(इस युद्ध के सत्य के उद्घाटक, घटनामूलक (evental) चरित्र पर एक टिप्पणी)
−अरुण माहेश्वरी
ईरान-अमेरिका युद्ध अब महज एक राजनीतिक या सैन्य घटना नहीं रह गई है । अमेरिका ने इस युद्ध का प्रारंभ किया पर इसका अंत अब उसके वश में नहीं रहा है । यह क्रमशः एक ऐसी वैश्विक चर्वणा का रूप ले चुका है जिसका परिणाम बिल्कुल अपरिमेय है । अभी तो अमेरिका अपने मृत सैनिकों की गिनती कर पा रहा है और इजरायल भी बर्बादियों के कुछ झूठे-सच्चे आँकड़े रख पा रहा है, पर इसमें आश्चर्य नहीं कि जल्द ही इन आँकड़ों की कोई अहमियत ही नहीं बचेगी । बमों और मिसाइलों के धमाकों के धूल-धुएं में जैसे सारी दुनिया ही ओझल होती दिखाई देगी । कल तक जो सच था, आज अचानक इतना बदल चुका होगा कि उसकी सूरत ही पहचान में नहीं आएगी ।
ट्रंप ने सत्ता पर आने के साथ ही ‘अमेरिका के हित’ के नाम पर दुनिया को अस्थिर करने की जो सुचिंतित मुहिम शुरू की थी, वह अब हमारी दृष्टि में ‘दुनिया के हित’ में अंगड़ाई लेते हुए विश्व-व्यवस्था के एक बिल्कुल नये आकार में उभरने के अविश्वसनीय आलोड़न का रूप लेती जा रही है । आज अमेरिका में ही यह चर्चा सरगर्म है कि एपस्टीन फाइल में फंसा डोनाल्ड ट्रंप न सिर्फ शारीरिक रूप में सड़ चुका है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी प्रति पल बद से बदतर होता जा रहा है । यह व्यक्ति ट्रंप का ही सच नहीं है, बल्कि काफी हद तक पूरी अमेरिकी सत्ता का, मध्यपूर्व और पूरे विश्व में फैले सैनिक अड्डों और उस पर आश्रित राजनीतिक सत्ताओं का भी सच है । इन अड्डों का और लंबे समय तक यूं ही बने रहना संभव नहीं लगता है क्योंकि इस युद्ध ने खाड़ी के देशों के सामने इनके होने की अहमियत के खोखलेपन को जाहिर कर दिया है ।
इसीलिए, हमारा मानना है कि ईरान तो महज एक बहाना है, वास्तविकता यह है कि जैसे अमेरिका-केंद्रित आज की दुनिया का अंतःस्थित सत्य ही अपने परम आत्म-संहारक रूप को प्रकट करने को मचल उठा है । वर्तमान का असहनीय यथार्थ अब विश्व के समूचे प्रतीकात्मक जगत को उलट-पुलट कर, भू-राजनीति की अब तक की पहचानी हुई सूरत को ध्वस्त कर, एक नये यथार्थ-प्रतीकात्मक-छविमूलक समग्र रूप को तैयार करने की दिशा में बढ़ रहा है । ईरान के नेतृत्व का आलम यह है कि उसने शहादत की अपनी मूलगामी परंपरा पर अपने अंत के साथ पूरे मध्यपूर्व के अन्यायपूर्ण स्वरूप के अंत की ठान ली है, जो वहां के शासन को पहले की तुलना में अंदर से कहीं ज्यादा मजबूत बना रहा है । ट्रंप-नेतन्याहू अब युद्ध विराम चाहते हैं और ईरान उसके लिए भारी शर्तों को रख कर इसे टालते हुए एक तार्किक अंत तक ले जाने पर आमादा है ।
इस घटना को यदि हम खास ईरान और इस्लामी इतिहास के संदर्भ में ही देखें तो लगेगा कि कर्बला के युद्ध में हुई शहादत ने आज उनके लिए एक नया रास्ता तैयार करना शुरू कर दिया है । कर्बला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इमाम हुसैन की युद्ध में जीत की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी। फिर भी उन्होंने संघर्ष चुना। यहीं से शहादत का वह दर्शन पैदा होता है जिसमें शहादत केवल मृत्यु नहीं, एक सत्य की सार्वजनिक घोषणा है। इस अर्थ में इमाम हुसैन ने एक प्रकार के नैतिक उद्घाटन (revelation) का काम किया था। शिया चिंतन में कर्बला को केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं माना जाता। इसे हमेशा मौजूद रहने वाली आज की घटना समझा जाता है। हुसैन की हार वास्तव में एक नैतिक विजय बन गई। शिया परंपरा में कर्बला केवल एक युद्ध नहीं है, बल्कि एक स्थायी नैतिक घटना है। “हर दिन आशूरा है, हर ज़मीन कर्बला है”— यह कथन इसी अर्थ को व्यक्त करता है।
इस प्रकार, इमाम हुसैन की शहादत ने इस्लामी चेतना में जो एक विशेष नैतिक संरचना पैदा की, उस संरचना में किसी अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने सत्य की गवाही, पराजय के बावजूद नैतिक विजय, स्मृति और शहादत के माध्यम से इतिहास के पुनर्लेखन को उसके मुख्य तत्त्व कहा जा सकता है ।
आज के आधुनिक दर्शन की भाषा में हम इसे सत्य के विस्फोट की तरह की ऐतिहासिक घटना की तरह भी देख सकते हैं । ऐलन बाद्यू ऐसी घटना को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं को इस प्रकार गिनाते हैं कि वह मौजूदा व्यवस्था से बाहर से आती है, स्थापित व्यवस्था के नियमों को चुनौती देती है और एक नई सत्य-विधि (Truth-process) की शुरुआत करती है । पुरानी व्यवस्था अपनी ही भाषा में स्वयं को समझाने में अक्षम नजर आने लगती है। वे फ्रांसीसी क्रांति, पेरिस कम्यून या कुछ महान कलात्मक आविष्कारों को भी ऐसी घटनाओं के उदाहरण बताते हैं। इसका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है सत्य-घटना के प्रति दीर्घकालिक निष्ठा और उसके अनुसार व्यवहारिक-संगठित प्रतिबद्धता। अर्थात्, घटना से उद्घाटित सत्य को जन-गण की व्यापक स्वीकृति और तदनुरूप सामाजिक रूपांतरण की एक लंबी प्रक्रिया का प्रारंभ । कर्बला इसीलिये एक घटना कहलायेगा क्योंकि उसने शिया समुदाय के रूप में एक नए सामूहिक प्रमाता (subject) को जन्म दिया ।
ईरान का आधुनिक इतिहास, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का इतिहास गवाह है कि वहां कर्बला की स्मृति को एक राजनीतिक रूप दिया गया। इसने वहां राजनीति को धर्म और नैतिकता के संघर्ष के रूप में देखने की नई परंपरा शुरू की, शहादत को प्रतिरोध की शक्ति बनाया और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को धार्मिक-ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ा । इसीलिये यह अकारण नहीं है कि आधुनिक ईरानी राजनीतिक भाषा में कर्बला का संदर्भ बार-बार आता है।
बहरहाल, आज के ईरान और अमेरिका-इजरायल की लड़ाई में कर्बला ही इस युद्ध के ईरानी नैरेटिव की संरचना में एक प्रमुख भूमिका अदा कर रहा है । इसी के चलते यह युद्ध केवल हथियारों से लड़ा जा रहा रणनीतिक संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि सत्य और शक्ति का टकराव का रूप लेता जा रहा है। बाद्यू के सत्य-विधि (truth-procedure) की प्रक्रिया में हमेशा नई राजनीतिक कल्पनाएँ जन्म लेती हैं, नए गठबंधन बनते हैं और पुराने शक्ति-संतुलन टूट जाते हैं । इतिहास में बार-बार देखा गया है कि बड़े युद्धों के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदल जाती है। प्रथम विश्व युद्ध से राष्ट्र संघ की उत्पत्ति हुई, द्वितीय विश्व युद्ध से संयुक्त राष्ट्र संघ बना । इसके अलावा समकालीन राजनीति में युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं होता, वह प्रतीकात्मक युद्ध भी होता है। नैरेटिव, स्मृति, धार्मिक प्रतीक − इन सबका प्रयोग राजनीतिक वैधता पाने के लिए भी किया जाता है। कर्बला का प्रतीक इसी कारण मध्य-पूर्व की राजनीति में अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक है।
यह सच है कि हर युद्ध को “सत्य की घटना” नहीं कहा जा सकता है । यह घटना (Event) केवल संघर्ष नहीं, बल्कि ऐसा क्षण होता है जो मानवता के लिए एक नए सार्वभौमिक सत्य का द्वार खोलता है। आज यह एक अनोखी बात है कि इस युद्ध के बीच से एक ‘शहादत-स्मृति से संचालित’ राज्य ईरान एक ऐसे प्रमाता के रूप में उभर कर सामने आया है जो दुनिया को एक नई विश्व-व्यवस्था के सत्य के उदय का साक्षात्कार कराता जान पड़ता है । अयातुल्ला अली खामनेई ने अमेरिकी साम्राज्यवाद-जियोनवादी इज़रायल के एपस्टीनपंथी, दुनिया के सबसे ताक़तवर अनैतिक गठबंधन को सीधी चुनौती दे कर ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी कि अब ईरान के नए सुप्रीम नेता मुज्तबा खामनेई युद्ध के अंत की ऐसी शर्तें पेश कर पा रहे हैं जो अभी की विश्व-व्यवस्था की सीमाओं से परे जाती है । वे सीधे मांग कर रहे हैं कि अमेरिका को पूरे मध्यपूर्व से अपने सैनिक अड्डों को समेट लेना होगा, ईरान की सार्वभौमिकता का सम्मान करना होगा, उस पर लगी सब पाबंदियों को खत्म करना होगा । अन्यथा, ईरान परमाणु बम को भी उतारेगा, नए वैश्विक सामरिक गठबंधन में शामिल होगा । इन शर्तों को मानने का अर्थ होगा विश्व शक्ति-संतुलन का पूरी तरह से उलट-पुलट जाना ।
इसीलिये हम यह देख पा रहे हैं कि अमेरिका ने युद्ध शुरू किया होगा, पर उसका ऐतिहासिक अर्थ अब उसके नियंत्रण में नहीं रहा । अब इसका अंत ईरान ही करेगा ।


