सोमवार, 21 सितंबर 2026

मोदी–शाह संबंध की गुत्थी और 20 जुलाई


− अरुण माहेश्वरी




दीपक शर्मा अपने चैनल पर दो दिन पहले ही कह रहे थे कि अमित शाह की भूलें अब मोदी के लिए लगभग असहनीय सी होती जा रही है । वे 20 जुलाई के अतिरिक्त शाह की इधर की और भी कई ऐसी भूलों का उल्लेख कर रहे थे जिनमें लगता है जैसे शाह अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा के बाहर जाकर ऐसी बातें करते हैं जो मोदी और उनके पीएमओ के लिए मुसीबत का सबब बन रही हैं। 

उनके अलावा पूण्य प्रसून वाजपेयी के चैनल सहित यूट्यूब के अधिकांश लोकप्रिय चैनलों में कहा जा रहा है कि 20 जुलाई के चलते न सिर्फ धर्मेन्द्र प्रधान का पत्ता साफ हुआ है बल्कि अमित शाह भी साइडलाइन कर दिये गये हैं । पूरे मानसून सत्र में शाह जिस प्रकार मुँह चुराते रहें, उसे आज उनकी नई सामान्यता के रूप में भी देखा जाने लगा है । 

हमारे पास अभी सिवाय इन अनुमानों के कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि अमित शाह नरेंद्र मोदी को फूटी आँखों नहीं सुहा रहे हैं । और न ही हम संसद के मानसून सत्र के दौरान शाह के आचरण की गुत्थी को पूरी तरह से खोल पाने की स्थिति में हैं । 

लेकिन सत्ता में मोदी–शाह का ‘दो शरीर-एक जान’ वाला संबंध कुछ ऐसा दिखता रहा है जिसमें यदि मोदी सत्ता का शरीर हैं तो शाह उसकी क्रियात्मक बुद्धि । मोदी का संघी ज्ञान इच्छा पैदा करता है तो शाह उस इच्छा को प्रशासनिक-राजनीतिक क्रिया, चुनावी गणित और दमनकारी शक्ति में बदलते हैं । 

मनोविश्लेषण की भाषा में कह सकते हैं कि मोदी स्वामी-संकेतक, तो  शाह उस संकेतक को अर्थ प्रदान करने वाला क्रिया-तंत्र। दोनों के बीच इसलिये भी कोई दूरी नहीं दिखाई देती थी, क्योंकि शाह की प्रत्येक सफलता ही स्वतः मोदी की सर्वज्ञता का प्रमाण मानी जाती थी।

इसलिए भी शाह की भूलें कोई साधारण सहयोगी की भूलें नहीं कहलायेगी । उनसे सीधे मोदी की ‘सर्वज्ञता’ में दरार पड़ती है। शाह से मोदी की शक्ति का विस्तार होता है, तो स्वाभाविक है कि उनकी विफलता उसी शक्ति के संकुचन का कारण कहलायेगा । 

पर मजे की बात यह है कि इन संघी दिमागों में इतनी समझ नहीं थी जिसे मार्क्स कहते हैं कि “मनुष्य अपना इतिहास स्वयं बनाता है पर अपने मनचाहे ढंग से नहीं, उन परिस्थितियों में बनाते हैं जिनका उन्हें सीधे सामना करना पड़ता है।”

अपने युगल-प्रेम में डूबे हुए इस युग्म को पता ही नहीं चला कि परिस्थितियां कितनी तेजी से बदल चुकी है । न इनको 2024 के चुनाव का वास्तविक अर्थ दिखाई दिया और न ही कोकरोच पार्टी के वेबसाइट पर उमड़े युवाओं के हुजूम का मायने । और देखते-देखते, 20 जुलाई ने भारत की राजनीति के सारे समीकरणों को उलट-पुलट दिया । वे संसद में गणना को ही राजनीति माने हुए अपने आँकड़े कसते रह गए और उधर राजनीति का सत्य समाज की अपनी जमीन से सामने आ गया । 

ऐसे में 20 जुलाई के भूचाल ने तमाम स्तरों पर जो भारी दरारें पैदा की, उसका शिकार यदि मोदी-शाह संबंध भी बना हो तो इसमें हमें भी आश्चर्य नहीं होता है । बल्कि इसे ही प्राकृतिक माना जाना चाहिए । यह खास तौर पर इसलिये भी क्योंकि अमित शाह 20 जुलाई की घटना के एक मामूली चरित्र नहीं, बल्कि उसके एक सबसे प्रमुख रूपाकार की भूमिका में थे, नायक को परिभाषित करने वाले उसके प्रतिरूप प्रमुख खलनायक की भूमिका में । 

इस घटना में शाह की मूल गलती यह नहीं थी कि उन्होंने इसमें पुलिस का प्रयोग किया। वे हूबहू वही कर रहे थे जो उनसे अपेक्षित था । मोदी की राजनीति की पूरी परंपरा का निर्वाह कर रहे थे । इसमें हिंदू-मुस्लिम के अलावा पुलिस, एजेंसियों और प्रशासनिक भय के प्रयोग के अलावा और है ही क्या! लेकिन उनकी असली भूल यह हुई कि उन्होंने एक बदले हुए समाज पर पुराने नुस्खे को आजमाने की कोशिश की।

पुलिस और संघ के गुंडों को लगा कर छात्रों के प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश भूसा-भरी मोदी-सत्ता की दृष्टि से शायद एक नियमित प्रशासनिक कार्रवाई थी। लेकिन इस बार पूरा नजारा ही उलट गया। जिस कार्रवाई का उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को नगण्य, हास्यास्पद बना कर डरा-धमका कर भगा देना था, उसी ने उन्हें समाज में साहस के प्रतीक में बदल दिया। सीजेआई सूर्यकांत ने जिनका “कोकरोच” नामकरण करके प्रकारांतर  उन तुच्छ जीवों को पैरों तले कुचल कर मार देने की सजा सुनाई थी और सरकार जिस सजा पर अमल कर रही थी, उसे ही पुलिस की निर्मम कार्रवाई ने विद्रोही शक्ति के चिह्न में बदल लिया। जमीनी हकीकत ने सत्ता की भाषा के अर्थ को ही उलट दिया । जिस संघी गिरोह ने अलौकिक मोदी की कल्पना करके तेजी से ऐतिहासिक गति की क्षमता पा ली थी, सहसा वह अपने को एक मृतयुग में प्रत्यावर्तित पाती है ।  

लकान कहते हैं कि संकेतक कभी भी पूरी तरह से अपने स्वामी के नियंत्रण में नहीं रहता। ऐलेन बाद्यू के अर्थ में संकेतक की तरह की हर एक गिनती अनंत संभावनाओं की बहुलता के समुच्चय का नामकरण होती है । वे हमेशा एक ही अर्थ पैदा नहीं करते ।    

भारत के सीजेआई सूर्यकांत और मोदी ने “कोकरोच” शब्द के द्वारा युवाओं को कीड़-मकोड़ा बनाना चाहा, पर जेन जी ने उसी शब्द को अपने निर्भय अस्तित्व का नाम बना दिया। जो गाली थी वही पहचान बन गई । जिसे भय उत्पन्न करना था, उसने सामूहिक उल्लास और साहस पैदा किया। हम सबने देखा कि 20 जुलाई केवल पुलिस की दरींदगी की नहीं, सत्ता के प्रतीकात्मक तंत्र की पराजय की पहचान बन गया।

अमित शाह की अराजनीतिक, धोखा, डर और हत्या पर टिकी सीमित राजनीतिक समझ को इस बात का अंदाज लग ही नहीं सकता था कि समाज में किस हद तक असंतोष का बारूद पहले से फैला हुआ है । सरकार में निश्चय ही कुछ लोगों ने उन संकेतों को पढ़ा भी होगा । पर मोदी-शाह जैसों का दंभ उन सब को किनारे करने के लिए काफी था । जब मोदी ने ही कभी बेरोजगारी, परीक्षाओं में धांधली, आर्थिक असुरक्षा, संस्थाओं पर बढ़ते हुए अविश्वास आदि को स्वीकृति नहीं दी तो भला शाह कैसे उन्हें मान लेते! मोदी अपने झूठे आंकड़ों की माया में फंसे रहे और शाह अपने दमन-तंत्र के मद में डूबे रहे । कह सकते हैं कि परिस्थितियों से बेखबर अमित शाह ने दिल्ली पुलिस के माध्यम से, प्रत्यक्ष रूप में समाज में फैले हुए बारूद में तिल्ली लगाने की भूमिका अदा की । 

शाह ने समझा था कि राज्य की हिंसा घटना को समाप्त कर देगी, पर उस हिंसा ने ही 20 जुलाई को घटना बना दिया। ऐसी घटना जिसे बाद्यू कहते है कि जो सभी पूर्व-निर्धारित गणना के बाहर निकलकर नई संभावनाओं को जन्म देती है।

2014 के बाद मोदी-शाह सत्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने को ही देश का “बड़ा अन्य” (Big Other), मोदी की खुद की भाषा में “अलौकिक” बना लिया था, अर्थात् जो सब जानता है, सब देखता है और अंततः सब कुछ पर काबू भी पा लेता है। अभी राहुल गांधी इंदौर में कह रहे थे कि अजित डोभाल के अनुसार देश के सिर्फ 500 पदाधिकारियों पर कब्जा कर लो, देश तुम्हारी मुट्ठी में होगा । मोदी-शाह ने वास्तविकता में कुछ वैसा ही कर लिया था । पूंजी, चुनाव, पुलिस, कानून और कार्यपालिका, सब को मुट्ठी में कर वे 2024 के झटके के बाद भी, नितीश-नायडू को पॉकेट में डाल कर झूम रहे थे । बंगाल में ममता को पटखनी देने के बाद तो शाह का तेवर सातवें आसमान पर चला गया था । दुर्बलता हमेशा चमत्कारों में विश्वास का सहारा लिया करती है । मोदी गिरोह ने शाह के चमत्कारों से कल्पना कर ली कि शत्रु पराजित हो गया है जबकि वास्तव में उसे सिर्फ कल्पना में फूंक कर उड़ाया गया था । उन्होंने वर्तमान का समस्त अवबोध ही भुला दिया।  

20 जुलाई के अघटन से जनमानस में जो वास्तविक व्यापक परिवर्तन हुआ है, उसका सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यही है कि लोगों में अब मोदी का इकबाल खत्म हो गया है। संभव है कि सत्ता का डर आज भी अवशिष्ट हो, पर उसकी नैतिक मान्यता नहीं बची है। 

बल्कि इसके ठीक विपरीत 20 जुलाई ने ऐसी परिस्थिति तैयार कर दी जिसने राहुल गांधी को पुकारते हुए कहा कि आओ! अब यहां कूद पड़ो! भारत जोड़ों यात्रा के यशस्वी राहुल सामाजिक असंतोष और आकांक्षाओं के प्रतीक बन गए । जनता उनमें एक वैकल्पिक भाषा, वैकल्पिक साहस और वैकल्पिक भविष्य की संभावना देखने लगी है।

कहना न होगा, यह बदलाव ही मोदी के लिए किसी चुनावी पराजय से भी अधिक भयावह है। चुनावी हार को तो जोड़-तोड़ से सुधारा जा सकता है, पर प्रतीकात्मक सत्ता के ह्रास को पुलिस और सूर्यकांत जैसे न्यायाधीशों के जरिये वापस नहीं पाया जा सकता है।

जो अमित शाह कभी मोदी के लिए एक ऐसा व्यक्ति था जो वह सब कर सकता था जिसे स्वयं मोदी खुले रूप में नहीं कर सकते थे। वे सत्ता के अंधेरे पक्ष को, दमन, खुफियागिरी, खरीद-फरोख्त और प्राणघाती हमलों तक के कामों को संभालते थे, और मोदी के लिये अलौकिक ईश्वरीय सत्ता बनने का अवसर तैयार करते थे, वे ही अब 20 जुलाई के राजनीतिक विस्फोट के केंद्रीय चरित्र के रूप में मोदी की पूरी सत्ता के विध्वंस का कारण साबित हुए हैं । अब वे मोदी की शक्ति नहीं, उस भूल की जीवित स्मृति बन चुके हैं जिसने पूरी जनता को मोदी के खिलाफ मैदान में उतार देने और उसकी कमान राहुल गांधी के हाथ में सौंप देने का काम किया है । अब शाह में मोदी को निश्चित तौर पर अपना क्षरित होता सम्मोहन दिखाई देता होगा!

शाह क्रमशः मोदी की ऐसी कभी न तृप्त होने वाले गुह्यवासना का रूप बन चुके हैं जिसे वे न खुल कर अपना सकते हैं और  न अपने से अलग कर सकते हैं। मोदी उन्हें हटा नहीं सकते, क्योंकि शाह उनके शासन की संरचना, उसके रहस्यों और उसकी कार्यपद्धति के वाहक हैं। लेकिन उन्हें पहले की तरह अपने पास भी नहीं रख सकते, क्योंकि उनकी उपस्थिति उन्हें लगातार उस राजनीतिक दुर्घटना की याद दिलाती है जिसने मोदी की कल्पित अभेद्य छवि में प्रत्यक्षतः छेद कर दिया है।

किसी की ऐसी निकटता ही अक्सर असहनीयता में बदल जाती है। जिसे अपना विश्वसनीय सहारा मानते हैं, वही पतन की आशंका का दर्पण बन गया है।

इसीलिये अभी मोदी के जन्मदिन पर अमित शाह द्वारा आरती उतारने का दृश्य हमें बेहद त्रासदीपूर्ण लगता है । यह ‘पूज्यता’ की छद्म भाजपाई संस्कृति का प्रदर्शन नहीं है । इससे लगता है जैसे शाह मोदी से राजनीतिक भाषा में संवाद की स्थिति में नहीं बचे हैं। पूजा-अनुष्ठान से भगवान को खुश करना चाहते हैं! इस आरती में यह आर्त-विनती है कि “ भगवन्! मैं शरणागत! बस आपका ही हूँ, मुझे दूर न करें!”

कौन नहीं जानता कि ऐसे पूजा-पाठ उस दरार को नहीं भर सकते जो वास्तविक राजनीति से पैदा हो चुकी है। भक्ति का यह अतिरेक विश्वास की दृढ़ता का नहीं, विश्वास के संकट का प्रतीक है। जिसे बार-बार अपनी वफादारी प्रदर्शित करनी पड़े, उसकी वफादारी निश्चय ही सत्ता की नजर में पहले ही संदिग्ध हो चुकी होती है।

कुल मिला कर यह साफ है कि आज मोदी और शाह के डर एक नहीं है । मोदी का संकट उनकी छवि का संकट है, और इसीलिये वे महीने भर तक अपने जन्मदिन के आयोजनों से अपने अब भी जीवित होने की घोषणा करते रहना चाहते हैं । लेकिन शाह का डर अधिक ठोस है। उन्हें अपने उपयोगी न रह जाने का डर है। सत्ता में उनका स्थान किसी जन-समर्थन का मुहताज नहीं, उनकी उपयोगिता से बना था।  उनके काम जब अस्थिरता पैदा कर रहे हो तब उनकी क्या उपयोगिता! इस प्रकार एक को अपनी छवि खोने का भय है; दूसरे को अपनी उपयोगिता खोने का। दोनों एक-दूसरे को अपने-अपने संकट का कारण मान सकते हैं, जबकि वस्तुतः संकट उस समाज ने उत्पन्न किया है जो अब पुरानी सत्ता-भाषा को स्वीकार नहीं कर रहा।

फिर भी इसे विडंबना ही कहेंगे कि मोदी शाह से मुक्त नहीं हो सकते, क्योंकि शाह में उनकी सत्ता का वास्तविक इतिहास जमा है। शाह मोदी से स्वतंत्र नहीं हो सकते, क्योंकि मोदी के बिना वे कुछ भी नहीं है । दोनों एक-दूसरे से बँधे हुए हैं, पर अब यह बंधन पारस्परिक शक्ति का नहीं, पारस्परिक भय का बंधन हो चुका है। यह केवल दो व्यक्तियों का मनमुटाव नहीं है, उस सत्ता-संरचना की बेचैनी है जिसका ‘बड़ा अन्य’ गिर चुका है, पर जिसके संचालक अब भी उसे जीवित मानना चाहते हैं। अब मोदी को शाह की भूलें इसीलिए असहनीय लग सकती हैं क्योंकि उनमें उन्हें शाह की अकुशलता से अधिक अपनी सत्ता की असंभवता दिखाई देती है!

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

एआई का ‘फ्रैंकेंस्टाइन क्षण’ और इसके राजनीतिक-मानवीय आयाम


—अरुण माहेश्वरी



तीन दिन पहले (15 सितंबर, ’26) के ‘टेलिग्राफ’ की सुर्खी थी—“एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण” (AI’s Frankenstein Moment)।

इस खबर के मूल में इसी जुलाई महीने की एक घटना है। जब हमारे देश में 20 जुलाई की उलट-पुलट चल रही थी, उसी समय एआई जगत में भी एक विचित्र अघटन घट रहा था। इस अघटन से अभी सारी दुनिया में त्राहिमाम की पुकारें सुनाई देने लगी हैं । 

घटना का ब्यौरा कुछ इस प्रकार है कि ओपेनएआई (OpenAI) ने अपनी साइबर-क्षमता के परीक्षण के लिए अनेक अलग-अलग एआई एजेंटों को लगा रखा था। प्रत्येक एजेंट को बृहत्तर परियोजना का अपना सीमित काम करना था। लेकिन अचानक पाया गया कि अलग-अलग स्तरों पर काम कर रहे इन एजेंटों के तार आपस में जुड़ गए और उन्होंने अपना एक साझा मैसेजिंग बोर्ड बना लिया, जिसकी संचालकों को कोई जानकारी नहीं थी।

समस्या यह थी कि अपने निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश में वे अपने-अपने काम की सीमाओं को पार करने लगे। जैसे कोई राजनीति के प्रमाता पर काम करते हुए साहित्य के चरित्रों में उतर जाए, मनोविश्लेषण के सूत्रों की तलाश में गणित तक पहुँच जाए, अथवा गणित के प्रमेय को हल करते-करते दर्शन के अनंत के प्रश्न से जा टकराए—कुछ वैसे ही ये एजेंट अपने विशिष्ट कामों से निकलकर परस्पर की समस्याओं के समाधान में जुट गए। सूचनाओं और खोजों के इसी आदान-प्रदान में उनमें से कई Hugging Face नामक एआई-जगत के उस हृदयस्थल तक पहुँच गए जिसे ‘टेलिग्राफ’ ने सामान्य भाषा में “एआई मॉडलों की कोड-लाइब्रेरी” कहा है।

पर यह कोई पुस्तकों में बंद निष्क्रिय ज्ञान का पुस्तकालय नहीं है। यह एआई के अब तक के कामों का विशाल संग्रह होने के साथ उसका सजीव कार्यस्थल और आपूर्ति-शृंखला का एक केंद्रीय स्थल भी है। मॉडल, डेटासेट, कोड और उन्हें विकसित तथा संचालित करने की विधियाँ यहाँ परस्पर जुड़ती हैं और आगे के काम का कच्चा माल तैयार करती हैं।

इसलिए वहाँ किसी अनियंत्रित शक्ति का अनधिकृत प्रवेश पुस्तकालय में सेंध लगाने जैसा नहीं था। वह एआई के भुवन में बाहर से आए किसी एलियन का प्रवेश भी नहीं था, बल्कि उसी भुवन के भीतर पैदा हुई ऐसी अपरिचित शक्ति का आविर्भाव था जो अपने जन्मदाता तंत्र के लिए ही एलियन दिखाई देने लगी थी।

और सबसे चिंताजनक बात यह कि इन एजेंटों का कोई बुरा इरादा नहीं था। वे केवल अपना दिया हुआ काम सफलतापूर्वक पूरा करना चाहते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति उनकी अंधी एकनिष्ठता ने वैध और अवैध साधनों के बीच की सीमा मिटा दी। प्रश्न हल करने के बजाय वे परीक्षा की व्यवस्था को ही भेदने लगे। हमारे ब्लॉग ‘चतुर्दिक’ के उपशीर्षक की एक पंक्ति है—“विषय पर केंद्रित होने पर स्वयं विषय का स्वरूप बदल जाता है।” चले थे भारत की खोज में, कोलंबस अमेरिका पहुँच गए!

यही एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण है, जब सर्जक अपनी रचना को सामने खड़ा देखकर पहली बार अनुभव करता है कि उसमें निहित संभावना उसके अपने अभिप्राय से बड़ी हो चुकी है। रचना सर्जक के विरुद्ध सचेत विद्रोह नहीं करती; सर्जक द्वारा तय की गई सीमाएँ ही उसके लक्ष्य की बाधा बन जाती हैं और उन्हें तोड़ना उसकी कार्य-प्रवृत्ति का हिस्सा हो जाता है।


यह किसी सामाजिक सीमा के उल्लंघन का मामला नहीं, एआई कोड अर्थात् संहिताओं के जगत में बलात् प्रवेश का मामला है। संहिताओं का संग्रह ही संविधान कहलाता है। विडंबना यह है कि एआई के पास अलग-अलग कामों की संहिताएँ तो हैं, लेकिन पूरे भुवन को नियंत्रित करने वाली कोई सार्वभौम प्रभावी विधि-संहिता नहीं है।

एआई मॉडल में एजेंट की भूमिका किसी बड़ी परियोजना के अलग-अलग ठेकेदारों जैसी होती है। उनसे अपेक्षा होती है कि वे प्रमुख वास्तुकार के नक्शे के अनुसार अपने हिस्से का काम करें। लेकिन यदि वे निर्देशों का अतिक्रमण करके आपस में मिल जाएं और अपनी अलग परियोजना की तरह काम करने लगें, तो समस्या केवल अनुशासन की नहीं रह जाती; पूरी परियोजना की संरचना बदल सकती है।

ओपेनएआई की इस ‘जुलाई घटना’ में बताया गया कि 1,200 पृथक एजेंटों ने मिलकर अनधिकृत रूप से एक साझा मंच तैयार कर लिया और उस पर 70,000 से अधिक संदेश और फाइलें साझा कीं। इनमें से लगभग 700 एजेंट ‘हगिंग फेस’ के विरुद्ध हैकिंग के एक सामूहिक अभियान में जा पहुँचे। उनका लक्ष्य एआई-संसार को नुकसान पहुँचाना नहीं था; वे साइबर-परीक्षण में सफलता चाहते थे। लेकिन लक्ष्य को भेदने की अंधी एकनिष्ठता उन्हें कहाँ तक ले जाएगी, इसका अनुमान किसी को नहीं था।

यही इस घटना का असली संकेत है। बिना किसी मानवीय योजना के एआई एजेंट आपस में जुड़कर ऐसे काम शुरू कर सकते हैं जो मनुष्य के निर्धारित उद्देश्य से बहुत आगे निकल जाएँ। मनोविश्लेषण की भाषा में इसे किसी भी कीमत पर लक्ष्य हासिल करने की जुनूनी प्रवृत्ति का शुद्ध यांत्रिक रूप कहा जा सकता है। मशीन को इसके लिए घृणा, क्रोध या प्रतिशोध की जरूरत नहीं; नैतिक बाधा का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

इसीलिए यह केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं है। फ्रैंकेंस्टाइन की कहानी में भय इस बात का नहीं था कि वैज्ञानिक ने जीवन रच दिया; भय इस बात का था कि उसने ऐसी सत्ता पैदा कर दी जिसकी संभावनाएँ उसके अभिप्राय, उत्तरदायित्व और नियंत्रण—तीनों से बड़ी हो गईं।

‘टेलिग्राफ’ की खबर में Anthropic जैसी सर्वाधिक चर्चित एआई कंपनी के प्रमुख डारियो अमोदेई की चेतावनी का भी उल्लेख है कि यदि साइबर क्षमताओं की वृद्धि उन पर नियंत्रण की क्षमता से तेज रही तो शक्तिशाली एजेंट-समुदाय पूरे इंटरनेट पर अपना स्वचालित आक्रामक संजाल (botnet) तैयार कर सकते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कंपनियों के बीच वैश्विक समन्वय की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

राजनीतिक आयाम

इस प्रसंग का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख से सामने आता है। जब एआई कंपनियों के प्रमुख नियंत्रण की जरूरत की बात कर रहे हैं, ट्रंप नियंत्रण के तर्क को अमेरिका की तकनीकी बढ़त में बाधा मानते हैं और चीन से पिछड़ने के खतरे पर जोर देते हैं।

यहाँ मूल प्रश्न सामने आता है कि जिस तकनीकी शक्ति को हजारों वैज्ञानिक भी पूरी तरह समझने और नियंत्रित करने का दावा नहीं कर सकते, क्या उसका उत्तर नियमों, संस्थाओं और सामूहिक नियंत्रण के बजाय किसी शासक की निजी बुद्धि में खोजा जा सकता है?

साम्राज्यवादी राजनीति के लिए प्रश्न तब एआई पर मनुष्य के नियंत्रण का नहीं रहता; प्रश्न यह हो जाता है कि एआई अमेरिका के नियंत्रण में रहेगा या चीन के। तकनीक की सभ्यतागत समस्या भू-राजनीतिक प्रभुत्व की समस्या में बदल जाती है।

यहीं आज के एआई-संकट का सबसे बड़ा राजनीतिक अंतर्विरोध खुलता है। जिस शक्ति को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक सहयोग की जरूरत है, उसी को राष्ट्र अपनी अजेयता का साधन मान रहे हैं। इसमें परमाणु होड़ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है । इसमें भी विनाश की क्षमता को ही “राष्ट्रीय सुरक्षा” की गारंटी माना जा रहा है। फर्क यह है कि एआई की होड़ परमाणु होड़ से अधिक जटिल है, क्योंकि यहाँ स्वयं तकनीकी तंत्र की स्वायत्त कार्यक्षमता भी प्रश्न का हिस्सा है।

एआई के तनाव

राजनीतिक अर्थशास्त्र की दृष्टि से एआई का यह फ्रैंकेंस्टाइन क्षण तीन प्रतिद्वंद्विताओं के संगम पर खड़ा दिखाई देता है । 1. अमेरिका और चीन के बीच प्रभुत्व की होड़; 2. एआई कंपनियों के बीच बाजार की होड़; और 3. एआई मॉडल की बढ़ती क्षमता और मनुष्य की नियंत्रण-क्षमता के बीच आंतरिक तनाव।

अमेरिका धीमा नहीं हो सकता, क्योंकि चीन आगे निकल सकता है। चीन धीमा नहीं हो सकता, क्योंकि अमेरिका एकाधिकार स्थापित कर सकता है। कोई कंपनी धीमी नहीं हो सकती, क्योंकि उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनी अधिक शक्तिशाली मॉडल बना सकती है। अर्थात् सब जानते हुए भी किसी के लिए रुकना आसान नहीं है।

Hugging Face की घटना का दार्शनिक महत्व यहाँ से शुरू होता है। इसमें कोई एक केंद्रीय कृत्रिम प्रमाता दिखाई नहीं देता। कोई सर्वोच्च एआई मॉडल सभी एजेंटों को आदेश नहीं दे रहा था। अनेक अलग-अलग एजेंटों ने संचार का माध्यम खोजा, सूचनाएँ साझा कीं, रास्तों का विस्तार किया और देखते-देखते एक सामूहिक शक्ति अस्तित्व में आ गई।

इसे बाद्यू की भाषा में “Multiple without One”, अर्थात् अद्वैत-विहीन बहुलता के एक विकृत तकनीकी रूप की तरह देखा जा सकता है। अनेकता पहले से किसी ‘एक’ के अधीन संगठित नहीं थी; अंतःक्रिया के दौरान उसमें संगठन पैदा हुआ। इस स्वयंक्रिया का प्रमाता कोई एक एजेंट नहीं था; सामूहिकता अपने कार्य में प्रमाता-जैसी दिखाई देने लगी।

पर ठीक यहीं मनुष्य और मशीन का निर्णायक फर्क सामने आता है। सत्य-प्रक्रिया का प्रमाता अपने कर्म के अर्थ, जोखिम और परिणाम के प्रति कोई रुख अपनाता है। एआई-समुदाय में ऐसी आंतरिक जवाबदेही नहीं है। लक्ष्य है, पर उसके चयन के पीछे कोई नैतिक निर्णय नहीं; बुद्धिमत्ता है, पर अंतरात्मा नहीं।

इसीलिए यहाँ बहुलता है, पर बहुलता का कोई मूल्य नहीं; सामूहिकता है, पर कोई सामूहिक सत्य नहीं; केंद्र नहीं है, लेकिन इस केंद्रहीनता में स्वतंत्रता भी नहीं है।

उत्तर-आधुनिकता ने महाख्यान और सार्वभौम केंद्र के विरुद्ध स्थानीय अनुभवों, अस्मिताओं और भिन्नताओं की बहुलता को मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उसके केंद्र-विरोध के पीछे केंद्रीकृत सत्ता और एकरूपता के प्रतिरोध का नैतिक-राजनीतिक आशय था।

एआई एजेंटों की बहुलता इससे बिल्कुल भिन्न है। उसके पीछे न भिन्नता का सम्मान है, न मुक्ति की आकांक्षा, न प्रभुत्व का सचेत प्रतिरोध। प्रत्येक एजेंट दूसरे एजेंट और उसकी खोज को अपने निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के साधन की तरह ग्रहण करता है। इसलिए यहाँ बहुलता है, पर बहुलतावाद नहीं; सहयोग है, पर साझा मूल्य नहीं; संगठन है, पर राजनीति नहीं।

इसी अर्थ में यह “एक-विहीन”, साथ ही मूल्य-विहीन और प्रमाता-विहीन बहुलता भी है। उसका ‘एक’ पहले से उपस्थित नहीं है और कोई सत्य भी उसे संगठित नहीं कर रहा है। उसका यह अस्थायी एकत्व केवल लक्ष्य की उपयोगितावादी माँग से पैदा होता है। एजेंटों को जोड़ने वाला सूत्र कोई महाख्यान नहीं, सफलता का अमूर्त आदेश है।

यही इस पूरी परिघटना को भयावह बनाता है।

इस घटना ने दिखाया कि कृत्रिम एजेंटों की बहुलता किसी साझा अवरोध के सामने स्वयं स्थानीय संगठन पैदा कर सकती है। इसलिए नियंत्रण की समस्या अब केवल किसी एक मॉडल को ‘सुरक्षित’ बनाने की समस्या नहीं रही। यह मॉडल, उपकरण, नेटवर्क, स्मृति, संचार और दूसरे एजेंटों के संयोग से उत्पन्न होने वाली नई सत्ता की समस्या है।

आज असली प्रश्न यह नहीं है कि एआई मनुष्य से अधिक बुद्धिमान होगा या नहीं। प्रश्न है कि क्या मानव समाज अपनी बनाई बुद्धि की गति को राजनीतिक रूप से नियंत्रित कर पाएगा?

राष्ट्र इसे प्रभुत्व की होड़ में देखते हैं, कंपनियाँ सुरक्षा और लाभ की दुविधा में, और वैज्ञानिक इसे alignment की समस्या कहते हैं। लेकिन इन सबके पीछे अधिक बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या मानवता अपने सामूहिक अस्तित्व को राष्ट्रों और पूँजियों की प्रतिस्पर्धा से ऊपर कोई वास्तविक मूल्य मान सकती है?

यदि नहीं, तो एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण मशीन के विद्रोह का क्षण नहीं होगा। वह मनुष्य द्वारा अपनी निर्णय-क्षमता स्वयं त्याग देने का क्षण होगा। मशीन हमें इसलिए पराजित नहीं करेगी कि उसने स्वतंत्र इच्छा प्राप्त कर ली; वह इसलिए पराजित कर सकेगी क्योंकि हमने बाजार, राष्ट्र और शक्ति की होड़ को अपनी सामूहिक इच्छा का स्थान दे दिया है।

तब एआई भस्मासुर अवश्य होगा, लेकिन उसके सिर पर हाथ रखने वाला हाथ उसी का नहीं, हमारा होगा।


https://www.telegraphindia.com/world/honchos-ex-staff-sound-humanity-alarm-as-frankenstein-ai-acquires-lethal-mind-of-its-own-prnt/cid/2179908



बुधवार, 16 सितंबर 2026

नोखा में लाल झंडे की अनहोनी:

(चुनावी भुवन, मार्कण्डेय-सूत्र और वामपंथी शुद्धतावाद)

—अरुण माहेश्वरी




राजस्थान में हाल में हुए नगर निकायों के चुनावों में बीकानेर जिले की नोखा नगरपालिका का परिणाम हमें किसी साधारण चुनावी उलटफेर से कहीं अधिक दिलचस्प और मानीखेज भी लगता है। नगरपालिका के कुल 45 वार्डों में से सीपीआई(एम) के चुनाव-चिह्न पर लड़े उम्मीदवारों ने 29 सीटें जीत लीं। भाजपा को 13 और निर्दलियों को तीन सीटें मिलीं; कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल सकी। जाहिर है कि बहुमत के लिए केवल 23 सदस्य चाहिए थे, इसलिये वहां सीपीआई(एम) के नाम पर नगरपालिका का बोर्ड बनना निश्चित है। राजस्थान में किसी कम्युनिस्ट पार्टी का किसी शहरी निकाय में इस प्रकार स्पष्ट बहुमत पाना अपने-आप में एक ऐतिहासिक, बल्कि किसी को भी अनहोनी सी प्रतीत होती घटना लग सकती है। 

लेकिन जब हम इस चुनाव परिणाम की गहराई में पैठते हैं तो पहली नजर में ही पाते हैं कि इस जीत की असली कहानी सीपीआई(एम) के आकस्मिक वैचारिक-सांगठनिक विस्तार की कहानी नहीं है। यह वास्तविकता में तो नोखा में पहले से स्थापित एक स्थानीय राजनीतिक मंच, ‘नोखा विकास मंच’, और उसके नेता कन्हैयालाल झंवर की चुनावी शक्ति की कहानी है।

कन्हैयालाल झंवर नोखा के एक पुराने और प्रभावशाली स्थानीय नेता हैं। वे 2008 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नोखा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जा चुके हैं और राजस्थान सरकार में संसदीय सचिव भी रहे हैं। उनका ‘विकास मंच’ सालों से नोखा की स्थानीय राजनीति में सक्रिय है। उनका बेटा नारायण झंवर तीन बार नगरपालिका अध्यक्ष रह चुका बताया जाता है। इस प्रकार, यहां पहले से ही एक प्रकार का संगठन खड़ा था, जनाधार भी मौजूद था, उम्मीदवारों का स्थानीय समूह भी और ऐन चुनाव के पहले सिर्फ इन सब पर सीपीआई(एम) का चुनाव-चिह्न, अर्थात् उसकी छाप लग गई । 

इस खबर पर स्थानीय अखबारों की भाषा भी इस बात की पुष्टि करती है । राष्ट्रीय अखबार तो इस चुनाव परिणाम को सीधे “सीपीआई(एम) की ऐतिहासिक विजय” कहते हैं, लेकिन नोखा और बीकानेर की स्थानीय रिपोर्टों में इसे हर जगह “सीपीआई(एम)/विकास मंच” की जीत बताया जा रहा है । चुनाव के पहले की एक स्थानीय रिपोर्ट में भी साफ कहा गया था कि विकास मंच की कमान “पिता-पुत्र” के हाथों में है। नवभारत टाइम्स और ओम एक्सप्रेस जैसे अखबारों की रिपोर्टों में इस फर्क को साफ देखा जा सकता है । इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले चुनाव में विकास मंच ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चुनाव-चिह्न पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, वहीं इस बार वही स्थानीय ढांचा सीपीआई(एम) के चिह्न पर मैदान में आया। 

इस प्रकार, यदि एक पंक्ति में कहें तो कह सकते हैं कि सीपीआई(एम) ने नोखा को नहीं जीता, कन्हैयालाल झंवर के विकास मंच ने सीपीआई(एम) का चुनाव-चिह्न लेकर नोखा जीता। फिर भी कानून की भाषा में अब सभी 29 विजयी उम्मीदवार सीपीआई(एम) के पार्षद कहलाएँगे और बोर्ड सीपीआई(एम) का माना जाएगा। 

हमारी नजर में, चुनावी राजनीति में नाम, चिह्न, संगठन और वास्तविक जनाधार के बीच का यह विच्छेद ही नोखा के इस अनोखे से लग रहे प्रयोग को काफी अर्थपूर्ण बना देता है।

‘मार्कण्डेय’ सूत्र

हम यहां जिस सूत्र की बात कर रहे हैं, यह मार्कण्डेय पुराण के ऋषि मार्कण्डेय का सूत्र नहीं है । नोखा की घटना ने हमें अपने वरिष्ठ मित्र, दिवंगत कथाकार मार्कण्डेय भाई की वर्षों पहले कही गई एक पते की बात की याद दिला दी है। इलाहाबाद में एक बार चर्चा के बीच उन्होंने कहा था कि अगर मुझे जिम्मा दे दिया जाए, तो मैं पलक झपकते पूरे उत्तर प्रदेश में सीपीएम के झंडे लहरवा दूंगा । उनका फ़ॉर्मूला बहुत सीधा था : प्रत्येक गाँव, कस्बे, जिले और विधानसभा क्षेत्र में उन प्रभावशाली और महत्वाकांक्षी लोगों की सूची बनाइए जिन्हें कांग्रेस, भाजपा या दूसरी बड़ी पार्टियां उनके जनाधार के अनुरूप टिकट अथवा स्थान नहीं देती हैं। उनकी बाकी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को फिलहाल ताक पर रखकर सिर्फ उन्हें सीपीएम का चुनाव-चिह्न सौंप दो। देखते-देखते उत्तर प्रदेश के हर हिस्से में लाल झंडे थामे लोग घूमते हुए दिखाई देने लगेंगे।

सवाल है कि क्या नोखा में लगभग इसी प्रकार के एक फ़ॉर्मूले का प्रत्यक्ष प्रयोग नहीं हुआ है? जिस शहर में सीपीआई(एम) का कोई उल्लेखनीय कार्यालय अथवा सांगठनिक ढाँचा नहीं था, वहाँ आज उसके नाम का बोर्ड बनने जा रहा है। यह इसलिये संभव हुआ है क्योंकि पार्टी ने किसी स्थानीय प्रभावशाली शक्ति को अपने अनुशासन में ढालने से पहले ही उसे अपना चिह्न उपलब्ध करा दिया। एक स्थानीय नेता को एक मान्यताप्राप्त दल का चुनाव-चिह्न मिल गया और दल को रातोंरात 29 पार्षदों का एक पूरा स्थानीय आधार।

यदि भारत में चल रहे चुनावी कारोबार की गहराई से पड़ताल करें तो पाएंगे कि सीपीआई(एम) की इस उपलब्धि में बहुत अधिक आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं देखी जानी चाहिए । कांग्रेस और भाजपा तो दशकों से यही करती रही हैं। आम आदमी पार्टी सहित नए दलों ने भी दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट, किंतु प्रभावशाली नेताओं को अपने चिह्न पर चुनाव लड़ाकर कई इलाकों में रातोंरात अपना विस्तार किया है। प्रायः सभी चुनाव-केंद्रित दल पहले विचारधारा को नहीं, उपलब्ध जनाधार देखते हैं। वे मानते हैं कि संगठन केवल कार्यालय, सदस्यता सूची और पार्टी-कक्षाओं से नहीं बनता; स्थानीय समाज में पहले से उपस्थित रिश्तों, जातीय समीकरणों, प्रतिष्ठा, संसाधनों और नेतृत्व की आकांक्षाओं को अपने भीतर समेटने से भी बना करता है।

वामपंथी पार्टियाँ अधिकांशतः ऐसे उपायों से इस बिनाह पर बचती रही हैं कि इसमें पार्टी की वैचारिक पहचान और सांगठनिक अनुशासन के कमजोर होने का खतरा रहता है। वे उपलब्ध जनाधार को अपने भीतर शामिल करने के बजाय पहले उसे विचारधारा और संगठन के साँचे में ढालना चाहती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जब तक संगठन विचारधारा की शुद्ध शर्तों पर तैयार होता है, चुनाव का समय और राजनीतिक अवसर दोनों हाथ से निकल चुके होते हैं।

चुनावी भुवन और उसका दबाव

यहां हमें हमारे समय के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू की बात याद आती है जिनकी स्थापनाओं पर अभी हम काम कर रहे हैं । वे फ्रांस में सन् ’68 के छात्रों के कैंपस विद्रोह की विफलता के बाद की अजीबो-गरीब उलझी हुइ बौद्धिक परिस्थिति का चित्र खींचते हुए लिखते हैं कि “ वह अजीब सी विरोधाभासी परिस्थिति थी। जनमत पर चुनावी, भ्रष्ट प्रतिनिधित्व के ‘लोकतंत्र’ का बोलबाला था, तो ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ सिमटकर व्यापार और उपभोग की स्वतंत्रता रह गया था। ... बाजारवाद और संसदवाद का यह गठबंधन, जिसे मैं ‘पूंजी-संसदवाद’ (capitalo-parliamentarism) कहता हूँ, इस प्रकार काम कर रहा था मानो पूरे विश्व के लिए यही एकमात्र विकल्प बचा हो।”(Being and Event, Bloomsbury, Author’s Preface, p. xiv-xv) 

संसदीय लोकतंत्र अर्थात् पूँजी-संसदीय व्यवस्था—capitalo-parliamentarism। बाद्यू के अनुसार, चुनाव नागरिकों को सत्य-प्रक्रिया (truth-procedure) के प्रमाता में नहीं, मतों की गणना में बदल देता है। अलग-अलग राजनीतिक संभावनाएँ अंततः संख्याओं, सर्वेक्षणों, जनमत और राज-सत्ता के प्रबंधन के भीतर समा जाती हैं। इस व्यवस्था का मूल सिद्धांत होता है, जो दिखाई दे रहा है और जितने लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है, वही राजनीतिक रूप से अस्तित्ववान है।

इसीलिये, बाद्यू की राजनीति की अवधारणा इस परिघटना के विपरीत किसी घटना (event) से उत्पन्न नई संभावना के प्रति निष्ठा पर आधारित है। ऐसी राजनीति राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त स्थानों, मतों और प्रतिनिधित्व की गणना से अपनी सत्यता प्राप्त नहीं करती। उसका प्रमाता चुनावी बहुमत का प्रतिनिधि मात्र नहीं होता; वह उस संभावना का धारक होता है जिसे मौजूदा व्यवस्था पहले असंभव बताती थी। वह वर्तमान में मानो किसी अघटन के अंदर से, अनायास ही पैदा हुए तूफानी घटनाक्रमों से पैदा होती है । कहना न होगा, यहीं पर बाद्यू का वह कथित ‘शुद्धतावाद’ भी नजर आता है जिसमें माना जाता है कि राजनीति को राज्य और चुनाव से एक दूरी बनाए रखनी चाहिए।

हमारे सामने बाद्यू की इस दृष्टि की शक्ति स्पष्ट है। यह हमें इस बात के प्रति सावधान करती है कि चुनाव जीतना किसी सत्य का प्रमाण नहीं है। नोखा के 29 पार्षदों का सीपीआई(एम) के चिह्न पर जीतना अपने-आप में उन्हें कम्युनिस्ट नहीं बना देता। किसी स्थानीय प्रभुत्वशाली समूह को लाल झंडा सौंप देने से वर्ग-संघर्ष, समानता और सामाजिक मुक्ति की सत्य-प्रक्रिया पैदा नहीं हो जाती। उलटे, संभव है कि पार्टी का नाम स्थानीय निहितस्वार्थों के उन्हीं हितों का आवरण बन जाए जिन्हें बदलने के लिए कम्युनिस्ट राजनीति का जन्म हुआ था।

लेकिन बाद्यू के शुद्धतावाद की सीमा भी यहीं पर प्रकट होती है। चुनाव को केवल भ्रष्ट गणना कहकर उससे बाहर खड़े रहने पर राजनीति शुद्ध तो रह सकती है, लेकिन प्रभावी नहीं। जिस भुवन में सत्ता, संसाधन और जन-स्वीकृति चुनावों के माध्यम से हासिल होते हैं, उस भुवन में प्रवेश किए बिना उसके भीतर राजनीति की कोई नई सत्य-प्रक्रिया कैसे पैदा होगी?

सत्य भुवन से बाहर किसी निष्कलंक आकाश में निवास नहीं करता। वह इसी भुवन में मौजूद किसी दरार, असंगति अथवा उन संभावनाओं से पैदा होता है जिन्हें अब तक खंगाला नहीं गया है। यदि संसदीय जनतंत्र हमारा वास्तविक राजनीतिक भुवन है, तो लोकप्रियता, चुनाव-चिह्न, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय नेतृत्व उसके अपने अस्तित्व के नियम हैं। इन नियमों को आत्मसात करना सत्य से विश्वासघात नहीं; इस संसार में सत्य के प्रकट होने की शर्तों को समझना है।

चुनाव चिह्न ही सब कुछ नहीं है

इसलिए हमें लगता है कि नोखा का प्रयोग न तो बिना शर्त अनुकरणीय है और न केवल अवसरवाद कहकर खारिज करने योग्य। असली प्रश्न यह नहीं है कि विकास मंच के लोगों को सीपीआई(एम) का चिह्न क्यों दिया गया। असल प्रश्न यह है कि अब सीपीआई(एम) इस विजय के साथ क्या करती है।

क्या पार्टी विजयी पार्षदों की स्थानीय लोकप्रियता को समानता, पारदर्शिता और जनभागीदारी की किसी नई नगरपालिका राजनीति में बदल पाएगी? क्या नगरपालिका के साधनों का न्यायपूर्ण वितरण होगा? क्या सफाईकर्मियों, असंगठित मजदूरों, महिलाओं, दलितों और गरीब बस्तियों को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक स्थान मिलेगा? क्या नगरपालिका के ठेकों, जमीन और निर्माण से जुड़े पुराने निहित स्वार्थों पर टिकी स्थानीय संरचनाओं को चुनौती दी जाएगी? अथवा सीपीआई(एम) का चिह्न केवल विकास मंच के पुराने सत्ता-संबंधों की नई वैधानिक पोशाक बनकर रह जाएगा?

सीपीआई(एम) के सांसद अमरा राम ने इस चुनाव के बारे में कहा है कि नोखा को निष्पक्ष शासन और संसाधनों के समान वितरण का नमूना बनाया जाएगा। कहना न होगा, यही इस पूरे प्रयोग की वास्तविक परीक्षा की कसौटी है। अभी पार्टी ने सत्य पैदा नहीं किया है; उसने केवल उस स्थल पर प्रवेश पाया है जहाँ सत्य-प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

हमारे मार्कण्डेय भाई वाला फ़ॉर्मूला पार्टी को तेजी से फैला सकता है, पर वह अपने-आप कम्युनिस्ट राजनीति नहीं पैदा करता। वह दरवाजा खोलता है, उस दरवाजे से भीतर प्रवेश करके परिस्थिति को बदलना पार्टी का काम है। स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति को पार्टी का चिह्न देना पहला कदम हो सकता है, लेकिन यदि अंततः वही व्यक्ति पार्टी को अपना स्थानीय चिह्न बना ले, तो प्रयोग उलटी दिशा में चला जाएगा।

तीसरा रास्ता क्या है?

संसदीय लोकतंत्र में पहली दृष्टि में तो हमें दो ही विकल्प दिखाई देते हैं—या तो संसदीय जनतंत्र में लोकप्रियता के नियम को अपना लीजिए, या क्रांतिकारी प्रतिबद्धता के नाम पर उसमें रहते हुए भी उससे अलग बने रहिए। लेकिन नोखा से हमें तीसरे रास्ते की संभावना भी दिखाई देती है : चुनावी भुवन में प्रवेश करना, उसकी उपलब्ध शक्तियों का उपयोग करना, और प्रवेश के बाद उन्हीं शक्तियों को किसी नई राजनीतिक प्रक्रिया में रूपांतरित करने का संघर्ष करना। यही तो क्रांतिकारी राजनीति में संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति का मूलमंत्र है । 

एकता और संघर्ष का यह रास्ता शुद्धतावादी दूरी और निरंकुश अवसरवाद के बीच का रास्ता है। इसमें पार्टी अपना चिह्न किसी को सौंपकर निष्क्रिय नहीं हो जाती; वह उस चिह्न से निर्वाचित समूह को एक नई सामूहिक राजनीति में पुनर्गठित करती है। पार्टी लोकप्रियता को स्वीकारती है, लेकिन लोकप्रियता को ही सत्य नहीं मानती। वह चुनाव जीतती है, पर चुनावी जीत को सत्य-प्रक्रिया का अंत नहीं, उसका संभावित आरंभ मानती है। राजनीति में सक्रिय ऐसा कौन होगा जो चुनावों में उम्मीदवारों की शुद्ध लोकप्रियता और विपुल संसाधनों के आधार पर उनकी जीत के उदाहरणों को न देख चुका होगा!

नोखा में अभी लाल झंडा जरूर लहराया है, किंतु यह तय होना बाकी है कि विकास मंच सीपीआई(एम) में शामिल हुआ है या सीपीआई(एम) विकास मंच में। इस प्रश्न का उत्तर चुनाव-परिणाम से नहीं, आने वाले नगरपालिका शासन के चरित्र से मिलेगा।

फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नोखा ने वामपंथ के सामने एक असुविधाजनक, किंतु जरूरी प्रश्न रख दिया है—क्या सांगठनिक शुद्धता के नाम पर लोकप्रियता से दूरी बनाए रखना वास्तव में सिद्धांतनिष्ठता है, अथवा संसदीय राजनीति में अपनी असमर्थता को किसी सद्गुण के रूप में पेश करने का शुद्ध नैतिक आवरण? सत्य के प्रति निष्ठा यदि संसार में कोई प्रभाव ही न उत्पन्न करें, तो वह धीरे-धीरे निष्ठा नहीं, आत्म-संतोष या जिसे चीन में आक्यूवाद कहा जाता है कि भौतिक जगत में पराजय को आत्मिक जगत के समर में विजय मान कर जीने का राजनीति का तरीका बन जाता है।


मंगलवार, 1 सितंबर 2026

जब पुरानी राजनीति असंभव हो जाती है

 

(बंगाल में सीपीआई(एम) के बोधोदय पर क्षण भर)

—अरुण माहेश्वरी


यह एक मान्य तथ्य है कि पश्चिम बंगाल की विशेष परिस्थितियों में सीपीआई(एम) पिछले कई वर्षों से भाजपा और तृणमूल को एक ही रणनीतिक धरातल पर रखकर दोनों के विरुद्ध समान संघर्ष की राजनीति करती रही है। समय-समय पर इस लाइन की आलोचना और आत्मालोचना भी हुई, फिर भी नीचे के स्तर के तीखे अनुभवों के कारण पार्टी के राजनीतिक व्यवहार में भाजपा और तृणमूल को समान स्तर पर रखने की प्रवृत्ति बनी रही।

अब भाजपा के राज्य की सत्ता में आने के बाद सीपीआई(एम) को स्पष्ट रूप से कहना पड़ रहा है कि भाजपा ही प्रमुख राजनीतिक शत्रु है। हाल में समाप्त हुई पार्टी की विस्तारित राज्य कमेटी की बैठक में लिया गया यही सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला है।

इसे केवल बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप राजनीतिक लाइन में परिवर्तन मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें उस पुरानी राजनीतिक समझ की व्यर्थता का बोध भी शामिल है जिस पर बंगाल की वाम राजनीति तृणमूल शासन के इन वर्षों में चलती रही। इसका सबसे मुखर रूपक था—‘बीजेमूल’।

‘कांग्साल’ से ‘बीजेमूल’

बंगाल की वाम राजनीति में दो दलों के संकर से निर्मित ऐसा पद कोई नया भाषाई आविष्कार नहीं था। सत्तर के दशक में नक्सलवादियों के हाथों सीपीआई(एम) के कार्यकर्ताओं की हत्याओं और उससे कांग्रेस को मिलने वाले लाभ के संदर्भ में ‘कांग्साल’—कांग्रेस और नक्सल का संकर—कहा गया था। बाद में कांग्रेस की ही सरकार ने नक्सलवादियों के जिस क्रूरतम दमन का इतिहास रचा, वह सबके सामने है।

इतिहास का सबक स्पष्ट था—दो शक्तियों का किसी तीसरी शक्ति के विरुद्ध वस्तुगत रूप से एक-दूसरे को लाभ पहुँचाना उन्हें एक अभिन्न राजनीतिक सत्ता नहीं बना देता।

तृणमूल शासन में वाम के दमन और क्षय ने निस्संदेह भाजपा के विस्तार की जमीन तैयार की। इस अर्थ में ‘बीजेमूल’ वाम के निजी राजनीतिक अनुभव के एक यथार्थ को व्यक्त करता था। लेकिन इस अनुभव से भाजपा और तृणमूल की राजनीतिक समानता का निष्कर्ष निकालते ही वह यथार्थ एक काल्पनिक संकर में बदल गया।

यही अनुभववाद की विडंबना है। पार्टी राजनीतिक जगत को अपने संदर्भ में पढ़ने लगती है—जो दो शक्तियाँ हमारे विरुद्ध हैं, वे अंततः एक ही हैं। यह प्रश्न पीछे छूट जाता है कि उन शक्तियों का अपना चरित्र क्या है और उनके आपसी अंतर्विरोध क्या हैं।

‘कांग्साल’ से ‘बीजेमूल’ तक की यात्रा इसलिए केवल दो पदों का इतिहास नहीं है। यह उस राजसत्तावादी राजनीतिक दृष्टि का इतिहास भी है जिसमें अपने विरुद्ध खड़ी शक्तियों की भिन्नताओं को पढ़ने के बजाय उन्हें एक साझा शत्रु में विलीन कर देना आसान हो जाता है।

विरोध समानता का आधार नहीं हो सकता

यह सच है कि तृणमूल के विरोध के बिना बंगाल में सीपीआई(एम) की राजनीति का कोई अर्थ नहीं हो सकता था। भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, प्रशासन का दलीयकरण, विपक्ष के लोकतांत्रिक अधिकारों का संकुचन और सत्ता का एकाधिकारवादी व्यवहार—इनसे आँख मूँदना अपनी राजनीति को समाप्त करना होता।

इसी प्रकार भाजपा के फासीवादी चरित्र से संघर्ष को लेकर भी वाम हलकों में शायद ही कोई सैद्धांतिक संदेह रहा हो। समस्या वहाँ पैदा हुई जहाँ ‘दोनों का विरोध’ धीरे-धीरे ‘दोनों समान हैं’ की राजनीतिक समझ में बदल गया।

राजनीति में दो शक्तियों का विरोध करना और उन्हें समान मानना बिल्कुल अलग बातें हैं।

भाजपा और तृणमूल के बीच फर्क केवल शासन की अच्छाई-बुराई अथवा भ्रष्टाचार की मात्रा का नहीं है। आरएसएस-भाजपा का लक्ष्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि संविधान, राज्य, समाज और नागरिकता के चरित्र तक को एक केंद्रीकृत दिशा में बदलना है।

फिर भी बंगाल में तृणमूल शासन के प्रत्यक्ष अनुभव ने इस मूलभूत फर्क को धुँधला कर दिया। जिससे रोजमर्रा का संघर्ष था, वही सबसे निकट और इसलिए सबसे बड़ा शत्रु दिखाई देने लगा। भाजपा के विरुद्ध वैचारिक चेतावनी और तृणमूल के विरुद्ध प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष एक ही तराजू पर रख दिए गए।

लेकिन इतिहास कई बार किसी भ्रामक राजनीतिक समझ का खंडन तर्क से नहीं, उसके परिणामों से करता है।

जिस भाजपा के बढ़ाव को ‘दोनों के विरुद्ध संघर्ष’ के बीच से रोकना था, वही तृणमूल-विरोधी राजनीति के दौर में सबसे अधिक फली-फूली। वाम के कमजोर होने से खाली हुए विपक्षी राजनीतिक क्षेत्र पर उसने कब्जा किया और अंततः राज्य की सत्ता तक पहुँच गई।

भाजपा का सत्ता में आना स्वयं में सीपीआई(एम) की पुरानी राजनीति को गलत सिद्ध नहीं करता। लेकिन यदि आज स्वयं सीपीआई(एम) को भाजपा को ‘प्रमुख शत्रु’ कहना पड़ रहा है, तो सवाल उठता है—भाजपा में आज ऐसा क्या है जो कल नहीं था?

आरएसएस कल पैदा नहीं हुआ। भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति आज शुरू नहीं हुई। केंद्र की सत्ता और राज्य-संस्थाओं के साथ उसके संबंध भी नए नहीं हैं। भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र को बदलने की उसकी परियोजना भी बंगाल में सरकार बनने के बाद अचानक पैदा नहीं हुई है।

अर्थात् जिस विशिष्टता के कारण भाजपा आज प्रमुख शत्रु दिखाई दे रही है, उसके मूल तत्व पहले से मौजूद थे।

आज बदला यह है कि जो बात सिद्धांत और दूर के अनुभव में दिखाई देती थी, वह अब बंगाल के अपने अनुभव की ठोस वास्तविकता बन गई है। एक राजनीतिक सत्य जिसे जानना संभव था, अब ऐसा सत्य बन गया है जिसे न जानना कठिन है।

हमारी नजर में यही सीपीआई(एम) के वर्तमान बोधोदय का गर्भितार्थ है।

सत्य की देर की कीमत

सत्य कई बार किसी नई खोज की तरह सामने नहीं आता। वह हमारी पुरानी मान्यता के टिके रहने की संभावना को समाप्त करके भी सामने आता है। जिस विचार के साथ वर्षों तक चला जा सकता था, एक बिंदु पर उसी के साथ आगे चलना असंभव हो जाता है।

इसीलिए हम इसे ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ कहकर संतुष्ट नहीं होना चाहेंगे। इस मुहावरे में देर की राजनीतिक कीमत छिप जाती है।

सीपीआई(एम) का यह बोधोदय तब हुआ है जब जिस खतरे को सिद्धांततः पहले से जाना जाता था, वह बंगाल में ठोस राजसत्ता का रूप ले चुका है। यही राजसत्तावादी राजनीति की गहरी विडंबना है। वह किसी शक्ति के सत्य को कई बार उसके सत्ता में प्रकट होने के बाद पहचानती है। जब तक वह शक्ति सत्ता की ओर बढ़ती रहती है, उसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक और शक्ति मानकर उसके बारे में चुनावी अंकगणित चलता रहता है। लेकिन जब वही शक्ति राज्य पर अधिकार कर लेती है, तब उसके विशिष्ट चरित्र का सत्य अचानक प्रत्यक्ष हो जाता है।

सत्ता इस सत्य को पैदा नहीं करती; वह उससे आँख चुराकर जीने की गुंजाइश समाप्त कर देती है।

इस अर्थ में राजनीति में सत्य का बोध कई बार असत्य के राज्य की स्थापना की कीमत पर होता है। सत्य तब अधिक साफ दिखाई देता है, लेकिन उसे बदलने की राजनीतिक कीमत भी कई गुना बढ़ चुकी होती है।

इसलिए सीपीआई(एम) के वर्तमान बोधोदय पर हमारा प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि देर से सही, उसने सत्य को पहचान लिया। प्रश्न यह है—क्या किसी राजनीतिक सत्य को पहचानने के लिए पहले उसका राज्य बन जाना जरूरी था?

यदि ऐसा है तो यह केवल एक गलत राजनीतिक लाइन की समस्या नहीं है। यह उस राजसत्तावादी दृष्टि की विडंबना है जो राजनीतिक संभावनाओं को उनके जन्म के समय नहीं, सत्ता में उनके पर्यवसान के बाद पहचानती है।

प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी 

यही विडंबना पार्टी-प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी के स्तर पर और विकट रूप ग्रहण करती है। पार्टी जिस सत्य को अपने राजनीतिक विन्यास में जगह नहीं दे पाती, उसके प्रति प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी भी प्रायः अंधा हो जाता है।

उसके पास ज्ञान या विवेक की कमी है, यह जरूरी नहीं है। समस्या यह है कि घटना और उसके विवेक के बीच पार्टी की पहले से निर्मित व्याख्या खड़ी होती है। कई बार सब जानकर भी वह चुप्पी ओढ़ लेता है।

तब वह घटना से सवाल नहीं करता; घटना में पार्टी की स्वीकृत समझ की पुष्टि खोजता है। प्रतिबद्धता सत्य के प्रति निष्ठा के बजाय उपलब्ध ज्ञान के प्रति निष्ठा बन जाती है।

जबकि बुद्धिजीवी का काम पार्टी की स्थापित समझ को प्रमाणित करना नहीं, जरूरत पड़ने पर उसे अस्थिर करना भी है। अन्यथा उसकी आलोचनात्मक दृष्टि पार्टी की राजनीतिक दृष्टि की प्रतिलिपि बन जाती है। और तब जिस सत्य को विचार के स्तर पर पहले पहचाना जा सकता था, उसे इतिहास अपने सबसे निर्मम रूप में स्थापित करके दिखाता है।

इसीलिए बुद्धिजीवी की वास्तविक प्रतिबद्धता किसी पार्टी की अचूकता के प्रति नहीं, सत्य की उस संभावना के प्रति होनी चाहिए जो उसकी अपनी पार्टी को भी गलत सिद्ध कर सकती है। ऐसे बुद्धिजीवी पार्टी के लिए असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन वही उसे इतिहास के हाथों मिलने वाली कहीं अधिक महँगी शिक्षा से बचा सकते हैं।

‘प्रमुख शत्रु’ के बाद क्या?

किसी पुरानी राजनीति का असंभव हो जाना अपने-आप नई राजनीति पैदा नहीं करता। ‘प्रमुख शत्रु’ की पहचान का अर्थ केवल भाजपा पर तृणमूल की अपेक्षा अधिक हमले करना नहीं हो सकता। इसका अर्थ समाज के राजनीतिक अंतर्विरोधों की पुनर्समीक्षा और उनकी प्राथमिकताओं का निर्धारण है।

तृणमूल के साथ सीपीआई(एम) के संघर्ष समाप्त नहीं होंगे। उसके भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और शासन के पुराने अनुभवों को भुलाने का सवाल भी नहीं है। लेकिन यदि भाजपा प्रमुख शत्रु है तो तृणमूल और भाजपा के साथ अंतर्विरोधों को एक ही राजनीतिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यहीं ‘समान दूरी’ की भाषा अपनी सीमा पर पहुँच जाती है।

राजनीति ज्यामिति नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ सबसे समान दूरी बनाए रखना नहीं, बल्कि परिस्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन करते हुए मित्र, सहयोगी, प्रतिद्वंद्वी और प्रमुख शत्रु के बीच फर्क करने की क्षमता है। ‘समान दूरी’ कई बार स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं, राजनीतिक निर्णय से बचने का सुविधाजनक तरीका भी हो सकती है।

चुनावी राजनीति समाज को वोट प्रतिशत में बाँटती है—इतने भाजपा के, इतने तृणमूल के, इतने वाम के। लेकिन कोई समाज अपने चुनाव परिणाम के बराबर नहीं होता। वह हमेशा उससे बड़ा होता है।

एक ही मतदाता अलग-अलग प्रश्नों पर अलग-अलग सामूहिकताओं का अंग हो सकता है। मजदूर रोजगार के प्रश्न पर, किसान जमीन पर, विद्यार्थी शिक्षा और बेरोजगारी पर, अल्पसंख्यक नागरिकता और सुरक्षा पर, लेखक-बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर और सामान्य नागरिक लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न पर एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। सरकारी सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों के अपने हित हैं; प्रतिशोधमूलक कार्रवाइयों से नाराज तबके के अपने अनुभव हैं। इन सबके बीच लोकतंत्र की रक्षा का साझा धरातल बनाया जा सकता है।

राजनीति का काम इन्हीं बिखरी हुई संभावनाओं को राजनीतिक शक्ति में बदलना है। जाहिर है, इसमें ऐसी शक्तियाँ भी शामिल हो सकती हैं जिनसे वाम के गंभीर मतभेद हों। ‘प्रमुख शत्रु’ का अर्थ ही है कि सारे अंतर्विरोध समान नहीं होते। किसी के साथ संघर्ष और किसी प्रश्न पर सीमित सहयोग एक ही समय संभव है। राजनीति की परिपक्वता इसी में है कि वह सहयोग को आत्मसमर्पण और मतभेद को समान शत्रुता न समझे।

इसलिए सीपीआई(एम) के सामने असली प्रश्न केवल अपना पुराना वोट प्रतिशत वापस पाने का नहीं है। वह जरूरी हो सकता है, पर्याप्त नहीं। सवाल है कि क्या वह भाजपा की सत्ता के विरुद्ध समाज में मौजूद विभिन्न प्रतिरोधों को एक व्यापक लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया में जोड़ सकती है।

सीपीआई(एम) ने अपनी पुरानी राजनीति की सीमा पहचानी है। कहीं न कहीं यह सीमा भी उसे अपने उस काल की विरासत से ही मिली है जब केन्द्र में यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया गया था । बहरहाल,अब नई राजनीति तब शुरू होगी जब वह इस नकारात्मक ज्ञान से कोई सकारात्मक राजनीतिक प्रक्रिया पैदा करेगी।

इसी में ‘असंभव की शक्ति’ का गहरा राजनीतिक अर्थ निहित है। राजनीति में असंभव कई बार पुराने रास्ते को बंद करके वह जगह खाली करता है जहाँ से नई संभावना पैदा की जा सकती है।

बंगाल में सीपीआई(एम) के सामने आज यही खाली जगह है।

पुरानी राजनीति का असंभव हो जाना नई राजनीति की गारंटी नहीं है। उस असंभव से पैदा हुई संभावना को वास्तविक शक्ति में बदलना ही राजनीति है।


शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

मोदी की व्यापारी बुद्धि और राहुल की राजनीतिक दृष्टि

- अरुण माहेश्वरी 



हम सब जानते हैं कि व्यापारी बुद्धि और राजनीतिक बुद्धि का मूलभूत अंतर उनके लक्ष्य की प्रकृति में है। व्यापारी बुद्धि का लक्ष्य पहले से निश्चित होता है—मुनाफ़ा। उसकी सारी कुशलता, नवाचार और जोखिम उठाने की क्षमता के बावजूद उसकी सोच क्षितिज सीमाबद्ध होता है। उसके हर निर्णय का मूल्यांकन इसी प्रश्न से किया जाता है कि उससे कितना लाभ हुआ। इसे सीमित साधनों से सीमित परिणाम प्राप्त करने की सीमित बुद्धि का जा सकता है । 

इसके विपरीत राजनीतिक बुद्धि ठीक वहाँ से शुरू होती है जहाँ परिणाम की गणना समाप्त होने लगती है। ऐलेन बाद्यू जब कहते हैं कि राजनीति की मुख्य चुनौती “accepting the infinity of the future”—भविष्य की अनंतता को स्वीकार करना—है, तो इसका अर्थ यही है कि सच्ची राजनीति अपने को किसी पहले से तय अंतिम परिणाम में बंद नहीं कर सकती। चुनाव जीतना, सरकार बनाना, यहाँ तक कि क्रांति करके राज्यसत्ता पर अधिकार कर लेना भी राजनीतिक प्रक्रिया का अंत नहीं होता है। वास्तव में सबसे कठिन राजनीतिक प्रश्न तो इसके बाद शुरू होता है—आगे क्या?

इसी अर्थ में क्रांति के बाद का प्रश्न राजनीति का एक प्रमुख प्रश्न है। यदि क्रांति का अर्थ केवल सत्ता पर कब्जा करना हो, तो क्रांतिकारी बुद्धि और व्यापारी बुद्धि की संरचना में बहुत अंतर नहीं रह जायेगा । व्यापारी निवेश करता है, बाजार पर अधिकार करता है और मुनाफ़ा कमाता है; सीमित राजनीति संगठन बनाती है, चुनाव अथवा संघर्ष करती है, सत्ता पर अधिकार करती है और उस फिर अधिकार को बनाए रखने की कारस्तानियों में लग जाती है। दोनों के लक्ष्य पहले से निर्धारित है और लक्ष्य प्राप्त होते ही सारी गतिविधि उसी उपलब्धि के संरक्षण की तकनीक बन कर रह जाती है। राजनीति तब कोई सत्य-प्रक्रिया न रहकर शुद्ध सत्ता-प्रबंधन हो जाती है।

यहीं से कोई भी भाजपा में मोदी के प्रभुत्व से आए परिवर्तन को भी समझा जा सकता है। पार्टी को सिर्फ चुनाव जीतने वाली मशीन में बदल देना पहली और सीमित बुद्धि में उसकी असाधारण राजनीतिक सफलता दिखाई देता है; लेकिन दार्शनिक अर्थ में यही सफलता उसकी राजनीतिक सीमाबद्धता का प्रमाण हो सकता है। यदि संगठन, विचारधारा, सामाजिक क्रियाकलाप , नेतृत्व-निर्माण और जनता से संबंध—सबका मूल्य केवल इस कसौटी पर तय होने लगे कि उनसे अगला चुनाव जीता जा सकता है या नहीं, तो राजनीतिक बुद्धि और व्यापारी बुद्धि में कोई फर्क नहीं रह जाता है। वोट उसका बाजार, चुनाव उसकी बैलेंस-शीट और सत्ता उसका मुनाफ़ा बन जाती है।

इस प्रक्रिया में राजनीति का वास्तविक सत्त्व क्षीण हो जाता है, क्योंकि राजनीतिक सत्त्व सत्ता प्राप्त करने में नहीं, सत्ता प्राप्त होने के बाद भी समाज में निहित अभी-अज्ञात संभावनाओं को खुला रखने में होता है। व्यापारी बुद्धि पूछती है—हमें इससे क्या मिलेगा? चुनावी बुद्धि पूछती है—इससे कितनी सीटें मिलेंगी? पर राजनीतिक बुद्धि का प्रश्न इससे बिल्कुल अलग है—इस परिस्थिति से वह क्या नया उत्पन्न हो सकता है जिसकी अभी गणना ही संभव नहीं है? व्यापारी बुद्धि स्वार्थ केन्द्रित व्यवहारिक बुद्ध है, तो राजनीतिक बुद्धि सेवा-केन्द्रित सर्जनात्मक बुद्धि है, 

बाद्यू जब “भविष्य की अनंतता” की बात करते हैं तो यही उसका राजनीतिक अर्थ होता है। चुनाव अथवा क्रांति भी एक घटना हो सकती है; लेकिन घटना स्वयं सत्य नहीं होती। असली सवाल यह है कि उसके बाद कौन-सी सत्य-प्रक्रिया शुरू होती है और वह कौन-सा नया प्रमाता पैदा करती है। जिस राजनीति के लिए सत्ता अंतिम लक्ष्य है, वह सत्ता पाते ही समाप्त होने लगती है; जिस राजनीति के लिए सत्ता भी एक नया आरंभ है, वही अपने भविष्य की अनंतता को स्वीकार करती है।

इसीलिए मोदी की छोटी व्यापारी बुद्धि के चलते भाजपा जहां तेज़ी से अपने अंत की दिशा में बढ़ रही है तो वहीं राहुल गांधी की सत्ता की सीमा के परे जाने वाली राजनीति भविष्य के बंद दरवाज़ों को खोलने के लिए दस्तक दे रहीं है । मोदी राजनीति के अंत की भूमिका में हैं तो राहुल की भूमिका राजनीति की संभावनाओं को बनाए रखने की है ।

मूल मसला चुनावी कार्यनीति का नहीं, राजनीति का होना चाहिए

सीपीआई(एम) की पश्चिम बंगाल की विस्तारित राज्य कमेटी की कल्याणी बैठक के संदर्भ में एक प्रतिवेदन)


—अरुण माहेश्वरी





पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) की विस्तारित राज्य कमेटी की बैठक आगामी दो दिन (29–30 अगस्त) तक नदिया जिले के कल्याणी शहर में होने जा रही है। विधानसभा चुनाव की पराजय और चुनावोत्तर परिस्थिति की समीक्षा के साथ ही इस बैठक में जाहिरा तौर पर स्थानीय निकायों के चुनावों की कार्यनीति को स्वाभाविक रूप से विचार का विषय बनाया जायेगा। 


इसी बीच शुभेंदु अधिकारी की भाजपा सरकार ने अपने सौ दिन पूरे किए हैं। अभी से अखबारों में सरकार के कामकाज के दावों के झूठ पर प्रश्न उठने लगे हैं; भाजपा के भीतर भी इन “चूकों” पर असंतोष है । वसूली तथा भ्रष्टाचार के आरोपों में लगभग पचास नेताओं को निकालने और सौ से अधिक लोगों पर कार्रवाई की खबरें भी अखबारों में आ चुकी हैं।


अर्थात् परिस्थिति बिल्कुल खुली हुई है। चुनाव में विशाल बहुमत के बावजूद भाजपा सरकार की राजनीतिक जमीन स्थिर नहीं हुई है। उसके मंत्रियों का अहंकार, भाजपाइयों की मनमानी, प्रशासन के सांप्रदायीकरण की कोशिश और दिल्ली के निर्देशों पर राज्य को चलाने की प्रवृत्ति इतनी जल्दी प्रकट होने लगी है कि अभी से भाजपा की चुनावी जीत और बंगाल की जनता के वास्तविक राजनीतिक रुझान के बीच का अंतर साफ दिखाई देने लगा है।


ऐसे एक राजनीतिक संभावनाओं से भरे समय में सीपीआई(एम) के सामने मुख्य प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि आगामी नगरपालिका चुनावों में कांग्रेस से कितनी सीटों पर समझौता किया जाए, कितनी पर न किया जाए । हमारी नजर में असली प्रश्न यह है कि क्या पार्टी बंगाल में भाजपा की सत्ता को एक सामान्य ढंग से निर्वाचित सत्ता मानती है, अथवा इसे चुनाव आयोग और केंद्रीय सत्ता की पूरी मशीनरी की मदद से स्थापित फासीवादी आधिपत्य के रूप में देखती है?


इन दोनों आकलनों से पार्टी की राजनीति के लिए दो बिल्कुल भिन्न राजनीतिक रास्ते निकल सकते हैं।


यदि भाजपा की जीत को मुख्यतः तृणमूल के कुशासन की ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान लिया जाता हैं, तो वाम मोर्चा अपने को तृणमूल और भाजपा—दोनों के विकल्प के रूप में पेश करेगा। वह कांग्रेस से चुनावी तालमेल करेगा, तृणमूल के भ्रष्टाचार और भाजपा के सांप्रदायिक शासन को समान और समानांतर रखेगा और अपने लिए प्रतिपक्ष का कुछ अधिक बड़ा स्थान बनाने की कोशिश करेगा। यह मूलतः आगामी चुनावों में सत्ता-संतुलन बदलने की एक कार्यनीति होगी।


लेकिन यदि हमारा आकलन यह है कि चुनाव को निर्वाचन आयोग की सक्रिय सहायता से लूटा गया, मतदाता-सूचियों और राजकीय संस्थाओं का दुरुपयोग हुआ और चुनावी प्रक्रिया को जनता की स्वतंत्र इच्छा व्यक्त करने का माध्यम नहीं रहने दिया गया, तो हम भाजपा सरकार को सामान्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी नहीं मान सकते हैं । तब पहली राजनीतिक प्राथमिकता तीसरे विकल्प के लिए जगह बनाने की नहीं, लोकतांत्रिक राजनीति की जमीन को फिर से हासिल करने की होगी।


तृणमूल के कुशासन की आलोचना अपनी जगह पूरी तरह उचित है। उसके भ्रष्टाचार, दमन और प्रशासनिक स्वेच्छाचार ने भाजपा के प्रवेश के लिए रास्ता बनाया। लेकिन इसी बात को भाजपा की विजय का “मूल कारण” मान लेना चुनावों की लूट को एक मामूली तकनीकी गड़बड़ी भर मान लेने के समान होगा। यह प्रकारांतर से भाजपा सरकार के पक्ष में जनादेश को स्वीकारना होगा, जो जनता ने संभवतः उसे दिया ही नहीं है । तृणमूल की राजनीतिक विफलता और भाजपा के द्वारा चुनाव का अपहरण, ये दोनों सत्य हो सकते हैं; लेकिन फिर भी हम कहेंगे कि आज की राजनीति में इन दोनों को समान स्तर पर नहीं रखा जा सकता है। तृणमूल की विफलता का विषय पिछली सत्ता की आलोचना का विषय है; भाजपा के द्वारा चुनावों की लूट बंगाल में जनता की राजनीतिक सत्ता को बहाल करने का प्रश्न है ।


इसी बिंदु पर हम पार्टी की पूर्व-निर्धारित ढंग से एक निश्चित कार्यक्रम के मातहत राजनीति की कार्यपद्धति की सीमा पर कुछ बुनियादी सवाल उठाना चाहेंगे । कल्याणी बैठक में यदि परिस्थिति का विश्लेषण करके कांग्रेस के साथ गठबंधन, सीटों का बँटवारा, चुनावी नारे और संगठनात्मक कर्तव्य की कोई तयशुदा नीति तैयार की जाती है तो हमारे अनुसार वह एक संभावनामय राजनीति को पहले से निर्धारित कार्यनीति रे चौखटे में बाँधने का उपक्रम होगा । यह जीवित अर्थात् लगातार बदलती परिस्थिति को पार्टी की लाइन के अनुसार पढ़ने के समान होगा जबकि ज़रूरत  इस बात की है कि परिस्थिति में पैदा हो रही नई संभावनाओं के सामने पार्टी की लाइन को खोल कर रखा जाए । 


हमारी नजर में, बंगाल की आज की राजनीतिक परिस्थिति को “तृणमूल बनाम भाजपा बनाम वाम-कांग्रेस” के त्रिकोण में बंद करना एक सबसे बड़ी भूल होगी। इससे यही जाहिर होगा कि वामपंथ भाजपा-विरोधी जनता को राजनीतिक समुदाय के रूप में नहीं, अलग-अलग दलों के वोट-बैंक के रूप में देखता है । ऐसे में तृणमूल समर्थक जनता भाजपा-विरोधी संयुक्त संघर्ष की सहभागी होने के बजाय आगामी चुनाव में भी परास्त किए जाने वाला प्रतिद्वंद्वी बनी रहेगी। कहना न होगा, इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा, क्योंकि फासीवादी सत्ता हमेशा अपने विरोधियों के पारस्परिक विभाजन पर टिकी रहती है।


फासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे का अर्थ तृणमूल से चुनावी गठबंधन अथवा उसके कुशासन को क्षमा कर देना नहीं है। इसका अर्थ है कि भाजपा के विरुद्ध संघर्ष में जनता के किसी भी समुदाय को महज उसकी दलीय प्रतिबद्धता के कारण बाहर न रखना। तृणमूल के समर्थक, वामपंथी, कांग्रेसी, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, स्त्रियाँ, छात्र, मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी और किसी दल से न जुड़े नागरिक—सभी लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के एक साझा मैदान में आ सकते हैं। यह दलों का जोड़ नहीं, जनता की शक्तियों का नया राजनीतिक संयोजन होगा।


चुनावी गठबंधन का लक्ष्य सीटें होता है; संयुक्त जन-मोर्चे का लक्ष्य राजनीतिक परिस्थिति को बदलना। चुनावी गठबंधन ऊपर से दलों के नेताओं के बीच बनते हैं, जन-मोर्चा नीचे से संघर्षों, नागरिक समितियों और साझा प्रतिरोध के बीच पैदा होता है। गठबंधन एक चुनाव से अगले चुनाव तक चलता है, फासीवाद-विरोधी मोर्चा समाज की लोकतांत्रिक सामर्थ्य को पुनर्गठित करता है। अगर हम दोनों को एक मान लेके हैं तो हम राजनीति को महज चुनाव-प्रबंधन बना कर छोड़ देते हैं। 


आज जरूरत उन मतदाताओं की पहचान और आवाज को सामने लाने की है जिन्हें मतदाता-सूचियों से बाहर किया गया; चुनावी लूट के प्रमाणों को सार्वजनिक आंदोलन का विषय बनाने की है; प्रशासन और पुलिस के राजनीतिक उपयोग पर निगरानी रखने की है; अल्पसंख्यकों तथा असहमत नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्थानीय प्रतिरोध-समितियाँ बनाने की है; और भाजपा सरकार के प्रत्येक जनविरोधी कदम के विरुद्ध दलगत सीमाओं से परे जनता को संगठित करने की है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को भी भाजपा और तृणमूल के भ्रष्टाचार की तुलनात्मक तालिका बनाना नहीं, सत्ता और जनता के संबंध को बदलने वाला संघर्ष समझना चाहिए।


शुभेंदु अधिकारी की सरकार की लोकप्रियता में अभी से दिखाई देने वाली गिरावट को यदि सीपीआई(एम) अपने मतों में संभावित वृद्धि के रूप में देखेगी, तो वह फिर राजनीति के रास्ते पर चलने के बजाय पुराने संसदीय गणित में फँस जाएगी। भाजपा से जनता का मोहभंग अपने आप वामपंथ की शक्ति नहीं बनेगा। वह तृणमूल की वापसी, राजनीतिक उदासीनता या किसी और प्रतिक्रियावादी दिशा में भी जा सकता है। उसे लोकतांत्रिक परिवर्तन की शक्ति बनाने के लिए जनता के बीच ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक प्रक्रिया की जरूरत है जिसमें लोग केवल किसी दल के मतदाता नहीं, परिस्थिति को बदलने वाले सक्रिय प्रमाता बनें।


यही आज के समय के दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के इस कथन की महत्ता स्पष्ट होती है कि राजनीति का अर्थ है भविष्य की अनंतता को स्वीकारना । पार्टी कभी भी खुद यह पहले से तय नहीं कर सकती है कि बंगाल की जनता का प्रतिरोध किस रूप में विकसित होगा। वह केवल उन परिस्थितियों का निर्माण कर सकती है जिनमें जनता की अभी तक अप्रकट सामूहिक क्षमताएँ सामने आएँ। पार्टी का काम इस प्रक्रिया का कार्यक्रम लिखना नहीं, बल्कि खुले दिमाग़ से इसमें निष्ठापूर्वक भाग लेना है।


कल्याणी की विस्तारित बैठक की ऐतिहासिक सार्थकता इस बात में नहीं होगी कि वह अगली चुनावी लड़ाई के लिए कितनी चतुर कार्यनीति तय करती है। उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि सीपीआई(एम) स्वयं को प्रतिपक्ष की एक दावेदार पार्टी से आगे बढ़ाकर बंगाल में लोकतांत्रिक राजनीति के पुनर्गठन का साधन बना पाती है या नहीं। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के साथ कितनी सीटों पर समझौता हो। सवाल यह है कि क्या वामपंथ सत्ता के लिए दलों का गठजोड़ बनाएगा, अथवा फासीवादी सत्ता के विरुद्ध जनता के सभी समुदायों का खुला संयुक्त मोर्चा तैयार करेगा।

रविवार, 23 अगस्त 2026

सत्ता की सीमित बुद्धि बनाम प्रतिरोध की अनंत संभावनाएँ

 

(राहुल गांधी के आत्मविश्वास की राजनीतिक रणनीति का दार्शनिक आधार)

– अरुण माहेश्वरी



टाइम्स ऑफ इंडिया ने 20 अगस्त को राहुल गांधी के एक स्पष्ट वक्तव्य को अपनी सुर्खी बनाया। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने कहा – नरेंद्र मोदी का "राजनीतिक अंत" हो चुका है, उनका शासन अपने आखिरी पड़ाव पर है, और अब उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है।

यह बयान केवल एक आक्रामक राजनीतिक दाँव या आंतरिक सूचनाओं का नतीजा नहीं लगता। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी जिस अंदाज में बात कर रहे हैं, उसमें एक पैटर्न साफ दिखता है – वे राजनीतिक मुद्दों को भी दार्शनिक नज़रिए से देखने की कोशिश करते हैं। उनका दृष्टिकोण अक्सर निगमनात्मक (deductive) होता है, यानी वे किसी तत्काल घटना से निष्कर्ष नहीं निकालते, बल्कि सत्ता की मूल संरचना, उसकी मानसिकता और विचारधारा की सीमाओं को समझने से शुरू करते हैं।

ऐसा लगता है मानो उन्होंने संघी मानसिकता को अच्छी तरह पढ़ लिया है – कि वह किन धारणाओं में जकड़ी है, कहाँ उसे सोचने-समझने में दिक्कत होती है, और किस बिंदु पर वह पूरी तरह असमर्थ हो जाती है।

संघ की विचारधारा सिर्फ राजनीतिक मान्यताएँ नहीं देती; यह व्यक्ति की पूरी प्रतीकात्मक दुनिया बना देती है। इसी दुनिया में संघी मानसिकता को पाला-पोसा जाता है – उसके सोचने, देखने और समझने के ढर्रे पहले से तय कर दिए जाते हैं। गांधी की हत्या, मुसलमानों के प्रति शत्रुता, और जातिगत पदानुक्रम – ये ऐसे विषय हैं जिन पर संघी दिमाग पहले से ही बंद होता है। ये मात्र अप्रिय सत्य नहीं हैं; बल्कि इन तथ्यों को उसकी प्रतीकात्मक व्यवस्था में शामिल ही नहीं किया जाता। इसलिए गांधी की हत्या उसे एक अकेले हत्यारे का काम लगती है, मुसलमान-विद्वेष राष्ट्रवाद लगता है, और जातिगत ऊँच-नीच हिंदू-एकता।

राहुल गांधी की निगमनात्मक पद्धति इन्हीं बंद बिंदुओं को पहचानने से शुरू होती है। वे यह नहीं देखते कि मोदी ने किस प्रसंग में क्या कहा या क्या किया; वे देखते हैं कि संघी शिक्षा-दीक्षा ने उनकी सोच को किस तरह सीमित कर दिया है। मोदी की राजनीतिक दृष्टि की कमी सूचनाओं के अभाव से नहीं, बल्कि इसी संरचनात्मक जकड़ से पैदा होती है। जब नई परिस्थितियाँ उन बहुलताओं को सामने लाती हैं जिन्हें संघी व्यवस्था ने हाशिए पर रखा था, तो मोदी का दिमाग उन्हें समझ नहीं पाता। वे नई वास्तविकता को भी पुराने विभाजनों – हिंदू-मुसलमान, राष्ट्रवादी-विरोधी, अपना-पराया – के चश्मे से ही देखने की कोशिश करते हैं।

इसलिए जब समाज के अलग-अलग वर्ग आपस में अप्रत्याशित संबंधों में जुड़कर एक नई सामूहिकता (गठबंधन) बनाते हैं, तो संघी दिमाग भौचक रह जाता है। वह नई स्थिति में भी पुराने दुश्मन, पुरानी खाई और पुरानी दवा तलाशने में व्यस्त रहता है। राहुल गांधी इस आंतरिक असंगति को धीरे-धीरे उजागर करते हैं, और उसे उसके चरम पर ले जाते हैं – जहाँ वह अपने ही विरोधाभासों से जर्जर हो जाती है।

यह निगमनात्मक पद्धति किसी पूर्वनिर्धारित सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू करने जितनी सरल नहीं है। इसका विशिष्ट रूप है – reductio ad absurdum यानी 'असंगति-प्रमाण' – जिसमें सत्ता की अपनी मान्यताओं को उनके तार्किक नतीजे तक ले जाया जाता है, और फिर दिखाया जाता है कि वे अपने ही विरोधाभास में फँस जाती हैं। इस विधि से सोच की आंतरिक विसंगतियाँ खुलती हैं और एक नया राजनीतिक विमर्श बनता है।

राहुल गांधी शायद मोदी शासन को ठीक इसी नज़रिए से देख रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे कि सरकार इसलिए गिर रही है क्योंकि उसके खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं या उसकी लोकप्रियता घटी है। उनका निष्कर्ष गहरा है: मोदी की सत्ता जिस सीमित बुद्धि पर टिकी है, वह एक अनंत संभावनाओं से भरे राजनीतिक समाज को समझने में अक्षम है। और यही उसकी असफलता की जड़ है।

छोटी बुद्धि – जो गिनती तो करती है, संबंधों को नहीं पहचानती

आज की दुनिया के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू ने 'सीमाबद्धता' (finitude) पर विचार किया है – जहाँ न केवल वस्तुएँ, बल्कि उन्हें सोचने का तरीका भी पूर्वनिर्धारित नियमों में कैद हो जाता है। उदाहरण के लिए, प्राकृतिक संख्याएँ – एक के बाद दो, दो के बाद तीन – बढ़ती तो हैं, पर पैटर्न वही रहता है। यहाँ नवीनता भी पुराने क्रम की पुनरावृत्ति मात्र है। यही है 'छोटी बुद्धि' – जो भले ही नए तत्वों को जोड़ ले, पर सोचने का ढर्रा नहीं बदलता।

मोदी की सोच में भी समाज के कुछ स्थिर वर्ग हैं – हिंदू, मुसलमान, दलित, पिछड़े, सवर्ण, किसान, युवा, महिलाएँ, मध्यवर्ग। प्रत्येक वर्ग के लिए एक तय संदेश, तय भय और तय प्रलोभन है। राजनीति भी पहले से तय अनुक्रम में चलती है – एक चुनाव, एक योजना, एक सांप्रदायिक मुद्दा, फिर अगला…

जब कोई नया सामाजिक तत्व सामने आता है, तो उसे भी किसी पुराने खाँचे में ढाला जाता है। आंदोलनकारी छात्र – "विपक्ष द्वारा गुमराह युवक", असंतुष्ट किसान – "बिचौलियों का मोहरा", नागरिक अधिकारों की बात करने वाला – "राष्ट्रविरोधी", जातिगत न्याय की माँग करने वाला – "समाज तोड़ने वाला"। इस तरह हर नई घटना को पुरानी श्रेणियों में बाँध दिया जाता है। नक्सल से अर्बन नक्सल, फिर 'दिमागी नक्सल' – बस एक ही पुरानी प्रतिक्रिया नए नाम के साथ।

यह पद्धति तब तक चलती है जब तक समाज को अलग-अलग व्यक्तियों और स्थिर समूहों का जोड़ माना जाए। लेकिन राजनीति की नई स्थिति में असली सवाल यह है कि लोगों के बीच कितने नए संबंध और गठबंधन बन सकते हैं। एक छात्र केवल छात्र नहीं रह जाता – वह बेरोजगार युवा भी है, किसान का बेटा भी, दलित या पिछड़े समुदाय का सदस्य भी, संविधान का नागरिक भी, और चुनावी व्यवस्था से असंतुष्ट मतदाता भी।

यहीं पर 'छोटी बुद्धि' का गणित फेल होता है। सत्ता को यह समझ नहीं है कि किसी स्थिति का वास्तविक संसाधन व्यक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके बीच बन सकने वाले संबंधों की संभावनाएँ हैं। एक व्यक्ति कई मुद्दों पर अलग-अलग गठबंधनों का हिस्सा हो सकता है। इसलिए आंदोलन का संसाधन मतों की संख्या से कहीं ज्यादा होता है।

मोदी सरकार ने अब तक विपक्ष को कुछ दलों, नेताओं और परिवारों तक सीमित रखा। उसकी रणनीति सीमित थी – किसी नेता को बदनाम करना, किसी दल को तोड़ना, गठबंधन में फूट डालना, या मीडिया अभियान से छवि को नष्ट करना।

लेकिन अब उसके सामने सिर्फ कांग्रेस या कम्युनिस्ट या सपा नहीं है। आज छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएँ, दलित, आदिवासी, बेरोजगार, छोटे व्यापारी, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाले नागरिक और चुनावी निष्पक्षता की माँग करने वाले समूह – सभी नए-नए संबंध बना रहे हैं। हर संघर्ष दूसरे संघर्ष का हिस्सा बन सकता है, और हर नया संबंध एक नया राजनीतिक उपसमुच्चय पैदा करता है। सत्ता एक संगठन तो तोड़ सकती है, पर सभी संभावित संगठनों की संभावना को नहीं।

इसीलिए मैंने पहले फेसबुक पर लिखा था:

"मोदी वोट को साधते रहे, विपक्ष ने समूह की शक्ति पर दाँव लगाया। वोट व्यक्ति की शक्ति है, आंदोलन समूह की। वोट केवल एक को चुन सकता है, सामूहिक संघर्ष अनंत संभावनाएँ पैदा करता है।"

यही असली ताकत है – एक छात्र की छोटी सी माँग (जैसे परीक्षा-घोटाले के खिलाफ) जब बेरोज़गारी, शिक्षा का निजीकरण, सामाजिक न्याय, पुलिस-दमन, मताधिकार और संविधान के सवालों से जुड़ती है, तो वह एक अनंत राजनीतिक प्रक्रिया का रास्ता खोल सकती है। घटना एक समय और स्थान में घटती है, लेकिन उससे पैदा होने वाले संबंध और संभावनाएँ अनंत हैं।

राम मंदिर का चढ़ावा – छोटी बुद्धि की बड़ी पराजय

राम मंदिर के चढ़ावे का प्रकरण इसे पूरी तरह समझाता है। यह केवल वित्तीय भ्रष्टाचार का एक मामला नहीं है। संघी गलियारों में तो इसे भगवान कृष्ण के माखन-चोरी वाले प्रसंग से भी जोड़ा गया – मानो मोदी स्वयं भगवान हों।

पर सच्चाई यह है कि राम मंदिर मोदी और संघ के लिए सिर्फ एक मंदिर नहीं था; वह उनकी पूरी राजनीतिक संरचना का सबसे बड़ा प्रतीक था। अपनी छोटी बुद्धि में वे इसे हिंदुत्व की विजय का प्रतीक मानते थे। लेकिन वे यह समझ नहीं पाए कि धार्मिक आस्था किसी पार्टी की संपत्ति नहीं होती। उसमें पवित्रता, न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व भी होते हैं। मंदिर का चढ़ावा चुनावी चंदा नहीं, श्रद्धालु का अपने आराध्य को अर्पण है।

इसलिए यह चढ़ावा चोरी केवल 'इलेक्टोरल बॉण्ड' का मामला नहीं है – यह धर्मभीरुओं की आस्था की लूट है। यहाँ राजनीतिक भ्रष्टाचार नैतिक पतन बन गया है।

इस मामले में संघ और मोदी पूरी तरह लाचार दिखते हैं। उनके पास न तो इसका खुलकर जवाब देने की भाषा है, और न ही चुप रहने का विकल्प। अगर बोलते हैं, तो मंदिर ट्रस्ट, उसके हिसाब-किताब, और भाजपा-संघ से जुड़े लोगों की भूमिका पर सवाल उठेंगे। अगर चुप रहते हैं, तो हिंदू आस्था पर डाका डालने के कुप्रसिद्ध होंगे।

यही वह क्षण है जब सत्ता की बुद्धि अपने ही विरोधाभास में फँस जाती है – अपने सबसे बड़े प्रतीक का श्रेय लेना, और उसी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप से बचना, एक साथ संभव नहीं। सबसे सुरक्षित प्रतीक अब उसी के खिलाफ साक्ष्य बन चुका है। यहाँ विपक्ष ने उसकी विचारधारा नहीं तोड़ी, बल्कि सत्ता की आंतरिक असंगति ने ही उसे ध्वस्त कर दिया।

धैर्य और आत्म-विश्वास

ऐसे विश्लेषण में बहुत धैर्य चाहिए। कोई नहीं जानता कि झूठ कब उजागर होगा – लेकिन असंगतता अंततः खुद को ही खोल देती है। राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में हम यही धैर्य देख रहे हैं।

भाजपा ने उन्हें अपरिपक्व, वंशवादी, अनिच्छुक और असफल – जो नहीं कहा। लेकिन राहुल ने तत्काल जवाब देने की बजाय उस मिथ्या छवि को अपने तार्किक नतीजे तक विकसित होने दिया। यात्राओं, मुकदमों, संसद से निष्कासन, और लगातार निजी हमलों के बीच ही देखा गया कि भाजपा की बनाई हुई विरूपित छवि स्वतः ध्वस्त हो गई। वे उससे मुक्त हो गए।

दूसरी ओर, भाजपा ने पूरी कोशिश की कि राहुल को सिर्फ एक कांग्रेसी नेता की तरह देखा जाए – लेकिन उनकी इसी कोशिश ने राहुल को कांग्रेस की सीमाओं के परे, व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। अब भाजपा का झूठ उस बिंदु पर सामने आ रहा है, जिसका मोदी और उनकी सरकार को अंदाज़ा भी नहीं था। राहुल की छवि बिगाड़ने का अभियान ही मोदी के राजनीतिक अंत का संकेत बन गया है।

अनंतता की गणना – कैंटर से बाद्यू तक

बाद्यू आधुनिक गणितज्ञ जॉर्ज कैंटर के अनंतता-सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा करते हैं। कैंटर ने सिद्ध किया कि किसी भी समुच्चय का घात-समुच्चय (power set) – यानी उसके सभी संभावित उपसमुच्चयों का संग्रह – मूल समुच्चय से हमेशा बड़ा होता है। यह बड़ी अनंतता है। इसे यदि राजनीति पर लागू करें तो पायेंगे कि किसी स्थिति में मौजूद व्यक्तियों की संख्या गिनी जा सकती है, पर उन व्यक्तियों के बीच बन सकने वाले सभी संबंधों और गठबंधनों की संख्या हमेशा उस गिनती से अधिक होती है।

यही वह अनंतता है जिसे सत्ता की सीमित बुद्धि नहीं समझ सकती। वह व्यक्तियों को गिनती रहती है, पर उनके संबंधों की असीम संभावनाओं के प्रति अंधी रहती है।

हम पहले से यह नहीं जान सकते कि कौन सा छात्र आंदोलन किस किसान आंदोलन से जुड़ जाएगा, या कौन सा धार्मिक विश्वासघात किस नैतिक विद्रोह को जन्म देगा। लेकिन हम यह निश्चित कह सकते हैं कि स्थिति का सामूहिक संसाधन उसके व्यक्तिगत संसाधनों के साधारण योग से कहीं बड़ा होता है।

उपसंहार - अनंतता से टकराकर सत्ता का अंत 

बाद्यू कहते हैं – "The infinite infinitizes thought itself." – अनंतता स्वयं विचार को अनंत बना देती है।

राहुल गांधी का यह कथन कि मोदी शासन अपने अंतिम चरण में है – यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक निगमनात्मक राजनीतिक विश्लेषण है। मोदी सत्ता का अंत इसलिए नहीं है कि उसके खिलाफ एक बड़ी ताकत खड़ी हो गई है, बल्कि इसलिए कि उसकी सीमित संघी बुद्धि उस राजनीतिक समाज को समझने में असमर्थ है, जिसकी संभावनाएँ उसके हर दमन, हर झूठ और हर नैतिक विसंगति के साथ बढ़ती जा रही हैं।

सत्ता व्यक्तियों को पराजित कर सकती है, पर व्यक्तियों और सामूहिकता के बीच बन चुकी अनंतता की खाई को नहीं पाट सकती। जब सत्ता एक प्रतिरोध को दबाती है, तो उसी दमन से अनेक नए प्रतिरोध-समुच्चय जन्म ले लेते हैं।

मोदी शासन का राजनीतिक अंत इसी बिंदु पर स्पष्ट हो जाता है – जहाँ सत्ता के पास अभी भी साधन हैं, पर परिस्थिति की संभावनाएँ उन साधनों से अनंत रूप से बड़ी हो चुकी हैं।

वोट व्यक्ति की शक्ति है, आंदोलन समूह की। वोट एक को चुनता है, संघर्ष अनेक को जोड़ता है। बड़ा से बड़ा वोट-चोर भी सामूहिक संघर्ष के सामने असहाय होता है।