−अरुण माहेश्वरी
तमिलनाडु में टीवीके की जीत एक असाधारण घटना है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक की दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति के भीतर वहां अचानक एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट घटित हुआ जिसे पारंपरिक राजनीतिक विश्लेषणों ने लगभग असंभव माना था।
हमारी नजर में, यह केवल किसी अभिनेता की लोकप्रियता का परिणाम नहीं है। भारत में अभिनेता पहले भी राजनीति में आए हैं। लेकिन यहाँ निर्णायक बात यह है कि यह एक ऐसे समय में संभव हुई है जिसे दुनिया में जेनजी के उभार के समय के रूप में भी पहचाना जा रहा है । विजय के पीछे भी कुछ एक ऐसी युवा आकांक्षा संगठित हुई है जो अपने को पुरानी विचारधारात्मक संरचनाओं के साथ बेमेल पाती है ।
यह उस नए राजनीतिक प्रमाता के उदय की घोषणा है जिसकी आहट पिछले छह दशकों से हमें दुनिया के अलग-अलग कई विद्रोहों में कभी धीमी तो कभी काफ विस्फोटक ध्वनि में सुनाई देती रही है। आज जिसे “जेनजी” कहा जा रहा है, वह दरअसल केवल एक आयु-समूह नहीं, बल्कि इतिहास की एक नई राजनीतिक सत्ता-चेतना है—एक ऐसा प्रमाता जो पुराने वर्गीय, वैचारिक और संगठनात्मक ढाँचों के भीतर स्वयं को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाता है।
आज के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के अनुसार, राजनीतिक सत्य का प्रमाता किसी पहले से स्थापित सामाजिक वर्ग का दूसरा नाम नहीं होता। वह हमेशा किसी एक घटना (event) से जन्म लेता है। एक ऐसी घटना से जो स्थापित व्यवस्था की गणना से बाहर होती है, जो राजनीति के पुराने व्याकरण को तोड़ देती है, और जिसके प्रति जनता की निष्ठा राजनीति के एक नए भुवन का निर्माण करती है।
कहना न होगा, टीवीके के विजय के उभार की घटना तमिलनाडु में द्रमुक राजनीति के जगत में एक बड़ी दरार की तरह है । द्रमुक-अन्नाद्रमुक की दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति के बीच अचानक एक ऐसे राजनीतिक केंद्र का उभरना जिसे स्थापित दलों ने लंबे समय तक “सिनेमा लोकप्रियता” समझ कर हल्के में लिया था, यह बताता है कि यहां राजनीति की सामाजिक संरचना बदल रही है। यहाँ केवल अभिनेता की लोकप्रियता निर्णायक नहीं है; निर्णायक वह युवा आकांक्षा है जो अपने लिए एक नई भाषा, नया प्रतीक और नया राजनीतिक शरीर खोज रही है।
यह वही ऐतिहासिक ऊर्जा है जिसकी पहली विराट आधुनिक अभिव्यक्ति हमें 1968 के मई महीने में फ्रांस के कैम्पस विद्रोह में दिखाई दी थी। फ़्रांस के विश्वविद्यालयों के छात्र केवल शिक्षा-व्यवस्था के खिलाफ नहीं उठे थे; उन्होंने आधुनिक राजसत्ता, नौकरशाही, पूँजीवादी श्रम-संरचना और यहाँ तक कि सोवियत शैली के संगठित वामपंथ—सभी को चुनौती दी थी। “कल्पना को सत्ता दो” का नारा केवल सांस्कृतिक विद्रोह नहीं था; वह राजनीति के एक नए प्रमाता का उदय था। उसने तत्कालीन फ्रांस के बड़े-बड़े कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया था । ऐलेन बाद्यू, मिशैल फुको ने वहीं से अपने रास्ते को किंचित बदल कर सामाजिक विश्लेषण की अपनी नई धाराओं और दर्शन को विकसित किया था ।
उस समय राजसत्ता और बाद्यू जिन्हें राजसत्तावादी क्रांतिकारी कहते हैं, सांस्थानिक कम्युनिस्ट पार्टियां—दोनों ने मिलकर उस शक्ति को दबाया था । फ़्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी ने छात्रों को अव्यवस्थित अराजकतावादी कह कर खारिज किया। बीसवीं सदी का पारंपरिक वामपंथ उस नई युवा चेतना को समझ नहीं पाया, क्योंकि उसकी राजनीति अब भी औद्योगिक मजदूर वर्ग की पुरानी समझ पर टिकी हुई थी।
अगर हम गौर से देखें तो भारत में इस युवा शक्ति का एक सबसे तीखा रूप 1967 में नक्सलवादी विद्रोह में सामने आया जब कोलकाता के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से निकले प्रतिभाशाली नौजवानों ने पहली बार नक्सलबाड़ी में हुए कृषक आंदोलन की भावभूमि से खुद को जोड़ कर उसे एक अखिल भारतीय परिघटना का रूप दिया; भारतीय राज्य को यह एहसास कराया कि राजनीति केवल चुनाव और पार्टी-संगठन की चीज़ नहीं है। तब एक नई पीढ़ी स्वयं को इतिहास का प्रत्यक्ष निर्माता मानने लगी थी। उस आंदोलन की त्रासदी अपनी जगह है, लेकिन यह भी सत्य है कि भारतीय राजनीति में विद्रोही युवा प्रमाता की वह पहली बड़ी दस्तक थी । बाद में गुजरात के छात्र आंदोलन और बिहार में जेपी के आंदोलन के बीच से इसका राजसत्तावादी चरित्र भी सामने आया ।
इक्कीसवीं सदी में प्रवेश के साथ ही दुनिया में नयी डिजिटल युग आया। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस नई पीढ़ी को पहली बार वैश्विक समकालिकता प्रदान की। 2011 में अरब वसंत (Arab Spring) में ट्यूनीशिया, मिस्र और मध्यपूर्व के दूसरे देशों के युवाओं ने यह दिखाया कि राजनीतिक संगठन अब केवल पार्टी कार्यालयों से नहीं, मोबाइल फ़ोन और नेटवर्कों से भी निर्मित हो सकता है। यह कोई पारंपरिक मजदूर आंदोलन नहीं था। डिजिटल संचार स्वयं राजनीतिक संगठन की शक्ति बन चुका था।
दक्षिण एशिया में भी हमें हाल में कमोबेस यही ढर्रा दिखाई देता है। श्रीलंका में अरगलाया (संघर्ष) (2022) के दौरान युवाओं ने राष्ट्रपति भवनों तक पर कब्ज़ा कर लिया। जनता ने पारंपरिक राजनीतिक कुलीनता से अपनी निष्ठा को खत्म कर सड़कों पर उतरे नए प्रमाता को वैधता प्रदान की। बांग्लादेश (2024) में छात्रों और नौजवानों ने दीर्घकालिक सत्ता-संरचना के विरुद्ध जिस शक्ति का प्रदर्शन किया, उसने भी यह दिखाया कि डिजिटल पीढ़ी अब भय की पुरानी राजनीतिक संरचनाओं से मुक्त हो रही है।
पिछले साल ही हमने अपने पड़ोसी नेपाल में तो बाकायदा जेनजी के नाम से सत्ता परिवर्तन के हिंसक संघर्ष को देखा । वहाँ केवल पारंपरिक दलों की सत्ता ही नहीं हिली, बल्कि काठमांडू के एक युवा लोकगायक को जनता ने प्रधानमंत्री पद तक पहुँचा दिया गया। यह घटना अत्यंत प्रतीकात्मक है। इसका अर्थ यह है कि जनता अब केवल विचारधारात्मक कैडरों या राजनीतिक वंशों में प्रतिनिधित्व नहीं खोज रही। वह सांस्कृतिक रूप से अपने निकट और भावनात्मक रूप से अपनी बेचैनी को व्यक्त करने वाले व्यक्तित्वों में अपना सत्य देखने लगी है।
इसी व्यापक पृष्ठभूमि में भारत की हाल की राजनीति को समझना होगा। अभी हमने गौर किया कि बंगाल में सीपीआई(एम) ने इस बार जिस प्रकार छात्रों और कम उम्र के नौजवानों को उम्मीदवार बनाया, वह भी केवल एक चुनावी प्रयोग नहीं कहलायेगा। इन उम्मीदवारों की इस चुनाव में काफी चर्चा रही । इनकी सफलता के बारे में हमें गहरा संदेह जरूर था, जो एक हद तक चुनाव परिणामों में भी देखने को मिला, लेकिन इसमें हमें बंगाल में बीज रूप में ही क्यों न हो, जेनजी आंदोलन की एक झलक दिखाई दी । लंबे समय तक खास प्रकार की पारंपरिक राजनीति पर टिके रहने के बाद बंगाल का वामपंथ पहली बार इस ऐतिहासिक तथ्य को स्वीकार करता दिखाई दिया कि राजनीति का भुवन बदल चुका है। इसमें डिजिटल युवा पीढ़ी का प्रवेश हो चुका है ।
इन उम्मीदवारों की जीत नहीं हुई, लेकिन उन्हें जिस मात्रा में मत मिले और जिस प्रकार इन नये उम्मीदवारों के बावजूद वामपंथ के मत प्रतिशत में कोई और बड़ी गिरावट नहीँ आई, वह संकेत देता है कि बंगाल में भी जेनजी का नया प्रमाता जन्म ले रहा है। हमारी नजर में यह महत्वपूर्ण है कि यह समर्थन केवल वैचारिक अनुशासन के कारण नहीं आया; इसमें युवा आकांक्षा, सांस्कृतिक पहचान और भविष्य की बेचैनी का तत्व निश्चित रूप से काम करता रहा है। यद्यपि इस युवा नेतृत्व के कुछ लोगों के मुंह से जब हमने पारंपरिक आशालीन भाषा को सुना और उनमें प्रतिद्वंद्विता के पुराने तेवर को ही पाया तो थोड़ी निराशा भी हुई । हमारा मानना है कि ऐसे चंद लोग शीघ्र ही पुरानी राजनीति के कीचड़ में कहीं धस जायेंगे, वामपंथ में जेनजी की ताजगी बनी रहेगी । इन उम्मीदवारों की हार भी अपने भीतर एक सत्य छिपाए हुए है। बाद्यू बार-बार कहते हैं कि सत्य की प्रक्रिया का मूल्य केवल सत्ता प्राप्ति से तय नहीं होता। कई बार राजनीतिक घटना अपनी तत्काल सफलता में नहीं, बल्कि भविष्य के प्रमाता के निर्माण में निर्णायक होती है। बंगाल में वामपंथ का मत प्रतिशत बनाए रखना इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। वह संकेत देता है कि राजनीति के पुराने मठों के भीतर भी नई पीढ़ी एक नए सत्य की खोज कर रही है।
यहीं पर भारत में राहुल गांधी की राजनीति को भी नए ढंग से समझने की जरूरत है। राहुल गांधी की यात्राएँ, उनका लगातार सड़क पर उतरना, बेरोज़गारी, असमानता और संविधान के प्रश्न को भावनात्मक-राजनीतिक भाषा में उठाना, प्रेम-मोहब्बत की तरह के मनोविश्लेषण के प्रतीकों को राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश करना—इन सबका प्रभाव केवल कांग्रेस संगठन तक सीमित नहीं रह सकता है। हमें लगता है जैसे वे कांग्रेस जैसे राजनीति के सबसे प्राचीन गढ़ से ही उसी नए राजनीतिक भुवन के सत्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ जनता की निष्ठा पुराने दलगत अनुशासन से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष संवेदनात्मक संपर्क से बनती है। तमिलनाडु में विजय के दल को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने में जरा सी भी हिचक न दिखा कर भी कांग्रेस ने राहुल के इसी नये भुवन के प्रति निष्ठा जाहिर की है ।
इसमें शक नहीं कि राहुल गांधी की राजनीति का संकट यह है कि वह अब भी एक पुराने पार्टी-संगठन के भीतर बँधी हुई है, जबकि उसकी अपील का स्रोत उससे बाहर उभरती युवा आकांक्षा में है। इसीलिए उनकी राजनीति में लगातार एक द्वंद्व दिखाई देता है—एक ओर संस्थागत कांग्रेस, दूसरी ओर सड़कों और डिजिटल माध्यमों में बनती नई जन-ऊर्जा।
ऐलेन बाद्यू के अनुसार किसी भी राजनीतिक सत्य के प्रमाता के निर्माण के लिए चार तत्व आवश्यक होते हैं—घटना, जनाकांक्षा, नया भुवन और उस सत्य के प्रति निष्ठा। कहना न होगा, आज क्रमशः दुनिया के स्तर पर जेनजी की राजनीति इन चारों शर्तों को पूरा करती दिखाई देती है।
पहली बात, इसमें घटना का तत्व है—ऐसी अप्रत्याशित राजनीतिक दरारें जिन्हें पुरानी राजनीति समझ नहीं पा रही। दूसरी बात, यह एक नए भुवन का निर्माण करती है—डिजिटल संचार, सांस्कृतिक तात्कालिकता और नेटवर्क आधारित सामूहिकता का भुवन। तीसरी बात, इसमें जनता की निष्ठा दिखाई देती है—श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और अब तमिलनाडु और भारत की राजनीति में राहुल गांधी की परिघटना । और चौथी बात, यह सीधे वर्तमान सत्ता की संरचनाओं को चुनौती देता है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बीसवीं सदी का मजदूर वर्ग अब अपनी पुरानी हरावल दस्ते की ऐतिहासिक पहचान खो चुका है। प्लेटफ़ॉर्म पूँजीवाद, अस्थायी श्रम, डिजिटल संचार और सांस्कृतिक उद्योगों ने श्रम की केंद्रीकृत संरचना को विघटित कर दिया है। इसलिए राजनीति का नया प्रमाता भी पारंपरिक वर्गीय पहचान से मुक्त है। और, आज की दुनिया में जेनजी केवल युवा मतदाता नहीं है। वह एक नया ऐतिहासिक प्रमाता है—अस्थिर, विस्फोटक, डिजिटल, भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से तीव्र। यही उसकी शक्ति है और कह सकते हैं कि यही उसका संकट भी है।
लेकिन इतिहास का हर नया सत्य पहले अराजक दिखाई देता है। 1968 के फ़्रांसीसी छात्र, नक्सलबाड़ी के नौजवान, अरब स्प्रिंग के डिजिटल विद्रोही, श्रीलंका के अरगलाया आंदोलनकारी, बांग्लादेश के छात्र, नेपाल का युवा लोकगायक नेतृत्व, बंगाल के युवा वामपंथी उम्मीदवार और तमिलनाडु में टीवीके की विजय—ये सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। ये राजनीति के एक नए वैश्विक भुवन के विविध संकेत हैं। और शायद पहली बार भारत की राजनीति भी उस नए भुवन की दहलीज़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राजनीति के बूढ़े गिद्धों की सत्ता के उलट जाने का वक्त करीब आ रहा है ।

