बुधवार, 10 अगस्त 2022

बिहार में फासीवाद के विकल्प का संकेत

 

—अरुण माहेश्वरी



आजादी की 75वीं सालगिरह का सप्ताह और 9 अगस्त, अर्थात् अगस्त क्रांति का दिन । ‘भारत छोड़ो’ का नारा तो गांधीजी ने दिया था, पर बिहार की धरती पर इस आंदोलन को एक ऐतिहासिक क्रांति का रूप दिया था कांग्रेस सोशिलिस्ट पार्टी के नेता जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया ने । उसी बिहार में इस बार 9 अगस्त के दिन ही जो घटा है, आज के भारत की राजनीतिक परिस्थिति में इसका इसका कितना भारी महत्व है, इसे बहुत सहज ही समझा जा सकता है । 

अभी पंद्रह दिन पहले ही ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रताप भानु मेहता ने एक लेख में कहा था कि भारत में विपक्ष की नगण्यता (littleness) भाजपा को विशाल (big) बना देती है । अब नीतीश कुमार के फैसले के बारे में ‘टेलिग्राफ’ की खबर की एक सुर्खी है, — ‘भाजपा का दायरा सिकुड़ गया है, विपक्ष खिल उठा है’ । 

सचमुच राजनीति में असंभव शब्द का कोई स्थान नहीं होता है । जैसे आदमी की फितरत है कि वह चीजों को बार-बार बनाने, बिगाड़ने के जरिये ही उन पर अपना अधिकार कायम करता है । वैसे ही राजनीति संभावनाओं का खेल है, जिसमें विकल्पों की तलाश की प्रक्रिया में अनोखे ढंग से उपस्थित विकल्पों के साथ ही अनुपस्थित, अर्थात् न दिखाई देने वाले विकल्पों की भी भूमिका होती है । राजनीति में विचारों का अंत नहीं, हमेशा समय के साथ एक प्रवाह होता है, अर्थात् लंबे अंतरालों के बाद भी विचारधाराएं नए रूप में, नई भूमिका के साथ सामने आती हैं । विचार आवर्त्तित होते हैं, पर निश्चित तौर पर नए रूप में । इस प्रवाह के कारण ही अनिवार्य तौर पर नया रूप पुराने से अलग होता है । राजनीति का सत्य यही है कि इसमें कभी भी कोई चीज खुद को हूबहू नहीं दोहरा सकती है । 

बिहार की सन् ’42 की प्रबल समाजवादी धारा लगभग पचास साल के अंतराल के बाद मंडलवाद के रूप में आवर्त्तित हुई थी । उसे ही अब फिर लगभग अढ़ाई दशक के बाद के तमाम घात-प्रतिघातों के उपरांत आज के भारत में जनतंत्र और संघीय ढांचे की रक्षा की लड़ाई के रूप में उतने ही प्रबल रूप में उभरते हुए देखना किसी को भी अतिरंजना लग सकता है । पर सच्चाई यह है कि विकल्पहीन मान लिये जा रहे राजनीतिक विश्वासों के इस काल में विकल्प के किसी भी संकेत को चमत्कारी, और इसीलिए अविश्वसनीय मानना ही स्वाभाविक है । आज के 'विपक्ष की तुच्छता' के समय में, बिहार में नीतीश की सरकार 242 सदस्यों की विधान सभा में भाजपा के 77 सदस्यों के मुकाबले 164 सदस्यों के साथ एक प्रतिरोध के ऐसे मजबूत गढ़ के रूप में सामने आना, जिसे न मोदी के पास मौजूद अनाप-शनाप धन की ताकत और न अमित शाह की ईडी की करतूतें ही डिगा सकती है, कैसे कोई इस पर यकीन कर सकता है ! 

अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता था जब पटना में भारी अहंकार के साथ बीजेपी के अध्यक्ष नड्डा ने भारत में सभी क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को खत्म करके देश में जनतंत्र और संघीय ढांचे के सामने एक नग्न चुनौती पेश की थी । हमारी राजनीति ने उनका उत्तर खोज निकालने में जैसे जरा भी देर नहीं की । ऐसा लगता है जैसे नड्डा के झटके ने अपने-अपने आहत अहम् से विक्षिप्त कटे हुए समाजवादियों को एक झटके में उनके अस्तित्व के यथार्थ से जोड़ दिया । जो यह राजनीति और विचारधारा के संबंध को नहीं समझते, वे कभी इस घटना को भी नहीं समझ सकते हैं । राजनीतिक दलों का अस्तित्व मूलतः विचारधाराओं पर आधारित होता है । राजनीति को शुद्ध व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने की अवसरवादी कला मानने वाले इसे कभी नहीं समझ सकते हैं । वे समाजवादी-मंडलवादी राजनीति के इस आवर्त्तन के पीछे काम कर रही आज की राजनीतिक जरूरतों को नजरंदाज करते हैं । वे ही आज अतीत के अनुभवों के हवाले से नीतीश, राजद और कांग्रेस के गठबंधन को क्षणभंगुर बताते हैं । 

बिहार के इस घटनाक्रम ने न सिर्फ विपक्ष की ‘नगण्यता’ की स्थिति को ही खत्म किया है, बल्कि 2024 के आम चुनाव में सांप्रदायिक फासीवाद की पराजय की संभावना की एक नई जमीन तैयार कर दी है । इसने कांग्रेस, वाम और समाजवादियों के साथ ही किसान-मजदूर आंदोलन की उस धुरी का साफ संकेत दिया है, जो मोदी की हिटलरशाही को परास्त करने में हर लिहाज से सक्षम होगी ।

जो भी बिहार के राजनीतिक यथार्थ से परिचित हैं, वे जानते हैं कि बिहार में नीतीश को वामपंथियों के समर्थन का क्या मायने है । यह अंबेडकरवाद के साथ जैविक संपर्क की तलाश में लगे वामपंथ के लिए एक ऐसी नई भूमिका की जमीन तैयार करता है जिसमें वह फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में सामाजिक जनवादियों की पुरानी अवसरवादी भूमिका से उत्पन्न पूर्वाग्रहों की आत्म-बाधा से मुक्त हो सकता है ।  

भाजपा आज बिहार में तो सबसे कटी हुई एक अकेली पार्टी है ही, पूरे उत्तर भारत में उसके पास कहीं भी कोई सहयोगी दल नहीं बचा है । आने वाले दिनों में इसका अलगाव और बढ़ेगा, बिहार में नीतीश के कदम से यह उम्मीद पैदा हुई है ।         


शनिवार, 30 जुलाई 2022

पुरस्कारों के लिये सर्वथा निरापद एक सरियलिस्ट उपन्यास : ‘रेत समाधि’

( प्रेमचंद जयंती पर एक कथा-विमर्श )

—अरुण माहेश्वरी


आज कथा सम्राट प्रेमचंद की 143वीं जयंती का दिन है । सम्राट, अर्थात् हेगेलियन अवधारणा के अनुसार कथा जगत का ईश्वर । मनोविश्लेषण की भाषा में इस जगत की प्राणीसत्ता जिसके आत्म-विस्तार का ही प्रकृत रूप है आज का हिंदी का कथा जगत । 

फेसबुक पर अभी प्रेमचंद की परंपरा को लेकर एक फिजूल सी चर्चा के सिलसिले में एक मित्र ने प्रेमचंद को कहानी का मानक बताये जाने पर प्रश्न करते हुए यह मासूम सा सवाल उठाया था कि ‘मानक’ क्या चीज होती है ? उस पर हमने लिखा : ‘मानक वह बिंदु होता है जिससे धरती पर हम अपनी जगह को मापते हैं । अगर वह न हो तो हर कोई स्वयं-केंद्रित, खुद से उत्पन्न और खुद में ही समाप्त होंगे । प्रेमचंद से ही हिंदी के आधुनिक कथा-साहित्य का वास्तविक इतिहास शुरू होता है, उसका अपना एक जगत बनता है ।’

इसी साल पहली बार हिंदी के एक उपन्यास, गीतांजलि श्री के ‘रेत समाधि’ को दुनिया का प्रतिष्ठित बूकर पुरस्कार मिला है । दक्षिणपंथ के भारी शोर के इस काल में भी गीतांजलि श्री के उपन्यास पर सबसे अधिक शोर उन लोगों ने ही मचाया, जो कहानी में प्रेमचंद की परंपरा के पक्के हिमायती हैं । अर्थात् हिंदी कहानी में जो भी उल्लेखयोग्य है, वह अब भी प्रगतिशीलों के दायरे के बाहर नहीं है । यही है प्रेमचंद और हिंदी कहानी की प्राणीसत्ता की बात का तात्पर्य । गीतांजलि श्री के उपन्यास को यह संस्पर्श इसीलिए तात्पर्यपूर्ण है ।     

जहां तक ‘रेत समाधि’ का सवाल है, हम नहीं जानते कि वे कौन लोग हैं जिन्होंने बड़े चाव से, जिसे कहते हैं रस लेकर, डूब कर इस उपन्यास को पढ़ा होगा ! यह उपन्यास चाव से पढ़ने या डूबने के लिए लिखा ही नहीं गया है । इसका वह विन्यास ही नहीं है । यह प्रेमचंद के शिल्प की तरह कथ्य से स्वतः निर्मित किसी प्रमाता (subject) का एक पूर्ण विन्यास नहीं है ।  इसके विन्यास का अपना एक अलग सचेत लक्ष्य है । यह उपन्यास के एक कल्पित चौखटे में प्रमाता के बिखरे हुए अलग-अलग अंगों के जैविक बोध के आख्यानों का समुच्चय है ।

किसी भी कथा में रस आता है प्रमाता (subject) के रूप में उसकी एक पूर्ण बोधगम्यता और अर्थवत्ता से, और प्रमाता में अर्थ की सृष्टि होती है उसके बाहर के संकेतकों से उसके संपर्क से । इसके विपरीत प्रमाता की अपनी शुद्ध प्राणीसत्ता का विषय मूलतः उसके अपने अंतर के जैविक बोध से जुड़ा होता है, जिसमें पूर्ण शरीर के बजाय उसके असंबद्ध अंगों का अवबोध होता है । इसमें होना हमेशा न होते हुए होना होता है । न अंतर की, न बाह्य की — किसी पूर्णता का यहां कोई अर्थ नहीं होता । मसलन्, मां हो या बेटी, दोनों पहचान के स्तर पर बस स्त्री हैं । यह स्त्री होने का एक जैविक बोध है । जाहिर है कि स्त्री मात्र होने में अनिवार्य तौर पर उनके होने के उस अर्थ की निश्चित क्षति होती है, जो ‘अन्य’ के क्षेत्र के संकेतक से संपर्क के जरिए बनने वाली कहानी के वितान से पैदा होता है, उनके मां अथवा बेटी अथवा बहन होने से पैदा होता है । 

मसलन्, लेखिका के शब्दों में : 

कहानी — अर्थात् जिसमें सरहद है, सरहद के आरम्पार है, औरत और सरहद के मेल से वह अपने आप चलती है, वह सुगबुगी है, उड़ती भी है, हवा की दिशा में, डूबते सूरज में भी, आगे जाती है, दाये बाये जाती है, घुमावती, बेहोश सी बढ़ती हुई, किस्से सुनाती सबके, ज्वालामुखी से निकलती, खामोशी से उभरती, भाप और अंगारों और धुए से फूटती स्मृतियों के किस्से समेटती ।

औरत — यानी, पहले की और आज की भी। उसकी ख्वाहिशें भी ।

मौत — महज एक सरहद को लांघने वाली ।

दीवार — एक और सरहद । 

शब्द — जो ध्वनि में अपने मतलब को झुला देते हैं ।  

ध्वनि — शब्द का मतलब झुठलाने वाली । 

दरवाजा — अपने अस्तित्व के भूत, वर्तमान और भविषय के अंगों में बिखरा हुआ ।

बेटी — जो हवा से बनती है । जिसकी साँस बालों पे आ गिरी नर्म पंखुड़ी थी, समुंदर में दहाड़ती चट्टान सी मारती है ।...हवा चलती है, जैसे रूह भरती, सारे में लहराती, करवट बदलती तो चुड़ैल हो जाती, उस पर टूट गिरती ।…सब औरतें, मत भूलना, बेटियाँ हैं ।    

बहन — धींगाधींगी की प्रयोगशाला में कैद कीड़ा ।

बचपन — जब आसमान से जमीन अलग नजर नहीं आती थी । “अंडा फूटा...हिल...भाग...फिर हवा चलने लगी और बदल डालने लगी ।” (यद्यपि आदमी का बच्चा ‘अंडा’ फोड़ कर निकलने के साथ स्वतः भाग नहीं पाता है ।)

मोहब्बत — सेहत के माफिक नहीं । या तो वो निस्वार्थ है और तुम अपनी साँसे दूसरे को दे दोगी या वो खुदपसन्द है और तुम दूसरे की साँसें हड़प लोगी । इक खिला खिला इक मिटा मिटा । 

माँ — सबका दुख हरने वाली महासतायी देवी । बेटे पर आश्रित ।

बेटी — बाप पर आश्रित जो उसकी अंगूठी का पुखराज है । (हवा से बनी) “बच्ची की जवानी और जिन्दगी हवा में चकचूर हुए।”

जिन्दगी — एक पगदण्डी – हाईवे को जाती हुई ।

चिल्लाना — एक परंपरा । प्रभुत्व की कहानी । 

दयालुता — घर में मकसद, भाईचारे, प्रेम और सुख-शान्ति का जरिया । 

इस प्रकार “चीटी, हाथी, दया, दरवाजा, माँ, छड़ी, गठरी, बड़े ये सब किरदार है ।”

आदि, आदि ...।

यह एक पूरा अध्याय ही देख लीजिए : 

“शब्द की एक पौध । अपनी उसकी लहराहट । उसमें लुकी मुरादें । मरतों के ‘नहीं’ के अपने राज । ‘नहीं’ के अपने ख्वाब।

“इस तरह । कि एक पेड़ खड़ा जड़ा । पर थक तो रहा है उन्हीं उन्हीं चेहरों के साये में घिरने से, उन्हीं खुशबुओं के पत्तों से लिपटने पे, उन्हीं ध्वनियों की डालियों पे चहचह से । होते होते हो गया पेड़ की साँसस उखड़ती से और उसकी बुदबुद में ‘नहीं नहीं।

“मगर हवा है और बारिशश और ‘नहीं’ की फूँक उन में उड़ जो पड़ी है और एक कतरन का आकार भी पा गयी है । जो फरफर फहराती है, फिर फड़ फड़ फड़फड़ाती है और डाली पर मन्नत का फीता बना के उसे, हवा और बरसात मिलकर बाँध देते हैं । हर बार एक गाँठ और लगा देते हैं । एक और गाँठ । एक नई गाँठ । एक नई चाह । नई । नयी । हो जाना । ‘नहीं’ की नयी झंकार । फरफर फड़फड फड़क फड़क । 

“तो पेड़ वही । सामने जो नजर में है । उसके तने पर और नीची झुकी डारियों पर धुएँ सी घूँघर ‘नहीं नहीं नहीं’, ऊपर लहराती उलझते ‘नहीं नहीं नई’ और फिर डालियाँ और फुनगियाँ जो हाथ है और उँगलियाँ, आसमान में चाँद को लपकती, ‘नई नयी’ ।

“या छत से । लपकती खिसकती । या दीवार से ।

“जिसमें एक छिद्र मिल गया है, या बन गया है, जहाँ से नन्हा सा जीव, एक कतरा साँस की तरह, बाहर को सरकता । फूँक दर फूँक दीवार गिराता ।” (पृष्ठ – 14) 


इन सारे ब्यौरों में अन्य के क्षेत्र के संकेतक के संस्पर्श से निर्मित होने वाली एक ‘भ्रामक’ पूर्णता का बोध नहीं, अलग-अलग अंग-प्रत्यंगों की प्राणीसत्तामूलक पूर्णता के कटे-फटे समुच्चय का बोध होगा । सरियलिस्ट कला का यही मूल दर्शन है । सल्वाडोर डाली के चित्रों को देख लीजिए, कला के इस स्वरूप की ठोस सूरत नजर आ जाएगी ।   

 ऐसे किसी भी कथानक में, जिसमें अधिक से अधिक बल प्रमाता की शुद्ध प्राणीसत्ता की ओर प्रेरित होता है, उसकी दिशा उसे संकेतकों से काटने, अर्थात् मूलतः उसके होने के अर्थ को सीमित करने की होती है । साफ शब्दों में कहें तो इसे एक प्रकार से प्रमाता के उस अर्थ के विरेचन की प्रक्रिया भी कहा जा सकता है, जिसे शास्त्रों की भाषा में माया कहा जाता है, जीवन के भ्रमों के इंद्रजाल को छांटने की प्रक्रिया । पर, कहानी की प्रकृति की विडंबना यह है कि यह इंद्रजाल ही जगत की उस बोधगम्य कथा को बुनता है, जिसका प्रमाता की प्राणीसत्ता के साथ ही उससे भिन्न कुछ और अर्थ भी हुआ करता है !

हम जानते हैं कि प्रमाता की प्राणीसत्ता के साथ संकेतक का संस्पर्श एक ओर जहां अवचेतन के उदय से मनुष्य में एक पूर्णता का बोध पैदा करता है, वहीं उसे उसकी जैविक प्राणीसत्ता से हमेशा के लिए काट भी देता है । स्त्री से उसके स्त्रीत्व के बोध का हरण करता है । प्रमाता की इस विच्छिन्नता को उसके बोधिसत्व के स्थायी अंत की वह आदिम परिघटना कहा जा सकता है जिसे, फ्रायडियन आवर्त्तन के सिद्धांत के आधार पर, फिर से प्राप्त करने के लिए ही उम्र के अंतिम वक्त तक मनुष्य तमाम प्रकार के आध्यात्मिक उपक्रमों में लगा रहता है । प्रमाता की जैविक प्राणीसत्ता की ओर प्रेरित होने की हर कोशिश इसी श्रेणी में पड़ती है । यह कला को एक आध्यात्मिक क्रिया मानने वाली खास अभिव्यंजनावादी शैली कहलाती है जिसमें किसी भी प्रकार के बाह्य उद्देश्य का कोई प्रयोजन नहीं दिखाई पड़ता है । जैविक अवबोध, जिसे अंतःप्रज्ञा का क्षण भी कहा जा सकता है, में सिर्फ संवेदना और आनंद की सहजानुभूतियां ही मूर्त हुआ करती हैं ।          

मनोविश्लेषक जॉक लकान ने अपने Ecrits में प्रमाता के बारे में लिखा था कि वह सर्वप्रथम जब mirror stage में अर्थ के बाहरी संदर्भ,  अपनी चाक्षुस छवि के प्रति सचेत होता है, जो उसमें एक पूर्णता का बोध पैदा करता है,  तभी इस पूर्णता के साथ ही उसमें अलगाव का एक अहसास भी पैदा होता है,  अपनी जैविक प्राणीसत्ता से अलगाव का अहसास । प्रमाता दर्पण की भ्रामक छवि में ही अपनी एकजुट प्राणीसत्ता को देखता है, पर बोध के स्तर पर वह हमेशा के लिए अपनी आंतरिक जैविक अनुभूति को गंवा देता है ।      

 ऐसे में जाहिर है कि जब जैविक प्राणीसत्ता के बोध को पाने के लिए  किसी भी आख्यान में व्यापक अर्थ की तलाश कर रहे प्रमाता की बोधगम्य उपस्थिति को ही खत्म करने की कोशिश होती है, तो इसका एक अनिवार्य असर होता है कि वह प्रमाता के लिए ही असहनीय हो जाती है । इन तनावों से निर्मित पाठों में कुछ अलग प्रकार का खिंचाव जरूर पैदा होता है और यही वजह है कि व्यापक सामाजिक अर्थ के बजाय लेखन में प्राणीसत्ता के चयन के आग्रह का भी अपना एक महत्व होता है । कविता के विन्यास की तो मूल जमीन यही है । साहित्य में यथार्थवाद और भाववाद के बीच के सूक्ष्म फर्क की भी जमीन है । पर इस हल्की सी दरार में कविता के लिए तो यथेष्ट स्थान मिल जाता है, पर कहानी इसमें काफी निचुड़ कर, रूखी-सूखी हो जाती है ! 

कहानी में अर्थ के क्षय की हानि पाठ में रोचकता और प्रवाह के अभाव के एक बड़े कारण के रूप में सामने आती है । इसका औपन्यासिक विस्तार तो इसे और भी कठिन और उबाऊ बना देता है ! उपन्यास अपठनीय हो जाता है । 

कहानी और कविता की प्रकृति का यह एक बुनियादी फर्क है कि कविता की दिशा प्रमाता की प्राणीसत्ता की तलाश की ओर होती है और कहानी की दिशा मूलतः कथा के बाहर के अन्य के क्षेत्र से जुड़ कर प्रमाता के विस्तार और उसके अधिक से अधिक अर्थों को प्रेषित करने की होती है । कहानी का वितान अन्य के क्षेत्र के संकेतों से बुने गए इंद्रजाल से और उसकी सार्थकता इस इंद्रजाल के भेदन के बिंदुओं से प्रमाणित होती है, पर कविता आम तौर पर अन्य के जगत का प्रत्याख्यान करती हुई प्रमाता में केंद्रीभूत होती है । निश्चित तौर पर महाकाव्यों का विन्यास अलग श्रेणी में पड़ता है । 

कहानी पर कविता के हावी होने का अर्थ होता है, कहानी के अपने वितान के यथार्थ से उसे अलग कर उसकी प्राणशक्ति के एक बड़े स्रोत से उसे काट देना ।  

जब भी हम जीवन के संकेतकों के जरिए किसी स्त्री को मां अथवा बेटी के रूप में पहचानते हैं, उनके स्त्रित्व की प्राणीसत्ता पर एक पर्दा गिरता है, पर जब हम उन्हें शुद्ध स्त्री के रूप में देखते हैं तो उनके मां अथवा बेटी होने का कोई मायने नहीं रह जाता । वे अपने उस खास अर्थ को गंवाती हैं जो उनके बाहर के जगत के संबंधों से तैयार होता है । यह सचमुच किसी भी प्रमाता की विडंबना है कि उससे जुड़े हर आख्यान में वह अनिवार्य तौर पर स्वयं से विच्छिन्न अथवा कुछ न कुछ गंवाता ही है । उसके बाहर के क्षेत्र की क्रियाशीलता ही उसे उसकी प्राणीसत्ता से काटती है । और उसका अपना जैविक बोध संकेतकों से जुड़े उसके आत्म-विस्तार से, उसके होने के अर्थ के विस्तार की संभावना से काटता है ।

‘रेत समाधि’ में कमोबेश यही बात, संकेतक के संपर्क से जुड़ कर पाए गए अर्थ को गंवाना, अपनी प्राणीसत्ता में सिमटना इस उपन्यास के सब चरित्रों और वस्तुओं के आख्यानों पर लागू होती है ।

इस उपन्यास के विन्यास की और भी सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि चरित्रों की जैविक अथवा किसी निश्चित प्राणीसत्ता की ओर प्रेरित इसका विस्तृत पाठ किसी एक चरित्र की अपनी धुरी पर टिका हुआ नहीं है । जैसे काव्यात्मक विन्यास वाले ही अल्बर्ट गार्सिया मार्केस का उपन्यास ‘ऑटम ऑफ पैट्रियार्क’ तानाशाहों की तमाम छवियों और कथा बिंबों के साथ तानाशाही की धुरी पर सख्ती से टिका रहता है । ‘रेत समाधि’ में परिपार्श्व की वैसी ही झांकियां कहानी की डगर और कठिन बनाती है । उन सबके सम्बद्ध-अर्थ को बस भाँप लेना होता है, अन्यथा भाषा के अन्य अनेक प्रयोगों की तरह वे सब चलती हुई रेल की खिड़की पर से सरपट गुजरती जाती है, उनसे एक गति के अलावा कोई चाक्षुस बिंब नहीं बनता । जिसे present continuous tense कहते हैं, किसी काम का जारी रहना, उस गति का एक क्षीण अहसास जरूर होता है ।

इस उपन्यास में ‘सरहद’, जिसे कुछ लोगों ने इसका बीज शब्द भी कहा है, एक पर्दा है, चरित्रों के अभाव को ढकने, परिदृश्य को छिपाने और चरित्रों की गोपनीय लालसाओं को प्रकट करने और दृश्य के परे किसी और चीज़ के होने की संभावना को पेश करने वाला पर्दा । इन कामों के लिए सरहद या पर्दे के बिंब से बेहतर कोई दूसरा बिंब नहीं होता है । पर्दा प्रमाता के बाह्य का वह रूप है जो बिना किसी क्रिया के प्रमाता की प्राणीसत्ता को क्रियाशील कर सकता है । सरहद की मौजूदगी ही सरहद पार जाने की कामना को पैदा कर सकती है । जैसे पूर्णता के प्रथम बोध से जुड़ा प्रमाता का विच्छन्नताबोध ही स्वातंत्र्य के मूल्यबोध को मनुष्य की प्राणीसत्ता से अभिन्न रूप में जोड़ देता है । 

कहना न होगा, माई की ‘नहीं’ और कुछ नहीं, उसकी प्राणीसत्ता से जुड़ा स्वातंत्र्य का मूल्यबोध है, जिसके बारे में लेखिका कहती है — 

“ नहीं । बच्ची का ‘नहीं’ सबको बड़ा सुहाता । बचपन में वो ‘नहीं’ की बनी थी ।

जब बचपन गया, पर उसका ‘नहीं’ उसके संग बालिग़ हुआ ।”

हमने यहां ऊपर इस ‘नहीं’ के काव्यात्मक बयान का एक पूरा अध्याय ही दिया है ।

‘रेत समाधि’ उपन्यास अनायास ही किसी को भी गीतांजलि श्री के ‘माई’ उपन्यास की याद दिला सकता है । उसमें गीतांजलि श्री कहती है, “कहीं है माई और वहाँ पूरी है,  हम पकड़ के, शब्दों में बांधकर, उसे अधूरा न कर दें कहीं ।” (पृष्ठ : 11) लेखिका वहां भी माई के बोधजगत में उसकी पूर्णता को शब्दों से व्याहत करना नहीं चाहती । पर यहां तो, पूर्णता के किसी भी बाह्य से उन्हें परहेज लगता है ।

माई में भी पर्दा है,    

“खिड़की-दरवाज़े पर टंगे परदे को देख कर हम अच्छी तरह जानते थे कि इसके पीछे एक पूरा, सजा-सजाया कमरा है …घर है…जहाँ किसी के जीवन का स्पंदन हर चीज़ को स्पर्श करता है । …यह तो हमने कभी न सोचा कि शून्य में फहराता पर्दा है, न उसके पीछे कुछ न आगे कुछ । कि बस उसी के फड़फड़ाते सन्नाटे में उलझके रह गए ?

“माई का पर्दा देख हमें उसके पीछे का ख़्याल ही न आया । “ (वही, पृष्ठ : 22) 

पर वह पर्दा अन्यों के लिए है । वह पर्दा अन्यों से जुड़ कर एक अर्थ ग्रहण करता है ।   

‘माई’ के बाद ‘रेत समाधि’, जाहिर है कि किसी भी विषय पर एक समय के अंतराल के उपरांत लौटना, उस अंतराल को एक अलंघनीय चट्टान बना देता है । जहां तब थे, वहीं लौटना असंभव होता है । दरअसल, माई की कहानी लेखिका के अवबोध की कहानी थी । “हमें छोड़ कर माई थी ही नहीं ।” वह प्रमातृत्व (subjectivity) की शैली थी । पर रेत समाधि प्रमाद की शैली है जो प्रमाता के अहम् से जुड़े उसके सवाल के रूप में सामने आता है । इसमें सवाल उठाने के लिए ही अपनी पहचान का प्रयोग किया जाता है । प्रमादग्रस्त स्त्री जानना चाहती है कि औरत होना क्या होता है ? 

गीतांजलि श्री लिखती है — “‘नहीं’ से राह खुलती है । नहीं से आजादी बनती है । नहीं से मजा आता है । नहीं अहमकाना है। अहमकाना सूफियाना है ।”

अर्थात् आजादी और अहमकपन में फर्क की लकीर बहुत महीन हुआ करती है । ऐसी स्थिति में जब सवाल विश्लेषण का आता है, मनोविश्लेषकों ने पाया है कि प्रमाता के अहम् के साथ समझौता करना बुनियादी तौर पर एक गलत शुरूआत होती है । इसका अंत परस्पर के साथ सिवाय छल के और कुछ नहीं होता । प्रमाता के साथ छल और प्रमाता का विश्लेषक के साथ छल । प्रमाता की आक्रामक आत्मरति से मुक्ति तभी संभव होती है जब प्रमाता की अपनी पहचान, उसकी प्राणीसत्ता अपने ही विरुद्ध खड़े होने का रास्ता बनाती है । वह संकेतक के लिए रास्ता होता है । इसमें प्रमाता के अहम् से जुड़े आदर्श की भी भूमिका होती है । वह प्रमाता के स्वातंत्र्य के मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों, अर्थात् उसके और प्रतीकात्मक जगत के बीच के संबंधों को सामान्य करता है । यहीं विचारधारा की भूमिका हुआ करती है ।

बहरहाल, ‘रेत समाधि’ का पूरा विन्यास हमें एक बहुत सचेत विन्यास प्रतीत होता है, जिसमें शुरू से अंत तक लेखक की हरचंद कोशिश चरित्रों की यथार्थ पहचान को लुप्त करके उन्हें उनकी जाति-सत्ता में सिमटा देने की है, जिसे कि हमने बार-बार दोहराया है । इसमें न कोई मां है और न कोई बेटी, दोनों सिर्फ स्त्रियां है । चरित्र और वस्तुएँ हैं, पर असम्बद्ध, स्वयं-संपूर्ण । यह एक उतना ही सचेत विन्यास है, जैसा अंग्रेजी साहित्य की कींवदंती बन चुके आइरिश कवि जेम्स जॉयस के बारे में जॉक लकान कहते हैं कि उन्होंने अपनी रचनाओं को कुछ इस प्रकार गढ़ा था ताकि जॉयस के ही शब्दों में “ अकादमिक्स के पास कभी काम की कमी नहीं रहे ।” अर्थात्, जब तक विश्वविद्यालय व्यवस्था कायम रहेंगी, वह उनकी कविता के पाठों में ही सिर धुनती रहेगी । 

लकान ने अपने लेख ‘James Joyce – A Symptom’ में जॉयस की कविता ‘फिन्ह्गन्स वेक’ (Finnegans Wake) का विश्लेषण करके बहुत गहराई से दिखाया था कि कैसे उसमें लेखक ने पूरी तरह से अपनी सनक के अनुसार शब्दों तक को अपनी मर्जी के हिसाब से ढाला था । अकादमिक दुनिया को ताउम्र व्यस्त कर देने का जॉयस के लेखन का वह एक अनोखा मिशन था । (देखें, अरुण माहेश्वरी, अथातो चित्त जिज्ञासा, पृष्ठ – 389-400)

इसीलिये, अंत में कहने की इच्छा होती है कि यह उपन्यास कुछ इस प्रकार, सरियलिस्ट शैली में, अर्थात् कहानी पर चित्रकला की एक खास यथार्थ-विरोधी शैली को लाद कर लिखा गया है जो इसे पढ़ने के बजाय, पुरस्कार हासिल करने के लिए एक सर्वथा निरापद और उपयुक्त कृति बनाता है ।

यह उपन्यास प्रेमचंद के यथार्थवादी आदर्शवाद पर टिके कथा साहित्य के पूर्ण नकार के बिल्कुल दूसरे छोर पर खड़ा है ।  


 





सोमवार, 27 जून 2022

एक प्रत्युत्तर

(25 जून 2022 को नई दिल्ली के हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में 'अथातो चित्त जिज्ञासा' के विमोचन समारोह में अरुण माहेश्वरी का वक्तव्य)  


यह हमारा एक प्रत्युत्तर है । प्रत्युत्तर उस दबाव का जो लगभग तीन दशक से भी ज्यादा काल से लगातार गहरा रहे विचारधारात्मक गतिरोध के अहसास से पैदा होता है । सोवियत संघ और समाजवादी शिविर का पतन और तब से अब तक जारी यह कालखंड — कह सकते हैं उस गतिरोध का एक जीता-जागता स्वरूप । हम जैसे राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए यह उसकी कामनाओं के एक ऐसे परासत्य के गुम हो जाने की तरह है जो उसे वेग देता है, क्रियाशील बनाता है । राजनीतिक कार्यकर्ता — अर्थात् वह जिसे अपने राजनीतिक कामों की प्रकृति की वजह से ही ग्राम्शी ने एक बुद्धिजीवी ही माना था । दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियां अपने सम्मेलनों में, खास तौर पर ‘विचारधारात्मक प्रश्नों पर’ (On ideological question) की तरह के प्रस्तावों में इस गतिरोध की एक तस्वीर बनाने की कोशिश करती रहती हैं । लेकिन मामला वही है कि — ‘तस्वीर बनाता हूं तेरी, तस्वीर नहीं बनती’ । हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अब तो ‘दिल के बहलने की भी तदबीर नहीं बनती’ । अर्थात् कम्युनिस्ट पार्टियों के अपने भाषाई औजारों से इसकी कोई वास्तविक तस्वीर बन ही नहीं पा रही है ! 

और जिसे भाषा में न उतारा जा सके, उस अहसास की कोई सही अवधारणात्मक समझ कैसे संभव है ! उससे उठने वाले सवालों के जवाब तो और भी बाद में आते हैं ।

आज सारे रंगों को खर्च करके भी जो तस्वीर न बन पाए, उसके सामने हम हताश यह पूछ रहे हैं कि आखिर वह ‘रंगे वफा’ कहां है जो इस तस्वीर को बनाने, विषय को समझने के लिए जरूरी है ? सच यह है कि हम जिन रंगों से, विचार के जिन सख्त ढांचों से इस परिस्थिति की सूरत समझना चाहते रहे हैं, वे रंग और कूची, वह पूरा ढांचा ही कुछ इतना बेढब या सीमित साबित हो रहा है कि उसके चलते इस सूरत को भाषा के आवरण में लाना अभी असंभव सा लगता है । अब तो लगने लगा है कि विचार की निश्चयमूलक, जड़ विश्लेषणात्मक श्रेणियों में उलझे हुए पार्टियों के गतानुगतिक राजनीतिक कर्मकांडों की तरह के प्रस्तावों से उसे शायद कभी नहीं साधा जा सकता है । ये तमाम औजार उलझनों को खोलने के बजाय गतिरोध को कहीं ज्यादा कठिन और घना बना रहे हैं !

कहना न होगा, यही वह परिस्थिति होती है जब शक्ति अर्जित करने के लिए गांधारी अर्थात् अंधकार का सामना पूरी तरह से नग्न हो कर करना होता है । इस उपक्रम में दुर्योधन की तरह शरीर पर बचा हुआ हर वस्त्र महज कमजोरी का सबब लगता है । 

मित्रो, इसी से जाहिर है कि संकट कितना कठिन और गहरा है । और अपने जिन जाने हुए सामान्य हथियारों से इस जड़ता का बाल भी बांका न होता हो, उनसे ही इसके मुकाबले की कोशिश, कोई मुकाबला ही न करने से भिन्न कोई अर्थ नहीं रखती है ! आज समस्या यह है कि जिसे हम नहीं जानते उसकी संज्ञानात्मक पहचान कायम करनी है ।  

यह कहने की जरूरत नहीं है कि जब हम किसी पूरी तरह से अबूझ, कठिन से कठिन विषय को भी क्रमिक रूप में, बिल्कुल प्रारंभ से रूपायित करते हुए आगे बढ़ते हैं तभी वह स्थिति भी आती है जब वह पाठ दिन के उजाले की तरह स्वच्छ और सरल होता जाता है । इस प्रकार की एक तत्त्व मीमांसक खोज की सबसे पहली जरूरत तो यह है कि विषय के मूल को, प्रमाता (subject) की प्राणीसत्ता (being of the subject) की उपस्थिति को जानें और उसकी उपस्थिति की मांगों पर गौर करें ।

मसलन् जब दाव पर विचारधारा हो तो सबसे पहली जरूरत है कि विचारधारा की ही प्राणीसत्ता की ओर रुख किया जाए । विचारधारा की प्राणीसत्ता और कहीं नहीं, सिर्फ मनुष्य में स्थित होती है । हमारे लिए इस विषय का एक अतिरिक्त पहलू होता है, सिर्फ मनुष्य नहीं, परिवर्तनकारी मनुष्य । सर्वहारा । इसके चलते ही यहां विचारधारा की प्राणीसत्ता खुद में एक प्रमाता (subject) भी हो जाती है । प्रमाता, अर्थात् समस्त चराचर जगत से सम्बद्ध, स्वयं को बनाने-बिगाड़ने, छिपाने और खोलने वाला प्रमाता । प्रमाता की तात्त्विकता स्वयं में नहीं उसके संबंधों में निहित होती है । सर्वहारा के साथ ही जुड़ा हुआ कम्युनिस्ट पार्टियों का वह पूरा ढांचा भी उभर कर सामने आता है जो इस प्रमाता की अपनी समस्त कामनाओं तक पर, एकाधिकार की हद तक अपनी संपूर्ण दावेदारी करता है । इस प्रकार क्रांतिकारी राजनीति के लिए सर्वहारा इतिहास में एक आत्म (subject) और वस्तु (object) दोनों ही रूप में हमारे सामने आता है । 

मित्रो, यही वह बिंदु है जहां से किसी भी प्रमाता से जुड़े इतिहास की गति के थम जाने, अर्थात् एक गहरे, अभेद्य प्रकार के गतिरोध के पैदा होने का एक स्थायी खतरा भी पैदा होता है, क्योंकि किसी भी काल में आत्म और वस्तु के एकाकार होने, उनके बीच किसी फासले के न रहने को ही तो गतिरोध कहा जाता हैं । किसी भी प्रमाता और उसके वस्तु रूप के बीच की दरार से ही उसमें गति पैदा होती है । वस्तु का अभाव ही उसमें गति का कारक होता है । आत्म और वस्तु की एकात्मता तो अद्वैत के परम भाव की मानिंद है जिसकी आगे कोई गति नहीं हुआ करती है । यहां पहुंच कर सारी चीजें थम जाया करती है । यही वजह है कि हम जिस विचारधारात्मकक गतिरोध की आज चर्चा कर रहे हैं, उसके वर्तमान हालात में सर्वहारा नहीं,  बल्कि उसकी भी प्राणीसत्ता से अपने विचार का प्रारंभ करना होगा । इतिहास में सर्वहारा के रूप में मजदूर वर्ग की सिनाख्त से पैदा होने वाले वैचारिक संकट पर हम पहले भी एरिक हाब्सवाम के हवाले से अपने एक लंबे लेख (हम भी अपनी एक हवा बांधते हैं) में विस्तार से चर्चा कर चुके हैं । यहां हमारा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जब इतिहास में एक प्रकार का अभेद्य गतिरोध उपस्थित होता है, तब और भी जरूरी हो जाता है कि मनुष्य के रूप में विचारधारा की प्राणीसत्ता को केंद्र में रखते हुए विश्लेषण की उस नई धारा की खोज की जाए जो सामाजिक रूपांतरणकारी शक्ति के तौर पर सर्वहारा में मनुष्य के स्थानांतरण को भी नए सिरे से परिभाषित करते हुए, उस पर लाद दी गई अनेक वस्तुगत जड़ताओं से उसे मुक्त कर सके । 

शक्ति अर्जित करने के लिए गांधारी के सामने अपने सारे आवरणों को त्याग कर उपस्थित होने की बात का एक तात्पर्य यह भी है । यह एक प्रकार से सर्वहारा की विचारधारा के लिये ही चिन्तन को पूरी तरह से मानव-केंद्रित करते हुए आगे बढ़ने की मांग है । यह मनुष्य के शरीर की तरह ही उसके गठन के मूलभूत अवयव के तौर पर भाषा की प्रकृति को भी विचार का विषय बनाने की मांग है । पारंपरिक भाषा की बाधाओं से मुक्त होकर नई भाषा को हासिल करने की बात है । भाषा से ही यह जाहिर होता है कि कोई चिंतन क्या चिंतन कर रहा है । भाषा जो अभी एक बाधक की भूमिका में दिखाई देती है, जो अपनी तमाम कसरतों के बावजूद कुछ प्रेषित नहीं कर पा रही है, उसे ही पुनः अपने प्रभावी सहयोगी के रूप में अर्जित करने का आग्रह है । और इसी उपक्रम में आगे, मार्टिन हाइडेगर की भाषा को उधार लेकर कहें तो चिन्तन को काव्यात्मक बनाने, उसे परिस्थिति के मर्म तक ले जाने की मांग है ।  

मित्रो, कार्ल मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन के नियमों का उद्घाटन किया और हमें एक ऐसे विज्ञान से परिचित कराया, जिसकी अवहेलना करके आज किसी भी सामाजिक-आर्थिक परिघटना की समाजशास्त्रीय व्याख्या असंभव लगती है । इस विज्ञान की बदौलत ही सामाजिक अन्तर्विरोधों का विश्लेषण अब बहुत बड़ी समस्या नहीं रह गई है । इस अर्थ में कहा जाए तो अब सारी समस्या सामाजिक परिवर्तन को साधने की प्रक्रिया के अवयवों की परत-दर-परत समझ में सिमट गई है । इसमें मनुष्यों का पूरा समस्त जगत समा जाता है । आज के वक्त मनुष्यों के सामाजिक-सामूहिक रूप के अतिरिक्त एक अकेले मनुष्य और उसकी सामाजिकता का पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता, जो हमें सामाजिक परिवर्तन की तरह के विषय की प्राणीसत्ता के सबसे ज्यादा करीब तक ले जा सकता है । 

जब भी हम आदमी को उसकी एक निश्चित सामाजिक पहचान मात्र के रूप में देखते हैं, पिता, माता, संतान, किसान, मजदूर, कर्मचारी, आदि-आदि मात्र में सीमित करके देखते हैं तो हमारी सोच के दायरे से ऐसा बहुत कुछ अनिवार्य तौर पर छूट जाता है जो मनुष्य के रूप में उसकी प्राणीसत्ता से अभिन्न रूप में जुड़ा होता है । उसके शरीर और उसकी भाषा तथा प्रतीकात्मक जगत के अनेक पहलू हमारे दायरे के बाहर चले जाते हैं । हम यह समझने में असमर्थ हो जाते हैं कि क्यों और कैसे कोई कंगाल हो चुका, अर्थात् अपने भौतिक जगत के संग्राम में पराजित व्यक्ति भी अपने अंतर में लगातार नाना प्रकार के समर आयोजनों में खुद को विजयी मान कर जीया करता है । लू शुन का आ क्यू, भौतिक जीवन में पराजित पर आत्मिक समर में विजयी होने के भाव में जीने वाला चरित्र, सिर्फ व्यक्ति का सच नहीं होता, वह पराजित और कमजोर राष्ट्रों का भी सच हुआ करता है । नोटबंदी से अपना सब कुछ लुटा चुका व्यक्ति उसमें ही अपनी विजय देख कर आह्लादित होता है ! 

मित्रो, यह उस inter-subjectivity, मनुष्यों के सामूहिक व्यवहार का भी एक मामला है कि कैसे कोई एक पूरा समाज सच को देख कर भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ाये भेड़ से भी पालतू प्राणीसत्ता का परिचय देने लगता है और कोई प्रताड़क प्रत्येक के पिछवाड़े के पंख कतर कर बटोर ले जाता है !  

राजनीतिक चिंतन की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए ही मनुष्यों के इस अंतर के सत्य को संज्ञान में लेना जरूरी है । राजनीतिक चिन्तन के केंद्र से मनुष्य को अपसारित करना वैसा ही है जैसे व्यक्ति की निजी कामनाओं को पूरी तरह से दरकिनार उसकी क्रियाशीलता पर विचार करना । पर यथार्थ में तो वे कामनाएँ कभी अपसारित होती नहीं हैं । जिसे हम अपने अंदर ही निष्काषित रखते हैं, वही हमारे अवचेतन के जरिए हमें लगातार प्रभावित करती है, हमारे तार्किक-अतार्किक व्यवहारों के कारक की भूमिका अदा करती है । इसीलिए, चिंतन के हर नए उपक्रम में उसी अपने अंदर के ही निष्काषित अंश की तलाश ही वस्तुतः प्रमाता की प्राणीसत्ता की तलाश बन जाती है । 

मित्रो, यह बेवजह नहीं है कि चिन्तन मात्र की ही चर्चा करते वक्त हमें चिन्तन और काव्य के बीच एक प्रकार के नैसर्गिक संबंध की हाइडेगर की बात याद आती है । मार्क्स का लिखा हर वाक्य अपनी सारगर्भिता की वजह से ही हमें कभी किसी कविता से कम नहीं लगता है । पचास साल पहले जिस शिद्दत से हम उन्हें पढ़ रहे थे, आज भी उसी शिद्दत से पढ़े जा रहे हैं । 

बहरहाल, विचारों की दक्षिणपंथी धारा का अर्थ ही है विचार की एक जड़, चिंतन-विरोधी धारा जो जीवन में हर परिवर्तन की धुर विरोधी, कला और साहित्य में मूलतः मूर्तिभंजक और विज्ञान तथा अकादमिक जगत में परंपरापूजक, गोबरपंथी और प्रेम के मामले में प्रभुत्ववादी, स्त्री-विरोधी होती है । पर जब वामपंथी जगत में भी हम नितांत जड़सूत्रों से गुंथी गई निर्जीव, शुष्क और सपाट भाषा का साम्राज्य देखते हैं, तो लगता है जैसे हम चिंतनशून्यता के किसी युग में ही जी रहे हैं । हम आज जिसे अपना प्रत्युत्तर कह रहे हैं वह इसी चुनौती के जवाब की तरह है । सचमुच, राजनीतिक चिंतन के बने रहने की ही शर्त है कि वह अपने सामान्य कर्मकांडों के परे की एक नई भाषा की तलाश करे । 

ऐसे ही तमाम दबावों के चलते ही हम विगत दस सालों में खास तौर पर उन विचार पल्लियों के चक्कर काटने लगे जो तब तक हमारे लिए लगभग निषिद्ध क्षेत्र बनी हुई थीं। और उन्हीं रास्तों पर, यह इत्तेफाक रहा कि लगभग एक साथ हमारी मुलाकात फ्रायड के महान शिष्य और मनोविश्लेषण की धारा को चिंतन के क्षेत्र में दर्शनशास्त्र से भी आगे ले जाने वाले फ्रांसीसी मनोविश्लेषक जॉक लकान और भारत के हजार साल पहले के चिंतक, दार्शनिक, भाषाविद्, सौन्दर्यशास्त्री और तंत्रालोक के प्रणेता अभिनवगुप्त से हुई । जैसे अभिनवगुप्त ने भारतीय चिंतन की अन्य तमाम धाराओं की सीमाओं से टकराते हुए उनके प्रत्युत्तर में अपने उस प्रत्यभिज्ञादर्शन को प्रस्तावित किया, जो मूलतः मनुष्य की आत्म-पहचान के दर्शन के रूप में पिंड से ब्रह्मांड तक, सबको अपने चिंतन के दायरे में लाता है और भारतीय चिंतन की प्रभुत्वशाली अद्वैतवादी धारा, परम के समक्ष अपनी निजी सत्ता को पूरी तरह से तिरोहित करने में ही मुक्ति के विचार को चुनौती देते हुए मनुष्य के स्वातंत्र्य को उसके परम लक्ष्य के रूप में पेश किया, ठीक उसी प्रकार लकान ने भी मनोविश्लेषण के सिद्धांतों को तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा के सभी क्षेत्रों की समस्याओं से जोड़ कर अपने व्यापक कामों से यहां तक दावा किया कि आने वाले समय में मनोविश्लेषण की भाषा ही चिंतन की मुख्यधारा के स्थान पर होगी, क्योंकि उसके केंद्र में उन्होंने मनुष्य के लक्ष्य को, स्वयं में ही निष्काषित करके रखी हुई कामनाओं के आब्जेक्ट ए (objet petit a) को, उसके अंतर की अलभ्य वासनाओं को रखा, और व्यक्ति और जगत के उनमुक्त, अनंत विकास का परिप्रेक्ष्य पेश किया । आज यहां हमें यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि यदि हमने अभिनवगुप्त के जरिए प्रत्यभिज्ञादर्शन, तंत्रालोक, सिद्धित्रयी और आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक को न जाना होता तो हम सिगमंड फ्रायड के अनूठे शिष्य जॉक लकान को कभी नहीं जान पाते, जिनके मनोविश्लेषण के सिद्धांतों पर विचार करने वाला हर विचारक एक स्वर में उनके लेखन को उसमें प्रयुक्त अनेक संक्षिप्त और सूत्रमूलक संज्ञाओं तथा अनायास ही आने वाले मनोविश्लेषण की धारा से भिन्न, अन्य चिंतन प्रणालियों के संदर्भों की वजह से बेहद जटिल और कठिन बताता है । सचमुच किसी के लिये भी यह एक चौंकाने वाली बात हो सकती है कि अभिनवगुप्त और आनंदवर्धन से ही हमें लकान की तरह के इस कठिन समझे जाने वाले सर्वाधुनिक विश्लेषक के सूत्रों को समझने की भाषा मिल पाई । बाकी इनके बीच की भिन्नता का विषय अलग है, जिसे हमने अपनी किताब में बाकायदा रेखांकित किया है । हमने तो यहां तक कहा है कि यहां उत्पलदेव-अभिनवगुप्त का प्रत्यभिज्ञादर्शन अपने पैरों के बल खड़ा है ।    

इस बात में हमें कभी कोई संदेह नहीं रहा है कि हर घटनाक्रम अपने साथ ही अपने अंत के गह्वर को तैयार करता जाता है । हर दृश्य को अदृश्य होना होता है और वह अदृश्यता कैसे घटित होती है, उसके लक्षण उसके नाना प्रकट रूपों के बीच से ही अपने को जाहिर करते हैं । ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में कार्ल मार्क्स ने जब पूंजीवाद के जन्म के साथ ही सर्वहारा के रूप में उसकी कब्र खोदने वाली शक्ति के जन्म की बात कही थी तो वह पूंजीवाद के एक गह्वर की ही सिनाख्त थी, जो मूलतः प्रमाता के अस्तित्व की पहली क्रिया से जुड़ी होती है और प्रमाता की गति की नियति की सूचक भी । किसी भी घटना के नए सत्य के प्रकट होने का अर्थ है एक नए प्रमाता (subject) का जन्म, एक नए संदर्भ का प्रकट होना । इसे तलाश कर ही विचारों की दुनिया में भी सभी स्तरों पर अपनी आत्म-पहचान की कोई नई प्रक्रिया शुरू हो सकती है । 

मित्रो, अगर कोई इस पूरे, विगत दस साल से भी अधिक के दौर के हमारे लेखन को देखें तो उसे हमारी इन प्रमुख चिंताओं के सूत्र को पकड़ने में शायद कोई दिक्कत नहीं होगी । यही वह काल रहा है जब हमने ‘आलोचना के कब्रिस्तान से’ के सभी, और ‘आलोचना की नई दृष्टि की तलाश’ संकलन के प्रमुख लेख लिखें । वे सब प्रगतिशील-जनवादी साहित्य आंदोलन के पर्यवसन की एक समझ बनाने की कोशिश थी । इतिहास के एक खास क्षण, सोवियत समाजवादी क्षण से टंकी हुई साहित्य दृष्टि की पहचान की कोशिश थी । और कहना न होगा, यह उसके पतन के गह्वर की सिनाख्त भी थी ।

इसी अर्थ में ‘गह्वर अपने-अपने’ स्वयं में एक तत्त्वमीमांसक दर्शनशास्त्रीय श्रेणी है जो वस्तु के उदय और अस्त को उसके तत्त्वमूल से हमेशा जोड़ कर देखती है । 

गह्वर — सिगमेंड फ्रायड ने लगभग एक दार्शनिक श्रेणी के रूप में ही इस पद की चर्चा की है — ‘Vel’ । वह गह्वर जिसमें subject को, प्रमाता को अदृश्य होना है । फ्रायड के श्रेष्ठ शिष्य जॉक लकान ने फ्रायड के द्वारा प्रयुक्त, पर मनोविश्लेषण की परवर्ती चर्चाओं में सर्वाधिक उपेक्षित रख दिये गये, इस पद की ओर दुनिया का ध्यान खींचा था । यह प्रमाता की एक ऐसी मजबूरी है जो उसके अस्तित्व की प्रथम क्रिया से, अर्थात् उसकी तात्त्विकता से जुड़ी हुई है । यह गह्वर उसके स्व के साथ, उसके अस्तित्व की सूचना के साथ ही तैयार हो जाता है, जो उसे अन्य से अलग भी करता है । यह जीवन के साथ मृत्यु के संबंध की तरह है । हजारों शुक्राणुओं की मृत्यु के बीच से एक-दो को मृत्यु तक पहुंचने के पहले मिलने वाले काल के अंत की तरह। यही काल प्रमाता में अन्य से अलगाव का बीजारोपण भी होता है, जो प्रमाता की प्रत्येक क्रिया के साथ बढ़ता जाता है, उसकी अपनी दिशा की लकीर बनने लगती है । इसीलिए प्रमाता की गति की समझ के लिए उसकी ओर दृष्टि रखना किसी भी लिहाज से गलत नहीं है । 

जैसे हेगेल ने सभ्यता के इतिहास में दास प्रथा के जन्म का कारण बताते हुए कहा था कि जब आदमी को मृत्यु अथवा दासता के बीच एक को चुनने के लिए बाध्य किया जाता है तो दासता का गह्वर उसकी मजबूरी हो जाता है । मजबूरी के इस गह्वर में मृत्यु का पहलू ही प्रमाता को अंतिम रूप से संचालित करता है । प्रमाता का यही क्षण हेगेलियन क्षण कहलाता है । इस पर तीखी नजर रख कर प्रमाता के उस अंत का संधान पाया जा सकता है जहां उसका अदृश्य हो जाना उसकी नियति होता है । 

मित्रो, प्रमाता के विश्लेषण को इस हद तक उसके तात्त्विक सत्य से जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति के कारण ही हम मनोविश्लेषक जॉक लकान को दार्शनिकों के दार्शनिक के रूप में पाते हैं । उन्होंने यह स्थान अपने मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के दर्शन-विरोधी दर्शन के बल पर अर्जित किया है । कार्ल मार्क्स के राजनीतिक अर्थशास्त्र के दर्शन-विरोधी दर्शन की तरह ही लकान के चित्त संबंधी इस चिंतन के गहरे समंदर में हम प्लेटो से लेकर हेगेल-हाइडेगर तक की सभी दार्शनिक धाराओं को तो विलीन होते हुए देखते ही हैं, साथ ही समाजशास्त्र, विज्ञान और गणितीय चिंतन की धाराएं भी इसमें समाहित है । चिंतन की लकानियन संरचना में एक सर्वोपरि स्थान भाषाशास्त्र का भी है । कहना न होगा, हमारे तंत्रशास्त्र में भी मनुष्य के आत्म-विस्तार का यही आधार है । 

अभी सोचता हूँ तो बार-बार यही लगता है कि सचमुच लकानियन पद्धति चिंतन की गहनता का एक ऐसा रूप है जिसमें सिर्फ प्रवेश का पथ है, इससे निकलने का मौत के सिवाय कोई अन्य रास्ता नहीं है । जैसे मार्क्स से आपकी मुक्ति नहीं है । आप एक बार प्रवेश करने के बाद सिर्फ उसी प्रकार अदृश्य हो सकते हैं जैसे हमारे अभिनवगुप्त के बारे में कहावत है कि वे गुलमर्ग के रास्ते की एक गुफा में अपने शिष्यों के साथ अदृश्य हो गये थे । कोई उनके अंत के बारे में और कुछ नहीं जानता । जॉक लकान दुनिया के ऐसे ही एक दार्शनिक हैं जिनमें सिर्फ प्रवेश का पथ होता है, निकास का नहीं । 

वस्तु की तत्त्वमीमांसा का सत्य यही है, जो आपको अंततः अनिवार्य तौर पर  वस्तु के पूरी तरह से अदृश्य हो जाने की हद तक ले जाता है । किसी भी कहानी का वास्तविक अंत वहीं होता है । 

मित्रो, अपनी इस पुस्तक को प्रस्तावित करते हुए हमने खुद को लगातार एक राजनीतिक कार्यकर्ता कहा है । दरअसल, यह लकान की ही शिक्षा है जिसमें वे दर्शनशास्त्र की सीमा को बताते हुए उसे अनिवार्य तौर पर दार्शनिक की प्राणीसत्ता से जोड़ते हैं । इस प्रकार वे दर्शन में एक प्रमाता (subject) और प्रमातृत्व (subjectivity) दोनों देखते हैं । सचमुच विचार के किसी भी रूप को विचारक के प्रमातृत्व से काट कर नहीं रखा जा सकता है । यही सीख हमें यहां बार-बार अपनी subjectivity की याद दिलाती है ।  हम इस अपने प्रकार के गहरे अकादमिक और ऊपर से जटिल से नजर आने वाले काम को भी उससे अलग नहीं कर सकते हैं । 

यह समूचा उपक्रम हमारे लिए भाषा के एक नए और किंचित भिन्न भुवन में बसने की तरह था । किसी भी नए भुवन में बसने का अर्थ होता है खुद को एक भिन्न परिवेश में रखना । अगर किसी भी वजह से ऐसा नहीं हो पाता है, हम नए परिवेश के नए जगत की अपनी पहचान नहीं कर पाते हैं, उसमें हमेशा अपने जाने हुए जगत की ही छवि देखते रहते हैं, तो कहना न होगा, ऐसा कहीं जाना, और न जाना, दोनों एक समान होता है । नए परिवेश में अपने को रखने का मतलब ही होता है, उन चीजों को देखना और उनसे परिचित होना जिनसे हम पहले परिचित नहीं होते हैं । जीवन में साहित्य कला की यही तो सबसे बड़ी भूमिका है । अन्यथा खुद के बाहर झांकने, आत्मरति से निकलने की संभावनाएँ कितनी कम हो जाती है !

बहरहाल, आज सारी दुनिया के विश्वविद्यालयों में Psychoanalysis को साहित्य आलोचना के एक सिद्धांत के रूप में भी पढ़ाया जाता है । फ्रायड के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों में साहित्य आलोचना के सिद्धांतों Theory of literary criticism के एक नये आयाम को स्थापित करने में जॉक लकान के लेखन की सबसे बड़ी भूमिका है जिसमें वे मनोविश्लेषण के केंद्र में मनुष्य के द्वारा कला और साहित्य में रचे जाने वाले दृश्यों को अतीव महत्व के स्थान पर रख पाए हैं । साहित्य मनुष्य की आत्मा का शिल्पी होता है, इस कथन के क्रियात्मक पहलू को वे मूर्त कर पाए हैं । इसीलिए साहित्य की आलोचना में फ्रायड के अध्ययनों का पहले से ही जो महत्व रहा है, उसे लकान ने अपने काम के जरिए साहित्य आलोचना के सिद्धांतों का एक अभिन्न अंग बना दिया है । हमें यह कहने में आज जरा भी संकोच नहीं है कि बिना मनोविश्लेषण के सिद्धांतों को आयत्त किए साहित्य आलोचना की ओर, जिसमें कृति के रूप में प्रमाता और लेखक के प्रमातृत्व, दोनों के विश्लेषण का ही समान रूप से महत्व होता है, शायद एक क़दम भी नहीं बढ़ाया जा सकता है । हमें लगता है कि शायद इस पुस्तक में यह हमारी एक खास उपलब्धि रही कि फ्रायड और लकान के सिद्धांतों के साथ अनायास ही भारत के श्रेष्ठतम दार्शनिक अभिनवगुप्त, स्वयं की पहचान के लिए ‘अन्य’ की उपस्थिति के अभिज्ञान पर टिके उनके प्रत्यभिज्ञादर्शन और आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक की टीका में भाषा और साहित्य पर उनके विचार हमारे इस अध्ययन में समाहित होते चले गए हैं। आज लगता है कि जैसे यह सब अनायास ही भारतीय साहित्य आलोचना के अधुनातन सिद्धांतों की एक भाषा को हासिल करने की हमारी विकलता , लकान की भाषा में हमारे jouissance का ही परिणाम है।  

अब किताब पाठकों के हाथ में है । हम जानते हैं, इसकी पहुंच की सीमाओं को । यह कोई उपन्यास नहीं है । पर जिसकी भी रुचि आलोचना के आधुनिक द्वंद्वात्मक भौतिकवादी सिद्धांत में होगी, और जो इसकी एक सक्षम भारतीय भाषा की तलाश में होगा, उसके लिए यह पुस्तक एक हद तक उपयोगी साबित हो सकती है । 


बुधवार, 11 मई 2022

मंटो, राजकमल चौधरी और इसराइल

(मंटो के जन्मदिन के अवसर पर एक विचार)


अरुण माहेश्वरी



मंटो और राजकमल चौधरीइन दो लेखकों की तुलना करना ही नितांत बेमाने है  जरा सोचियेमंटो क्यों मंटो हैखास हैऔर राजकमल चौधरी क्यों एक समर्थ लेखक होकर भी ‘राजकमल चौधरी’, अर्थात् अन्यों से अलग नहीं है ? 


मंटो फिल्म जगत के चरित्रों से जुड़े अपने संस्मरणों या ऐसे ही उच्च और मध्य वर्ग के लोगों की जिंदगी की कुंठाओंउनकेचारित्रिक दोहरेपन और इनके जीवन की गलाजतों के चित्रण की वजह से मंटो नहीं है  मंटो है ‘काली सलवार’ की सुलतानाऔर खुदाबख्श और शंकर और मुख्तार के कारण, ‘धुआं’ के मसऊद और कुलसुम, ‘बूं’ के रणधीर और बिना नाम वाली घाटनके कारण, ‘खोल दो’ की सकीना और सिराजुद्दीन के कारण, ‘ठंडा गोश्त’ के ईशर सिंह और कुलवंत कौर के कारण  


सोचियेसमाज के सबसे नीचे के स्तर के कौन से वर्गों से ये तमाम चरित्र आते हैंमध्यवर्गीय लोगों के जीवन की तरह ही उनकेलेखन से भी पूरी तरह से बहिष्कृतबेजुबान चरित्र और ये सब किस प्रकार के अकल्पनीय अस्तित्व के संकट में उनकी रचनाओंमें फंसे हुए दिखाई देते हैं  मंटो इनके जीवन की गलाजतों को इनकी महा-त्रासदियों के रूप में सामने लाते हैं कि उनमें डूबया उन्हें बेपर्द करके ही उनसे किसी प्रकार का रस लेते हैं  मंटो की लेखनी में लंपटगिरी का लेश मात्र नहीं मिलेगा  


इसके विपरीतराजकमल के चरित्र तो महानगरीय जीवन के उच्च वर्गीय और आम मध्य वर्गीय चरित्र होते हैं जिनकी कहानियोंसे ही हिंदी का पूरा कथा साहित्य पटा हुआ है  हिंदी कथा साहित्य पर थोड़ी सी नजर रखने वालों को ही राजकमल के लेखन मेंकोई विशिष्टता नहीं दिखाई देगी  यही तो व्यापक लेखक समुदाय का अपना वर्ग हैजिसमें वे खूब रमते हैं  हिंदी साहित्य मेंइन चरित्रों के तमाम रंगों को देखा जा सकता है  राजकमल भीअन्य कई पारंगत कथाकारों की तरह एक अच्छे किस्सागो थेउनके पास भाषा और मनोविज्ञान की एक तमीज थीलेकिन यह उनकी जीवन-दृष्टि का दोष कहें या कुछ और , वे अपने चरित्रोंके जीवन की त्रासदियों के चितेरे नहींउनकी गलाजतों के उपभोक्ता रहे  ‘मछली मरी हुई’ हो या ‘ताश के पत्तों का शहर’, इनकेचरित्र कहां से लिये गये हैं ; ये किस मायने में विशिष्ट हैं ; और कौन से अब तक  देखे गये पक्षों को वे उठा रहे थे ? 


राजकमल चौधरी की उच्छवसित वाहवाही करने की पहली शर्त है हिंदी और बांग्ला के कथा साहित्य से आपका अपरिचय राजकमल की जो बातें कुछ लोगों को ज्यादा ही आकर्षित कर रही हैंउन मामलों में बांग्ला में सुनील गांगुलीशक्तिचटोपाध्याय और मलय रायचौधुरी आदि भूखी पीढ़ी के लेखक उनके बाप रहे हैं  राजकमल में उनके स्तर तक उतरने की हिम्मतही नहीं थी  औरइनमें से कोई भी मंटो नहीं थाये सब मंटो से सिर्फ रश्क कर सकते थे  राजकमल ने बांग्ला से अनुवाद केलिये अपने ही स्तर के लेखक शंकर (मणिशंकर मुखर्जीके ‘चौरंगी’ को चुनाजिसे बांग्ला में दोयम दर्जे का किस्सागो मानाजाता रहा है  साहित्य के किसी निकष पर उनके बारे में यहां चर्चा नहीं होती है  


हिंदी में अगर किसी लेखक के पास मंटो की तरह का लेखन करने की सलाहियत थी तो हमारी नजर में एक ही है - इसराइल इसराइल ने जितना और दो भी लिखावह ऐसी जलता हुआ यथार्थ है जिसे उठाने की ताकत को अर्जित करने के लिये किसीमध्यवर्गीय या उच्चवर्गीय लेखक को कईं जन्म लेने पड़ते हैं  मंटो ने समाज की अतल अंधेरी गहराइयों में डूबे हुए चरित्रों परकैसे लिखा होगासोच कर भी सिहरन होती है  इसराइल साहब की कहानियों के बारे में भी सोचने पर कुछ ऐसा ही लगता है  


बहरहालजिस समय राजकमल का ‘मछली मरी हुई’ प्रकाशित हुआसाठ के मध्य का वह दशक बंगाल में मजदूर आंदोलनऔर जन-आंदोलनों के सबसे गौरवशाली दिनों का काल था  इसराइल की कहानियों में वर्णित मजदूर वर्ग के जीवन में भी उसकाल की धड़कनों को कुछ सुना जा सकता है  राजकमल को इन संघर्षों का बोध भी अपने आखिरी दिनों में ही हुआ थाजिसकी एक छाप ‘मुक्तिप्रसंग’ में मिलती है