यह इस बात का प्रश्न है कि क्या वहाँ कोई ऐसी नयी राजनीतिक घटना संभव है जो तृणमूल और भाजपा, दोनों की सीमाओं को पार करके जनता के सामने एक तीसरी, अधिक ऊर्ध्वगामी संभावना रख सके। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक यथास्थिति ही लोगों को तुलनात्मक रूप से कम बुरा विकल्प लगती रहेगी, चाहे उसके भीतर कितनी भी थकान, असंतोष और विघटन क्यों न जमा होता जाए।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

क्या अमेरिकी साम्राज्यवाद आत्म-हत्या की दिशा में नहीं बढ़ रहा है!

 -अरुण माहेश्वरी 





ईरान पर अमेरिका-इज़रायल के हमले के वर्तमान चरण में हम एक बार फिर यह दोहराना चाहते हैं अमेरिका की संपूर्ण मध्यपूर्व की नीति के केंद्र में उसके पेट्रोडालर, सामरिक रणनीति, हथियार -उद्योग और इज़रायल के विस्तारवाद को बढ़ावा देना तो हैं ही , पर इसकी क्रियाशीलता को साम्राज्यवाद की आंतरिक गति के नियमों से, उसकी विवशतामूलक पुनरावृत्ति (compulsive pattern) की संरचना से भी समझने की जरूरत है । 


अमेरिका के इस युद्ध में एक ऐसी गहरी पुनरावृत्तिमूलक संरचना दिखाई देती है, जो हर थोड़े दिनों के अंतराल पर संकट के नए चक्र के साथ उसके समाधान को किसी न किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई में खोजा करती है । 


अमेरिका का वियतनाम युद्ध (1954–1975), अमेरिका का इराक़ युद्ध (2003–2011), अफ़ग़ानिस्तान युद्ध (2001–2021 ) और अब फिर, इस युद्ध के पाँच साल के अंदर ही यह ईरान युद्ध । इन सबमें एक मनोरोगी के क्रमशः बढ़ते हुए तनाव की वह प्रवृत्ति बार-बार दिखाई देती है जो अपने अहम् के सामने चुनौती की कल्पना से अधिक से अधिक उग्र होता चला जाता है । साम्राज्यवाद विश्व पर अपने प्रभुत्व के क्षय की आशंका से और अधिक शक्ति-प्रदर्शन की कोशिश करता है । 


फ्रायडियन भाषा में कहें तो यह केवल शक्ति का प्रयोग नहीं, बल्कि शक्ति के खोने के भय से पैदा हुई एक ऐसी मृत्युमुखी पुनरावृत्ति है जिसमें हर अगला कदम पहले से अधिक जोखिमपूर्ण हो जाता है। अहम् की तरह ही साम्राज्य तभी सबसे अधिक खतरनाक दिशा में बढ़ता है जब उसे अपने अंत की आहट सुनाई देने लगती है। ऐसे समय में प्रमाता का व्यवहार विवेकपूर्ण नहीं रहता; वह अपनी घटती हुई प्रभुता को स्वीकार करने के बजाय उसे हिंसक रूप से पुनर्स्थापित करना चाहता है।


ट्रंप की राजनीति में हमें अवसादग्रस्त मनोरोगी की इसी विडंबना का चरम रूप दिखाई देता है। वे सत्ता में इस वादे के साथ आए थे कि अमेरिका को अंतहीन युद्धों से बाहर निकालेंगे, MAGA का नारा दिया और यह भी वादा किया कि मध्यपूर्व में अमेरिका की अनावश्यक उलझनों को कम करेंगे। परंतु धीरे-धीरे वे एक पतनशील व्यवस्था की अवसादपूर्ण राजनीति के जुएसॉंस के अधिक उग्र रूप में फंसते दिखाई देने लगे । यह शीत युद्ध के काल के वियतनाम युद्ध से लेकर आज तक के सभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों का वंशानुगत रोग है और ट्रंप उससे जरा भी निकलने के बजाय इस death-drive की तार्किक परिणति, आत्म-हत्या तक चले जाने की दिशा में बढ़ते जा रहे हैं । 


ट्रंप बार-बार युद्ध रोकने, बातचीत, मोहलत, और समझौते की भाषा बोलते हैं; लेकिन उसी के साथ वे सैन्य जमावड़े, कठोर अल्टीमेटम, धमकियों और बड़े हमलों की संभावना को भी बढ़ाते हैं। उनका इस प्रकार दो अतियों के बीच पेंडुलम की तरह डोलना केवल एक रणनीतिक अस्पष्टता या झांसापट्टी नहीं है; यह उस विभाजित मानसिकता का संकेत है जिसमें युद्ध से बचना भी चाहा जाता है और युद्ध के बिना प्रभुता की कल्पना भी असंभव लगती है।


यही कारण है कि हर “दो सप्ताह”, “तीन सप्ताह”, “अंतिम चेतावनी”, “कूटनीतिक अवसर” जैसी ट्रंप की बात के भीतर एक गहरे सैन्य विस्तार की तैयारी भी छिपी रहती है। जॉक लकान कहते हैं कि जब विश्लेषण की प्रक्रिया में मनोरोगी बिल्कुल संयत व्यवहार के जरिये विश्लेषक को बरगलाने की कोशिश करता है, तभी वह सबसे अधिक शातिर दिमाग़ के साथ पेश आता हुआ होता है । साम्राज्य जब वार्ता की भाषा बोलता है तभी वह युद्ध की तैयारी कर रहा होता है, और जब युद्ध की भाषा बोलता है, उसे अपनी कमजोरी का भय सता रहा होता है। 


इसलिए ईरान के साथ कोई भी संभावित संघर्ष केवल कुछ हफ़्तों की बमबारी या मिसाइलबाज़ी तक सीमित नहीं रह सकता। उसका एक लंबे ज़मीनी युद्ध, प्रॉक्सी युद्ध, होर्मुज से लेकर रेड सी तक पर क़ब्ज़े की लड़ाई, पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की लपटों का उठना पिछले पचास साल के अमेरिकी युद्धों के इतिहास की पृष्ठभूमि में उसके मृत्युमुखी उद्दीपन की अनिवार्य पुनरावृत्ति है। 


पर आज की परिस्थितियों में दुनिया साफ़ तौर पर एकध्रुवीय नहीं रही है । ट्रंप के टैरिफ़ युद्ध की घनघोर विफलता ने इस सत्य को प्रमाणित कर दिया है।  चीन, रूस, ब्रिक्स का उदय, खाड़ी क्षेत्र की बदलती राजनीति, और स्वयं नाटो के सदस्य देशों की इस लड़ाई से घोषित दूरी, मध्यपूर्व की नई कूटनीतिक व्यवस्थाएँ अमेरिका की पुरानी शैली की एकध्रुवीय शक्ति की सीमा को उजागर करते हैं ।  यह परिस्थिति अवसादग्रस्त अमेरिका को मृत्यु की ओर छलाँग लगाने की दिशा में प्रेरित करने के लिए यथेष्ट है । यह ईरान युद्ध को केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद के वाटरलू का नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था के एक नए सत्य के उद्घाटन की घटना का रूप दे रही है जिसके दीर्घ अंत के बीच से साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद के पूरी तरह से अंत की घोषणा हो सकती है । 


इसीलिए ईरान के साथ अमेरिका का यह संघर्ष अब केवल एक और युद्ध नहीं है, यह उस पूरी विश्व-व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें अमेरिका दशकों से एक प्रकार की निर्णायक शक्ति की भूमिका निभाता रहा है।


हम पुनः यह कहना चाहेंगे कि रोगग्रस्त प्रमाता के विश्लेषण की तरह ही किसी साम्राज्य का अंत हमेशा उसकी बाहरी हार से नहीं होता; वह अपने ही पुनरावृत्तिमूलक भय और हिंसा से भीतर से टूटता है। वह जितना अधिक अपने प्रभुत्व को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करता है, उतना ही अधिक वह अपनी सीमाओं को उजागर करता है। विश्लेषक उसे एक नए सत्य पर टिका कर उसे अपने अंदर के इस प्रेत से मुक्त करता है । साम्राज्य के मामले में ऐसा “विश्लेषक” कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि इतिहास की नई बहुध्रुवीय शक्तियाँ और संघर्षरत राष्ट्र होते हैं। इस लड़ाई के अंत से इसी नई बहु-ध्रुवीयता का सत्य भी स्थापित होगा ।  


इसी अर्थ में ईरान का प्रश्न केवल ईरान का प्रश्न नहीं है; यह उस बिंदु का नाम है जहाँ अमेरिका को स्वयं अपने संकट का सम्मुख खड़ा कर दिया जा रहा है।


इस संकट के बीच से एक नई विश्व-व्यवस्था उभरेगी जिसमें संप्रभु राष्ट्रों के बीच संबंध केवल सैन्य धमकी, प्रतिबंधों, और एकतरफा हस्तक्षेप पर आधारित नहीं होंगे, बल्कि परस्पर सम्मान , समानता, बहुध्रुवीयता और नए प्रकार के कूटनीतिक शील पर आधारित होंगे ।  

यह प्रक्रिया सहज नहीं होगी; इसमें युद्ध, अस्थिरता और भारी विनाश की संभावना रहेगी । और, इसीलिए हम ईरान युद्ध के जल्द और आसान हल को अभी नहीं देख पा रहे हैं।  परंतु इतिहास में बार-बार ऐसा हुआ है कि किसी पुरानी व्यवस्था का अंत उसकी सबसे उग्र हिंसा के बीच से ही होता है। हिटलर अपनी शक्ति के चरम प्रदर्शन के बाद ही खत्म हुआ करते हैं। 


आज अमेरिका को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वह एक मृत्यु-उद्दीपन (death drive) के चक्र में फँस चुका है । यह एक ऐसा चक्र है जिसमें हर अगला सैन्य कदम उसे अपने अंत के और निकट ले जायेगा ।  वह जितना अधिक अपनी खो रही शक्ति को फिर से पाने के लिए हाथ-पैर मारेगा, उतना ही अधिक ऐतिहासिक परिस्थितियों और अपनी सीमाओं, अपनी आंतरिक विघटनशीलता के दलदल में धँसता चला जायेगा। इसीलिए ईरान के विरुद्ध यह युद्ध केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि उस साम्राज्य की आत्म-विनाशकारी विवशतामूलक पुनरावृत्ति का एक और चरण है, जो अब अपने अंतिम और सबसे खतरनाक रूप में प्रवेश कर चुका है।


यह आश्चर्य की बात नहीं है कि साम्राज्य कई बार शत्रु के हाथों नहीं, अपने ही मृत्यु-उद्दीपन में फँस कर समाप्त होते हैं। जुएसॉंस जब स्वातंत्र्य और संकुचन के संतुलन से कट जाता है, तब वह शांत चित्त की गति के बजाय उच्छृंखल आत्म-विनाश का कारक बन जाता है। ऐलेन बाद्यू का सत्य के बारे में एक प्रसिद्ध कथन है कि "हर जगत अपने अंदर ही अपने सत्य को प्रकट करने की शक्ति रखता है ।" (Every world is capable of producing its own truth within itself) हम जोड़ेंगे कि सृष्टि की इस प्रक्रिया के साथ एक आत्म-संहार भी समांतराल में जारी रहता है ।   

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

‘अब युद्ध का अंत ईरान ही करेगा !’


(इस युद्ध के सत्य के उद्घाटक, घटनामूलक (evental) चरित्र पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी  


ईरान-अमेरिका युद्ध अब महज एक राजनीतिक या सैन्य घटना नहीं रह गई है । अमेरिका ने इस युद्ध का प्रारंभ किया पर इसका अंत अब उसके वश में नहीं रहा है । यह क्रमशः एक ऐसी वैश्विक चर्वणा का रूप ले चुका है जिसका परिणाम बिल्कुल अपरिमेय है । अभी तो अमेरिका अपने मृत सैनिकों की गिनती कर पा रहा है और इजरायल भी बर्बादियों के कुछ झूठे-सच्चे आँकड़े रख पा रहा है, पर इसमें आश्चर्य नहीं कि जल्द ही इन आँकड़ों की कोई अहमियत ही नहीं बचेगी । बमों और मिसाइलों के धमाकों के धूल-धुएं में जैसे सारी दुनिया ही ओझल होती दिखाई देगी । कल तक जो सच था, आज अचानक इतना बदल चुका होगा कि उसकी सूरत ही पहचान में नहीं आएगी । 

ट्रंप ने सत्ता पर आने के साथ ही ‘अमेरिका के हित’ के नाम पर दुनिया को अस्थिर करने की जो सुचिंतित मुहिम शुरू की थी, वह अब हमारी दृष्टि में ‘दुनिया के हित’ में अंगड़ाई लेते हुए विश्व-व्यवस्था के एक बिल्कुल नये आकार में उभरने के अविश्वसनीय आलोड़न का रूप लेती जा रही है । आज अमेरिका में ही यह चर्चा सरगर्म है कि एपस्टीन फाइल में फंसा डोनाल्ड ट्रंप न सिर्फ शारीरिक रूप में सड़ चुका है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी प्रति पल बद से बदतर होता जा रहा है । यह व्यक्ति ट्रंप का ही सच नहीं है, बल्कि काफी हद तक पूरी अमेरिकी सत्ता का, मध्यपूर्व और पूरे विश्व में फैले सैनिक अड्डों और उस पर आश्रित राजनीतिक सत्ताओं का भी सच है । इन अड्डों का और लंबे समय तक यूं ही बने रहना संभव नहीं लगता है क्योंकि इस युद्ध ने खाड़ी के देशों के सामने इनके होने की अहमियत के खोखलेपन को जाहिर कर दिया है ।  

इसीलिए, हमारा मानना है कि ईरान तो महज एक बहाना है, वास्तविकता यह है कि जैसे अमेरिका-केंद्रित आज की दुनिया का अंतःस्थित सत्य ही अपने परम आत्म-संहारक रूप को प्रकट करने को मचल उठा है । वर्तमान का असहनीय यथार्थ अब विश्व के समूचे प्रतीकात्मक जगत को उलट-पुलट कर, भू-राजनीति की अब तक की पहचानी हुई सूरत को ध्वस्त कर, एक नये यथार्थ-प्रतीकात्मक-छविमूलक समग्र रूप को तैयार करने की दिशा में बढ़ रहा है । ईरान के नेतृत्व का आलम यह है कि उसने शहादत की अपनी मूलगामी परंपरा पर अपने अंत के साथ पूरे मध्यपूर्व के अन्यायपूर्ण स्वरूप के अंत की ठान ली है, जो वहां के शासन को पहले की तुलना में अंदर से कहीं ज्यादा मजबूत बना रहा है । ट्रंप-नेतन्याहू अब युद्ध विराम चाहते हैं और ईरान उसके लिए भारी शर्तों को रख कर इसे टालते हुए एक तार्किक अंत तक ले जाने पर आमादा है ।  

इस घटना को यदि हम खास ईरान और इस्लामी इतिहास के संदर्भ में ही देखें तो लगेगा कि कर्बला के युद्ध में हुई शहादत ने आज उनके लिए एक नया रास्ता तैयार करना शुरू कर दिया है । कर्बला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इमाम हुसैन की युद्ध में जीत की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी। फिर भी उन्होंने संघर्ष चुना। यहीं से शहादत का वह दर्शन पैदा होता है जिसमें शहादत केवल मृत्यु नहीं, एक सत्य की सार्वजनिक घोषणा है। इस अर्थ में इमाम हुसैन ने एक प्रकार के नैतिक उद्घाटन (revelation) का काम किया था। शिया चिंतन में कर्बला को केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं माना जाता। इसे हमेशा मौजूद रहने वाली आज की घटना समझा जाता है। हुसैन की हार वास्तव में एक नैतिक विजय बन गई। शिया परंपरा में कर्बला केवल एक युद्ध नहीं है, बल्कि एक स्थायी नैतिक घटना है। “हर दिन आशूरा है, हर ज़मीन कर्बला है”— यह कथन इसी अर्थ को व्यक्त करता है।

इस प्रकार, इमाम हुसैन की शहादत ने इस्लामी चेतना में जो एक विशेष नैतिक संरचना पैदा की, उस संरचना में किसी अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने सत्य की गवाही, पराजय के बावजूद नैतिक विजय, स्मृति और शहादत के माध्यम से इतिहास के पुनर्लेखन को उसके मुख्य तत्त्व कहा जा सकता है । 

आज के आधुनिक दर्शन की भाषा में हम इसे सत्य के विस्फोट की तरह की ऐतिहासिक घटना की तरह भी देख सकते हैं । ऐलन बाद्यू ऐसी घटना को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं को इस प्रकार गिनाते हैं कि वह मौजूदा व्यवस्था से बाहर से आती है, स्थापित व्यवस्था के नियमों को चुनौती देती है और एक नई सत्य-विधि (Truth-process) की शुरुआत करती है । पुरानी व्यवस्था अपनी ही भाषा में स्वयं को समझाने में अक्षम नजर आने लगती है। वे फ्रांसीसी क्रांति, पेरिस कम्यून या कुछ महान कलात्मक आविष्कारों को भी ऐसी घटनाओं के उदाहरण बताते हैं। इसका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है सत्य-घटना के प्रति दीर्घकालिक निष्ठा और उसके अनुसार व्यवहारिक-संगठित प्रतिबद्धता। अर्थात्, घटना से उद्घाटित सत्य को जन-गण की व्यापक स्वीकृति और तदनुरूप सामाजिक रूपांतरण की एक लंबी प्रक्रिया का प्रारंभ । कर्बला इसीलिये एक घटना कहलायेगा क्योंकि उसने शिया समुदाय के रूप में एक नए सामूहिक प्रमाता (subject) को जन्म दिया । 

ईरान का आधुनिक इतिहास, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का इतिहास गवाह है कि वहां कर्बला की स्मृति को एक राजनीतिक रूप दिया गया। इसने वहां राजनीति को धर्म और नैतिकता के संघर्ष के रूप में देखने की नई परंपरा शुरू की, शहादत को प्रतिरोध की शक्ति बनाया और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को धार्मिक-ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ा । इसीलिये यह अकारण नहीं है कि आधुनिक ईरानी राजनीतिक भाषा में कर्बला का संदर्भ बार-बार आता है। 

बहरहाल, आज के ईरान और अमेरिका-इजरायल की लड़ाई में कर्बला ही इस युद्ध के ईरानी नैरेटिव की संरचना में एक प्रमुख भूमिका अदा कर रहा है । इसी के चलते यह युद्ध केवल हथियारों से लड़ा जा रहा रणनीतिक संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि सत्य और शक्ति का टकराव का रूप लेता जा रहा है। बाद्यू के सत्य-विधि (truth-procedure) की प्रक्रिया में हमेशा नई राजनीतिक कल्पनाएँ जन्म लेती हैं, नए गठबंधन बनते हैं और पुराने शक्ति-संतुलन टूट जाते हैं । इतिहास में बार-बार देखा गया है कि बड़े युद्धों के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदल जाती है। प्रथम विश्व युद्ध से राष्ट्र संघ की उत्पत्ति हुई, द्वितीय विश्व युद्ध से संयुक्त राष्ट्र संघ बना । इसके अलावा समकालीन राजनीति में युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं होता, वह प्रतीकात्मक युद्ध भी होता है। नैरेटिव, स्मृति, धार्मिक प्रतीक − इन सबका प्रयोग राजनीतिक वैधता पाने के लिए भी किया जाता है। कर्बला का प्रतीक इसी कारण मध्य-पूर्व की राजनीति में अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक है।

यह सच है कि हर युद्ध को “सत्य की घटना” नहीं कहा जा सकता है । यह घटना (Event) केवल संघर्ष नहीं, बल्कि ऐसा क्षण होता है जो मानवता के लिए एक नए सार्वभौमिक सत्य का द्वार खोलता है। आज यह एक अनोखी बात है कि इस युद्ध के बीच से एक ‘शहादत-स्मृति से संचालित’ राज्य ईरान एक ऐसे प्रमाता के रूप में उभर कर सामने आया है जो दुनिया को एक नई विश्व-व्यवस्था के सत्य के उदय का साक्षात्कार कराता जान पड़ता है । अयातुल्ला अली खामनेई ने अमेरिकी साम्राज्यवाद-जियोनवादी इज़रायल के एपस्टीनपंथी, दुनिया के सबसे ताक़तवर अनैतिक गठबंधन को सीधी चुनौती दे कर ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी कि अब ईरान के नए सुप्रीम नेता मुज्तबा खामनेई युद्ध के अंत की ऐसी शर्तें पेश कर पा रहे हैं जो अभी की विश्व-व्यवस्था की सीमाओं से परे जाती है । वे सीधे मांग कर रहे हैं कि अमेरिका को पूरे मध्यपूर्व से अपने सैनिक अड्डों को समेट लेना होगा, ईरान की सार्वभौमिकता का सम्मान करना होगा, उस पर लगी सब पाबंदियों को खत्म करना होगा । अन्यथा, ईरान परमाणु बम को भी उतारेगा, नए वैश्विक सामरिक गठबंधन में शामिल होगा । इन शर्तों को मानने का अर्थ होगा विश्व शक्ति-संतुलन का पूरी तरह से उलट-पुलट जाना ।  

इसीलिये हम यह देख पा रहे हैं कि अमेरिका ने युद्ध शुरू किया होगा, पर उसका ऐतिहासिक अर्थ अब उसके नियंत्रण में नहीं रहा ।  अब इसका अंत ईरान ही करेगा । 


सोमवार, 2 मार्च 2026

ईरान युद्ध, तेल और प्रभुत्व की चिंता से जुड़ी अमेरिकी बदहवासी

(अमेरिकी प्रमाता के संकट की एक मनोविश्लेषणात्मक-भूराजनीतिक व्याख्या की कोशिश) 


– अरुण माहेश्वरी





आज ईरान के साथ अमेरिका और उसके सहयोगियों का युद्ध केवल एक क्षेत्रीय सैन्य संघर्ष नहीं है। इसे केवल मिसाइलों, विमानों, या सामरिक चालों के स्तर पर समझना इस घटना के वास्तविक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह युद्ध वस्तुतः उस महाशक्ति के अस्तित्वगत संकट का प्रकटीकरण है, जिसने लगभग आठ दशकों तक स्वयं को विश्व-व्यवस्था के अंतिम संरक्षक और निर्णायक केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यह संकट केवल बाहरी शक्ति-संतुलन का संकट नहीं है; यह स्वयं अमेरिका के प्रमाता-स्वरूप—उसके subject-position—के भीतर उत्पन्न हुआ संकट है। यह वह क्षण है जब एक सत्ता अपनी ही निर्मित पूर्णता की छवि के विघटन से गुजर रही है, और उसी विघटन की बदहवासी में अपने सबसे गहरे सत्य को उजागर कर रही है।


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने जो स्थान प्राप्त किया, वह केवल सैन्य विजय का परिणाम नहीं था। उसने एक ऐसी प्रतीकात्मक व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें उसकी शक्ति विश्व-व्यवस्था की अनिवार्य शर्त बन गई। डॉलर वैश्विक विनिमय का आधार बना, अमेरिकी सैन्य गठबंधनों ने सुरक्षा की अंतिम गारंटी का रूप लिया, और उसकी सांस्कृतिक-तकनीकी शक्ति ने उसे आधुनिकता के छविमूलक केंद्र के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं रहा; वह एक प्रतीकात्मक सत्ता बन गया—एक ऐसा “विश्व-प्रमाता” जिसके अस्तित्व पर पूरी पूंजीवादी विश्व-व्यवस्था का विश्वास टिका हुआ था।


परंतु मनोविश्लेषण हमें बताता है कि कोई भी सत्ता अपने भीतर एक अभाव (lack) को छिपाए बिना इस प्रकार की पूर्णता का दावा नहीं कर सकती। सत्ता की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि इस अभाव को अभाव के रूप में पहचाना न जाए। जैसे ही यह अभाव प्रकट होता है, सत्ता का अस्तित्वगत संकट प्रारंभ हो जाता है। आज अमेरिका की स्थिति में यही हो रहा है। वह विश्व का सबसे अधिक ऋण-ग्रस्त राष्ट्र है। उसकी सैन्य संरचना पर होने वाला व्यय उसकी आर्थिक संरचना पर असाधारण दबाव डाल रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण, चीन का उदय पहली बार उसके अद्वितीय प्रभुत्व के मिथक को वास्तविक चुनौती दे रहा है। यह चुनौती केवल शक्ति-संतुलन का परिवर्तन नहीं है; यह उसकी आत्म-छवि पर लगा हुआ आघात है।


यहाँ यह समझना आवश्यक है कि अमेरिका का यह संकट केवल मनोवैज्ञानिक या प्रतीकात्मक स्तर का संकट नहीं है। इसके पीछे एक ठोस भौतिक आधार है। अमेरिकी प्रभुत्व की आर्थिक संरचना लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र के तेल और पेट्रो-डॉलर व्यवस्था पर टिकी रही है। तेल केवल एक ऊर्जा-संसाधन नहीं है; वह उस वित्तीय संरचना का आधार है जिसने डॉलर को वैश्विक मुद्रा के रूप में स्थापित किया। खाड़ी के तेल के वैश्विक व्यापार का डॉलर में होना ही अमेरिकी वित्तीय शक्ति की वास्तविक नींव रहा है। इसी ने अमेरिका को यह क्षमता दी कि वह अपने बढ़ते ऋण-भार के बावजूद विश्व-अर्थव्यवस्था का केंद्र बना रहे।


इस प्रकार खाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण अमेरिका के लिए केवल सामरिक प्रश्न नहीं है; यह उसके आर्थिक अस्तित्व का प्रश्न है। यदि इस क्षेत्र पर उसका निर्णायक प्रभाव कमजोर पड़ता है, यदि तेल-व्यापार में वैकल्पिक व्यवस्थाएँ उभरती हैं, यदि खाड़ी के देश अन्य शक्तियों—विशेषतः चीन—की ओर झुकते हैं, तो यह केवल एक क्षेत्रीय परिवर्तन नहीं होगा। यह अमेरिकी प्रभुत्व की वित्तीय नींव को ही हिला देगा। इस अर्थ में ईरान के साथ उसका संघर्ष केवल सुरक्षा-संबंधी संघर्ष नहीं है; यह उस आर्थिक संरचना को बनाए रखने का संघर्ष है जिस पर उसका वैश्विक प्रभुत्व टिका हुआ है।


परंतु यहीं एक निर्णायक विरोधाभास उत्पन्न होता है। जब किसी शक्ति को अपने आर्थिक प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए बार-बार सैन्य आक्रामकता का सहारा लेना पड़े, तो यह उसकी शक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि उसके संकट का संकेत बन जाता है। क्योंकि वास्तविक प्रभुत्व वह होता है जिसे बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता न पड़े। जिस क्षण प्रभुत्व को सिद्ध करना पड़े, उसी क्षण उसका अभाव प्रकट हो चुका होता है।


डोनाल्ड ट्रंप का “Make America Great Again” का नारा इसी अभाव की राजनीतिक अभिव्यक्ति है। यह नारा केवल एक चुनावी नारा नहीं है; यह उस खोई हुई पूर्णता को पुनः प्राप्त करने की सामूहिक कल्पना है, जिसका अस्तित्व अब केवल अतीत में है। “फिर से महान बनाना” इस बात की स्वीकारोक्ति है कि महानता अब स्वयंसिद्ध नहीं रही। इस प्रकार यह नारा समाधान नहीं, बल्कि संकट का लक्षण है—एक ऐसी कल्पना जो अभाव को ढँकने का प्रयास करती है, पर उसे समाप्त नहीं कर सकती।


मनोविश्लेषण के सिद्धांत के अनुसार, जब सत्ता अपने प्रतीकात्मक आधार को खोने लगती है, तो वह वास्तविक हिंसा के माध्यम से अपनी शक्ति को प्रमाणित करने का प्रयास करती है। यही वह बिंदु है जहाँ बदहवासी जन्म लेती है। बदहवासी केवल भय की अवस्था नहीं है; यह उस आक्रामक सक्रियता की अवस्था है जिसमें सत्ता अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लगातार क्रिया करती रहती है। परंतु यही क्रिया उसके अभाव को और अधिक स्पष्ट कर देती है।


ईरान के साथ युद्ध इसी बदहवासी का परिणाम है। यह युद्ध केवल ईरान को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं है; यह उस प्रतीकात्मक संरचना को बनाए रखने का प्रयास है जिसमें अमेरिका विश्व-प्रमाता के रूप में स्थापित रहा है। परंतु युद्ध-क्षेत्र से आ रही घटनाएँ—चाहे वे सैन्य क्षति की खबरें हों, या सहयोगियों की असुरक्षा की भावना—इन सबका महत्व केवल उनके सामरिक परिणाम में नहीं है। उनका महत्व इस तथ्य में है कि वे उस अजेयता के मिथक में दरार के संकेतक बन रही हैं जिस पर अमेरिकी प्रभुत्व टिका हुआ था।


इस युद्ध का एक और महत्वपूर्ण परिणाम खाड़ी के देशों की प्रतिक्रिया में दिखाई देता है। दशकों से ये देश अमेरिकी सुरक्षा-गारंटी पर निर्भर रहे हैं। परंतु आज यदि वे यह अनुभव करने लगते हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की सार्वभौमिक गारंटी नहीं रहा, बल्कि एक सीमित और पक्षधर शक्ति बन गया है, तो यह एक गहरे प्रतीकात्मक परिवर्तन का संकेत है। यह उस विश्वास के विघटन का संकेत है जिस पर अमेरिकी प्रभुत्व टिका हुआ था।


जब सहयोगी अपने संरक्षक पर से विश्वास खोने लगते हैं, तो यह किसी भी महाशक्ति के संकट का सबसे स्पष्ट संकेत होता है। क्योंकि महाशक्ति की शक्ति केवल उसके शत्रुओं पर नहीं, बल्कि उसके सहयोगियों के विश्वास पर टिकी होती है। जैसे ही यह विश्वास डगमगाने लगता है, उसकी शक्ति का प्रतीकात्मक आधार टूटने लगता है।


इस स्थिति को यदि हम एक व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका का वर्तमान संकट केवल एक राष्ट्र का संकट नहीं है। यह उस पूरी विश्व-व्यवस्था का संकट है जिसका केंद्र वह रहा है। यह उस ऐतिहासिक संरचना का संकट है जिसमें पूंजीवादी प्रभुत्व, तेल-आधारित वित्तीय व्यवस्था, और सैन्य शक्ति का संयोजन शामिल रहा है।


अभिनवगुप्त के स्पन्द सिद्धांत की भाषा में कहें तो यह चिति के विक्षोभ का क्षण है—वह क्षण जब चेतना अपनी ही सीमा का अनुभव करती है। यह विक्षोभ केवल विघटन नहीं है; यह एक नई संरचना के जन्म का संकेत भी है। इसी प्रकार अमेरिका का संकट केवल उसके प्रभुत्व के अंत का संकेत नहीं है; यह एक नई विश्व-व्यवस्था के उद्भव का संकेत भी है।


इस प्रकार अमेरिका की आक्रामकता को उसकी शक्ति के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि उसके प्रतीकात्मक और आर्थिक अभाव के लक्षण के रूप में देखना चाहिए। उसकी हर आक्रामक कार्रवाई उसके उस प्रयास का हिस्सा है जिसके माध्यम से वह अपने प्रभुत्व को बनाए रखना चाहता है। परंतु उसी प्रयास में उसका अभाव और अधिक स्पष्ट होता जाता है।


अंततः यह कहा जा सकता है कि महाशक्तियों का वास्तविक संकट उनकी सैन्य पराजय में नहीं, बल्कि उस क्षण में निहित होता है जब उनकी अपरिहार्यता का विश्वास टूट जाता है। आज अमेरिका इसी क्षण से गुजर रहा है। उसकी आक्रामकता उसके प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, पर उसी में उसके प्रभुत्व की सीमाएँ भी उजागर हो रही हैं।


और हम यह भी जोड़ना चाहेंगे कि ऐसे संकट में फँसी महाशक्तियाँ अपनी पराजय से नहीं, बल्कि अपनी बदहवासी से पहचानी जाती हैं।