बुधवार, 5 अगस्त 2020

राम मंदिर के शिलान्यास का भव्य सरकारी आयोजन किस बात के संकेत देता है ?


­अरुण माहेश्वरी

आज सभ्यता के सबसे बड़े संकट कोरोना के काल में भारत में राम जन्मभूमि मंदिर के शिलान्यास का जो भव्य आडंबरपूर्ण कार्यक्रम संपन्न हुआ वह भारतीय राज्य की धार्मिक निष्ठा की शक्ति का नग्न प्रदर्शन था । जिस काल में राज्य की स्वास्थ्य, शिक्षा और जन-कल्याणकारी पाशुपत शक्ति को संजोने और पूरी निष्ठा के साथ उसको सामने लाने की जरूरत है, उस काल में धार्मिक आस्था के विषय को राष्ट्र की सबसे प्रमुख जरूरत के रूप में पेश करना ही इस सच को दर्शाता है कि अभी भारत में राष्ट्र की प्राथमिकताएं किस हद तक अपनी धुरी से हट कर पूरी तरह से गड्ड-मड्ड हो चुकी है । इसके भारी दुष्परिणाम हम रोजमर्रा के सामाजिक-आर्थिक जीवन में देख ही रहे हैं । किसी भी सामाजिक-आर्थिक समस्या का तो जैसे कहीं कोई अंत ही नहीं दिखाई देता है । सबसे दुर्भाग्यजनक बात यह है कि सरकार को खुद इस देश की वास्तविकता का कोई बोध नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसने इन छः सालों में अपने दैनंदिन राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए सभी आर्थिक-सामाजिक तथ्यों के आंकड़ों को इस हद तक विकृत कर दिया है कि पुख्ता सूचनाओं के आधार पर सटीक नीतिगत निर्णयों तक पहुंचना आज सबसे अधिक दुष्कर काम हो चुका है । विडंबना देखिये कि इस संकट के काल में आज सभी प्रमुख अर्थनीतिविदों की भारत सरकार से सबसे बड़ी और पहली मांग यह है कि वह तत्काल ऐसे जरूरी कदम उठाए जिनसे सब को अर्थनीति संबंधी सही आंकड़े उपलब्ध हो सके । तभी अर्थव्यवस्था के रोगों के निदान का भी कोई सटीक रास्ता खोज पाना संभव होगा ।  
यहां तक कि कोरोना के इलाज और वैक्सिन के मामले में भी सरकार का यही रुख दिखाई देता है । हर रोज सरकार की ओर से झूठे आंकड़े दिये जाते हैं और झूठी आशाओं से सच पर पर्दा डाला जाता है । यथार्थ परिस्थिति के बारे में राष्ट्र को, और खुद सरकार के अलग-अलग विभागों को भी पूरी तरह से अंधेरे में रखा जाता है । आज के ‘टेलिग्राफ’ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में वैक्सिन को विकसित करने के काम में लगे खास गवेषकों ने इसके बारे में आईसीएमआर के दावों को बिल्कुल झूठा बताया है । 

बहरहाल, इन तमाम कारणों से ही आज देश पूरी तरह से अस्त-व्यस्त नजर आता है । सरकार की विफलताएँ जीवन के सभी क्षेत्रों में उसकी नाना प्रकार की अतियों के जरिये भी व्यक्त होती है । इसे हम सीमा की रक्षा से लेकर जनता के मूलभूत अधिकारों की रक्षा और आर्थिक नीतियों के मामले में भी साफ देख सकते हैं । 

इन हालात में पूरी सरकार का एक मंदिर के निर्माण को सबसे बड़ी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना सिर्फ और सिर्फ धर्म-आधारित राजनीति का ही एक विचारधारात्मक मुद्दा हो सकता है । जो लोग अपनी धार्मिक आस्था के चलते बड़ी मासूमियत से यह कह रहे हैं कि इससे उनके भगवान राम को अपना एक आलीशान घर मिल गया है, वे ऐसे अभागे है जो आज भी पूरी तरह से धर्म और अंधविश्वासों के जंजाल में ही फंसे हुए हैं । बुद्धि और विवेकवाद के वैज्ञानिक प्रकाश से वंचित वे ही तमाम प्रकार के बाबाओं और धर्मगुरुओं के कारोबार के विषय बने हुए हैं । मानसिक तौर पर वे इतने अविकसित है कि उनके दिमाग में इसकी प्रयोजनीयता के बारे में, एक आधुनिक राष्ट्र की प्राथमिकताओं के बारे में कोई सवाल ही नहीं पैदा हो सकते हैं । वे संशयहीन हो कर धर्म को ही आधुनिक राष्ट्र की आत्मा बताते हैं और पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि राम भारत की आत्मा है, उनके लिये एक भव्य महल का निर्माण ही भारत का निर्माण है ।
 
शिलान्यास समारोह में आरएसएस के मोहन भागवत और प्रधानमंत्री मोदी, दोनों ने ही इस मंदिर के निर्माण को राष्ट्र के उस आत्म-विश्वास की उपलब्धि बताया जो उनके अनुसार किसी भी राष्ट्र के आगे आत्म-निर्माण के लिये जरूरी होता है । धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले आरएसएस की यह हमेशा की जानी-पहचानी नीति रही है कि पहले बहुसंख्यक हिंदू धर्मावलंबियों में उग्र और जुझारू धार्मिक भावनाएं जाग्रत की जाए, राष्ट्र के निर्माण का रास्ता स्वतः खुल जाएगा । यही वजह रही है कि आरएसएस ने देश की सभी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के केन्द्र में हमेशा धर्म को रखा । जीवन के जिन तमाम पक्षों में धर्म का कोई स्थान नहीं होता है, वैसे लौकिक विषय कभी भी संघ की सोच के गंभीर विषय नहीं बन पाएँ हैं । 

कहना न होगा, आरएसएस के लोगों के मस्तिष्क की इसी धर्म-केंद्रित संरचना का खामियाजा पिछले छः साल से हमारा देश चुका रहा है जब देश की पूरी सत्ता आरएसएस के हाथ में आ चुकी है । आर्थिक, कूटनीतिक और जन-कल्याण के तमाम सामाजिक सवालों पर मोदी सरकार की विफलताओं का इन छः सालों में जो एक विशाल पहाड़ तैयार हो गया है, उसके मूल में भी मोदी और उनके पूरे दल-बल का यही मानस काम कर रहा है जिसमें राष्ट्रीय निर्माण के तमाम आधुनिक वैज्ञानिक पहलू कभी उभर ही नहीं पाते हैं । 
    
यह सही है कि किसी भी विचारधारा में कर्मकांडी आडंबरपूर्ण आयोजनों का काफी महत्व होता है । कर्मकांड का तात्पर्य ही यह है कि जो तबका मानसिक तौर पर इतना विकसित नहीं होता है कि बौद्धिक स्तर पर विचारधारा को आत्मसात कर जरूरी निष्ठा को अर्जित कर सके, उसकी आस्था और निष्ठा को सुनिश्चित करने के लिये उसे कर्मकांडों के आयोजनों में फंसा कर रखा जाए । यह वैसे ही है जैसे उपनिषद् कभी किसी कर्मकांड का विधान नहीं करतें । उपनिषदों के महान भाष्यकार शंकराचार्य कहते हैं कि जो वैदिक कर्मकांड अनुष्ठानादि करते हैं वे निम्न स्तर के होते हैं । उपनिषद् ज्ञानियों के लिए हैं जो सांसारिक एवं भौतिक सुखों से उपरत हों गए हैं और जिनके लिए वैदिक कर्मकांड का कोई विशेष प्रयोजन नहीं रह गया है । कहने का मतलब है कर्मकांड सिर्फ लाठियां भांजने वाले कार्यकर्ताओं को उलझाए रखने के लिए होते हैं, किसी ज्ञान चर्चा, निर्माण के सुचिंतित कामों के लिए नहीं । 

हमारा दुर्भाग्य है कि राष्ट्र सिर्फ लाठी भांजने वालों के हाथ में चला गया है । इसीलिये पंडित नेहरू ने आधुनिक सिंचाई और औद्योगिक प्रकल्पों को आधुनिक भारत के मंदिर कहा था, वहीं मोदी और संघ परिवार भगवान के मंदिर को ही आधुनिक राष्ट्र की आत्मा बता रहे हैं । आज के काल में सारी दुनिया में आतंकवाद ऐसी धर्म-आधारित उग्र राजनीति के कोख से ही पैदा हुआ है । रामजन्म भूमि को हथियाने का कथित संविधान-सम्मत तरीका कितना संविधान-सम्मत रहा है, इसे राजनीति के जगत का बच्चा भी अच्छी तरह से जानता है । बाबरी मस्जिद को ढहाने से लेकर संविधान की मूलभूत धर्म-निरपेक्ष भावना के साथ किये गये विश्वासघात के इतिहास को यहां दोहराने की जरूरत नहीं है । इसीलिये कहते हैं कि भारत आज क्रमशः उसी आतंकवादी राजनीति के एक सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभरता हुआ दिखाई दे रहा है । गरीबी, कुपोषण और अशिक्षा की तरह की तमाम प्रकार की समस्याओं जूझते किसी भी राष्ट्र पर आधिपत्य की राजनीति का यह सबसे पतनशील रूप बेहद डरावना है ।     
    

रविवार, 2 अगस्त 2020

शमशेर की एक कविता का विखंडन

-अरुण माहेश्वरी 

(‘समालोचन डाट कॉम’ में शमशेर की कविता ‘टूटी हुईबिखरी हुई’ पर सविता सिंह के लेख के संदर्भ में

-अरुण माहेश्वरी 



 आइयेजरा हम शमशेर जी की इस कविता को पंक्ति दर पंक्ति थोड़ा खोल कर पढ़ते हैं  कविता का प्रारंभ होता है कविता की तलाश में  कवि के सामने आए बिंबों से  वह वहाँ हैं जहां दरारें हैंछिद्र और बिखराव हैंअर्थात्जहां जो है और जो नहीं हैदोनों मौजूद हैं  

 

टूटी हुई बिखरी हुई चाय

     की दली हुई पाँव के नीचे

          पत्तियाँ

       मेरी कविता” 

 

कविता की तलाश के साथ ही जुड़ी हुई है शमशेर की खुद की भी एक तलाश  अपनी पहचान का एक रूखा सा चित्रइसमें भी जो हैवह जैसे अपने से अलग हो रहे केंचुल की तरह है  

 

बालझड़े हुएमैले से रूखेगिरे हुएगर्दन से फिर भी

चिपके

         ...कुछ ऐसी मेरी खाल,

         मुझसे अलग-सीमिट्टी में

         मिली-सी

 

इस आदमी की पसलियाँ शाम के वक्त इंतज़ार करती ठेलागाड़ियों की तरह और शरीर रफू किये जा रहे बोरे की तरह है  जो भी हैंवह अभी सूना हैरीता हैबस आगत के लिए हैं  अभी के लिए तो बस एक खुद पर मुस्कुराहट हैइसमें ही जो हैउतना सा कुछ सुकून हैकबूतरों की गुटरगू का ही संगीत है  उसमें गंगा भी मरीचिका की झिलमिल ही हैअर्थात् है भी पर नहीं है  ठोस रूप में अपनी उपस्थिति कीचड़ सी लगने पर भी कवि के एक अहम् की चमक ज़रूर कहीं हैपर वह भी अभी दिखाई नहीं देती है 

 

दोपहर-बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ

जैसे मेरी पसलियाँ...

ख़ाली बोरे सूजों से रफ़ू किए जा रहे हैं... जो

              मेरी आँखों का सूनापन हैं

 

ठंड भी एक मुसकराहट लिए हुए है

           जो कि मेरी दोस्त है.

 

कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...

मैं समझ  सकारदीफ़-क़ाफ़िए क्या थे,

इतना ख़फ़ीफ़इतना हलकाइतना मीठा

                      उनका दर्द था.

 

आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है.

मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

                      और चमक रहा हूँ कहीं...

                       जाने कहाँ.”

 

कवि के स्वर उसका जीवन हैदुख से भरागीलाछप छप करता  उन स्वरों का सच मृत्यु है  इसमें जीवन तो जैसे कोई ज़हर की दुकान है  और हर उपचार एक कोरा भ्रम  

 

इसी रूखी सतह पर गीले कीचड़ के अंधेरे में जैसे अचानक कौंधता है बिजली की तरह एक मांसल प्रेम का अनुभवबाक़ी सब कुछ कोरौंदतापरे धकेलता हुआ सत्य से साक्षात्कार  उसकी तपिश और आँच की वासना में जैसे पूरी कायनात झूम उठती है 

 

मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार

                जिसके स्वर गीले हो गए हैं,

छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है...

                      छप् छप् छप.

 

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है.

वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्वाइज़न’ का लेबुल लिए हुए

                                  दवाइयाँ हँसती हैं

उनके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है.

 

वह मुझ पर हँस रही हैजो मेरे होंठों पर एक तलुए

                               के बल खड़ी है

मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं

      और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह

      खुरच रहे हैं

उसके एक चुंबन की स्पष्ट परछाईं मुहर बनकर उसके

      तलुओं के ठप्पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है

उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है.

 

मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं

       एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ.

मुझको सूरज की किरनों में जलने दो

     ताकि उसकी आँच और लपट में तुम

     फ़ौवारे की तरह नाचो.”

 

अब तक जो सब अधर में थावह अब बेपरवाह ओस के सहारे टपकना चाहता हैगुलाब जल की तरह प्रेम की उनींदी आँख की थकन मिटाना चाहता है पर शमशेर बेहद सजग और संवेदनशील है  वे जानते है कि प्रेम दो प्राणियों के बीच का व्यापार है इसमें कुछ भी एकतरफ़ा नहीं हो सकता है, दोनों का निवेदन ज़रूरी है  दूसरा भी उन संकेतों का ही अनुसरण करेजो अन्य के अंतर के हर कोने से दिये जा रहे हैं  वह भी उन संकेतों की मौज में विचरेउसे जीएँ ; उसे किसी फाँस सा  लगेबल्कि सीने को ठंडक मिले  कवि साँस की तरह उसे पी लेना नहीं चाहता ; बल्कि महबूब अपने वजूद के साथ उससे एकान्वित हो 

 

मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,

    ताकि उसकी दबी हुई ख़ुशबू से अपने पलकों की

    उनींदी जलन को तुम भिंगो सकोमुमकिन है तो.

 

हाँतुम मुझसे बोलोजैसे मेरे दरवाज़े की शर्माती चूलें

सवाल करतीं हैं बार-बार... मेरे दिल के

अनगिनती कमरों से

 

हाँतुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं

      ...जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,

जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं

       जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,

तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ.

 

प्रेम की इस कौंध के साथ ही कवि का शुरू का मृत्युबोध कहीं ग़ायब हो जाता है  नए अहसास के उल्लास में वह अपने सारे बिंबों-प्रतिबिंबों को एक उजली किरण में घुला देना चाहता है  वह अब अपने लिए एक नए कथ्य और रूप की माँग करता है  जो मृतप्राय लगता था उसे मार कर अपने को नए बिंबों की ज़िंदगी कहता है  एक नई खिलखिलाते फूलों जैसी सुबह का आगमन होता है  फूल के आलिंगन में ही रात ख़त्म होती है  यह बिना काँटों का फूलज़मीन को छूती लंबी ज़ुल्फ़ों का फूल थाजो कवि को लपेटे हुए कुछ ऐसा था कि जिसमें खुद कवि ही दुबक कर समा गया था  यह मांसल प्रेम का एक अकुंठ चित्र है  लिपटा हुआ फूल अपनी ख़ुशबू के पाश में जिस मज़े से सब कुछ जकड़ता चला जा रहा था - यह शरीर की सत्ता के अवलोप और मनुष्य की प्राणीसत्ता के सत्य के आगमन का क्षण था  सब विलीन होता हुआबूँद का बूँद में विलय जैसा  

 

शमशेर की मानवीयता देखिएवे यहाँ भी प्रेम के इस लेख में जैसे पेन की नोक जितने दबाव के लिये भी कोई जगह देखना नहीं चाहते वह दबाव सिर्फ किसी दु:स्वप्न में ही संभव है  उत्तेजना के इन क्षणों में दिखाई तो कुछ देता नहीं कि कवि महबूबा के पैरों पर ही गिर जाता  

 

आईनोरोशनाई में घुल जाओ और आसमान में

      मुझे लिखो और मुझे पढ़ो.

आईनोमुसकराओ और मुझे मार डालो.

आईनोमैं तुम्हारी ज़िंदगी हूँ.

 

      कालीबहुत लंबी ज़ुल्फ़ थी जो ज़मीन तक

      साया किए हुए थी... जहाँ मेरे पाँव

      खो गए थे.

 

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को

     अपनी कनखियों में घुलाता हुआमुझ पर

     एक ज़िंदा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा.

 

और तब मैंने देखा कि सिर्फ़ एक साँस हूँ जो उसकी

     बूँदों में बस गई है.

     जो तुम्हारे सीनों में फाँस की तरह ख़ाब में

     अटकती होगीबुरी तरह खटकती होगी.

 

मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा  बन सका,

      क्योंकि मेरे झुकते  झुकते

       उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर

       खो गई थी.” 

 

यह था सत्य से साक्षात्कार का क्षण जिसके बाद बची रह जाती है स्मृतियाँसदा अतृप्त बनाए रखने वाली टीस देने वाली स्मृतियाँजिन्हें फिर कभी वैसा ही हासिल नहीं किया जा सकता है  बाद में मिलता है तो सिर्फ फटा हुआ लिफाफा  अर्थात् समय ने जिसके मजमुए को ओझल कर दिया है  इसीलिये अब अगर कुछ है तो सिर्फ ज़मीन पर पड़ा हुआ एक ख़ाली लिफ़ाफ़ा है  अहसास के ख़ालीपन का कविता में यह एक नया प्रत्यावर्त्तन है।

 

यहीं से फिर कवि को विडंबना का एक नया अवबोध घेरने लगता है  वह देखता है कि कैसे सत्य से एक मुठभेड़ भग्न स्मृतियों के रूप में लेखक के लिये महज भुनाने की चीज बन जाती है  उसकी एक पूँजी  उसके अंतर का प्रेम तो मानो फिर किसी नए जन्म तक के लिए स्थगित हो जाता है  उदास पहाड़ अंधेरे में डूब जाता है। अवशिष्ट रहता है प्रेम का व्यापारदाद का कारोबार ! कविता की वस्तु बन आदमी कवि के हाथ का खिलौना रह जाता है  वह उससे चाहे जैसा सलूक कर सकता है  मज़े की बात यह है कि कविता की यह गुलामी भी अब भाने लगती है  स्मृतियों की ख़ुशबू की भी अपनी यह ख़ास रंगत होती है  यह दूसरा जन्म इसलिये प्यारा होता है क्योंकि इसमें पूरे आदमी का अधूरापन नहीं होताउसकी कामनाओं की पूरी काया होती है  

 

जब तुम मुझे मिलेएक खुला फटा हुआ लिफ़ाफ़ा

                   तुम्हारे हाथ आया.

    बहुत उसे उलटा-पलटाउसमें कुछ  था

    तुमने उसे फेंक दिया ׃ तभी जाकर मैं नीचे

    पड़ा हुआ तुम्हें ‘मैं’ लगातुम उसे

    उठाने के लिए झुके भीपर फिर कुछ सोचकर

    मुझे वहीं छोड़ दियामैं तुमसे

    यों ही मिल लिया था.

 

मेरी याददाश्त को तुमने गुनाहगार बनायाऔर उसका

सूद बहुत बढ़ाकर मुझसे वसूल कियाऔर तब

मैंने कहाअगले जनम मेंमैं इस

तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में

डूबते पहाड़ ग़मगीन मुसकराते हैं.

 

मेरी कविता की तुमने ख़ूब दाद दीमैंने समझा

     तुम अपनी ही बातें सुना रहे होतुमने मेरी

     कविता की    ख़ूब दाद दी.

 

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटामैं लिपटता गया ׃

      और जब लपेट  खुलेतुमने मुझे जला दिया.

      मुझेजलते हुए को भी तुम देखते रहे ׃ और वह

      मुझे अच्छा लगता रहा.

 

एक ख़ुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह

     बस गई हैजैसे तुम्हारे नाम की नन्हीं-सी

     स्पेलिंग होछोटी-सी प्यारी-सीतिरछी स्पेलिंग.

 

आहतुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक

    उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,

    आज तक मेरी नींद में गड़ती है.”

 

फिर भीशमशेर एक जीता जागता इंसान है  वे वैरागी नहींअनंत कामनाओं की (अतृप्त ही सहीपवित्रता के धारक है  इसीलियेप्रेम के सत्य से इस उत्तेजक मुठभेड़ की श्रांति के अंत पर भी यही कहते है जो भी होअशरीरी तो नहीं रहा जाता है  पर बाक़ी सारी बातों के बाद भी शमशेर अंत में यही कहते हैं कि प्रेम के उस क्षेत्र के बाहर उदास रंगीनियाँ ही होती है फ़क़त  वे मरीचिकाएँ जो मृत्यु की ओर मुख़ातिब होती है  शमशेर की अतृप्तियों का सच 

 

अगर मुझे किसी से ईर्ष्या होती तो मैं

     दूसरा जन्म बार-बार हर घंटे लेता जाता ׃

पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ

तुम्हारी बरकत!

 

बहुत-से तीर     बहुत-सी नावें,   बहुत-से पर इधर

     उड़ते हुए आएघूमते हुए गुज़र गए

     मुझको लिएसबके सबतुमने समझा

     कि उनमें तुम थेनहींनहींनहीं.

उनमें कोई  थासिर्फ़ बीती हुई

   अनहोनी और होनी की उदास

   रंगीनियाँ थींफ़क़त.”

 

कविता यहीं ख़त्म हो जाती है  हम नहीं जानते यहाँ कहाँ कोई पुरुषवाद हैकहाँ कोई स्त्रीवाद अथवा दूसरी वैसी अहम्मन्यता ! 

 

यहाँ शमशेर की इस पूरी कविता को दिया जा रहा है : 


टूटी हुई, बिखरी हुई

-शमशेर बहादुर सिंह

 

टूटी हुई बिखरी हुई चाय

     की दली हुई पाँव के नीचे

          पत्तियाँ

       मेरी कविता

 

बालझड़े हुएमैले से रूखेगिरे हुएगर्दन से फिर भी

चिपके

         ...कुछ ऐसी मेरी खाल,

         मुझसे अलग-सीमिट्टी में

         मिली-सी

 

दोपहर-बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ

जैसे मेरी पसलियाँ...

ख़ाली बोरे सूजों से रफ़ू किए जा रहे हैं... जो

              मेरी आँखों का सूनापन हैं

 

ठंड भी एक मुसकराहट लिए हुए है

           जो कि मेरी दोस्त है.

 

कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...

मैं समझ  सकारदीफ़-क़ाफ़िए क्या थे,

इतना ख़फ़ीफ़इतना हलकाइतना मीठा

                      उनका दर्द था.

 

आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है.

मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

                      और चमक रहा हूँ कहीं...

                       जाने कहाँ.

 

मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार

                जिसके स्वर गीले हो गए हैं,

छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है...

                      छप् छप् छप.

 

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है.

वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्वाइज़न’ का लेबुल लिए हुए

                                  दवाइयाँ हँसती हैं

उनके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है.

 

वह मुझ पर हँस रही हैजो मेरे होंठों पर एक तलुए

                               के बल खड़ी है

मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं

      और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह

      खुरच रहे हैं

उसके एक चुंबन की स्पष्ट परछाईं मुहर बनकर उसके

      तलुओं के ठप्पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है

उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है.

 

मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं

       एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ.

मुझको सूरज की किरनों में जलने दो

     ताकि उसकी आँच और लपट में तुम

     फ़ौवारे की तरह नाचो.

 

मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,

    ताकि उसकी दबी हुई ख़ुशबू से अपने पलकों की

    उनींदी जलन को तुम भिंगो सकोमुमकिन है तो.

 

हाँतुम मुझसे बोलोजैसे मेरे दरवाज़े की शर्माती चूलें

सवाल करतीं हैं बार-बार... मेरे दिल के

अनगिनती कमरों से

 

हाँतुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं

      ...जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,

जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं

       जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,

तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ.

 

आईनोरोशनाई में घुल जाओ और आसमान में

      मुझे लिखो और मुझे पढ़ो.

आईनोमुसकराओ और मुझे मार डालो.

आईनोमैं तुम्हारी ज़िंदगी हूँ.

 

      कालीबहुत लंबी ज़ुल्फ़ थी जो ज़मीन तक

      साया किए हुए थी... जहाँ मेरे पाँव

      खो गए थे.

 

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को

     अपनी कनखियों में घुलाता हुआमुझ पर

     एक ज़िंदा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा.

 

और तब मैंने देखा कि सिर्फ़ एक साँस हूँ जो उसकी

     बूँदों में बस गई है.

     जो तुम्हारे सीनों में फाँस की तरह ख़ाब में

     अटकती होगीबुरी तरह खटकती होगी.

 

मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा  बन सका,

      क्योंकि मेरे झुकते  झुकते

       उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर

       खो गई थी.

 

जब तुम मुझे मिलेएक खुला फटा हुआ लिफ़ाफ़ा

                   तुम्हारे हाथ आया.

    बहुत उसे उलटा-पलटाउसमें कुछ  था

    तुमने उसे फेंक दिया ׃ तभी जाकर मैं नीचे

    पड़ा हुआ तुम्हें ‘मैं’ लगातुम उसे

    उठाने के लिए झुके भीपर फिर कुछ सोचकर

    मुझे वहीं छोड़ दियामैं तुमसे

    यों ही मिल लिया था.

 

मेरी याददाश्त को तुमने गुनाहगार बनायाऔर उसका

सूद बहुत बढ़ाकर मुझसे वसूल कियाऔर तब

मैंने कहाअगले जनम मेंमैं इस

तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में

डूबते पहाड़ ग़मगीन मुसकराते हैं.

 

मेरी कविता की तुमने ख़ूब दाद दीमैंने समझा

     तुम अपनी ही बातें सुना रहे होतुमने मेरी

     कविता की    ख़ूब दाद दी.

 

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटामैं लिपटता गया ׃

      और जब लपेट  खुलेतुमने मुझे जला दिया.

      मुझेजलते हुए को भी तुम देखते रहे ׃ और वह

      मुझे अच्छा लगता रहा.

 

एक ख़ुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह

     बस गई हैजैसे तुम्हारे नाम की नन्हीं-सी

     स्पेलिंग होछोटी-सी प्यारी-सीतिरछी स्पेलिंग.

 

आहतुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक

    उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,

    आज तक मेरी नींद में गड़ती है.

 

अगर मुझे किसी से ईर्ष्या होती तो मैं

     दूसरा जन्म बार-बार हर घंटे लेता जाता ׃

पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ

तुम्हारी बरकत!

 

बहुत-से तीर     बहुत-सी नावें,   बहुत-से पर इधर

     उड़ते हुए आएघूमते हुए गुज़र गए

     मुझको लिएसबके सबतुमने समझा

     कि उनमें तुम थेनहींनहींनहीं.

उनमें कोई  थासिर्फ़ बीती हुई

   अनहोनी और होनी की उदास

   रंगीनियाँ थींफ़क़त.

(१९५४


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