रविवार, 12 जुलाई 2026

राजनीतिक समुच्चयों का अस्तित्व उनकी सबसे नीचे की इकाइयों की सक्रियता में निहित होता है!

 

(हितेन्द्र पटेल द्वारा फेसबुक पर साझा की गई कुनाल चट्टोपाध्याय की एक टिप्पणी पर)

 

अरुण माहेश्वरी

 

कुनाल चट्टोपाध्याय ने पश्चिम बंगाल के वामपंथ की वर्तमान स्थिति पर एक विचारोत्तेजक टिप्पणी लिखी है। उनका मुख्य निष्कर्ष है कि सीपीआई जैसे दलों का निरंतर संकुचन मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड़कर सीपीआई(एम) पर निर्भर रहने की नीति अपनाई। उनके अनुसार यदि वे अपने स्वतंत्र संगठन, स्वतंत्र आंदोलनों और स्वतंत्र राजनीतिक आलोचना का विकास नहीं करेंगे, तो उनका यह सिकुड़ना जारी रहेगा।

 

यह विश्लेषण अपने भीतर निस्संदेह एक महत्वपूर्ण सत्य समेटे हुए है। लेकिन हमारा सवाल है कि क्या यही पूरा सत्य है? हमें ऐसा नहीं लगता । ऐसा इसलिए क्योंकि यह विश्लेषण मुख्यतः राजनीतिक रणनीति के स्तर पर ही रुक जाता है। यह उस गहरे संरचनात्मक नियम तक नहीं पहुँचता जो किसी भी राजनीतिक दल (समुच्चय) के विस्तार और संकुचन को नियंत्रित करता है।

 

इस पूरे विषय को, हमारे अनुसार, एक अलग धरातल से देखने की जरूरत है ।

 

सबसे पहले हमें इस मूल सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि राजनीति सत्य की एक प्रक्रिया है, और प्रत्येक सत्य की तरह उसका अस्तित्व भी समुच्चयों के रूप में ही संगठित होता है। कोई भी राजनीतिक दल केवल व्यक्तियों का इकट्ठा होना नहीं होता। वह मूलतः एक समुच्चय होता है, जिसकी एकता उसकी राजनीतिक लाइन और संगठनात्मक ढाँचे से निर्मित होती है।

 

राजनीतिक दल अपने बाहर समाज में मौजूद समानधर्मा खास सामाजिक तत्वों को लगातार अपनी ओर आकर्षित करता है। यही उसकी जीवन-प्रक्रिया, बल्कि जीवन धर्म है । जिस दिन यह प्रक्रिया रुक जाती है, उसी दिन वास्तव में उसका संकुचन शुरू हो जाता है।

 

यहीं पर राजनीति के फ्रैक्टल चरित्र का एक बहुत खास पहलू सामने आता है।

 

फ्रैक्टल गणित की एक ऐसी ज्यामितीय संरचना है जिसमें किसी सम्पूर्ण की निर्माण-पद्धति विभिन्न पैमानों पर उसके प्रत्येक हिस्से में पुनरावर्तित होती है। इसलिए प्रत्येक छोटा भाग किसी अर्थ में सम्पूर्ण का ही पुनरावर्तन होता है।

 

राजनीति का स्वरूप भी कुछ ऐसा ही होता है । राष्ट्रीय दल एक समुच्चय है तो उसका प्रांतीय संगठन भी एक समुच्चय है। जिला समिति और स्थानीय शाखा भी। यहाँ तक कि प्रत्येक जनसंगठन और प्रत्येक स्थानीय आंदोलन भी समुच्चय ही होते हैं । इन सभी पर एक ही नियम लागू होता है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर स्तर पर संगठन की आकृति एक जैसी दिखाई देती है ।

 

इसका वास्तविक अर्थ यह है कि जिस राजनीतिक लाइन और संगठनात्मक प्रभाव से कोई दल अपने सबसे छोटे स्तर पर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है, वही बड़े स्तरों पर भी उसके विस्तार का आधार बनती है। नीचे जो प्रभावी नहीं है, वह ऊपर कभी स्थायी रूप से प्रभावी नहीं हो सकता।

 

इसीलिए किसी भी दल की वास्तविक शक्ति उसके शीर्ष नेतृत्व में नहीं, बल्कि उसके सबसे छोटे पुनरुत्पादक समुच्चयों में निहित होती है। ऊपर वही जीवित रहता है जो नीचे जीवित है।

 

यहीं पर हमारे सामने कुनाल चट्टोपाध्याय की टिप्पणी की सीमा जाहिर हो जाती है।

 

वे सीपीएम की अधीनता को सीपीआई के पतन का कारण मानते हैं। लेकिन समुच्चय सिद्धांत के आधार पर देखें तो यह अधीनता शायद स्वयं एक पहले से उपस्थित सीपीआई की संरचनात्मक दुर्बलता की अभिव्यक्ति थी।

 

जिस दल की स्थानीय इकाइयाँ समाज में अपना विस्तार नहीं कर रही हो, वह ऊपर जाकर स्वतंत्र कैसे रह सकता है? इसीलिए किसी भी प्रकार का पिछलग्गूपन कारण कम, परिणाम अधिक अधिक होता है।

 

हम और एक कदम आगे जाते हुए यह भी कहना चाहेंगे कि सीपीएम भी इस तर्क से ऊपर नहीं है ।

यदि सीपीएम खुद नए सामाजिक तत्वों को अपनी ओर आकर्षित कर रही होती, तब भी वाम समुच्चय में विस्तार की प्रक्रिया बनी रहती। लेकिन जब उसका ही जैविक विस्तार रुक गया, तो पूरे वाम समुच्चय का संकुचन शुरू हो गया। छोटे वाम दलों का क्षय उसी बड़े संकट का भी एक खास परिणाम हो सकता है।

 

कुनाल जी की टिप्पणी में जो एक और महत्वपूर्ण सवाल आता है, वह है राज्य और राजनीति के संबंध का सवाल। कुनाल कहते हैं कि सीपीएम ने सत्ता के बल पर सीपीआई जैसे दलों को निगल जाने की अतिरिक्त क्षमता पा ली थी ।

 

हमारा मानना है कि राजनीतिक दलों का भविष्य उनके आकार और राज्य की ताक़त मात्र से तय नहीं होता । वह हमेशा उनके सबसे छोटे स्तरों पर राजनीतिक सक्रियता अर्थात् उनकी अपनी जैविक पुनरुत्पादन-क्षमता से निर्धारित होता है।

 

लेकिन राज्य की तर्क-पद्धति अलग होती है। राज्य को स्थिरता चाहिए, प्रशासन चाहिए, आनुगत्य और नियंत्रण चाहिए; समझौते चाहिए।

 

अर्थात राज्य का स्वाभाविक झुकाव पुनरुत्पादन की राजनीतिक प्रक्रिया के बजाय व्यवस्था के संरक्षण की ओर होता है।

 

बाद्यू की भाषा में राजनीति का उद्देश्य नित नए प्रमाताओं का निर्माण होता है और राज्य का उद्देश्य व्यवस्था का पुनरुत्पादन। इसीलिए बाद्यू राजनीति और राज्य के बीच स्थायी तनाव की बात करते हैं।

 

जब कोई भी राजनीतिक दल समाज में अपना आधार विकसित करने के बजाय दूसरे दलों के नेताओं, संगठनों और प्रभाव क्षेत्रों को अपने भीतर समाहित करके बढ़ने लगता है, तब उसका विस्तार मुख्यतः संख्यात्मक होता है। समकालीन भारत में इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण भारतीय जनता पार्टी के विस्तार में देखा जा सकता है।

 

ऐसा विस्तार अंततः अपने भीतर अनेक परस्पर विरोधी उपसमुच्चयों तैयार करता है।इसमें जब तक सत्ता का केंद्रीकरण बना रहता है, वे साथ रहते हैं। सत्ता ढीली पड़ते ही वही अंतर्विरोध उभर आते हैं। इसलिए हमारी दृष्टि में ऐसा अवसरवादी विस्तार वास्तव में स्थगित विघटन होता है।

 

जो दल समाज के भीतर नए राजनीतिक प्रमाताओं का निर्माण करते रहते हैं, वही दीर्घजीवी होते हैं। इसके बजाय जो दल केवल दूसरे समुच्चयों को तोड़कर बढ़ते हैं, वे अपने भीतर भविष्य के विखंडन के बीज भी साथ-साथ बोते चलते हैं।

 

राजनीति का इतिहास ऊपर से नहीं लिखा जाता। वह नीचे की उन असंख्य जीवित इकाइयों में रचा जाता है जहाँ पहली बार कोई नया राजनीतिक प्रमाता जन्म लेता है। जो दल इन इकाइयों का सतत पुनरुत्पादन करते हैं, वही इतिहास में टिकते हैं; जो उनसे कट जाते हैं, उनका क्षय केवल समय का प्रश्न रह जाता है।

 


शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

बंगाल के इतिहास का पुनर्लेखन या इतिहास का राजनीतिक पुनरुत्पादन?

 

−अरुण माहेश्वरी 



अब बीजेपी के सत्ता पर आने के साथ ही लगता है बंगाल के इतिहास लेखन की नई शैली आकार लेना चाहती है।

यहां हमारा संकेत हितेन्द्र पटेल जी की 3 जुलाई की एक फेसबुक पोस्ट की ओर है । इसमें वे इतिहास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति न्याय करने के लिए एक पूरी बुकलेट लिखने की घोषणा करते हैं । हितेंद्र जी की परियोजना को हम यदि सिर्फ किसी अवसरवादी समायोजन के खाते में डालने के बजाय गंभीरता से लें, तो इस पर इतिहास लेखन संबंधी एक अन्य प्रकार की गंभीर अकादमिक चर्चा की जा सकती है ।

वे कहते हैं कि अब तक “मार्क्सवादी”, “कैम्ब्रिज”, “एलीट” इतिहासकारों ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि की उपेक्षा की । 

इतिहास में किसी का उपेक्षित रह जाना कोई नई बात नहीं है । वास्तव में कुछ अर्थ में किसी का वहां न होना ही इतिहास का होना भी होता है । पूर्ण इतिहास तो यूं भी इतिहास की ‘पूर्ण गति’ के समान होता है!

बहरहाल, सवाल यह है कि अब तक के इतिहास को ‘एलीट’ का धोखा बता कर उपेक्षित तथ्यों को सामने लाने का दावा क्या सिर्फ उपेक्षित के प्रति न्याय तक ही सीमित है या न्याय के नाम पर इसमें इतिहास की खुली दरारों को किसी नए खास प्रकार के आख्यान से पाटने की परियोजना भी है; अर्थात् उपेक्षित के पुनरुद्धार के नाम पर अतीत के किसी वृत्तांत को एक नई विचारधारा के अनुरूप तैयार करने की कोशिश तो नहीं है!

हम सारी दुनिया में दक्षिणपंथ की तमाम वैचारिक मुहिम को न्याय करने के नारों की ओट में ही ऐसे ही काम करते हुए देख सकते हैं। 

ट्रंप का ‘मागा’ (make America great again) अमेरिकी ‘एलीट’ से लड़ते हुए गाजा के ध्वंस-स्तूप पर एक और ‘एलीट’ के लिये ही पर्यटन केंद्र बनाने और ‘आतंकवादी’ ईरान के विध्वंस से धनाढ्य विस्तारवादी यहूदियों के ग्रेटर इज़रायल के निर्माण की घोषणाएँ कर रहा है।

इतिहास के उपेक्षित तथ्यों को सामने लाना तभी एक विश्लेषणात्मक कर्म है जब वे इतिहास की दरारों को और चौड़ा करें ताकि उसके सामाजिक सत्य पर रोशनी गिरे। लेकिन जब उन्हीं तथ्यों को किसी नए राजनीतिक प्रभुत्व के ज्ञान-तंत्र में व्यवस्थित कर बांधा जाता है, तब वह विश्लेषण नहीं, एक नया विश्वविद्यालयी विमर्श कहलाता है । इतिहास किसी प्रश्न के बजाय नए प्रभुओं को ज्ञान की वैधता देने का पाठ्यक्रम बन जाता है।

अब हम आते हैं हितेंद्र पटेल जी के विषय पर । उनका विषय है बंगाल के राष्ट्रवाद का इतिहास और उसमें हिंदुत्व या श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्थान।

सब जानते हैं कि उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक बंगाली राष्ट्रवाद पर हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का गहरा प्रभाव था। बंकिम, विवेकानंद, अरविन्द, बिपिन पाल और रवीन्द्रनाथ भी — इन सबके यहाँ हिंदू सांस्कृतिक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं । पर जो नोट करने की बात है कि इनमें से किसी की राजनीतिक कल्पना धार्मिक राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना की नहीं थी।

इसके विपरीत जहां तक हिंदू महासभा और हिंदुत्व का सवाल है, वे एक अलग, शुद्ध राजनीतिक परियोजना है जिसका विकास विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ।

इसीलिए यह निष्कर्ष सही नहीं है कि बंगाली राष्ट्रवाद में हिंदुत्व के तत्व हिंदू महासभा के हिंदुत्व के पूर्वरूप थे । इन दोनों को एक ही ऐतिहासिक धारा में मिलाना न सिर्फ इतिहास का सरलीकरणवादी है, बल्कि बंगाली राष्ट्रवाद में मौजूद हिंदू सांस्कृतिक तत्त्वों से हिंदुत्व के धार्मिक राष्ट्र-राज्य की प्रतिस्थापना की वैसी ही कोशिश है जिसे हमने ऊपर न्याय के नाम पर पुराने औजारों से ही किसी ‘नए विश्वविद्यालयी विमर्श की प्रतिस्थापना’ कहा है । 

अब विशेष रूप से श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिया जाए । वे एक गंभीर शिक्षाविद् थे और उन्होंने एक समय बंगाल के हिंदुओं की आशंकाओं को भी उठाया था । 1947 के बंगाल विभाजन में उन्होंने हिंदू-बहुल क्षेत्र को भारत में रखने की मांग का साथ दिया था । यह इतिहास का तथ्य है और इसे दर्ज जरूर किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने अंततः हिंदू महासभा का राजनीतिक मंच स्वीकार किया। इसलिए उनकी ऐतिहासिक भूमिका का आकलन केवल उनकी आशंकाओं से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक विकल्पों से भी होगा।

इतिहास किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक विकल्पों से करता है जिन्हें उसने उन परिस्थितियों में चुना।

इसी प्रकार, ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और राज करो” की नीति एक ऐतिहासिक तथ्य है । पर इसी से बंगाल के सारे सामाजिक अंतर्विरोधों की पर्याप्त व्याख्या नहीं मिलती । मुस्लिम किसानों की आर्थिक शिकायतें और आकांक्षाएँ, जातिगत असमानताएँ, नमशूद्र राजनीति का उदय और भद्रलोक समाज का वर्चस्व, इन सबको केवल औपनिवेशिक षड्यंत्र का परिणाम मान लेना इतिहास की आंतरिक जटिलताओं से आँख मूँद लेना है । प्रो. सुशोभन सरकार आदि के बंगाल रिनैसां संबंधी कामों में इन पहलुओं पर काफी प्रकाश डाला गया है जो इतिहास की ऐसी दरारों को खोलते हैं जिनसे उससे जुड़ा सामाजिक सत्य प्रकाश में आता है । तभी इतिहास समाज के गतिशील वर्गीय अन्तर्विरोधों के अध्ययन का सजीव स्रोत बनता है । 

दरार किसी पाठ की कमी नहीं होती । यह वह स्थान है जहाँ कोई वैचारिक रूप अपने ही सामाजिक आधार को पूरी तरह ढँक नहीं पाता। इतिहासकार उसी असंगति को बड़ा करता है। 

हितेंद्र जी ने प्रो.सव्यसाची भट्टाचार्य का खास ज़िक्र किया है। यह सच है कि प्रो. भट्टाचार्य ने बंगाल के इतिहास के कुछ ऐसे प्रसंगों को भी दर्ज किया जिन्हें आसानी से छोड़ा जा सकता था। उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सांप्रदायिक तनाव और बंगाल के हिंदू समाज की आशंकाओं को भी इतिहास का हिस्सा माना। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि उन्होंने इन तथ्यों से हिंदुत्व का कभी कोई वैचारिक आख्यान निर्मित नहीं किया। 

लकान के यहाँ विश्लेषक (Analyst) कभी नया गुरु नहीं बनता। वह विश्लेष्य को कोई नया अंतिम सत्य नहीं देता। कोई वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत नहीं करता। इतिहास की प्रगति किसी आख्यान के पूर्ण होने से नहीं, बल्कि समाज के अन्तर्विरोधों के उद्घाटन से होती है । 

प्रचारक पहले कहता है कि पुराने इतिहासकारों ने दरार छिपा दी थी। फिर उसी दरार पर अपने राजनीतिक आख्यान का नया प्लास्टर चढ़ा देता है। इस प्रकार पुराना आवरण हटता है, पर उसकी जगह नया आवरण आ जाता है। 

नए इतिहास-लेखन की बड़ी विशेषता यह नहीं होती कि वह नए तथ्य खोजती है। नए तथ्य तो हर पीढ़ी खोजती है। जो इतिहासकार उसकी जटिलता को बचाते हैं, वे इतिहास को समृद्ध करते हैं; और जो उसे एक वैचारिक आख्यान में समेटना चाहते हैं, वे चाहे कितने ही नए तथ्य क्यों न प्रस्तुत करें, अंततः इतिहास नहीं, स्मृति-राजनीति (politics of memory) का लेखन करते हैं। 

कुल मिला कर इतिहास का विश्लेषक उसकी दरारों को चौड़ा करता है; इतिहास का प्रचारक उन्हें अपने नए प्रभुत्व के गारे से भर देता है। 

अब जब हम स्मृति-राजनीति (politics of memory) की बात कर रहे हैं, हितेंद्र जी के द्वारा गुरुदत्त के उपन्यासों का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है । गुरुदत्त हिंदुत्ववादी वैचारिक पृष्ठभूमि के एक लोकप्रिय उपन्यासकार थे। उनके उपन्यास स्वतंत्रता, विभाजन और हिंदू समाज की कुछ खास प्रकार की स्मृतियों का लेखन है । उन्हें किसी मानसिक संसार को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत कहेंगे । लेकिन वे इतिहास के प्राथमिक स्रोत नहीं हैं।

साहित्य इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, इतिहास की चेतना का दस्तावेज़ होता है। यदि उपन्यासों को अभिलेखीय प्रमाणों के समकक्ष रख दिया जाए, तो इतिहास और साहित्य दोनों की प्रकृति विकृत हो जाती है। 

इतिहासकार का काम किसी दल की ओर से मुकदमा लड़ना नहीं है। लकान की भाषा में कहें तो विश्लेषक S₁ (मास्टर-संकेतक) का उत्पादक नहीं होता। वह उस स्थान को सक्रिय करता है जहाँ $ (विभाजित प्रमाता) (barred subject) अपने सत्य के साथ उपस्थित हो सकता है। 

अंत में हम यही कहेंगें कि इतिहास का विषय वैचारिक आकृतियाँ नहीं, उन आकृतियों को जन्म देने वाले सामाजिक अन्तर्विरोध हैं। राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और सांस्कृतिक पहचान इतिहास की गतिशील शक्तियाँ नहीं, बल्कि उन शक्तियों के वैचारिक रूप हैं। इतिहासकार यदि इन्हीं रूपों को विश्लेषण की अंतिम इकाई मान ले, तो वह स्वयं विचारधारा के भीतर काम करने लगता है। इतिहास का काम इन वैचारिक रूपों के आवरण को काटकर उन सामाजिक अन्तर्विरोधों को दृश्य बनाना है जिनकी वास्तविक गति इन रूपों के भीतर छिप जाती है।




बुधवार, 1 जुलाई 2026

राम मंदिर में चोरी और धर्म के राजनीतिकरण का संकट

— अरुण माहेश्वरी





अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोपों और उससे जुड़ी गिरफ्तारियों ने करोड़ों श्रद्धालुओं को स्तब्ध कर दिया है। यदि जांच अंततः इन आरोपों की पुष्टि करती है और यह सिद्ध होता है कि श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित धन का व्यवस्थित दुरुपयोग हुआ है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं होगी; यह उस संस्थागत संरचना पर भी गंभीर प्रश्न होगा जिसके अधीन इस मंदिर का संचालन किया जा रहा है।


सबसे पहले एक बुनियादी बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए। यह चोरी किसी हिंदू मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था में हुई चोरी नहीं है। भारत के हजारों मंदिरों में चढ़ावे से पुजारियों, सेवायतों और धार्मिक संस्थाओं का निर्वाह होता है। यदि वह स्थापित परंपरा और नियमों के अनुरूप है, तो उसे चोरी नहीं कहा जाता। चोरी तब कहलाती है जब श्रद्धा से समर्पित धन को नियमों के विरुद्ध निजी संपत्ति में बदल दिया जाए।


लेकिन अयोध्या का प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।

यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं रहा। इसका निर्माण एक विशाल राजनीतिक आंदोलन की परिणति के रूप में हुआ। इसे केवल भगवान राम के मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष राजनीतिक परियोजना के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसीलिए यहाँ जो कुछ घटित होता है, वह केवल धार्मिक घटना नहीं रह जाता; वह राजनीति, सत्ता और संस्थागत संस्कृति के प्रश्नों को भी जन्म देता है।


समाजशास्त्र का एक सामान्य सिद्धांत है कि संस्था का स्वरूप उसके संचालन के स्वरूप को भी प्रभावित करता है। संस्था जिस उद्देश्य से निर्मित होती है, जिस प्रकार की सत्ता-संरचना उसके भीतर स्थापित की जाती है और जिन प्रोत्साहनों पर उसका प्रशासन चलता है, वही उसकी कार्य-संस्कृति को आकार देते हैं।


भारत का दुर्भाग्य यह है कि सार्वजनिक जीवन का शायद ही कोई क्षेत्र भ्रष्टाचार के संकट से पूरी तरह मुक्त रहा हो। सरकारी संस्थाएँ, सार्वजनिक उपक्रम, अनेक प्रशासनिक निकाय और राजनीतिक संगठन बार-बार इसी समस्या से ग्रस्त पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई धार्मिक संस्था स्वयं एक प्रकार के अर्ध-सरकारी या राजनीतिक प्रतिष्ठान का रूप ग्रहण कर ले, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह भी उसी संस्थागत संस्कृति से प्रभावित नहीं होगी जो हमारे सार्वजनिक जीवन में पहले से व्याप्त है ?


यहीं से अयोध्या के राम मंदिर का प्रश्न एक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है।


प्राचीन हिंदू धर्म का ऐतिहासिक स्वरूप किसी एक केंद्रीय धर्मसत्ता पर आधारित नहीं रहा है। उसकी शक्ति उसकी बहुलता में रही है—असंख्य तीर्थ, असंख्य परंपराएँ, असंख्य संप्रदाय, स्थानीय देवस्थानों की स्वायत्तता और साधना के विविध मार्ग। उसके पास न कोई एक सर्वोच्च धर्माध्यक्ष रहा, न कोई एक अनिवार्य धार्मिक राजधानी और न ही एक केंद्रीकृत धार्मिक अनुशासन। यही उसकी ऐतिहासिक विशेषता रही है।


इसके विपरीत, आधुनिक राजनीतिक हिंदुत्व की परियोजना हिंदू समाज को एक केंद्रीय प्रतीक, एक केंद्रीय धार्मिक-राजनीतिक स्थल और एक प्रकार के आधिकारिक प्रतिनिधित्व के अंतर्गत संगठित करने का प्रयास करती दिखाई देती है। यह प्रक्रिया हिंदू धर्म के स्वाभाविक ऐतिहासिक विकास का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीति द्वारा निर्मित एक कृत्रिम केंद्रीकरण का प्रयास है।


और, हमारी नजर में यहीं सबसे बड़ा खतरा निहित है।


जब किसी बहुलतावादी लोकधर्म को सत्ता की केंद्रीय परियोजना में रूपांतरित किया जाता है, तब उसके भीतर भी वही प्रशासनिक तर्क प्रवेश करते हैं जो आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की पहचान हैं—सत्ता का केंद्रीकरण, संसाधनों का केंद्रीकरण, नियंत्रण का केंद्रीकरण, भाई-भतीजावाद और संरक्षण की राजनीति। श्रद्धा का स्थान प्रबंधन लेने लगता है, नैतिक अनुशासन की जगह प्रशासनिक अनुशासन आ जाता है, और धार्मिक उत्तरदायित्व की जगह राजनीतिक उत्तरदायित्व प्रमुख हो जाता है।


ऐसी स्थिति में यदि भ्रष्टाचार जन्म लेता है, तो उसे केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक विफलता कहकर टालना पर्याप्त नहीं होता। वह किसी न किसी रूप में उस संस्थागत रूपांतरण की भी अभिव्यक्ति बन जाता है जिसके द्वारा धर्म को राजनीति की भाषा में संगठित किया गया।


इसीलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह किसी हिंदू मंदिर में हुई चोरी भर नहीं है। यह उस मंदिर में हुई चोरी है जिसे राजनीतिक हिंदुत्व की केंद्रीय परियोजना का प्रतीक बनाया गया। यह टिप्पणी हिंदू धर्म पर नहीं, बल्कि धर्म के राजनीतिकरण पर है।


विडंबना यह है कि भगवान राम भारतीय सांस्कृतिक चेतना में मर्यादा, न्याय और धर्म के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। यदि उन्हीं के नाम पर निर्मित सबसे बड़े सार्वजनिक मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा पर प्रश्न उठने लगें, तो यह केवल धन के गबन का मामला नहीं रहता । यह उस दावे की भी परीक्षा है कि क्या राजनीति धर्म की रक्षा कर सकती है? 


शायद इस घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि धर्म की सबसे बड़ी सुरक्षा उसके राजनीतिक अधिग्रहण में नहीं, बल्कि उसकी नैतिक स्वायत्तता में निहित होती है। जिस दिन कोई धार्मिक संस्था सत्ता का विस्तार बन जाती है, उसी दिन उसमें सत्ता की बीमारियों के प्रवेश का खतरा पैदा हो जाता है। और जहाँ सत्ता की संस्कृति का प्रवेश होता है, वहाँ श्रद्धा भी प्रशासनिक फ़ाइलों और राजनीतिक संरक्षण के बीच खोने लगती है।


यदि अयोध्या की यह घटना अंततः सिद्ध होती है, तो उसका सबसे गहरा संदेश यही होगा कि किसी भी धर्म की रक्षा राजनीति के द्वारा नहीं, बल्कि उस नैतिक चेतना के द्वारा होती है जो सत्ता से बड़ी होती है। जब सत्ता स्वयं धर्म का रूप धारण कर लेती है, तब सबसे पहले धर्म की आत्मा ही संकट में पड़ती है।


आगे के लिए कुछ सुझावः


इस संदर्भ में कुछ ठोस कदमों पर विचार किया जाना आवश्यक है। 

सबसे पहले, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए—नियमित ऑडिट, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और स्वतंत्र निगरानी तंत्र के माध्यम से। 

दूसरा, धार्मिक संस्थाओं के संचालन को राजनीतिक प्रभाव से यथासंभव मुक्त रखने की दिशा में स्पष्ट नीतियाँ बननी चाहिए, ताकि उनकी नैतिक स्वायत्तता बनी रहे। 

तीसरा, यह भी विचार किया जा सकता है कि क्या ऐसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में पारंपरिक धार्मिक प्राधिकारों—जैसे शंकराचार्यों या अन्य मान्य आध्यात्मिक संस्थाओं—की अधिक भूमिका सुनिश्चित की जाए, ताकि संचालन का आधार राजनीतिक संरचना के बजाय धार्मिक उत्तरदायित्व और परंपरा पर टिका रहे। 

चौथा, श्रद्धालुओं और समाज की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिससे जवाबदेही केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित न रहे। अंततः, धर्म के मूल नैतिक मूल्यों—ईमानदारी, सेवा और उत्तरदायित्व—को संस्थागत व्यवहार का आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि श्रद्धा और विश्वास की रक्षा केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में भी दिखाई दे।

सोमवार, 29 जून 2026

क्यों हमने इस उपन्यास के दो अध्यायों के बाद ही उसे छोड़ दिया!

 

(अलका सरावगी के उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें” के अधूरे पठन पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी 



अलका सरावगी के उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें” के पहले अध्याय “कोई बीसेक बरस बाद प्रेम” के बमुश्किल बारह पन्नों के बाद जब उसके दूसरे अध्याय “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” पढ़ा तो हमारा धीरज जवाब दे गया। हम आगे और इस उपन्यास को पढ़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा सके ।

इन दो अध्यायों ने ही स्पष्ट कर दिया कि अलका सरावगी जिस उपन्यास-दृष्टि के संकट से अपने आरंभिक लेखन से जूझती रही हैं, समय के साथ उससे बाहर नहीं निकलीं; बल्कि इस उपन्यास में वह संकट और अधिक गहरा होकर सामने आता है। इस उपन्यास के प्रारंभ में ही यह नजर आने लगा कि लेखिका ज़िद की हद तक अपने पात्रों को कभी बोलने नहीं देती; वह खुद उनके भीतर बैठकर लगातार खुद ही बोलती रहती है। 

यह वह स्थिति है जिसे मनोविश्लेषण की भाषा में कहा जा सकता है कि विश्लेष्य (analysand) की जगह विश्लेषक (analyst) स्वयं बोलने लगें । और, जिस क्षण ऐसा होता है, उसी क्षण विश्लेषण समाप्त हो जाता है; केवल आरोप, संकेत और पूर्वग्रह शेष रह जाते हैं । 

उपन्यास के पहले अध्याय, “कोई बीसेक बरस बाद प्रेम”, में सुनील बोस उर्फ़ मोहम्मद दानियाल की कहानी है । एक ऐसा व्यक्ति जिसने मुस्लिम लड़की दीबा से विवाह किया, परिवार से कट गया, बीस साल बाद माँ के पास लौटा और फिर माँ की भयावह आत्महत्या का सामना किया। 

जाहिर है कि यह कथा गहरी मानवीय करुणा की माँग करती थी। पर लेखिका इसे पात्रों की भीतरी आवाज़ से नहीं, अपने बाहरी व्याख्यात्मक चाबुक से चलाती है। “सच बोलो...”, “क्या तुम सिर्फ़ माँ के दिल की सोचकर गए थे?”, “क्या एक अदद विलेन के बिना कहानी पूरी नहीं होती?” जैसे कोष्ठकों में बार-बार आने वाले वाक्यों से पुलिसिया पूछताछ के लहजे में लेखक का हस्तक्षेप कथा के खुलने की संभावनाओं को लगातार बंद करता जाता है। कहना न होगा, पात्र के अचेतन को सुनने के बजाय उस पर अर्थ का आरोपण विश्लेषण को चौपट करने के लिए काफी होता है। 

उपन्यास के दूसरे अध्याय, “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” में तो यह दोष जैसे सिर पर चढ़ कर बोलने लगता है। इसके पात्र बोड़ो बाबू को कम्युनिस्ट सिद्ध करने के लिए लेखिका कुछ बाहरी चिह्नों का प्रयोग करती है, जैसे वे ‘गणशक्ति’ (सीपीआईएम का बांग्ला दैनिक मुखपत्र), रूसी साहित्य पढ़ते हैं, यूनियन की बैठकों में जाते हैं, पूजा से चिढ़ते हैं और मुसलमानों के इलाके में घर बनाते हैं। मानो कम्युनिस्ट होना कोई ऐतिहासिक, वर्गीय और वैचारिक चेतना न होकर अख़बार, चश्मा, गंभीर चेहरा, दाढ़ी और कुछ आदतों का जोड़ मात्र हो।

इसमें दूसरा और सबसे गंभीर उदाहरण बाबरी मस्जिद प्रकरण का है। यह इस अंश का सबसे निर्णायक दृश्य भी है। बिना किसी पूर्ववर्ती मानसिक प्रक्रिया, किसी वैचारिक संकट, किसी सामाजिक दबाव या किसी व्यक्तिगत अनुभव की तैयारी के एक जीवन-भर का ‘कम्युनिस्ट’ अचानक टीवी पर बाबरी मस्जिद गिरते देखकर उछल-उछलकर ताली बजाने लगता है! 

यदि लेखक वास्तव में यह दिखाना चाहता कि किसी कम्युनिस्ट के भीतर सांप्रदायिक चेतना दबे रूप में मौजूद होती है, तो उसे उस चेतना के बनने की प्रक्रिया दिखानी चाहिए । साहित्य में आकस्मिक घटनाएँ भी असंभव नहीं होतीं; पर आकस्मिकता तभी विश्वसनीय बनती है जब उसका मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार कथा के भीतर निर्मित किया गया हो । पर यहाँ तो केवल एक दृश्य है, जो इसलिए उपस्थित है कि पाठक चौंक जाए और निष्कर्ष निकाल ले कि कम्युनिस्ट भी अंततः भीतर से हिंदुत्ववादी ही निकलते हैं। 

इसे आलोचना की भाषा में, साहित्यिक अन्वेषण नहीं, वैचारिक युक्ति (device) कहते हैं। लेखक ऐसे ही चरित्रों पर सवार होकर बोला करता है।

तीसरा उदाहरण मुसलमानों के बीच घर बनाने की घटना को भी लिया जा सकता है। लेखिका इसे बार-बार इस प्रकार रखती है कि जैसे यह कम्युनिस्टों की कोई हास्यास्पद नैतिक नुमाइश हो। जबकि बंगाल में विशेषकर वामपंथी ट्रेड यूनियन आंदोलन के इतिहास में मिश्रित आबादी वाले इलाक़ों में रहना कोई असाधारण घटना नहीं थी। अनेक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता वास्तव में उन्हीं मज़दूर बस्तियों में रहते थे जहाँ हिन्दू-मुस्लिम साथ रहते थे। इससे किसी भोले आदर्शवाद का उपहास करना स्वयं इतिहास की अज्ञानता का परिचायक है।

बोड़ो बाबू का चरित्र वास्तव में कहीं अधिक जटिल हो सकता था। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, एक असफल पिता, एक मूक पति, एक वैचारिक मनुष्य, एक दुख से टूटा हुआ इंसान—इन सबके बीच का तनाव एक बड़े उपन्यास का आधार बन सकता था। लेकिन लेखिका को ऐसी जटिलता पसंद नहीं हैं। वह उसे सरल बनाती हैं, फिर उस सरलता पर व्यंग्य करती हैं। इस प्रकार चरित्र का नहीं, चरित्र के कैरिकेचर का निर्माण करती है।

चौथा उदाहरण बोस और दीबा के विवाह का है। ऊपर से तो उपन्यास मानो अंतर-धार्मिक विवाह का समर्थन करता दिखाई देता है, पर उसके पूरे भाव-संयोजन में यह विवाह लगातार “समस्याग्रस्त”, “बेमेल”, और “त्रासद” रूप में उपस्थित होता है। सुनील का मोहम्मद दानियाल बनना प्रेम का विस्तार नहीं, लगभग सामाजिक दुर्घटना जैसा दिखाई देता है। अंततः पाठक के भीतर यह भाव पैदा होता है कि ऐसी शादियाँ स्वभावतः विफल होती हैं। इस प्रकार, लेखक बिना प्रत्यक्ष घोषणा किए अपने पूरे भाव-संयोजन से वही प्रभाव पैदा करता है जिसे आज का हिंदुत्ववादी सामाजिक विमर्श लगातार प्रचारित कर रहा है।

कोलकाता का चित्रण भी इसी प्रकार सुनी-सुनाई सूचनाओं का कोलाज है—मटियाबुर्ज, वाजिद अली शाह, दर्जी, मुस्लिम बस्ती, बंगाली उच्चारण, रवीन्द्र-संगीत, गणशक्ति, यूनियन, बाबरी, CAA—सब कुछ मौजूद है, पर किसी की ऐतिहासिक आत्मा नहीं है। शहर यहां महज एक दृश्य-सामग्री है, जीवित अनुभव नहीं।

इस दूसरे अध्याय का शीर्षक है, “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” । पर वास्तव में यहां किसी मनुष्य का निर्माण नहीं होता। यहाँ पहले से तय वैचारिक निष्कर्षों के अनुसार मनुष्य की एक आकृति गढ़ी जाती है। चरित्र का स्थान रूढ़ छवि (stereotype) ले लेती है। 

इस प्रकार के लेखन की बुनियादी विफलता का कारण यही होता है कि लेखक पात्रों पर विश्वास नहीं करता। वह पहले निष्कर्ष तय करता है, फिर पात्रों से वैसा व्यवहार करवाता है जिससे निष्कर्ष सिद्ध हो जाए। फलतः बोड़ो बाबू चरित्र नहीं, कम्युनिस्ट का कैरिकेचर बन जाते हैं; बोस प्रेमी नहीं, भ्रमित पहचान का नमूना बन जाता है; दीबा स्वतंत्र स्त्री नहीं, तनाव का कारण बन जाती है; माँ करुणा की जगह भावुकता का यंत्र बन जाती है। उपन्यास अपने पात्रों का उपन्यास नहीं रहता; यह लेखिका की पूर्वधारणाओं का आख्यान, बन जाता है। 

अच्छा उपन्यास अर्थ को आरोपित नहीं करता, उसे जन्म लेने देता है। पर यहां मनुष्य नहीं, मनुष्य पर बनी-बनाई राय बोलती है। और जब राय कथा पर हावी हो जाती है, तब साहित्य मर जाता है—केवल टिप्पणी ही बचती है। 

“कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन” के दो अध्यायों तक आते-आते ही हमारे लिए उपन्यास को आगे पढ़ना कठिन हो गया। इसका कारण भाषा या कथन-कौशल नहीं था। अलका सरावगी इन पहलुओं को निभा लेती हैं। पर हमारे तई समस्या उनके लेखन की मूलभूत दृष्टि की संरचना में है । उनके लेखन पर हमारा यह अनुभव नया भी नहीं है।

लगभग तीस वर्ष पहले जब हमने उनके चर्चित उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ की तुलना प्रभा खेतान के ‘पीली आँधी’ से करते हुए एक टिप्पणी लिखी थी, तब भी हमने पाया था कि दोनों लेखिकाएँ लगभग एक ही सामाजिक संसार, एक ही मारवाड़ी परिवेश और एक ही कलकत्ता को आधार बनाती हैं; लेकिन प्रभा खेतान के यहाँ वही संसार जीवित मनुष्यों, उनके श्रम, उनकी महत्वाकांक्षाओं, उनकी विफलताओं और इतिहास की ठोस प्रक्रियाओं से बनता है, जबकि अलका सरावगी के यहाँ वही संसार धीरे-धीरे एक विचारधारात्मक आख्यान में बदल जाता है। इतिहास अपनी जटिलता में नहीं आता;  किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष का बयान बन जाता है।

उस समीक्षा में हमने लिखा था कि कलिकथा का दोष उसका इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि इतिहास का विकृतिकरण है। उसमें स्वतंत्रता आन्दोलन, बंगाल का सामाजिक जीवन, मारवाड़ी समुदाय, गांधीवादी, सुभाषवादी, सांप्रदायिक तनाव—सब कुछ इस प्रकार संयोजित होता है ताकि अंततः एक निर्मित "मारवाड़ी अस्मिता" का आख्यान तैयार हो सके। इसके विपरीत पीली आँधी में माधो बाबू जैसे पात्र अपने कर्म, अपने व्यापार, अपने समय और अपने अंतर्विरोधों से बनते हैं। उनकी अस्मिता विचारधारा से आरोपित नहीं होती; जीवन से अर्जित होती है।

आज कलकत्ता : कॉस्मोपॉलिटन दिल और दरारें के केवल दो अध्याय पढ़कर ही हममें फिर वही पुरानी अनुभूति लौट आई।

यहाँ भी कलकत्ता अपने बहुस्तरीय ऐतिहासिक यथार्थ में नहीं, कुछ चुने हुए प्रसंगों और सुनी-सुनाई स्मृतियों के सहारे उपस्थित होता है। शहर की वह जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया, जिसमें बंगाली, मारवाड़ी, अंग्रेज़, चीनी, यहूदी, बिहारी मजदूर, शिक्षित मध्यवर्ग, उद्योगपति, ट्रेड यूनियन, अकाल, विभाजन, नक्सलबाड़ी और उदारीकरण—सब मिलकर आधुनिक कलकत्ता का निर्माण करते हैं—वह लगभग अनुपस्थित है। उसकी जगह घटनाओं के ऐसे सरलीकृत रेखाचित्र हैं जिनमें लेखक की वैचारिक धारणा अधिक दिखाई देती है, शहर का वास्तविक जीवन कम।

यथार्थवादी साहित्य की पहली शर्त होती है कि लेखक अपने पात्रों और इतिहास, दोनों से कुछ सीखने के लिए तैयार हो। विचार उसके अनुभव से निकले, अनुभव विचार की कठपुतली न बने। यहाँ हमें बार-बार उलटी प्रक्रिया दिखाई देती है। जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं, पात्र बोलते कम हैं, लेखक की धारणाएं उनके माध्यम से अधिक बोलती हैं। इतिहास खुलता नहीं, समझाया जाता है। स्मृति खोज नहीं करती, प्रमाण जुटाती है।

यही कारण है कि दूसरे अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते हमारे भीतर यह विश्वास नहीं बचा कि आगे का पाठ इस पहली छाप को बदलेगा। अनुभव ने उलटे यही बताया कि ‘कलिकथा वाया बाईपास’ के समय अनुभूति के जिस उथलेपन को हमने पहचाना था, वही उनके और भी कुछ परवर्ती उपन्यासों की भांति फिर से एक नए शीर्षक और नए प्रसंग के साथ उपस्थित हो गया है। 

विचारधारा अपने-आप में लेखक को यथार्थ के प्रति अंधा नहीं बनाती। हर बड़ा लेखक किसी-न-किसी विचारधारा या विश्वदृष्टि से संचालित होता है । वह यथार्थ की खोज का उपकरण होती है, लेखक की दृष्टि को पैना बनाती है। लेकिन जब विचारधारा यथार्थ पर आरोपित निष्कर्ष बन जाती है, तब वह लेखक को यथार्थ के प्रति अंधा कर देती है। लेखक तब जीवन से सीखना बंद कर देता है; वह जीवन से केवल अपने लिए प्रमाण जुटाने लगता है। 

यथार्थवादी साहित्य की पहली शर्त यह नहीं कि लेखक विचारधारा से मुक्त हो; बल्कि यह कि उसकी विचारधारा यथार्थ की खोज का साधन बने, उसका विकल्प नहीं। और यदि वह आरोपित विचारधारा प्रतिक्रियावादी हो, तो वह मनुष्य को उसके कर्म, संघर्ष और इतिहास से काटकर पूर्वनिर्धारित पहचानों में बदल देती है। वहाँ साहित्य अपनी सबसे बड़ी शक्ति, मानव-मुक्ति की कल्पना को ही खो देता है।

इसी कारण 'कलकत्ता : कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें' के केवल दो अध्यायों के बाद ही हमें आगे बढ़ना निरर्थक लगा। हमारे लिए यह किसी नए साहित्यिक अनुभव की शुरुआत नहीं थी; यह उस दृष्टि की पुनरावृत्ति थी जिसे हम लगभग तीन दशक पहले 'कलिकथा वाया बाईपास' की समीक्षा में पहचान चुके थे। उपन्यास समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन उसके देखने का ढंग हमारे सामने पूरा खुल चुका था। आगे के पृष्ठ शायद नए प्रसंग देते, पर नई दृष्टि नहीं!

पुनः, जब लेखक अपने पात्रों और इतिहास से सीखना बंद कर देता है और उन्हें अपनी पूर्वधारणाओं के प्रमाण में बदल देता है, उसी क्षण उपन्यास का यथार्थ समाप्त होने लगता है।







सोमवार, 22 जून 2026

सड़कों के नाम बदलना स्मृतियों पर बुलडोजर चलाने जैसा है !

 

(सुहरावर्दी एवेन्यू से गोपाल मुखर्जी रोड के बहाने इतिहास, स्मृति और नाजी सत्ता पर एक टिप्पणी)

-अरुण माहेश्वरी



कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड करना पहली नज़र में किसी को भी एक सामान्य राजनीतिक घटना लग सकती है। लेकिन यह प्रसंग केवल नाम बदलने का नहीं, इतिहास को पहचानने और उसके साथ व्यवहार करने के मूलभूत दृष्टिकोण का है।

यदि कोई सरकार यह कहे कि वह इतिहास का न्याय कर रही है, तो उससे सबसे पहली अपेक्षा तो यह होती है कि वह इतिहास के तथ्यों की तो सटीक पहचान करें । जिस व्यक्ति के नाम को हटाया जा रहा है और जिसे स्थापित किया जा रहा है, उनके बारे में ठोस तथ्यों की तो उसे सही जानकारी हो ! 

यहाँ विडंबना यह है कि जिस सड़क को हटाया गया, वह उस सुहरावर्दी के नाम पर थी ही नहीं जिसे हटाने का नैतिक तर्क दिया गया है । 

1933 में नामित यह सड़क उन सर हसन सुहरावर्दी की स्मृति में थी जिन्होंने बंगाल की शिक्षा, चिकित्सा और सार्वजनिक जीवन में काम किया था । वे चिकित्सक थे, विश्वविद्यालय प्रशासक और सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे। जिस 1946 की कोलकाता किलिंग की बात की जा रही है उस राजनीति से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था । 

हमारी नजर में यह केवल तथ्यगत भूल नहीं है। यह स्मृति का राजनीतिक पुनर्लेखन है। 

हिटलर के थर्ड राइख के इतिहासकार विलियम शिरर ने दिखाया है कि 1933 के बाद नाज़ी शासन ने जर्मन जीवन के ‘हर कोने’ को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी—शिक्षा, प्रेस, कला, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, यहाँ तक कि नगरों की दृश्य संरचना तक को। सड़कों और सार्वजनिक स्थलों का पुनर्नामकरण इसी व्यापक नाज़ीकरण परियोजना का हिस्सा था।


हिटलर ने देश भर में सैकड़ों सड़कों, चौकों और सार्वजनिक स्थलों को नए नाम दिए । इनमें से तमाम नाम नाज़ी आंदोलन के शहीदों, सैनिक प्रतीकों और स्वयं हिटलर से जुड़े हुए थे। इस नामकरण का ही दूसरा पक्ष था, नामों को मिटाना। हिटलर ने चुन-चुन कर यहूदी मूल के व्यक्तियों के, समाजवादी नेताओं के, उदारवादी और लोकतांत्रिक परंपरा के प्रतीकों और वाइमर गणराज्य से जुड़े नामों को हटाया था । इतिहास की किताबों में इसके सारे तथ्य मौजूद हैं । पूर्वी प्रशिया में तो 1938 में हजारों गाँवों और कस्बों के नाम बदल दिए गए ताकि पोलिश, लिथुआनियाई और पुराने प्रुशियाई सांस्कृतिक चिह्न ही मिट जाएँ। 


यहाँ नाम बदलना प्रशासनिक काम नहीं था, इतिहास के स्वामित्व का दावा था। आज भी जर्मनी में संग्रहालय, स्मारक और अभिलेख बताते हैं कि कौन-सी सड़क कब बदली, क्यों बदली और किस इतिहास से जुड़ी थी। 1945 के बाद जर्मनी ने नाज़ी नाम तो हटाए, पर उसने नाज़ी अतीत को मिटाया नहीं। स्मृति को नष्ट नहीं किया गया; उसे आलोचनात्मक रूप से संरक्षित किया गया।

अब हम फिर कोलकाता के सुहरावर्दी प्रसंग पर आते हैं । सुहरावर्दी की जगह गोपाल मुखर्जी को लाने के निर्णय के समर्थकों का तर्क है कि 1946 की कोलकाता हिंसा में हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भूमिका को भूलना नहीं चाहिए। 

यह सही है कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी का नाम 1946 के डायरेक्ट एक्शन से अलग नहीं किया जा सकता। उनके आलोचक उन्हें प्रशासनिक विफलता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जोड़ते हैं। लेकिन हुसैन शहीद सुहरावर्दी राजनीति की विरासत भी इतनी सरल नहीं, बल्कि काफी जटिल रही है । वही व्यक्ति 1947 में गांधीजी के साथ कोलकाता में शांति स्थापित करने के प्रयासों में भी दिखाई देता है।

इतिहास में किसी व्यक्ति की भूमिका एकरेखीय नहीं होती । और यहाँ तो एक अलग ही प्रश्न उठ गया है कि क्या किसी व्यक्ति के अपराध की स्मृति दूसरे व्यक्ति के नाम पर दर्ज की जा सकती है ?  यह कैसा प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन है!

जहां तक गोपाल चंद्र मुखर्जी का सवाल है, उनकी स्मृति बंगाल के विभाजन-पूर्व लोकजीवन की स्मृति है। वे मांस-व्यवसाय और अखाड़ा-संस्कृति से जुड़े थे, और 1946 के दंगों के दौरान स्थानीय प्रतिरोध के एक लोकप्रिय पात्र बन गये थे। उनके परिवार के अनुसार उन्होंने हिंदुओं की रक्षा की और निर्दोष मुसलमानों को हानि न पहुँचाने की भी सलाह दी। पर उनके आलोचक उनकी दूसरी तस्वीर भी रखते हैं। यह बहस भी इतिहास का एक हिस्सा है।

शहरों के नाम स्मृति की परतें होते हैं । क्या किसी शहर को उसके अतीत से काट कर नया बनाया जा सकता है? शहर केवल सड़कें और इमारतें नहीं होते, वे स्मृति के अभिलेख होते हैं । सड़कों, चौकों और मोहल्लों के नाम केवल दिशा बताने के लिए नहीं होते। वे बताते हैं कि शहर स्वयं को कैसे याद करता है।

इस संदर्भ में आज लाहौर का उदाहरण सबसे ताजा और उल्लेखनीय है। लाहौर में भी पुराने हिंदू-सिख नामों और नगर-स्मृतियों को पुनः दृश्य बनाने की चर्चाएँ सामने आई हैं । वहाँ यही तर्क काम कर रहा है कि शहर की संस्कृति उसकी बहुस्तरीय स्मृति में बसती है; उसे मिटाकर नया राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता। लाहौर को उसके पहले के सांस्कृतिक स्तरों सहित पढ़ने का आग्रह स्मृति-संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण काम है । यदि यह प्रवृत्ति सचमुच शहर को उसके बहुलतावादी अतीत से जोड़ने की है, तो उससे जाहिर होता है कि  इतिहास को सुधारने का अर्थ इतिहास को संक्षिप्त करना नहीं होता।

हम इस घटना में कोलकाता की स्मृतियों पर छाये संकट के अशनि संकेत देख रहे हैं । किसी शहर की सड़क का नाम बदलना आसान है पर उसकी स्मृति को बचाए रखना कठिन। और किसी भी जाति या समाज को उसके अतीत की बहुलता से काट देना, चाहे वह गौरवपूर्ण हो या त्रासद, केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, सांस्कृतिक विस्मरण का आरंभ कहलायेगा । 

कोलकाता ने पहले भी सड़कें बदली हैं। औपनिवेशिक नाम हटे, नए आए। यह नई बात नहीं। विद्वानों ने उस स्वेच्छाचार की भी निंदा की क्योंकि शहर केवल वर्तमान का निवास नहीं, अतीत का अभिलेख भी होता है। किसी समाज की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने नाम हटाए; बल्कि इस बात से कि वह अपने कठिन, विरोधाभासी और असुविधाजनक अतीत को कितनी जगह देता है। 

जो शहर अपने इतिहास को काटता है, वह अंततः अपने ही अनुभव को काटता है। और जो समाज अपने अतीत की बहुलता से डरता है, वह अंततः अपने भविष्य की संभावनाओं से भी डरने लगता है। स्मृति का संकुचन अंततः सत्य के संकुचन में बदल जाता है; और जहाँ सत्य को एकक घोषित कर दिया जाता है, वहाँ इतिहास धीरे-धीरे मिथक में बदलने लगता है। 




रविवार, 21 जून 2026

‘इतिहास फिर से खुल गया है’


(ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध और इस्लामाबाद एमओयू पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी




ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को केवल एक और पश्चिम एशियाई युद्ध कह कर नहीं छोड़ा जा सकता। यह युद्ध अपने सैन्य परिणामों से कहीं अधिक अपने प्रतीकात्मक परिणामों के कारण महत्वपूर्ण है। इसने उस अमेरिकी प्रभुत्व की संरचना की आंतरिक संगति को झकझोर दिया है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से स्वयं को विश्व-व्यवस्था की अंतिम गारंटी के रूप में प्रस्तुत करती आई है । 

28 फ़रवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हमलों की शुरुआत की। लक्ष्य था ईरान की सैन्य क्षमता, वायु-रक्षा, मिसाइल ढाँचे, परमाणु कार्यक्रम और नेतृत्व-संरचना को निर्णायक रूप से खत्म कर देना। आरंभिक हमले ही अत्यंत क्रूर और व्यापक थे। अमेरिका और इज़राइल की रणनीति साफ थी कि ईरान को ऐसा झटका दिया जाए कि वह न केवल सैनिक रूप से पंगु हो, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अस्थिर हो जाए। यह अमेरिका-इजरायल का मध्यपूर्व पर पूर्ण और प्रश्नातीत प्रभुत्व कायम करने का एक निर्णायक अभियान था । 

लेकिन युद्ध की असली कहानी तब शुरू हुई, जब ईरान ने जवाबी हमला किया। उसने इज़राइल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिकी सैनिक अड्डो की क्षेत्रीय संरचनाओं को अपना निशाना बनाया। युद्ध लेबनान, खाड़ी, होरमुज़ जलडमरूमध्य से लेकर मध्य पूर्व के तमाम ऊर्जा-केंद्रों तक फैल गया। ईरान के साथ ताल-मेल रखते हुए हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के मोर्चे पर भी इज़राइल को उत्तर की दिशा से बुरी तरह उलझाए रखा। सर्वोपरि, होरमुज़ के संकट ने दुनिया को बता दिया कि भू-राजनीति केवल वाशिंगटन या तेल अवीव की इच्छा से संचालित नहीं होती।   

जिसे अमेरिका अपनी अजेय शक्ति के प्रदर्शन और ईरान के खिलाफ निर्णायक दंडात्मक कार्रवाई मान रहा था, वही धीरे-धीरे उसके प्रभुत्व की सीमाओं को अनावृत करने लगा।

और, यहीं से युद्ध का चरित्र ही बदल गया।

अमेरिका अपनी जिस सैन्य शक्ति पर सबसे अधिक भरोसा करता था, वही शक्ति इस युद्ध में उसके लिए समुद्र की चोर बालू साबित होने लगी । उसका हमला भले ही कितना भी विनाशकारी क्यों न हो, निर्णायक नहीं साबित हुआ। वह न ईरान को मिटा सका, न उसे अलग-थलग ही कर सका। यहां तक की दूसरे क्षेत्रीय प्रतिरोधों को भी समाप्त नहीं कर सका। उल्टे, ऊर्जा-मार्गों पर से उसका नियंत्रण खत्म हो गया । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह दुनिया को यह विश्वास नहीं दिला सका कि उसके बिना विश्व-व्यवस्था असंभव है।

हम इसे लकानियन अर्थ में भू राजनीति का वह बिंदु कहेंगे जब इसमें बहु-ध्रुवीय जगत के ‘रीयल’ का प्रवेश होता है।

यह लकानियन ‘रीयल’ कोई बाहरी वस्तु की तरह नहीं होता। यह अंतर की वह असंभवता है जिसे प्रतीकात्मक व्यवस्था लगातार ढँकती रहती है। अमेरिकी प्रभुत्व का प्रतीकात्मक संसार इस गहरे विश्वास पर टिका था कि अमेरिका ही अंतिम निर्णायक शक्ति है; उसकी सैन्य उपस्थिति ही सुरक्षा है; उसके नियम ही अंतरराष्ट्रीय नियम हैं; उसका दंड ही न्याय है; और उसकी स्वीकृति ही वैधता है। ट्रंप हर वक्त अपनी श्रेष्ठता के बखान से इसी प्रतीकात्मक विश्वास को दोहराया करते हैं । 

पर ईरान ने इसी आत्म-संसार को उसके रीयल के सामने खड़ा कर दिया। उसने दिखाया कि कोई भी ‘बड़ा अन्य’ (big other) स्वयं में पूर्ण नहीं है। अमेरिका कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है और न इज़राइल अजेय है। प्रतिबंध अंतिम हथियार नहीं हैं। सैन्य शक्ति राजनीतिक सत्य की गारंटी नहीं है। इतिहास किसी एक केंद्र की ही पटकथा के अनुसार नहीं चलता है। 

हमारी नजर में, इस युद्ध का यही सबसे बड़ा निष्कर्ष है।

इस युद्ध में ईरान की जीत को केवल इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि उसने अमेरिका को किसी पारंपरिक युद्धक्षेत्र में हरा दिया। निस्संदेह, इस युद्ध के अंतिम मुकाम पर अमेरिका के पास कोई दूसरी कारगर सैन्य रणनीति नहीं बची थी । पर इससे भी बड़ी बात यह है कि उसने अमेरिकी महाशक्ति के भ्रम को तोड़ दिया। 

इस अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन और रूस की भूमिका इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाती है। वे इसमें केवल ईरान के समर्थक नहीं रहे; वे उस नई वैश्विक गणना के संकेतक के रूप में सामने आएं जिसमें अमेरिका अब विश्व का अकेला व्याख्याता नहीं रह गया है। 

हम जानते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि अब कोई नई आदर्श व्यवस्था स्थापित हो चुकी है, जैसा कि हमारे इस काल के प्रमुख युद्ध रणनीति के विशेषज्ञ प्रवीण साहनी लगातार कह रहे हैं । वे इससे एक ऐसी नई विश्व-व्यवस्था के उदय का दावा कर रहे हैं, जिसमें युद्ध नहीं, शांति और विकास ही दुनिया के देशों के बीच व्यवहार के अकेले कारक रह जायेंगे । 

हमें लगता है कि अभी ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं होगा । बल्कि यह फिर एक नए भ्रम में गिरने के समान भी हो सकता है। हम इसे कहीं ज्यादा व्यापक और यथार्थ रूप में देखते हुए संक्षेप में यही कहेंगे कि यह वह घटना है जब इतिहास का वह अध्याय, जिसे अमेरिका ने अपने प्रभुत्व के अंतर्गत बंद कर देने की कोशिश की थी, फिर से खुल गया है।

बाद्यू की भाषा में, घटना वही होती है जो किसी स्थापित संसार की गणना में दर्ज नहीं होती, लेकिन उसी संसार की पूर्णता को संदिग्ध बना देती है। ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध इसी अर्थ में एक घटना है । 

अमेरिका ने युद्ध शुरू किया था इस विश्वास से कि वह ईरान को निर्णायक रूप से झुका देगा। लेकिन उसे अंततः ‘इस्लामाबाद एमओयू’ की दिशा में जाना पड़ा। यह एमओयू केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है। 

इस एमओयू में सैन्य कार्रवाइयों की समाप्ति, 60 दिनों की वार्ता, होरमुज़ जलडमरूमध्य के खुलने, प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, संपत्तियों की मुक्ति और पुनर्निर्माण की संभावनाओं का उल्लेख केवल तकनीकी बातें नहीं हैं। ये युद्ध के पीछे के उस तर्क का प्रत्याख्यान है जो ईरान को केवल दंडित करने पर आधारित था। यहीं हमें ईरान आज के विश्व में एक ‘संभावित प्रमाता’ की स्थिति ग्रहण करता दिखाई देता है।

गौर करें कि हम ईरान को 'प्रमाता' नहीं, ‘संभावित प्रमाता’ कह रहे हैं । अगर सीधे 'प्रमाता'  कहते, तो यह देखना पड़ता कि ईरान ने इस युद्ध को किस हद तक अपनी नई पहचान का आधार बनाया है, कि उसके भीतर का राजनीतिक-सांस्कृतिक ताना-बाना इस घटना के अनुसार कितना पुनर्व्यवस्थित हुआ है, और वह इसके सत्य को दुनिया के सामने स्थायी रूप से पेश करने में कितना सक्षम है।

वह इस युद्ध के बाद 'प्रमाता' बनने की क्षमता (संभावना) रखता है, परंतु वह अभी वहां तक गया नहीं है। उसने ‘बड़े अन्य’ को खंडित किया है, लेकिन उस खंडन के बाद की विश्व-दृष्टि अभी उसके भीतर पूरी तरह संगठित नहीं हुई है। इस लिहाज से वह अभी इस 'घटना' के प्रति निष्ठा (Fidelity) की प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में है।

'संभावित प्रमाता' होने के नाते, ईरान अभी भी विजयी की तरह नहीं, उसी पुराने ढांचे (प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, पुनर्निर्माण) के भीतर बातचीत कर रहा है, हालाँकि अब उसकी बातचीत की स्थिति बहुत मजबूत है। यानी, उसने व्यवस्था को झकझोरा है, लेकिन नई विश्व-गणना का बोध अभी भी संभावनाओं के गर्भ में ही है।

प्रमाता कोई नैतिक नायक तो नहीं होता है लेकिन वह उस सत्य का वाहक जरूर होता है जो घटना से पैदा होता है। ईरान ने यह सत्य सामने रखा कि विश्व अब अमेरिकी सैन्य-संरचना की एकरेखीय गणना में नहीं समा रहा है; अमेरिकी प्रभुत्व की जकड़ अटूट नहीं है; उसमें दरार आ चुकी है।

और, यह दरार ही रीयल है। दुनिया अब पहले जैसी नहीं रह गई है। यह इस युद्ध का सत्य है।

इसीलिये, अमेरिका–इज़राइल धुरी का यह संकट हमारी नजर में, दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

इस पूरे प्रसंग को और भी गहराई से पूरे परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए हमें बीसवीं शताब्दी के अंत की दो अत्यंत प्रभावशाली घोषणाओं को याद करना चाहिए।




पहली थी फ्रांसिस फुकुयामा की “इतिहास का अंत और अंतिम मनुष्य” (The end of History and the Last Man) की घोषणा।

सोवियत संघ के विघटन के बाद फुकुयामा ने दावा किया था कि अब वैचारिक संघर्ष का युग समाप्त हो चुका है। उदार लोकतंत्र और पूँजीवादी विश्व-बाज़ार मानव राजनीतिक विकास के अंतिम रूप के रूप में सामने आ चुके हैं। युद्ध, संघर्ष और वैकल्पिक विश्व-दृष्टियाँ अब केवल अवशेष भर होंगी; इतिहास अपने अंतिम संगठन तक पहुँच चुका है।

यह घोषणा केवल राजनीतिक नहीं थी; यह पश्चिमी प्रभुत्व की दार्शनिक आत्म-घोषणा थी। उसमें अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं था; वह इतिहास के अंतिम रूप का संरक्षक बन गया था।

लेकिन इतिहास की विडंबना यही है कि वह अपने अंत की ऐसी  घोषणाओं को कभी स्वीकार नहीं सकता है । ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को भी इसकी पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास बंद नहीं हुआ था; उसे बंद मान लिया गया था। पर, इतिहास की वापसी किसी नए यूटोपिया के रूप में नहीं हुई है, बल्कि उस रीयल के रूप में हुई जिसे अंतिम घोषित व्यवस्था दबा नहीं सकी। 

बीसवीं सदी के अंत में की गई दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना थी सैमुअल हंटिंगटन (Samuel P. Huntington) की, वर्तमान विश्व में “सभ्यताओं का संघर्ष” की स्थापना।

फुकुयामा जहाँ संघर्ष के अंत की बात कर रहे थे, वहीं हंटिंगटन कह रहे थे कि संघर्ष जारी रहेगा, लेकिन उसका आधार विचारधारा नहीं, सभ्यता होगी। उनकी दृष्टि में पश्चिम और उसके संस्थान अंततः इस संघर्ष के केंद्रीय नियामक बने रहेंगे। 

ईरान हंटिंगटन की विश्व संबंधी इस रूपरेखा में लंबे समय से एक “सभ्यतामूलक अन्य”(civilizational Other) की तरह उपस्थित रहा, वह जो पश्चिम की सांस्कृतिक–राजनीतिक सार्वभौमिकता में वैसे ही पूरी तरह समाहित नहीं होता, जैसे, उनके अनुसार, इस्लामी, सिनिक (चीनी), ऑर्थोडॉक्स आदि सभ्यताएं भी नहीं होती । 

यहां यदि हम ‘अन्य’ के बारे में लकानियन धारणा का प्रयोग करें कि वह कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि वह स्थान है जिससे कोई व्यवस्था अपनी पहचान बनाती है, (मैं स्वयं को “मैं” तभी कहता हूँ जब कोई “अन्य” हो !), तो कहेंगे कि ईरान सभ्यता के बाहर नहीं था, वह उस बिंदु का नाम था जहाँ पश्चिम स्वयं को सार्वभौमिक सिद्ध करने में अटकने लगा, वह पश्चिम की सीमाओं को उजागर करने वाले बाह्य-आंतरिक बिंदु के रूप में मौजूद रहा। 

लेकिन इस युद्ध ने विचित्र रूप से सब उलटफेर कर दिया है। यदि इसे केवल सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में पढ़ा जाए, तो संभव है कि हम उसके कईं, अधिक निर्णायक पहलू को खो दें।

इसे एक दूसरी भाषा में, हम अपना अंतहीन विस्तार चाहने वाले जुएसॉंस (jouissance) की राजनीतिक प्रवृत्तियों और शांति और स्थिरता की homeostasis की राजनीति की प्रवृत्तियों के बीच के तनाव के रूप में भी देख सकते हैं । यहाँ jouissance का अर्थ वह जिद, विस्तार और ऐतिहासिक नियंता बनने की राजनीति है जो स्वयं को सार्वभौमिक बनाने की ओर प्रवृत्त होती है। इसके विपरीत homeostasis उस संतुलन, सीमांकन और अस्तित्वगत स्थिरता का नाम है, जो व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश करती है। 

इस अर्थ में संघर्ष केवल सांस्कृतिक पहचान का नहीं रह जाता; वह उस प्रश्न का रूप ले लेता है कि विश्व किस प्रकार की ऐतिहासिक ऊर्जा पर संगठित होगा। यह विभाजन न तो अपने में पूर्ण है और न ही नैतिक है। संभव है कि इसकी रूपरेखा में कुछ अधिक आदर्शवाद झलकता हो।

पर हम इसे बीसवीं शताब्दी की उस पुरानी प्रतिद्वंद्विता के एक नए रूप के रूप में देख सकते हैं जिसे कभी साम्राज्यवाद और समाजवाद के बीच के प्रमुख अन्तर्विरोध के रूप में विवेचित किया जाता था।

इसीलिये, अब प्रश्न यह नहीं है कि नई विश्व-व्यवस्था कितनी सुंदर होगी। प्रश्न यह है कि क्या इस दरार से नए प्रमाता पैदा होंगे। क्या गरीब और परिधीय देश इस खुले हुए इतिहास में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराएँगे। क्या वे केवल नए ध्रुवों के ग्राहक बनेंगे या स्वयं विश्व की पुनर्गणना में भाग लेंगे।

फुकुयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की थी। हंटिंगटन ने संघर्ष के स्थायी भूगोल की कल्पना की थी। इस युद्ध ने दोनों को एक साथ चुनौती दी है।

इतिहास समाप्त नहीं हुआ। सभ्यताओं की रेखाएँ भी अंतिम सिद्ध नहीं हुईं। विश्व फिर से एक खुले समुच्चय की तरह सामने आया है।

ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध का सबसे बड़ा निचोड़ यही नहीं कि किसने किसे हराया। उसका सबसे बड़ा निचोड़ यह है कि कोई भी शक्ति इतिहास को अंतिम रूप नहीं दे सकती। 

यहां रीयल ने इतिहास को कोई दिशा नहीं दी है, उसने केवल यह सिद्ध किया कि इतिहास अभी समाप्त नहीं हुआ था । 

इतिहास का अर्थ तभी बनता है जब वह बंद न हो। 

इतिहास फिर से खुल गया है।