(सुहरावर्दी एवेन्यू से गोपाल मुखर्जी रोड के बहाने इतिहास, स्मृति और नाजी सत्ता पर एक टिप्पणी)
-अरुण माहेश्वरी
कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड करना पहली नज़र में किसी को भी एक सामान्य राजनीतिक घटना लग सकती है। लेकिन यह प्रसंग केवल नाम बदलने का नहीं, इतिहास को पहचानने और उसके साथ व्यवहार करने के मूलभूत दृष्टिकोण का है।
यदि कोई सरकार यह कहे कि वह इतिहास का न्याय कर रही है, तो उससे सबसे पहली अपेक्षा तो यह होती है कि वह इतिहास के तथ्यों की तो सटीक पहचान करें । जिस व्यक्ति के नाम को हटाया जा रहा है और जिसे स्थापित किया जा रहा है, उनके बारे में ठोस तथ्यों की तो उसे सही जानकारी हो !
यहाँ विडंबना यह है कि जिस सड़क को हटाया गया, वह उस सुहरावर्दी के नाम पर थी ही नहीं जिसे हटाने का नैतिक तर्क दिया गया है ।
1933 में नामित यह सड़क उन सर हसन सुहरावर्दी की स्मृति में थी जिन्होंने बंगाल की शिक्षा, चिकित्सा और सार्वजनिक जीवन में काम किया था । वे चिकित्सक थे, विश्वविद्यालय प्रशासक और सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे। जिस 1946 की कोलकाता किलिंग की बात की जा रही है उस राजनीति से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था ।
हमारी नजर में यह केवल तथ्यगत भूल नहीं है। यह स्मृति का राजनीतिक पुनर्लेखन है।
हिटलर के थर्ड राइख के इतिहासकार विलियम शिरर ने दिखाया है कि 1933 के बाद नाज़ी शासन ने जर्मन जीवन के ‘हर कोने’ को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी—शिक्षा, प्रेस, कला, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, यहाँ तक कि नगरों की दृश्य संरचना तक को। सड़कों और सार्वजनिक स्थलों का पुनर्नामकरण इसी व्यापक नाज़ीकरण परियोजना का हिस्सा था।
हिटलर ने देश भर में सैकड़ों सड़कों, चौकों और सार्वजनिक स्थलों को नए नाम दिए । इनमें से तमाम नाम नाज़ी आंदोलन के शहीदों, सैनिक प्रतीकों और स्वयं हिटलर से जुड़े हुए थे। इस नामकरण का ही दूसरा पक्ष था, नामों को मिटाना। हिटलर ने चुन-चुन कर यहूदी मूल के व्यक्तियों के, समाजवादी नेताओं के, उदारवादी और लोकतांत्रिक परंपरा के प्रतीकों और वाइमर गणराज्य से जुड़े नामों को हटाया था । इतिहास की किताबों में इसके सारे तथ्य मौजूद हैं । पूर्वी प्रशिया में तो 1938 में हजारों गाँवों और कस्बों के नाम बदल दिए गए ताकि पोलिश, लिथुआनियाई और पुराने प्रुशियाई सांस्कृतिक चिह्न ही मिट जाएँ।
यहाँ नाम बदलना प्रशासनिक काम नहीं था, इतिहास के स्वामित्व का दावा था। आज भी जर्मनी में संग्रहालय, स्मारक और अभिलेख बताते हैं कि कौन-सी सड़क कब बदली, क्यों बदली और किस इतिहास से जुड़ी थी। 1945 के बाद जर्मनी ने नाज़ी नाम तो हटाए, पर उसने नाज़ी अतीत को मिटाया नहीं। स्मृति को नष्ट नहीं किया गया; उसे आलोचनात्मक रूप से संरक्षित किया गया।
अब हम फिर कोलकाता के सुहरावर्दी प्रसंग पर आते हैं । सुहरावर्दी की जगह गोपाल मुखर्जी को लाने के निर्णय के समर्थकों का तर्क है कि 1946 की कोलकाता हिंसा में हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भूमिका को भूलना नहीं चाहिए।
यह सही है कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी का नाम 1946 के डायरेक्ट एक्शन से अलग नहीं किया जा सकता। उनके आलोचक उन्हें प्रशासनिक विफलता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जोड़ते हैं। लेकिन हुसैन शहीद सुहरावर्दी राजनीति की विरासत भी इतनी सरल नहीं, बल्कि काफी जटिल रही है । वही व्यक्ति 1947 में गांधीजी के साथ कोलकाता में शांति स्थापित करने के प्रयासों में भी दिखाई देता है।
इतिहास में किसी व्यक्ति की भूमिका एकरेखीय नहीं होती । और यहाँ तो एक अलग ही प्रश्न उठ गया है कि क्या किसी व्यक्ति के अपराध की स्मृति दूसरे व्यक्ति के नाम पर दर्ज की जा सकती है ? यह कैसा प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन है!
जहां तक गोपाल चंद्र मुखर्जी का सवाल है, उनकी स्मृति बंगाल के विभाजन-पूर्व लोकजीवन की स्मृति है। वे मांस-व्यवसाय और अखाड़ा-संस्कृति से जुड़े थे, और 1946 के दंगों के दौरान स्थानीय प्रतिरोध के एक लोकप्रिय पात्र बन गये थे। उनके परिवार के अनुसार उन्होंने हिंदुओं की रक्षा की और निर्दोष मुसलमानों को हानि न पहुँचाने की भी सलाह दी। पर उनके आलोचक उनकी दूसरी तस्वीर भी रखते हैं। यह बहस भी इतिहास का एक हिस्सा है।
शहरों के नाम स्मृति की परतें होते हैं । क्या किसी शहर को उसके अतीत से काट कर नया बनाया जा सकता है? शहर केवल सड़कें और इमारतें नहीं होते, वे स्मृति के अभिलेख होते हैं । सड़कों, चौकों और मोहल्लों के नाम केवल दिशा बताने के लिए नहीं होते। वे बताते हैं कि शहर स्वयं को कैसे याद करता है।
इस संदर्भ में आज लाहौर का उदाहरण सबसे ताजा और उल्लेखनीय है। लाहौर में भी पुराने हिंदू-सिख नामों और नगर-स्मृतियों को पुनः दृश्य बनाने की चर्चाएँ सामने आई हैं । वहाँ यही तर्क काम कर रहा है कि शहर की संस्कृति उसकी बहुस्तरीय स्मृति में बसती है; उसे मिटाकर नया राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता। लाहौर को उसके पहले के सांस्कृतिक स्तरों सहित पढ़ने का आग्रह स्मृति-संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण काम है । यदि यह प्रवृत्ति सचमुच शहर को उसके बहुलतावादी अतीत से जोड़ने की है, तो उससे जाहिर होता है कि इतिहास को सुधारने का अर्थ इतिहास को संक्षिप्त करना नहीं होता।
हम इस घटना में कोलकाता की स्मृतियों पर छाये संकट के अशनि संकेत देख रहे हैं । किसी शहर की सड़क का नाम बदलना आसान है पर उसकी स्मृति को बचाए रखना कठिन। और किसी भी जाति या समाज को उसके अतीत की बहुलता से काट देना, चाहे वह गौरवपूर्ण हो या त्रासद, केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, सांस्कृतिक विस्मरण का आरंभ कहलायेगा ।
कोलकाता ने पहले भी सड़कें बदली हैं। औपनिवेशिक नाम हटे, नए आए। यह नई बात नहीं। विद्वानों ने उस स्वेच्छाचार की भी निंदा की क्योंकि शहर केवल वर्तमान का निवास नहीं, अतीत का अभिलेख भी होता है। किसी समाज की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने नाम हटाए; बल्कि इस बात से कि वह अपने कठिन, विरोधाभासी और असुविधाजनक अतीत को कितनी जगह देता है।
जो शहर अपने इतिहास को काटता है, वह अंततः अपने ही अनुभव को काटता है। और जो समाज अपने अतीत की बहुलता से डरता है, वह अंततः अपने भविष्य की संभावनाओं से भी डरने लगता है। स्मृति का संकुचन अंततः सत्य के संकुचन में बदल जाता है; और जहाँ सत्य को एकक घोषित कर दिया जाता है, वहाँ इतिहास धीरे-धीरे मिथक में बदलने लगता है।





