शनिवार, 8 जून 2024

‘ईश्वर मर गया है’

(चुनाव पर एक टिप्पणी) 



— अरुण माहेश्वरी 


‘ईश्वर मर गया है । अब ऐसा लगता है कि उसकी प्रेत छाया मंडराती रहेगी।’ नित्शे का यह कथन तब यथार्थ में साफ़ नज़र आया जब एनडीए की सभा में मोदी के भाषण से मोदी उड़ गया और एनडीए छा गया।


सीएसडीएस का ताज़ा सर्वे बताता है कि उत्तर प्रदेश की जनता में प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी उनकी पहली पसंद हैं । मोदी राहुल से पीछे हैं। राहुल को चाहने वालों की संख्या 36 प्रतिशत हो गई है और मोदी को पसंद करने वालों की संख्या 32 प्रतिशत रह गई है। 


ज़ाहिर है कि मोदी अब एक पतनोन्मुख शक्ति है । सत्ता उनकी सबसे भारी कमजोरी है । इसके विपरीत राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस दल उर्ध्वमुखी विकास के घोड़े पर सवार हो गया है । सत्ता का न होना अभी उसकी उड़ान को आसान बनाता है । 


डूबते हुए शासक दल के पूरी तरह से डूबने से बचने में उसके पास राजसत्ता का होना एक भारी बाधा की भूमिका अदा करता है और उदीयमान विपक्ष के विस्तार के लिए राजसत्ता का अभाव तीव्र प्रेरणा का काम करता है । 


इस 2024 के चुनाव ने विपक्ष और पीड़ित जनता के मिलन का एक वैसा ही दृश्य पेश किया है जैसा फ़िल्मों में खलनायक की डरावनी बाधा को पार कर प्रेमी और प्रेमिका के मिलन का दृश्य होता है । इस चुनाव में विपक्ष के प्रति जनता का आवेग बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के आवेग से कमतर नहीं था । यह प्रेम ही आगे एक नई राजनीति के निर्माण की ज़मीन तैयार करेगा । 


मोदी ने अपनी तमाम जनतंत्र-विरोधी करतूतों से राजनीति के सामने वह चुनौती पैदा की थी जिसका मुक़ाबला करके ही विपक्ष और जनता के मिलन की आकांक्षा की पूर्ति हो सकती थी। चुनौती स्वयं में ही किसी भी इच्छा और ज़रूरत का कम बड़ा कारक नहीं होती है।


यह चुनाव एक घटना है क्योंकि इसने भारत के ऐसे सत्य को सामने ला दिया है जिसे पहले जान कर भी लोग मानने को तैयार नहीं थे। यह अनेकों के लिए किसी इलहाम  से कम साबित नहीं होगा । जीवन में इसे ही घटना कहते हैं । 


दुनिया की किसी भी घटना का अर्थ उसके घटित होने में नहीं, उससे दुनिया को देखने-समझने के हमारे नज़रिये में हुए परिवर्तन में निहित होता है । मोदी की इस हार से जाहिरा तौर पर भारत के लोगों के दिमाग़ों की जड़ता टूटेगी। जब लोग अपनी अंतरबाधाओं से मुक्त होंगे, तभी उन्हें जीवन की गति की तीव्रता का अहसास होगा । सामान्य जीवन की शक्ति का परिचय अंदर की जड़ताओं से मुक्ति के बाद ही संभव होता है । 


परिप्रेक्ष्य के बदलने के साथ ही जिसे कोरी फैंटेसी समझा जाता था, वही सबसे जीवंत, ठोस यथार्थ नज़र आने लगता है । इस चुनाव के बीच से अब जनतंत्र, धर्म-निरपेक्षता, समानता और नागरिकों की स्वतंत्रता संविधान की किताब की सजावटी इबारतें भर नहीं, दैनंदिन राजनीति के संघर्ष के जीवंत मसले बन गये हैं। स्वयं संविधान आम मेहनतकश जनता के संघर्ष का हथियार बन चुका है ।


भारत जोड़ो यात्रा 


पिछले दिनों राहुल और उनकी भारत जोड़ो यात्रा ने देश के डरावने और निरंकुश हालात में एक प्रमुख दिशा सूचक संकेतक की भूमिका अदा की । राजनीति की दिशाहीनता ख़त्म हुई, उसे अर्थ से जुड़ी स्थिरता मिली । 


भारत जोड़ो यात्रा का रास्ता कठिन था पर यह किसी को भी हंसते हुए राजनीति की इस कठिनाई को झेलने के लिए तैयार करने का एक सबसे प्रभावी रास्ता भी था। इस ओर बढ़ने में कोई बुराई नहीं है, यही बात इस लड़ाई में तमाम लोगों के उतर पड़ने के लिए काफ़ी थी।


भारत जोड़ो यात्रा की राजनीति वास्तव में कोई सुरक्षा कवच में आरामतलबी की राजनीति नहीं थी । इसमें कोई जादू भी नहीं था कि छड़ी घुमाते ही फल मिल जायेगा । यह किसी भी अघटन के प्रति अंधा भी नहीं बनाती थी । पर इतना तय है कि यह किसी भी अघटन के डर से बचाती थी । ‘डरो मत’ का राहुल का नारा इसका एक प्रमुख लक्ष्य भी था । 


भारत जोड़ो यात्रा ने ही प्रेम और संविधान को राजनीति के समानार्थी शब्द बना दिया । इस प्रकार, इसने सभ्यता के मूल्यों के अंत और जीवन में तबाही की आशंका का एक समुचित उत्तर पेश किया । इन यात्राओं का यह एक सबसे महत्वपूर्ण सर्वकालिक पहलू रहा है । 


अब मोदी की राजनीति के दुष्प्रभावों से बचने का एक सबसे उत्तम उपाय यह है कि हम समझ लें कि इस राजनीति में भारतीय जीवन के यथार्थ का लेशमात्र भी नहीं है । वह समग्रतः एक निरर्थक बकवास है। व्हाट्सअप विश्वविद्यालयों के ज्ञान की तरह की ही झूठी बकवास । और चूँकि कोरी बकवास से कभी कोई संवाद संभव नहीं होता है, इस राजनीति से भी कोई संवाद नहीं हो सकता है । इससे सिर्फ़ संघर्ष ही हो सकता है । 


मोदी अभी कुछ दिन और प्रेत बन कर हमारे सर पर मँडरायेंगे । पर बहुत ज़्यादा दिनों तक नहीं । उन्हें दफ़नाने की सारी रश्म अदायगी भी जल्द ही पूरी हो जायेगी । 


मोदी का फिर से प्रधानमंत्री बनना ही साबित करता है कि पूरी बीजेपी भारत की जन-भावनाओं के खिलाफ खड़ी हो गई है । इसीलिए जनतंत्र में अब उसकी कोई भूमिका नहीं बची है । उसकी जगह अब सिर्फ़ इतिहास के कूड़ेदान में है । 


जिन राहुल गांधी से उनकी संसद की सदस्यता को जबरन छीन लिया गया था, अब वे बाकायदा लोक सभा में विपक्ष के नेता होंगे । और जैसा कि सीएसडीएस का सर्वे संकेत दे रहा है, वे शीघ्र ही भारत के प्रधानमंत्री भी होंगे। कभी नेहरू जी को भारत के युवाओं का हृदय सम्राट कहा गया था,आज राहुल को कहा जाने लगा है । राजनीति के भविष्य का अनुमान लगाने के लिए इतना ही काफ़ी है । 




रविवार, 12 मई 2024

चुनाव में मुद्दों की वापसी ही मोदी की भारी हार को सुनिश्चित कर रही है

 

—अरुण माहेश्वरी 



चौथे चरण के मतदान तक आते-आते अब 2024 के चुनाव ने साफ़ दिशा पकड़ ली है । 

मोदी और बीजेपी ने सोचा था कि वे अपने प्रचार तंत्र के बूते इस चुनाव को ‘जीत गये, जीत गये’ के महज एक शोर में बदल कर वैसे ही लूट ले जायेंगे, जैसे पुलवामा और बालाकोट के नाम पर 2019 में लूट लिया गया था । 

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को बीजेपी के ‘ शोर’ की इस योजना में उसकी कुरूपता को छिपाने के महज़ एक पर्दे के रूप में तैयार किया गया था । 

पर चुनाव प्रचार के प्रारंभ के साथ ही ख़ास तौर पर राहुल गांधी के भाषणों और उनकी भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे चरण ने गरीब जनता के जीवन से जुड़े विषयों को मोदी की मर्ज़ी के विरुद्ध इस चुनाव के केंद्र में स्थापित कर दिया । 

अब चुनाव मुद्दा-विहीन ‘शोर’ के बजाय बाक़ायदा जनतंत्र के एक गहन राजनीतिक विमर्श में बदल चुका है । 

इस चुनाव का यही वह पहलू है जिसने मोदी को बदहवास कर दिया है, उनका समूचा प्रचार पटरी से उतरा हुआ दिखाई देने लगा है । 

संसद और मीडिया की आवाज़ को कुचल कर मोदी ने अपने लिए जो प्रश्न-विहीन राजनीतिक वातावरण तैयार कर रखा था, इस चुनाव ने एक झटके में उस स्थिति को बदल डाला है । 

प्रश्न मोदी के लिए वैसे ही हैं, जैसे बैल के लिए लाल कपड़ा होता है । प्रश्नों के सामने मोदी एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रह पाते हैं । 

इसी कारण मोदी ऐसे किसी भी संवाददाता सम्मेलन या संवाद में शामिल होने से कतराते हैं । 

लेकिन 2024 के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने मोदी को खुले राजनीतिक विमर्श में खींच लिया है । मोदी अभी भी इससे भाग कर हिंदू-मुसलमान की तरह की अपनी ख़ास-ख़ास गुफा में छिपने के लिए आज भी हाथ-पैर मार रहे हैं । पर आज की सचाई यह है कि ऐसी किसी भी जगह पर अब वे अपने को सुरक्षित नहीं पा रहे हैं । 

सही वजह है कि अभी मोदी की सारी हरकतों में बदहवासी साफ़ दिखाई दे रही है । 

इसके विपरीत राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के दूसरे सभी नेता मतदान के हर चरण के साथ अधिक जुझारू, अधिक निश्चित और आत्म-विश्वास से भरे हुए नज़र आते हैं । 

इस लड़ाई में दोनों पक्ष के नेताओं की यह स्थिति अभी से चुनाव के परिणामों का साफ़ संकेत देने लगी है । मोदी पर भ्रष्टाचार, खरबपतियों को रियायतें देने और संविधान पर हमला करने का आरोप पूरी तरह से चस्पाँ हो चुका है और मोदी इनमें से एक का भी सटीक उत्तर देने में असमर्थ दिखाई देते है । 

जबकि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन सामाजिक न्याय के चैंपियन के रूप में साफ़ तौर पर अपनी खोई हुई ज़मीन को वापस पाता हुआ दिखाई देता है।  

चुनाव के दौरान विकसित हुए इस राजनीतिक परिवेश ने मोदी कंपनी के साथ ही पत्रकारों की उस जमात को भी बदहवास कर दिया है जो मोदी कंपनी के शोर, उनकी एजेंसियों की दमनकीरी कार्रवाइयों को ही राजनीति का पर्याय मान कर मोदी को अपराजेय समझे हुए थे; जो गाहे-बगाहे मोदी की शक्ति की वंदना में लगे हुए दिखाई देते थे।  

यही वजह है कि मोदी के पतन के साफ़ संकेतों के बावजूद पत्रकार बिरादरी अब भी उनकी पराजय का सही-सही आकलन करने में विफल हैं । वे राहुल गांधी के आकलन की सचाई को नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं कि बीजेपी की सीटें 150-180 से ज़्यादा नहीं जाने वाली है । 

आज मतदान के चौथ चरण की पूर्वबेला में हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जो लोग इस चुनाव में बीजेपी को बहुमत न मिलने पर भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देख रहे हैं, वे अपने इस आकलन में पूरी तरह से ग़लत साबित होंगे।  

योगेन्द्र यादव के स्तर के चुनाव विशेषज्ञ ने खुद ज़मीनी सर्वेक्षण से यह पता लगाया है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में बीजेपी के मतों में 33% की कमी आने वाली है । इससे पिछले चुनाव में हिंदी भाषी प्रदेशों में उसे मिले 50 प्रतिशत मतों का एक तिहाई अर्थात् उसके मत क़रीब 33 प्रतिशत रह जायेंगे । 

अभी सब जगह बीजेपी और इंडिया गठबंधन के बीच सीधी टक्कर के कारण मतों में 33 प्रतिशत की गिरावट सीटों में 67% की गिरावट साबित होगी । इस अनुमान से बीजेपी को मिलने वाली सीटों की कुल संख्या 100 से भी कम रह सकती है । 

यह आकलन 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की पराजय के इतिहास से पूरी तरह मेल खाता है । तब कमोबेश ऐसी ही परिस्थितियों में सीपीआई(एम) की सीटें 176 से घट कर सिर्फ़ 40 रह गई थी ।

इसी लेखक ने दस महीना पहले 16 जुलाई 2023 के दिन अपने ‘चतुर्दिक’ ब्लाग पर एक लेख लिखा था — ‘फासीवाद के कैंसर के खिलाफ संघर्ष में विपक्ष की बहुलतापूर्ण एकता और राहुल गांधी’ । उसमें मोदी-आरएसएस के फासीवाद के विरुद्ध विपक्ष की रणनीति का उल्लेख करते हुए रोमन साम्राज्य के खिलाफ गुलामों के ऐतिहासिक विद्रोह के इतिहास को याद गया था । उसमें लिखा था कि —


“रोमन साम्राज्य के खिलाफ गुलामों के संघर्ष (स्पार्टकस) का इतिहास यह बताता है कि उस साम्राज्य में जितने ज्यादा गुलाम मालिक से विद्रोह करके भाग कर साम्राज्य के दूर-दराज के विभिन्न इलाकों में फैल गए थे, स्पार्टकस के संघर्ष का दायरा उतना ही विस्तृत होता चला गया था और उस विद्रोह में हर क्षेत्र की अपनी-अपनी विशिष्टताएं शामिल हो गई थी । विद्रोही गुलामों की टुकड़ियों का कोई एक चरित्र नहीं था । सिर्फ गुलामी से मुक्ति ही उन सब अलग-अलग टुकड़ियों को एक सूत्र में बांध रही थी । पर रोमन साम्राज्य की एक भारी-भरकम सेना के खिलाफ विद्रोही गुलामों की अपनी ख़ास प्रकार की इन अलग-अलग टुकड़ियों की विविधता ही उस पूरी लड़ाई को दुनिया से गुलामी प्रथा के अंत की एक व्यापक सामाजिक क्रांति का रूप देने में सफल हुई थी । संघर्ष का दायरा जितना विस्तृत और वैविध्यपूर्ण होता गया, रोमन साम्राज्य की केंद्रीभूत शक्ति उतनी कमजोर दिखाई देने लगी और साम्राज्य को अनेक बिंदुओं पर एक साथ चुनौती देने की विद्रोहियों की ताकत उसी अनुपात में बढ़ती चली गई । देखते-देखते निहत्थे गुलामों के सामने रोमन साम्राज्य के तहत सदियों से चली आ रही समाज व्यवस्था का वह विशाल, महाशक्तिशाली किला बालू के महल की तरह ढहता हुआ नजर आया ।

“रोमन साम्राज्य में गुलामों के विद्रोह का यह गौरवशाली खास इतिहास इस बात का भी गवाह है कि संघर्ष की परिस्थितियां ही वास्तव में भविष्य की नई ताकतों के उभार की प्रक्रिया और उसके स्वरूप को तय करती है । हर उदीयमान निकाय का संघटन उसके घटनापूर्ण वर्तमान की गति-प्रकृति पर निर्भर करता है । 

“कहना न होगा, आज हमारे यहाँ विपक्ष का वास्तविक स्वरूप भी शासक दल की चुनौतियों के वर्तमान रूप से ही तय हो रहा है । यह आज के हमारे समय की सच्चाई है कि बीजेपी को जितने ज़्यादा राज्यों में कड़ी से कड़ी टक्कर दी जा सकेगी, विपक्ष 2024 की लड़ाई में उतना ही अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बन कर उभरेगा और दुनिया भर के संसाधनों से संपन्न बीजेपी उतनी ही लुंज-पुंज और उनका ‘विश्व नायक’ नरेन्द्र मोदी उतना ही एक विदूषक जैसा दिखाई देगा ।” 


आज जिस प्रकार राज्य दर राज्य, मोदी को इंडिया गठबंधन के घटक दलों के नेतृत्व में कड़ी चुनौती दी जा रही है, और उसके सामने मोदी गली-गली भटकते हुए हाँफते नज़र आने लगे हैं, उसमें किसी भी केंद्रीभूत आततायी सत्ता को धराशायी करने की रणनीति की सफलता को साफ़ तौर पर देखा जा सकता है । 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

भाषा के मूल से दृश्य के ज़रिये ध्वनि का विस्थापन और इसके स्नायविक प्रभाव


आज के ‘टेलिग्राफ’ में प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक जी एन देवी का महत्वपूर्ण लेख है - दृष्ट की जीत ( मनुष्यता सामूहिक स्मृतिलोप की ओर बढ़ रही है ) । 

इस लेख का प्रारंभ उन्होंने सभ्यता के इतिहास में अलग-अलग जगहों पर आदिम ध्वनियों से वर्ण-शब्द-वाक्य की प्रक्रिया के ज़रिए लिपियों और भाषाओं के उद्भव की कहानी का ज़िक्र करते हुए आज के काल में तेज़ी से अनेक मातृ भाषाओं के अवलोप की कहानी की चर्चा से किया है । 


पर श्री देवी के इस लेख का मूल विषय है आज के काल में, जब कृत्रिम स्मृति (artificial memory) का बोलबाला है, मानव-संचार के लिए ध्वनि-आधारित भाषाओं का स्थान क्रमशः दृश्य -आधारित भाषा लेती जा रही है और इसका सीधा प्रभाव मानव मस्तिष्कों के गठन तक पर पड़ रहा है । 


उन्होंने इसमें ख़ास तौर पर दो अध्ययनों, Maryanne Wolf की पुस्तक Proust and Squid तथा Michael Charles Corballis की पुस्तक ‘The Recursive Mind:The origins of Human Language, Thought and Civilization’ का उल्लेख किया है । 


Wolf के अध्ययन से पता चलता है कि आज के समय में स्कूल के छात्रों में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ रही है जिनमें पढ़ने की क्षमता अभाव होता है, अर्थात् जो डिस्लेक्सिया के शिकार हैं । Corballis की पुस्तक में मनुष्यों में भाषा संबंधी स्नायविक क्षमताओं के विकास का ऐतिहासिक अध्ययन किया गया है । 


इन दोनों अध्ययनों के आधार पर श्री देवी ने यह महत्वपूर्ण स्थापना दी है कि “Non-reading dyslectic-types are a necessary part of human evolution. “  ( पढ़ने में अक्षम डिस्लेक्टिक प्रकार मानव के विकास का एक ज़रूरी हिस्सा है ।) 


हम जानते हैं पिछले दिनों जेनेटिक विज्ञान के ऐसे तमाम अध्ययन प्रकाश में आ चुके हैं जिनसे पता चलता है कि शरीर के अंगों का विशेष प्रकार से निरंतर प्रयोग करने से जीवों के जेनेटिक गठन तक में बदलाव हो जाता है और आगे की पीढ़ियाँ उसी प्रकार के परिवर्तित गठन की बनने लगती है । 

श्री देवी ने अपने इस लेख के अंत में इस ‘विकास’ को सलाम करते हुए समाज में आर्थिक विषमताओं की चर्चा की है और इस बात पर चिंता ज़ाहिर की है कि आज एक तबका जहां डिजिटल उपायों से संचार की नई भाषा को आयत्त करने में समर्थ है, वही दूसरा डिजिटल साधनों से वंचित तबका इस नए भाषा बोध को प्राप्त करने में पिछड़ जा रहा है । इसी वजह से इस तकनीकी परिवर्तन के कारण स्मृतिलोप का जो संकट पैदा हो रहा है, उसका सबसे अधिक शिकार यह गरीब और वंचित तबका ही होने वाला है । 

श्री देवी के इस लेख को गंभीरता से पढ़ा जाना चाहिए : 


https://epaper.telegraphindia.com/imageview/468098/6039371/undefined.html

बुधवार, 6 मार्च 2024

जनमानस तेजी से बदल रहा है

(राहुल गांधी की यात्राओं में जन समुद्र की परिघटना का एक विश्लेषण) 

अरुण माहेश्वरी

 


राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा और उसमें हर जगह पर उमड़ती हुई भीड़, खास तौर पर पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के नौजवानों का उच्छवसित भाव, पटना के गांधी मैदान में जन-सैलाब और लालू यादव के प्रति बिहार के आम लोगों के लगाव का क्रमशः उनके बेटे तेजस्वी यादव के प्रति स्नेह में बदलते हुए देखना  हमारी आँखों के सामने उभरता हुआ यह समूचा दृश्य एक ऐसी नई परिघटना के रूप में सामने आ रहा है जो सामान्य टीका-टिप्पणी से आगे जाकर कहीं ज्यादा गंभीर विश्लेषण की अपेक्षा रखता है ।  

यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि उत्तर भारत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रति आम लोगों का आग्रह फिर से एक बार धीरे-धीरे जड़ पकड़ने लगा है । लगातार साठ साल के कांग्रेस के शासन में छीजते-छीजते कांग्रेस दल 2014 तक ऐसी दशा में पहुंच गया था कि नरेन्द्र मोदी और आरएसएस ने बेहिचक कांग्रेस-मुक्त भारत के निर्माण के लक्ष्य का ऐलान कर दिया। इस प्रकार, प्रकारांतर से उन्होंने कांग्रेस की मृत्यु का ही ऐलान कर दिया था । 

इस सचाई से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि 2014 तक अनेक प्रदेशों से कांग्रेस के संगठन का लगभग सफाया हो चुका था । कांग्रेस भारत की राजनीति में एक दूरस्थ विचार बनती जा रही थी । 

हम सब जानते हैं कि राजनीति में होना विचार में होना मात्र नहीं होता, इस होने में संगठन नामक एक ठोस शरीर का होना अनिवार्य होता है । और, कांग्रेस उस शरीर को ही खो चुकी थी ! भारत में राजनीति की एक प्रमुख जरूरत के ही लगभग बाहर जाती हुई दिखाई देने लगी थी ।

ऐसी स्थिति में, आज फिर से कांग्रेस का हमारी राजनीति की कथित प्रमुख जरूरत, सांगठनिक ताने-बाने के के क्षेत्र क बाहर से ही उभरना और क्रमशः राजनीति के मंच के केंद्र में आते हुए दिखाई देना, किस बात का द्योतक है ?

यह स्वयं में एक ऐसी परिघटना है जिसे मनोविश्लेषण में प्रेम की मांग की निःशर्त स्थिति (unconditionality of the demand for love) से जुड़ी एक अलग परिघटना बताया गया है । इसमें जिस प्रेम को कभी खत्म मान कर आगे बढ़ जाने का फैसला कर लिया जाता है, वही प्रेम फिर किसी मोड़ पर, आदमी की जरूरत के दायरे के बाहर के क्षेत्र में फिर से खड़ा दिखाई देने लगता है और आदमी के दिलो-दिमाग पर छा जाता है ।

जब भारत के लोगों ने कांग्रेस के प्रति अपने आग्रह को झटक कर उसके विपरीत छोर, मोदी की तरह की एक घनघोर सांप्रदायिक शक्ति का दामन थाम लिया, इसके बाद आज निराशा के एक नए दौर में लोगों में अपने उस ठुकरा दिये गये प्रेम की निश्छल स्मृतियां बिल्कुल अलग से, उनकी जरूरत और स्वार्थ के दायरे के बाहर के क्षेत्र में खड़ी दिखाई देने लगी है । मजे की बात यही है कि भारत के लोगों के उस पुराने प्रेम के नये आग्रह के रूप में इस पुनर्वतार में भी प्रेम के लिए जरूरी निःस्वार्थता का ढांचा अन्तर्निहित है, जो इसे तूफ़ानी शक्ति प्रदान कर रहा है कांग्रेस शासन के पिछले कई सालों का नकारात्मक आख्यान इसमें कहीं से आड़े नहीं आ रहा । 

यही वजह है कि कांग्रेस के प्रति जनता के आग्रह की इस वापसी को ‘नकार का नकार’ (negation of negation) भर कह कर शायद विश्लेषित नहीं किया जा सकता है । 

जॉक लकान ने इसे किसी खोई हुई वस्तु की शक्ति (power of pure loss) कहा था । यह शक्ति हमेशा राख से चिंगारी की तरह भड़क कर सामने आया करती है । हमारी जो प्रिय वस्तु खो जाती है, वह जब हमारे पास होती है, यह उससे कहीं ज्यादा लुभावनी हो उठती है। अब उसके होने में हमारी जरूरत के बजाय उसके प्रति निःशर्त लगाव की भूमिका कहीं ज्यादा प्रमुख होती है । 

कहना न होगा, राजनीति में असंभव की तमाम संभावनाओं का यह भी एक प्रमुख स्रोत है  खोई हुई वस्तु की शक्ति ।

यह सच है कि राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्राओं से कांग्रेस के उस रूप को पुनर्जीवित करने के निश्चय को दोहरा रहे हैं जो हमेशा से भारत में सभी उत्पीड़ित जनों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए आश्वस्तिदायक रहा है । जिसके चलते उनके जीवन में वास्तव में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं । यह भारतीय राजनीति में लोक कल्याण, समानता, न्याय, धर्म-निरपेक्षता और संघवाद की तरह के मजबूत आधार स्तंभों पर टिका एक गहरा विश्वास भी है । 

साठ सालों के शासन में कांग्रेस ने जितना अपने को उस भूमिका से अलग किया, उसी अनुपात में भारत की व्यापक पीड़ित-वंचित जनता से उसका नाता टूटा । 

आज राहुल गांधी ने फिर से कांग्रेस की पुरानी भूमिका को पुनर्जीवित करने के आश्वासन के साथ सभी वंचित समुदायों में कांग्रेस के प्रति पुराने अनुराग की राख को हवा देना शुरू किया है । खास तौर पर इन वंचित समुदायों के नौजवान तबकों को उनकी इस नई राजनीति में उस मोहब्बत की खुशबू आने लगी है जो उन्हें शुद्ध रूप से अपने स्वार्थ से जुड़े जातिवाद के बजाय राष्ट्र के समतापूर्ण, न्यायपूर्ण विकास के संविधान-सम्मत निश्छल भाव से अनुप्रेरित और उत्साहित करती है ।    

जॉक लकान कहते हैं कि निःस्वार्थ मांग के कारण आदमी की चाहत ही उसके लिए परम हो जाती है । (For the unconditionality of demand, desire substitutes the “absolute” condition)  प्रेम को प्रमाण की जरूरत नहीं रहती । इसमें पड़ा मनुष्य स्वार्थ और जरूरत की पूर्ति के तत्त्व से विद्रोह करता है । लकान ने इसे आदमी में पड़ने वाली दरार की ऐसी परिघटना बताया था जो अनायास अंतर की एक छिपी हुई शक्ति को प्रबलतम शक्ति का रूप दे देती है । लकान ने इसका इस प्रकार सूत्रबद्ध किया था :

“चाहत न संतुष्टि की भूख है और न प्रेम की मांग, बल्कि संतुष्टि की भूख में से प्रेम की मांग को घटा देने पर जो बचता है, आदमी में उस दरार की परिघटना है ।” (“This is why desire is neither the appetite for satisfaction nor the demand for love, but the difference that results forom the subtraction of the first from the second, the very phenomenon of their splitting. -Ecrits, page. 691)

आज भारत के पिछड़े समुदाय, दलितों और मुसलमानों में तेजी के साथ एक नई दरार पैदा हो रही है । वही परिघटना राहुल गांधी की यात्राओं में सामने आ रहे जन-आलोड़न से मुखरित होती है । यह समूचा वंचित समुदाय धीरे-धीरे अपने फ़ौरी पाँच किलो अनाज के स्वार्थ के पाश से मुक्त हो, अपनी अकुंठ चाहत की पार्टी की तलाश में उतर रहा है । राहुल गांधी में उन्हें आजादी की लड़ाई के गांधी-नेहरू दिखाई देने लगे हैं । वे उनमें पूंजीपतियों की दलाल सत्ता के खिलाफ पूरी बुलंदी से वंचितों के उत्थान की आवाज को उठाने वाला वीर योद्धा देखने लगे हैं । 

कहना न होगा, जन मानस में उभर रही यह नई दरार साफ तौर पर एक गहरे बदलाव का संकेत है । आगामी चुनाव में वह अनेक रूपों में सामने आयेगा ।

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

ऐसे निरुद्वेग सूत्रीकरणों का क्या लाभ ?

 

(‘टेलिग्राफ‘ में प्रभात पटनायक की टिप्पणी के बहाने व्याख्याओं के सही स्वरूप पर एक मनोविश्लेषणात्मक विवेचन) 


—अरुण माहेश्वरी 


चौदह फ़रवरी के ‘टेलिग्राफ’ में प्रभात पटनायक की एक टिप्पणी है — (नवउदारवाद से नवफासीवाद ) गोपनीय संपर्क । From neoliberalism to neofascism : Hidden link ।

 

प्रभात के शब्दों में कहें तो यह नवफासीवाद की वर्गीय प्रकृति का सैद्धांतीकरण है । दरअसल इसे आज की दुनिया में दक्षिणपंथ के उभार की वस्तुस्थिति का ऐसा वर्णन कहा जा सकता है जिसमें प्रमुख रूप से विभिन्न शक्तियों की भूमिका को वर्गों की एक सर्वकालिक भाषा में चित्रित किया गया है । 

प्रभात की शिकायत है कि इस उभार को ‘दक्षिणपंथी” (right-wing populist) कह कर आम तौर पर ऐसी सरकारों की वर्गीय प्रकृति पर चुप्पी साध ली जाती है । 


प्रभात ने नवफासीवाद के बारे में अपने इस ‘वर्गीय ब्यौरे” में सामान्य तौर पर दुनिया के, और ख़ास तौर पर अभी के भारत के राजनीतिक परिदृश्य में सामने दिखाई देने वाली आर्थिक परिघटनाओं के मद्देनज़र इजारेदारों और मज़दूर वर्ग की तमाम स्थितियों को नव-फासीवाद की सर्वकालिक प्रवृतियों के रूप में पेश किया है । इसे सही मायने में हम एक ऐसा प्रकृतिवादी विश्लेषण कह सकते हैं जिसमें प्रत्यक्ष और लक्षणों के बीच कोई भेद नहीं होता है । जो सामने, व्यक्त रूप में है वही पीछे भी, अर्थात् अव्यक्त भी है । परिस्थिति की गतिशीलता, अर्थात् उसमें कुछ की अनुपस्थिति और कुछ नये के सामने आने की संभावना के संकेत के लिए कोई स्थान नहीं होता हैं। 


मसलन्, भारत में पहले इजारेदार घरानों के रूप में टाटा-बिड़ला को चिह्नित किया जाता था, अब  अंबानी-अडानी भी आ गये हैं । अभी की मोदी सरकार ने टाटा-बिड़ला का साथ नहीं छोड़ा है, बल्कि उनके साथ ही अंबानी-अडानी को भी साध लिया है । इससे प्रभात ने यह ‘वर्गीय सिद्धांत’, अथवा नव-फासीवाद की परिभाषा तैयार कर ली कि नवफासीवाद “सामान्य तौर पर इजारेदार पूंजीवाद का ध्यान रखता है, पर वह इसके अंदर नये रूप में पैदा होने वाले तबकों से भी अपने क़रीबी संबंध रखता है ।” (while solicitous towards monopoly capital in general, also enjoys close proximity with this new emerging stratum within it. ) 


यह है ‘तथ्यों से सिद्धांत निरूपण’ की, किसी नई परिघटना के कथित वर्गीय चित्रण को ही वैज्ञानिक सूत्रीकरण में तब्दील कर देने की ख़ास पद्धति, जिसे हमने ऊपर प्रकृतिवादी पद्धति कहा है । इस ‘वर्गीय ब्यौरे’ की विडंबना यह है कि इसमें वर्णन को ही परिस्थिति का विश्लेषण बताया जाता है । यथार्थ के वर्णन में और उसके विश्लेषण में निहित द्वंद्वात्मकता के बीच कोई भेद नहीं किया जाता है । 


यथार्थ के ब्यौरों से सैद्धांतिक संश्लेषण का यह एक ऐसा तरीक़ा है जिससे प्रत्यक्ष में हर छोटे से छोटे भेद से एक नई सैद्धांतिकी खड़ी करने की ओर दौड़ पड़ने की प्रवृत्ति पैदा होती है । यथार्थ की परख में युग की ऐतिहासिक दिशा के सामान्य परिदृश्य की भूमिका गौण नहीं, बल्कि ग़ायब ही हो जाती है । 


कहना न होगा, यह एक प्रकार की प्रकृतिवादी सैद्धांतिक सूत्रीकरण की पद्धति है जो सैद्धांतिक अवसरवाद के लिए जगह बनाती है, फिर भले उसे ‘वर्ग भाषा’ की ओट में ही क्यों न किया जाए । 


प्रभात ने इस लेख में निचोड़ के रूप में अपनी दृष्टि से एक बड़ी खोज की है कि “ नवफासीवाद नवउदारवाद की ही संतान है” । (Neofascism, therefore, is the progeny of neoliberalism. ) “नवफासीवाद का विरोध भी नवउदारवाद के द्वारा कमजोर कर दिए गए मज़दूर वर्ग की वजह से ही कमजोर है ।”( The opposition to neofascism is also weakened by the same weakening of the working class effected by neoliberalism. ) 

(हम यहाँ उनकी इस टिप्पणी का लिंक साझा कर रहे हैं : https://www.telegraphindia.com/opinion/hidden-link-from-neoliberalism-to-neofascism/cid/2000310)


कुल मिला कर यह कथित सूत्रीकरण परिस्थिति का एक वैसे ही क़िस्म का चित्रण है जैसा मनोविश्लेषण में अवचेतन की व्याख्या से किया जाता है । ऐसी व्याख्या को कहा जाता है कि “अवचेतन ही व्याख्या करता है“। (Unconscious interprets) । परिस्थिति ही बोलती है । इसमें विश्लेषक खुद को वास्तव में परिस्थिति (अवचेतन) की आड़ में छिपा कर रखता है । उसकी भूमिका परिस्थिति में होने वाले हर मामूली हेर-फेर पर निगाह रखने भर की होती है । अर्थात् वह बिल्कुल निष्क्रिय नहीं होता है, न पुरानी पाठ्य पुस्तकों की सैद्धांतिक स्थापनाओं में सर गड़ाये बैठा रहता है । बल्कि वह हमेशा अपनी सुविधानुसार कुछ न कुछ करते हुए अपने को थोड़ा सक्रिय रखता है । 


पर परिस्थिति के साथ घिसटते रहने की ऐसी सक्रियता की विडंबना यह है कि इस क्रम में उसकी शक्ति का क्षय होते-होते उसके हस्तक्षेप करने की संभावना कम से कमतर होती चली जाती है । वह सिर्फ उतना ही कुछ कर पाता है जितने के लायक़ वह थोड़ा ज़ोर लगा कर अपने बैठने के लिए जगह बना पाता है। कुल मिला कर ऐसे विश्लेषक की सक्रियता किसी प्रकार अपनी जगह बनाने जितनी, अर्थात् अपने को अलगाते रहने की कोशिश के जितनी ही रह जाती है । 


इसके विपरीत, जिसे हम वास्तविक विश्लेषण समझते हैं, उसकी माँग होती है कि यदि उसे अपने को परिस्थिति की व्याख्या पर वास्तव में अवस्थित करना है तो उसे पूरी परिस्थिति के स्पंदित ढाँचे से अपनी पूर्ण संगति कायम करनी पड़ेगी । उसे उसकी धड़कनों के साथ ही धड़कना, खुलना और बंद होते रहना होगा । तभी आप अपने को कटे-छटे, कोरे उत्तर-आधुनिक व्यवहारों से अलग कर सकते हैं । परिस्थिति की बारे में अन्य चालू क़िस्म की अवधारणाओं से दूर रह सकते हैं । विश्लेषक के रूप में अपनी भूमिका अदा करने के लिए ही उसे स्पंदनों की संगति की वैज्ञानिक रीति को अपनाना होता है । 


हम इससे इंकार नहीं करते हैं कि विश्लेषक का काम परिस्थिति के ब्यौरों के संधान से उसकी व्याख्या पर ही निर्भर होता है । कार्ल मार्क्स ने इस रास्ते से ही पूंजीवाद की क्रियाशीलता के ब्यौरों से अपनी यात्रा शुरू की थी । लेकिन उनमें फ़र्क़ यह था कि उसके साथ ही उन्होंने उसे वस्तु की द्वंद्वात्मक भाषा से प्रतीकों की पराभाषा (metalanguage), सामान्यीकरणों की भाषा में लगातार अनुदित करने का काम भी जारी रखा और क्रमशः द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन का एक स्वरूप तैयार किया । 


पर जब रूस में लेनिन के सामने मार्क्स के विचारों पर ठोस रूप में अमल की चुनौती आई, तब उनके लिए परिस्थिति में व्यक्त और अव्यक्त को समेटने की राजनीति का सवाल उतना अहम नहीं था जितना यह था कि जो भी परिस्थिति है, उसमें ही एक अलग दिशा में बढ़ जाया जाए । उनके लिए किसी वैश्विक परिघटना की तलाश के बजाय ‘एक देश में समाजवाद’ की दिशा को अपनाने का सवाल प्रमुख हो गया । रूस की जनता की आकांक्षाओं के सपनों के साथ और उस देश की वास्तविकताओं के बीच मेल बैठाना प्रमुख हो गया । और इसमें अंततः जो सामने आया, वह यह कि पराभाषा (विश्व क्रांति) नाम की कोई चीज नहीं है, हर देश का अपना अलग-अलग यथार्थ है । जॉक लकान इसे मनोविश्लेषण की भाषा में कहते हैं —“अन्य का कोई और अन्य नहीं है”। (There is no other of the other) 


इस प्रकार , हम देखते हैं कि हम दैनंदिन राजनीति के सरोकारों से सम्बद्ध जनों को जिस परिस्थिति की व्याख्या करनी होती है, उसके तात्कालिक रुझानों के साथ-साथ ही हमारा ध्यान भी इधर-उधर भटकता रहता है । और हम उससे अपने लिए अजीबो-गरीब सिद्धांतों का एक जाल भी बुनने में मसगूल हो जाते हैं।  


सिगमंड फ्रायड किसी भी विश्लेषक की इस मुश्किल को जानते थे और इसीलिए अपने तई सचेत रूप में उन्होंने कभी भी रोगी के अपने आशय के बारे में दिये जाने वाले बयानों को कोई महत्व नहीं  देने का रास्ता अपनाया था । उनकी नज़र सिर्फ़ रोगी की बातों से अनायास ही ज़ुबान की फिसलन के रूप में सामने आने वाली उन अवांतर क़िस्म की बातों पर होती थीं जिनसे वे उसके मनोरोग के अवचेतन की गहरी परतों में छिपे संकेत मिल सकते थे । 


जैसे मार्क्स ने पूंजीवाद के अंतर्गत उत्पादन के साधनों के क्रांतिकारी रूपांतरण की अनवरत प्रक्रिया में बार-बार पैदा होने वाले संकटों के संकेतों से ही पूँजीवाद के अंत के लक्षणों की पहचान की थी । 


जब ‘अवचेतन ही व्याख्या करता है’ के सिद्धांत पर परिस्थिति पर ही विश्लेषण को निर्भर बना दिया जाता है तो उससे यह भी तय हो जाता है कि विश्लेषक के हस्तक्षेप का प्रभाव भी सिर्फ़ परिस्थिति-सापेक्ष होगा । परिस्थितियां ही इसकी अनुमति देगी कि कोई राजनीति किस हद तक जनता को प्रभावित कर सकती है, और कितनी नहीं । राजनीति अर्थात् विश्लेषक की अपनी विधेयात्मक भूमिका की कोई संभावना नहीं बचेगी । वह राजनीति परिस्थितियों की लगभग मूक दर्शक बन जाती है।  


इसके विपरीत, सच यह है मनोरोगी विश्लेषक के सामने सच बोलता है या झूठ, वह विश्लेषक की बात स्वीकारता है या नहीं, रोगी के सपनों की व्याख्या के मामले में उसका कोई मतलब नहीं होता है । परिस्थिति हमें कुछ भी क्यों न कहती हो, मनुष्यों के न्याय और समानता के सपनों का उससे कोई तात्पर्य नहीं होता है । किसी भी व्याख्या का परिणाम इस बात से तय होता है कि वह उसमें सपने से जुड़ी कौन सी नई चीज़ को उपस्थित करने में सफल होती है । उससे किसी नए अवचेतन के, नई परिस्थिति के लक्षणों के निर्माण का अथवा उससे साफ़ इंकार का ही कोई नया इंगित मिलता है या नहीं । 


असल में, परिस्थिति और विश्लेषक के बीच कोई विरोध नहीं हुआ करता है । यदि कोई ऐसा विरोध महसूस करता है तो साफ़ है कि वह अपने को किसी काल्पनिक धुरी पर स्थित किये हुए है। 


सपनों की व्याख्या की तरह ही मानवता की यात्रा की दिशाओं का कोई अंत नहीं है । इसमें विश्लेषक को अपने लिए ख़ास दिशा को चुन लेना पड़ता है । इसके लिए उसे बार-बार अपने मूल, एक ही सपने पर लौटना ज़रूरी नहीं होता है । 


जो चला आ रहा है, हम उसी की लकीर को पीटेंगे, ऐसे परिपाटी से जुड़े विमर्श से अपने को अलग करना हमारी दृष्टि में जरा भी ग़लत नहीं है । बल्कि इसी से असल में कोई बात बन सकती है । खींच-तान कर, वर्गीय विश्लेषण के नाम पर बार-बार पुरानी घिसीपिटी परिभाषाओं पर लौटना बुद्धिमत्ता नहीं है । किसी भी विवेकसंगत विश्लेषण के लिए यह हमेशा ज़रूरी होता है कि (1) वह अपने अंतिम लक्ष्य की पूर्ति के काम को यथार्थ की ज़मीन से जोड़े ; (2) समाज में उसके विरोध का जो दबाव है उसका जायज़ा ले और (3) सर्वोपरि, समाज में उत्पन्न विकृति के ठोस कारणों की तलाश करे। 


वह जमाना नहीं रहा जब मार्क्सवाद के लिए सच्ची राजनीति का अर्थ लोगों में समानतावादी समाज के लिए वर्ग संघर्ष की चेतना भर जगाने का होता था । वह आम मनुष्यों को इस चेतना के अभाव वाली प्राणीसत्ता कै रूप में देखता था । उसकी कोशिश थी कि लोगों की चेतना में वह दरार पैदा हो कि जिससे वह आगे हर चीज को एक ही वर्ग दृष्टि से देखने लगे। इसमें कहीं न कहीं यह भाव भी था कि जैसे प्रमाता के रूप में मनुष्य का वर्ग के अलावा अन्य कोई अस्तित्व शेष न रहे । लेकिन यह नियम है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से ही जीवन में अनेक पहचानों में बंध जाता है । प्राणी सत्ता कभी भी शुद्ध वर्गीय चेतना में सिमट नहीं सकती है । 


मनुष्य की कामनाओं के दो रूप हुआ करते हैं।  वह कामना यदि किसी शून्य में होती है तब भी वह वृत्ताकार में घूमती रहती है । लेकिन उसकी दूसरा रूप उस पतंगें की तरह का होता है जो लौ के रहते बार-बार जलने के लिए फिर से लौटता रहता है । वह अपने अंतर में जल जाने के उद्वेग को, असंतोष के सनातन आक्रोश को धारण किए होता है । मनोविश्लेषण में इसे प्रमाता का वह अवबोध कहते हैं जो उसके उल्लासोद्वेलन (jouissance) का वाहक होता है । यह वह सामाजिक चेतना है जिसमें हमेशा कुछ कर गुजरने का हौसला बना रहता है । 


हमारी दृष्टि में, किसी भी विश्लेषण का लक्ष्य जिस सामाजिक चेतना को पैदा करना होता है, वह यही चेतना होती है जो उसके दमित अवचेतन को, प्रतिकार की दबी हुई भावनाओं को, समाज के उल्लासोद्वेलन को वहन करती हो । आज की ऐसी किसी भी क्रांतिकारी व्याख्या को अनिवार्य तौर पर उसी दिशा में बढ़ कर ही विकसित किया जा सकता है । कोरी विवरणात्मक सैद्धांतिकी का कोई मूल्य नहीं हो सकता है ।  


ज़रूरी है कि आज के विश्लेषण पर यदि समाजवादोत्तर अभाव की छाया हो तो साथ ही जनता में बदलाव के बचे हुए उद्वेग के लिए भी जगह हो । तभी परिस्थितियाँ ही बोलेगी की थिसिस को जो सामने प्रकट है उसके पीछे के कारणों की व्याख्या के ज़रिये पुष्ट किया जा सकेगा ।