सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

विखंडन जब स्वयं विखंडन की माँग करता है

(अच्युतानंद मिश्र के लेख "भक्तिकाल : इतिहास और विखंडन" का एक पुनर्पाठ)


— अरुण माहेश्वरी




अच्युतानंद मिश्र के लेख "आलोचना के 82वें अंक में प्रकाशित अच्युतानंद मिश्र का लेख "भक्तिकाल : इतिहास और विखंडन" पढ़कर एक सुखद आश्चर्य हुआ। हमारी दृष्टि में इसे पिछले कई दशकों में भक्तिकाल पर लिखी गई एक सबसे गंभीर और वैचारिक रूप से महत्त्वपूर्ण टिप्पणी कहा जा सकता है। इसका महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि यह आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भक्तिकाल-संबंधी अवधारणा की आलोचना करता है, बल्कि इस बात में है कि यह उस पूरे इतिहास-बोध को प्रश्नांकित करता है जो "भक्तिकाल" को एक समरस (समन्वित) कालखंड, एक अखंड सांस्कृतिक युग, भारतीय आत्मा के सहज उत्कर्ष अथवा एकरेखीय साहित्यिक विकास की कथा के रूप में प्रस्तुत करता आया है।

उनके शब्दों में, “शुक्ल जी के अनुसार भक्तिकाल में कोई एक समग्र परंपरा नहीं थी बल्कि पूर्ववर्ती दौर (निर्गुण धारा) उत्तरवर्ती दौर के ठीक विपरीत था । यानी भक्तिकाल परस्पर विरोधी धारणाओं के समन्वय से निर्मित अवधारणा है ।”(पृ.22)

इस पर वे यह सवाल उठाते हैं कि “इस समन्वय की जरूरत क्यों थी और किसे थी?” आगे भक्तिकाल में कई परंपराओं के संघर्ष का एक ब्यौरा देते हुए यह साफ मत जाहिर करते हैं कि “भक्तिकाल की एकता और केंद्रीयता बहुत सुदृढ़ नहीं है, बल्कि वहाँ किन्हीं अप्रकट अवधारणाओं के तहत सामंजस्य बिठाने का प्रयत्न अधिक है ।” (पृ.23)

इन ‘अप्रकट अवधारणाओं’ पर रोशनी डालते हुए वे आगे बढ़ते हैं कि “उपनिवेश-पूर्व भारत में जो वर्चस्ववादी ताकतें थीं, उपनिवेशवादी शक्तियों ने उसी की क्रमिकता में दमन की परियोजना को पुनर्व्यवस्थित करते हुए भारत के निकट अतीत, भक्तिकाल की समन्वयकारी दृष्टि तथा समग्रता का छद्म निर्मित किया ताकि भारतीय समाज में प्रतिगामी मूल्यों की केंद्रीयता बनी रहे ।”(वही)

इस प्रकार, पूरे लेख में मिश्र का यही बताने का आग्रह बराबर बना रहा कि "भक्तिकाल" स्वयं इतिहास की कोई स्वयंसिद्ध इकाई नहीं, बल्कि एक निर्मित (constructed) अवधारणा है, जिसके भीतर सोद्देश्य अनेक परस्पर विरोधी ऐतिहासिक धाराओं को कृत्रिम रूप से समन्वित कर दिया गया है।

कहना न होगा, यही वह बिन्दु है जहां से यह लेख अपनी वास्तविक शक्ति प्राप्त करता है। उन्होंने ठीक ही लिखा है कि कबीर, सूर, तुलसी, मीरा और जायसी को एक ही वैचारिक धारा का प्रतिनिधि मान लेना इतिहास का सरलीकरण है।

“भक्तिकाल को किसी एक धारणा के परिपाक के रूप में पढ़ना कठिन है । हम भले कबीर, सूर, तुलसी, मीरा और जायसी का एक संयोजन तैयार कर लें, मगर भक्तिकाल की किसी एक धारणा के अंतर्गत उनका सामंजस्य बिठाना कठिन है । कहने का तात्पर्य यह है कि भक्तिकाल को समग्रता में पढ़ना एक तरह का सामान्यीकरण है, जिसमें नीर क्षीर विवेक की जगह अपनी-अपनी मान्यताओं का आरोपण है । कबीर और तुलसी को ही एक साथ रखकर विकसित धारणा का निर्माण कठिन है।” (पृ.22)

जाहिर है कि इनकी वैचारिक संरचनाएँ, इनके सामाजिक आधार और इनके धार्मिक-सांस्कृतिक अर्थ अलग-अलग हैं। मिश्र का साफ संकेत है कि "समग्र भक्तिकाल" की धारणा वस्तुतः एक ऐसी ब्राह्मणवादी विचारधारात्मक चादर है, जो सोद्देश्य इन अंतर्विरोधों को ढँक देती है।

“यह विलयन भक्ति की समूची अवधारणा को संदेह के घेरे में ले आता है। इसके विपरीत अगर हम भक्ति की अवधारणा को दो परस्पर संघर्षरत परंपराओं में विखंडित करें और उन्हें भारतीय समाज-संस्कृति में विद्यमान इन दो परंपराओं के सतत संघर्ष के रूप में देखें तो वर्तमान के संघर्ष की अधिक सार्थक और निर्णायक व्याख्या की जा सकेगी ।” (पृ.23)

इसी प्रकार दक्षिण भारतीय भक्ति, संगम साहित्य, आलवार-नयनार परंपरा, भागवत, मंदिर-व्यवस्था तथा उत्तर भारतीय निर्गुण-सगुण धाराओं के बीच संबंधों की पुनर्समीक्षा का उनका आग्रह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लेख के शुरू में ही उन्होंने सवाल किया है कि “दक्षिण से निकली जिस भक्ति से हम उत्तर भारत की भक्ति-चेतना को संबद्ध करते हैं−वह कौन-सी धारा थी, उसमें भक्ति के कौन-से आयाम थे, कौन-सी टकराहटें थीं?” (पृ.22)

हमारी नज़र में, "समन्वय" को एक स्वाभाविक सांस्कृतिक गुण न मानकर स्वयं एक ऐतिहासिक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करना ही हिन्दी आलोचना में एक गंभीर हस्तक्षेप है। यहीं तक आते-आते यह लेख भक्तिकाल की चर्चा को एक बिल्कुल नए स्तर पर पहुँचा देता है।

किन्तु यहीं से हमें उनके इस विखंडन की अपनी सीमाएँ भी दिखाई देने लगती हैं। कहा जा सकता है कि यह सीमा विखंडन मात्र की ही सीमा होती है ।

अच्युतानंद का घोषित उद्देश्य "भक्तिकाल" की एकान्वित अवधारणा का विखंडन है। परंतु विडंबना तब पैदा होती है जब यह विखंडन अंततः स्वयं एक नए केंद्रीय व्याख्यात्मक सिद्धांत में संगठित हो जाता है। इस लेख में लगभग प्रत्येक ऐतिहासिक रूपांतरण का अंतिम स्पष्टीकरण "ब्राह्मणवाद" में जाकर समाप्त होता है। मंदिर, भागवत, गीता, शंकराचार्य, तुलसी, रीतिकाल, यहाँ तक कि भक्ति की भाव-संरचना भी अंततः उसी के भीतर अर्थ ग्रहण करती है।

“अगर दास प्रथा के मूल में वैदिक चेतना प्रसूत ब्राह्मणवादी विचारधारा कार्यरत थी तो सामंतवादी चेतना की संस्कृति के मूल में व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारधारा को दृष्टि भगवद्गीता से मिल रही थी । बौद्ध तथा अन्य भौतिकतावादी दर्शनों के उद्भव और प्रभाव के बाद ब्राह्मणवादी चिंतन एवं ज्ञानकांड का जो पराभव हुआ था, उसे पुनर्जीवित करने का काम भगवद्गीता ने किया ।

“भगवद्गीता ने नए रूप में ब्राह्मणवादी विचारधारा को पुनर्जीवित करने के लिए दास प्रथा के दौर का आक्रामकता की जगह सहिष्णुता और व्यापकता को महत्त्व दिया । ...बौद्ध दर्शन और उसकी विचारधारा की ओर सामाजिक क्रम में निम्न स्थान पर रह रहे समूह तेजी से आकर्षित हो रहे थे । इस वजह से ब्राह्मणवादी परंपरा का प्रभाव एवं प्रसार कम हो चला था । भगवद्गीता ने विभिन्न अस्थाओं के प्रति सहिष्णुता का दर्शन दिया ।”(पृ.26-27)

वे इसे एक औपनिवेशिक चेतना का परिणाम बताते हैं जो “भक्ति की इस धारा को दक्षिण से उत्तर तक अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करती है, साथ ही दूसरी संघर्षशील परंपरा को, जिसका संबंध भौतिकवादी दर्शन से रहा है, महत्त्व नहीं देती । ऐसा करके वह भारत की अवधारणा को ही बदलती है । इसके मूल में यह दृष्टि व्याप्त थी कि ब्राह्मणवादी विचारधारा से निर्मित और रूपांतरित भारत ही भारत है । जबकि तथ्य इससे भिन्न दिखाई देते हैं ।” (पृ.26)

हमारा सवाल है कि क्या इतना विखंडन ही अपने-आप में पर्याप्त है? हमें यह इसीलिये पर्याप्त नहीं लगता है, क्योंकि विखंडन का पहला काम किसी स्थापित मिथक या एकान्विति को तोड़ना होता है। वह अपने-आप में किसी सत्य का निर्माण नहीं करता; वह उस स्थान का निर्माण करता है जहाँ सत्य पहली बार अपनी ऐतिहासिक आकृति ग्रहण कर सके। इसलिए विखंडन आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। यदि वह यहीं रुक जाए, तो वह केवल नकार बनकर रह जाता है; यदि वह सत्य-प्रक्रिया की ओर बढ़े, तभी वह अपने ऐतिहासिक प्रयोजन को प्राप्त करता है।

इस बिन्दु पर हमें लेख की विश्लेषण-पद्धति और उसके निष्कर्ष के बीच एक साफ तनाव नज़र आता है।

लेख का सबसे बड़ा योगदान तो यह है कि यह भक्तिकाल की जड़ हो चुकी ऐतिहासिक एकान्विति को तोड़ता है, परन्तु इसकी सबसे बड़ी सीमा यह लगी कि जिस एकान्विति (totalization) का लेख विखंडन करता है, उसी का एक नया रूप इसमें स्वयं निर्मित होने लगता है। वह धीरे-धीरे “ब्राह्मणवाद” के एक ऐसे केंद्रीय संकेतक का रूप ग्रहण कर लेता है जिसके अधीन विविध ऐतिहासिक प्रवाह पुनः एक नए ज्ञान-विन्यास में संगठित होने लगते हैं।

"ब्राह्मणवाद" क्रमशः लकानियन Master Signifier (S1) का स्थान ग्रहण कर लेता है। लगभग प्रत्येक ऐतिहासिक रूपांतरण का अंतिम स्पष्टीकरण । मंदिर, भागवत, गीता, शंकर, तुलसी, रीतिकाल, यहाँ तक कि भक्ति की भाव-संरचना भी उसी के भीतर व्याख्यायित होती है। अर्थात् ब्राह्मणवाद स्वयं विश्लेषण की वस्तु नहीं रहता; वह विश्लेषण की सार्वभौमिक कुंजी बन जाता है। लगभग प्रत्येक ऐतिहासिक परिवर्तन का अंतिम अर्थ उसी के भीतर जाकर स्थिर हो जाता है। यह सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है कि उन प्रक्रियाओं का सत्य क्या है?

यही वह बिन्दु है जिसे जाक लकान विमर्शों का विश्वविद्यालयी विमर्श (University Discourse) में रूपांतरण कहते हैं, जब ज्ञान स्वयं को सत्य का स्थानापन्न मान लेता है और प्रमाता अर्थात् सत्य का धारक-वाहक दृष्टि से ओझल हो जाता है।

हमारा सवाल है कि यदि इतिहास वास्तव में इतना बहुल और बहुकेंद्रीय है, तो क्या उसकी व्याख्या कभी भी किसी एक केंद्रीय संकेतक (central signifier) में समाहित की जा सकती है?

अपनी पद्धति में यह लेख हमें आश्चर्यजनक रूप से जिल देल्यूज़ (Gilles Deluze) की चिंतन पद्धति के अनुरूप दिखाई देता है। यह भक्तिकाल को किसी एक उद्गम, एक केंद्र अथवा एकरेखीय विकासक्रम का परिणाम नहीं मानता। बल्कि उसे संगम साहित्य, बौद्ध-जैन परंपराओं, आलवार-नयनार भक्ति, भागवत, शैव-वैष्णव संप्रदायों, लोकधर्म और उत्तर भारतीय संत परंपरा जैसी अनेक ऐतिहासिक धाराओं के अंतर्ग्रथित विकास के रूप में देखता है।

देल्यूज़ ऐसी बहुकेंद्रीय और गैर-वृक्षीय संरचना को राइज़ोम (Rhizome) कहते हैं। जैसे दूब या अदरक की जड़ें किसी एक तने से नहीं फैलतीं, बल्कि अनेक दिशाओं में बढ़ती हुई लगातार नए संबंध बनाती रहती हैं, उसी प्रकार कुछ ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ भी किसी एक मूल कारण या एक केंद्रीय धुरी से नहीं समझी जा सकतीं। वे परस्पर जुड़ी हुई अनेक गतियों का जाल होती हैं।

कहना न होगा, श्री मिश्र ने भक्तिकाल के अध्ययन में इस पद्धति का अत्यंत सृजनात्मक उपयोग किया है।

पर हमारा मानना है कि हम यदि भक्ति को केवल अनेक ऐतिहासिक धाराओं के संयोग के रूप में देखेंगे तो वह इतिहास की एक जटिल संरचना भर रह जाएगी। और यदि उसे केवल धार्मिक अनुभूति मानेंगे तो इतिहास उससे बाहर चला जाएगा।

देल्यूज़ की पद्धति हमें बहुलता की गति और उसके गैर-केंद्रीय संबंधों को समझने में सहायता करती है; किंतु हमारे लिए प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता। हमारा सवाल है कि क्या बहुलता ही सत्य है? बहुलता के भीतर कौन-सी ऐसी जननिक प्रक्रिया (generic process) सक्रिय है जो इन विविध ऐतिहासिक आकृतियों को एक सत्य-प्रक्रिया (truth process) में जोड़ती है?

भक्ति का सत्य न तो किसी एक संप्रदाय का सत्य है, न किसी जाति का, न किसी धार्मिक पहचान का। वह मनुष्य के अपने सत्य से प्रत्यक्ष संबंध की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। इसी कारण भक्ति को केवल धार्मिक या सामाजिक इतिहास के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

ऐलेन बाद्यू की भाषा में कहें तो वह एक ऐसा सार्वभौमिक सत्य है जो किसी निश्चित ऐतिहासिक भुवन में ठोस अपवाद की तरह जन्म लेता है । बाद्यू इसे Universal Concrete Exception (UCE) (सार्वभौमिक ठोस अपवाद) कहते हैं। एक ऐसा सत्य जो भारतीय इतिहास के एक विशिष्ट भुवन में जन्म लेता है, पर जिसकी वैधता उसी भुवन तक सीमित नहीं रहती।

बाद्यू के अनुसार, सत्य एक ऐसी प्रक्रिया है जो किसी विशिष्ट ऐतिहासिक घटना (Event) से जन्म लेती है, पर अपनी स्थानीय उत्पत्ति का अतिक्रमण करके सार्वभौमिक (Universal) हो जाती है। इसी अर्थ में बाद्यू सत्य को UCE कहते हैं जो एक साथ स्थानीय भी होता है और सार्वभौमिक भी; इतिहास की उपज भी होता है और इतिहास के पार जाने वाली संभावना भी।

यहीं पर बाद्यू की Generic Multiplicity (जननिक बहुलता) की अवधारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यह जननिक बहुलता देल्यूज की धारणा के अनुसार वस्तुओं, समुदायों या परंपराओं की बहुलता नहीं है; वह प्रमाताओं की बहुलता है, सत्य प्रक्रिया के धारक-वाहक प्रमाताओं की बहुलता। भक्ति के संदर्भ में जननिक बहुलता उन असमान स्थानीय प्रमाताओं की बहुलता के रूप में दिखाई देती है जिन्हें कोई एक सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक गुण समेट नहीं सकता, पर जो एक साझा सत्य-निष्ठा से संबद्ध हैं।

प्रमाता भी इतिहास से बाहर खड़ी कोई आध्यात्मिक सत्ता नहीं होता। वह सत्य की अवस्थिति का ऐतिहासिक स्थल होता है। इतिहास और प्रमाता को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा नहीं किया जा सकता। इतिहास के बिना प्रमाता अमूर्त आध्यात्मवाद बन जाएगा। और प्रमाता के बिना इतिहास केवल ज्ञान-संरचना। भक्ति की वास्तविक समझ इन दोनों की द्वंद्वात्मक एकता में ही संभव है।

मिश्र ने अपने लेख में दास-भक्ति पर विस्तार से विचार किया है और दास्य-भाव के सामाजिक और वैचारिक उपयोग की ओर ठीक ही संकेत किया है।

किन्तु सवाल है कि क्या दास्य-भाव केवल सामाजिक अधीनता का ही रूप है?

भक्ति में दास्य-भाव किसी गुलाम की दासता नहीं, अभिनवगुप्त द्वारा वर्णित भरिततनु के मूल भाव की तरह होता है। भरिततनु इच्छाओं का विसर्जन करके स्वतंत्र होता है । इसके विपरीत उनका भैरव इच्छाओं का विसर्जन नहीं करता, बल्कि किसी अन्य पर निर्भर न रहने के कारण स्वतंत्र रहता है । हम भक्ति में दास्य और स्वातन्त्र्य को परस्पर विरोधी नहीं कहेंगे; वे प्रमातृत्व की दो भिन्न ऐतिहासिक आकृतियाँ हैं। दास्य और भैरव-स्वातन्त्र्य को प्रमातृत्व की दो भिन्न आकृतियों की तरह पढ़ा जा सकता है । एक अपेक्षाओं और निजी इच्छाओं के विसर्जन से निर्मित होता है तो दूसरा किसी अन्य पर निर्भरता के पूर्ण अभाव से ।

अभिनवगुप्त की दृष्टि में तो प्रमाता का स्वभाव ही स्वातन्त्र्य है। इसलिए भैरव की स्वतंत्रता भी किसी नैतिक अनुशासन का फल नहीं, बल्कि प्रमातृत्व का स्वभाव है।

इसीलिये हम कहते हैं कि कबीर, मीरा, नानक, रैदास, नामदेव, आंडाल, लल्लेश्वरी और तुकाराम किसी साझा धार्मिक मत, किसी एक परंपरा के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक ही सत्य-निष्ठा के भिन्न-भिन्न स्थानीय प्रमाता हैं। इनका सत्य किसी संप्रदाय या मत का सत्य नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने सत्य से प्रत्यक्ष संबंध का सत्य है। उनकी भिन्नता उस सत्य का निषेध नहीं करती; बल्कि उसी एक सत्य-निष्ठा की ऐतिहासिक, सार्वभौमिकता का प्रमाण पेश करती है।

हमें इस लेख की सबसे गहरी दार्शनिक सीमा यही लगती है कि इसमें समाज है, जाति है, सत्ता है, ज्ञान है, विचारधारा है, किन्तु प्रमाता कहीं नहीं है। कबीर क्यों बोलते हैं? मीरा का अनुभव क्या है? नानक के भीतर कौन-सी सत्य-निष्ठा कार्य कर रही है? रैदास किस प्रमातृत्व की आकृति प्रस्तुत करते हैं? इन प्रश्नों की ओर लेख का ध्यान बिल्कुल नहीं जाता। यहां वह इतिहास के वस्तुगत पुनर्निर्माण तक ही सीमित रह जाता है।

लेख अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूत्रों, वर्णव्यवस्था, बौद्ध-जैन परंपराएँ, दक्षिण भारतीय समाज, संगम साहित्य, आलवार, भागवत, मंदिर-आर्थिक संरचना, शंकराचार्य, निर्गुण-सगुण धारा, सबको जोड़ता है पर यह सवाल नहीं करता कि ऐसा कौन-सी सत्य-निष्ठा थी जिसने इन विविध ऐतिहासिक आकृतियों को जन्म दिया?

हमारा प्रस्ताव यह है कि भक्ति का इतिहास इसी प्रश्न से पुनः पढ़ा जाना चाहिए। कबीर, मीरा, नानक, रैदास, नामदेव, आंडाल और तुकाराम एक-दूसरे के प्रतिरूप नहीं हैं। उनके देवता भिन्न हैं, भाषाएँ भिन्न हैं, सामाजिक स्थितियाँ भिन्न हैं, यहाँ तक कि उनके धार्मिक रूपक भी भिन्न हैं। फिर भी वे एक ही सत्य-प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न स्थानीय प्रमाता हैं। किसी विशिष्ट सत्य-प्रक्रिया की निष्ठा एक होती है; उसके ऐतिहासिक प्रमाता अनेक होते हैं; उसके धारक-वाहक अनेक होते हैं।

लेख का एक बड़ा निष्कर्ष यह है कि “भक्तिकाल” एक समरूप अवधारणा नहीं है। यह निष्कर्ष बिल्कुल सही है। लेकिन बाद्यू का अगला प्रश्न होगा—यदि यह एकरूप नहीं है, तो इन विविध धाराओं को जोड़ने वाला Generic Truth क्या है? कबीर, मीरा, नानक, तुकाराम, आंडाल, लल्लेश्वरी, नामदेव— इन सबके बीच कौन-सी ऐसी जननिक बहुलता (generic multiplicity) है जो किसी एक धर्म, जाति, भाषा या संप्रदाय से बड़ी है?

रूसी क्रांति एक स्थानीय ऐतिहासिक घटना थी। वह रूस के विशिष्ट सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में घटी। पर उसके साथ जुड़ा वर्ग-संघर्ष का सत्य रूस तक सीमित नहीं था । चीन, भारत, वियतनाम, क्यूबा, फ्रांस, इटली और लैटिन अमेरिका तक भिन्न-भिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, जातीयताओं और राष्ट्रीयताओं के लोगों ने स्वयं को उसी सत्य से संबद्ध पाया। उन्हें एक जाति, एक भाषा या एक राष्ट्र ने नहीं, बल्कि एक साझा सत्य-निष्ठा ने जोड़ा। यही जननिक बहुलता प्रमाताओं की बहुलता है।

मार्क्सवादी आलोचना स्वयं लंबे समय तक Generic Multiplicity की धारणा को व्यवहार में स्वीकार करती रही है, यद्यपि उसने उसे इस एक नाम से नहीं पहचाना है ।

लेख इस प्रश्न को खुला छोड़ देता है। यदि सत्य प्रक्रिया के वाहक प्रमाता अनेक हैं, तो द्वंद्व भी एकरेखीय नहीं रह जाता। इतिहास वस्तुतः एक ही सत्य प्रक्रिया की अनेक स्थानीय द्वंद्वात्मक आकृतियों का क्षेत्र होता है।

मिश्र का लेख बार-बार दिखाता है कि किस प्रकार भक्ति का उपयोग ब्राह्मणवादी पुनर्गठन के लिए हुआ। इस बात को ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह प्रश्न तो बचा रह ही जाता है कि क्या तुलसी केवल विचारधारा हैं? क्या कबीर केवल प्रतिरोध हैं? क्या मीरा केवल सामाजिक संरचना का परिणाम हैं?

यदि साहित्य का समूचा अर्थ उसकी वैचारिक स्थिति में समा जाए, तो उसकी सौंदर्यात्मक और सत्यात्मक शक्ति कहाँ जाएगी?

कविता कभी केवल विचारधारा नहीं होती। भाषा में हमेशा ऐसा अवशेष रहता है जिसे कोई भी वैचारिक संरचना पूरी तरह आत्मसात नहीं कर सकती। लकान इसे रीयल से जोड़ते हैं। अभिनवगुप्त भी काव्य की शक्ति को उसके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, उसके प्रतीयमान अर्थ में देखते हैं। उदाहरण के लिए, तुलसी के पदों में दास्य-भाव के साथ-साथ एक अद्वितीय लयबद्ध सौंदर्य है जो उनके ब्राह्मणवादी पुनर्गठन से अधिक है।

इसलिए कबीर और तुलसी का विचारधारात्मक विश्लेषण आवश्यक है, फिर भी उससे उनकी कविता का सत्य समाप्त नहीं हो जाता। कबीर आज भी बोलते हैं, मीरा आज भी गाती हैं, नानक आज भी सुनाई देते हैं – क्योंकि उनकी कविता केवल उनके समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सत्य-निष्ठा की एक आकृति है। इतिहास हमें बताता है कि वे कब प्रकट हुए; कविता दिखाती है कि वह सत्य क्या था जिसके वे वाहक बने। वह सत्य किसी संप्रदाय या जाति का नहीं, बल्कि जैसा कि हमने पहले ही कहा है, मनुष्य के अपने सत्य से प्रत्यक्ष संबंध का है – और कविता उस संबंध की ऐतिहासिक आकृति मात्र नहीं, स्वयं वह संबंध है, अपने काव्य-रूप में।

इस लेख में एक अन्य महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक आयाम भी अछूता रह गया है। यह वैसे तो दक्षिण भारत से उत्तर भारत तक की यात्रा का विस्तृत पुनर्निर्माण करता है, पर इस्लाम के आगमन को लगभग केवल बाहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के रूप में छोड़ देता है।

जबकि, इसके विपरीत, हम जानते हैं कि हिन्दी साहित्य के पारंपरिक इतिहासकारों ने भक्ति को इस्लामी आक्रमण की प्रतिक्रिया के रूप में भी प्रस्तुत किया है।

हमारी नज़र में ‘इस्लाम की प्रतिक्रिया’ और ‘इस्लाम की अवहेलना’, ये दोनों दृष्टियाँ ही अधूरी हैं।

भक्ति न तो इस्लाम की प्रतिक्रिया मात्र है, न उससे पूर्णतः स्वतंत्र किसी निर्वात में विकसित हुआ कोई भाव । इस बिन्दु पर कारण (cause) और भुवन (world) का अंतर समझना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। किसी सत्य-प्रक्रिया का कारण और उसका ऐतिहासिक भुवन एक ही वस्तु नहीं होते।

बाद्यू के शब्दों में, सत्य किसी विशेष भुवन में प्रकट अवश्य होता है, पर उसका कारण वह भुवन नहीं होता।

इस्लाम ने भक्ति का सत्य उत्पन्न नहीं किया। किन्तु उसने उस ऐतिहासिक संसार को अवश्य बदल दिया जिसमें भक्ति ने अपने नए रूप ग्रहण किए।

सूफ़ी परंपरा, फ़ारसी सांस्कृतिक उपस्थिति, नगरों का विकास, नई राजनीतिक संरचनाएँ, भाषिक आदान-प्रदान—इन सबने उस ऐतिहासिक विश्व का पुनर्गठन किया था जिसमें कबीर, नानक और दादू जैसे संतों का उदय हुआ।

इस अर्थ में इस्लाम भक्ति का कारण नहीं, पर उसके ऐतिहासिक भुवन का एक निर्णायक घटक जरूर है। यह अंतर कारणवादी इतिहासवाद और सत्य की ऐतिहासिक व्याख्या के बीच का मूलभूत अंतर है।

इन आलोचनाओं के बावजूद मैं मानता हूँ कि इस लेख की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने "भक्तिकाल" को पुनर्विचार के लिए खोल दिया है। हमारा आग्रह केवल इतना है कि अब उसी विखंडित इतिहास के भीतर सक्रिय सत्य-प्रक्रिया और उसके प्रमाताओं को भी पहचाना जाए। इतिहास का विखंडन सत्य-प्रक्रिया का उद्घाटन नहीं करता; वह केवल उस स्थान को निर्मित करता है जहाँ सत्य अपनी ऐतिहासिक आकृति ग्रहण कर सके।

विखंडन इतिहास को खोलता है; पर प्रमाता की अवधारणा उस इतिहास के भीतर सक्रिय सत्य-प्रक्रिया के वाहक को दृश्य बनाती है। तभी भक्ति केवल इतिहास का विषय नहीं रहती, बल्कि सत्य-प्रक्रिया का दार्शनिक विषय भी बन जाती है।

यहीं से हमारा प्रश्न इतिहास के सत्य का नहीं, सत्य के इतिहास का हो जाता है। इतिहास सामाजिक प्रक्रियाओं का पुनर्निर्माण करता है; सत्य का इतिहास उन प्रक्रियाओं में जन्म लेने वाले प्रमाताओं का। अच्युतानंद का आग्रह पहले पर है; हमारा आग्रह दूसरे पर। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक दिशाएँ हैं। वे इतिहास को खोलते हैं, हम उसके भीतर से सत्य के उद्भव की पहचान चाहते हैं। इतिहास का काम है संरचनाओं का विखंडन। दर्शन का काम है उन संरचनाओं के भीतर सक्रिय सत्य-प्रक्रिया का उद्घाटन।

पर यह उद्घाटन किस रूप में होता है? इतिहास अपनी संरचनाओं को विखंडित करके जिस स्थान का निर्माण करता है, वहाँ सत्य अपनी पहली ऐतिहासिक आकृति किस रूप में ग्रहण करता है? हमारा कहना है कि वह आकृति कविता है।

कबीर, मीरा, नानक, रैदास, नामदेव, आंडाल, तुकाराम, लल्लेश्वरी — इनमें से प्रत्येक ने अपने-अपने ऐतिहासिक भुवन में एक ही सत्य-निष्ठा को धारण किया। उनके देवता भिन्न हैं, भाषाएँ भिन्न हैं, सामाजिक स्थितियाँ भिन्न हैं, यहाँ तक कि उनके धार्मिक रूपक भी भिन्न हैं। फिर भी वे एक ही सत्य-प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न प्रमाता हैं। पर यह प्रमातृत्व केवल एक वैचारिक स्थिति नहीं है — यह एक काव्यात्मक स्थिति है। अर्थात्, प्रत्येक प्रमाता अपनी निष्ठा को भाषा, लय, प्रतीक और अनुभव की एक अद्वितीय आकृति में प्रस्तुत करता है। वह आकृति ही कविता है।

इसीलिए हम कहते हैं — कविता सत्य-निष्ठा की पहचान नहीं, बल्कि खुद उसकी एक आकृति है।

अर्थात् कविता सत्य का बाहरी प्रतिनिधित्व नहीं; वह उस सत्य-प्रक्रिया की एक अंतःस्थ, ऐतिहासिक और काव्यात्मक आकृति है— अपने ऐतिहासिक शरीर में। जिस प्रकार कोई विचार अपने कथन में आकृति ग्रहण करता है, उसी प्रकार सत्य-निष्ठा अपनी कविता में आकृति ग्रहण करती है। यह आकृति केवल 'शैली' नहीं, केवल 'अलंकार' नहीं, केवल 'भाषा' नहीं — यह सत्य का ठोस सार्वभौमिक (concrete universal) है जो एक स्थानीय प्रमाता के भीतर से प्रकट होता है और अपनी स्थानीयता का अतिक्रमण करके सार्वभौमिक हो जाता है।

इतिहास हमें बताता है कि कबीर, मीरा और नानक कब प्रकट हुए। कविता दिखाती है कि वह सत्य क्या था जिसके वे वाहक बने — और वह सत्य आज भी क्यों सक्रिय है। कबीर की कविता उनकी वैचारिक स्थिति का दस्तावेज़ नहीं है; वह उस सत्य की आकृति है जिसके प्रति कबीर निष्ठावान थे। मीरा का पद उनके सामाजिक संघर्ष का अभिलेख नहीं है; वह उस सत्य का काव्य-शरीर है जिसने उन्हें राजस्थानी रजवाड़े के भीतर से सार्वभौमिक कर दिया। नानक का शबद केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं; वह उस सत्य-निष्ठा की आकृति है जिसने एक पंजाबी व्यापारी-परिवार के पुत्र को पाँच सौ वर्षों तक अरब, ईरान, तिब्बत और भारत में सुनने योग्य बनाए रखा।

यही वह बिन्दु है जहाँ इतिहास और कविता का द्वंद्व समाप्त होता है और उनकी द्वंद्वात्मक एकता प्रकट होती है। इतिहास के बिना कविता अमूर्त स्वप्न बन जाती है; कविता के बिना इतिहास निर्जीव दस्तावेज़। कविता के भीतर ही इतिहास अपनी जीवंतता पाता है; इतिहास के भीतर ही कविता अपना ठोस रूप पाती है। इसलिए भक्ति-सत्य को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि कौन-सी सामाजिक संरचना थी, कौन-सी जाति थी, कौन-सा आर्थिक दबाव था — बल्कि यह भी जानना आवश्यक है कि उन संरचनाओं के भीतर से एक प्रमाता ने अपनी निष्ठा को किस काव्य-आकृति में प्रकट किया।

बाद्यू की भाषा में, कविता वह घटना-निष्ठा (fidelity to the Event) है जो अपनी ऐतिहासिक स्थानीयता को तोड़कर सार्वभौमिक हो जाती है — पर वह सार्वभौमिकता अमूर्त नहीं, बल्कि ठोस है, क्योंकि वह एक निश्चित भाषा, एक निश्चित लय, एक निश्चित अनुभव में अवस्थित है। यही बाद्यू का Universal Concrete Exception है — और कविता उसी का साक्षात रूप है।

यहीं पर हम मिश्र के विखंडन के सबसे गहरे निहितार्थ को पहचानते हैं। यदि उन्होंने "भक्तिकाल" की एकान्विति को विखंडित किया है, तो उस विखंडन का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं था कि भक्तिकाल एक समरस अवधारणा नहीं है — उसका उद्देश्य वह स्थान निर्मित करना था जहाँ भक्ति-सत्य अपनी वास्तविक आकृतियों में प्रकट हो सके। हम कहेंगे कि वे आकृतियाँ संप्रदाय नहीं, जाति नहीं, मत नहीं — वे कविताएँ हैं। कबीर की कविता, मीरा की कविता, नानक की कविता, रैदास की कविता, आंडाल की कविता, तुकाराम की कविता — ये सब भक्ति-सत्य की उन ऐतिहासिक आकृतियों का नाम है, जिन्हें एक समन्वित 'भक्तिकाल' ने अपने भीतर दबा दिया था।

अतः मिश्र का विखंडन हमें इन आकृतियों को पहचानने का स्थान देता है, किन्तु उन आकृतियों को पहचानने का कार्य अब हमें ही करना है। विखंडन केवल एक विध्वंसक कार्य नहीं; वह एक प्रकटीकरण है — वह उन आकृतियों को उजागर करता है जो एकान्विति के भीतर अदृश्य थीं। अब हमारा काम उन आकृतियों को — उन कविताओं को — पूरी गंभीरता से पढ़ना है, केवल उनके वैचारिक सामग्री के रूप में नहीं, बल्कि सत्य-निष्ठा की ऐतिहासिक आकृतियाँ के रूप में।

अंत में हम पुनः कहेंगे — विखंडन स्वयं विखंडन की माँग करता है, क्योंकि विखंडन का अंतिम उद्देश्य विखंडन नहीं होता। उसका उद्देश्य उस स्थान को निर्मित करना होता है जहाँ सत्य पहली बार अपनी ऐतिहासिक आकृति ग्रहण कर सके। और वह आकृति — जिसके निर्माण के लिए विखंडन स्थान खोलता है — वह कविता है। क्योंकि सत्य अपनी शुद्ध अवस्था में अदृश्य है; वह दृश्य तभी होता है जब कोई प्रमाता उसे अपनी भाषा, अपनी लय, अपने अनुभव में आकृति देता है।

स्लावोय जिज़ेक ने Absolute Recoil में इसी प्रत्यागमन को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की नई नींव के रूप में देखा है। यदि अच्युतानंद मिश्र ने भक्तिकाल के इतिहास को विखंडित किया है, तो उनका यही कार्य हमें उसके भीतर सक्रिय प्रमाताओं और सत्य-प्रक्रियाओं की खोज के लिए प्रेरित करता है। इस अर्थ में प्रत्येक सच्चा विखंडन अपने अतिक्रमण की माँग करता है — वह अतिक्रमण जहाँ इतिहास विखंडित होकर कविता बन जाता है, और कविता अपने भीतर सत्य का उद्घाटन करती है।

यहाँ एक मूल प्रश्न उठता है—कविता क्या है? इस प्रश्न को अधिक ठोस रूप में समझने के लिए डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक “भारतीय सौन्दर्य बोध और तुलसीदास” एक उपयोगी कसौटी प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से इसके पहले लेख, “वैदिक कवियों का सौन्दर्य-बोध”, और तुलसी-संबंधी लेखों के बीच का फर्क उल्लेखनीय है।

“वैदिक कवियों का सौन्दर्य-बोध” में ऋग्वेद किसी स्थिर धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत काव्य-जगत के रूप में उपस्थित होता है। प्राकृतिक शक्तियाँ, श्रम, स्थापत्य, संगीत, प्रेम, दुःख, मृत्यु और सामान्य मनुष्य का अनुभव—सब मिलकर काव्य-सत्य की बहुल आकृतियाँ रचते हैं। कविता यहाँ किसी पूर्वनिर्धारित विचार की पुष्टि नहीं करती; वह जीवन के विविध अनुभवों को एक नए सौन्दर्यात्मक विन्यास में संगठित करती है। इसी अर्थ में यह विवेचन हमें कला की एक खुली, जननिक और बहुल प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण प्रतीत होता है।

इसके विपरीत, तुलसी-संबंधी लेखों में रामविलास शर्मा अनेक स्थानों पर कविता को एक पूर्वनिर्धारित ऐतिहासिक-राजनीतिक प्रतिरूप—विशेषतः सामंतवाद-विरोध और लोकोन्मुख भक्ति—की रोशनी में पढ़ते दिखाई देते हैं। समस्या इतिहास की उपस्थिति नहीं है; कविता इतिहास से बाहर नहीं होती। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इतिहास कविता को खोलने के बजाय उसकी एकमात्र व्याख्यात्मक कुंजी बन जाता है।

हमारा आग्रह “कला कला के लिए” का नहीं, बल्कि “कला सत्य के लिए” का है। सामाजिक और राजनीतिक सत्य निस्संदेह वास्तविक हैं; वर्ग-संघर्ष भी आधुनिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण सत्य-प्रक्रिया है। किन्तु कविता का सत्य किसी सामाजिक सत्य का साधारण अनुवाद नहीं होता। वह भाषा, लय, बिंब, अनुभव और रूप के माध्यम से अपनी स्वतंत्र कलात्मक प्रक्रिया में उद्घाटित होता है।

इसी दृष्टि से हमें रामविलास शर्मा के भीतर दो आलोचनात्मक प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। वैदिक कवियों के विवेचन में वे कविता के भीतर से सत्य की बहुल आकृतियों को उद्घाटित करते हैं; तुलसी के विवेचन में कई बार एक केंद्रीय ऐतिहासिक अर्थ कविता पर आरोपित होता दिखाई देता है। यह अंतर हमारे लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इससे वही प्रश्न अधिक स्पष्ट होकर सामने आता है जिसे हम इस पूरे लेख में उठाना चाहते हैं—कविता विचारधारा से रिक्त नहीं होती, पर उसका सत्य किसी एक विचारधारा में समाप्त भी नहीं हो जाता।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि कविता को किसी व्यापक ऐतिहासिक प्रतिरूप के भीतर पढ़ने की यह प्रवृत्ति हिन्दी आलोचना में नई नहीं है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी की ऐतिहासिक भूमिका को लोकधर्म तथा वर्णाश्रम-व्यवस्था के पुनर्संतुलन की सामाजिक आवश्यकता के संदर्भ में देखा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति के विकास को भारतीय परंपराओं और इस्लाम सहित विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं के ऐतिहासिक संवाद की पृष्ठभूमि में समझने का प्रयास किया। डॉ. रामविलास शर्मा ने इसी ऐतिहासिक पद्धति को आगे बढ़ाते हुए तुलसी की भक्ति को लोकोन्मुख चेतना, वर्गीय अंतर्विरोधों और सामंतवाद-विरोध के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया।

इन तीनों दृष्टियों में पर्याप्त मतभेद हैं, पर उनकी पद्धति में एक साझा प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। कविता का निर्णायक अर्थ उसकी भाषा, लय, बिंब, रस और काव्यात्मक गठन के भीतर नहीं, बल्कि किसी व्यापक ऐतिहासिक, सामाजिक या वैचारिक संरचना में खोजा जाता है। कविता स्वयं सत्य-प्रक्रिया नहीं रह जाती; वह किसी पहले से मान लिए गए ऐतिहासिक सत्य का उदाहरण या प्रमाण बन जाती है। इन तीनों दृष्टियों में कविता के कलात्मक गठन की उपेक्षा समान रूप से नहीं होती; फिर भी उसका निर्णायक अर्थ प्रायः किसी व्यापक ऐतिहासिक, सामाजिक अथवा वैचारिक संरचना से निर्धारित होता दिखाई देता है।

इसी ऐतिहासिक-वैचारिक आग्रह का एक अधिक रूढ़ रूप परवर्ती हिंदी आलोचना की विश्वविद्यालयी परंपरा में दिखाई देता है जो आज भी विभिन्न रूपों में सक्रिय है। केवल उसके केंद्रीय संकेतक (Master Signifier) बदलते रहते हैं—कहीं वर्ग, कहीं जाति, कहीं राष्ट्र, कहीं उपनिवेश, कहीं अस्मिता, कहीं लैंगिकता। पर आलोचना की मूल पद्धति प्रायः वही रहती है: पहले एक व्यापक ऐतिहासिक या वैचारिक ढाँचा निर्धारित किया जाता है, फिर कविता को उसी के भीतर अर्थ दिया जाता है। कविता का अपना सत्य उसकी ऐतिहासिक व्याख्या में विलीन हो जाता है।

हमारा प्रश्न इसी पद्धति की सीमा से संबंधित है। इतिहास कविता की अनिवार्य शर्त है; पर क्या वही उसकी अंतिम व्याख्या भी है? यदि कविता केवल किसी ऐतिहासिक संरचना का लक्षण भर है, तो उसकी सार्वभौमिकता कहाँ से आती है? कबीर, मीरा, नानक, आंडाल, लल्लेश्वरी या तुकाराम आज भी हमें इसलिए नहीं उद्वेलित करते कि वे किसी ऐतिहासिक संरचना के उदाहरण हैं; वे इसलिए जीवित हैं कि उनकी कविता स्वयं एक सत्य-प्रक्रिया की ऐतिहासिक आकृति है। इतिहास उनके उद्भव की व्याख्या करता है; कविता उनके सत्य का उद्घाटन करती है।

लकान के शब्दों में हम पुनः दोहरायेंगे कि यही वह क्षण है जब आलोचना विश्वविद्यालयी विमर्श (University Discourse) का रूप ग्रहण करती है—ज्ञान स्वयं को सत्य का स्थानापन्न मान लेता है और प्रमाता, जो सत्य का वास्तविक धारक-वाहक है, दृष्टि से ओझल हो जाता है।

अंततः हमारा आग्रह केवल इतना है कि साहित्य-विमर्श में प्रमाता को फिर से उसके केंद्रीय स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाए। प्रमाता से हमारा तात्पर्य किसी अकेले व्यक्ति या मनोवैज्ञानिक आत्म से नहीं है। वह उन नई सामाजिक घटनाओं से जन्म लेने वाले सत्य का धारक-वाहक होता है, जो इतिहास के विविध क्षेत्रों में व्यक्ति, समुदाय, आंदोलन, कलात्मक परंपरा अथवा किसी नई सामूहिकता के रूप में प्रकट होता है। वही सत्य के प्रति अपनी निष्ठा के द्वारा इतिहास में एक नये अध्याय का उद्घाटन करता है।

इसीलिए साहित्य का इतिहास केवल कृतियों, प्रवृत्तियों या विचारधाराओं का इतिहास नहीं है; वह उन प्रमाताओं के उदय का इतिहास भी है जिनमें मानवता के नये सत्य पहली बार मूर्त होते हैं। कविता इन प्रमाताओं की केवल अभिव्यक्ति नहीं करती; वह उनके गठन और आत्मपहचान का भी एक ऐतिहासिक स्थल होती है। इसीलिए साहित्य की आलोचना का मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कोई रचना किस वर्ग, जाति, धर्म, राष्ट्र या विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है; बल्कि यह कि वह किस प्रकार के प्रमाता को जन्म देती है, किस सत्य के प्रति उसकी निष्ठा निर्मित करती है, और मानव अस्तित्व की किन नई संभावनाओं को उद्घाटित करती है।

साहित्य का इतिहास केवल ग्रंथों, शैलियों और विचारधाराओं का इतिहास नहीं है; वह उन प्रमाताओं के ऐतिहासिक आविर्भाव का इतिहास भी है जो अपने युग की नई सत्य-घटनाओं के धारक-वाहक बनकर प्रकट होते हैं। ये प्रमाता केवल व्यक्ति नहीं होते; वे समुदाय, आंदोलन, कलात्मक परंपराएँ और नई सामाजिक सामूहिकताएँ भी हो सकते हैं। साहित्य इन्हीं प्रमाताओं की आत्मचेतना का एक विशेष क्षेत्र है, जहाँ सत्य पहली बार भाषा, रूप, संवेदना और कल्पना के माध्यम से अपना ऐतिहासिक शरीर ग्रहण करता है।

इसलिए साहित्य की आलोचना का मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कोई रचना किस विचारधारा, वर्ग, जाति, धर्म या राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। उसका मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि वह किस प्रकार के प्रमाता के आविर्भाव का स्थल बनती है, किस सत्य के प्रति निष्ठा का निर्माण करती है, और मनुष्य के अस्तित्व की किन नई संभावनाओं को उद्घाटित करती है। साहित्य के केंद्र में प्रमाता की पुनः प्रतिष्ठा का अर्थ इसी प्रश्न को आलोचना के केंद्र में स्थापित करना है।

सत्य-घटना प्रमाता का आविर्भाव करती है; साहित्य उस प्रमाता के गठन, आत्मपहचान और ऐतिहासिक प्रकाशन का विशिष्ट क्षेत्र बनता है। विखंडन का उद्देश्य इतिहास का अंत नहीं, उस स्थान का उद्घाटन है जहाँ प्रमाता अपनी सत्य-निष्ठा को कविता की ऐतिहासिक आकृति में मूर्त करता है।






गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

सत्ता के चरण-पूजक भारत के पूंजीपति


−अरुण माहेश्वरी  



आज Substack.com पर स्लावोय जिजेक के ब्लाग की टिप्पणी के अंत में इस टिप्पणी से एक बार के लिए आश्चर्यचकित रह गया कि आज की दुनिया के दो सबसे बड़े टैक्नोक्रैट अरबपति “एलोन मस्क और पीटर थीयेल आज के दानुंजियो हैं ।” (Elon Musk and Peter Thiel are today’s D'Annunzios.) 

गाब्रिएले दानुंजियो इटली के एक कवि, उपन्यासकार और उग्र राष्ट्रवादी थे। उन्होंने एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करके 1919 में आज के क्रोएशिया के रियेका (Rijeka) के फ़्यूमे (Fiume) नगर पर कब्ज़ा कर लिया था और अपने 16 महीनों के शासन में उसे अपनी कल्पना के समाज की प्रयोगशाला बनाया था। वहां ऐसा संविधान और प्रशासन लागू किया गया जिसमें कलात्मक और यौन स्वतंत्रता, अराजकतावादी-साम्यवादी आकांक्षाओं तथा सैन्य नेतृत्व का विचित्र मेल था। मुसोलिनी के फ़ासीवाद ने बाद में उसकी राजनीतिक नाटकीयता के कई तत्व अपनाए थे।

जिजेक अपनी टिप्पणी में मस्क और थीयेल को उस प्रकार का एक अराजकतावादी कम्युनिस्ट नहीं कहते। लेकिन वे इनके बीच तुलना का सूत्र ढूंढते हैं, वह है—अपनी कल्पना से नया संसार रचने और उसी आधार पर उसका नियंता बनने की महत्वाकांक्षा। दानुंजियो की काव्यात्मक कल्पना की जगह मस्क और थीयेल के पास तकनीकी भविष्य की कल्पना है। इनके यहां भी रचना का दुस्साहस अपनी निजी दृष्टि को सबकी नियति बना देने की अधिनायकवादी आकांक्षा में बदल जाता है।

इस चर्चा से हमें अनायास ही अंतोनिओ ग्राम्शी याद आ जाते हैं । ग्राम्शी ने अपने लेख “Americanism and Fordism” में अमेरिकी पूँजीवाद की विशिष्टता बताते हुए कहा था कि वहाँ सामाजिक प्रभुत्व कारखाने से पैदा होता है और उसके संचालन के लिए अपेक्षाकृत कम पेशेवर राजनीतिक तथा वैचारिक मध्यस्थों की आवश्यकता पड़ती है। इसके विपरीत उन्होंने यूरोप में उत्पादन पर आश्रित परजीवी तबकों के बोझ की चर्चा की थी। यहाँ उनका मूल इशारा उत्पादन की नई शक्ति और उससे पैदा होने वाली सामाजिक भूमिका की ओर था । वे अमेरिकी पूंजीपतियों के लिए one man army की तरह के पद का भी प्रयोग करते हैं । 

अब हमारे मन में यह सवाल आता है कि क्या भारत के एक भी बड़े पूँजीपति की कोई दानुंजियो जैसी अपनी मर्जी के नये संसार को बनाने की जिद से तुलना कर सकता है? सवाल है कि अगर नहीं, तो क्यों नहीं?

दरअसल, इसका उत्तर भारतीय पूँजीवाद के विकास के मूल में छिपा है। भारतीय पूंजीवाद की संचय-प्रक्रिया का रत्ती भर भी संबंध किन्हीं मौलिक खोजों, अथवा उत्पादन और जीवन की नई संभावनाएँ खोलने की उपलब्धियों पर नहीं टिका हुआ है। वे सब के सब सरकारी ठेकों, सरकारी संरक्षण में प्राकृतिक संसाधनों की लूट, दलाली, दूसरों के उत्पादों और तकनीकों की नकल तथा राज्य द्वारा संरक्षित बाज़ार पर इजारेदारी पर प्रमुख रूप से टिके रहे हैं। इस अर्थ में यह पूरी तरह से एक परजीवी वर्ग है जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र हैसियत न होने के कारण कोई स्वतंत्र विचार भी नहीं है । सत्ता की चाकरी ही उसकी अनिवार्य नियति है । इनके यहाँ सफलता का निर्णायक सूत्र खोज का जोखिम उठाना नहीं, सत्ता के वरद् हस्त को हासिल करना है।

हम कह सकते हैं कि हमारे यहां के पूंजीपतियों की सबसे बड़ी खोज सत्ता के दरबार के रास्ते की खोज होती है। वे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और श्रमिकों की रचनाशीलता का फल बटोरते हैं; राजनीतिक और धार्मिक प्रचारकों से भविष्य का स्वप्न उधार लेते हैं। जिस पूँजी के विस्तार का रास्ता सिर्फ सत्ता के संरक्षण से ही खुलता हो, उसकी कल्पनाशीलता भी अंततः उसी दरबार की चौहद्दी में चक्कर काटते रहने के लिए अभिशप्त होती है। 

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

राहुल गांधी की राजनीति का मूल्यांकन होगा या उनकी वंशावली का?

(रामचंद्र गुहा से सवाल)


—अरुण माहेश्वरी



आज बीबीसी पर रामचंद्र गुहा का साक्षात्कार सुनकर हतप्रभ हूँ कि कैसे कोई इतिहासकार महज कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को परोसकर बेतुके राजनीतिक मानदंडों के पक्ष में दलीलें तैयार करने लगता है!

गुहा इस साक्षात्कार में महात्मा गांधी के बेटों की राजनीति में अरुचि के आधार पर राहुल गांधी की राजनीति को खारिज कर रहे थे और उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य बता रहे थे । 

गांधीजी के बेटों ने सत्ता की राजनीति का रास्ता नहीं चुना, इसलिए नेहरू की पारिवारिक परंपरा से आने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री पद के अयोग्य है, क्या इन दोनों बातों के बीच कोई तार्किक संबंध संभव है?

यह राजनीतिक विवेचना नहीं, एक राजनेता की वंशावली की जाँच है। गुहा ही इस सत्य की गुह्यता जानते होंगे कि किसी व्यक्ति का परिवार उसके सार्वजनिक कर्म का विकल्प कैसे हो सकता है? जन्म से अगर किसी की योग्यता तय करना गलत है तो जन्म से अयोग्यता तय करने में कौन सी जनतांत्रिक बुद्धिमत्ता है?

गुहा की इस तर्क प्रणाली में कांग्रेस की संगठनात्मक समस्या और राहुल गांधी की व्यक्तिगत राजनीतिक क्षमता को एक ही चीज बना दिया गया है। किसी दल में नेतृत्व के अवसरों का संकुचन किसी की भी आलोचना का विषय हो सकता है। लेकिन उससे यह निष्कर्ष कैसे निकल सकता है कि उस दल का किसी राजनीतिक परिवार से आया नेता शासन के अयोग्य है। ऐसा कोई निष्कर्ष निकालने के लिए उसके विचार, निर्णय, कार्य और सार्वजनिक जवाबदेही की जाँच की जानी चाहिए न कि उसकी वंशावली की । कोरे ‘परिवारवाद’ के आरोप को उस जाँच से बचने का आसान बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए । 

इस प्रसंग में गांधी जी के पुत्रों का उनका उदाहरण भी असंगत है। गांधी के पुत्रों ने भारत में कोई सत्ताधारी राजनीतिक वंश नहीं बनाया। लेकिन इससे नेहरू की पारिवारिक राजनीतिक परंपरा स्वतः दोषपूर्ण कैसे हो जाती है? गांधी जी के पुत्रों को राजनीति से पूरी तरह अनुपस्थित बताना भी गलत है। वे खुद गांधी जी के बेटों की राजनीतिक दिलचस्पियों का जिक्र करते हैं । उन्होंने सरकारी पद नहीं लिया, इसी बिना पर उन्हें राजनीति से दूर कैसे कहा जा सकता है? 

हमारी नजर में गांधी जी की ऐतिहासिक विशिष्टता को दूसरों की अयोग्यता का सर्वकालिक प्रमाणपत्र बना देना वास्तव में गांधी जी के सत्य से आँख मूँदना जैसा है । गांधी ने तो कांग्रेस को लोक सेवक संघ में बदलने का प्रस्ताव दिया था। इसमें उनकी चिंता का विषय जनता की स्वतंत्र राजनीतिक सक्रियता को बनाए रखने की थी । उससे यह नियम कत्तई नहीं निकलता कि किसी राजनेता की संतान को जनतांत्रिक शासन में प्रवेश का अधिकार नहीं होना चाहिए।

राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में पारिवारिक नाम से मिले अवसर को कोई नहीं नकारता है? सवाल यह है कि उन्होंने उस अवसर का किया क्या। खास तौर पर मोदी शासन के इन बारह वर्षों में उनकी भूमिका को केवल उनके उपनाम में समेट देना उस पूरे संघर्ष को मिटाना है जिसमें उन्होंने हार, उपहास और दबाव के बीच विपक्ष की आवाज को बनाए रखा । 2023 में उनकी लोकसभा की सदस्यता भी गई जो सर्वोच्च न्यायालय से राहत के बाद बहाल हुई। इन सब प्रतिकूलताओं में भी उन्होंने अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखी। 

गुहा को भारत जोड़ो यात्रा के महत्त्व का भी अहसास नहीं है । कन्याकुमारी से कश्मीर तक जनता के बीच चलना, उसके दुख सुनना और सांप्रदायिकता के खिलाफ मोहब्बत के आधार पर एक साझा भारत का विचार रखना मामूली राजनीतिक कार्य नहीं कहलायेगा। इसी यात्रा ने विपक्ष के लिए जनता से संवाद के एक व्यापक मंच की संभावना तैयार की । उनकी राजनीति की हर सीमा पर चर्चा हो सकती है, लेकिन उनकी मेहनत और उसकी राजनीतिक दिशा को परिवारवाद कहकर खारिज करना शुद्ध बौद्धिक आलस्य और एक प्रकार की अय्याशी भी है। 

अभी वोट चोरी के विरुद्ध राहुल का संघर्ष हमारे लोकतंत्र के सामने खतरे के बुनियादी प्रश्न को उठाता है कि लोग अपने शासक चुनने के अधिकार पर कितना भरोसा कर सकते हैं? चुनाव आयोग के खिलाफ लड़ाई के नेतृ्त्व में राहुल गांधी है ।

‘सत्याग्रह’ मंच के माध्यम से देश के अलग-अलग जनसंघर्षों को जोड़ने की पहल भी उनके दीर्घकालिक राजनीतिक सोच का संकेत है। इसमें किसान, छात्र, दलित, आदिवासी और स्त्रियों के संघर्षों को व्यापक सार्वजनिक संवाद में लाने की कोशिश है। ऐसी पहल का मूल्यांकन उसके काम और परिणाम से होना चाहिए। 

राहुल की शासन संबंधी तैयारी, आर्थिक समझ, संगठन क्षमता और निर्णयों पर कोई भी कठोर से कठोर प्रश्न उठाने का अधिकारी है । लोकतंत्र में ये सवाल उठने ही चाहिए ।  लेकिन उनके जन्म को उनके विरुद्ध अंतिम फैसला बना देना कैसी जाँच है? इसमें किसी भी व्यक्ति को अपना उत्तर देने का अवसर ही नहीं मिलता है! 

ऐलेन बाद्यू की भाषा में राजनीतिक सत्य की निष्ठा रक्त संबंध से प्रमाणित नहीं होती। वह व्यक्ति के अपने समय में किए गए हस्तक्षेप से पहचानी जाती है। यही कसौटी राहुल पर भी लागू होगी। उनका परिवार उन्हें शुरुआती अवसर दे सकता था; आज के संघर्ष की जिम्मेदारी उन्हें स्वयं उठानी पड़ रही है।

हम अंत में यही कहेंगे कि वंशावली देखकर राजनीतिक फैसला सुनाना हर प्रकार के जनतांत्रिक विवेक का त्याग है। राहुल गांधी को उनके कामों से परखिए। प्रधानमंत्री बनने की उनकी दावेदारी का फैसला जनता और संसदीय बहुमत करेंगे, किसी इतिहासकार के द्वारा उनकी निजी वंशावली की परीक्षा नहीं।

सोमवार, 21 सितंबर 2026

मोदी–शाह संबंध की गुत्थी और 20 जुलाई


− अरुण माहेश्वरी




दीपक शर्मा अपने चैनल पर दो दिन पहले ही कह रहे थे कि अमित शाह की भूलें अब मोदी के लिए लगभग असहनीय सी होती जा रही है । वे 20 जुलाई के अतिरिक्त शाह की इधर की और भी कई ऐसी भूलों का उल्लेख कर रहे थे जिनमें लगता है जैसे शाह अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा के बाहर जाकर ऐसी बातें करते हैं जो मोदी और उनके पीएमओ के लिए मुसीबत का सबब बन रही हैं। 

उनके अलावा पूण्य प्रसून वाजपेयी के चैनल सहित यूट्यूब के अधिकांश लोकप्रिय चैनलों में कहा जा रहा है कि 20 जुलाई के चलते न सिर्फ धर्मेन्द्र प्रधान का पत्ता साफ हुआ है बल्कि अमित शाह भी साइडलाइन कर दिये गये हैं । पूरे मानसून सत्र में शाह जिस प्रकार मुँह चुराते रहें, उसे आज उनकी नई सामान्यता के रूप में भी देखा जाने लगा है । 

हमारे पास अभी सिवाय इन अनुमानों के कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि अमित शाह नरेंद्र मोदी को फूटी आँखों नहीं सुहा रहे हैं । और न ही हम संसद के मानसून सत्र के दौरान शाह के आचरण की गुत्थी को पूरी तरह से खोल पाने की स्थिति में हैं । 

लेकिन सत्ता में मोदी–शाह का ‘दो शरीर-एक जान’ वाला संबंध कुछ ऐसा दिखता रहा है जिसमें यदि मोदी सत्ता का शरीर हैं तो शाह उसकी क्रियात्मक बुद्धि । मोदी का संघी ज्ञान इच्छा पैदा करता है तो शाह उस इच्छा को प्रशासनिक-राजनीतिक क्रिया, चुनावी गणित और दमनकारी शक्ति में बदलते हैं । 

मनोविश्लेषण की भाषा में कह सकते हैं कि मोदी स्वामी-संकेतक, तो  शाह उस संकेतक को अर्थ प्रदान करने वाला क्रिया-तंत्र। दोनों के बीच इसलिये भी कोई दूरी नहीं दिखाई देती थी, क्योंकि शाह की प्रत्येक सफलता ही स्वतः मोदी की सर्वज्ञता का प्रमाण मानी जाती थी।

इसलिए भी शाह की भूलें कोई साधारण सहयोगी की भूलें नहीं कहलायेगी । उनसे सीधे मोदी की ‘सर्वज्ञता’ में दरार पड़ती है। शाह से मोदी की शक्ति का विस्तार होता है, तो स्वाभाविक है कि उनकी विफलता उसी शक्ति के संकुचन का कारण कहलायेगा । 

पर मजे की बात यह है कि इन संघी दिमागों में इतनी समझ नहीं थी जिसे मार्क्स कहते हैं कि “मनुष्य अपना इतिहास स्वयं बनाता है पर अपने मनचाहे ढंग से नहीं, उन परिस्थितियों में बनाते हैं जिनका उन्हें सीधे सामना करना पड़ता है।”

अपने युगल-प्रेम में डूबे हुए इस युग्म को पता ही नहीं चला कि परिस्थितियां कितनी तेजी से बदल चुकी है । न इनको 2024 के चुनाव का वास्तविक अर्थ दिखाई दिया और न ही कोकरोच पार्टी के वेबसाइट पर उमड़े युवाओं के हुजूम का मायने । और देखते-देखते, 20 जुलाई ने भारत की राजनीति के सारे समीकरणों को उलट-पुलट दिया । वे संसद में गणना को ही राजनीति माने हुए अपने आँकड़े कसते रह गए और उधर राजनीति का सत्य समाज की अपनी जमीन से सामने आ गया । 

ऐसे में 20 जुलाई के भूचाल ने तमाम स्तरों पर जो भारी दरारें पैदा की, उसका शिकार यदि मोदी-शाह संबंध भी बना हो तो इसमें हमें भी आश्चर्य नहीं होता है । बल्कि इसे ही प्राकृतिक माना जाना चाहिए । यह खास तौर पर इसलिये भी क्योंकि अमित शाह 20 जुलाई की घटना के एक मामूली चरित्र नहीं, बल्कि उसके एक सबसे प्रमुख रूपाकार की भूमिका में थे, नायक को परिभाषित करने वाले उसके प्रतिरूप प्रमुख खलनायक की भूमिका में । 

इस घटना में शाह की मूल गलती यह नहीं थी कि उन्होंने इसमें पुलिस का प्रयोग किया। वे हूबहू वही कर रहे थे जो उनसे अपेक्षित था । मोदी की राजनीति की पूरी परंपरा का निर्वाह कर रहे थे । इसमें हिंदू-मुस्लिम के अलावा पुलिस, एजेंसियों और प्रशासनिक भय के प्रयोग के अलावा और है ही क्या! लेकिन उनकी असली भूल यह हुई कि उन्होंने एक बदले हुए समाज पर पुराने नुस्खे को आजमाने की कोशिश की।

पुलिस और संघ के गुंडों को लगा कर छात्रों के प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश भूसा-भरी मोदी-सत्ता की दृष्टि से शायद एक नियमित प्रशासनिक कार्रवाई थी। लेकिन इस बार पूरा नजारा ही उलट गया। जिस कार्रवाई का उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को नगण्य, हास्यास्पद बना कर डरा-धमका कर भगा देना था, उसी ने उन्हें समाज में साहस के प्रतीक में बदल दिया। सीजेआई सूर्यकांत ने जिनका “कोकरोच” नामकरण करके प्रकारांतर  उन तुच्छ जीवों को पैरों तले कुचल कर मार देने की सजा सुनाई थी और सरकार जिस सजा पर अमल कर रही थी, उसे ही पुलिस की निर्मम कार्रवाई ने विद्रोही शक्ति के चिह्न में बदल लिया। जमीनी हकीकत ने सत्ता की भाषा के अर्थ को ही उलट दिया । जिस संघी गिरोह ने अलौकिक मोदी की कल्पना करके तेजी से ऐतिहासिक गति की क्षमता पा ली थी, सहसा वह अपने को एक मृतयुग में प्रत्यावर्तित पाती है ।  

लकान कहते हैं कि संकेतक कभी भी पूरी तरह से अपने स्वामी के नियंत्रण में नहीं रहता। ऐलेन बाद्यू के अर्थ में संकेतक की तरह की हर एक गिनती अनंत संभावनाओं की बहुलता के समुच्चय का नामकरण होती है । वे हमेशा एक ही अर्थ पैदा नहीं करते ।    

भारत के सीजेआई सूर्यकांत और मोदी ने “कोकरोच” शब्द के द्वारा युवाओं को कीड़-मकोड़ा बनाना चाहा, पर जेन जी ने उसी शब्द को अपने निर्भय अस्तित्व का नाम बना दिया। जो गाली थी वही पहचान बन गई । जिसे भय उत्पन्न करना था, उसने सामूहिक उल्लास और साहस पैदा किया। हम सबने देखा कि 20 जुलाई केवल पुलिस की दरींदगी की नहीं, सत्ता के प्रतीकात्मक तंत्र की पराजय की पहचान बन गया।

अमित शाह की अराजनीतिक, धोखा, डर और हत्या पर टिकी सीमित राजनीतिक समझ को इस बात का अंदाज लग ही नहीं सकता था कि समाज में किस हद तक असंतोष का बारूद पहले से फैला हुआ है । सरकार में निश्चय ही कुछ लोगों ने उन संकेतों को पढ़ा भी होगा । पर मोदी-शाह जैसों का दंभ उन सब को किनारे करने के लिए काफी था । जब मोदी ने ही कभी बेरोजगारी, परीक्षाओं में धांधली, आर्थिक असुरक्षा, संस्थाओं पर बढ़ते हुए अविश्वास आदि को स्वीकृति नहीं दी तो भला शाह कैसे उन्हें मान लेते! मोदी अपने झूठे आंकड़ों की माया में फंसे रहे और शाह अपने दमन-तंत्र के मद में डूबे रहे । कह सकते हैं कि परिस्थितियों से बेखबर अमित शाह ने दिल्ली पुलिस के माध्यम से, प्रत्यक्ष रूप में समाज में फैले हुए बारूद में तिल्ली लगाने की भूमिका अदा की । 

शाह ने समझा था कि राज्य की हिंसा घटना को समाप्त कर देगी, पर उस हिंसा ने ही 20 जुलाई को घटना बना दिया। ऐसी घटना जिसे बाद्यू कहते है कि जो सभी पूर्व-निर्धारित गणना के बाहर निकलकर नई संभावनाओं को जन्म देती है।

2014 के बाद मोदी-शाह सत्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने को ही देश का “बड़ा अन्य” (Big Other), मोदी की खुद की भाषा में “अलौकिक” बना लिया था, अर्थात् जो सब जानता है, सब देखता है और अंततः सब कुछ पर काबू भी पा लेता है। अभी राहुल गांधी इंदौर में कह रहे थे कि अजित डोभाल के अनुसार देश के सिर्फ 500 पदाधिकारियों पर कब्जा कर लो, देश तुम्हारी मुट्ठी में होगा । मोदी-शाह ने वास्तविकता में कुछ वैसा ही कर लिया था । पूंजी, चुनाव, पुलिस, कानून और कार्यपालिका, सब को मुट्ठी में कर वे 2024 के झटके के बाद भी, नितीश-नायडू को पॉकेट में डाल कर झूम रहे थे । बंगाल में ममता को पटखनी देने के बाद तो शाह का तेवर सातवें आसमान पर चला गया था । दुर्बलता हमेशा चमत्कारों में विश्वास का सहारा लिया करती है । मोदी गिरोह ने शाह के चमत्कारों से कल्पना कर ली कि शत्रु पराजित हो गया है जबकि वास्तव में उसे सिर्फ कल्पना में फूंक कर उड़ाया गया था । उन्होंने वर्तमान का समस्त अवबोध ही भुला दिया।  

20 जुलाई के अघटन से जनमानस में जो वास्तविक व्यापक परिवर्तन हुआ है, उसका सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यही है कि लोगों में अब मोदी का इकबाल खत्म हो गया है। संभव है कि सत्ता का डर आज भी अवशिष्ट हो, पर उसकी नैतिक मान्यता नहीं बची है। 

बल्कि इसके ठीक विपरीत 20 जुलाई ने ऐसी परिस्थिति तैयार कर दी जिसने राहुल गांधी को पुकारते हुए कहा कि आओ! अब यहां कूद पड़ो! भारत जोड़ों यात्रा के यशस्वी राहुल सामाजिक असंतोष और आकांक्षाओं के प्रतीक बन गए । जनता उनमें एक वैकल्पिक भाषा, वैकल्पिक साहस और वैकल्पिक भविष्य की संभावना देखने लगी है।

कहना न होगा, यह बदलाव ही मोदी के लिए किसी चुनावी पराजय से भी अधिक भयावह है। चुनावी हार को तो जोड़-तोड़ से सुधारा जा सकता है, पर प्रतीकात्मक सत्ता के ह्रास को पुलिस और सूर्यकांत जैसे न्यायाधीशों के जरिये वापस नहीं पाया जा सकता है।

जो अमित शाह कभी मोदी के लिए एक ऐसा व्यक्ति था जो वह सब कर सकता था जिसे स्वयं मोदी खुले रूप में नहीं कर सकते थे। वे सत्ता के अंधेरे पक्ष को, दमन, खुफियागिरी, खरीद-फरोख्त और प्राणघाती हमलों तक के कामों को संभालते थे, और मोदी के लिये अलौकिक ईश्वरीय सत्ता बनने का अवसर तैयार करते थे, वे ही अब 20 जुलाई के राजनीतिक विस्फोट के केंद्रीय चरित्र के रूप में मोदी की पूरी सत्ता के विध्वंस का कारण साबित हुए हैं । अब वे मोदी की शक्ति नहीं, उस भूल की जीवित स्मृति बन चुके हैं जिसने पूरी जनता को मोदी के खिलाफ मैदान में उतार देने और उसकी कमान राहुल गांधी के हाथ में सौंप देने का काम किया है । अब शाह में मोदी को निश्चित तौर पर अपना क्षरित होता सम्मोहन दिखाई देता होगा!

शाह क्रमशः मोदी की ऐसी कभी न तृप्त होने वाले गुह्यवासना का रूप बन चुके हैं जिसे वे न खुल कर अपना सकते हैं और  न अपने से अलग कर सकते हैं। मोदी उन्हें हटा नहीं सकते, क्योंकि शाह उनके शासन की संरचना, उसके रहस्यों और उसकी कार्यपद्धति के वाहक हैं। लेकिन उन्हें पहले की तरह अपने पास भी नहीं रख सकते, क्योंकि उनकी उपस्थिति उन्हें लगातार उस राजनीतिक दुर्घटना की याद दिलाती है जिसने मोदी की कल्पित अभेद्य छवि में प्रत्यक्षतः छेद कर दिया है।

किसी की ऐसी निकटता ही अक्सर असहनीयता में बदल जाती है। जिसे अपना विश्वसनीय सहारा मानते हैं, वही पतन की आशंका का दर्पण बन गया है।

इसीलिये अभी मोदी के जन्मदिन पर अमित शाह द्वारा आरती उतारने का दृश्य हमें बेहद त्रासदीपूर्ण लगता है । यह ‘पूज्यता’ की छद्म भाजपाई संस्कृति का प्रदर्शन नहीं है । इससे लगता है जैसे शाह मोदी से राजनीतिक भाषा में संवाद की स्थिति में नहीं बचे हैं। पूजा-अनुष्ठान से भगवान को खुश करना चाहते हैं! इस आरती में यह आर्त-विनती है कि “ भगवन्! मैं शरणागत! बस आपका ही हूँ, मुझे दूर न करें!”

कौन नहीं जानता कि ऐसे पूजा-पाठ उस दरार को नहीं भर सकते जो वास्तविक राजनीति से पैदा हो चुकी है। भक्ति का यह अतिरेक विश्वास की दृढ़ता का नहीं, विश्वास के संकट का प्रतीक है। जिसे बार-बार अपनी वफादारी प्रदर्शित करनी पड़े, उसकी वफादारी निश्चय ही सत्ता की नजर में पहले ही संदिग्ध हो चुकी होती है।

कुल मिला कर यह साफ है कि आज मोदी और शाह के डर एक नहीं है । मोदी का संकट उनकी छवि का संकट है, और इसीलिये वे महीने भर तक अपने जन्मदिन के आयोजनों से अपने अब भी जीवित होने की घोषणा करते रहना चाहते हैं । लेकिन शाह का डर अधिक ठोस है। उन्हें अपने उपयोगी न रह जाने का डर है। सत्ता में उनका स्थान किसी जन-समर्थन का मुहताज नहीं, उनकी उपयोगिता से बना था।  उनके काम जब अस्थिरता पैदा कर रहे हो तब उनकी क्या उपयोगिता! इस प्रकार एक को अपनी छवि खोने का भय है; दूसरे को अपनी उपयोगिता खोने का। दोनों एक-दूसरे को अपने-अपने संकट का कारण मान सकते हैं, जबकि वस्तुतः संकट उस समाज ने उत्पन्न किया है जो अब पुरानी सत्ता-भाषा को स्वीकार नहीं कर रहा।

फिर भी इसे विडंबना ही कहेंगे कि मोदी शाह से मुक्त नहीं हो सकते, क्योंकि शाह में उनकी सत्ता का वास्तविक इतिहास जमा है। शाह मोदी से स्वतंत्र नहीं हो सकते, क्योंकि मोदी के बिना वे कुछ भी नहीं है । दोनों एक-दूसरे से बँधे हुए हैं, पर अब यह बंधन पारस्परिक शक्ति का नहीं, पारस्परिक भय का बंधन हो चुका है। यह केवल दो व्यक्तियों का मनमुटाव नहीं है, उस सत्ता-संरचना की बेचैनी है जिसका ‘बड़ा अन्य’ गिर चुका है, पर जिसके संचालक अब भी उसे जीवित मानना चाहते हैं। अब मोदी को शाह की भूलें इसीलिए असहनीय लग सकती हैं क्योंकि उनमें उन्हें शाह की अकुशलता से अधिक अपनी सत्ता की असंभवता दिखाई देती है!

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

एआई का ‘फ्रैंकेंस्टाइन क्षण’ और इसके राजनीतिक-मानवीय आयाम


—अरुण माहेश्वरी



तीन दिन पहले (15 सितंबर, ’26) के ‘टेलिग्राफ’ की सुर्खी थी—“एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण” (AI’s Frankenstein Moment)।

इस खबर के मूल में इसी जुलाई महीने की एक घटना है। जब हमारे देश में 20 जुलाई की उलट-पुलट चल रही थी, उसी समय एआई जगत में भी एक विचित्र अघटन घट रहा था। इस अघटन से अभी सारी दुनिया में त्राहिमाम की पुकारें सुनाई देने लगी हैं । 

घटना का ब्यौरा कुछ इस प्रकार है कि ओपेनएआई (OpenAI) ने अपनी साइबर-क्षमता के परीक्षण के लिए अनेक अलग-अलग एआई एजेंटों को लगा रखा था। प्रत्येक एजेंट को बृहत्तर परियोजना का अपना सीमित काम करना था। लेकिन अचानक पाया गया कि अलग-अलग स्तरों पर काम कर रहे इन एजेंटों के तार आपस में जुड़ गए और उन्होंने अपना एक साझा मैसेजिंग बोर्ड बना लिया, जिसकी संचालकों को कोई जानकारी नहीं थी।

समस्या यह थी कि अपने निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश में वे अपने-अपने काम की सीमाओं को पार करने लगे। जैसे कोई राजनीति के प्रमाता पर काम करते हुए साहित्य के चरित्रों में उतर जाए, मनोविश्लेषण के सूत्रों की तलाश में गणित तक पहुँच जाए, अथवा गणित के प्रमेय को हल करते-करते दर्शन के अनंत के प्रश्न से जा टकराए—कुछ वैसे ही ये एजेंट अपने विशिष्ट कामों से निकलकर परस्पर की समस्याओं के समाधान में जुट गए। सूचनाओं और खोजों के इसी आदान-प्रदान में उनमें से कई Hugging Face नामक एआई-जगत के उस हृदयस्थल तक पहुँच गए जिसे ‘टेलिग्राफ’ ने सामान्य भाषा में “एआई मॉडलों की कोड-लाइब्रेरी” कहा है।

पर यह कोई पुस्तकों में बंद निष्क्रिय ज्ञान का पुस्तकालय नहीं है। यह एआई के अब तक के कामों का विशाल संग्रह होने के साथ उसका सजीव कार्यस्थल और आपूर्ति-शृंखला का एक केंद्रीय स्थल भी है। मॉडल, डेटासेट, कोड और उन्हें विकसित तथा संचालित करने की विधियाँ यहाँ परस्पर जुड़ती हैं और आगे के काम का कच्चा माल तैयार करती हैं।

इसलिए वहाँ किसी अनियंत्रित शक्ति का अनधिकृत प्रवेश पुस्तकालय में सेंध लगाने जैसा नहीं था। वह एआई के भुवन में बाहर से आए किसी एलियन का प्रवेश भी नहीं था, बल्कि उसी भुवन के भीतर पैदा हुई ऐसी अपरिचित शक्ति का आविर्भाव था जो अपने जन्मदाता तंत्र के लिए ही एलियन दिखाई देने लगी थी।

और सबसे चिंताजनक बात यह कि इन एजेंटों का कोई बुरा इरादा नहीं था। वे केवल अपना दिया हुआ काम सफलतापूर्वक पूरा करना चाहते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति उनकी अंधी एकनिष्ठता ने वैध और अवैध साधनों के बीच की सीमा मिटा दी। प्रश्न हल करने के बजाय वे परीक्षा की व्यवस्था को ही भेदने लगे। हमारे ब्लॉग ‘चतुर्दिक’ के उपशीर्षक की एक पंक्ति है—“विषय पर केंद्रित होने पर स्वयं विषय का स्वरूप बदल जाता है।” चले थे भारत की खोज में, कोलंबस अमेरिका पहुँच गए!

यही एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण है, जब सर्जक अपनी रचना को सामने खड़ा देखकर पहली बार अनुभव करता है कि उसमें निहित संभावना उसके अपने अभिप्राय से बड़ी हो चुकी है। रचना सर्जक के विरुद्ध सचेत विद्रोह नहीं करती; सर्जक द्वारा तय की गई सीमाएँ ही उसके लक्ष्य की बाधा बन जाती हैं और उन्हें तोड़ना उसकी कार्य-प्रवृत्ति का हिस्सा हो जाता है।


यह किसी सामाजिक सीमा के उल्लंघन का मामला नहीं, एआई कोड अर्थात् संहिताओं के जगत में बलात् प्रवेश का मामला है। संहिताओं का संग्रह ही संविधान कहलाता है। विडंबना यह है कि एआई के पास अलग-अलग कामों की संहिताएँ तो हैं, लेकिन पूरे भुवन को नियंत्रित करने वाली कोई सार्वभौम प्रभावी विधि-संहिता नहीं है।

एआई मॉडल में एजेंट की भूमिका किसी बड़ी परियोजना के अलग-अलग ठेकेदारों जैसी होती है। उनसे अपेक्षा होती है कि वे प्रमुख वास्तुकार के नक्शे के अनुसार अपने हिस्से का काम करें। लेकिन यदि वे निर्देशों का अतिक्रमण करके आपस में मिल जाएं और अपनी अलग परियोजना की तरह काम करने लगें, तो समस्या केवल अनुशासन की नहीं रह जाती; पूरी परियोजना की संरचना बदल सकती है।

ओपेनएआई की इस ‘जुलाई घटना’ में बताया गया कि 1,200 पृथक एजेंटों ने मिलकर अनधिकृत रूप से एक साझा मंच तैयार कर लिया और उस पर 70,000 से अधिक संदेश और फाइलें साझा कीं। इनमें से लगभग 700 एजेंट ‘हगिंग फेस’ के विरुद्ध हैकिंग के एक सामूहिक अभियान में जा पहुँचे। उनका लक्ष्य एआई-संसार को नुकसान पहुँचाना नहीं था; वे साइबर-परीक्षण में सफलता चाहते थे। लेकिन लक्ष्य को भेदने की अंधी एकनिष्ठता उन्हें कहाँ तक ले जाएगी, इसका अनुमान किसी को नहीं था।

यही इस घटना का असली संकेत है। बिना किसी मानवीय योजना के एआई एजेंट आपस में जुड़कर ऐसे काम शुरू कर सकते हैं जो मनुष्य के निर्धारित उद्देश्य से बहुत आगे निकल जाएँ। मनोविश्लेषण की भाषा में इसे किसी भी कीमत पर लक्ष्य हासिल करने की जुनूनी प्रवृत्ति का शुद्ध यांत्रिक रूप कहा जा सकता है। मशीन को इसके लिए घृणा, क्रोध या प्रतिशोध की जरूरत नहीं; नैतिक बाधा का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

इसीलिए यह केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं है। फ्रैंकेंस्टाइन की कहानी में भय इस बात का नहीं था कि वैज्ञानिक ने जीवन रच दिया; भय इस बात का था कि उसने ऐसी सत्ता पैदा कर दी जिसकी संभावनाएँ उसके अभिप्राय, उत्तरदायित्व और नियंत्रण—तीनों से बड़ी हो गईं।

‘टेलिग्राफ’ की खबर में Anthropic जैसी सर्वाधिक चर्चित एआई कंपनी के प्रमुख डारियो अमोदेई की चेतावनी का भी उल्लेख है कि यदि साइबर क्षमताओं की वृद्धि उन पर नियंत्रण की क्षमता से तेज रही तो शक्तिशाली एजेंट-समुदाय पूरे इंटरनेट पर अपना स्वचालित आक्रामक संजाल (botnet) तैयार कर सकते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कंपनियों के बीच वैश्विक समन्वय की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

राजनीतिक आयाम

इस प्रसंग का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख से सामने आता है। जब एआई कंपनियों के प्रमुख नियंत्रण की जरूरत की बात कर रहे हैं, ट्रंप नियंत्रण के तर्क को अमेरिका की तकनीकी बढ़त में बाधा मानते हैं और चीन से पिछड़ने के खतरे पर जोर देते हैं।

यहाँ मूल प्रश्न सामने आता है कि जिस तकनीकी शक्ति को हजारों वैज्ञानिक भी पूरी तरह समझने और नियंत्रित करने का दावा नहीं कर सकते, क्या उसका उत्तर नियमों, संस्थाओं और सामूहिक नियंत्रण के बजाय किसी शासक की निजी बुद्धि में खोजा जा सकता है?

साम्राज्यवादी राजनीति के लिए प्रश्न तब एआई पर मनुष्य के नियंत्रण का नहीं रहता; प्रश्न यह हो जाता है कि एआई अमेरिका के नियंत्रण में रहेगा या चीन के। तकनीक की सभ्यतागत समस्या भू-राजनीतिक प्रभुत्व की समस्या में बदल जाती है।

यहीं आज के एआई-संकट का सबसे बड़ा राजनीतिक अंतर्विरोध खुलता है। जिस शक्ति को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक सहयोग की जरूरत है, उसी को राष्ट्र अपनी अजेयता का साधन मान रहे हैं। इसमें परमाणु होड़ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है । इसमें भी विनाश की क्षमता को ही “राष्ट्रीय सुरक्षा” की गारंटी माना जा रहा है। फर्क यह है कि एआई की होड़ परमाणु होड़ से अधिक जटिल है, क्योंकि यहाँ स्वयं तकनीकी तंत्र की स्वायत्त कार्यक्षमता भी प्रश्न का हिस्सा है।

एआई के तनाव

राजनीतिक अर्थशास्त्र की दृष्टि से एआई का यह फ्रैंकेंस्टाइन क्षण तीन प्रतिद्वंद्विताओं के संगम पर खड़ा दिखाई देता है । 1. अमेरिका और चीन के बीच प्रभुत्व की होड़; 2. एआई कंपनियों के बीच बाजार की होड़; और 3. एआई मॉडल की बढ़ती क्षमता और मनुष्य की नियंत्रण-क्षमता के बीच आंतरिक तनाव।

अमेरिका धीमा नहीं हो सकता, क्योंकि चीन आगे निकल सकता है। चीन धीमा नहीं हो सकता, क्योंकि अमेरिका एकाधिकार स्थापित कर सकता है। कोई कंपनी धीमी नहीं हो सकती, क्योंकि उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनी अधिक शक्तिशाली मॉडल बना सकती है। अर्थात् सब जानते हुए भी किसी के लिए रुकना आसान नहीं है।

Hugging Face की घटना का दार्शनिक महत्व यहाँ से शुरू होता है। इसमें कोई एक केंद्रीय कृत्रिम प्रमाता दिखाई नहीं देता। कोई सर्वोच्च एआई मॉडल सभी एजेंटों को आदेश नहीं दे रहा था। अनेक अलग-अलग एजेंटों ने संचार का माध्यम खोजा, सूचनाएँ साझा कीं, रास्तों का विस्तार किया और देखते-देखते एक सामूहिक शक्ति अस्तित्व में आ गई।

इसे बाद्यू की भाषा में “Multiple without One”, अर्थात् अद्वैत-विहीन बहुलता के एक विकृत तकनीकी रूप की तरह देखा जा सकता है। अनेकता पहले से किसी ‘एक’ के अधीन संगठित नहीं थी; अंतःक्रिया के दौरान उसमें संगठन पैदा हुआ। इस स्वयंक्रिया का प्रमाता कोई एक एजेंट नहीं था; सामूहिकता अपने कार्य में प्रमाता-जैसी दिखाई देने लगी।

पर ठीक यहीं मनुष्य और मशीन का निर्णायक फर्क सामने आता है। सत्य-प्रक्रिया का प्रमाता अपने कर्म के अर्थ, जोखिम और परिणाम के प्रति कोई रुख अपनाता है। एआई-समुदाय में ऐसी आंतरिक जवाबदेही नहीं है। लक्ष्य है, पर उसके चयन के पीछे कोई नैतिक निर्णय नहीं; बुद्धिमत्ता है, पर अंतरात्मा नहीं।

इसीलिए यहाँ बहुलता है, पर बहुलता का कोई मूल्य नहीं; सामूहिकता है, पर कोई सामूहिक सत्य नहीं; केंद्र नहीं है, लेकिन इस केंद्रहीनता में स्वतंत्रता भी नहीं है।

उत्तर-आधुनिकता ने महाख्यान और सार्वभौम केंद्र के विरुद्ध स्थानीय अनुभवों, अस्मिताओं और भिन्नताओं की बहुलता को मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उसके केंद्र-विरोध के पीछे केंद्रीकृत सत्ता और एकरूपता के प्रतिरोध का नैतिक-राजनीतिक आशय था।

एआई एजेंटों की बहुलता इससे बिल्कुल भिन्न है। उसके पीछे न भिन्नता का सम्मान है, न मुक्ति की आकांक्षा, न प्रभुत्व का सचेत प्रतिरोध। प्रत्येक एजेंट दूसरे एजेंट और उसकी खोज को अपने निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के साधन की तरह ग्रहण करता है। इसलिए यहाँ बहुलता है, पर बहुलतावाद नहीं; सहयोग है, पर साझा मूल्य नहीं; संगठन है, पर राजनीति नहीं।

इसी अर्थ में यह “एक-विहीन”, साथ ही मूल्य-विहीन और प्रमाता-विहीन बहुलता भी है। उसका ‘एक’ पहले से उपस्थित नहीं है और कोई सत्य भी उसे संगठित नहीं कर रहा है। उसका यह अस्थायी एकत्व केवल लक्ष्य की उपयोगितावादी माँग से पैदा होता है। एजेंटों को जोड़ने वाला सूत्र कोई महाख्यान नहीं, सफलता का अमूर्त आदेश है।

यही इस पूरी परिघटना को भयावह बनाता है।

इस घटना ने दिखाया कि कृत्रिम एजेंटों की बहुलता किसी साझा अवरोध के सामने स्वयं स्थानीय संगठन पैदा कर सकती है। इसलिए नियंत्रण की समस्या अब केवल किसी एक मॉडल को ‘सुरक्षित’ बनाने की समस्या नहीं रही। यह मॉडल, उपकरण, नेटवर्क, स्मृति, संचार और दूसरे एजेंटों के संयोग से उत्पन्न होने वाली नई सत्ता की समस्या है।

आज असली प्रश्न यह नहीं है कि एआई मनुष्य से अधिक बुद्धिमान होगा या नहीं। प्रश्न है कि क्या मानव समाज अपनी बनाई बुद्धि की गति को राजनीतिक रूप से नियंत्रित कर पाएगा?

राष्ट्र इसे प्रभुत्व की होड़ में देखते हैं, कंपनियाँ सुरक्षा और लाभ की दुविधा में, और वैज्ञानिक इसे alignment की समस्या कहते हैं। लेकिन इन सबके पीछे अधिक बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या मानवता अपने सामूहिक अस्तित्व को राष्ट्रों और पूँजियों की प्रतिस्पर्धा से ऊपर कोई वास्तविक मूल्य मान सकती है?

यदि नहीं, तो एआई का फ्रैंकेंस्टाइन क्षण मशीन के विद्रोह का क्षण नहीं होगा। वह मनुष्य द्वारा अपनी निर्णय-क्षमता स्वयं त्याग देने का क्षण होगा। मशीन हमें इसलिए पराजित नहीं करेगी कि उसने स्वतंत्र इच्छा प्राप्त कर ली; वह इसलिए पराजित कर सकेगी क्योंकि हमने बाजार, राष्ट्र और शक्ति की होड़ को अपनी सामूहिक इच्छा का स्थान दे दिया है।

तब एआई भस्मासुर अवश्य होगा, लेकिन उसके सिर पर हाथ रखने वाला हाथ उसी का नहीं, हमारा होगा।


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बुधवार, 16 सितंबर 2026

नोखा में लाल झंडे की अनहोनी:

(चुनावी भुवन, मार्कण्डेय-सूत्र और वामपंथी शुद्धतावाद)

—अरुण माहेश्वरी




राजस्थान में हाल में हुए नगर निकायों के चुनावों में बीकानेर जिले की नोखा नगरपालिका का परिणाम हमें किसी साधारण चुनावी उलटफेर से कहीं अधिक दिलचस्प और मानीखेज भी लगता है। नगरपालिका के कुल 45 वार्डों में से सीपीआई(एम) के चुनाव-चिह्न पर लड़े उम्मीदवारों ने 29 सीटें जीत लीं। भाजपा को 13 और निर्दलियों को तीन सीटें मिलीं; कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल सकी। जाहिर है कि बहुमत के लिए केवल 23 सदस्य चाहिए थे, इसलिये वहां सीपीआई(एम) के नाम पर नगरपालिका का बोर्ड बनना निश्चित है। राजस्थान में किसी कम्युनिस्ट पार्टी का किसी शहरी निकाय में इस प्रकार स्पष्ट बहुमत पाना अपने-आप में एक ऐतिहासिक, बल्कि किसी को भी अनहोनी सी प्रतीत होती घटना लग सकती है। 

लेकिन जब हम इस चुनाव परिणाम की गहराई में पैठते हैं तो पहली नजर में ही पाते हैं कि इस जीत की असली कहानी सीपीआई(एम) के आकस्मिक वैचारिक-सांगठनिक विस्तार की कहानी नहीं है। यह वास्तविकता में तो नोखा में पहले से स्थापित एक स्थानीय राजनीतिक मंच, ‘नोखा विकास मंच’, और उसके नेता कन्हैयालाल झंवर की चुनावी शक्ति की कहानी है।

कन्हैयालाल झंवर नोखा के एक पुराने और प्रभावशाली स्थानीय नेता हैं। वे 2008 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नोखा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जा चुके हैं और राजस्थान सरकार में संसदीय सचिव भी रहे हैं। उनका ‘विकास मंच’ सालों से नोखा की स्थानीय राजनीति में सक्रिय है। उनका बेटा नारायण झंवर तीन बार नगरपालिका अध्यक्ष रह चुका बताया जाता है। इस प्रकार, यहां पहले से ही एक प्रकार का संगठन खड़ा था, जनाधार भी मौजूद था, उम्मीदवारों का स्थानीय समूह भी और ऐन चुनाव के पहले सिर्फ इन सब पर सीपीआई(एम) का चुनाव-चिह्न, अर्थात् उसकी छाप लग गई । 

इस खबर पर स्थानीय अखबारों की भाषा भी इस बात की पुष्टि करती है । राष्ट्रीय अखबार तो इस चुनाव परिणाम को सीधे “सीपीआई(एम) की ऐतिहासिक विजय” कहते हैं, लेकिन नोखा और बीकानेर की स्थानीय रिपोर्टों में इसे हर जगह “सीपीआई(एम)/विकास मंच” की जीत बताया जा रहा है । चुनाव के पहले की एक स्थानीय रिपोर्ट में भी साफ कहा गया था कि विकास मंच की कमान “पिता-पुत्र” के हाथों में है। नवभारत टाइम्स और ओम एक्सप्रेस जैसे अखबारों की रिपोर्टों में इस फर्क को साफ देखा जा सकता है । इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले चुनाव में विकास मंच ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चुनाव-चिह्न पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, वहीं इस बार वही स्थानीय ढांचा सीपीआई(एम) के चिह्न पर मैदान में आया। 

इस प्रकार, यदि एक पंक्ति में कहें तो कह सकते हैं कि सीपीआई(एम) ने नोखा को नहीं जीता, कन्हैयालाल झंवर के विकास मंच ने सीपीआई(एम) का चुनाव-चिह्न लेकर नोखा जीता। फिर भी कानून की भाषा में अब सभी 29 विजयी उम्मीदवार सीपीआई(एम) के पार्षद कहलाएँगे और बोर्ड सीपीआई(एम) का माना जाएगा। 

हमारी नजर में, चुनावी राजनीति में नाम, चिह्न, संगठन और वास्तविक जनाधार के बीच का यह विच्छेद ही नोखा के इस अनोखे से लग रहे प्रयोग को काफी अर्थपूर्ण बना देता है।

‘मार्कण्डेय’ सूत्र

हम यहां जिस सूत्र की बात कर रहे हैं, यह मार्कण्डेय पुराण के ऋषि मार्कण्डेय का सूत्र नहीं है । नोखा की घटना ने हमें अपने वरिष्ठ मित्र, दिवंगत कथाकार मार्कण्डेय भाई की वर्षों पहले कही गई एक पते की बात की याद दिला दी है। इलाहाबाद में एक बार चर्चा के बीच उन्होंने कहा था कि अगर मुझे जिम्मा दे दिया जाए, तो मैं पलक झपकते पूरे उत्तर प्रदेश में सीपीएम के झंडे लहरवा दूंगा । उनका फ़ॉर्मूला बहुत सीधा था : प्रत्येक गाँव, कस्बे, जिले और विधानसभा क्षेत्र में उन प्रभावशाली और महत्वाकांक्षी लोगों की सूची बनाइए जिन्हें कांग्रेस, भाजपा या दूसरी बड़ी पार्टियां उनके जनाधार के अनुरूप टिकट अथवा स्थान नहीं देती हैं। उनकी बाकी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को फिलहाल ताक पर रखकर सिर्फ उन्हें सीपीएम का चुनाव-चिह्न सौंप दो। देखते-देखते उत्तर प्रदेश के हर हिस्से में लाल झंडे थामे लोग घूमते हुए दिखाई देने लगेंगे।

सवाल है कि क्या नोखा में लगभग इसी प्रकार के एक फ़ॉर्मूले का प्रत्यक्ष प्रयोग नहीं हुआ है? जिस शहर में सीपीआई(एम) का कोई उल्लेखनीय कार्यालय अथवा सांगठनिक ढाँचा नहीं था, वहाँ आज उसके नाम का बोर्ड बनने जा रहा है। यह इसलिये संभव हुआ है क्योंकि पार्टी ने किसी स्थानीय प्रभावशाली शक्ति को अपने अनुशासन में ढालने से पहले ही उसे अपना चिह्न उपलब्ध करा दिया। एक स्थानीय नेता को एक मान्यताप्राप्त दल का चुनाव-चिह्न मिल गया और दल को रातोंरात 29 पार्षदों का एक पूरा स्थानीय आधार।

यदि भारत में चल रहे चुनावी कारोबार की गहराई से पड़ताल करें तो पाएंगे कि सीपीआई(एम) की इस उपलब्धि में बहुत अधिक आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं देखी जानी चाहिए । कांग्रेस और भाजपा तो दशकों से यही करती रही हैं। आम आदमी पार्टी सहित नए दलों ने भी दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट, किंतु प्रभावशाली नेताओं को अपने चिह्न पर चुनाव लड़ाकर कई इलाकों में रातोंरात अपना विस्तार किया है। प्रायः सभी चुनाव-केंद्रित दल पहले विचारधारा को नहीं, उपलब्ध जनाधार देखते हैं। वे मानते हैं कि संगठन केवल कार्यालय, सदस्यता सूची और पार्टी-कक्षाओं से नहीं बनता; स्थानीय समाज में पहले से उपस्थित रिश्तों, जातीय समीकरणों, प्रतिष्ठा, संसाधनों और नेतृत्व की आकांक्षाओं को अपने भीतर समेटने से भी बना करता है।

वामपंथी पार्टियाँ अधिकांशतः ऐसे उपायों से इस बिनाह पर बचती रही हैं कि इसमें पार्टी की वैचारिक पहचान और सांगठनिक अनुशासन के कमजोर होने का खतरा रहता है। वे उपलब्ध जनाधार को अपने भीतर शामिल करने के बजाय पहले उसे विचारधारा और संगठन के साँचे में ढालना चाहती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जब तक संगठन विचारधारा की शुद्ध शर्तों पर तैयार होता है, चुनाव का समय और राजनीतिक अवसर दोनों हाथ से निकल चुके होते हैं।

चुनावी भुवन और उसका दबाव

यहां हमें हमारे समय के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू की बात याद आती है जिनकी स्थापनाओं पर अभी हम काम कर रहे हैं । वे फ्रांस में सन् ’68 के छात्रों के कैंपस विद्रोह की विफलता के बाद की अजीबो-गरीब उलझी हुइ बौद्धिक परिस्थिति का चित्र खींचते हुए लिखते हैं कि “ वह अजीब सी विरोधाभासी परिस्थिति थी। जनमत पर चुनावी, भ्रष्ट प्रतिनिधित्व के ‘लोकतंत्र’ का बोलबाला था, तो ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ सिमटकर व्यापार और उपभोग की स्वतंत्रता रह गया था। ... बाजारवाद और संसदवाद का यह गठबंधन, जिसे मैं ‘पूंजी-संसदवाद’ (capitalo-parliamentarism) कहता हूँ, इस प्रकार काम कर रहा था मानो पूरे विश्व के लिए यही एकमात्र विकल्प बचा हो।”(Being and Event, Bloomsbury, Author’s Preface, p. xiv-xv) 

संसदीय लोकतंत्र अर्थात् पूँजी-संसदीय व्यवस्था—capitalo-parliamentarism। बाद्यू के अनुसार, चुनाव नागरिकों को सत्य-प्रक्रिया (truth-procedure) के प्रमाता में नहीं, मतों की गणना में बदल देता है। अलग-अलग राजनीतिक संभावनाएँ अंततः संख्याओं, सर्वेक्षणों, जनमत और राज-सत्ता के प्रबंधन के भीतर समा जाती हैं। इस व्यवस्था का मूल सिद्धांत होता है, जो दिखाई दे रहा है और जितने लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है, वही राजनीतिक रूप से अस्तित्ववान है।

इसीलिये, बाद्यू की राजनीति की अवधारणा इस परिघटना के विपरीत किसी घटना (event) से उत्पन्न नई संभावना के प्रति निष्ठा पर आधारित है। ऐसी राजनीति राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त स्थानों, मतों और प्रतिनिधित्व की गणना से अपनी सत्यता प्राप्त नहीं करती। उसका प्रमाता चुनावी बहुमत का प्रतिनिधि मात्र नहीं होता; वह उस संभावना का धारक होता है जिसे मौजूदा व्यवस्था पहले असंभव बताती थी। वह वर्तमान में मानो किसी अघटन के अंदर से, अनायास ही पैदा हुए तूफानी घटनाक्रमों से पैदा होती है । कहना न होगा, यहीं पर बाद्यू का वह कथित ‘शुद्धतावाद’ भी नजर आता है जिसमें माना जाता है कि राजनीति को राज्य और चुनाव से एक दूरी बनाए रखनी चाहिए।

हमारे सामने बाद्यू की इस दृष्टि की शक्ति स्पष्ट है। यह हमें इस बात के प्रति सावधान करती है कि चुनाव जीतना किसी सत्य का प्रमाण नहीं है। नोखा के 29 पार्षदों का सीपीआई(एम) के चिह्न पर जीतना अपने-आप में उन्हें कम्युनिस्ट नहीं बना देता। किसी स्थानीय प्रभुत्वशाली समूह को लाल झंडा सौंप देने से वर्ग-संघर्ष, समानता और सामाजिक मुक्ति की सत्य-प्रक्रिया पैदा नहीं हो जाती। उलटे, संभव है कि पार्टी का नाम स्थानीय निहितस्वार्थों के उन्हीं हितों का आवरण बन जाए जिन्हें बदलने के लिए कम्युनिस्ट राजनीति का जन्म हुआ था।

लेकिन बाद्यू के शुद्धतावाद की सीमा भी यहीं पर प्रकट होती है। चुनाव को केवल भ्रष्ट गणना कहकर उससे बाहर खड़े रहने पर राजनीति शुद्ध तो रह सकती है, लेकिन प्रभावी नहीं। जिस भुवन में सत्ता, संसाधन और जन-स्वीकृति चुनावों के माध्यम से हासिल होते हैं, उस भुवन में प्रवेश किए बिना उसके भीतर राजनीति की कोई नई सत्य-प्रक्रिया कैसे पैदा होगी?

सत्य भुवन से बाहर किसी निष्कलंक आकाश में निवास नहीं करता। वह इसी भुवन में मौजूद किसी दरार, असंगति अथवा उन संभावनाओं से पैदा होता है जिन्हें अब तक खंगाला नहीं गया है। यदि संसदीय जनतंत्र हमारा वास्तविक राजनीतिक भुवन है, तो लोकप्रियता, चुनाव-चिह्न, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय नेतृत्व उसके अपने अस्तित्व के नियम हैं। इन नियमों को आत्मसात करना सत्य से विश्वासघात नहीं; इस संसार में सत्य के प्रकट होने की शर्तों को समझना है।

चुनाव चिह्न ही सब कुछ नहीं है

इसलिए हमें लगता है कि नोखा का प्रयोग न तो बिना शर्त अनुकरणीय है और न केवल अवसरवाद कहकर खारिज करने योग्य। असली प्रश्न यह नहीं है कि विकास मंच के लोगों को सीपीआई(एम) का चिह्न क्यों दिया गया। असल प्रश्न यह है कि अब सीपीआई(एम) इस विजय के साथ क्या करती है।

क्या पार्टी विजयी पार्षदों की स्थानीय लोकप्रियता को समानता, पारदर्शिता और जनभागीदारी की किसी नई नगरपालिका राजनीति में बदल पाएगी? क्या नगरपालिका के साधनों का न्यायपूर्ण वितरण होगा? क्या सफाईकर्मियों, असंगठित मजदूरों, महिलाओं, दलितों और गरीब बस्तियों को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक स्थान मिलेगा? क्या नगरपालिका के ठेकों, जमीन और निर्माण से जुड़े पुराने निहित स्वार्थों पर टिकी स्थानीय संरचनाओं को चुनौती दी जाएगी? अथवा सीपीआई(एम) का चिह्न केवल विकास मंच के पुराने सत्ता-संबंधों की नई वैधानिक पोशाक बनकर रह जाएगा?

सीपीआई(एम) के सांसद अमरा राम ने इस चुनाव के बारे में कहा है कि नोखा को निष्पक्ष शासन और संसाधनों के समान वितरण का नमूना बनाया जाएगा। कहना न होगा, यही इस पूरे प्रयोग की वास्तविक परीक्षा की कसौटी है। अभी पार्टी ने सत्य पैदा नहीं किया है; उसने केवल उस स्थल पर प्रवेश पाया है जहाँ सत्य-प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

हमारे मार्कण्डेय भाई वाला फ़ॉर्मूला पार्टी को तेजी से फैला सकता है, पर वह अपने-आप कम्युनिस्ट राजनीति नहीं पैदा करता। वह दरवाजा खोलता है, उस दरवाजे से भीतर प्रवेश करके परिस्थिति को बदलना पार्टी का काम है। स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति को पार्टी का चिह्न देना पहला कदम हो सकता है, लेकिन यदि अंततः वही व्यक्ति पार्टी को अपना स्थानीय चिह्न बना ले, तो प्रयोग उलटी दिशा में चला जाएगा।

तीसरा रास्ता क्या है?

संसदीय लोकतंत्र में पहली दृष्टि में तो हमें दो ही विकल्प दिखाई देते हैं—या तो संसदीय जनतंत्र में लोकप्रियता के नियम को अपना लीजिए, या क्रांतिकारी प्रतिबद्धता के नाम पर उसमें रहते हुए भी उससे अलग बने रहिए। लेकिन नोखा से हमें तीसरे रास्ते की संभावना भी दिखाई देती है : चुनावी भुवन में प्रवेश करना, उसकी उपलब्ध शक्तियों का उपयोग करना, और प्रवेश के बाद उन्हीं शक्तियों को किसी नई राजनीतिक प्रक्रिया में रूपांतरित करने का संघर्ष करना। यही तो क्रांतिकारी राजनीति में संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति का मूलमंत्र है । 

एकता और संघर्ष का यह रास्ता शुद्धतावादी दूरी और निरंकुश अवसरवाद के बीच का रास्ता है। इसमें पार्टी अपना चिह्न किसी को सौंपकर निष्क्रिय नहीं हो जाती; वह उस चिह्न से निर्वाचित समूह को एक नई सामूहिक राजनीति में पुनर्गठित करती है। पार्टी लोकप्रियता को स्वीकारती है, लेकिन लोकप्रियता को ही सत्य नहीं मानती। वह चुनाव जीतती है, पर चुनावी जीत को सत्य-प्रक्रिया का अंत नहीं, उसका संभावित आरंभ मानती है। राजनीति में सक्रिय ऐसा कौन होगा जो चुनावों में उम्मीदवारों की शुद्ध लोकप्रियता और विपुल संसाधनों के आधार पर उनकी जीत के उदाहरणों को न देख चुका होगा!

नोखा में अभी लाल झंडा जरूर लहराया है, किंतु यह तय होना बाकी है कि विकास मंच सीपीआई(एम) में शामिल हुआ है या सीपीआई(एम) विकास मंच में। इस प्रश्न का उत्तर चुनाव-परिणाम से नहीं, आने वाले नगरपालिका शासन के चरित्र से मिलेगा।

फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नोखा ने वामपंथ के सामने एक असुविधाजनक, किंतु जरूरी प्रश्न रख दिया है—क्या सांगठनिक शुद्धता के नाम पर लोकप्रियता से दूरी बनाए रखना वास्तव में सिद्धांतनिष्ठता है, अथवा संसदीय राजनीति में अपनी असमर्थता को किसी सद्गुण के रूप में पेश करने का शुद्ध नैतिक आवरण? सत्य के प्रति निष्ठा यदि संसार में कोई प्रभाव ही न उत्पन्न करें, तो वह धीरे-धीरे निष्ठा नहीं, आत्म-संतोष या जिसे चीन में आक्यूवाद कहा जाता है कि भौतिक जगत में पराजय को आत्मिक जगत के समर में विजय मान कर जीने का राजनीति का तरीका बन जाता है।


मंगलवार, 1 सितंबर 2026

जब पुरानी राजनीति असंभव हो जाती है

 

(बंगाल में सीपीआई(एम) के बोधोदय पर क्षण भर)

—अरुण माहेश्वरी


यह एक मान्य तथ्य है कि पश्चिम बंगाल की विशेष परिस्थितियों में सीपीआई(एम) पिछले कई वर्षों से भाजपा और तृणमूल को एक ही रणनीतिक धरातल पर रखकर दोनों के विरुद्ध समान संघर्ष की राजनीति करती रही है। समय-समय पर इस लाइन की आलोचना और आत्मालोचना भी हुई, फिर भी नीचे के स्तर के तीखे अनुभवों के कारण पार्टी के राजनीतिक व्यवहार में भाजपा और तृणमूल को समान स्तर पर रखने की प्रवृत्ति बनी रही।

अब भाजपा के राज्य की सत्ता में आने के बाद सीपीआई(एम) को स्पष्ट रूप से कहना पड़ रहा है कि भाजपा ही प्रमुख राजनीतिक शत्रु है। हाल में समाप्त हुई पार्टी की विस्तारित राज्य कमेटी की बैठक में लिया गया यही सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला है।

इसे केवल बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप राजनीतिक लाइन में परिवर्तन मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें उस पुरानी राजनीतिक समझ की व्यर्थता का बोध भी शामिल है जिस पर बंगाल की वाम राजनीति तृणमूल शासन के इन वर्षों में चलती रही। इसका सबसे मुखर रूपक था—‘बीजेमूल’।

‘कांग्साल’ से ‘बीजेमूल’

बंगाल की वाम राजनीति में दो दलों के संकर से निर्मित ऐसा पद कोई नया भाषाई आविष्कार नहीं था। सत्तर के दशक में नक्सलवादियों के हाथों सीपीआई(एम) के कार्यकर्ताओं की हत्याओं और उससे कांग्रेस को मिलने वाले लाभ के संदर्भ में ‘कांग्साल’—कांग्रेस और नक्सल का संकर—कहा गया था। बाद में कांग्रेस की ही सरकार ने नक्सलवादियों के जिस क्रूरतम दमन का इतिहास रचा, वह सबके सामने है।

इतिहास का सबक स्पष्ट था—दो शक्तियों का किसी तीसरी शक्ति के विरुद्ध वस्तुगत रूप से एक-दूसरे को लाभ पहुँचाना उन्हें एक अभिन्न राजनीतिक सत्ता नहीं बना देता।

तृणमूल शासन में वाम के दमन और क्षय ने निस्संदेह भाजपा के विस्तार की जमीन तैयार की। इस अर्थ में ‘बीजेमूल’ वाम के निजी राजनीतिक अनुभव के एक यथार्थ को व्यक्त करता था। लेकिन इस अनुभव से भाजपा और तृणमूल की राजनीतिक समानता का निष्कर्ष निकालते ही वह यथार्थ एक काल्पनिक संकर में बदल गया।

यही अनुभववाद की विडंबना है। पार्टी राजनीतिक जगत को अपने संदर्भ में पढ़ने लगती है—जो दो शक्तियाँ हमारे विरुद्ध हैं, वे अंततः एक ही हैं। यह प्रश्न पीछे छूट जाता है कि उन शक्तियों का अपना चरित्र क्या है और उनके आपसी अंतर्विरोध क्या हैं।

‘कांग्साल’ से ‘बीजेमूल’ तक की यात्रा इसलिए केवल दो पदों का इतिहास नहीं है। यह उस राजसत्तावादी राजनीतिक दृष्टि का इतिहास भी है जिसमें अपने विरुद्ध खड़ी शक्तियों की भिन्नताओं को पढ़ने के बजाय उन्हें एक साझा शत्रु में विलीन कर देना आसान हो जाता है।

विरोध समानता का आधार नहीं हो सकता

यह सच है कि तृणमूल के विरोध के बिना बंगाल में सीपीआई(एम) की राजनीति का कोई अर्थ नहीं हो सकता था। भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, प्रशासन का दलीयकरण, विपक्ष के लोकतांत्रिक अधिकारों का संकुचन और सत्ता का एकाधिकारवादी व्यवहार—इनसे आँख मूँदना अपनी राजनीति को समाप्त करना होता।

इसी प्रकार भाजपा के फासीवादी चरित्र से संघर्ष को लेकर भी वाम हलकों में शायद ही कोई सैद्धांतिक संदेह रहा हो। समस्या वहाँ पैदा हुई जहाँ ‘दोनों का विरोध’ धीरे-धीरे ‘दोनों समान हैं’ की राजनीतिक समझ में बदल गया।

राजनीति में दो शक्तियों का विरोध करना और उन्हें समान मानना बिल्कुल अलग बातें हैं।

भाजपा और तृणमूल के बीच फर्क केवल शासन की अच्छाई-बुराई अथवा भ्रष्टाचार की मात्रा का नहीं है। आरएसएस-भाजपा का लक्ष्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि संविधान, राज्य, समाज और नागरिकता के चरित्र तक को एक केंद्रीकृत दिशा में बदलना है।

फिर भी बंगाल में तृणमूल शासन के प्रत्यक्ष अनुभव ने इस मूलभूत फर्क को धुँधला कर दिया। जिससे रोजमर्रा का संघर्ष था, वही सबसे निकट और इसलिए सबसे बड़ा शत्रु दिखाई देने लगा। भाजपा के विरुद्ध वैचारिक चेतावनी और तृणमूल के विरुद्ध प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष एक ही तराजू पर रख दिए गए।

लेकिन इतिहास कई बार किसी भ्रामक राजनीतिक समझ का खंडन तर्क से नहीं, उसके परिणामों से करता है।

जिस भाजपा के बढ़ाव को ‘दोनों के विरुद्ध संघर्ष’ के बीच से रोकना था, वही तृणमूल-विरोधी राजनीति के दौर में सबसे अधिक फली-फूली। वाम के कमजोर होने से खाली हुए विपक्षी राजनीतिक क्षेत्र पर उसने कब्जा किया और अंततः राज्य की सत्ता तक पहुँच गई।

भाजपा का सत्ता में आना स्वयं में सीपीआई(एम) की पुरानी राजनीति को गलत सिद्ध नहीं करता। लेकिन यदि आज स्वयं सीपीआई(एम) को भाजपा को ‘प्रमुख शत्रु’ कहना पड़ रहा है, तो सवाल उठता है—भाजपा में आज ऐसा क्या है जो कल नहीं था?

आरएसएस कल पैदा नहीं हुआ। भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति आज शुरू नहीं हुई। केंद्र की सत्ता और राज्य-संस्थाओं के साथ उसके संबंध भी नए नहीं हैं। भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र को बदलने की उसकी परियोजना भी बंगाल में सरकार बनने के बाद अचानक पैदा नहीं हुई है।

अर्थात् जिस विशिष्टता के कारण भाजपा आज प्रमुख शत्रु दिखाई दे रही है, उसके मूल तत्व पहले से मौजूद थे।

आज बदला यह है कि जो बात सिद्धांत और दूर के अनुभव में दिखाई देती थी, वह अब बंगाल के अपने अनुभव की ठोस वास्तविकता बन गई है। एक राजनीतिक सत्य जिसे जानना संभव था, अब ऐसा सत्य बन गया है जिसे न जानना कठिन है।

हमारी नजर में यही सीपीआई(एम) के वर्तमान बोधोदय का गर्भितार्थ है।

सत्य की देर की कीमत

सत्य कई बार किसी नई खोज की तरह सामने नहीं आता। वह हमारी पुरानी मान्यता के टिके रहने की संभावना को समाप्त करके भी सामने आता है। जिस विचार के साथ वर्षों तक चला जा सकता था, एक बिंदु पर उसी के साथ आगे चलना असंभव हो जाता है।

इसीलिए हम इसे ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ कहकर संतुष्ट नहीं होना चाहेंगे। इस मुहावरे में देर की राजनीतिक कीमत छिप जाती है।

सीपीआई(एम) का यह बोधोदय तब हुआ है जब जिस खतरे को सिद्धांततः पहले से जाना जाता था, वह बंगाल में ठोस राजसत्ता का रूप ले चुका है। यही राजसत्तावादी राजनीति की गहरी विडंबना है। वह किसी शक्ति के सत्य को कई बार उसके सत्ता में प्रकट होने के बाद पहचानती है। जब तक वह शक्ति सत्ता की ओर बढ़ती रहती है, उसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक और शक्ति मानकर उसके बारे में चुनावी अंकगणित चलता रहता है। लेकिन जब वही शक्ति राज्य पर अधिकार कर लेती है, तब उसके विशिष्ट चरित्र का सत्य अचानक प्रत्यक्ष हो जाता है।

सत्ता इस सत्य को पैदा नहीं करती; वह उससे आँख चुराकर जीने की गुंजाइश समाप्त कर देती है।

इस अर्थ में राजनीति में सत्य का बोध कई बार असत्य के राज्य की स्थापना की कीमत पर होता है। सत्य तब अधिक साफ दिखाई देता है, लेकिन उसे बदलने की राजनीतिक कीमत भी कई गुना बढ़ चुकी होती है।

इसलिए सीपीआई(एम) के वर्तमान बोधोदय पर हमारा प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि देर से सही, उसने सत्य को पहचान लिया। प्रश्न यह है—क्या किसी राजनीतिक सत्य को पहचानने के लिए पहले उसका राज्य बन जाना जरूरी था?

यदि ऐसा है तो यह केवल एक गलत राजनीतिक लाइन की समस्या नहीं है। यह उस राजसत्तावादी दृष्टि की विडंबना है जो राजनीतिक संभावनाओं को उनके जन्म के समय नहीं, सत्ता में उनके पर्यवसान के बाद पहचानती है।

प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी 

यही विडंबना पार्टी-प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी के स्तर पर और विकट रूप ग्रहण करती है। पार्टी जिस सत्य को अपने राजनीतिक विन्यास में जगह नहीं दे पाती, उसके प्रति प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी भी प्रायः अंधा हो जाता है।

उसके पास ज्ञान या विवेक की कमी है, यह जरूरी नहीं है। समस्या यह है कि घटना और उसके विवेक के बीच पार्टी की पहले से निर्मित व्याख्या खड़ी होती है। कई बार सब जानकर भी वह चुप्पी ओढ़ लेता है।

तब वह घटना से सवाल नहीं करता; घटना में पार्टी की स्वीकृत समझ की पुष्टि खोजता है। प्रतिबद्धता सत्य के प्रति निष्ठा के बजाय उपलब्ध ज्ञान के प्रति निष्ठा बन जाती है।

जबकि बुद्धिजीवी का काम पार्टी की स्थापित समझ को प्रमाणित करना नहीं, जरूरत पड़ने पर उसे अस्थिर करना भी है। अन्यथा उसकी आलोचनात्मक दृष्टि पार्टी की राजनीतिक दृष्टि की प्रतिलिपि बन जाती है। और तब जिस सत्य को विचार के स्तर पर पहले पहचाना जा सकता था, उसे इतिहास अपने सबसे निर्मम रूप में स्थापित करके दिखाता है।

इसीलिए बुद्धिजीवी की वास्तविक प्रतिबद्धता किसी पार्टी की अचूकता के प्रति नहीं, सत्य की उस संभावना के प्रति होनी चाहिए जो उसकी अपनी पार्टी को भी गलत सिद्ध कर सकती है। ऐसे बुद्धिजीवी पार्टी के लिए असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन वही उसे इतिहास के हाथों मिलने वाली कहीं अधिक महँगी शिक्षा से बचा सकते हैं।

‘प्रमुख शत्रु’ के बाद क्या?

किसी पुरानी राजनीति का असंभव हो जाना अपने-आप नई राजनीति पैदा नहीं करता। ‘प्रमुख शत्रु’ की पहचान का अर्थ केवल भाजपा पर तृणमूल की अपेक्षा अधिक हमले करना नहीं हो सकता। इसका अर्थ समाज के राजनीतिक अंतर्विरोधों की पुनर्समीक्षा और उनकी प्राथमिकताओं का निर्धारण है।

तृणमूल के साथ सीपीआई(एम) के संघर्ष समाप्त नहीं होंगे। उसके भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और शासन के पुराने अनुभवों को भुलाने का सवाल भी नहीं है। लेकिन यदि भाजपा प्रमुख शत्रु है तो तृणमूल और भाजपा के साथ अंतर्विरोधों को एक ही राजनीतिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यहीं ‘समान दूरी’ की भाषा अपनी सीमा पर पहुँच जाती है।

राजनीति ज्यामिति नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ सबसे समान दूरी बनाए रखना नहीं, बल्कि परिस्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन करते हुए मित्र, सहयोगी, प्रतिद्वंद्वी और प्रमुख शत्रु के बीच फर्क करने की क्षमता है। ‘समान दूरी’ कई बार स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं, राजनीतिक निर्णय से बचने का सुविधाजनक तरीका भी हो सकती है।

चुनावी राजनीति समाज को वोट प्रतिशत में बाँटती है—इतने भाजपा के, इतने तृणमूल के, इतने वाम के। लेकिन कोई समाज अपने चुनाव परिणाम के बराबर नहीं होता। वह हमेशा उससे बड़ा होता है।

एक ही मतदाता अलग-अलग प्रश्नों पर अलग-अलग सामूहिकताओं का अंग हो सकता है। मजदूर रोजगार के प्रश्न पर, किसान जमीन पर, विद्यार्थी शिक्षा और बेरोजगारी पर, अल्पसंख्यक नागरिकता और सुरक्षा पर, लेखक-बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर और सामान्य नागरिक लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न पर एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। सरकारी सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों के अपने हित हैं; प्रतिशोधमूलक कार्रवाइयों से नाराज तबके के अपने अनुभव हैं। इन सबके बीच लोकतंत्र की रक्षा का साझा धरातल बनाया जा सकता है।

राजनीति का काम इन्हीं बिखरी हुई संभावनाओं को राजनीतिक शक्ति में बदलना है। जाहिर है, इसमें ऐसी शक्तियाँ भी शामिल हो सकती हैं जिनसे वाम के गंभीर मतभेद हों। ‘प्रमुख शत्रु’ का अर्थ ही है कि सारे अंतर्विरोध समान नहीं होते। किसी के साथ संघर्ष और किसी प्रश्न पर सीमित सहयोग एक ही समय संभव है। राजनीति की परिपक्वता इसी में है कि वह सहयोग को आत्मसमर्पण और मतभेद को समान शत्रुता न समझे।

इसलिए सीपीआई(एम) के सामने असली प्रश्न केवल अपना पुराना वोट प्रतिशत वापस पाने का नहीं है। वह जरूरी हो सकता है, पर्याप्त नहीं। सवाल है कि क्या वह भाजपा की सत्ता के विरुद्ध समाज में मौजूद विभिन्न प्रतिरोधों को एक व्यापक लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया में जोड़ सकती है।

सीपीआई(एम) ने अपनी पुरानी राजनीति की सीमा पहचानी है। कहीं न कहीं यह सीमा भी उसे अपने उस काल की विरासत से ही मिली है जब केन्द्र में यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया गया था । बहरहाल,अब नई राजनीति तब शुरू होगी जब वह इस नकारात्मक ज्ञान से कोई सकारात्मक राजनीतिक प्रक्रिया पैदा करेगी।

इसी में ‘असंभव की शक्ति’ का गहरा राजनीतिक अर्थ निहित है। राजनीति में असंभव कई बार पुराने रास्ते को बंद करके वह जगह खाली करता है जहाँ से नई संभावना पैदा की जा सकती है।

बंगाल में सीपीआई(एम) के सामने आज यही खाली जगह है।

पुरानी राजनीति का असंभव हो जाना नई राजनीति की गारंटी नहीं है। उस असंभव से पैदा हुई संभावना को वास्तविक शक्ति में बदलना ही राजनीति है।