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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ : एक फालतू फिल्म

-अरुण माहेश्वरी


आजऐक्सिडेंटल प्राइममिनिस्टर फिल्म देखी किसी अभिनेता के काम पर उसकी विचारधारा के हावी हो जाने पर वह चरित्र को भूल कर अपनी विचाधारा से कैसे चालित होने लगता है और इसी उपक्रम में फिल्म के तमाम दृश्यों को बेढब बनाता जाता है, इसका इस फिल्म में एक क्लासिक उदाहरण है अनुपम खेर   

यह फिल्म एक ऐसे पेशेवर पत्रकार की लिखी हुई किताब पर आधारित है जो राजनीति में सत्ता की शक्ति को तो जानता है, लेकिन राजनीति के बाहर का व्यक्ति होने के कारण उस सत्ता की संरचना से पूरी तरह से अनभिज्ञ है सत्ता के बाहरी स्वरूप की चमक-दमक उसके लिये राजनीति के बारे में अज्ञता और अंधता का सबब बनी हुई है इसीलिये प्रधानमंत्री के इस मीडिया एडवाइजर को उनमें देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति की छवि के अलावा और कुछ नहीं दिखाई देता था और शायद उनके इसी मनोविज्ञान ने उन्हें ऐन 2014 के चुनाव के समय मोदी की सहायता के लिये उतार दिया वह मोदी की लफ्फाजी से प्रभावित था या कांग्रेस दल की आंतरिक राजनीतिक संरचना के प्रति अपनी अज्ञानता का शिकार कहना मुश्किल है, लेकिन वह मनमोहन सिंह का एक नादान दोस्त साबित हुआ इस नादानी में उसने उसी व्यक्ति के प्रति शत्रुता का काम किया जिसे वह अपनी नजर से न्याय दिलाना चाहता था  


यही वजह है कि मनमोहन सिंह के इस नादान शुभाकांक्षी की किताब ने मनमोहन सिंह का तो कुछ भला नहीं किया, 2014 में उनके दुश्मन मोदी की सेवा ज्यादा की उस किताब पर बनाई गई फिल्म भी प्रधानमंत्री पर बनी फिल्म के बजाय उनके मीडिया एडवाइजर पर बनी फिल्म में बदल गई और, जहां तक फिल्म में प्रधानमंत्री के चरित्र का सवाल है, अनुपम खेर ने संजय बारू की किताब की वास्तविक राजनीतिक भूमिका के मर्म को पकड़ कर अपनी चाल-ढाल और संवेदनशून्य भाव-भंगिमाओं से मनमोहन सिंह को मनुष्य के बजाय लगभग एक मवेशी का रूप दे दिया अनुपम खेर का दुर्भाग्य है कि मनमोहन सिंह आज भी राजनीति के परिदृश्य में उपस्थित एक जीता जागता चरित्र है इसीलिये वे मनमोहन सिंह की छवि को तो बिगाड़ पाने में सफल नहीं हुए, लेकिन एक अभिनेता के नाते उन्होंने खुद को दो कौड़ी का जरूर साबित कर दिया  

इस पूरी फिल्म को एक बुरी किताब पर आधारित बुरी स्क्रिप्ट और उसके केंद्रीय चरित्र के रूप में काम कर रहे अभिनेता के बुरे इरादों की दोहरी मार ने ऐसा चौपट किया कि यह एक बचकानी सी फिल्म बन कर रह गई अनुपम खेर ने मनमोहन सिंह को क्षति पहुंचाने के चक्कर में इस फिल्म की ही जान निकाल दी मनमोहन सिंह अपनी जगह अक्षुण्ण रह गये और मीडिया एडवाइजर संजय बारू का चरित्र अपनी नादानी में एक कमजोर कथा के जुनूनी सूत्रधार से अधिक और कुछ नजर नहीं आया इस फिल्म में आए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य नेताओं के चरित्र भी विशेष कुछ कहते नहीं दिखाई दिये  

वैसे, दिल्ली में आज की सरकार का जो जघन्य, षड़यंत्रकारी और अपराधी स्वरूप है, उसकी पृष्ठभूमि में मनमोहन सिंह और कांग्रेस दल की सरकार का इस फिल्म में दिखाया गया स्वरूप बहुत स्वच्छ, उजला और मुद्दों पर केंद्रित दिखाई देता है समय इसी प्रकार किसी भी पटकथा के अर्थों को निदेशक की मंशा के विरुद्ध जाकर बदल दिया करता है

कुल मिला कर इसे एक फालतू फिल्म कहना ही सही होगा संजय बारू की मौके का फायदा उठाने के लिये लिखी गई एक नासमझी भरी किताब का लगभग वैसा ही समय का लाभ उठाने मंशा से निर्मित एक बुरा फिल्मी प्रतिरूप  

-अरुण माहेश्वरी 


रविवार, 13 जनवरी 2019

रोज लिखी जा रही मोदी शासन के अंतिम अध्याय की यह रोचक कहानी


—अरुण माहेश्वरी


देखते-देखते भारतीय राजनीति का मोदी अध्याय अब लगभग अपने  समापन पर आ गया है । आरएसएस की तरह के एक फासिस्ट अतीतजीवी संगठन ने मोदी नामके जिस बौने हिटलर से भारत के जनतंत्र को अपसारित करने की चुनौती पेश की, वह 2019 के चुनाव के पहले ही अपने इस तानाशाह की कल्पित भव्य मूर्ति के हवा हो जाने से आज बदहवास हैं । चंद दिन पहले तक जो अपने को किसी अखंड पेशवाई राज की गद्दी पर विराजमान देख कर युगों-युगों तक मनुस्मृति-प्रदत्त प्रभुता के अधिकारों के अबाध भोग के सपने देख रहे थे, वे सहसा खुद को एक मृतयुग में प्रत्यावर्तित पाकर स्तब्ध है ।   

पूंजीवादी जनतंत्र एक वर्ग का अन्य वर्गों पर जितना भी अबाध और स्वेच्छाचारी शासन क्यों न हो, यह जीवन का कोई रूढ़िगत रूप कत्तई नहीं है । यह गोमाता की सेवा और गोबर-मूत के सेवन और मंदिर-मस्जिद के लिये मर-मिटने वाले जुनूनी वीरों तथा पुराण कथाओं में धूनी रमा कर आधुनिक विज्ञान को धत्ता बताने का शासन नहीं होता है । मार्क्स के शब्दों में यह अपने मूल अर्थ में “पूंजीवादी समाज में क्रांति का सामाजिक रूप मात्र होता है ।...(इसमें) स्वत: प्रवहमान तत्वों का निरंतर परिवर्तन और अंतर्विनिमय होता हैं,... अंतिम बात यह है कि इसमें भौतिक उत्पादन जिसे नई दुनिया को अपना बनाना होता है, की प्रचंड, युवावस्था जैसी गति ऐसी है कि उसे पुराने प्रेत-जगत का उन्मूलन करने का न तो समय है और न अवसर ।”



भारत में अभी हूबहू वही हो रहा है । संघी कठमुल्लों ने मोदी-योगी के जिस गोबर युग को जिंदा रखने की जिद पाल रखी है, गोगुंडों की असभ्यता और नागा साधुओं के कुंभ भले अपनी जगह होते रहे, हर रोज राम मंदिर की हुंकारें भले ही भरी जाती रहे — लेकिन देखते-देखते राहुल गांधी के रूप में नई दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के लिये एक युवा और आधुनिक नेता का देश की कमान संभालने के लिये अवतरण हो चुका है । मोदी-योगी-संघ के गोबर शासन के अंत की जमीन तैयार हो चुकी है ।


कल ही (10-11 जनवरी 2019) रामलीला मैदान में खत्म हुए भाजपा के दस हजार लोगों के जीवित भोज (हिंदू मान्यता में जिंदा रहते किया जाने वाला मृत्यु भोज) में खुद मोदी ने यह कह कर कि ‘ मोदी की आस में मत रहो कि वह आकर सब ठीक कर देगा’ – यह स्वीकार लिया कि मोदी अब महज एक खोटा सिक्का है । उन्होंने राहुल गांधी पर सौ झूठी तोहमतें लगाई और फिर यह सवाल दागा कि क्या आप ऐसा प्रधान सेवक चाहेंगे ? अर्थात्, कल तक राहुल की भौंडी नकल उतारने वाले मोदी ने अब खुद राहुल को पीएम पद का दावेदार घोषित कर दिया । कल जब वे कई मृतात्माओं का आह्वान करते हुए कह रहे थे कि यदि पटेल प्रधानमंत्री होते...यदि 2004 में अटल बिहारी फिर आ जाते ...तो भारत कुछ और होता, तब वे प्रकारांतर से ईश्वर से सिर्फ यह प्रार्थना करते लग रहे थे कि काश, 2019 में मैं फिर से जीत जाता ! 'टेलिग्राफ' अखबार ने सुर्खी लगाई — ‘ मोदी ने मोदी को पीएम बनाने की शपथ ली’।(Modi pledges to make Modi PM - Telegraph) पराजित मन का यह आर्तनाद सचमुच बहुत करुण था !

अब हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं हो रही है कि 2019 में मोदी का लौटना तार्किक असंभवता के स्तर तक , मसलन् एक वृत्ताकार चौकोर को पाने के स्तर तक चला गया है । मोदी की सीबीआई के रस्सी के सांप ने वास्तव में राजनीतिक हलकों में कोई नया भ्रम या डर पैदा नहीं किया, इतना जरूर किया कि इसने पूरे विपक्ष को इकट्ठा कर दिया ह और इस प्रकार इस रस्सी ने मोदी-शाह की सबूतों को समाप्त करने में महारथ प्राप्त जोड़ी के भविष्य को सचमुच बांध दिया । 2019 के चुनाव का जो समीकरण अब साफ दिखाई दे रहा है — मोदी+सीबीआई+ईडी+आईटी वनाम अन्य सभी राजनीतिक दल ( जिनमें मोदी के गुलाम बन चुके एनडीए में शामिल दल भी हैं )।


अभी मोदी उन्हें नीचे खींच रही भंवर से उबरने के लिये जिस प्रकार हाथ-पैर मार रहे हैं, उसमें डूबने से बचने के बजाय वे और तेजी से डूबने की दिशा में ही बढ़ रहे हैं । उनके ठस संघी दिमाग में भंवर के खत्म होने तक प्रयत्नहीन, हल्के रह कर टूटी नाव से चिपक कर ऊपर-ऊपर चक्कर काटते रहने का उपाय भी नहीं आता है । वे अभी भी सीबीआई, सीवीसी, ईडी, आईटी के डंडों से सबको देख लेने के करतबों में लगे हुए हैं और इसके कारण ही इनके नीचे धसने की गति भी तेज से तेजतर होती चली जा रही है ।

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पद पर बहाल करके उनके खिलाफ मोदी की तमाम फर्जी दलीलों को एक सिरे से खारिज कर दिया । लेकिन साथ ही सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नौकरशाहों की 'हुजूरियत' की मानसिकता का परिचय देते हुए मोदी को भी खुश करने का, प्रक्रिया और न्याय के बीच संतुलन का खेल भी खेला और आलोक वर्मा के भविष्य की डोर सेलेक्शन कमेटी को सौंप दी । अपने गहराते संकट का अवभास कर मोदी के लिये उचित था कि सुप्रीम कोर्ट की इस चपत से सबक लेते और शांत हो जाते । लेकिन चुनाव के डर से भी बड़ा डर उन्हें अपने भ्रष्टाचार के सबूतों का जो था ! उन्हें शाह की सबूतों को खत्म करने की ताकत पर अतिरिक्त भरोसा भी है । इधर मायावती-अखिलेश के बीच यूपी की 37-37 सीटों पर समझौते की खबर तेज हुई, सीबीआई ने यूपी के बालू माफिया की जांच की घोषणा कर दी और यह भी कह डाला कि इसमें अखिलेश को भी घसीटा जायेगा ! इससे पता चलता है कि मोदी-शाह अब भी किस नशे में हैं ?

इसी चक्कर में आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के मामले में खुद जो सरकार एक अभियुक्त थी, उसी ने सेलेक्शन कमेटी में न्याय का भार ले कर न्याय विवेक के न्यूनतम बुनियादी उसूलों का खुला मजाक उड़ाया । ऊपर से उनका साथ दे दिया चंद रोज बाद ही सेवा-निवृत्त होने वाले जज सीकरी ने ।


भारत में उच्च अधिकारियों की सेवा-निवृत्ति का समय उनके जीवन का सबसे कमजोर क्षण होता है । इसी समय वे अपने इहलोक के साथ ही परलोक को भी सुरक्षित करने के बारे में सबसे ज्यादा चिंतित रहते हैं । जैसे रंजन गोगई ने राफेल के मामले में सरकार की एक झूठी रिपोर्ट को आधार बना कर न्यायपालिका की न्यूनतम भूमिका अदा करने से पल्ला झाड़ लिया, बिल्कुल उसी तर्ज पर जस्टिस सीकरी सीवीसी की एक निराधार रिपोर्ट को आधार बना कर आलोक वर्मा को प्राकृतिक न्याय का अधिकार तक देने से मुकर गये और उन्होंने मोदी के रबड़ स्टांप की भूमिका निभाने तक में शर्म नहीं महसूस की । जिन जस्टिस ए के पटनायक से सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी की रिपोर्ट की जांच करवाई, वे तक कह रहे हैं कि आलोक वर्मा के साथ न्याय नहीं हुआ और सेलेक्शन कमेटी ने हड़बड़ी में, अर्थात् मोदी के दबाव में निर्णय लिया । इसी बात को सम्मानित पूर्व न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने भी साफ शब्दों में कहा है कि आलोक वर्मा को प्राकृतिक न्याय के अधिकार से वंचित किया गया है।

लेकिन 'विद्रोही' मुख्य न्यायाधीश, प्रेस कांफ्रेंस के जरिये जस्टिस दीपक मिश्रा को बींधने वाले रंजन गोगई की अदालत की कुल मिला कर अभी यह दशा है कि कहना पड़ता है —'शर्म इनको मगर नहीं आती' । रफाल मामले में सीएजी की काल्पनिक रिपोर्ट के हवाले से सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया गया । आलोक वर्मा मामले में सीवीसी की रिपोर्ट को गलत रूप में पेश करके जस्टिस सीकरी को भरमाया गया । आज हवा में यह सवाल बना हुआ है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट बार-बार इतना नादान क्यों साबित हो रहा है ?

बहरहाल, सीबीआई की साख की रक्षा जस्टिस सीकरी नहीं कर सके, दिल्ली के जस्टिस वजीरी ने दस हफ्ते में सीबीआई के चरम भ्रष्ट और मोदी के 'शूटर' आर के अस्थाना पर लगे आरोपों की जांच को पूरा करने का आदेश देकर वह काम किया है । उन्होंने अस्थाना की अपने खिलाफ प्राथमिकी को रद्द करने की मांग को ठुकराते हुए यह भी कहा है कि अस्थाना को अप्रमाणित अपराध का लाभ नहीं दिया जा सकता है । सिलेक्शन कमेटी ने सीवीसी की जिस रिपोर्ट को आधार बना कर आलोक वर्मा को हटाया, उसी रिपोर्ट के सारे तर्कों को दिल्ली हाई कोर्ट ने आर के अस्थाना मामले में पूरी तरह से निराधार बता दिया ;  मोदी और जस्टिस सीकरी के मुंह पर कालिख पोत दी । एक काबिल और ईमानदार पुलिस अधिकारी आलोक वर्मा के अपमान और उनके साथ अन्याय में सुप्रीम कोर्ट सरकार के साथ समान रूप से भागीदार बना । ऊपर से आलोक वर्मा ने केंद्र सरकार की नौकरी से ही इस्तीफा देकर नरेन्द्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट, दोनों को करारी चपत मारी है । दुखजनक बात यह रही कि फिर एक बार यह सामने आया कि सीबीआई की नियति है तोता बने रहना ।



आज चुनावी संकट के भंवर में फंस चुके मोदी के लिये चुनावी रणनीति के लिहाज से निर्धनों के लिये उनका आनन-फानन में लाया गया आरक्षण विधेयक एक और आत्म-हंता कदम साबित होगा। दरअसल, निर्धनों को 10 % आरक्षण का यह झुनझुना आम लोगों के लिये नहीं, इस चुनावी मौसम के तनावों से बचने के लिये मोदी ने जैसे सिर्फ खुद के खेलने के लिये तैयार किया है । जो लोग भी इस आरक्षण के शिगूफे पर हांक रहे हैं कि इसका 2019 के चुनाव पर भारी असर पड़ेगा, वे पेशेवर गपोड़ी हैं । वे सचमुच जनता को महामूर्ख समझते हैं ।

भारत के 95 प्रतिशत परिवारों की सालाना आमदनी 8 लाख रुपये से कम है। इसके अलावा घर के क्षेत्रफल के मामले में भी 90 प्रतिशत परिवारों के पास आरक्षण विधेयक में निर्धारित सीमा से छोटे घर हैं । तब सवाल रह जाता है कि निर्धन कौन नहीं ? आरक्षण का मतलब क्या है जब सिर्फ 5 प्रतिशत परिवारों को ही इसके बाहर रखा गया है । यह है मोदी के काम करने का खास तरीका । मोदी सचमुच सरकारी संसाधनों की बर्बादी के अलावा कोई काम नहीं जानते हैं ! उनके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ प्रचार के फितूर के अलावा कुछ नहीं होता है । वे जानते हैं कि जब लगभग पूरी आबादी ही इस आरक्षण विधेयक के दायरे में आ जायेगी तो वास्तव में वह किसी के लिये भी उपयोगी नहीं रह जायेगा । उल्टे इससे सरकार का देश भर के लोगों को ‘निर्धन’ होने का एक नया प्रमाण पत्र देने का फिजूल का भारी काम जरूर बढ जायेगा । झूठ के ऐसे खेलों में केवल मोदी का ही मन रम सकता है ।

कुल मिला कर इस विधेयक के बाद भारत सचमुच ‘निर्धन नागरिकों’ का देश कहलाने का हकदार हो जायेगा । कहां ये चले थे इस देश को समृद्ध और विश्वगुरू बनाने के लिये, और जाते-जाते इसे ‘निर्धनों का देश घोषित’ कर रहे हैं ! भारत आगे ‘निर्धनों का देश’ कहलायेगा ! जहां तक इसके चुनावी प्रभाव का सवाल है, इसने सामाजिक स्तर पर सभी अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ों के बीच मोदी और आरएसएस को पूरी तरह नंगा कर दिया है और आम लोगों के बीच मोदी के मिथ्याचार के बारे में कोई संदेह नहीं छोड़ा ।

चन्द्रबाबू नायडू के शब्दों में - प्रधानमंत्री मोदी एक खोखला व्यक्ति है जिसने भारत के लिये कुछ भी नहीं किया है । वह एक ब्लैकमेलर है जो हर किसी को डरा-धमका कर उससे अपनी बात मनवाना चाहता है ।

आज आलम यह है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हाल के चुनावों में भाजपा के मतों में क्रमश: 12, 16 और 16 प्रतिशत की गिरावट हुई । इधर के सारे उपचुनाव बताते है कि यूपी में भी उसके मतों में 12 प्रतिशत से अधिक की गिरावट होगी । अर्थात् भाजपा को किसी हाल में 30 प्रतिशत से ज्यादा मत नहीं मिलेंगे । ऊपर से सपा और बसपा का गठबंधन हो गया है । उन दोनों के कुल मिला कर चालीस प्रतिशत वोट पक्के हैं । मोदी की साख तेजी से गिर रही है, जो आगे भी जारी रहेगी । इसी अनुपात में यह भी सच है कि राहुल गांधी और कांग्रेस की साख बढ़ रही है । यूपी में भाजपा के मतों में गिरावट का पूरा लाभ कांग्रेस को मिलेगा । इसीलिये कई सीटों पर भाजपा तीसरे नंबर पर रहेगी । अर्थात्, यूपी में भाजपा को एक सीट का भी लाला पड़ सकता है ।

इसके बाद शायद 2019 के चुनाव में भाजपा की दशा के बारे में कहने के लिये कुछ शेष नहीं रह जाता है । आज सच यह है कि मोदी का मतलब है - नोटबंदी, जीएसटी, राफेल,चरम बेरोजगारी, बेहाल किसान, फटेहाल मजदूर, औद्योगिक अवनति, सीबीआई, मिथ्याचार, और विजय माल्या-नीरव मोदी । प्रैस से मुंह चुराने वाला पीएम ; इतिहास का सबसे बुरा और झूठा शासन ।

रफाल मामले पर मोदी के मुंह से एक शब्द नहीं निकलता । एचएएल को वंचित करके अंबानी को तीस हजार करोड़ देने पर पर्दा डालने के  लिये निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में कहा कि भारत सरकार ने एचएएल को एक लाख करोड़ रुपये के आर्डर पाइपलाइन में हैं । दूसरी ओर एचएएल के अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि उन्हें एक रुपये का भी आर्डर नहीं मिला है । हमारा कहना है कि 2019 की पाइपलाइन में तो मोदी जी का प्रस्थान भी है, तो क्या रक्षा मंत्री के तर्क पर अभी से उन्हें प्रधानमंत्री पद से बाहर मान लिया जाए ? निर्मला जी की यह अनोखी सुक्ति देखियें — बोफोर्स में कमीशनखोरी कांग्रेस को ले डूबी थी और राफेल में डकैती मोदी की डूबती नौका को बचायेगी ! ओफ ! लूट के धन की ताकत पर इतना विश्वास ! निर्मला सीतारमण ने अपने सम्मान को प्रधानमंत्री के समकक्ष रख कर भले ही सोचा हो कि उन्होंने अपने कद को बढ़ा लिया । लेकिन उनमें जरा भी यथार्थ बोध होता तो वे शायद अपना इतना पतन नहीं स्वीकारती !




राहुल ने इस विषय पर मुंह छिपा रही सरकार की परीक्षा के लिये उसे सिर्फ दो सवाल पेश किये  - 1. अनिल अंबानी को डसॉं से किसने ठेका दिलाया ? 2. क्या रक्षा मंत्रालय ने मोदी के किये सौदे पर आपत्ति की थी ?  किसी में हिम्मत नहीं कि वे इन सवालों का जवाब दें ।

जिस समय, देश-विदेश के हर कोने में एक ही नारा गूंज रहा है कि 'चौकीदार चोर है', उस समय भाजपा के कार्यकर्ताओं को मोदी कह रहे है कि उन पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है । मनोचिकित्सकों की दुनिया की एक प्रचलित सुक्ति है - ‘हम इस दुनिया से एक भिन्न चीज पर विचार करते हैं।” नरेन्द्र मोदी पर सोचते समय यह सुक्ति बहुत याद आती है !

और वे नेता और कार्यकर्ता भी कैसे हैं जो यह सब देख सुन कर भी काठ के उल्लू की तरह चुपचाप बैठे हुए हैं । वे जानते हैं, सिराजा बिखर चुका है । अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत । उपन्यासकार पंकज मिश्रा ने मोदी शासन के उदय को भारत के आधुनिक इतिहास के एक राग की निरंतरता में बटवारे के अधूरे काम की परिणति कहा था । हम कहेंगे — यह आधुनिक भारत के राग के बीच की एक ऐसी झंकार है जो किसी भी वजह से सितार के तार के टूटने से राग की मूर्च्छना में पड़े विघ्न से पैदा हुई है और अब इसके तारों को बांध कर फिर इस राग के मूल स्वरों की वापसी होने वाली है ।

जनता के बीच से अब फिर एक बार यह आवाज उठ गई है — सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।