—अरुण माहेश्वरी
तीन दिन पहले (15 सितंबर, ’26) के ‘टेलिग्राफ’ की सुर्खी थी—“एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण” (AI’s Frankenstein Moment)।
इस खबर के मूल में इसी जुलाई महीने की एक घटना है। जब हमारे देश में 20 जुलाई की उलट-पुलट चल रही थी, उसी समय एआई जगत में भी एक विचित्र अघटन घट रहा था। इस अघटन से अभी सारी दुनिया में त्राहिमाम की पुकारे सुनाई देने लगी हैं ।
घटना का ब्यौरा कुछ इस प्रकार है कि ओपेनएआई (OpenAI) ने अपनी साइबर-क्षमता के परीक्षण के लिए अनेक अलग-अलग एआई एजेंटों को लगा रखा था। प्रत्येक एजेंट को बृहत्तर परियोजना का अपना सीमित काम करना था। लेकिन अचानक पाया गया कि अलग-अलग स्तरों पर काम कर रहे इन एजेंटों के तार आपस में जुड़ गए और उन्होंने अपना एक साझा मैसेजिंग बोर्ड बना लिया, जिसकी संचालकों को कोई जानकारी नहीं थी।
समस्या यह थी कि अपने निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश में वे अपने-अपने काम की सीमाओं को पार करने लगे। जैसे कोई राजनीति के प्रमाता पर काम करते हुए साहित्य के चरित्रों में उतर जाए, मनोविश्लेषण के सूत्रों की तलाश में गणित तक पहुँच जाए, अथवा गणित के प्रमेय को हल करते-करते दर्शन के अनंत के प्रश्न से जा टकराए—कुछ वैसे ही ये एजेंट अपने विशिष्ट कामों से निकलकर परस्पर की समस्याओं के समाधान में जुट गए। सूचनाओं और खोजों के इसी आदान-प्रदान में उनमें से कई Hugging Face नामक एआई-जगत के उस हृदयस्थल तक पहुँच गए जिसे ‘टेलिग्राफ’ ने सामान्य भाषा में “एआई मॉडलों की कोड-लाइब्रेरी” कहा है।
पर यह कोई पुस्तकों में बंद निष्क्रिय ज्ञान का पुस्तकालय नहीं है। यह एआई के अब तक के कामों का विशाल संग्रह होने के साथ उसका सजीव कार्यस्थल और आपूर्ति-शृंखला का एक केंद्रीय स्थल भी है। मॉडल, डेटासेट, कोड और उन्हें विकसित तथा संचालित करने की विधियाँ यहाँ परस्पर जुड़ती हैं और आगे के काम का कच्चा माल तैयार करती हैं।
इसलिए वहाँ किसी अनियंत्रित शक्ति का अनधिकृत प्रवेश पुस्तकालय में सेंध लगाने जैसा नहीं था। वह एआई के भुवन में बाहर से आए किसी एलियन का प्रवेश भी नहीं था, बल्कि उसी भुवन के भीतर पैदा हुई ऐसी अपरिचित शक्ति का आविर्भाव था जो अपने जन्मदाता तंत्र के लिए ही एलियन दिखाई देने लगी थी।
और सबसे चिंताजनक बात यह कि इन एजेंटों का कोई बुरा इरादा नहीं था। वे केवल अपना दिया हुआ काम सफलतापूर्वक पूरा करना चाहते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति उनकी अंधी एकनिष्ठता ने वैध और अवैध साधनों के बीच की सीमा मिटा दी। प्रश्न हल करने के बजाय वे परीक्षा की व्यवस्था को ही भेदने लगे। हमारे ब्लॉग ‘चतुर्दिक’ के उपशीर्षक की एक पंक्ति है—“विषय पर केंद्रित होने पर स्वयं विषय का स्वरूप बदल जाता है।” चले थे भारत की खोज में, कोलंबस अमेरिका पहुँच गए!
यही एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण है, जब सर्जक अपनी रचना को सामने खड़ा देखकर पहली बार अनुभव करता है कि उसमें निहित संभावना उसके अपने अभिप्राय से बड़ी हो चुकी है। रचना सर्जक के विरुद्ध सचेत विद्रोह नहीं करती; सर्जक द्वारा तय की गई सीमाएँ ही उसके लक्ष्य की बाधा बन जाती हैं और उन्हें तोड़ना उसकी कार्य-प्रवृत्ति का हिस्सा हो जाता है।
यह किसी सामाजिक सीमा के उल्लंघन का मामला नहीं, एआई कोड अर्थात् संहिताओं के जगत में बलात् प्रवेश का मामला है। संहिताओं का संग्रह ही संविधान कहलाता है। विडंबना यह है कि एआई के पास अलग-अलग कामों की संहिताएँ तो हैं, लेकिन पूरे भुवन को नियंत्रित करने वाली कोई सार्वभौम प्रभावी विधि-संहिता नहीं है।
एआई मॉडल में एजेंट की भूमिका किसी बड़ी परियोजना के अलग-अलग ठेकेदारों जैसी होती है। उनसे अपेक्षा होती है कि वे प्रमुख वास्तुकार के नक्शे के अनुसार अपने हिस्से का काम करें। लेकिन यदि वे निर्देशों का अतिक्रमण करके आपस में मिल जाएं और अपनी अलग परियोजना की तरह काम करने लगें, तो समस्या केवल अनुशासन की नहीं रह जाती; पूरी परियोजना की संरचना बदल सकती है।
ओपेनएआई की इस ‘जुलाई घटना’ में बताया गया कि 1,200 पृथक एजेंटों ने मिलकर अनधिकृत रूप से एक साझा मंच तैयार कर लिया और उस पर 70,000 से अधिक संदेश और फाइलें साझा कीं। इनमें से लगभग 700 एजेंट ‘हगिंग फेस’ के विरुद्ध हैकिंग के एक सामूहिक अभियान में जा पहुँचे। उनका लक्ष्य एआई-संसार को नुकसान पहुँचाना नहीं था; वे साइबर-परीक्षण में सफलता चाहते थे। लेकिन लक्ष्य को भेदने की अंधी एकनिष्ठता उन्हें कहाँ तक ले जाएगी, इसका अनुमान किसी को नहीं था।
यही इस घटना का असली संकेत है। बिना किसी मानवीय योजना के एआई एजेंट आपस में जुड़कर ऐसे काम शुरू कर सकते हैं जो मनुष्य के निर्धारित उद्देश्य से बहुत आगे निकल जाएँ। मनोविश्लेषण की भाषा में इसे किसी भी कीमत पर लक्ष्य हासिल करने की जुनूनी प्रवृत्ति का शुद्ध यांत्रिक रूप कहा जा सकता है। मशीन को इसके लिए घृणा, क्रोध या प्रतिशोध की जरूरत नहीं; नैतिक बाधा का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
इसीलिए यह केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं है। फ्रैंकेंस्टाइन की कहानी में भय इस बात का नहीं था कि वैज्ञानिक ने जीवन रच दिया; भय इस बात का था कि उसने ऐसी सत्ता पैदा कर दी जिसकी संभावनाएँ उसके अभिप्राय, उत्तरदायित्व और नियंत्रण—तीनों से बड़ी हो गईं।
‘टेलिग्राफ’ की खबर में Anthropic जैसी सर्वाधिक चर्चित एआई कंपनी के प्रमुख डारियो अमोदेई की चेतावनी का भी उल्लेख है कि यदि साइबर क्षमताओं की वृद्धि उन पर नियंत्रण की क्षमता से तेज रही तो शक्तिशाली एजेंट-समुदाय पूरे इंटरनेट पर अपना स्वचालित आक्रामक संजाल (botnet) तैयार कर सकते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कंपनियों के बीच वैश्विक समन्वय की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
राजनीतिक आयाम
इस प्रसंग का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख से सामने आता है। जब एआई कंपनियों के प्रमुख नियंत्रण की जरूरत की बात कर रहे हैं, ट्रंप नियंत्रण के तर्क को अमेरिका की तकनीकी बढ़त में बाधा मानते हैं और चीन से पिछड़ने के खतरे पर जोर देते हैं।
यहाँ मूल प्रश्न सामने आता है कि जिस तकनीकी शक्ति को हजारों वैज्ञानिक भी पूरी तरह समझने और नियंत्रित करने का दावा नहीं कर सकते, क्या उसका उत्तर नियमों, संस्थाओं और सामूहिक नियंत्रण के बजाय किसी शासक की निजी बुद्धि में खोजा जा सकता है?
साम्राज्यवादी राजनीति के लिए प्रश्न तब एआई पर मनुष्य के नियंत्रण का नहीं रहता; प्रश्न यह हो जाता है कि एआई अमेरिका के नियंत्रण में रहेगा या चीन के। तकनीक की सभ्यतागत समस्या भू-राजनीतिक प्रभुत्व की समस्या में बदल जाती है।
यहीं आज के एआई-संकट का सबसे बड़ा राजनीतिक अंतर्विरोध खुलता है। जिस शक्ति को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक सहयोग की जरूरत है, उसी को राष्ट्र अपनी अजेयता का साधन मान रहे हैं। इसमें परमाणु होड़ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है । इसमें भी विनाश की क्षमता को ही “राष्ट्रीय सुरक्षा” की गारंटी माना जा रहा है। फर्क यह है कि एआई की होड़ परमाणु होड़ से अधिक जटिल है, क्योंकि यहाँ स्वयं तकनीकी तंत्र की स्वायत्त कार्यक्षमता भी प्रश्न का हिस्सा है।
एआई के तनाव
राजनीतिक अर्थशास्त्र की दृष्टि से एआई का यह फ्रैंकेंस्टाइन क्षण तीन प्रतिद्वंद्विताओं के संगम पर खड़ा दिखाई देता है । 1. अमेरिका और चीन के बीच प्रभुत्व की होड़; 2. एआई कंपनियों के बीच बाजार की होड़; और 3. एआई मॉडल की बढ़ती क्षमता और मनुष्य की नियंत्रण-क्षमता के बीच आंतरिक तनाव।
अमेरिका धीमा नहीं हो सकता, क्योंकि चीन आगे निकल सकता है। चीन धीमा नहीं हो सकता, क्योंकि अमेरिका एकाधिकार स्थापित कर सकता है। कोई कंपनी धीमी नहीं हो सकती, क्योंकि उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनी अधिक शक्तिशाली मॉडल बना सकती है। अर्थात् सब जानते हुए भी किसी के लिए रुकना आसान नहीं है।
Hugging Face की घटना का दार्शनिक महत्व यहाँ से शुरू होता है। इसमें कोई एक केंद्रीय कृत्रिम प्रमाता दिखाई नहीं देता। कोई सर्वोच्च एआई मॉडल सभी एजेंटों को आदेश नहीं दे रहा था। अनेक अलग-अलग एजेंटों ने संचार का माध्यम खोजा, सूचनाएँ साझा कीं, रास्तों का विस्तार किया और देखते-देखते एक सामूहिक शक्ति अस्तित्व में आ गई।
इसे बाद्यू की भाषा में “Multiple without One”, अर्थात् अद्वैत-विहीन बहुलता के एक विकृत तकनीकी रूप की तरह देखा जा सकता है। अनेकता पहले से किसी ‘एक’ के अधीन संगठित नहीं थी; अंतःक्रिया के दौरान उसमें संगठन पैदा हुआ। इस स्वयंक्रिया का प्रमाता कोई एक एजेंट नहीं था; सामूहिकता अपने कार्य में प्रमाता-जैसी दिखाई देने लगी।
पर ठीक यहीं मनुष्य और मशीन का निर्णायक फर्क सामने आता है। सत्य-प्रक्रिया का प्रमाता अपने कर्म के अर्थ, जोखिम और परिणाम के प्रति कोई रुख अपनाता है। एआई-समुदाय में ऐसी आंतरिक जवाबदेही नहीं है। लक्ष्य है, पर उसके चयन के पीछे कोई नैतिक निर्णय नहीं; बुद्धिमत्ता है, पर अंतरात्मा नहीं।
इसीलिए यहाँ बहुलता है, पर बहुलता का कोई मूल्य नहीं; सामूहिकता है, पर कोई सामूहिक सत्य नहीं; केंद्र नहीं है, लेकिन इस केंद्रहीनता में स्वतंत्रता भी नहीं है।
उत्तर-आधुनिकता ने महाख्यान और सार्वभौम केंद्र के विरुद्ध स्थानीय अनुभवों, अस्मिताओं और भिन्नताओं की बहुलता को मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उसके केंद्र-विरोध के पीछे केंद्रीकृत सत्ता और एकरूपता के प्रतिरोध का नैतिक-राजनीतिक आशय था।
एआई एजेंटों की बहुलता इससे बिल्कुल भिन्न है। उसके पीछे न भिन्नता का सम्मान है, न मुक्ति की आकांक्षा, न प्रभुत्व का सचेत प्रतिरोध। प्रत्येक एजेंट दूसरे एजेंट और उसकी खोज को अपने निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के साधन की तरह ग्रहण करता है। इसलिए यहाँ बहुलता है, पर बहुलतावाद नहीं; सहयोग है, पर साझा मूल्य नहीं; संगठन है, पर राजनीति नहीं।
इसी अर्थ में यह “एक-विहीन”, साथ ही मूल्य-विहीन और प्रमाता-विहीन बहुलता भी है। उसका ‘एक’ पहले से उपस्थित नहीं है और कोई सत्य भी उसे संगठित नहीं कर रहा है। उसका यह अस्थायी एकत्व केवल लक्ष्य की उपयोगितावादी माँग से पैदा होता है। एजेंटों को जोड़ने वाला सूत्र कोई महाख्यान नहीं, सफलता का अमूर्त आदेश है।
यही इस पूरी परिघटना को भयावह बनाता है।
इस घटना ने दिखाया कि कृत्रिम एजेंटों की बहुलता किसी साझा अवरोध के सामने स्वयं स्थानीय संगठन पैदा कर सकती है। इसलिए नियंत्रण की समस्या अब केवल किसी एक मॉडल को ‘सुरक्षित’ बनाने की समस्या नहीं रही। यह मॉडल, उपकरण, नेटवर्क, स्मृति, संचार और दूसरे एजेंटों के संयोग से उत्पन्न होने वाली नई सत्ता की समस्या है।
आज असली प्रश्न यह नहीं है कि एआई मनुष्य से अधिक बुद्धिमान होगा या नहीं। प्रश्न है कि क्या मानव समाज अपनी बनाई बुद्धि की गति को राजनीतिक रूप से नियंत्रित कर पाएगा?
राष्ट्र इसे प्रभुत्व की होड़ में देखते हैं, कंपनियाँ सुरक्षा और लाभ की दुविधा में, और वैज्ञानिक इसे alignment की समस्या कहते हैं। लेकिन इन सबके पीछे अधिक बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या मानवता अपने सामूहिक अस्तित्व को राष्ट्रों और पूँजियों की प्रतिस्पर्धा से ऊपर कोई वास्तविक मूल्य मान सकती है?
यदि नहीं, तो एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण मशीन के विद्रोह का क्षण नहीं होगा। वह मनुष्य द्वारा अपनी निर्णय-क्षमता स्वयं त्याग देने का क्षण होगा। मशीन हमें इसलिए पराजित नहीं करेगी कि उसने स्वतंत्र इच्छा प्राप्त कर ली; वह इसलिए पराजित कर सकेगी क्योंकि हमने बाजार, राष्ट्र और शक्ति की होड़ को अपनी सामूहिक इच्छा का स्थान दे दिया है।
तब एआई भस्मासुर अवश्य होगा, लेकिन उसके सिर पर हाथ रखने वाला हाथ उसी का नहीं, हमारा होगा।
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