गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

पूंजीवादी बाजारवाद बनाम समाजवादी ‘प्रकृतिवाद’

 

(चीन में कथित ‘विचारधारात्मक संघर्ष’ का तात्पर्य) 

—अरुण माहेश्वरी



राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने चीन में कुछ बड़ी टेक कंपनियों से शुरू करके इजारेदार पूंजी पर लगाम की दिशा में जो कार्रवाइयां शुरू की हैं, वे सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में नहीं, समग्र रूप में चीन के समाज के नये सिरे से निरूपण के उनके अभियान का एक हिस्सा हैं । इनके जरिये वे आने वाले दिनों में वहां एक गहरी और सुनियोजित उथल-पुथल का संकेत देते हुए जान पड़ते हैं । 


लगभग 44 साल पहले 1977 में चीन के नेता देंग श्याओ पिंग ने जब ‘चार आधुनिकीकरण’ के जरिये ‘खुलेपन’ का कार्यक्रम अपनाया था, उन्होंने कहा था कि अब से पचास साल बाद हम देखेंगे कि चीन की आगे की दिशा क्या होगी ? वह समाजवाद के पथ पर ही बना रहेगा या पूंजीवाद के लिए जगह छोड़ देगा !


अब उस पचास साल की अवधि में सिर्फ छः साल और बचे हैं । इसी साल जून महीने में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे हुए हैं और अगले साल के जून महीने में उसकी 21वीं पार्टी कांग्रेस का आयोजन होने वाला है । सभी हलकों में यह उम्मीद की जाती हैं कि उस पार्टी कांग्रेस से भी अगले पांच साल, 2027 तक के लिए शी जिन पिंग के हाथ में ही पार्टी और राज्य की कमान सौंपी जाएगी । अर्थात्, सन् 2027 में, जब देंग के आर्थिक उदारतावाद के पचास पूरे होंगे, और जब से चीन के आगे के रास्ते के बारे में किसी अन्य निर्णायक कदम की बात कही गई थी, उस समय चीन का प्रकृत नेतृत्व शी के हाथ में ही होगा ।

    

हम नहीं जानते कि शी अभी जो कर रहे हैं, उसका वास्तव में देंग की परिकल्पना से जरा भी कोई रिश्ता है या नहीं । पर इस एक संयोग के नाते ही इसे विचार का प्रस्थान बिंदु बनाया ही जा सकता है । 


शी ने बड़ी टेक कंपनियों के आर्थिक दुराचारों और चीन में बैंकों के कर्जों के साथ बड़े स्तर पर की जा रही धांधलियों पर नकेल कसने की बात करते हुए ही मार्क्सवाद और माओ के विचारों को भी याद किया है, और इस बात को दोहराया है कि चीन को समाजवाद के रास्ते पर ही दृढ़ता से अडिग रहना होगा । इसीलिए उनकी कार्रवाइयों को देंग के उस कथन से जोड़ कर देखना ज्यादा सही लगता है कि ‘अबाध आधुनिकीकरण और खुलेपन के पचास साल बाद हम यह विचार करेंगे कि चीन समाजवादी ही रहेगा या वह पूंजीवाद के लिए रास्ता छोड़ देगा’ । 


पूंजीवाद से मूल तात्पर्य है — बाजार अर्थ-व्यवस्था । ऐसी अर्थ-व्यवस्था जिसमें सिद्धांततः राज्य के हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं होती है । कथित प्रतिद्वंद्विता और बाजार का मांग और आपूर्ति का सिद्धांत उसका एकमात्र चालक सिद्धांत होता है । पूंजी के आत्म-विस्तार के खेल को खुल कर खेलने दो ; समाज की जरूरतें नहीं, पूंजी की जरूरतें समाज के नियमों का निर्धारण करेगा — यही पूंजीवाद के संचालन का मूल मंत्र है । इसमें सामाजिक विषमता को कोई अभिशाप नहीं, बल्कि विकास का एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है । विषमता का अर्थ है एक ओर चंद हाथों में संपत्ति का संकेंद्रण और दूसरी ओर अभाव का निरंतर विस्तारवान व्यापक परिसर । यह अभाव की निरंतरता ही पूंजी की गतिशीलता के इंजन और ईंधन की तरह भी काम करती है ।

 

इस मानदंड पर जब भी कोई आज के चीन पर नजर डालता है तो एक नजर में यही लगता है कि पिछले चालीस सालों में उत्पादन में सामान्य वृद्धि से वहां के जीवन की सामान्य समृद्धि में कुछ स्पष्ट सुधार नजर आने पर भी इसी दौरान सामाजिक विषमता का चेहरा इतना विकराल हो चुका है कि वह समानता पर आधारित न्यायपूर्ण समाज के मार्क्सवाद और उसके समाजवादी प्रकल्प को मुंह चिढ़ाता हुआ सा प्रतीत होता है । आज चीन और अमेरिका में संपत्ति के वितरण के स्वरूप में कोई बुनियादी फर्क नहीं रह गया है । अमेरिका में भी ऊपर के एक प्रतिशत लोगों के पास राष्ट्र की संपदा के 30 प्रतिशत हिस्से की मिल्कियत है, तो चीन में भी इसका अनुपात हूबहू वही है । वहाँ भी तीस प्रतिशत संपत्ति का मालिक एक प्रतिशत तबका बना हुआ है । यह स्थिति तब भी यथावत बनी हुई है जब पिछले कुछ सालों से शिंग ही वहां एक न्यायपूर्ण समाज (fair society) की दिशा में सुनियोजित ढंग से बढ़ने की लगातार बातें कर रहे हैं । अर्थात् इन चालीस से ज्यादा सालों में पूंजीवाद ने चीन की अर्थ-व्यवस्था पर एक ऐसी जकड़बंदी कायम कर ली है, उसने अपने एक ऐसे पूरी तरह से स्वतंत्र व्यापक स्नायुतंत्र को बखूबी विकसित कर लिया है कि उस पर राज्य का नियंत्रण कारगर होता नहीं जान पड़ता है । पूंजीवाद की सारी नीतियों-नैतिकताओं ने समाज के तंत्र को लगभग अपनी शर्तों पर चलाना शुरू कर दिया है । 


ऐसे में आज शी जिन पिंग का नए सिरे से सभी स्तर से भ्रष्टाचार को निकाल बाहर करने, बड़ी पूंजी के अपहरणकारी अभियानों के प्रति संदेह की दृष्टि रखते हुए उन्हें नियंत्रित करने, चिट फंड की तरह के व्यापार के पोंजी मॉडल पर खास तौर से प्रहार करने जिनसे बिल्कुल साधारण जनों के छोटे-छोटे संचय पर से हाथ साफ किया जाता है और समाज के हर स्तर पर समाजवाद के पक्ष में एक व्यापक विचारधारात्मक, नैतिक संघर्ष चलाने की बातों पर अधिकतम बल देने के उपक्रम को वैश्विक स्तर पर भी पूंजीवाद और समाजवाद के बीच के सनातन द्वंद्व के लिहाज से काफी दूरगामी महत्व का माना जा रहा है । 


शी के इस नए अभियान को दुनिया के तमाम पूंजीवादी अर्थशास्त्री स्वाभाविक रूप में गहरे शक की निगाह से देख रहे हैं । चीन के जिस रास्ते ने पिछले चालीस साल में वहां की अर्थ-व्यवस्था का एक कायाकल्प सा कर दिया है, उसमें किसी भी प्रकार के अनायास हस्तक्षेप के आगे क्या-क्या परिणाम हो सकते हैं, न सिर्फ चीन के लिए बल्कि पूरी विश्व अर्थ-व्यवस्था के लिए भी, इसे अगर आज विचार का विषय नहीं बनाया जाता है, तो सचमुच किसी आर्थिक चिंतन का कोई मायने ही नहीं रह जाएगा । 


चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थ-व्यवस्था है । कोरोना जैसी महामारी ने न सिर्फ उसकी जन-स्वास्थ्य सेवाओं और समग्र रूप से जन-कल्याण के ताने-बाने को मजबूत किया है, बल्कि एक प्रतिकूल विश्व-राजनीतिक परिवेश में भी कोरोना की चुनौतियों ने उसकी अर्थ-व्यवस्था को कहीं ज्यादा मजबूती प्रदान की है । 


ऐसे में, चीन के राष्ट्रपति शी का किसी भिन्न रास्ते की ओर बढ़ने की बात करना किसी के भी लिए आशंका और संदेह दोनों का विषय हो ही सकता है । 


शी चीन की इस नई परिस्थिति में मार्क्सवाद और समाजवाद की शक्ति को दिखाना और एक प्रकार से परखना भी चाहते हैं । मार्क्सवाद तथाकथित बाजार के नियमों की ‘स्वाभाविकता’ को कोई प्राकृतिक घटनाचक्र नहीं, बल्कि अर्थ-व्यवस्था की अपनी स्वाभाविकता में अप्राकृतिक हस्तक्षेप से कम नहीं मानता है । समाज की सामूहिक स्वाभाविकता में विषमता सिवाय एक विचलन के सिवाय कुछ नहीं है । सभ्यता और संस्कृति का विकास का अर्थ होता है सामाजिक गतिशीलता के बीच से सामने आने वाली विषमताओं के उन्मूलन की सतत कोशिश । पर पूंजीवाद सभ्यता के विकास का एक ऐसा चरण है जिसमें इस विषमता को ही प्रगति मान कर सचेत रूप में उसे साधा जाता है । पूंजी मनुष्यों के संसार के विरुद्ध अपना ही एक स्वतंत्र संसार तैयार करके उसके नियमों को समाज के नियमों पर बलात् आरोपित करती जाती है । यह समाज की प्रकृति के विरुद्ध पूंजी की प्रकृति का हमला है । 

तमाम पूंजीवादी विचारधारात्मक अभियानों का सार होता है, विषमता और गैर-बराबरी की साधना । यहां तक कि वहां स्वतंत्रताएं भी गुलामी के बीज धारण किए होती है । इसके खिलाफ मार्क्स ने समाज को उसकी स्वाभाविक विकास की गति पर लाने और विषमताओं का अंत करते जाने के सतत क्रांतिकारी संघर्ष का जो रास्ता दिखाया था, समाजवाद उसी सभ्यता और संस्कृति का प्रकृत रूप है । 


चीन के राष्ट्रपति जब मार्क्सवाद और समाजवाद की शक्ति को पूंजीवाद के खिलाफ लगाने के एक नए, सचेत अभियान की बात कहते हैं, तब उनका तात्पर्य यही होता है कि अर्थ-व्यवस्था को उसकी स्वाभाविक पटरी पर रखा जाए, उसे पूंजीवादी विचलन से यथासंभव बचाया जाए । संपत्ति के प्रमुख स्रोत प्रकृति और श्रम के बीच के अबाध संयोग को पूर्ण संरक्षण देते हुए ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ के स्वाभाविक प्रवाह में अप्राकृतिक बाधाओं से समाज को मुक्त रखा जाए ।


अमेरिकी अर्थशास्त्री डेविड कार्ड ने, जिन्हें इस साल के अर्थनीति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है, अर्थ-व्यवस्था के प्राकृतिक स्वरूप पर अपने शोध से यह साबित किया है कि न्यूनतम वेतन में वृद्धि से रोजगार में कभी कोई कमी पैदा नहीं होती है । सच्चाई यह है कि उससे सिर्फ पूंजी के मुनाफे की दर में कमी आ सकती है । कार्ल मार्क्स ने अपनी ‘पूंजी’ के तीसरे खंड में सामान्य लाभ दर का अध्ययन करते हुए बार-बार यह साफ किया है कि “जब भी मजूरी बढ़ती है, लाभ दर गिरती है” और कह सकते हैं कि जब भी लाभ दर गिरती है, मजदूरी, आम लोगों की आमदनी बढ़ती है । बाजार में माल की कीमतों में वृद्धि का पूंजी की लाभ दर की मात्रा की कामना, अर्थात् पूंजीवाद से संबंध है, न कि अर्थ-व्यवस्था की अपनी स्वाभाविकता से, जिसके लिए दुनिया की सारी पूंजीवादी सरकारें जनता के जीवन में भारी संकटों के काल में भी पुरजोर प्रचार करती हैं कि वे अर्थ-व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

 

बहरहाल, एक जमाना था जब चीन में इतनी गरीबी थी कि वहां एक उपलब्ध ‘केक’ के समान वितरण के बारे में बातें हुआ करती थी । इसमें परिवर्तन के लिए तीव्रता से उत्पादन में वृद्धि जरूरी थी । दुनिया में उपलब्ध तमाम संसाधनों का इसमें योगदान लेने की जरूरत थी । पर आज परिस्थिति भिन्न है । चीन ने अपने देश से गरीब के अंत की घोषणा कर दी है । उसके सामने अब एक केक के वितरण वाली समस्या नहीं है । उसकी केक इतनी बड़ी हो चुकी है कि उससे सामान्य समृद्धि के लक्ष्य को साधा जा सकता है । केक वाली बहस वहां पीछे छूट गई है । और, ‘समानतापूर्ण वितरण’, न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की समस्या प्रमुख हो गई है । समय के साथ परिस्थितियों के विकास ने इस न्यायपूर्ण समाज के लक्ष्य को साधने के रास्ते को बहुत अधिक जटिल और दुर्गम बना दिया है । सच कहा जाए तो वहां निजी पूंजी के अंत का मार्क्सवादी लक्ष्य लगभग पहेली प्रतीत होने लगा है । 


चीन के समाज के इस यथार्थ को समझते हुए ही शी ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को याद दिलाया है कि उन्हें याद रखना चाहिए कि मार्क्सवाद और माओ के विचारों के आधार पर बनी पार्टी का गठन किस उद्देश्य से हुआ था ? आज वे कौन सी चीजें है जो इस लक्ष्य के सामने पहाड़ समान बाधा का रूप ले चुके हैं ? वे चाहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी को उन सबकी शिनाख्त करते हुए उनकी जकड़नों से अर्थ-व्यवस्था और पूरे समाज को अधिकतम मुक्त करना होगा । 


चीन इस दिशा में आगे कौन से ठोस कदम उठाता है, यह देखने की बात होगी । चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को अब तक नियंत्रित ढंग से व्यापक सामाजिक उथल-पुथल को संचालित करने और उसके बीच से राष्ट्र को मजबूत करने का लंबा अनुभव मिल चुका है । इस साल रोम के जिन वैज्ञानिक प्रोफेसर जार्जिया पैरिसी को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है, उनका अध्ययन इस बात पर है कि पिंड से लेकर ब्रह्मांड तक की अटूट दिखाई देती किसी भी व्यवस्था के मूल में अव्यवस्था ही सबसे मजबूत चुंबक के रूप में काम करती है ।  व्यवस्था नहीं, अव्यवस्था ही शाश्वत है । व्यवस्था तो उसका एक सामयिक उत्पाद भर है । एक चरण । उन्होंने ही ‘स्पिन ग्लास’ के उन सिद्धांतों पर काम किया था जिनसे शीशे के रूप को बनाए रखते हुए भी उसमें गुणात्मक परिवर्तन संभव होते हैं । टफेंड ग्लास जैसे सारे प्रयोग इन्हीं सिद्धांतों से चालित होते हैं ।


इसमें सिर्फ गौर करने की बात यह है कि यह टफेंड ग्लास अपनी भारी मजबूती के बावजूद जब किसी झटके से टूटता है तो उसके क्रिस्टल इस प्रकार बिखर जाते हैं कि उन्हें फिर से जोड़ पाना असंभव होता है । पैरिसी ने तमाम चीजों में इस प्रकार के अव्यवस्था के सचेत प्रयोग की हद के माप के तरीके पर काम किया, जिसके लिए उन्हें नोबेल दिया गया है । इसमें चूक किसी भी व्यवस्था के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है । 


बड़ी पूंजी और उसके तंत्र पर नियंत्रण के अपने तमाम प्रयोगों में चीन के कम्युनिस्ट नेतृत्व को इस प्रकार के फौलादी शीशे को तैयार करने के सचेत प्रयोगों की सीमाओं के प्रति भी पूरी तरह से जागरूक रहना होगा । पैरिसी ने ही यह भी दिखाया है कि इस जगत में कोई भी चीज असंबद्ध नहीं है । आदमी के स्नायुतंत्र से लेकर पूरी ब्रह्मांडीय व्यवस्था तक, सब ऐसे सूत्र में गुँथे होते हैं कि स्ट्रिंग सिद्धांत के अनुसार तितली के पंख की फड़फड़ाहट से ही उनमें हमेशा एक खलबली मची रहती है । 

बहरहाल, चीन में पुलिस, खुफिया विभाग, न्यायपालिका और जेलों की व्यवस्था में व्यापक भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए हजारों कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाइयों से लेकर वहाँ की एक सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री झेन शुआंग पर 46 मिलियन डालर का जुर्माना, भीमकाय रीयल स्टेट कंपनियों के वित्तीय कदाचार को पकड़ने आदि की तरह के बहुचर्चित कदमों के अलावा आगे विचारधारात्मक संघर्ष के जिस व्यापक अभियान की एक रूपरेखा का राष्ट्रपति शी ने इसी बीच जो संकेत दिया है, वह बताता है कि उनकी नजर में पूंजीवाद के आर्थिक प्रसार से लेकर उसके द्वारा पैदा की जा रही सांस्कृतिक चुनौतियों का भी एक पूरा परिदृश्य स्पष्ट है । वे आधार और अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों के सच को जानते हैं और विषय को सिर्फ अर्थ-व्यवस्था के किसी एक सवाल तक सीमित रखना नहीं चाहते । वे इस बीच जीवन के सभी क्षेत्रों पर जो गर्दो-गुबार जम गई है, जिसके नीचे समाजवाद की चमक मलिन नजर आती है, उस गर्द को झाड़ने का अभियान चलाना चाहते है । जाहिर है कि इसमें बहुतों को पार्टी के अंदर ‘पूंजीवादी रास्ते के पथिकों’ के खिलाफ माओ की सांस्कृतिक क्रांति की एक झलक भी दिखाई दे सकती है ।

 

बाजारवाद के खिलाफ शी जिन पिंग की इस मुहिम के जिस एक पहलू से हम जैसे भारत के लोगों के कान खड़े हो जाते हैं, वह है मोरल पुलिसिंग, नैतिक निगरानी का पहलू । इस प्रकार की पुलिसिंग के साथ आम तौर पर जुड़ा हुआ एक प्रकार का संरक्षणवादी नजरियां हमारे लिए किसी भी प्रगतिशील रूपांतरण की दृष्टि से बेहद अटपटी सी चीज है । भारतीय समाज का समग्र ढांचा बिल्कुल प्रारंभ से ही इतना वैविध्यपूर्ण, सामंजस्य तथा सहानुभूति पर टिका रहा है जिसमें बराबरी के नाम पर भी किसी भी प्रकार के ‘यकसापन’ की कल्पना ही हमारे अंदर एक गहरी वितृष्णा का भाव पैदा करती है । भारतीय मन ऐसे सर्वाधिकारवाद को कभी स्वीकार नहीं सकता है जो जीवन के हर क्षेत्र को अपने ही नियत मानदंडों पर ढालने की जिद लिए हुए हो ।


इस मामले में भारत सचमुच ऐसा प्राकृतिक समाज है जिसमें अव्यवस्था ही व्यवस्था है, और वही इस समाज की आंतरिक शक्ति भी है । यह विश्वकुटुंबकम् के सिद्धांत का देश, अपने अंतर से एक संघीय राज्य है । अगर वह नहीं है तो हम कह सकते हैं कि भारत ही नहीं है । हमारा आधुनिक राजनीति का समग्र अनुभव भी यही दिखाता है कि जब भी किसी केंद्रीय शक्ति ने इसपर किसी भी प्रकार के यकसापन के फार्मूले को लादने की कोशिश की है, तभी राष्ट्र अंदर से कमजोर हुआ है और उसमें बिखराव की दरारें उभरने लगती है ।

 

खुद चीन में बमुश्किल 10-12 लाख वीगर मुसलमानों, तिब्बत, और हांगकांग का अनुभव भी यही जाहिर करता है कि इतना शक्तिशाली और समर्थ होने पर भी वह इन समस्याओं का अब तक कोई सहज निदान नहीं ढूंढ पाया है । चीन की समृद्धि का लालच भी उन्हें अपनी पहचानों को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर पाया है । चीन आज ताइवान का अपने में विलय चाहता है । पर इस दिशा में वह जल्दबाजी से सिर्फ इसीलिए बचना चाहता है क्योंकि ‘एक राज्य और दो व्यवस्थाओं’ के हांगकांग के अनुभव में इसी प्रकार की जल्दबाजी के चक्कर में वह अभी अपने हाथ जला रहा है ।

 

जो भी हो, मोरल पुलिसिंग, एक ‘आज्ञाकारी समाज’ के गठन के लिए विचारधारात्मक संघर्ष की अवधारणा की पता नहीं चीनी सभ्यता का इतिहास कितनी अनुमति देता है, कितनी नहीं । पर हम भारत के लोगों के लिए यह एक त्याज्य विचार है । हम मतभेदों को कायम रखते हुए अपने राष्ट्र को मजबूत करने के सिद्धांत को ज्यादा सही और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में ज्यादा संगतिपूर्ण मानते हैं । 


शी जिन पिंग का पूंजीवादी बाजारवाद के विरुद्ध एक प्रकार के समाजवादी आर्थिक प्रकृतिवाद का नारा भी इसीलिए हमारे अंदर गहरे समर्थन का भाव पैदा करता है क्योंकि प्रकृति का नियम किसी जोर-जबर्दस्ती से नहीं चलता है । वह पूरे समाज की समान भागीदारी का नियम है, वह समाजवाद का मूल मंत्र है । वही प्रकृति में पूंजीवादी बलात् हस्तक्षेप का प्रतिकार है । इस प्रतिकार में किसी भी प्रकार के ‘यकसापन’ का अभियान ‘प्रतिकार के प्रतिकार’ के रूप में काम करेगा । चीन के समाजवाद को अगर कहीं से कोई खतरा पैदा होगा, तो कहना न होगा, वह वहीं से होगा । 

       




गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

जो पानी बह गया उसे फिर से छुआ नहीं जा सकता !

 —अरुण माहेश्वरी



आज के टेलिग्राफ में प्रभात पटनायक का एक लेख है — A Promethian moment ( The farmer’s agitation challenges theoretical wisdom) । बंधन से मुक्ति का क्षण ; किसानों के आंदोलन ने सैद्धांतिक बुद्धिमत्ता को ललकारा है । 


जाहिर है, यह किसान आंदोलन और उसके एक महत्वपूर्ण सबक पर लिखा गया लेख है । अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास से जो भी परिचित है, जानता है कि 1935 से ही इसकी प्रमुख चिंता का एक स्थायी विषय रहा है — किसान एकता । किसान सभा भारत की समग्र किसान जनता का एक छतरीनुमा (umbrella) संगठन रहा है । और सच कहा जाए तो तब से लेकर आज तक यह एकता का प्रश्न ही उसके लिए एक स्थायी समस्या और विचार का प्रमुख विषय भी बना हुआ है । 


दरअसल, यह विषय एक बड़ी समस्या का विषय तब लेता है जब किसी को किसानों का एक हिस्सा किसान नहीं, पूंजीपति नजर आने लगता है । अगर किसी भी चरण में कृषि समाज भी पूंजीवाद की तरह के पूंजी और श्रम के बीच अन्तर्विरोध का क्षेत्र बन कर रह जाए तो फिर समग्र किसान एकता कैसे संभव हो सकती है ? कहना न होगा, किसान सभा के लोगों के लिए भी घुमा-फिरा कर यही बिंदु एक अबूझ पहेली की तरह उनकी समस्या बना रहा है अथवा बनाया जाता रहा है । 


हमारी दृष्टि में किसान सभा के आंदोलन के अंदर की इस समस्या के मूल में कहीं न कहीं पूंजी की एक भ्रांत समझ की सबसे बड़ी भूमिका रहती है । पूंजी का अर्थ होता है मुनाफे के जरिए लगातार विस्तार के लिए नियोजित धन । धन के जिस रूप में निरंतर विकास की संभावना न हो, वह और कुछ भी कहला सकता है, पर पूंजी नहीं कहलाता । वह एक प्रकार का गड़ा हुआ धन, अस्थि हो सकता है जिसे खर्च करके खत्म किया जा सकता है, अथवा जिसे सहेज कर रेहन पर रख कर जीवन भी किया जा सकता है । किसान की जमीन ऐसा धन है जिसका कोई आत्म-विस्तार नहीं होता, हस्तांतरण हो सकता है, उसके मूल्य में वृद्धि भी अनिवार्य नहीं होती। फसल से किसान परिवार अपना जीवन चलाता है । इसे सही कहे तो पूंजी का वह आदिम संचित रूप कह सकते हैं जिसका पूंजी में रूपांतरण संभव है । कार्ल मार्क्स की शब्दावली में — “मूल्य की वह मात्रा जो पूंजी की तरह काम करने वाली है ।” (पूंजी खंड-1, भाग-7, पूंजी का संचय) 


अर्थात् एक ऐसा मूल्य जो अभी पूंजी नहीं है, पर वह आगे एक प्रक्रिया के तहत पूंजी में रूपांतरण की संभावना लिए हुए है । इसीलिए जमीन जब तक किसान के हाथ में होती है, उसका मूल्य होने पर भी वह पूंजी का रूप नहीं ले सकती है । 


आज के अति-आधुनिक तकनीक के काल में भी, जमीन की उत्पादनशीलता में अभूतपूर्व वृद्धि के बावजूद दुनिया में कहीं भी किसान पूंजीपति नहीं कहलाता है । वह मूल्य के निरंतर और अनंत ब्रह्मांडीय विस्तार की संभावना लिए हुए धन का मालिक नहीं होता है । पूंजीवादी बाजार का नियम उसके सारे अतिरिक्त मूल्य का इस तरह अपहरण करता जाता है कि किसानी हमेशा किसान के जीवन में एक स्थायी संकट का सबब बनी रहती है । सारी दुनिया में किसानों और औद्योगिक पूंजी के मालिकों के बीच एक स्थायी, असमाधेय अन्तर्विरोध दिखाई देता है । राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा मात्र के दुनिया की तमाम सरकारों को किसी न किसी रूप में किसानों को क्षतिपूर्ति देनी पड़ती है । इसीलिए दुनिया के सभी किसानों की समस्या कमोबेश एक सी बनी हुई है । 


किसी भी पूंजीवादी राज्य में गांवों के इस यथार्थ के बावजूद एक प्रकार के अपरिष्कृत (crude) कम्युनिज्म की धारणा के तहत, जिसे मार्क्स ने शुद्ध रूप से ईर्ष्या पर आधारित शक्ति का एक रूप कहा था, गांवों में किसानों और भूमिहीन खेतमजदूरों के बीच कुछ उसी प्रकार के शत्रुतामूलक अन्तर्विरोध की धारणा काम करने लगती है जैसा असमाधेय अन्तर्विरोध पूंजी और श्रम के बीच का हुआ करता है । 


यहां किसी भी अतिरिक्त भ्रम से बचाव के लिए ही हम मार्क्स के ‘अपरिष्कृत कम्युनिज्म’ के विश्लेषण को थोड़ा विस्तार से रखना चाहूंगा क्योंकि यह कृषि क्षेत्र में वामपंथ की कार्यनीति पर विचार के लिए भी उपयोगी हो सकता है । 


मार्क्स अपनी प्रसिद्ध कृति “Economic and Philosophic Manuscripts of 1844” में जहां ‘सम्पत्ति और कम्युनिज्म’ के विषय पर विचार कर रहे थे, एक प्रसंग आया औरतों को निजी संपत्ति के बजाय सार्वजनिक संपत्ति मानने का । कम्युनिज्म के दुश्मनों ने इस बात को कम्युनिज्म के खिलाफ खूब प्रचारित किया था, जिसका एक उत्तर कम्युनिस्ट घोषणापत्र में भी दिया गया है । इसी विषय के सूत्र को थाम कर मार्क्स ने 1844 की आर्थिक और दर्शनशास्त्रीय पांडुलिपियों में अपरिष्कृत(crude) और मूर्खतापूर्ण (thoughtless) कम्युनिज्म का प्रसंग उठाया जिसमें भी कहीं इसी प्रकार प्रच्छन्न रूप में स्त्रियों को संपत्ति मानने का विचार काम कर रहा होता है । इसी सिलसिले में विषय का खुलासा करते हुए मार्क्स लिखते हैं कि “इस प्रकार का कम्युनिज्म — चूंकि हर क्षेत्र में आदमी के व्यक्तित्व से इंकार करता है — निजी संपत्ति की ही एक तार्किक अभिव्यक्ति मात्र है, जिसे वह नकारता है । आम ईर्ष्या की खुद एक ताकत होती है जिसकी ओट में घुमा कर लालच अपने को पुनर्स्थापित करता है और खुद को संतुष्ट करता है । निजी संपत्ति के कम से कम हर ऐसा रूप को संपत्तिवान के निजी धन के खिलाफ ईर्ष्या को काम में लगा कर सबको एक समान स्तर पर घसीट लाने का विचार ऐसा अपरिष्कृत कम्युनिज्म है, ताकि इस ईर्ष्या और लालसा को टकराहट के मूल में ला सके । यह सिर्फ इसी ईर्ष्या की परिणति है और एक पूर्व-कल्पित न्यूनतम की नीचे के स्तर पर उतार लेने का काम । इसका अपना एक निश्चित और संकीर्ण मानक होता है । निजी संपत्ति को ऐसे कम करने का संपत्ति के आत्मसातीकरण से कितना कम संबंध होता है, यह इसके संस्कृति और सभ्यता के पूरे जगत के इंकार के विचार के तथ्य से साबित हो जाता है । यह उस गरीब और अविकसित मनुष्य की अप्राकृतिक सादगी की दिशा में पतन है जिसकी मामूली जरूरतें होती हैं और जो न सिर्फ निजी संपत्ति के विचार से आगे जाने में विफल रहा है, बल्कि अभी वहां तक पहुंचा भी नहीं है ।” (Marx-Engels Collected works, vol.3, page 294-295)

(This type of communism — since it negates the personality of man in every sphere — is but the logical expression of private property, which is this negation. General envy constituting itself as a power is the disguise in which greed re-establishes itself and satisfies  itself, only in the other way. The tthought of every piece of private property as such is atleast turned against wealthier private property in the formm of envy and urge to reduce things to a common level, so that this envy and and urge even consttitute the essence of competition. Crude communism is only the culmination of this envy and of this levelling down proceeding from the pre-conceived minimum. Itt has a definite and limited standard. How little this annulement of private property is really an appropriation is in fact proved by the abstract negation of the entire world of culture and civilisation, the regression to the unnatural simplicity of the poor and crude man who has few needs and who has not only failed to go beyond private property, but has not yet even reached it.) 

हम जानते हैं कि वामपंथी राजनीति की कुछ स्थानीय जरूरतों के कारण ही इर्ष्या की इस शक्ति के प्रयोग के लालच में हमेशा गांव में किसानों के बीच के आपसी विरोधों और किसान-मजदूर के बीच मौलिक अन्तर्विरोधों की कल्पना कर ली जाती है जैसा पूंजीवाद में पूंजी और श्रम के बीच होता है और उसका भरपूर इस्तेमाल किया जाता है । 

कहना न होगा, गांव की राजनीति में कम्युनिस्ट कार्यनीति का यह स्थानीय दबाव सामाजिक अन्तर्विरोधों की उसकी समग्र और मूलभूत समझ को प्रभावित करता है । उन्हें गांव के धनी किसानों को गांव में पूंजीवाद का मूर्त रूप दिखाई देने लगता है और जो औद्योगिक पूंजी बिचौलियों के असंख्य स्तरों के जरिये गांव की संपत्ति की लूट के काम में लगी रहती है, उसकी सूरत ग्रामीण संदर्भ में सुदूर अंतरिक्ष में कहीं गुम हो जाती है । चालू भाषा में जिस सच को ‘शहर वनाम गांव’ के मुहावरे से पहचाना जाता है, मार्क्सवादी सिद्धांतकार उसमें एक सामंती धोखा देखने से नहीं चूकते हैं। 

इसी समझ की पृष्ठभूमि में, किसी विकासमान पूंजीवादी राज्य के अन्तर्गत पूंजी और जनता के बीच के विकासमान मुख्य अन्तर्विरोध को देखते हुए पूंजी के खिलाफ जनता के सभी हिस्सों की एकता को सर्वोपरि समझने में कोई कष्ट नहीं होना चाहिए । पूंजीवाद के दलाल इस अन्तर्विरोध को न सिर्फ धर्म, जाति और वर्ण के धुएं से छिपाया करते हैं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में छोटे-बड़े भेद से उत्पन्न ईर्ष्या, और सामाजिक अन्याय के नाना रूपों से भी धूमिल किया जाता है । गांवों में वर्गीय अन्तर्विरोधों की ही एक खास अभिव्यक्ति मान कर कम्युनिस्ट भी यदा कदा जातिवाद का झंडा उठा लेते हैं । 


कम्युनिस्ट आंदोलन ने मन-प्राण से हमेशा सांप्रदायिकता, जातिवाद आदि से लड़ाई की जरूरत को स्वीकारा है और इसके लिए तमाम स्तरों पर भारी कुर्बानियां दी है । यहां तक कि भूमि सुधार के अपने कार्यक्रमों में भी उसने व्यापकतम किसान एकता के पहलू की आंतरिकता से रक्षा की है । इसके चलते कई इलाकों में गरीब जनों के अपने परंपरागत समर्थन के आधार को भी जातिवादियों के हाथ में गंवाया है ।


इस मामले में हम खास तौर पर पश्चिम बंगाल के तेभागा आंदोलन (1846-47) से लेकर भूमि सुधार और आपरेशन वर्गा (सन् ’72-’80 का काल) के अनुभवों का जिक्र करना चाहेंगे जिनमें छोटी जोत के किसानों, भूमिहीनों, बंटाईदारों और खेत मजदूरों की भी भागीदारी थी । बड़ी जोत के जमींदार तो तेभागा के परवर्ती जमींदारी उन्मूलन से दृश्य से प्रायः गायब थे । उसके लिए तो भारत सरकार के कानून और बिनोवा के भूदान तक को याद किया जा सकता है, जिनमें नीतिगत स्तर पर देश की सार्विक उन्नति के लिए ही चकबंदी से लेकर जमीन के पुनर्वितरण तक को जरूरी माना गया था । गौर करने की बात है कि पश्चिम बंगाल के इन आंदोलनों के कई नेतृत्वकारी व्यक्ति गांव के अपेक्षाकृत संपन्न तबकों से ही आते थे । वामपंथी किसान आंदोलन वास्तव में कभी हिंसक नहीं रहा । यह एक व्यापक जन-आलोड़न के मानिंद था और उसी की एक तार्किक परिणति पंचायती राज के विकास में भी हुई है । इन सबके विस्तृत ब्यौरों को हमने अपनी पुस्तक ‘पश्चिम बंगाल में मौन क्रांति’ में दिया है  । 


थोड़ा और विषयांतर होते हुए, हम यह भी कहेंगे कि वास्तव में भारत में ‘कृषि क्रांति’ की पूरी अवधारणा चीनी क्रांति की तर्ज पर विकसित हुई थी जहां तब तक भारत की तरह पूंजीवाद के बीज भी नहीं पड़े थे । वहां हर सामाजिक अन्तर्विरोध सामंतवाद के दायरे में, गांवों के स्तर पर ही प्रकट हो रहे थे ।

 

जो भी हो, यह एक बिल्कुल भिन्न विषय है । मूल बात यह है कि पश्चिम बंगाल के किसान आंदोलन ने शुरू से ही हमेशा किसान एकता को कृषि क्षेत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना था । पश्चिमबंग कृषक सभा ही यहां के गांवों में सभी स्तर के किसानों का अकेला संगठन था । जब सीपीआई(एम) ने खेतमजदूर संघ की स्थापना की, पार्टी की बंगाल इकाई ने शुरू में अपने प्रदेश में उसके गठन से इंकार तक किया था । पर काफी साल बाद, पार्टी के अंदर भी ‘वर्ग संघर्ष’ चलाने वाले केंद्रीय क्रांतिकारी नेतृत्व के दबाव से उसे स्वीकारना पड़ा । 


आज कोई अगर इस पूरे इतिहास की पुनर्खोज करे तो पाएगा कि कैसे अपरिष्कृत (crude) क्रांतिकारी धारणाओं के कारण किसान एकता का सूत्र वामपंथी आंदोलन से छूटता चला गया, अर्थात् वामपंथ भारत के बृहद ग्रामीण क्षेत्र से नदारद होने लगा । 

कहना न होगा, यह वही खोया हुआ सूत्र है जिसे अभी के किसान आंदोलन के बीच से फिर एक बार पा कर प्रभात पटनायक आह्लादित है, इसे सिद्धांतकारों के एक नए इलहाम के क्षण, उनकी अपनी जकड़न से मुक्ति के क्षण के रूप में देख रहे हैं । जाट चौधरियों और उनके पैर के जूती मान ली गई दलितों की एकता का महत्व उन्हें फिर से समझ में आ रहा है । 


पर हम इसे एक दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जब भी किसी खोई हुई चीज को फिर से पाया जाता है, वह कभी भी अपने मूल रूप में वापस नहीं आती है । उस बीच बीत चुके समय की छाप उस पर अंकित हो जाती है । अभी के किसान आंदोलन की भी एक आधारभूत शक्ति के रूप में आज किसान सभा को देख कर हम खुश होते हैं, पर संदेह होता है कि वामपंथी आंदोलन को वास्तव में उसकी जड़ताओं से मुक्ति में यह अब कितना सहयोगी हो पाएगा । यही इतिहास का न्याय कहलाता है !

 

प्रभात पटनायक इस पूरी प्रक्रिया में किसान जनता के क्रांतिकारीकरण को देख रहे हैं, जो बिल्कुल सही है । पर वह क्रांतिकारी भूमिका भी अपनी शर्तों पर ही निभायेगी, जडसूत्रों में कैद वामपंथ की शर्तों पर नहीं, यह भी दिखाई देता है । जो बस छूट जाती है, उसे ही फिर से पकड़ा नहीं जात । जो पानी बह जाता है उसे फिर से छुआ नहीं जाता । 

प्रभात पटनायक के लेख का लिंक : https://www.telegraphindia.com/opinion/the-farmers-agitation-challenges-theoretical-wisdom/cid/1833646            


शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

एक सच्चा जनकवि हरीश भादानी

 अरुण माहेश्वरी

हरीश जी अपने वातायन परिवार के साथ

सचमुच इससे कठिन शायद ही कोई दूसरा काम हो सकता है कि एक बेहद मासूम, सरल और सीधे आदमी को गहराई से समझा जाए। किसी कपटी, कठिन और टेढ़े चरित्र की गुत्थियों को खोलना आसान होता है। उसमें बहुत कुछ ऐसा होता है जो खोले जाने की अपेक्षा रखता है, पर्दे के पीछे छिपा होता है। लेकिन एक पूरी तरह से पारदर्शी जीवन को और गहरे तक समझने की सायास कोशिश कितनी दुष्कर हो सकती है, आज जब मैं हरीश जी के व्यक्तित्व के बारे में लिखने बैठा हूं तब पता चल रहा है। अनंत तिकड़मों और स्वार्थों में डूबे इस संसार में कोई योजनाविहीन नि:स्वार्थ जीवन ही हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती है, हरीश जी की स्मृतियों से उनकी कोई तस्वीर बनाने की कोशिश में खुद को सबसे अधिक इसी चुनौती से जूझता हुआ पाता हूं। 


चीन के महान कथाकार लू शुन की सबसे प्रसिद्ध कहानी है : आ क्यू की सच्ची कहानी। गांव का एक बेहद गरीब, अबोध, सबसे लात खाने वाला फिर भी सदा सबकी सेवा के लिये उपलब्ध चरित्र। गांव भर में अनायास विचरण करने वाले उस चरित्र में कहीं किसी प्रकार की कोई नाटकीयता नहीं थी, सिवाय इसके कि उसका अंत गांव के ही एक घमंडी ‘क्रांतिकारी’ से झूठी होड़ में फांसी पर चढ़ जाने से हुआ था। ऐसे निष्प्रयोजन और अनाटकीय जीवन को कहानी का विषय बनाना सचमुच एक कठिन चयन था। लेकिन इसी जीवन के ब्यौरे से लू शुन ने ऐसी कहानी कह दी कि आज तक साहित्य के पंडितगण उसमें अपना मगज खपाये हुए हैं। लू शुन के इस विचित्र से चयन के पीछे के तर्क को लेकर अब तो एक पूरे जीवन दर्शन, आक्यूवाद तक की रचना हो चुकी है। 


आ क्यू के ठीक विपरीत हमारे सामने पूरी तरह से पारदर्शी, सरल और सादा जीवन का एक दूसरा चरम उदाहरण गांधीजी का है। उनके निजी जीवन में जो भी थोड़ी बहुत गुत्थियां थीं, खुद उन्होंने उन्हें सबके सामने रख दिया था। उनके दर्शन, उनके जीवन के उद्देश्यों पर कहीं कोई पर्दादारी नहीं थी। फिर भी उनके जीवन काल में ही बड़े-बड़े दिग्गजों ने उन्हें ‘चालाक लोमड़ी’ तक कहा। आज तक वे दुनिया के सबसे रहस्यमय और आकर्षक व्यक्तित्व बने हुए हैं। रोमा रोलां का यह कहना कि लोग इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि इस धरती पर गांधी जैसा भी कोई व्यक्ति हुआ था, अतिशयोक्ति नहीं था। 


हरीश जी न आ क्यू थे और न ही महात्मा गांधी। वे सुदूर रेगिस्तान के एक छोटे से शहर के सामंती परिवार में पनपे हिंदी के अपने प्रकार के विद्रोही रूमानी कवि थे। अन्यों से फर्क शायद इतना ही था कि स्वरों और अक्षर-ब्रह्म के मनमोही अनहद के गुंफन ने उनसे आम जीवन के प्रयोजनों और स्वार्थी सरोकारों को छीन लिया था। अपने पिता और दादा की भगवाधारी होने की पारिवारिक परंपरा के ठीक विपरीत वे पूरी तरह से गृहस्थ, अपने परिवार के मुखिया थे। फिर भी उन्हें चालू अर्थों में पूरी तरह से पारिवारिक नहीं कहा जा सकता। घर से दूर महीनों किसी दूसरे-तीसरे शहर में डेरा जमाये रखने वाले घुमंतु। अपने सुरों और शब्दों से निर्मित संसार में एक खासप्रकार की आत्मलीनता के साथ उन्होंने ऐसा जीवन जीया कि अनायास ही उनके निकट के अनेक लोग उनमें किसी संत का रूप देखने लगते थे। लेकिन सच सिर्फ यही है कि वे भी एक सच्चे, सरल, निश्छल और पारदर्शी इंसान थे। और इसीलिये एक चरित्र के रूप में अध्ययन की दृष्टि से बेहद कठिन चरित्र थे। उन्हें खोलना किसी खुले हुए को खोलने जितना ही दुष्कर काम जान पड़ता है।  


हरीशजी की अंतिम यात्रा के समय बीकानेर शहर की सड़कों पर जो जन-सैलाब उमड़ा और उनकी शोकसभा में शहर के जाने-माने लोगों के रूंधे गलों की जो सुबकियां सुनाई दी, उनसे एक बात साफ थी कि वे बेहद लोकप्रिय ऐसे आदमी थे जिनके संसर्ग से हर आम और खास को सिर्फ सुकून और सुकून ही मिलता था। ऐसी शोकसभाओं में ही जो बात सबसे अधिक सुनने को मिली, वह यह कि उन्होंने कभी किसी से अपने बारे में कोई सिफारिश नहीं की। 


जिनकी अपने बारे में कोई योजना ही नहीं थी वे फिर किस बात की सिफारिश करते! लगता है होश संभालते ही उन्होंने किसी पवित्र प्रेमी के ओज और विगलित उदात्तता के प्याले को पीकर होश गंवा दिया था। प्रेम फिर प्रिया से हो या यृद्धरत आदमी से, या अपने देश, धरती और यहां तक कि परंपरा के सूत्रों से ही क्यों न हो! हरीश जी की तमाम रचनाएं, उनकी भाषा और शैली किसी भक्त की अडिग आस्था से उपजे तेज और समर्पण की आवेशपूर्ण और आवेगमय आत्मलीनता की गवाह है। उम्र और अनुभवों के साथ उनके विषय बदलें लेकिन रचना का मूल स्वभाव नहीं। और, उसी प्रकार उनका पूरा व्यक्तित्व भी नहीं। उनके व्यक्तित्व का कोई भी अंश उनकी रचनाओं से जुदा नहीं था। इसीलिये जानकार उन्हें एक आपाद-मस्तक कवि कहते थे। मृत्यु के उपरांत उन्हें दीगयी श्रद्धांजलियों में जिस एक जुमले का सबसे अधिक प्रयोग दिखाई देता है, वह है - मुकम्मल कवि। खास के प्रति उनमें न कभी कोई आकर्षण था और न ही खास बनने की कोई ख्वाहिश। आम के वृत्त में ही रचते-बसते थे। इहलोक परलोक सब इसी दायरे में था। इसीलिये कहना मुश्किल है कि प्रेम के कवि का जनकवि में उत्तरण हुआ या जनकवि प्रेम का कवि, प्रकृति और धरती का कवि बन गया। जन और प्रेम, जन और प्रकृति की नैसर्गिक अभिन्नता उनमें चरितार्थ हुई थी। 


हरीश जी महीनों हमारे घर रहते थे। लगभग चार दशकों से उनके गीतों और धुनों से हमारा परिवेश गुंथा हुआ था। लेकिन उनसे संवाद तुलनामूलक कम ही हुआ करता था। युवा वय में जब हम पर क्रांतिकारी राजनीति का जोम था, हम उन्हें गाते थे, उनमें रमते थे, लेकिन अक्सर उनपर राजनीति के कुछ अजीबोगरीब मानदंडों की अपेक्षाओं के हथौड़ें भी चलाया करते थे। लेकिन अपनी धुन के पक्के हरीश जी हमारे आवेश से ज्यादा विचलित नहीं होते थे। यहां तक कि परवर्ती दिनों में जब हम क्रिया को संज्ञा और संज्ञा को क्रिया बनाने के भाषा के उनके खेलों पर या शब्दों की पुनरावृत्ति से अभिव्यक्ति के आवेग को बनाये रखने के उनके अतिरिक्त आग्रह पर या नितांत निजी अनुभवों और स्थानिक भाषाई और मिथकीय संदर्भों के बिंबों से लबालब उनकी लंबी-लंबी कविताओं के अभेद्य से लगने वाले संसार पर घनघोर आपत्ति करते थे, तब भी लगभग किसी चिकने घड़े की तरह वे बेअसर ही रहते थे। आज जब वे नहीं है तब उनके ऐसे ही विपुल रचना संभार को देख कर लगता है कि भाषा, शैली और अभिव्यक्ति के सभी स्तरों पर रचाव की उनकी जिद ने सचमुच रचना का उनका अपना ही व्याकरण, एक संपूर्ण शास्त्र गढ़ दिया है। पहले उस व्याकरण को समझो, शास्त्र को सिद्ध करो, फिर उनके इस रचना संसार में प्रवेश करो। आम लोगों के बीच रचने-बसने और बड़ी से बड़ी भीड़ को भी अपने गीतों से रिझाने और प्रेरित करने वाले, कोई ‘खास’ बनने की ख्वाहिशों से कोसों दूर हरीश जी का किंतु यह अपना एक खास क्षेत्र था, कुछ-कुछ मिर्जा गालिब की अरबी-फारसी शायरी के क्षेत्र की तरह ही। गालिब-विशेषज्ञों के लिये उनकी अरबी-फारसी की शायरी कम महत्वपूर्ण नहीं है। हरीशजी के अध्येता-प्रशंसक भी उनकी रचनाओं के इस विशाल, किन्तु अचर्चित अंश में डूब कर रोमांचित और अनुप्रेरित होंगे, इसमें कोई शक नहीं है। 


तथापि, गालिब ‘गालिब’ हुए, उनकी उर्दू शायरी के चलते। बिल्कुल इसी तरह, हरीश भादानी हरीश भादानी है अपने असंख्य बेहद लोकप्रिय गीतों के चलते।  हरीश जी के अमर, जन-जन में गाये जाने वाले गीतों और कविताओं का भी इतना बड़ा भंडार है, जिसे उनके एक श्रेष्ठ रचनाकार व्यक्तित्व की तस्वीर बनाने के लिये काफी कहा जा सकता है। 


इधर के दिनों, जब हरीश जी हमारे घर पर होते थे, सरला से अक्सर कहा करता था कि यह शख्स हमारी जिंदगी भर, अपनी गैर-मौजूदगी में भी, अपने गीतों के बोल और धुनों से पता नहीं हमें कितना रुलायेगा, और हमेशा एक अलग प्रकार की छाया और सुकून भी देगा। 


जब से हमने हरीश जी को जाना, हमेशा उन्हें आर्थिक संकटों से जूझते हुए ही जाना। अर्थ का विषय शायद उनके लिये किसी बला की तरह था। वे उससे दुखी हो सकते थे, उसके टल जाने की प्रार्थना कर सकते थे, लेकिन उससे मुक्ति का उनके पास कोई उपाय नहीं था। एक समय वे कवि सम्मेलनों के बड़े कवि थें, लेकिन कवि सम्मेलन उनके लिये थे, वे कभी कवि सम्मेलनों के नहीं हुए। राजस्थान का बच्चन और नीरज कहलाना उन्हें प्रिय हो सकता था, लेकिन कविसम्मेलनी कहलाना कत्तई नहीं। अपनी गायकी के लिये उनके निकट अज्ञेय जी की इतनी सी प्रशंसा ही काफी थी कि हरीश भादानी को सुन कर पता चलता है कि कविता को कैसे गाया जा सकता है। गीत और मंच उनके जीविकोपार्जन के साधन नहीं बने, कविगोष्ठियों और जन-आंदोलनों की वस्तु ही रहे। व्यवसायिक कवि सम्मेलनों में न जाने का निर्णय उन्होंने उस वक्त लिया जब वे अपने जीवन के सबसे गहरे और पीड़ादायी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे थे। आर्थिक परेशानी उन्हें मसीजीवी लेखन की ओर ले गयी, जयपुर में डेरा डाला। इसका भी रचनात्मक फल यह निकला कि प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों से जुड़ कर वे राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों के जन-जीवन से एकाकार होगये। गांव के लोगों के लिये उन्होंने ‘क्षण-क्षण उकल्या हूणियां’ के जिन दोहों की रचना की उन्हें नगाड़ों की थाप पर आज राजस्थान के सुदूर गांवों तक में गाया जाता है। इसी काल के अकेलेपन में उन्हें पौर्वात्य साहित्य, वेदों की कविता और उपनिषदों की जिज्ञासाओं ने भी काफी घेरा। 


लेकिन हरीश जी के पौर्वात्य प्रेम की बातें काफी इधर की है। युवा दिलों के हृदय पर शासन करने वाले और जन-आंदोलनों की अग्रिम पांत में खड़े एक जन कवि के रूप में हरीश जी की मुकम्मल पहचान तीन दशक पहले ही बन चुकी थी। ‘वातायन’ के संपादक हरीश जी की यादें भी ‘60 से लेकर प्राय: ’80 के जमाने की है। ‘अधूरे गीत’(1959), ‘सपन की गली’(1961) के गीत और ‘हंसिनी याद की’(1962) की रूबाइयां, जिनकी जुबान पर तब थे, आज भी हैं और आगे भी सदा उनके फुरसत के क्षणों के खालीपन को अनोखी मानवीय अनुभूतियों से आबाद रखेंगे। हरीश जी को जानना है तो उनके साहित्य शैशव की इन मासूम सी लगने वाली ताजगी से भरी रचनाओं को जानना ही होगा। ये कवि हरीश भादानी के व्यक्ति-सत्व का एक निश्चित परिचय देती हैं। प्रेम की विस्मृतियों और सुधियों के एक विस्तृत फलक में कहीं लोरी सुनाती, तो कहीं उद्बुद्ध करती, और कहीं  कदम-ताल मिलाती अनगिन धुनों के उस रचना संसार को सिर्फ रूमानी बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। एक कठोर सामंती परिवेश में वह किसी मुक्त मन के विद्रोही स्वरों का ऐसा प्रवाह था जिसमें डुबकी लगा कर आज भी बड़ी आसानी से मानवीय और जनतांत्रिक संवेदनाओं के पूण्य को अर्जित किया जा सकता है। जिन्होंने भी हरीश जी के प्रेम और सौंदर्य के ऐसे गीतों के पहले संकलन ‘अधूरे गीत’ के  ‘तेरी मेरी जिन्दगी के गीत एक है’, ‘रही अछूती सभी मटकियां’, ‘सभी सुख दूर से गुजरे’, ‘प्रिये अधूरी बात’ तथा दूसरे संकलन ‘सपन की गली’ के ‘सात सुरों में बोल’, ‘सोजा पीड़ा मेरे गीत की’ की तरह के गीतों को सुना है, उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकते हैं।


युवा दिलों पर राज करने वाला हरीश जी का यह रचना संसार हमारी तो साहित्यिक रुचियों के जन्म काल और युवा वय के नितांत आत्मीय और बेहद आनंददायी क्षणों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है और सही कहूं तो हमारे साहित्य-संस्कार का आधार है। इसीलिये इन रचनाओं के सम्मोहक वृत्तांत में मैं खोना नहीं चाहता। अगर इनकी ओर कदम बढ़ा दिये तो न जाने कहां का कहां चला जाऊं और इस भटकाव के चलते उनके पूरे व्यक्तित्व की जिन दूसरी खास बातों की ओर मैं संकेत करना चाहता हूं, उन्हें ही कहीं भूल न जाऊं!


हरीश जी के जीवन का सीधा संबंध उनकी रचनाओं से रहा है। ‘अधूरे गीत’ और ‘सपन की गली’ के लेखक की रचनाओं का फलक साठ के दशक के लगभग प्रारंभ से ही बुनियादी रूप से बदल चुका था। इसी समय से वे कोलकाता और मुंबई के चक्कर लगाने लगे थे। ‘सुलगते पिंड’(1966) और ‘एक उजली नजर की सूईं’(1966) की कविताओं और गीतों को देखिये, महानगरीय जीवन की त्रासदी, अजनबीपन और मानवीय संवेदनाओं के अनूठे बिंबों से निर्मित यह एक ऐसा रचना-संसार है जो नागर जीवन की बेगानगी को अपनी छैनी के प्रहारों या फिर आत्मीय आलींगनों से दूर करने और जिंदगी की जिल्द के किसी नये सफे को पढ़ने के सपनों से रचा-बुना गया था। यह समय था हरीश जी के मूल विद्रोही तेवर पर कम्युनिस्ट दर्शन के मुलम्मे की चमक का। विद्रोही प्रेमी ड्योढ़ी के रोज ब रोज शहर जाने और कारखाने के सायरन की सीटी से बंधी एक नियत जिंदगी जीने के पीछे के विच्छिन्नताबोध की पीड़ा को महसूस करता है और ‘क्षण-क्षण की छैनी’ से काट कर चीजों को परखने की तरह, कड़े से कड़े प्रश्नों से व्यवस्था को बींधने वाले विद्रोही मजदूर से एकात्म हो जाता है। ‘एक उजली नजर की सुई’ में उनके इस दौर के कई अमर गीत संकलित है, जैसे - ‘मैंने नहीं कल ने बुलाया है’, ‘क्षण-क्षण की छैनी से काटो तो जानूं’, ‘ऐसे तट हैं क्यों इन्कारें’, संकल्पों के नेजों को और तरासो’, ‘थाली भर धूप लिये’ और ‘सड़क बीच चलने वालों से’। कोलकाता और मुंबई में बैठ कर लिखे गये ये गीत सघन और जटिल महानगरीय बोध के साथ नये, बेहतर और मानवीय समाज के निर्माण की बेचैनी के गीत है। इन गीतों में उकेरे गये आधुनिक जटिल भावबोध के बिंब गीत और कविता के बीच श्रेष्ठता की बहस को बेमानी कर देने के लिये काफी है। शायद इन्हें ही सुन कर अज्ञेय जी ने बीकानेर में सुरों में बंधी कविता को सुनने के अपने अभिनव अनुभव का जिक्र किया होगा!  


इसके बाद आता है 74-75 के बाद का हरीश जी के जीवन का सबसे कठिन समय जब वे जयपुर में अकेले डेरा डालने के लिये मजबूर होते हैं। इस काल में उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता, महानगरीय अवबोध और झकझोर देने वाले प्रश्नों को उठाने की बेचैनी कुछ भिन्न दिशा में बढ़ने लगती है। ‘एक उजली नजर की सुई’ का प्रकाशन 1966 में हुआ था। इसके बाद लंबे 13 वर्षों के उपरांत 1979 में उनकी लंबी कविता प्रकाशित हुई ‘नष्टोमोह’। इस कविता को सतही तौर पर देखने से तो लगेगा कि यह भी सत्तर के जमाने के पूरे ‘क्रांतिकारी’ दृष्यपट के साथ आत्मालाप करने वाली उनकी पहले की रचना दृष्टि का ही किंचित विस्तार हैं। लेकिन यदि कोई इसकी सतह की गहराई में जाए तो साठ और सत्तर के पूरे काल के साथ किया गया यह आत्मालाप उनके पूर्व के विप्लवी आवेग की एक और पुनरावृत्ति नहीं, उल्टे उस आवेग को दी गयी एक शानदार श्रद्धांजलि दिखाई देगी। 


लेकिन ‘66 से ‘79 के बीच के 13 वर्षों के इसी दौर में एक कालखंड सन् ‘75 के आंतरिक आपातकाल से जुड़ी परिस्थितियों का आता है। ‘75 का आंतरिक आपातकाल और उसके पहले और बाद की चुनौती भरी उत्तेजक राजनीतिक परिस्थितियों का दौर कुछ अलग ही था। यह एक अलग प्रकार की लड़ाई का दौर था और शायद तब बाकी सब कुछ स्थगित करके सड़कों पर उतर आना ही हरीश जी की तरह के आम जनों के बीच जीने वाले कवि और कविता की मजबूरी थी। उस दौरान बीकानेर की जेल में बंद अपने साथियों के पास रोज हाजिरी भरने और  जेल के अंदर तक जाकर कवि सम्मेलन कर आने वाले हरीश जी की उत्तेजना और तेज को हमने देखा था। इसीने ‘रोटी नाम सत है’ के गीतों के रचयिता, हरीश भादानी के एक नये नुक्कड़कवि के रूप को जन्म दिया। ‘रोटी नाम सत है’ के जुझारू गीतों ने जन कविता के अपने एक अलग ही इतिहास की रचना की। हरीश जी ने अपने साहित्यिक-राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक दौर में ‘भारत की भूखी जनता को अपना लेफ्टिनेंट चाहिए’ की तरह के कई जोशीले जन-गीत और रूबाइयां आदि लिखी थी। ‘रोटी नाम सत है’ के गीतों को उसी हरीश भादानी का कहीं ज्यादा चेतनासंपन्न, कल्पनाप्रवर और परिपक्व पुनर्जन्म कहा जा सकता है। ‘रोटी नाम सत है’, ‘राज बोलता सुराज बोलता’ तथा ‘बोल मजूरे हल्ला बोल’ की तरह के उनके गीतों की पंक्तियां आपातकाल के खिलाफ देश भर के जनवादी आंदोलन के नारे बन चुकी थी। 


आज सोच कर अचरज होता है कि जिस काल में हरीश जी में 60 और 70 के दशक के  तमाम आवेगों के प्रति ‘नष्टोमोह’ की तरह की कविता के बीज पनप चुके थे, उसी काल में आंतरिक आपातकाल की भीषण मार ने उनमें एक नये जनकवि को जन्म दिया। लेकिन हरीश जी 60-70 के दशक की अपनी अनुभूतियों को अलविदा कहने के लिये तैयार हो चुके थे, इसका एक बड़ा प्रमाण ‘वातायन’ पत्रिका का प्रकाशन हमेशा के लिये बंद होजाना भी है। एक रूमानी, स्वप्नदर्शी और प्रतिबद्ध कवि हरीश जी के साहित्यिक क्रिया-कलापों की पहचान ‘वातायन’ पत्रिका, जो उनके संपादन में ‘60 के जमाने से लंबे काल तक नियमित मासिक और फिर कुछ दिनों तक अनियतकालीन रूप में निकली, उसे ‘73 तक आते-आते पूरी तरह बंद कर दिया गया। अन्य जानकार इस पत्रिका के बंद होने के कई सामाजिक-आर्थिक कारणों को गिना सकते हैं, और शायद वो सच भी हो, लेकिन लगभग डेढ़ दशक तक लगातार निकली इस पत्रिका से हरीश जी के इसप्रकार मूंह मोड़ लेने का कितना संबंध उनके ‘नष्टोमोह’ की पृष्ठभूमि से था, यह सचमुच एक गवेषणा का विषय है। 


यहीं आकर मेरा ध्यान उनके प्रारंभिक दो दशकों के रचनाकाल के बाद के अंतिम तीन दशकों के रचनाकाल की ओर चला जाता है। यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं है कि लगभग तीन दशक पहले ही जिस कवि की शख्सियत की एक संपूर्ण प्रतिमा विकसित होकर लोगों के दिलों में रच-बस गयी थी, जिसने समाज को ढेरों अमर रचनाओं की सौगात दी, वह कवि बाद में और तीन दशकों तक अपनी ही उस विशाल प्रतिमा की छाया तले लिखता रहा, लगातार लिखता रहा और गौर करने लायक है कि अपने अतीत से मोहाविष्ट होकर खुद को ही दोहराते हुए नहीं, बल्कि उससे बिल्कुल भिन्न परिदृश्य और संदर्भों के साथ एक नये आवेग और नयी भाषा में, किसी और ही नये सत्य के संधान का संकेत देता हुआ लिखता रहा। 


‘नष्टोमोह’ का विक्षुब्ध और आवेशित कवि, कहता है कि उनके हाथ जगन्नाथ/उनके पांव वामन/उनका रोम-रोम समझदार/वे तीनों गुण/वे ढउंपसजवरूगुण/वेझ पांचों तत्व/वे संदीपन द्रोणाचार्य/चाणक्य बिस्मार्क/वे कलाएं और विज्ञान/जनक जननी भी/रिश्ते-अ-रिश्ते भी वे/औचित्य अनौचित्य भी वे/वे इकाई में दहाइयां/और मैं-/एक मान लिया गया कुछ भी नहीं...एक पैमाना उठाए/समझाने लगते हैं वे मुझे/एक फार्मूला-दहाई का गुणक/गुणनफल ढउंपसजवरूगुणक/गुणनफलझ बटा मियादी हुंडी/या चैक/बराबर जीवित शरीर...अगवानी थाली/निहोरे और बिछौना/गदराया शरीर/आदि अनादि भूखों की /भौतिक अधिभौतिक/सभी संक्रामक व्याधियों की रामबाण दवा/मिलती है उसे/ आता हो जिसे /लीलावती रचित भिन्न/लंगड़ी भिन्न हल कर लेना, उसे खनखना देना। और इनके मोह से मुक्त हो जिसे अपने वास्तविक रूप और कत्‍र्तव्य का बोध हो गया है, वह संशयमुक्त कवि विद्रोह की तमाम परंपराओं का खुद को अंशी मानते हुए भी अंत में कहता हैं कि मुझे ही बनना है/आदमी के लिये/आदमी की सभ्यता, उसकी संस्कृति/और जब करने लगूंगा रचाव/आदमी: आरम्भ/मुझ जैसी दुनियाओं के लिये/हम खयाल अजीज!/तुम्हें ही दूंगा आवाज/संयोग लिये/गर्भा लिये जाने मेरे वर्तमान से /समय नहीं/शरीर नहीं/ रोशनी! शब्द! संबोधन! 


जरूरत इस नयी रोशनी, शब्द और संबोधन के साथ खुद ही आदमी की सभ्यता और संस्कृति बनने का हौसला रखने वाले कवि की लगभग तीन दशकों तक फैली परवर्ती रचनाशीलता को टटोलने की भी है। इसे यदि उनकी पूर्व की रचनाशीलता का विपरीत न भी कहा जाए तो पूर्व से भिन्न तो कहना ही होगा, और इसीलिये यह बेहद गंभीर, जरूरी और जिम्मेदारीपूर्ण जांच की मांग करता है। इसके अभाव में कवि हरीश भादानी के कृतित्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा अव्याख्यायित रह जायेगा और उनके व्यक्तित्व का कभी भी समग्र आकलन नहीं हो पायेगा।


नष्टोमोह के दो वर्ष बाद ही 1981 में हरीश जी के गीतों का एक नया संकलन प्रकाशित होता है, ‘खुले अलाव पकाई घाटी’। तीन भागों में विभाजित इस संकलन के पहले भाग का शीर्षक है - अपना ही आकाश..., लेकिन अपना ही आकाश बुनूं मैं गीत दूसरे भाग में शामिल है। नष्टोमोह में मुझे ही बनना है/आदमी के लिये/आदमी की सभ्यता, उसकी संस्कृति का जो संकल्प जाहिर किया गया है, ‘अपना ही आकाश बुनूं’ उसीका आगे फैलाव है। इस गीत की पंक्तियां हैं सूरज सुर्ख बताने वालो/सूरजमुखी दिखाने वालो/...पोर-पोर/ फटती देखू मैं/केवल इतना सा उजियारा/रहने दो मेरी आंखों में/...तार-तार/ कर सकू मौन को/केवल इतना शोर सुबह का/भरने दो मुझको सांसों में/ स्वर की हदें बांधने वालो/पहरेदार बिठाने वालो/...अपना ही/ आकाश बुनूं मैं/केवल इतनी सी तलाश ही/भरने दो मुझको/ पांखों में/मेरी दिशा बांधने वालो/दूरी मुझे बताने वालो।


सवाल उठता है कि हरीश जी यहां किन बंधनों, वर्जनाओं और निर्देशों से अपनी मुक्ति की मांग कर रहे हैं? यह एक सौ टके का सवाल हो सकता है, जो हरीश जी के परवर्ती सृजन और उनकी रचनाशीलता की ऊर्जा और दिशा को जानने की कुंजी भी बन सकता है। दरअसल यह नकार का नकार था। हरीश जी की सारी ऊर्जस्विता और उनकी रचनाओं के सौन्दर्य का स्रोत किसी भी रूमानी कवि की तरह हमेशा तमाम बाधाओं और बंधनों को नकारने में रहा है, लेकिन उम्र के इस नये मुकाम पर अब पुन: वे किस चीज को नकार कर फिर एक बार अपनी मुक्ति की कामना करते हैं, यह सवाल हरीशजी के पूरे व्यक्तित्व और उनकी कविताओं के किसी भी अध्येता के लिये  काफी तात्पर्यपूर्ण है।


इस सवाल के साथ जब हम हरीश जी के परवर्ती रचनाकर्म की ओर नजर डालते हैं तो उसमें साफ तौर पर जो तीन चीजें दिखाई देती हैं, उनमें पहली है- गहरा विषाद। ‘अपना ही’ आकाश बुनने की जिद में खुद पर लाद लिये गये अकेलेपन और सन्नाटे का ऐसा घटाटोप जिसमें सदा उत्साहित रहने वाले, समाज को बदलने का आह्वान करने वाले रचनाकार की सांसे घुट रही है, लेकिन वह उससे मुक्त होने के लिये तैयार नहीं है। यही समय उनके बार-बार जयपुर जाने और दाना-पानी का जुगत बैठाने की जद्दोजहद का समय था। इस अकेलेपन और सन्नाटे की अनुभूति उनमें व्यर्थताबोध के एक प्रकार के अद्भुत, सम्मोहक सृजन का हेतु बनती है। ‘खुले अलाव पकाई घाटी’ के गीतों को देखिये। ‘याद नहीं है’ गीत में कवि कहता है- चले कहां से /गए कहां तक/याद नहीं है/...रिस-रिस झर-झर ठर-ठर गुमसुम/ झील होगया है घाटी में/हलचलती बस्ती में केवल/एक अकेलापन पांती में/ दिया गया या/ लिया शोर से / याद नहीं है/। इसी संकलन में विषाद के चरम क्षणों का एक गीत है : टूटी गजल न गा पाएंगे। सांसों का/ इतना सा माने/स्वरों-स्वरों/ मौसम दर मौसम/हरफ-हरफ/ गुंजन दर गुंजन/ हवा हदें ही बांध गई है/ सन्नाटा न स्वरा पाएंगे/ यह ठहराव न जी पाएंगे/...आसमान उलटा उतरा है/ अंधियारा न आंज पाएंगे/...काट गए काफिले रास्ता/ यह ठहराव न जी पाएंगे।


गौर करने लायक दूसरी बात यह है कि इस दमघोंटू ठहराव की तीव्र अनुभूतियों के बीच से ही हरीश जी अपने नये संबंधों के विकास और सोच की नयी दिशाओं के निर्माण की ओर प्रवृत्त होते हैं। ये नये संबंध है मरुभूमि और उसके खास परिवेश के साथ नये संपर्कों के संबंध। मौसम ने रचते रहने की /ऐसी हमें पढ़ाई पाटी/...मोड़ ढलानों चौके जाए/आखर मन का चलवा/अपने हाथों से थकने की/कभी न मांडे पड़वा/कोलाहल में इकतारे पर/एक धुन गुंजवाई घाटी या सुपरणे उड़ना मन मत हार की तरह के भावबोध के साथ सन्नाटे में भी निरंतर रचनाशील बने रहने की अपनी नैसर्गिकता को कायम रखने के संघर्ष में ही उनके इन नये संबंधों और विचार के नये क्षेत्रों का उन्मेष होता है। और, देखते ही देखते, सन्नाटे और अकेलेपन के उपरोक्त अनोखे, मन को गहराई तक छू देने वाले गीतों के साथ ही सामने आता है हरीश जी की रचना शक्ति का एक और उत्कृष्ट नमूना - रेत में नहाया है मन। इन तटों पर कभी/धार के बीच में/डूब-डूब तिर आया है मन/...गूंगी घाटी में/ सूने धोरों पर‘ एक आसन बिछाया है मन/...ओठ आखर रचे/ शोर जैसे मचे/ देख हिरणी लजी/ साथ चलने सजी/ इस दूर तक निभाया है मन। /। धोरों की धरती के सौन्दर्य पर इससे खूबसूरत आधुनिक गीत क्या होगा! इसी दौर में हरीश जी ने रेत को केंद्र में रख कर कई रचनाएं लिखी, जिनमें ‘कलम’ पत्रिका में प्रकाशित हुई, इसे मत छेड़ पसर जायेगी/रेत है रेत बिफर जायेगी की भी अलग से चर्चा की जा सकती हैं।  


अब तक ‘शहरीले जंगल’ में खोयेे मन के इस प्रकार अपनी धरती के रेत के समंदर में डूबने-तिरने, उस पर आसन बिछा कर खोजाने का यह सारा उपक्रम, हरीश जी के जीवन और रचनाओं में घर कर बैठे सन्नाटे को एक नयी सृजनात्मक दिशा में मोड़ता है और हम पाते हैं सन्नाटे के शिलाखंड पर(1982), एक अकेला सूरज खेले, आज की आंख का सिलसिला(1985), विस्मय के अंशी हैं (1988) कविता संकलन और पितृकल्प(1991) तथा मैं-मेरा अष्टावक्र(1999) की तरह की लंबी कविताओं का एक विशाल रचना भंडार। 


कहना न होगा कि लगभग अढ़ाई दशकों तक फैली हरीश जी की रचनाशीलता का यह तीसरा दौर अपनी जड़ों की तलाश की उनकी लंबी यात्रा का दौर है। उनके सरोकार बदलते है और साथ में रचना का शिल्प और भाषा भी। ‘बांथा में भूगोल’ (1984), खण-खण उकल्या हूणियां तथा जिण हाथां आ रेत रचीजै की तरह के राजस्थानी भाषा की कविताओं के संकलन सामने आते हैं और हिंदी की कविता भी स्थानीय भाषा और संदर्भों तथा निहायत निजी प्रसंगों से लबरेज होकर अपना एक अलग संसार गढ़ लेती है, जिसे मैंने इस लेख के शुरू में गालिब की अरबी-फारसी शायरी वाला हिस्सा कहा है। इस काल के हरीश भादानी की रचनाएं हिंदी के साधारण पाठक के लिये बहुत कुछ अपनी भाषाई संरचना की वजह से ही जैसे एक अबूझ पहेली बन कर रह गयी हैं। 


अपना आकाश से शुरू होकर अपनी भाषा, अपनी धरती और अपना परिवेश का यह तीव्र आग्रह उन्हें किंचित अपनी ‘सांस्कृतिक जड़ों’ की ओर भी खींचता है जिसे इस नये दौर का तीसरा उल्लेखनीय पहलू कहा जा सकता है। एक अच्छे-खासे समय तक वे प्राचीन पौर्वात्य साहित्य, वेदों, उपनिषदों और मिथकीय आख्यानों में डूबते-उतरते रहे और  शायद उनके रहस्यों में कुछ खो भी गये थे। मिथकों से हरीश जी पहले भी कभी पूरी तरह मुक्त नहीं रहे। बिल्कुल प्रारंभिक ‘सपन की गली’ में रूमानी कविताओं के साथ ही ‘हे शिव प्रथम मनीषी’ की तरह की रचना भी संकलित है। बाद के दिनों में ‘सड़कवासी राम’ और ‘गोरधन’ की तरह के उनके अमर गीत मिथकों के सृजनात्मक नवीनीकरण के महत्वपूर्ण उदाहरण है। लेकिन विस्मय के अंशी हैं के एक अध्याय में जिस प्रकार वेदों की कविताओं का उल्था किया गया है और कुछ अर्सा पहले ही प्रकाशित अखिर जिज्ञासा में उपनिषदों और धर्म-ग्रंथों की प्राचीन कथाओं पर जिसप्रकार की ‘जिज्ञासाएं’ व्यक्त की गयी है, वह उनके व्यक्तित्व में एक सर्वथा नया संयोजन कहलायेगा। हरीश जी के इस नये दौर के गीत, जो पहले अपना घर फूंके का वह हिस्सा जिसमें राम, कृष्ण, बुद्ध, कबीर और रवीन्द्रनाथ के रास्ते पर चलने का आह्वान है, सांस्कृतिक जड़ों की खोज में लगी खास(टिपिकल) रचनाशीलता की ही उपज है। लेकिन हरीशजी अपनी मूलभूत जनोन्मुख प्रकृति के चलते ही इस दिशा में बहुत दूर नहीं जासकते थे। प्राग-ऐतिहासिक मनुष्य की जिज्ञासाओं के रहस्य के बजाय वास्तव में वे रेत के समुद्र में ही गोते लगाते रहे। मुक्ति की किसी और आत्मिक दिशा की ओर, जिसे उनके पिता और दादा की आघ्यात्मिक दिशाओं से भी जोड़ा जा सकता था, कभी प्रवृत्त नहीं हुए। यही वजह है कि गुरुता के बोध से कभी का मुक्त हो चुके हरीश जी हिंदी के एक सच्चे जनकवि के रूप में ही हमसे विदा हुए। लोगों को उनके संत होने का भान जरूर हुआ, लेकिन सचाई सिर्फ यही है कि वे एक आपाद मस्तक सच्चे और ईमानदार मनुष्य और कवि थे। वे कभी किसी से अलग से अपनी सिफारिश क्या करते, क्योंकि पृष्ठ-दर-पृष्ठ वे खुद को ही तो लिखते रहे थे। उनके गीत और कविताएं ही उनका जीवन है। इस जीवन को उन्होंने अपनी ढेरों रचनाओं के जरिये इतना अधिक खोल दिया है कि उसे अब और ज्यादा कैसे खोला जाए! 


बुधवार, 15 सितंबर 2021

हिंदी के बेडौल अपराध साहित्य की एक नजीर -- 'पिशाच'

 —अरुण माहेश्वरी 



पिछली 29 अगस्त को वीडियो पत्रकार अजित अंजुम ने अपने यूपी चुनाव और किसान आंदोलन संबंधी कवरेज के बीच अचानक ही हिंदी के हाल में प्रकाशित एक ‘क्राइम थ्रिलर’ ‘पिशाच’ पर चर्चा की । इसके लेखक संदीप पालीवाल के साथ ही उनके एक मित्र विनोद कापड़ी भी चर्चा में शामिल थे । ये तीनों टेलिविजन के न्यूज रूम के मित्र हैं और नॉवेल भी टेलिविजन के न्यूज रूम में पसरे हुए हाई सोसाइटी के लोगों के उच्च स्तरीय अपराधी कृत्यों (सोच) की ही एक कहानी कहता है । विनोद कापड़ी ने उपन्यास पढ़ा था और उनका कहना था कि इसका गठन कुछ ऐसा है कि कोई भी इसे एक सांस में पढ़ जायेगा । मतलब कथा की रोचकता वाला पहलू इसमें भरपूर है । 

बहरहाल, उनकी चर्चा सुन कर ही मन में पहली बार हिंदी के किसी क्राइम थ्रिलर को पढ़ने की इच्छा जगी । हिंदी में आम भाषा में इन्हें जासूसी उपन्यास कहते हैं और हमारा दुर्भाग्य-सौभाग्य कुछ भी कहे, हममें इनको पढ़ने की कभी कोई रुचि नहीं जगी थी। यहां तक कि इस क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय कहे जाने वाले लेखक सुरेन्द्रमोहन पाठक के भी किसी उपन्यास को हमने उलट-पुलट कर तक नहीं देखा है । बांग्ला में सत्यजीत राय ने इस क्षेत्र में कुछ अपने प्रकार का काम किया था । उनका फेलुदा बांग्ला साहित्य का भी एक लोकप्रिय चरित्र है । वहां ऐसा ही दूसरा चरित्र है व्योमकेश बक्शी । पर हिंदी में ऐसे किसी जासूसी चरित्र की चर्चा नहीं सुनी । अंग्रेजी में आर्थर कोनन डोयल के शार्लोक होम्स को सारी दुनिया जानती है । उतनी ही लोकप्रिय है अगाथा क्रिस्टी की हत्या-रहस्य की कथाएँ । 

बहरहाल, हिंदी के साहित्य के पाठक की जासूसी उपन्यासों में कोई रुचि पैदा न होना अपने आप में एक गहरी खोज का विषय हो सकता है । प्रेमचंद के पहले की अय्यारी और तिलिस्म की रोमांचक कथाओं का जिक्र इसीलिये आता है कि उसने हिंदी-उर्दू का जो एक पाठक वर्ग तैयार किया था, उसे प्रेमचंद ने अपने सामाजिक, यथार्थवादी आदर्श के उपन्यासों से विस्थापित करके साहित्य के पाठक में तब्दील कर दिया । और कहना न होगा, इसके साथ ही समाज से अपराध और दंड निकल नहीं गए, पर अय्यारी का कथित लेखन साहित्य चर्चा से बाहर हो गया । मानो यथार्थवादी साहित्य ने उसके पाठकों को खींच कर उस लेखन के प्राणों को ही सोख लिया । साहित्य के पाठक के लिए तो उसका अस्तित्व ही खत्म हो गया । प्रेमचंद के साथ ही हिंदी में जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय आदि आदि बड़े-बड़े उपन्यासकारों की एक बाढ़ आई और हिंदी समाज उनके मोटे-मोटे उपन्यासों में उसी प्रकार डूब गया जैसा कि आज भी जासूसी उपन्यासों के पाठक उनमें डूबे हुए पाए जाते हैं । उस काल में साहित्य की दुनिया में सेक्स और सुरसुराहट पैदा करने वाले प्रेमप्रसंगों को लेकर जो प्रयोग किए गए उन्हें साहित्यालोचना में चाकलेटी साहित्य से लेकर साड़ी-जम्परवादी साहित्य आदि कई नामों से साहित्य के अपेक्षाकृत तिरस्कृत कोने में धकेल कर उन प्रवृत्तियों के गंभीर आकलन की जरूरत को ही जैसे रोक दिया गया । इसीलिए एक ऐसे साहित्यिक परिवेश से संस्कारित हम जैसे हिंदी के पाठक-लेखक के लिए जासूसी उपन्यास का जगत पूरी तरह से अनजान रहा । हमें लगता है कि आज तक भी हिंदी साहित्य जगत की इस स्थिति में कोई फर्क नहीं आया है । इसीलिए जासूसी कहे जाने वाले उपन्यासों के रहस्य-रोमांच के संधान का, उनकी समीक्षा का कोई सठीक ढांचा भी विकसित नहीं हुआ है । इनके रहस्य-रोमांच को सायास और यांत्रिक रूप में गढ़ी हुई ऐसी किस्सागोई के खाते में खतिया दिया जाता है जिनका उद्देश्य पाठक को नितांत सामयिक उत्तेजना देने के अलावा कुछ नहीं होता है । साहित्य में रहस्य-रोमांच के जिस बिंदु से आम तौर पर समय की करवट के सूक्ष्म संकेत मिला करते हैं, व्यक्ति के आत्मिक जगत में उसके आलोड़न की ध्वनि पैदा होती है, रोमांच का ऐसा अर्थपूर्ण, संक्रमण के संकेतों से भरा बिंदु कथित जासूसी उपन्यासों से गायब होता है । कुल मिला कर हिंदी के जासूसी उपन्यासों का एक प्रकार का उथलापन और कृत्रिमता ही शायद इसे गंभीर साहित्यिक अन्वीक्षा की नजर से बाहर की चीज बना देता है । 

बहरहाल, मनुष्य की किसी भी क्रिया को लेकर यदि हमें कोई खास सैद्धांतिक कसौटी तैयार करनी हो, वह भले जासूसी उपन्यास के रूप में हो क्यों न दिखाई दे, यह जरूरी होता है कि उस कसौटी की भी अपनी एक आंतरिक संहति हो । महज अपने उद्देश्यों की घोषणा करके कोई भी मानव विज्ञान मनुष्य के व्यवहार के अर्थ से जुड़े सवालों से बच नहीं सकता है । अन्यथा उसे उसके अस्तित्व मात्र से ही इंकार करना होगा, अर्थात् कहना होगा कि हिंदी में जासूसी उपन्यास जैसी कोई चीज ही नहीं है । 

जीवन के सत्य के उद्घाटन की तरह ही लेखन के सत्य का उद्घाटन एक सतत प्रक्रिया है । इसी के चलते अक्सर हमें लगने लगता है कि जैसे पदार्थ का सत्य उसमें ही द्वंद्वात्मक रूप में कैद रहता है । किसी भी लेखन का जो उद्देश्य होता है, उसकी प्राप्ति के लिए वह कभी भी अपने उद्देश्य की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता है । और यही वह बिंदु होता है जहां साहित्य के आलोचक की भूमिका का सवाल पैदा होता है । यह उसका दायित्व होता है कि वह जो लिखा जा रहा है, उसके घोषित उद्देश्यों से परे जाकर उसमें सत्य की खोज करे । उसके पेशे की जरूरत के नाते ही उसके पास चीजों को परखने वे औजार होते हैं जिनसे वह लेखन के प्रकट रूप से यह तय कर पाता है कि जीवन के रहस्य का उद्घाटन उसे कहां और कितना प्रभावित कर रहा है । अपराधशास्त्र का उद्देश्य भी सत्य की तलाश होता है । अपराध के सत्य को स्थापित करना अगर न्याय तंत्र की जरूरत है, तो अपराधी के सत्य को पाना साहित्य और मानवशास्त्र का विषय है और इस आधार पर भी जासूसी उपन्यास और साहित्य लेखन के बीच एक अभिन्न संबंध बन जाता है । जीवन के महाकाव्य के रूप में उपन्यास की संरचना की मांग है कि वह अपराध और अपराधी के सत्य की एक समग्र, संशलिष्ट तस्वीर पेश करे । जासूसी उपन्यास जब महज किसी पुलिस इंस्पेक्टर की तरह अपराध के सत्य पर ही सिर गड़ाये रहता है, अपराधी का सत्य उसके दायरे से एक सिरे से गायब हो जाता है, तब उस लेखन की अहमियत पुलिस की जांच रिपोर्ट से अधिक नहीं रहती है । 

जीवन तमाम विस्मयों से भरपूर होता है । लेखक अपने चरित्र पर उन विस्मयों के प्रभाव को देखता है । पर लेखन में जो आता है, वह हमेशा चरित्रों पर निर्भर नहीं करता । कोई भी चरित्र अपनी मर्जी से जीवन के सामान्य ढांचे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता, लेखक ही उसे किसी खास रंग में रंग कर उससे सीमाओं का उल्लंघन करवाता है । यही बात साहित्य और आलोचक के संबंध पर भी लागू होती है । आलोचक को साहित्य के सत्य की तलाश में लेखक से अपने स्तर पर एक संवाद करना होता है । जब हम देखते हैं कि जासूसी उपन्यासों पर विचार का कोई स्वयं में विकसित ढांचा उपलब्ध नहीं है तो यह जरूरी है कि हम उपन्यास साहित्य में उसके स्थान और योगदान के साथ ही अपनी कसौटियों की सीमाओं की भी चर्चा करे । साहित्य आलोचना का काम किन्हीं स्थापित मानदंडों का प्रचार करना नहीं है, बल्कि हमेशा उनके पुनर्विचार की दिशा में बढ़ना है । किसी भी नए विषय को छूने का तात्पर्य भी यही है, अपने पूर्व के मानदंडों पर पुनर्विचार । बिना उसके उपेक्षित-तिरस्कृत क्षेत्रों को अपने विचार के दायरे में लाना मुश्किल है । 

अपराध हो या अपराधी, उनकों अपने सामाजिक संदर्भों से काट कर विचार संभव नहीं है । दुनिया में ऐसे समाज की कल्पना संभव नहीं है जिसके अपने लिखित अथवा अलिखित विधायी कानून नहीं होते हैं । और कोई भी समाज ऐसा नहीं होता जिसमें किसी न किसी रूप में इन कानूनों का अतिक्रमण न होता हो । इन अतिक्रमणों से ही अपराध परिभाषित होते हैं । शत-प्रतिशत आज्ञाकारी, समूह के नियमों का पूरी तरह से पालन करने वाला मनुष्य एक शुद्ध मानवशास्त्रीय, ‘वैदिक’, कल्पनाप्रसूत, मूलतः मिथकीय अवधारणा है, जिसके दबाव में बाकी सारी सामाजिक अवधारणाएं तैयार हुआ करती है, पर वह स्वयं में कोई इंगित वहन नहीं करता है । मनुष्य के यथार्थ और प्रतीकात्मक जगत को जानना है तो उसकी सामाजिकता को जानना होता है और समाज स्वयं में अपराध और दंड के बीच के संबंधों के अलावा क्या है ? दंड विधान ही अपराध और अपराधी को सामाजिक विषय बनाता है ।

अपराध-कथा समाज के सच की कथा ही होती है और दुनिया का कोई भी यथार्थवादी साहित्य अपराध और दंड के विषय के बिना तैयार ही नहीं हो सकता है । इसीलिये अपराध कथा हमेशा गंभीर लेखकीय विश्लेषण का विषय भी होती है । इसके अलावा, कोई भी लेखक अपने सीमित अनुभव से यह दावा नहीं कर सकता है कि उसने चरित्र को उसकी सामाजिक समग्रता में व्यक्त कर दिया है, अर्थात् समाज में सक्रिय तमाम ताकतों, प्रवृत्तियों के समुच्चयों को उसने जान लिया है । लेखक चरित्र के संबंधों के तनावों को भांप कर उनका सभ्यता के स्तर पर एक सामान्यीकरण करता है जिसमें चरित्र की नैसर्गिकता और उसके प्रतीकात्मक जगत का मिलन बिंदु साफ नजर आने लगता है । यही साहित्य का साध्य है । इसी अर्थ में विश्लेषणमूलक लेखन मानवशास्त्र का ही एक रूप है जिसकी कथा में उन द्वंद्वों के संकेत मिलते हैं जो किसी भी समाज के सामने बड़े सवाल पेश किया करते हैं । 

अपराध और साहित्य, अपराध साहित्य और हिंदी आलोचना, अपराध और अपराधी, अपराधी और दंड, दंड और समाज के इस पूरे संदर्भ में जब हम संजीव पालीवाल के उपन्यास ‘पिशाच’ को देखते हैं तो सबसे पहली बात जो जेहन में आती है, वह यह कि किसी भी अपराध की जांच का और उसके लेखन का भी लक्ष्य होता है — अपराधी की आत्म-स्वीकृति । इसे अपराध शास्त्र की वह प्रमुख कुंजी माना जाता है जिससे अपराधी दंड का भागीदार बन कर समाज में लौटता है । लेकिन ‘पिशाच’ का पूरा ढांचा ही इसके अपराधी रैना दुबे उर्फ काली के ऐलानिया कबूलनामे पर टिका हुआ है । अपराध-स्वीकृति इसमें जांच या लेखन का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक प्रस्थान बिंदु है । लक्ष्य है समाज के एक हिस्से के सच को उजागर करना । 

सरे आम, टेलिविजन चैनल पर हत्यारा खुद ही अपने सारे अपराधों की कहानी पेश करता है । अपराधों की जांच के लिए जिम्मेदार सरकारी जांच ऐजेंसी (इंस्पेक्टर समर) तो उस चैनल के पीछे-पीछे सिर्फ घिसटती हुई दिखाई देती है । अर्थात् सत्य के उद्घाटनकर्ता की भूमिका को लगभग शुरू में ही खत्म करके जासूसी उपन्यासों के रोमांचकारी रहस्योद्घाटन के प्रमुख स्रोत को बंद कर दिया जाता है । उपन्यास के अंत में एक पंक्ति में अनायास ही रैना दुबे के पिता रवि दुबे यह कहते हैं कि ये सारे खून उसने किये हैं । उनका यह कथन एक अवांतर क्षेपक और जैसे दौड़ते हुए अपराध-कथा में रहस्योद्घाटन के विस्मय का लाभ पा लेने की हास्यास्पद कोशिश सा लगता है ।  अपराध की जांच-रिपोर्ट और उपन्यास की कथा, दोनों लिए ही कोई ऐसी स्वीकारोक्ति का कोई महत्व नहीं है । 

कहना न होगा, ‘पिशाच’ का यह आत्म-स्वीकृतिमूलक ढांचा ही इसे रहस्य-रोमांच पर टिके अपराध साहित्य के दायरे से बाहर कर देता है । अब इस पर यदि विचार हो सकता है तो सिर्फ एक ऐसे चरित्र की कहानी मान कर विचार किया जा सकता है जो 28 साल पहले, बचपन में एक कवि के द्वारा बलात्कृत होने के भाव को अपने अंदर पाले हुए थी और आश्चर्यजनक रूप में इतने सालों की लंबी तैयारी करके वह न सिर्फ उस कवि की बल्कि और भी कई बलात्कारियों की सुनियोजित नृशंस हत्या का तांडव करती है ।

फ्रायडियन नजरिये से विचार करे तो पहली नजर में ही कोई भी इसे एक हिस्टेरिक चरित्र की कहानी कह देगा । उस पर बलात्कार हुआ या नहीं या उसने किसी की हत्या भी की या नहीं, पर वह अपनी कल्पना में एक ऐसी पूरी कहानी गढ़ लेता है जिसमें उसका परिवेश, उसके संबंध में आने वाले व्यक्ति अजीब प्रकार से उसे बिल्कुल नंगे दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें देख कर वह बौरा जाती है । मनोविश्लेषण में यह माना जाता है कि सामाजिक यथार्थ का सबसे नग्न रूप किसी पागल के व्यवहार में ही प्रकट होता है जो सत्य और अनुभूति की मध्यस्थता करने वाले प्रतीकात्मक संजाल को तोड़ कर अलग हो चुका होता है । हिस्टेरिक दौरों में वह उन तमाम चीजों को बिल्कुल साक्षात देखने लगता है जो कभी घटित ही नहीं हुआ, फिर भी घटित होने की संभावनाओं से भरा हुआ सत्य होता है और उसके बल पर ही चरित्र अपनी एक पूरी कहानी बुन लेता है । फ्रायड की यह मान्यता थी कि किसी भी मनोविश्लेषक के लिए विश्लेषण की सही दिशा पकड़ने के लिए सबसे पहली शर्त होती है कि वह मनोरोगी की अपने अहम् से निकली हुई, अर्थात् अपने पक्ष में कही गई बातों को एक सिरे से खारिज करता हुआ आगे बढ़े । उसे जरा भी मूल्य देने का अर्थ होता है शुरू में ही विश्लेषण को गलत दिशा में मोड़ देना । 

‘पिशाच’ में यथार्थ के जिस विश्लेषण को कथा का विषय बनाया गया है वह विश्लेषण ऐसे ही मूलभूत दोष से दूषित है । इसीलिये इसमें शुरू से ही किसी नए अवबोध के रोमांच की कोई संभावना नहीं रहती है । लेखन का उद्देश्य महज तात्कालिक उत्तेजना देने की किस्सागोई तक सीमित रह जाता है । शर्लोक होम्स की तरह छोटी-छोटी चीजों से विषय के रहस्य के अनपेक्षित पक्षों को उजागर करने की प्रखर अन्तर्दृष्टि का परिचय पाने की भी कोई संभावना नहीं बचती, क्योंकि लेखक तो अपराधी के आत्म-कथन को ही ध्रुव सत्य मान कर दोहरा भर रहा होता है । 

काली अचानक 28 साल बाद ही क्यों बलात्कारियों के प्रति नफरत से भर कर इतनी संवेदनशील हो जाती है कि अपनी पहचान के सभी बलात्कारियों का सिर कलम कर देने के अभियान में उतर पड़ती है, ऐसी अवास्तविक कहानी की सच्चाई को काली में नहीं उसके बाहर से देखने की जरूरत थी । तब जाहिर होता कि कैसे जीवन की घटनाएँ और परिवेश में होने वाली उथल-पुथल से आदमी इस कदर पागल हो जाता है कि वह अपने वर्तमान जीवन की सारी बलाओं के लिए पंडित नेहरू को जिम्मेदार मानने लगता है ! ‘पिशाच’ की कहानी ऐसे भक्तों की कहानी से जरा भी भिन्न नहीं है । पर लेखक उसे सच मान कर पेश करता है और इसके चलते इस कथा में आने वाले तमाम जाने-पहचाने चरित्र भी कहानी के ताने-बाने से खुल कर सामने आने के बजाय और ज्यादा रहस्यमय हो कर रह जाते हैं । पूरा उपक्रम रहस्योद्घाटन का नहीं, रहस्योत्पादन का उपक्रम बन जाता है । टेलिविजन के न्यूजरूम के ब्यौरे भी इसमें कथा के बेडौलपन के चलते अर्थहीन से हो जाते हैं ।           

शायद हिंदी के जासूसी और सस्ते पाकेटबुक्स उपन्यासों का ऐसा ही सत्यकथाओं वाला उथलापन उन्हें किसी भी गंभीर साहित्यिक समीक्षा का विषय बनने से रोकता है । 


रविवार, 12 सितंबर 2021

एक विमर्श से खुलती गाँठों की कहानी

अरुण माहेश्वरी


 

‘सत्य हिंद’ वेब पोर्टल पर ‘आशुतोष की बात’ कार्यक्रम में दो दिन पहले की एक लगभग डेढ़ घंटा की चर्चा को सुना जिसका शीर्षक था — ‘हिंदुत्व पर बहस से डरना क्यों’ । संदर्भ था ‘विश्व हिंदुत्व को ध्वस्त करने’ के विषय में दुनिया के कई विश्वविद्यालयों का एक घोषित अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार । 


इस चर्चा में आशुतोष के अलावा जिन चार लोगों ने हिस्सा लिया उनमें दो, नरेन्द्र तनेजा और राहुल देव के भाजपा के पक्ष के रुझान को हर कोई जानता है । नरेन्द्र तनेजा ने तो खुद स्वीकारा कि वे भाजपा के अंदर के व्यक्ति है और पूरी बहस में अपनी दलीलों की प्रामाणिकता के तौर पर तर्क के बजाय अपनी इस स्थिति के प्रयोग से कोई परहेज भी नहीं कर रहे थे । राहुल देव की पहचान हमेशा से सत्ता के गलियारों में घूमने वाले पत्रकार की रही है । आज जब लंबे सात साल से केंद्र में भाजपा की सरकार है तब उनमें भाजपा में सारे गुण खोज लेने की प्रवृत्ति की प्रबलता के लक्षण न दिखने का कोई कारण नहीं है । 


बाकी दो थे —  अभय दुबे और विनोद अग्निहोत्री । दोनों ही जाने-माने पत्रकार और साफ तौर पर सांप्रदायिकता विरोधी सेकुलर विचारों के ऐसे व्यक्ति हैं जो अक्सर यथार्थ-परकता के दबाव में अपने विचारधारात्मक तात्त्विक औजारों को एक बार के लिए परे रखते हैं, पर किसी भी मौके पर भाजपा-आरएसएसस के छल-छद्म और उनकी विभाजनकारी राजनीति के मिथ्याचारों पर से पर्दा उठाने से नहीं चूकते । 


जहां तक आशुतोष का सवाल है, उनकी हमेशा की एक वैचारिक पहचान होने पर भी जब वे ऐंकर की कुर्सी पर होते हैं, अपनी बातों को कुछ इस प्रकार के गदलेपन के साथ रखते हैं कि उसके धुंधलके में अन्य प्रतिभागियों की बातों पर ऐसी तिरछी रोशनी गिरती है, जो उनकी बातों के प्रकट रूप के लिए एक वेधक का काम करती है । आशुतोष के प्रस्तुतीकरण  की तरलता से ही प्रतिभागी अपने को कहीं ज्यादा खोलने के लिए उत्साहित होते हैं, और पूरी चर्चा के अंत में या तो बदले हुए या फिर हाथ मलते हुए दिखाई देने लगते हैं ।


ऐंकरिंग की यह एक कला है जो हिप्नोटाइज करने वाले खुली बहस के आमंत्रण से रोगी को अनायास ही उसके लक्षणों के मूल स्रोत के सामने खड़ा कर देता है । प्रतिभागी उससे कितना ग्रहण करते हैं कोई नहीं जानता, पर दर्शक-श्रोता के लिए प्रतिभागियों का सच मंच के प्रहसन में साफ दिखाई देने लगता है ।


बहरहाल, इस चर्चा का मूल विषय बन गया था — हिंदुत्व । हिंदुत्व की सावरकर की अवधारणा और हिंदुत्व के नाम पर आईटीसेल और आरएसएस के अनुषंगी संगठनों की वैचारिक-व्यवहारिक गतिविधियां । इस चर्चा में हमें प्रतिभागियों के बीच तीन बिंदुओं पर एक आम सहमति दिखाई दी । 


पहला, हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक चीज नहीं है । सावरकर ने हिंदुत्व की अवधारणा पेश की थी । आरएसएस की सावरकर से कितनी भी सहमति-असहमति क्यों न रही हो, पर उनकी यह हिंदुत्व की राजनीतिक धारणा आरएसएस के लिए एक बीज विचार के तौर पर हमेशा से रही है । उनके शासन का वर्तमान काल इसी बीज विचार की सीमाओँ और संभावनाओं की तस्वीर पेश कर रहा है । 


दूसरा, आरएसएस अपने जन्म के वक्त जो था, वह आज नहीं है । उसमें कैसा और कितना बदलाव आया है, इस पर सबकी अपनी-अपनी राय थी । लेकिन जहां तक उसके मूल स्वरूप में बदलाव का पहलू है, इसे सब आरएसएस की जमीनी गतिविधियों के बजाय उसके नेताओं की समय-समय पर अलग-अलग बातों के हवाले से बता रहे थे । हेडगेवार-गोलवलकर जिस भाषा में बात करते थे, हूबहू उसी भाषा में देवरस और भागवत नहीं बोलते हैं । पर साथ ही बहस में संघ के अंदर से पैदा होने वाली उग्रपंथी चुनौतियों के संदर्भ में प्रच्छन्न रूप से यह भी माना जा रहा था कि आरएसएस सावरकर के विचार और हेडगेवार-गोलवलकर की कार्यपद्धति से उत्पन्न अन्तरबाधाओं से अभिन्न रूप में ग्रसित है । 


तीसरा, प्रतिभागियों का मानना था कि भाजपा-आरएसएस के आकलन में पुरानी तात्त्विक बातें काम की नहीं बची है । वे जितनी पुरानी है आज का संघ उतना पुराना नहीं है ! वे आज देश की सत्ता पर है !


चर्चा में आम सहमति की इन तीन बातों के अलावा हिंदू धर्म आदि पर जो दिखावे की बातें हुई, उनका संघ के हिंदुत्व से कोई संबंध नहीं है, इसे तो शुरू में ही मान लिया गया था । ऐसे में उनके हवाले से  हिंदुत्व-विरोधी अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजकों को जान से मार देने तक की धमकियों और अपशब्दों पर पर्दादारी की कोशिश एक प्रकार का मिथ्याचार ही था । यह जो हो रहा है उससे इंकार तो प्रत्यक्ष से इंकार की तरह है । आज आरएसएस-भाजपा की कार्यपद्धति का यह एक सर्वज्ञात-सर्वमान्य रूप है । इसी संदर्भ में हमने देवदत्त पटनायक के एक साक्षात्कार को फेसबुक पर साझा किया है जिसमें उन्होंने अपने मिथकीय तत्त्वों के आधार पर जीवन में श्रीवृद्धि से जोड़ कर सनातन धर्म के सम्यक रूप को रखा है ।


हमारी नजर में ‘सत्य हिंदी’ की इस लंबी चर्चा में विषय को परखने का जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू एक सिरे से छूट गया, वह यह था कि एक जनतांत्रिक समाज में राजनीतिक दल, वह भले आरएसएस की तरह संस्कृति के नकाब में ही क्यों न काम करें, का मायने क्या है ? वे हमेशा खास वैचारिक-सामाजिक समूहों के समुच्चय होते हैं । पूरा राजनीतिक यथार्थ इनके एक समग्र समुच्चय से बनता है । इन सबके अपने कुछ आंतरिक अन्तर्विरोध होते हैं, तो अन्य समुच्चयों के साथ भी इनके संपर्क और अन्तर्विरोध होते हैं । इनके आधार पर ही वह समीकरण तैयार होता है जिससे पूरे समाज की द्वंद्वात्मक गति का रूप तैयार होता है । सवाल है कि इस द्वंद्व में आरएसएस-भाजपा का समुच्चय किसका प्रतिनिधित्व करता है ? क्या वे समन्वयवादी धर्म-निरपेक्षता के खिलाफ विभाजनकारी सांप्रदायिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करते ? क्या इनके इस सत्य को इनके चंद नेताओं के कुछ भाषणों से खारिज किया जा सकता है ? कोई भी राजनीतिक विश्लेषक अगर देख सकता है तो वह इन बातों से सिर्फ आरएसएस-भाजपा की मृत्यु के संकेतों को देख सकता है । इसके अलावा इन बातों का कोई दूसरा मायने नहीं हो सकता है । 

 

जो भी हो, ‘सत्य हिंदी’ की इस बहस के अंत में हमें राहुल देव जहां यह कहते हुए दिखाई दिये कि यह सब चुनाव का खेल है जिसके लिए सब प्रकार के विभाजनकारी हथकंडे अपनाए जाते हैं, तो नरेन्द्र तनेजा भाजपा के अंदर अपनी उपस्थिति का हवाला देते हुए यह विश्वास दिला रहे थे कि यकीन मानिये, भाजपा इस देश को तोड़ना नहीं, एक महाशक्ति के रूप में मजबूत करना चाहती है ! आरएसएस के सत्य को जो जानते हैं, वे यह जानते हैं कि यह अन्ततः एक गोपनीय संगठन है । ऐसे संगठनों का सच उन सभाओं में सामने नहीं आता है, जिनमें तनेजा की तरह के बौद्धिकों की भी उपस्थिति हुआ करती है ! अभय दुबे, विनोद अग्निहोत्री और खुद आशुतोष को अब और दलीलों की जरूरत नहीं रह गई थी ।  


रविवार, 29 अगस्त 2021

अफ़ग़ानिस्तान: पुरातनपंथी जुझारूपन कहीं भी स्थिरता नहीं ला सकता


 -अरुण माहेश्वरी 


अफ़ग़ानिस्तान में हामिद करजाई और अब्दुल्ला अब्दुल्ला जैसे नेताओं से पहले वार्ता और उसके बाद उन्हें नज़रबंद करने का वाक़या यहसवाल उठाता है कि उस देश में किसी सर्वसमावेशी सरकार का गठन कैसे संभव होगा जहां किसी भी सभा में किसी की उपस्थिति याअनुपस्थिति इस बात से तय होती है कि उसके साथ बंदूक़ की कितनी बड़ी ताक़त है ; जहां विचार नहींबंदूक़ की ताक़त का उन्माद हीसत्य हो ? सम्मति का अर्थ होता है संघर्ष का अंत  यह एक बुनियादी प्रश्न है कि शुद्ध रूप में जुझारु शक्तियों के बीच सहमति कैसेक़ायम हो ? नितांत निजी स्वार्थ की भी एक समग्र राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थिरता के लिहाज़ से सीमित और क्षणिक भूमिका ही हो सकती है 


अंग्रेजों ने भारत की आज़ादी के साथ इसके बिखराव की बातें यूँ ही नहीं की थी  इस बारे में चर्चिल का कथन सब जानते हैं  उन्होंनेकहा था कि भारत में “ सत्ता बदमाशोंकुटिल और लुटेरों के हाथ में चली जाएगी ; सभी भारतीय नेता बौने और कमजोर होंगे ” 

पर भारत के बारे में अंग्रेजों की भविष्यवाणी शत-प्रतिशत ग़लत साबित हुई क्योंकि वे यह नहीं देख पाए थे कि आज़ादी की लड़ाई औरउस दौरान सभी स्तरों पर शुरू हो चुके एक स्वतंत्र और आधुनिक जनतांत्रिक राष्ट्र के विमर्श के बीच से भारत बदल चुका था और बदलरहा था  आज़ादी की लड़ाई के काल में यदि कांग्रेस के व्यापक मंच के बजाय अंग्रेजों की पूरी तरह से चली होतीमुस्लिम लीग केसमानांतर हिंदू सांप्रदायिक ताक़तोंरियासती राजाओं और दूसरी विभाजनकारी ताक़तों का बोलबाला होतातो चर्चिल ने इसके पुर्ज़े-पुर्ज़े बिखर जाने की जो भविष्यवाणी की थीउसे सच साबित होने से कोई नहीं रोक सकता था  ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं हुआ क्योंकिकांग्रेस के आंदोलन के साथ भारत की जनता की तमाम आधुनिक आशाएँ और आकांक्षाएँजनता के सभी हिस्सों के हित जुड़ चुके थे कांग्रेस किसी भी रूप में भारत में किसी प्रकार के पिछड़ेपनधार्मिक कट्टरता और संकीर्ण सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी  इसी काएक परिणाम यह भी था कि यहाँ तक कि जिन्ना ने भी तब पाकिस्तान की परिकल्पना एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र के रूप में ही पेश की थी आज जरूर मोदी कंपनी को देखते हैं तो चर्चिल की बात याद आती है कि “भारत के नेता मीठी बातें करेंगे पर मन से गंदे होंगे  …एकदिन भारत में हवा और पानी पर भी कर लगेगा  “ 


बहरहालअफ़ग़ानिस्तान में दशकों तक तालिबान जो जंगलोंपहाड़ोंकंदराओं में सिर्फ एक जुझारूपन की तपस्या में लगे हुए थेउनकेलिए यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि एक सुबह अचानक जब वे इस तपस्या की तंद्रा से निकलें तो उनके लिए जुझारूपन के परे किसीअन्य विधेयात्मक लक्ष्य को देख पाना ही संभव  हो  जो सत्य  सामान्यतः शिव की तरह शांतिप्रगति और स्थिरता की ओर प्रेरितकरता हैमनुष्य के जीवन में फ्रायड के आनंद सिद्धांत का सत्यउसे दशकों के शुद्ध जुझारूपन से वहाँ कुछ इस कदर विस्थापित करदिया गया है कि दूर-दूर तक उनके लिए सत्य के किंचित् स्थिरता प्रदान करने वाले स्वरूप का कोई अनुमान ही नहीं बचा रह गया हैंउससे जुड़ने का सूत्र ही कहीं टूट गया है  जैसे आइसिस हैजिसके बारे में यह बिल्कुल सही आशंका की जाती हैं कि यदि उसके हाथ मेंपरमाणविक हथियार लग गए तो इस धरती का अंत सुनिश्चित है  जुझारूपन को ही जीने के सत्य के रूप में अपनाने की एक परिणतिहै यह  


आज दुनिया तालिबान से माँग कर रही है कि वे एक सभ्य राष्ट्र के राज्य की तरह का व्यवहार करेऔरतों और नागरिकों के अधिकारोंका ख़्याल रखे  यह वैसे ही है जैसे उनसे कहा जाए कि वे अपने उस स्वात्म को ही भूल जाएजिसकी रक्षा के लिए ही वे जंगलोंपहाड़ोंमें घूम रहे थेदशकों से कंदराओं में जी रहे थे ।  तालिबान की अब तक की पूरी मुहिम में जनतांत्रिक मूल्यों से जुड़े किसी भी विमर्श का कोई संकेतनहीं मिलता है  और यही अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान परिस्थिति में अस्थिरता का एक सबसे मूलभूत कारण है  


इसके साथ ही यह भी सच है कि तालिबान की नियति अफ़ग़ानिस्तान की नियति नहीं है  एक राष्ट्र के रूप में अफ़ग़ानिस्तान एकशानदार ऐतिहासिक दौर से गुजर चुका है  उसे फिर से लौटाने और सहेजने की लालसा निश्चित तौर पर वहाँ प्रबल रूप में मौजूद हैभले अभी वह सामने  दिखाई दे रही हो। और यही बात आज वहाँ एक नई और स्थायी सरकार केबल्कि ज़्यादा सही कहे तो तालिबानके नेतृत्व में एक नए राष्ट्र के रूप में अफ़ग़ानिस्तान के उभार के रास्ते की एक अतिरिक्त बाधा भी है। खुद तालिबान ही राष्ट्र के लिए एकसमस्या है और उसका प्रतिरोध किसी भी प्रकार की सामयिक स्थिरता के लिए भी बाधा है  जब तक कोई द्वंद्व किसी आत्म-बाधा केरूप में रहता हैतब तक उसे रोग नहीं भी कहा जा सकता हैपर जब यह आत्मबाधा क्रियात्मक रूप लेने लगती हैतब जुझारूपनमरजीवीपन के अलावा कुछ शेष नहीं रह सकता है  ऐसे में सहमति या सम्मति सिर्फ़ सामूहिक आत्म-हनन का रूप ले सकती है  आजके काल में कथित जिहादीपन का इसके स्वयं में अलावा कोई अर्थ नहीं हो सकता है कि वह किसी को भी आत्म-घाती उन्माद के आवर्त्तनमें ढकेल दे  


उन्हीं कारणों से अमेरिकी हस्तक्षेप के विरुद्ध तालिबान की जीत में हम वैसे ही किसी नए स्वाधीन राष्ट्र के उदय को नहीं देख पा रहे हैंजैसे सीरिया में आइसिस की जीत ने सिवाय विध्वंस के वहाँ के लोगों को कुछ नहीं दिया है  जैसे आइसिस या अल-क़ायदा का सर्व-इस्लामवादउनका शरीयत आदि का पुरातनपंथी धार्मिक पोंगापंथ से जुड़ा राष्ट्र का विचार आधुनिक समय के साथ अपनी विसंगतियोंके कारण ही किसी सकारात्मक दिशा में सहयोगी नहीं बन सकता है  वे सिर्फ़ संहार के कारण बन सकते हैं ।तालिबान या कोई भीशक्ति यदि राष्ट्र के निर्माण के अपने सामूहिक प्रकल्प में आबादी के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर चलनेके लक्ष्य को अपना कर चलती है तो वह कभी भी शांतिस्थिरता और समृद्धि का सबब नहीं बन सकती है  


अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के रास्ते में  रही विचारधारा और युद्धखोर सरदारों के स्वार्थों केसमायोजन की अभी की बाधाओं की रोशनी में वहाँ का भविष्य निराशाजनक ही दिखाई देता है  औरतों और जनता के एक बड़े हिस्सेके अधिकारों के हनन पर आधारित अफ़ग़ानिस्तान की संप्रभुता के सम्मान का तर्क हमें ज़रा प्रभावित नहीं कर रहा है