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बुधवार, 16 अगस्त 2017

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार का वह भाषण जिसे भारत के संघीय ढाँचे के सिद्धांतों का नग्न उल्लंघन करते हुए स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर आकाशवाणी ने प्रसारित करने से इंकार कर दिया :




त्रिपुरा के प्रियजनो,

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप सबका अभिनंदन और सबको शुभकामनाएं । मैं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों की अमर स्मृतियों को श्रद्धांजलि देता हूँ । उन स्वतंत्रता सेनानियों में जो आज भी हमारे बीच मौजूद है उन सबके प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करता हूँ ।
स्वतंत्रता दिवस को मनाना कोई आनुष्ठानिक काम भर नहीं है । इसके ऐतिहासिक महत्व और इस दिन के साथ जुड़ी भारतवासियों की गहरी भावनाओं के चलते इसे राष्ट्रीय आत्म - निरीक्षण के एक महत्वपूर्ण उत्सव के तौर पर मनाया जाना चाहिए ।

इस स्वतंत्रता दिवसके मौक़े पर हमारे सामने कुछ अत्यंत प्रासंगिक, महत्वपूर्ण और समसामयिक प्रश्न उपस्थित हैं । विविधता में एकता भारत की परंपरागत विरासत है । धर्म निरपेक्षता के महान मूल्यों ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट बनाये रखा है । लेकिन आज धर्म-निरपेक्षता की इसी भावना पर आघात किये जा रहे हैं । हमारे समाज में अवांछित जटिलताएँ और दरारें पैदा करने के षड़यंत्र और प्रयत्न किये जा रहे हैं ; धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर, भारत को एक खास धर्म पर आधारित देश में बदलने तथा गाय की रक्षा के नाम पर उत्तेजना फैला कर हमारी राष्ट्रीय चेतना पर हमला किया जा रहा है । इनके कारण अल्प-संख्यक और दलित समुदाय के लोगों पर भारी हमले हो रहे हैं । उनके बीच सुरक्षा का भाव ख़त्म हो रहा है । उनके जीवन में भारी कष्ट हैं । इन नापाक रुझानों को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है, न बर्दाश्त किया जा सकता है । ये विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के उद्देश्यों, स्वप्नों और आदर्शों के विरुद्ध हैं । जिन्होंने कभी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, उल्टे उसमें भीतरघात किया, जो अत्याचारी और निर्दयी अंग्रेज़ लुटेरों के सहयोगी थे और राष्ट्र-विरोधी ताक़तों से मिले हुए थे,, उनके अनुयायी अभी विभिन्न नामों और रंगों की ओट में भारत की एकता और अखंडता पर चोट कर रहे हैं ।प्रत्येक वफ़ादार और देशभक्त भारतवासी के आज एकजुट भारत के लिये और इन विध्वंसक साज़िशों और हमलों को परस्त करने के लिये शपथ लेनी चाहिए ।

हम सबको मिल कर संयुक्त रूप में अल्प-संख्यकों, दलितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने और देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने की कोशिश करनी चाहिए ।

आज ग़रीबों और अमीरों के बीच का फर्क तेज़ी से बढ़ रहा है । मुट्ठी भर लोगों के हाथ में राष्ट्र के विशाल संसाधान और संपदा सिमट रहे हैं । आबादी का विशाल हिस्सा ग़रीब है । ये लोग अमानवीय शोषण के शिकार हैं । उनके पास न भोजन है, न घर, न कपड़ें, न शिक्षा, न चिकित्सा और न निश्चित आय के रोजगार की सुरक्षा । यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के लक्ष्यों और उद्देश्यों के विपरीत है । इन परिस्थितियों के लिये हमारी आज की राष्ट्रीय नीतियाँ सीधे ज़िम्मेदार हैं । इन जन-विरोधी नीतियों को ख़त्म करना होगा । लेकिन यह काम सिर्फ बातों से नहीं हो सकता । इसके लिये वंचित और पीड़ित जनों को जागना होगा, आवाज उठानी होगी, और निर्भय हो कर सामूहिक रूप से बिना थके प्रतिवाद करना होगा । हमारे पास निश्चित तौर पर ऐसी वैकल्पक नीति होनी चाहिए जो भारत के अधिकांश लोगों के हितों की सेवा कर सके । इस वैकल्पिक नीति को रूपायित करने के लिये वंचित, पीड़ित भारतवासियों को इस स्वतंत्रता दिवस पर एकजुट होकर एक व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन शुरू करने की प्रतिज्ञा करनी होगी ।

बेरोज़गारी की बढ़ती हुई समस्या ने हमारे राष्ट्रीय मनोविज्ञान में निराशा और हताशा के भाव को पैदा किया है । एक ओर लाखों लोग अपना रोजगार गँवा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों बेरोज़गार नौजवान काम की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके लिये मृग मरीचिका की तरह है । राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों को बिना बदले इस विकराल समस्या का समाधान संभव नहीं है । यह नीति मुट्ठी भर मुनाफ़ाख़ोर कारपोरेट के स्वार्थ को साधती है । भारत की आम जनता की क्रय शक्ति में कोई वृद्धि नहीं हो रही है । इसीलिये इस स्वतंत्रता दिवस पर छात्रों, नौजवानों और मेहनतकशों को इन विनाशकारी नीतियों को बदलने के लिये सामूहिक और लगातार आंदोलन छेड़ने का प्रण करना होगा ।

केंद्र की सरकार की जन-विरोधी नीतियों की तुलना में त्रिपुरा की सरकार अपनी सीमाओं के बावजूद दबे-कुचले लोगों के उत्थान पर विशेष ध्यान देते हुए सभी लोगों के कल्याण की नीतियों पर चल रही है । यह एक पूरी तरह से भिन्न और वैकल्पिक रास्ता है । इस रास्ते ने न सिर्फ त्रिपुरा की जनता को आकर्षित किया है बल्कि देश भर के दबे हुए लोगों में सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है । त्रिपुरा में प्रतिक्रियावादी ताकतों को यह सहन नहीं हो रहा है । इसीलिये शांति, भाईचारे और राज्य की अखंडता को प्रभावित करने के लिये जनता के दुश्मन एक के बाद एक साज़िशें रच रहे हैं । विकास के कामों को बाधित करने की भी कोशिश चल रही है । इन नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादियों ताक़तों को अलग-थलग करना होगा । इसी पृष्ठभूमि में, स्वतंत्रता दिवस पर, त्रिपुरा के सभी शुभ बुद्धिसंपन्न, शांतिप्रिय और विकासकामी लोगों को इन विभाजनकारी ताक़तों के खिलाफ आगे आने और एकजुट होकर काम करने का संकल्प लेना होगा ।

रविवार, 13 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (32)


-अरुण माहेश्वरी

'पवित्र परिवार', या आलोचनात्मक आलोचना की आलोचना 
(ब्रुनो बावर एंड कंपनी के खिलाफ)

हम पहले ही उस कहानी का बखान कर चुके है कि कैसे पेरिस में समाजवादियों के साथ एक बैठक में मार्क्स और एंगेल्स की मुलाकात हुई और उन्होंने संयुक्त रूप से ब्रुनो बावर और उनके शागिर्दों की दर्शनशास्त्रीय बकवासों का एक भरपूर जवाब लिखने का फैसला किया ।  'पवित्र परिवार' उनके इसी निर्णय की उपज है । इसीसे से यह भी पता चलता है कि जिन परिस्थितियों में यह किताब लिखी गई वह तब यूरोप चल रहे सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों और विचारधारात्मक विमर्शों में परंपरागत सोच से बिल्कुल अलग रूप में अपने विचारों को रखने की मार्क्स-एंगेल्स की एक खास जद्दोजहद का काल था । यही वजह है कि इस किताब का उनके दर्शनशास्त्रीय और सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण के निर्माण में एक महत्वपूर्ण स्थान माना जाता  है ।

इसमें वे यंग हेगेलियन्स के आत्मनिष्ठ भाववाद से टकराये, वे हेगेल के जिस भाववादी दर्शन पर आधारित थे, उसके समग्र रूप से भी टकराये और दोनों पर ही सुसंगत भौतिकवादी नजरिये से कस कर प्रहार किये । बावर कंपनी के तर्कों का खंडन करते हुए उन्होंने दिखाया कि युवा हेगेलपंथियों का आत्मनिष्ठ भाववाद हेगेल के दर्शन से भी पीछे की ओर बढ़ाया गया कदम है ।


हम यह पहले ही बता चुके हैं कि किस प्रकार यहूदी प्रश्न और हेगेल के कानून का दर्शन की समीक्षा से लेकर '1844 की आर्थिक और दर्शनशास्त्रीय पांडुलिपियों' की तरह की कृतियों में वे धर्म संबंधी चर्चा से  इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के सिद्धांतों की दिशा में कदम बढ़ा चुके थे । 'पवित्र परिवार' को इस दिशा में उनका एक बहुत बड़ा कदम कहा जा सकता है । इसमें उन्होंने '1844 की पांडुलिपियों' की तुलना में सामाजिक विकास में भौतिक उत्पादन की निर्णायक भूमिका को और भी साफ तौर पर रखा है । मार्क्स ने अब इसमें समूची मानवता की ऐतिहासिक प्रगति के आधार को देख लिया था । वे बहुत ही साफ ढंग से यह कह पाये थे कि किसी भी एक ऐतिहासिक काल को तब तक समझना असंभव है जब तक कि “उस काल के उद्योग को, खुद जीवन के उत्पादन के तात्कालिक रूप को नहीं जाना जाता है ।“ (MECW, Vol. 4, page – 150)

किसी भी समाज विशेष की राजनीतिक व्यवस्था उसके आर्थिक ढांचे से कैसे संबद्ध रहती है, इनके बीच किस प्रकार के द्वंद्वात्मक संबंध होते हैं और कैसे ये परस्पर को प्रभावित करते हैं, इन सबके बारे में मार्क्स के गहन सोच का रूप इस कृति में साफ तौर पर देखने को मिलता है । इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के इस सिद्धांत के साथ ही ऐतिहासिक विकास में जनता की निर्णायक भूमिका, और विकास के फलस्वरूप इस भूमिका में वृद्धि के बारे में भी इसमें उनकी साफ समझ दिखाई देती है । मार्क्स ने कहा था कि मनुष्य के सामने और भी गहरे सामाजिक रूपांतरणों का दायित्व है, जिसके निर्वाह के बीच से “ऐतिहासिक आंदोलन की गहनता के साथ ही इस आंदोलन से जुड़ी जनता की तादाद भी बढ़ेगी ।“ (वही, पृष्ठ – 82)


'पवित्र परिवार' के तीक्ष्ण वैचारिक विवाद के बीच से ही मार्क्स ने समाजवादी समाज के निर्माण में सर्वहारा की विश्व-ऐतिहासिक भूमिका के विचार को रखा था । “सर्वहारा के जीवन की परिस्थितियां आज समाज में जीवन की परिस्थितियों को उनके सबसे अमानवीय रूप में पेश करती है ।“ एक वर्ग के तौर पर अपने ऐतिहासिक अस्तित्व की बदौलत ही सर्वहारा “खुद को मुक्त कर सकता है और करेगा ।“ (वही, पृष्ठ – 36-37) मार्क्स के ये प्रसिद्ध कथन इसी पुस्तक में आए थे । उन्होंने यह भी बताया कि सर्वहारा की सामाजिक मुक्ति का अर्थ होगा समूचे समाज की शोषण से मुक्ति । इस प्रकार उन्होंने सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के सार्वलौकिक मानवीय महत्व पर, उसके सच्चे मानवीय अर्थ पर बल दिया । 'पवित्र परिवार' में ही पहली बार पूंजीवाद-विरोधी क्रांतिकारी और मुक्ति संघर्ष में मार्क्स ने सर्वहारा की नेतृत्वकारी भूमिका के मूलभूत मार्क्सवादी विचार को रखा था । लेनिन कहते हैं कि 'पवित्र परिवार' में “सर्वहारा की क्रांतिकारी भूमिका के बारे में मार्क्स की दृष्टि लगभग पूरी तरह से विकसित हो चुकी थी ।“ (V.I.Lenin, Collected Works, Vol.38, page – 26)


क्रांतिकारी संघर्ष में सर्वहारा की नेतृत्वकारी भूमिका के निष्कर्ष के अलावा यही वह कृति है जिसमे मार्क्स-एंगेल्स ने इतिहास में विचारों की भूमिका की भी भौतिकवादी व्याख्या पेश की थी। हेगेल के न्याय दर्शन की समीक्षा के प्रयास में मार्क्स ने बताया था कि कैसे सिद्धांत एक भौतिक शक्ति का रूप ले लेते हैं, जिसका हम पहले जिक्र कर चुके हैं । इसी बात की और गहराई से व्याख्या करते हुए 'पवित्र परिवार' में वे बताते हैं कि कैसे विचार जब वास्तविक जीवन की जरूरतों से संगति रखते हुए प्रगतिशील वर्गों के हितों को व्यक्त करते हैं, वे समग्र सामाजिक विकास की प्रभावशाली शक्ति बन जाते हैं । इसे वे सत्रहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक के दर्शनशास्त्र के इतिहास के उदाहरणों के जरिये पुष्ट करते हैं । भौतिकवाद और भाववाद की दो बुनियादी धाराओं के बीच के संघर्ष का विश्लेषण करते हुए वे सामाजिक जीवन में एक प्रगतिशील दर्शन के रूप में भौतिकवाद के महत्व को बताते हैं ; खास तौर पर 1789 की फ्रांसीसी बुर्जुआ क्रांति के लिये एक विचारधारात्मक जमीन तैयार करने में भौतिकवाद की भूमिका को रेखांकित करते हैं । भौतिकवादी विचारों और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र की उपलब्धियों के बीच कैसा जैविक संबंध होता है, वह भी इस पुस्तक में मार्क्स के तर्कों के बीच से निकल कर आता है । वे जोर देकर कहते हैं कि भौतिकवादी दार्शनिक चिंतन का आगे और रचनात्मक विकास  निश्चित रूप से दर्शनशास्त्र को कम्युनिस्ट निष्कर्षों तक ले जायेगा ।


इसमें सबसे दिलचस्प, गौर करने लायक बात यह है कि मार्क्स और एंगेल्स अतीत की प्रगतिशील दार्शनिक धाराओं का विवेचन करते हुए सिर्फ अतीत तक ही सीमित नहीं रह जाते हैं । 'पवित्र परिवार' में उन्होंने हेगेल के दर्शन के तार्किक तत्वों, उसकी द्वंद्वात्मकता को जिस प्रकार भौतिकवादी दृष्टि से विकसित करके पुनर्व्याख्यायित किया और पहले के भौतिकवादियों में जिस चीज की कमी थी, उसे दूर करते हुए उसके साथ द्वंद्वात्मकता को जैविक रूप से उससे जोड़ा, इसे भी 'पवित्र परिवार' में बखूबी देखा जा सकता है । ध्यान से देखने पर पता चलता है कि किस प्रकार 'पवित्र परिवार' के पूरे पाठ में द्वंद्वात्मकता का कितने रचनात्मक तरीके से प्रयोग किया गया है । सामाजिक-आर्थिक और विचारधारात्मक विषयों पर द्वंद्वात्मक दृष्टि के साथ किस प्रकार बढ़ा जाता है और सामाजिक तथा बौद्धिक प्रक्रियाओं में द्वंद्ववाद के मूलभूत वस्तुवादी नियम, खास तौर पर विरोधों की एकता और संघर्ष के नियम किस प्रकार काम करते है, इन्हें इस किताब के पूरे विन्यास में साफ देखा जा सकता है ।

(क्रमशः)

शनिवार, 12 अगस्त 2017

प्रशासन मोदी - योगी के वश की बात नहीं है



-अरुण माहेश्वरी

हैरोल्ड लास्की ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'राजनीति का व्याकरण' में लिखा था कि जनतंत्र में राज्य का संचालन विशेषज्ञों का काम है क्योंकि उसे उस जनता के हितों के लिये काम करना होता है जो अपने हितों के प्रति ही ज़्यादातर बेख़बर रहती है । ऐसे में सिर्फ वोट में जीतने से वास्तव में कोई प्रशासक नहीं हो जाता । ख़ास तौर पर जो लोग जनता के पिछड़ेपन का लाभ उठाने की राजनीति करते हैं, सत्ता पर आने के बाद वे जनता के जीवन में सुधार के नहीं, और ज्यादा तबाही के कारक बन जाते हैं ।

हैरोल्ड लास्की के इस कथन के क्लासिक उदाहरण हैं हमारे देश की मोदी सरकार और यूपी की योगी सरकार ।
मोदी जी को जब और कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने नोटबंदी की तरह का तुगलकी कदम उठा कर पूरी अर्थ-व्यवस्था को ही पटरी से उतार दिया ।

जनता के हितों के लिये काम करने के लिये बनी सरकार ने एक झटके में लाखों लोगों के रोजगार छीन लिये; किसानों के उत्पादों के दाम गिरा कर पूरी कृषि अर्थ-व्यवस्था को चौपट कर दिया । जीडीपी का आँकड़ा 2016-17 की चौथी तिमाह में गिरते हुए सिर्फ 6.1 प्रतिशत रह गया है ; औद्योगिक उत्पादन मई महीने में -0.01 प्रतिशत की गिर कर इसमें वृद्धि की दर 1.7 प्रतिशत रह गई है। यहाँ तक कि बैंकों की भी, ख़ुद रिजर्व बैंक की हालत ख़राब कर दी । नोटबंदी के धक्के के कारण इस बार आरबीआई ने केंद्र सरकार को मात्र 30659 करोड़ रुपये का लाभ दिया है जो पिछले पाँच सालों में सबसे कम और पिछले साल की तुलना में आधा है । जाहिर है इससे अपने वित्तीय घाटे से निपटने में केंद्र सरकार की समस्या और बढ़ जायेगी जिसकी गाज जनहित के ही किसी न किसी प्रकल्प पर गिरेगी ।


पूरी अर्थ-व्यवस्था अभी इस क़दर बैठती जा रही है कि अब अर्थशास्त्री मुद्रास्फीति की नहीं, मुद्रा-संकुचन को आज की मुख्य समस्या बताने लगे हैं । मुद्रा संकुचन का अर्थ होता है कंपनियों के मुनाफ़े में तेज़ी से गिरावट और उनके ऋणों के वास्तविक मूल्य में वृद्धि । इसकी वजह से बैंकों का एनपीए पहले के किसी भी समय की तुलना में और तेजी से बढ़ेगा ।



इसी प्रकार,गोरखपुर अस्पताल में आक्सीजन की आपूर्ति की समस्या को जानने के बावजूद मुख्यमंत्री योगी बच्चों की मृत्यु का कारण उनकी बीमारियों को बता रहे है जबकि इन बीमारियों से जूझने के लिये ही उन्हें आक्सीजन दी जा रही थी । उन्होंने ख़ुद माना कि आक्सीजन के सप्लायर को उसका बक़ाया नहीं चुकाया गया था, फिर भी बच्चे और कुछ वयस्क भी, जो आक्सीजन पर थे, उनके अनुसार अपनी बीमारियों की वजह से मरे !

योगी की इन बेवक़ूफ़ी की बातों को क्या कहा जाए ? गनीमत है कि अभी तक उन्होंने अस्पताल पर किसी प्रेतात्मा के साये को ज़िम्मेदार नहीं बताया और यज्ञ-हवन के जरिये अस्पताल को उससे मुक्त करने का उपाय नहीं सुझाया है । लेकिन वे कल यदि ऐसे ही किसी भारी-भरकम आयोजन में बैठ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।

केंद्र सरकार से लेकर भाजपा की तमाम सरकारें पर्यावरण से लेकर दूसरी कई समस्याओं के समाधान के लिये आज किसी न किसी 'नमामि' कार्यक्रम में लगी हुई है । मोदी जी के पास देश की हर समस्या का समाधान प्रचार के शोर में होता है । वह भले स्वच्छ भारत का विषय हो या कोई और विषय हो ।

केंद्र और राज्य सरकारों के इन कार्यक्रमों में लाखों लोग शामिल होते है, अर्थात जनता ख़ुश होती है । लेकिन वास्तविकता यह है कि इन सारे प्रचारमूलक कामों से जनता का ही सबसे अधिक नुक़सान होता है । जन हितकारी प्रकल्पों के लिये धन में कमी करनी पड़ती है ।


मोदी सरकार पहली सरकार है जिसने उच्च शिक्षा और शोध में खर्च को पहले से आधा कर दिया है । मनरेगा का भट्टा पहले से ही बैठा दिया गया है । किसानों के कर्ज-माफी के सवाल पर भी बहुत आगे बढ़ कर कुछ करने की इनकी हिम्मत जवाब देने लगी है । ऊपर से कूटनीतिक विफलताओं के चलते सीमाओं पर युद्ध की परिस्थति पूरे परिदृश्य को चिंताजनक बना दे रही है ।

इसीलिये आज हैराल्ड लास्की बहुत याद आते हैं - जनतंत्र में प्रशासन खुद में एक विशेषज्ञता का काम है । यह कोरे लफ्फाजों के बस का नहीं होता है । मोदी और योगी के तमाम कदमों के पीछे की विवेकहीनता को देख कर इस बात को और भी निश्चय के साथ कहा जा सकता है ।

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (31)


-अरुण माहेश्वरी

'युवा मार्क्स' की लंबी विचार यात्रा पर

इस प्रकार दर्शन, धर्म, राज्य और समाज से होते हुए राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन की दिशा में मार्क्स की वैचारिक यात्रा के प्रस्थान की पूरी पृष्ठभूमि को हम बहुत साफ रूप में देख पा रहे हैं । मार्क्स के अध्येताओं ने उनके वैचारिक जीवन के इसी काल को युवा मार्क्स के काल के रूप में विवेचित किया है और बहुतेरे तो उनके इसी काल के लेखन पर इस हद तक फिदा है कि आगे के लगभग तीस साल के उनके महान कार्य को इसके सामने गौण समझते हैं । इसमें उन्हें एक बेहद प्रतिभाशाली युवक की वह ताजगी दिखाई देती है, जिसकी खुशबू और जिसकी संभावनाओँ के असीम विस्तार की कल्पना पर कौन नहीं मुग्ध होगा ! लेकिन सारी दुनिया जानती है कि यह तो किसी महान वैज्ञानिक की अनोखी परिकल्पनाओं की झलक भर थी । उनका आगे का समूचा कृतित्व जब इन परिकल्पनाओं की ठोस रूप में पुष्टि करता है, मनुष्य के द्वारा उसके भौतिक उत्पादन से उत्पन्न जीवन के जिन तमाम रूपों की साक्षात तस्वीर पेश करता है, तब मार्क्स हाथ में अपनी किताब थामे किसी सचमुच देवदूत से कम प्रतीत नहीं होते । आज भी जब हम नई से नई वैज्ञानिक खोजों के साथ बदलते मनुष्य के भौतिक उत्पादनों की संगति में सामाजिक संबंधों में आने वाले बदलावों की व्याख्या की कोशिश करते हैं तो उसके आधारभूत सूत्र मार्क्स के अलावा और कहीं नहीं मिलते । ये सूत्र कोई आधिभौतिक सूत्र नही, बल्कि परिवर्तन के नियम के सूत्र है । एंगेल्स ने लिखा था कि “(मनुष्य के इतिहास में ही नहीं) प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में हर युगांतकारी खोज के साथ भौतिकवाद को अपना रूप बदलना पड़ता है।“ इसीलिये मार्क्सवाद का यह तकाजा है कि प्राकृतिक-दार्शनिक प्रस्तावनाओं में भी मनुष्य द्वारा भौतिक उत्पादन की परिस्थितियों में परिवर्तन के अनुरूप हमेशा परिवर्तन किये जाते रहे । सचमुच विचारों की दुनिया में यह ऐसी कापरनिकस क्रांति है, जिसने आगे के सोच के पूरे परिप्रेक्ष्य और तौर-तरीकों को बुनियादी रूप से बदल दिया है ।



बहरहाल, अभी इन विषयों में जाने के पहले जरूरी है कि सन् 1838 से लेकर सन् 1844-45 तक के युवा मार्क्स की वैचारिक यात्रा के साथ ही हम इस काल के उनके जीवन की घटनाओँ के वृत्तांत पर से अपनी नजर न हटाए । अब तक के ब्यौरों से ही साफ है कि सन् '38-'39 के यंग हेगेलियन्स वाले काल में मार्क्स बॉन विश्वविद्यालय से बर्लिन पहुंच चुके थे, लेकिन 1843 में जब उन्होंने हेगेल के न्याय दर्शन पर काम शुरू किया और बावर बंधुओँ के जवाब देते हुए 'पवित्र परिवार' लिखा तब वे पेरिस में थे और फिर जब 'न्याय दर्शन की समीक्षा' वाली किताब की उन्होंने भूमिका लिखी, तब वे लंदन में जा बसे थे ।

इस प्रकार, मार्क्स का एक शहर से दूसरे शहर में ठौर खोजते हुए भटकना कभी उनका कोई स्वैच्छिक या पेशेवर चयन नहीं था, वे अपने लिये किसी कैरियर की तलाश में नहीं भटक रहे थे । इसके पीछे शुद्ध राजनीतिक कारण थे, जर्मनी, बेल्जियम, फ्रांस की सरकारों द्वारा उन्हें जलावतन की सजाएं थी । यह अकेला तथ्य इतना बताने के लिये काफी है मार्क्स के जरिये यूरोप के वैचारिक जीवन में पैदा हुए तूफानों का संपर्क सिर्फ मार्क्स के मस्तिष्क की हलचलों से ही नहीं था, भौतिक जीवन की उन सभी परिस्थितियों से भी था जो मानो किसी प्रयोगशाला की तरह उनकी प्रत्येक वैचारिक खोज को पुष्ट करती हुई उनका सैद्धांतिक निरूपण कर रही थी ।

इसके पहले कि हम सन् 1838 में मार्क्स के पिता हेनरिख की मृत्यु से लेकर 1844 तक के उनके घटना-बहुल जीवन की तफसील में जाएं, जिसमें 1843 में जेनी के साथ उनकी शादी का प्रसंग भी शामिल है, हम चाहते हैं कि इस काल में उनके विचारों की अब तक की श्रंखला में जिसमें हमने विस्तार के साथ धर्म के बारे में, और फिर न्याय दर्शन, समाज और राज्य के बीच संबंधों के पर दृष्टिपात किया, उसी क्रम में, संक्षेप में ही क्यों न हो, उनकी महत्वपूर्ण कृति 'पवित्र परिवार' के बारे में थोड़ी चर्चा कर लें। इसे भी मार्क्स के भौतिकवादी विचारों के द्वंद्वात्मक स्वरूप के निर्माण को सूचित करने वाली एक सबसे अहम कृति माना जाता है । इसके कुछ अंशों पर हम यदि सूक्ष्मता से नजर डालेंगे तो उनसे मार्क्स के लेखन की उस विशेष शैली का भी अनुमान मिलेगा जो हमें यह बताती है कि कैसे लेखक, कलाकार की शैली भी उसका एक प्रमुख परिचय हुआ करती है ।
                                      (क्रमशः)   

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

सीपीआई(एम) पर बहुमतवादियों का यह कैसा मकड़जाल है !

- अरुण माहेश्वरी


सीपीआई(एम) के अंदर 1996 के बाद से ही जब मतदान और बहुमत के जरिये संयुक्त मोर्चा के सर्वसम्मत चयन के बावजूद ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया गया, प्रकाश करात के नेतृत्व में बहुमतवादियों ने एक अनोखी परिपाटी चला दी है कि देश और पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण विषयों पर मतदान के जरिये निर्णय लिये जाएं । मजे की बात यह है कि पार्टी की काम करने की इस पद्धति को जनवादी केंद्रीयतावाद कह कर महिमामंडित किया जाता है । सीपीआई (एम) के अंदर के लोग इसी बात पर खुश हो लेते हैं कि वे पार्टी के संचालन की सर्व-स्वीकृत लेनिनवादी लाइन का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे हैं । और अपनी इस सिद्धांत-निष्ठा के जोश में वे न सिर्फ पार्टी के लगातार पतन की सच्चाई से आंख मूंदे रहते हैं बल्कि खुद अपनी पार्टी के संविधान को भी पूरी तरह से भूल जा रहे हैं ।

सीपीआई(एम) के संविधान के जिस परिच्छेद में 'जनवादी केंद्रीयतावाद के सिद्धांतों' के बारे में विस्तार से कहा गया है, उसमें बहुत साफ शब्दों में यह भी कहा गया है कि “ जब किसी पार्टी कमेटी में गंभीर मतभेद पैदा हो जाए तो सहमति पर पहुंचने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए । इसमे विफल होने पर निर्णय को टाल दिया जाना चाहिए ताकि आगे और बहस के जरिये मतभेदों को दूर किया जा सके, बशर्ते पार्टी और जन आंदोलन की जरूरतों को देखते हुए तत्काल फैसला करना आवश्यक न हो ।“(धारा – 13, 2सी)

अपने ही संविधान की इस धारा की भावना के विपरीत, कोरे संख्या बल से सारी चीजों को तय करने की इन बहुमतवादियों की जकड़बंदी ने आज सीपीआई(एम) को किस प्रकार हंसी का पात्र बना कर छोड़ दिया है, यह पिछले सभी अनुभवों के बाद एक बार फिर कामरेड सीताराम येचुरी को राज्य सभा से वापस बुला लेने की घटना में देखा गया ।  कहना न होगा, सीपीआई(एम ) के बहुमतवादियों ने कामरेड सीताराम येचुरी को राज्य सभा से विदा होने के लिये मजबूर करके एक बार फिर पार्टी के अंदर अपनी एक महान जीत अर्जित कर ली और संसद में सीपीआई(एम) की आवाज को कमज़ोर करके उसे संसदवादी भटकाव से बचाने और 'क्रांतिकारी' रास्ते पर अडिग रखने की दिशा में एक और बड़ी सैद्धांतिक सफलता भी प्राप्त कर ली । यद्यपि बहुत सारे लोगों के मन में आज भी यह सवाल बना रह गया है कि यदि कांग्रेस पार्टी ने सीताराम येचुरी के बजाय सीपीआई(एम) के बहुमतवादियो में से किसी नेता या नेत्री को अपना समर्थन देने की पेशकश की होती तब भी क्या सीपीआई(एम) अपनी उस विचारधारात्मक शुद्धता पर इसी भाव के साथ डटी रहती !


हम जानते हैं, जब यूपीए-1 को समर्थन देने का फैसला किया गया था, इन्हीं बहुमतवादियों को कांग्रेस को समर्थन देने में कोई सैद्धांतिक संकोच नहीं हुआ था, क्योंकि पर्दे के पीछे, अंधेरे में काम करने के अभ्यस्त सीपीआई(एम) के इस 'क्रांतिकारी' समूह के लिये इसमें अंदर-अंदर अपने वर्चस्व के दिखावे का खेल खेलने की पूरी संभावना नज़र आ रही थी । और, अपनी इसी थोथी हेकड़ी के प्रदर्शन के चक्कर में बेबात ही इस तबके ने यूपीए-1 सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था । तभी से प्रकाश करात और उनके साथ के बहुमतवादियों अंध कांग्रेस-विरोध की जो गांठ बांध ली उसने जैसे पूरी पार्टी के ही हाथ-पांव बांध कर रख दिये । इस एक नीति ने सीपीआई(एम) को एक कागजी शेर बना कर छोड़ दिया है । वह सिर्फ बयानबाजी की पार्टी बन कर रह गई है । सांप्रदायिकता के खिलाफ जनता की अधिकतम एकता की उसकी सारी बातें यथार्थ की जमीन पर खोखली हो जाती है, क्योंकि हमारी राजनीतिक सच्चाई यह है कि कांग्रेस को अलग करके साप्रदायिकता के खिलाफ किसी भी व्यापक लड़ाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।

इस प्रकार, सीपीआई(एम) का बहुमतवादी समूह कांग्रेस से दूरी रखने की अपनी नीति पर तो अटल है, लेकिन वह सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ जनता के व्यापक एकजुट आंदोलन को बड़ी आसानी से भूल जा रहा है । फलतः, थोथी बयानबाजियों और इस प्रकार राजनीति के रंगमंच पर पूरी तरह से अप्रासंगिक हो जाने के अलावा उसके पास कुछ नहीं रह जा रहा है ।

हाल में सीपीआई(एम) के मुखपत्र 'पीपुल्स डेमोक्रेसी' में, जिसके संपादक प्रकाश करात है, बिहार में नीतीश के विश्वासघात के प्रसंग में निहायत अप्रासंगिक तरीक़े से कांग्रेस को घसीट कर यह फैसला सुनाया है कि भाजपा के खिलाफ ऐसा कोई भी संयुक्त प्रतिरोध सफल नहीं हो सकता है जिसमें कांग्रेस दल शामिल होगा । इसमें कांग्रेस को नव-उदारवादी नीतियों को लादने के लिये मुख्य रूप से ज़िम्मेदार बताते हुए कहा गया है कि भाजपा को हराने के लिये जरूरी है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता के साथ ही नव-उदारवाद से भी लड़ा जाए ।
हमारा इन 'सिद्धांतकारों' से एक छोटा सा सवाल है कि नव-उदारवाद से उनका तात्पर्य क्या है ? क्या यह इक्कीसवी सदी के पूँजीवाद से भिन्न कोई दूसरा अर्थ रखता है ? तब क्या फासीवाद-विरोधी किसी भी संयुक्त मोर्चे की यह पूर्व-शर्त होगी कि उसे पूँजीवाद-विरोधी भी होना पड़ेगा ? क्या मार्क्सवादी सिद्धांतकारों ने फासीवाद को पूँजीवाद के दायरे में भी एक अलग स्थान पर नहीं रखा था ? स्टालिन ने जब कहा था कि जनतंत्र के जिस झंडे को पूँजीवाद ने फेक दिया है, उसे उठा कर चलने का दायित्व कम्युनिस्टों का है, तब क्या वे प्रकारांतर से पूँजीवाद की ताक़तों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की पैरवी ही नहीं कर रहे थे ?

प्रकाश करात ने ही कुछ दिनों पहले 'इंडियन एक्सप्रेस' में यह लिखा था कि वे अभी भाजपा को फासीवादी नहीं कहेंगे । इस पर भारी विवाद हुआ था, लेकिन किसी भी सवाल का जवाब देने के बजाय वे चुप्पी साध कर बैठे रहे थे । यही वह बहुमतवादी समूह है जिसने यूपीए-1 से निकल कर वामपंथ के 'अभूतपूर्व विस्तार' की दिशा में छलाँग लगाई थी । इसके पहले के ज्योति बसु वाले प्रसंग की हम पहवे ही चर्चा कर चुके हैं जब केंद्रीय कमेटी में बहुमत जुटा कर भारतीय राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई से वामपंथ को हमेशा के लिये अलग कर लिया गया था और प्रकारांतर से इसकी लगाम को भाजपा के सुपुर्द करने का महान कृत्य किया गया ।

वास्तविकता यह है कि कोई भी दल सत्ता में हो, परिस्थिति अंतर्विरोधों से रहित नहीं रह सकती । उसकी दरारों में हमेशा बदलाव के लक्षणों को पाया जा सकता है । संसदीय राजनीति में जनवादी ताक़तों की कार्यनीति की भूमिका यह है कि उन दरारों का लाभ कैसे क्रमश: प्रगतिशील शक्तियों के पक्ष में उठाया जाए न कि प्रतिक्रियावादियों को उनका लाभ उठाने की अनुमति दी जाए । कार्यनीति कभी भी तथाकथित शुद्धतावाद की बहादुरी से तय नहीं की जाती है । शुद्धतावाद आपको पार्टी में गुटबाज़ी के लिये एक आड़ तो प्रदान कर सकता है, कभी किसी दल के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की अनुमति नहीं दे सकता । जैसा कि ट्राटस्कीपंथियों की लंबी-चौड़ी, लेकिन खोखली दलीलों में देखा जा सकता है ।

कार्यनीति का मतलब ही है राजनीति में अपने वर्तमान के हित को साधो, अपने मित्रों के दायरे को बढ़ाओ । और जो अपने वर्तमान को नहीं साध सकते वे भविष्य के लिये भी किसी काम के नहीं रहते हैं । जिस महान नैतिकता के लक्ष्य के लिये ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया और फिर भारत को साम्राज्यवाद से मुक्त करने के जिस महान लक्ष्य के लिये यूपीए-1 से समर्थन वापस लिया गया, भारतीय वामपंथ उन्हीं 'शौर्य गाथाओं' के खोखलेपन का भुक्त भोगी है । आज फिर सीपीएम में ये बहुमतवादी अपनी गुटबाज़ी के स्वार्थ में उसी प्रकार का थोथी वीरता के प्रदर्शन वाला डान क्विगजोटिक खेल खेल रहे हैं ।

नव-उदारवाद से लड़ाई का जो अर्थ पश्चिम के विकसित साम्राज्यवादी देशों में है, भारत की तरह के विकासशील देश में नहीं है । अमेरिका में ओबामा केयर के लिये लड़ाई भी नव-उदारवाद के खिलाफ लड़ाई है । यह वहाँ विकसित हुए व्यापक सामाजिक सुरक्षा के नेटवर्क की रक्षा की लड़ाई है जिसके हवाले से पश्चिम के बुद्धिजीवी इन विकसित देशों को साम्यवाद से सिर्फ एक कदम पीछे बताने की तरह की व्याख्याएँ भी किया करते है। उस लड़ाई को गोरक्षा, लिंचिंग और राममंदिर में अटके हुए भारत की लड़ाई बताना स्वयं में एक बहुत बड़ी विच्युति है ।

जनतंत्र पर तंज करता हुआ इक़बाल का यह मशहूर शेर है -
'जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में
बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते'

सीपीएम के बहुमतवादी प्रकाश करात के नेतृत्व में पार्टी के अंदर इसी प्रकार के जनतंत्र को साधने में लगे हुए हैं। इन्हें ऐतिहासिक क्षणों में भी शुद्ध संख्याबल पर निर्णय लेने में कोई संकोच नहीं होता और उसे 'आंतरिक जनतंत्र' की जीत बता कर डुगडुगी बजाते हैं । ऐसा लगता है कि सीपीआई(एम) में प्रकाश करात के नेतृत्व में बहुमतवादियों ने भाजपा के खिलाफ एकजुट प्रतिरोध में कांग्रेस को शामिल करने के मामले में चल रहे मतभेदों को उनकी अंतिम परिणति तक ले जाने, अर्थात पार्टी को तोड़ डालने तक का निर्णय ले लिया है ।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (30)


-अरुण माहेश्वरी

हेगेल के न्याय दर्शन की आलोचना

मार्क्स किस प्रकार धर्म को क्रमशः अपने वैचारिक मानदंडों से अलग करने लगे, इसका एक उदाहरण यह भी था कि फायरबाख हेगेल के न्याय दर्शन के विश्लेषण में जिस प्रकार धर्म की आलोचना का रास्ता पकड़ते हैं, मार्क्स ने उस दिशा में एक भी कदम नहीं बढ़ाया । सामाजिक संबंधों की रोशनी में ही वे इस पर विचार करते हैं । हेगेल के न्याय दर्शन के प्रति मार्क्स के आकर्षण का कारण ही राजसत्ता और समाज के संबंधों के बारे में हेगेल की शिक्षाएं थी ।

हेगेल के न्याय दर्शन की आलोचना की प्रक्रिया में ही मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचे थे कि नागरिक समाज ही राज्य को निर्धारित करता है । नागरिक समाज मनुष्यों के निजी, सबसे पहले उनके भौतिक, हितों का क्षेत्र होता है जिनके साथ सामाजिक संबंध जुड़े होते हैं । राज्य नागरिक समाज का गठन नहीं करता । जबकि हेगेल उल्टा देख रहे थे ।

मार्क्स चाहते थे कि नागरिक समाज के वे और ठोस रूप में परिभाषित करें जिसमें उसके ऐतिहासिक विकास की मूल बातों को शामिल किया जा सके । खास तौर पर इसके विकास के उस चरण की व्याख्या करना चाहते थे जिसमें पूंजीवादी निजी संपत्ति ने भौतिक संबंधों के क्षेत्र में प्रमुख भूमिका अदा करना शुरू कर दिया था । अपने समय में राज्य और पूंजीवादी मिल्कियत के बीच के परस्पर संबंधों की एक भौतिकवादी व्याख्या करते हुए मार्क्स ने लिखा कि विकसित देशों में मौजूद राजनीतिक संविधान “निजी संपत्ति का संविधान है।“ “सर्वोच्च राजनीतिक आस्था निजा संपत्ति की आस्था है । (MECW, Vo;. 3, page – 98)(The political constitution at its highest point is therefore the constitution of private property.The supreme political conviction is the conviction of private property.)


आइयें, आगे बढ़ने के पहले हम इस कृति में युवा मार्क्स की दार्शनिक तर्क प्रणाली की एक बहुत छोटी सी बानगी को देखते हैं । वे लिखते हैं —

“हेगेल ने यहां एक अनसुलझा विरोध खड़ा कर दिया । एक ओर बाहरी जरूरत, दूसरी ओर आंतरिक लक्ष्य । राज्य के अंतिम सामान्य उद्देश्य के साथ व्यक्तियों के खास हितों की एकता को इस तथ्य में निहित मान लिया जाता है कि राज्य के प्रति उनके कर्त्तव्य और राज्य में उनके अधिकार दोनों एक है । (अर्थात संपत्ति का सम्मान करने के कर्त्तव्य को संपत्ति में अधिकार के साथ मिला दिया गया ।)

...“इस बिंदु पर तार्किक, सर्वेश्वरवादी रहस्यवाद बिल्कुल साफ हो जाता है ।
“वास्तविक संबंध यह है — “व्यक्ति के संदर्भ में राज्य की भूमिका की मध्यस्थता परिस्थितियों, लोभ, और व्यक्ति की वृत्ति के अपने चयन के जरिये होती है ।“ काल्पनिक दर्शनशास्त्र इस तथ्य को, इस वास्तविक संबंध को प्रतीति अथवा परिघटना के रूप में पेश करता है । ये परिस्थितियां, यह लोभ, यह वृत्ति का चयन, यह वास्तविक मधयस्थता — यह सब एक मध्यस्थता की महज प्रतीति है जिसे वास्तविक विचार खुद से व्यक्त करता है या जो दृश्य के पीछे चलता रहता है । यथार्थ को अपने खुद के रूप में नहीं बल्कि अन्य यथार्थ के रूप में पेश किया जाता है । साधारण नजर आने वाले तथ्य की अपनी नहीं, बल्कि उससे अलग उसके कानून की आत्मा होती है ; जबकि वास्तविक विचार के अस्तित्व का ढांचा खुद से ही विकसित कोई वास्तविकता नहीं है, बल्कि सामान्य अनुभवजन्य तथ्य है ।

Abandon all hope, you who enter here.

“… परिवार और नागरिक समाज राज्य के परिसर है ; वे सचमुच के सक्रिय तत्व है, लेकिन काल्पनिक दर्शन में चीजों को उलट दिया जाता है । जब विचार को विषय बना दिया जाता है, तो फिर, वास्तविक विषय, मसलन, नागरिक समाज, परिवार, “परिस्थितियां, लोभ इत्यादि“ एक भिन्न महत्व के अयथार्थ वस्तुनिष्ठ तत्व बन जाते हैं ।“ (MECW, Vol. 3, page- 6-8)

बाद के दिनों में खुद मार्क्स ने 'हेगेल के न्याय दर्शन की आलोचना' को अपने भौतिकवादी विचारों के गठन में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिये इस रूप में याद किया है  —“अपने को आक्रांत करने वाली शंकाओं के समाधान के लिए मैंने जो प्रथम कृति हाथ में ली, वह थी हेगेल के न्याय दर्शन की आलोचनात्मक समीक्षा जिसकी भूमिका पेरिस में प्रकाशित 'Deutsch-Französische Jahrbücher' 1844 में छपी थी । अपने अन्वेषणों से मैं इस परिणाम पर पहुंचा कि कानूनी संबंधों एवं राज्य के रूपों को स्वयं उनसे या तथाकथित मानव मस्तिष्क के सामान्य विकास से नहीं समझा जा सकता, बल्कि उनका मूल जीवन की भौतिक अवस्थओं में है, जिनके समाहार को हेगेल ने 18वीं सदी के फ्रांसिसियों और अंग्रेजों की मिसाल पर चलते हुए “नागरिक समाज“ का नाम दिया था, लेकिन अगर उस नागरिक समाज के ढांचे का पता लगाना है तो उसकी राजनीतिक अर्थ-व्यवस्था को देखना होगा ।“( Preface to A Contribution to the Critique of Political Economy)

1859 के जनवरी महीने में लंदन में लिखी गई इसी भूमिका का अंत मार्क्स ने दांते की 'दिव्य कॉमेडी' की इन प्रसिद्ध दो पंक्तियों को उद्दृत करते हुए किया था —

“विज्ञान के प्रवेश द्वार पर, नरक के प्रवेश द्वार की ही भांति, यह आदेश टंगा हुआ होना चाहिएः
“समस्त अविश्वास को यहां तिलांजलि देना होगा ;
प्रत्येक कातर चिंता को यहां दफन करना होगा ।“ *



* Qui si convien lasciare ogni sospetto;
ogni viltà convien che qui sia morta.

Here one must leave behind all hesitation;
here every cowardice must meet its death.

(क्रमशः)

बुधवार, 9 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (29)


-अरुण माहेश्वरी

पवित्र परिवार और सन् 1844

इस प्रकार डाक्टर्स क्लब के यंग हेगेलियन्स के बीच की दर्शनशास्त्रीय और धर्मशास्त्रीय चर्चा के एक लंबे इतिहास के बीच से गुजरते हुए हमने देखा कि कैसे सन् 1840 के काल में ही मार्क्स ने धर्म के पूरे विषय को उसके अपने दायरे से बाहर एक बड़े सामाजिक परिप्रेक्ष्य में विचार का विषय माना था । और धर्म की चर्चा से शुरू करके वे मनुष्य के परायेपन और पूंजीवाद की आलोचना की अपनी दिशा को पकड़ चुके थे ।

जब उन्होंने धर्म नामक भ्रांति को आद्योपांत, पूरी तरह से जान लिया, जब उसके सारे रहस्यो के भेद को पा लिया तो सचमुच वे धर्म के विषय से हमेशा के लिये मुक्त हो गये । आगे के पूरे तीन दशक तक फिर उन्होने उस विषय की ओर मुड़ कर ताका तक नहीं । धर्म बाद में उनके लिये विषय को कोरा रहस्यमय बना दिये जाने के एक रूपक से अधिक महत्व का नहीं रह गया । किसी भी भ्रांत वस्तु को पूरी तरह से जान कर उससे पूरी तरह से मुक्त हो जाने की सचाई का इसे एक क्लासिक उदाहरण कहा जा सकता है ।


जिस 1844 में उन्होंने 'यहूदी प्रश्न' वाला निबंध लिखा, उसी साल ब्रुनो बावर की तमाम स्थापनाओं का खंडन करते हुए उन्होंने एंगेल्स के साथ मिल कर 'पवित्र परिवार' (The Holy Family) पुस्तक लिखी जिसके ऊपर, प्रारंभ में ही एंगेल्स की पहली पंक्ति है — “ 1844 की गर्मियों में जब पेरिस में मैंने मार्क्स से मुलाकात की तभी तमाम सैद्धांतिक मसलों पर हमारे बीच पूर्ण सहमति साफ हो गई थी और वही हमारे संयुक्त लेखन का साल रहा ।“ दोनों की इस मुलाकात के वक्त ही मार्क्स ने एंगेल्स को कहा था कि क्यों न हम अपनी 'यंग हेगेलियन्स' के दिनों की अपनी सैद्धांतिक उत्तेजनाओं को लिख डाले । इसी उपक्रम में न सिर्फ उनके संयुक्त लेखन का एक प्रकल्प ही सामने आया बल्कि दोनों के बीच एक ऐसे आपसी संबंध की नींव पड़ी जिसने सारी दुनिया को बदल देने में एक अहम भूमिका अदा की ।

1844 में पेरिस में समाजवादियों के साथ मार्क्स और एंगेल्स

इस किताब की एक कहानी यह भी है कि इसमें एंगेल्स को जो लिखने का जिम्मा दिया गया था उसे तो उन्होंने अपने दस दिनों के पेरिस प्रवास के समय ही लिख दिया था लेकिन किताब का प्रमुख काम मार्क्स ने ही किया था क्योंकि इसमें मार्क्स को अपनी 'पांडुलिपियों' में से कुछ चीजों के इसमे शामिल करना था, जिस पर वे उन दिनों काम कर रहे थे । इस काम को उन्होंने 1844 के नवंबर महीने तक में पूरा किया । किताब का शीर्षक 'पवित्र परिवार' प्रकाशक का दिया हुआ शीर्षक था जो बावर बंधुओं और उनके समर्थकों को संबोधित होने के कारण अपने में व्यंग्यात्मक संपुट लिये हुए था ।

उस समय के अखबारों में इस किताब की काफी चर्चा हुई थी क्योंकि उसमें विद्रोही माने जाने वाले बावर बंधुओं की खिंचाई थी । एक अखबार ने लिखा कि समाजवादी विचारों के पेश किया गया है क्योंकि यह “हमारे समय की सामाजिक बीमारियों के खिलाफ किसी भी आधे-अधूरे कदम की अनुपयुक्तता“ को बताती है । फिर भी इस पुस्तक के क्रांतिकारी विचारों के खतरे को लोगों ने पकड़ा था और कहा गया था कि मार्क्स के अत्यंत व्यापक ज्ञान से कोई इंकार नहीं कर सकता और न ही हेगेल के तर्कशास्त्र में वितर्क करने के शस्त्र-भंडार, जिसे आम तौर पर 'इस्पाती तर्क' कहते हैं, के प्रयोग करने की उनकी सामर्थ्य को कोई नकार सकता है ।

बाद के दिनों में लेनिन ने 'पवित्र परिवार' के बारे में कहा था कि इसके जरिये ही वैज्ञानिक क्रांतिकारी भौतिकवादी समाजवाद की आधारशिला रखी गई थी । ब्रुनो बावर ने 1845 में ही इस किताब का प्रत्युत्तर देने की एक कोशिश की थी जिसमें उनका कहना था कि मार्क्स और एंगेल्स ने उन्हें गलत समझा था । मार्क्स ने 1846 में अपने एक लेख में बावर का जवाब दिया और बाद के काल में 'जर्मन विचारधारा' पुस्तक के दूसरे अध्याय में भी इसकी चर्चा की ।


1844 का ही यह साल था जब मार्क्स ने अपनी प्रसिद्ध “1844 की आर्थिक और दर्शनशास्त्रीय पाण्डुलिपियों“ (Economic and Philosophic Manuscripts of 1844) की टीपें लिखीं जिन्हें मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र की आधारभूत मान्यताओं के प्रथम सूत्रीकरण के तौर पर लिया जाता है । इसके पहले 1843 में मार्क्स ने अपनी किताब “हेगेल के कानून के दर्शन की आलोचना में एक योगदान“ (A Contribution to the Critique of Hegel’s Philosophy of Law) लिखी थी जिसकी भूमिका भी 1844 में लिखी गई, जिस पर हम पहले थोड़ी चर्चा कर चुके हैं ।

हेगेल के कानून का दर्शन पर अपनी किताब में मार्क्स ने मानव मुक्ति की समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया था । इस कृति में ही वे क्रांतिकारी रूपांतरण में सर्वहारा की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपने महत्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुंचे थे । इसमें उन्होंने पहली बार यह घोषित किया था कि सर्वहारा एक ऐसी सामाजिक शक्ति है जो मानव मात्र की पूर्ण मुक्ति के काम को संपन्न कर सकती है । इसी में चिंतन और चेतना के क्षेत्र में वे एक बहुत ही क्रांतिकारी महत्व के इस नतीजे पर पहुंचे थे कि “आलोचना का हथियार निश्चय ही आलोचना को हथियार से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है, भौतिक शक्ति को भौतिक शक्ति के जरिये ही उखाड़ फेंका जा सकता है ; लेकिन सिद्धांत भी जैसे ही जनता के हृदय में बस जाते हैं, वे भौतिक शक्ति का रूप ले लेते हैं ।“
(क्रमशः)



मंगलवार, 8 अगस्त 2017

2019 मोद-शाह का वाटरलू साबित होगा

- गुजरात का संदेश



-अरुण माहेश्वरी

अहमद पटेल की जीत ही लाज़िमी थी । जिस सीट को जीतने के लिये 47 विधायकों की ज़रूरत थी, कांग्रेस के पास 57 विधायक थे । फिर भी, मोदी-शाह बदनाम जोड़ी ने अपनी अनैतिकताओं की पूरी ताकत ताकत झोंक कर इसे लाज़िमी-ग़ैर-लाज़िमी के बीच की सीधी टक्कर का रूप दे दिया । पूरी नंगई से विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त में उतर गये । जनता के बीच पूरी ताकत के साथ एक ही बात फैलायी गई कि इसे ही 'संसदीय जनतंत्र' कहते है ।

कांग्रेस ने कैसे अहमद पटेल की इस जीत को सुनिश्चित किया, एनसीपी और जेडीयू के एक-एक विधायक ने उसे कैसे बल दिया, इस पूरी कहानी को सब जानते है । मोदी-शाह के गुंडों, पुलिस और वाघेला की तरह के घुटे हुए सत्ता के दलालों की मार से बचने के लिये उनके विधायकों को गुजरात को छोड़ कर बैंगलोर तक जाना पड़ा ।

इस सीट को लेकर गुजरात में अमित शाह ने जो किया और इधर सभी राज्यों में दूसरे दलों के जन-प्रतिनिधियों को दबाव में लाकर तोड़ने का जो काम मोदी-शाह गिरोह कर रहा है, उसकी गहराई में जाने पर यही कहा जा सकता है कि वे सचेत रूप से जनता में यह संदेश देना चाहते हैं कि संसदीय जनतंत्र में अब जनता की कोई भूमिका नहीं बची है । जनता किसी भी दल के प्रतिनिधि को क्यों न चुने, सबको अंबानी-अडानी की धन शक्ति और मोदी-शाह की राज-शक्ति का गुलाम बन कर ही रहना होगा !


इस प्रकार वास्तव अर्थों में वे राज्य में अपनी सर्वशक्तिमत्ता को स्थापित करके, जन-प्रतिनिधियों को ग़ुलामों में बदल कर पूरी संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को जनता की नज़रों में बिल्कुल लुंज-पुंज और निरर्थक बना दे रहे हैं । ढेर सारे जन-प्रतिनिधियों को सीबीआई, आयकर विभाग इत्यादि के दुरुपयोग से नाना मुक़दमों में फँसा कर उनकी संसदीय निरापदता को मज़ाक़ का विषय बना कर छोड़ दे रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ाई का मतलब यही है कि विपक्ष के जन-प्रतिनिधियों की कोई हैसियत नहीं रहनी चाहिए । जन-प्रतिनिधियों की साख को इस प्रकार सुचिंतित ढंग से गिराना पूरी संसदीय प्रणाली की साख को ही गिराने का एक ऐसा सुनियोजित काम है, जिसकी पृष्ठभूमि में मोदी-शाह-संघ की तिकड़ी अपनी हर प्रकार की असंवैधानिक, ग़ैर-कानूनी या माफ़ियाँ वाली हरकतों को बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चला सके ।

अभी जिस प्रकार मोदी जी के रुतबे को बढ़ाने का अभियान चल रहा है, उसी अनुपात में जनता के सभी व्यक्तिगत प्रतिनिधियों के सम्मान को घटाने की भी समानान्तर प्रक्रिया चल रही है । जिस हद तक जन प्रतिनिधि बौने होते जायेंगे, संसद की अवहेलना करने के लिये कुख्यात एक कोरे लफ़्फ़ाज़ प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व अधिक से अधिक विराट दिखाई देने लगेगा । हिटलर के आगमन की प्रतीक्षा में सालों से लाठियाँ भांज रहे आरएसएस के लोग अब उसी हद तक ढोल-मृदंग बजाते उसकी आरती की तैयारियों के लिये उन्मादित दिखाई देने लगे हैं । इनकी मदद के लिये 'सब चोर है, सब चोर है' का शोर मचाने वाले 'क्रांति वीरों' की एक गाल बजाऊ फ़ौज भी पहले से लगी हुई है ।




वे 2019 की तैयारी में ऐसे तमाम लोगों को अभी से डराने-धमकाने में लग गये हैं जिनमें स्वाधीनता का लेश मात्र भी बचा हुआ हो ताकि 2019 के तूफ़ान के साथ भारत में संसदीय जनतंत्र के पूरे तंबू को ही उखाड़ कर हवा में उड़ा दिया जाए ।

2019 के चुनाव में हर स्तर पर तमाम प्रकार की धाँधलियों के जरिये चुनाव को पूरी तरह से लूट लेने का मोदी-शाह कंपनी ने जो सपना देखना शुरू किया है, उत्तर प्रदेश की जीत के बाद बिहार में अपनी सरकार बनाने और भाजपा से बचे हुए बाकी सभी राज्यों में जनतंत्र के अपने यमदूतों को दौड़ाने का जो सिलसिला शुरू किया गया है, उसमें गुजरात की राज्य सभा की इस एक सीट को जीतने की कोशिश काफी तात्पर्यपूर्ण थी । वें कांग्रेस के उम्मीदवार की सौ फ़ीसदी निश्चित जीत को हार में बदल कर आम लोगों के बीच मोदी-शाह की अपराजेयता का एक ऐसा हौवा खड़ा करना चाहते थे ताकि आगे की उनकी और भी बड़ी-बड़ी जनतंत्र-विरोधी साज़िशों के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई आवाज उठाने की कल्पना भी न कर सके और जनता भी इन षड़यंत्रकारियों को ही अपनी अंतिम नियति मान कर पूरी तरह से निस्तेज हो जाए ।


गुजरात में कांग्रेस दल की सक्रियता और अंतिम समय तक चुनाव आयोग के सामने भी उनकी दृढ़ता ने अमित शाह के इन मंसूबों पर काफी हद तक पानी फेरने का काम किया है । इसमें एनसीपी के एक सदस्य और जेडीयू के एक सदस्य ने भी उनका साथ दिया है । यह प्रतिरोध के एक नये संघर्ष के प्रारंभ का बिंदु साबित हो सकता है । जेडीयू के शरद यादव ने मोदी के दिये गये लालच को ठुकरा कर बिहार की सरज़मीन पर ही कौड़ियों के मोल बिकने वाले नीतीश कुमार को चुनौती देने का बीड़ा उठाया है ।

इधर दूसरे ग़ैर-भाजपाई प्रमुख दलों ने भी भाजपा के खिलाफ संयुक्त अभियान में कांग्रेस के नेतृत्व में एक नये अभियान के साथ अपने को जोड़ने की प्रतिबद्धता का ऐलान किया है । गुजरात की इस पराजय का चंद महीनों बाद ही इस राज्य में होने वाले विधान सभा के चुनावों पर निश्चित तौर पर गहरा असर पड़ेगा । वहाँ वैसे ही जनता के बीच से भाजपा की ज़मीन खिसकने के सारे संकेत मिल रहे हैं । वे इसी जनता की चेतना को कमज़ोर करके और मोदी के चमत्कार को बढ़ा-चढ़ा कर बता कर जीतने के फेर में हैं । कांग्रेस के 43 विधायकों ने अपनी दृढ़ता का परिचय देकर इनके जहाज़ में इतना बड़ा सुराख़ पैदा कर दिया है कि आने वाले गुजरात चुनाव को पार करना भी इसके लिये कठिन होगा ।

कहना न होगा, यहीं से भाजपा के जहाज़ के डूबने का जो सिलसिला शुरू होगा, 2019 का आम चुनाव निश्चित तौर पर मोदी-शाह का वाटरलू साबित होगा । आज के टेलिग्राफ़ में अहमद पटेल की जीत की खबर की बहुत सही सुर्खी लगाई है - 'अमित शाह आया, देखा और फुस्स हो गया' (Amit Shah came, saw & flopped) ।

सोमवार, 7 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (28)


-अरुण माहेश्वरी

धर्म मनुष्य के परायेपन का एक मूल कारक है 

“यहूदी प्रश्न पर'' लेख में ही मार्क्स एक नागरिक समाज में धर्म की स्थिति का जिक्र करते हुए कहते हैं कि “मनुष्य धर्म को सार्वजनिक कानून से निजी कानून में निर्वासित करके खुद को राजनीतिक तौर पर धर्म से मुक्त कर लेता है।... अब धर्म पूरे समुदाय का सारतत्व नहीं रहा बल्कि विभेद का सारतत्व हो गया। यह समुदाय से, स्वयं से तथा अन्य मनुष्यों से मनुष्य के अलगाव की अभिव्यक्ति हो गया है, जैसा कि वह अपने मूल रूप में था।''

धर्म मूलत: मनुष्य के स्वयं से, अन्य मनुष्यों से तथा समाज से अलगाव की अभिव्यक्ति है, इसी सूत्र के साथ मार्क्स ने “परायेपन''(Alienation)  के बारे में अपने विचारों के सूत्रीकरण की ओर कदम बढ़ाया था और इसके साथ ही उस ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि की आधारशिला रखी जिस पर उनके बाद के पूरे जीवन का कृतित्व टिका हुआ है।

“परायेपन'' (Alienation) की बात का उत्स ईसाई और यहूदी धर्मशास्त्र की इस मान्यता में ही है कि जब आदमी ईश्वर कृपा से गिर जाता है तो वह पराया हो जाता है। यह पराया मनुष्य ईसा मसीह के जरिये फिर से ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है। हेगेल ने इस सूत्र के आधार पर चेतना के जरिये परायीकृत मनुष्य की प्रगति का भाववादी द्वन्द्वात्मक सिद्धांत पेश किया था। लेकिन फायरबाख ने इस पूरी अवधारणा को ही उलट कर यह स्थापित किया कि धर्म परायेपन से उबारने के बजाय परायेपन का कारण होता है, यह वास्तविक दुनिया से मनुष्य के अलगाव का प्रतीक और उसकी अभिव्यक्ति है। फायरबाख ईश्वर को ही एक परायीकृत मनुष्य मानते थे।
मार्क्स ने धर्मशास्त्र के दायरे के अंदर की इस बहस से ही “परायेपन'' पद को चुना था और इसे राजनीतिक अर्थशास्त्र के अपने अध्ययन से जोड़कर यह स्थापित किया कि पूंजीवादी समाज में मनुष्य के परायेपन की पहचान की कुंजी उसके परायीकृत श्रम की पहचान में है। आदमी अपने श्रम का मालिक नहीं, बल्कि दास बन जाता है। और मार्क्स इस बात पर बल देते हैं कि इसकी वजह आदमी के श्रम की निजी प्रकृति नहीं, बल्कि समाज-व्यवस्था है।

यहूदी धर्म की आलोचना करते हुए मार्क्स एक जगह लिखते हैं — “सिद्धांत, कला, इतिहास, और एक लक्ष्य के तौर पर स्वयं मनुष्य के प्रति अनादर का भाव, जो यहूदी धर्म में निहित है, वह वास्तविक है, सचेत दृष्टिकोण है, संपत्तिवान आदमी की नैतिकता है । खुद प्राणियों के आपसी संबंध, आदमी और औरत के बीच के संबंध, इत्यादि व्यापार की वस्तु बन जाते हैं ! औरतें खरीदी और बेची जाती है ।“




इसी सिलसिले में मार्क्स यहूदी धर्म और फिर ईसाई धर्म की चर्चा करते हुए अनोखी टिप्पणी करते हैं कि “ईसाईयत जुडाइज्म से पैदा हुई । वह फिर उसीमें विलीन हो गई ।...

“ईसाईयत जुडाइज्म का सूक्ष्म विचार है, जुडाइज्म ईसाईयत का सामान्य व्यवहारिक प्रयोग, लेकिन यह प्रयोग सिर्फ तभी आम हो पाया जब ईसाईयत एक विकसित धर्म के रूप में सैद्धांतिक तौर पर मनुष्य को अपने से और प्रकृति से पूरी तरह अलग कर पाया ।“(MECW, Vol.3, Page – 172-173)

मार्क्स इसमें आगे कहते हैं — “बेचना परायेपन का व्यवहारिक पहलू है । मनुष्य जब तक धर्म की जकड़ में रहता है, वह उसे अपने से परायीकृत रूप दे कर, थोड़ा अनोखा रूप देकर अपनी मूल प्रकृति को वस्तुनिष्ठ बना पाता है ताकि अपनी अहमवादी जरूरत के दबाव में वह व्यवहारिक तौर पर सक्रिय रह सके, और व्यवहार में, अपने से किसी पराये प्राणी के प्रभुत्व में अपने उत्पादों और अपनी सक्रियता के प्रयोग से ऐसी चीजें पैदा कर सके जिन पर एक बिल्कुल अलग तत्व - धन - के महत्व को आरोपित कर सके ।“ (MECW, Vol. – 3, page 174)

धर्म को इस परायेपन की आत्मा कहा जा सकता है। परायेपन का मूल कारण सामाजिक-आर्थिक जीवन में है । धर्म उसी हद तक इस परायेपन से जुड़ा होता है जिस हद तक वह इसे एक वैद्यता का, नैतिकता का, सनातनता का, प्रकृति का और पवित्रता का रूप प्रदान करता है। धर्म से परायेपन को शक्ति मिलती है क्योंकि वह मनुष्य में सांसारिक विषयों के प्रति विराग पैदा करता है, सामाजिक बुराइयों को दैविक बताकर उन्हें न्यायोचित बताता है, गरीबों और उत्पीड़ित जनों को कर्म सिद्धान्त के बल पर वर्तमान के दुखों को अगले जन्म में सुख पाने की खुशी के साथ सहने की शिक्षा देता है। मार्क्स कहते हैं कि इससे एक वर्गों में विभाजित समाज में स्वर्ग और नरक की तरह के विचार अपरिहार्य रूप में पैदा हो जाते हैं क्योंकि उनसे भविष्य में काल्पनिक न्याय की आशा बंधती है तथा वर्तमान में वास्तविक न्याय पाने की इच्छा खत्म होती है। वर्ग विभाजित समाज में धर्म विभाजन को स्थायी तथा द्वेष को स्वाभाविक बनाता है।

इसीलिए धर्म के बारे में मार्क्स की समग्र आलोचना के ढांचे में जहां धर्म से निपटने के लिए धर्म को पैदा करने वाली सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की आलोचना का असीम महत्व है, वहीं स्वयं धर्म की विचारधारा की आलोचना का भी अपना स्थान है। लेकिन धर्म के खिलाफ धावा बोलने के जोश में यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को बदलने का संघर्ष ही वास्तव अर्थों में धर्म की जड़ों पर प्रहार करने वाला संघर्ष है। अफीम के नशे में कल्पना लोक में विचरण करता हुआ मनुष्य अपने जीवन की मुसीबतों के बोझ को उठा लेता है। मनुष्य को इस कल्पना लोक से धरती पर सिर्फ पाठ पढ़ा कर नहीं उतारा जा सकता है, सिर्फ वैचारिक अभियान से उसे सारे भ्रमों से मुक्त नहीं किया जा सकता है, बल्कि उन परिस्थितियों को बदलना होगा जो भ्रमों को जीवन के लिए अनिवार्य बनाती है।



मार्क्स द्वारा धर्म की आलोचना के एक समग्र ढांचे की तस्वीर पेश करने के उद्देश्य से ही यहां मार्क्स और एंगेल्स की प्रसिद्ध कृति “जर्मन विचारधारा''(1846)  से एक अंश को उद्धृत करना भी प्रासंगिक होगा जिसमें मार्क्स कहते हैं, “नैतिकता, धर्म, आध्यात्म, विचारधारा की अन्य सभी बातों तथा चेतना के उनके मेल खाते रूप अब अपनी स्वतंत्र हैसियत का दिखावा गंवा चुके हैं। उनका अपना कोई इतिहास, कोई विकास नहीं है, बल्कि मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन के विकास तथा अपने भौतिक आदान-प्रदान के जरिये अपने वास्तविक अस्तित्व के साथ ही अपनी सोच तथा अपनी सोच के उत्पादों को बदला करता है।''

गैलेलियो की मृत्यु के लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष बाद रोमन कैथोलिक चर्च उनकी खोज को स्वीकार कर उन्हें फिर से स्थापित करता है, यह अकेला तथ्य ही धर्म और उसकी समस्याओं के भौतिक यथार्थ के विकास के काफी पीछे घिसटते हुए चलने की वास्तविकता को दर्शाता है। यही सच्चाई है कि आदमी की बौद्धिकता का इतिहास उत्पादन और उत्पादन संबंधों के इतिहास से अलग करके नहीं लिखा जा सकता। इसी प्रकार मानसिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का भी कोई कार्य भौतिक जीवन की यथार्थ परिस्थितियों में परिवर्तन से काट कर सम्पन्न नहीं हो सकता। धर्म के अंत के लिए सिर्फ विज्ञान की नहीं, सामाजिक क्रांति की भी जरूरत है।

धर्म यदि सिर्फ एक बौद्धिक विकृति ही होती तो उसे एक भ्रम या झूठ साबित करके ही समाप्त किया जा सकता था। चूंकि मार्क्स ऐसा नहीं मानते इसीलिए वे सांस्कृतिक परिवर्तन की तरह ही धर्म के क्षेत्र में परिवर्तन को भी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के साथ जोड़ कर देखने पर बल देते हैं। विचारों के किसी भी इतिहास को उसे बनाने वाले मनुष्य के भौतिक इतिहास से काटकर देखना एक कोरी कल्पना या अटकलबाजी के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।

(क्रमशः)

रविवार, 6 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (27)


-अरुण माहेश्वरी

धर्म-निरपेक्षता (लौकिकता) की कमियों की अभिव्यक्ति है धर्म

यहूदी प्रश्न पर इस लंबे विमर्श के बाद ही मार्क्स ने धर्म और राज्य के संबंधों की वस्तुनिष्ठ ढंग से जांच शुरू की और उस क्रम में उन्होंने जो विचार पेश किए वे धर्म के खिलाफ वास्तविक संघर्ष के बारे में मार्क्स की मूलभूत अवधारणा को अच्छी तरह व्यक्त करते हैं।

उत्तरी अमरीका के स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राज्यों में भी धर्म के फलने-फूलने की वास्तविकता के उदाहरण से वे यह सवाल उठाते हैं कि “धर्म के साथ पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता का क्या संबंध है? यदि हम यह देखते हैं कि पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता वाले देश में भी धर्म सिर्फ कायम ही नहीं है बल्कि एक नयी और जबरदस्त शक्ति का परिचय दे रहा है तो यह इस बात का प्रमाण है कि धर्म का अस्तित्व राज्य के आदर्श रूप का अंतर्विरोधी नहीं है। फिर भी चूंकि धर्म का अस्तित्व एक दोष के अस्तित्व का प्रमाण है, इस दोष के उत्स की तलाश में राज्य के चरित्र को टटोला जा सकता है। हम अब धर्म को कारण नहीं,  बल्कि धर्म-निरपेक्षता (लौकिकता- अ.मा.) की कमियों की अभिव्यक्ति मानते हैं। इसीलिए हम स्वतंत्र नागरिकों की धार्मिक सीमाओं को उनके लौकिक जीवन की सीमाओं से व्याख्यायित करते हैं। हम यह मांग नहीं करते कि अपने लौकिक जीवन की सीमाओं से उबरने के लिए उन्हें अपनी धार्मिक संकीर्णताओं से मुक्त होना होगा। हम लौकिक प्रश्नों को धर्मशास्त्रीय प्रश्नों में तबदील नहीं करते। हम धर्मशास्त्रीय प्रश्नों को लौकिक प्रश्नों में तब्दील करते हैं। इतिहास लम्बे काल से अंधविश्वासों में निमज्जित रहा है, अब हम इतिहास में अंधविश्वासों को निमज्जित करते हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ धर्म के संबंध का प्रश्न हमारे लिए राजनीतिक स्वतंत्रता से मानवीय स्वतंत्रता के संबंध का प्रश्न बन जाता है।''(MECW, Vol. -3 , page 150)

“इसीलिए यह संभव है कि राज्य अपने को धर्म से मुक्त कर ले फिर भी भारी बहुमत धार्मिक रह जाए।... राज्य की धर्म से मुक्ति का अर्थ वास्तविक मनुष्य की धर्म से मुक्ति नहीं है।''(MECW, Vol. -3 , page 152)


इन्हीं तर्कों के आधार पर राज्य और समाज के संबंधों के बारे में प्रचलित धारणाओं पर मार्क्स ने सवालिया निशान लगाए। समाज में धर्म के स्थान पर भी प्रचलित विचारों का दोष उन्हें साफ दिखाई देने लगा। राजनीतिक मुक्ति एक महान प्रगति होने पर भी उतनी महान नहीं है जितना बावर और अन्य दावा करते हैं। बावर का कहना था कि यदि सभी नागरिकों को समान नागरिक अधिकार मिल जाएं तो समाज में न्याय की प्रतिष्ठा हो जायेगी, लेकिन मार्क्स को समाज और राज्य का अस्तित्व इस प्रकार एकमेव नहीं दिखाई दे रहा था। उन्होंने स्वतंत्र राज्यों की सच्चाई को पहचानते हुए समझा कि इनमें राज्यों की मुक्ति का सार बुर्जुआ की सत्ता है। एक राज्य के मुक्त होने पर ही उसके सभी नागरिक मुक्त नहीं हो जाते। एक जनतांत्रिक राज्य बाहर से धर्मनिरपेक्ष होने पर भी अंदर से धार्मिक हो सकता है क्योंकि धर्म उस राज्य के नागरिकों का आदर्श, उनकी अलौकिक चेतना है।

बावर समझते थे कि सभी चर्चों को खत्म कर दो, धर्म खत्म हो जायेगा लेकिन मार्क्स ने कहा कि तब भी धर्म रह जायेगा। अपने आप में राजनीतिक स्वतंत्रता न सामाजिक स्वतंत्रता ही प्रदान करती है और न धर्म से स्वतंत्रता। इसीलिए सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटने से काम नहीं चल सकता। एक यहूदी राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र होकर भी एक पक्का यहूदी हो सकता है अर्थात् राजनीतिक स्वतंत्रता ही मानवीय स्वतंत्रता नहीं है। सिर्फ राजनीतिक ढांचे को नहीं समाज के समूचे अन्त:सार को बदलना होगा।

यह था मार्क्स के विचारों के विकास का क्रम। धर्म की आलोचना से वे राजसत्ता और पूरे समाज की आलोचना की ओर बढ़े थे। मनुष्य धर्म को बनाता है लेकिन इसलिए क्योंकि उसे इसकी आवश्यकता होती है, आवश्यकता इसलिए क्योंकि वह एक ऐसी समाज व्यवस्था में रह रहा है जिसमें सबकुछ गड्ड-मड्ड है। धर्म सामाजिक जीवन की बीमारी का लक्षण है। वह रोगी को ऐसी व्यवस्था को सहने की शक्ति देता है जो अन्यथा असहनीय है। चूंकि यह बीमारी को सहनीय बनाता है इसीलिए बीमारी के निदान की कोशिश और उसकी इच्छा-शक्ति को ही कुंद कर देता है।

यहां “यहूदी प्रश्न पर'' हमने इतने विस्तार के साथ इसलिए चर्चा की, क्योंकि इसी लेख में मार्क्स धर्म की ऐसी समग्र आलोचना की रूपरेखा पेश करते हैं जो आगे मार्क्स के पूरे चिंतन में स्थायी तौर से एक स्वयं-सिद्ध अवधारणा के रूप में कायम हो जाती है। इस लेख में मार्क्स धर्म को महज एक तात्विक प्रश्न के बजाय, सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न के रूप में विवेचित करते हैं। इसके अलावा यह भी उल्लेखनीय है, मार्क्स ने यह लेख 1843 की पतझड़ में लिखा था और इसके बाद 1843 के अंत और 1844 के जनवरी महीने में उन्होंने “हेगेल के कानून के दर्शन की आलोचना में योगदान'' की वह प्रसिद्ध भूमिका लिखी थी जिसमें मार्क्स की यह उक्ति आयी थी कि “धर्म उसी प्रकार उत्पीड़ित प्राणी की आह, हृदयहीन विश्व का हृदय है जिस प्रकार आत्माविहीन परिस्थिति की आत्मा है । यह जनता की अफीम है।''(MECW, Vol. -3 , page 175)


इसके पहले वे गैर-धार्मिक आलोचना के बारे में शानदार विश्लेषण करते हुए कहते है — “गैर-धार्मिक आलोचना का आधार हैः मनुष्य ने धर्म को बनाया है, धर्म ने मनुष्य को नहीं । धर्म उस मनुष्य की आत्म- चेतना और आत्म-सम्मान है जिसने या तो अब तक अपने को पाया नहीं है या फिर से अपने को खो दिया है । लेकिन मनुष्य दुनिया के बाहर रहने वाला कोई अमूर्त प्राणी नहीं है । मनुष्य, राज्य, समाज की दुनिया मनुष्य है । यह समाज, यह राज्य धर्म की एक उल्टी विश्व-चेतना की उत्पत्ति करता है । धर्म उस दुनिया का सामान्य सिद्धांत है, उसका विश्वकोशीय सार-संग्रह, एक लोकप्रिय रूप में उसका तर्क, उसका आध्यात्मिक तरीके का सम्मान, उसका उत्साह, उसका नैतिक बल, उसका गाम्भीर्य, सांत्वना और औचित्य का उसका सार्वलौकिक स्रोत है। यह मानवीय सार की एक अनोखी उपलब्धि है क्योंकि मानवीय सार का कोई वास्तविक सत्य नहीं है । इसीलिये धर्म के खिलाफ संघर्ष परोक्ष रूप से उस दुनिया के खिलाफ लड़ाई है जिसमे धर्म उसकी आध्यात्मिक सुरभि है।“
इसके बाद ही मार्क्स का उपरोक्त कथन आता है — “धर्म उसी प्रकार उत्पीड़ित प्राणी की आह, हृदयहीन विश्व का हृदय है जिस प्रकार आत्माविहीन परिस्थिति की आत्मा है । यह जनता की अफीम है।''  (MECW, Vol. -3 , page 175)

'यहूदी प्रश्न पर' तथा 'हेगेल के कानून के दर्शन की आलोचना में योगदान' की भूमिका, ये दोनों लेख एक ही पत्रिका में एक साथ 1844 में  प्रकाशित हुए थे। इसीलिए “यहूदी प्रश्न पर'' लेख में मार्क्स के धर्म के बारे में विचार “धर्म जनता की अफीम'' के मार्क्स के प्राय: स्वयंसिद्ध कथन के पूरक का काम करते हैं और इनके बीच से ही मार्क्स की परवर्ती पूरी चिंतन विधि की भी तस्वीर उभरने लगती है। इन्हीं लेखों से मार्क्स के धर्म के बारे में विचार राजसत्ता के चरित्र के बारे में, सामाजिक व्यवस्था के बारे में, अर्थव्यवस्था के बारे में विचार की  ओर मुड़ जाते हैं। ब्रुनो बावर के आत्मनिष्ठ भाववाद पर 1844 में ही मार्क्स ने एंगेल्स के साथ मिलकर एक पूरी पुस्तक  “पवित्र परिवार'' लिखी और अपनी भौतिकवादी स्थापनाओं को और स्पष्ट किया।
(क्रमशः)

शनिवार, 5 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (26)


-अरुण माहेश्वरी

मार्क्स और यहूदी प्रश्न

हेगेल के भाववाद से मुक्त भौतिकवादी मार्क्स के लिए धर्म अब झूठ है या सच है की तरह का कोई प्रतिपाद्य विषय नहीं रह गया था। धर्म के झूठे या सच्चे होने के बजाय अब मार्क्स के लिए धर्म की सामाजिक भूमिका प्रमुख हो गयी थी। मार्क्स के दृष्टिकोण में आये इस परिवर्तन में एक संपादक और पत्रकार के रूप में उनके तमाम अनुभवों की काफी अहम भूमिका रही।

8 अक्टूबर 1842 में वे “राइनिश जेइतुंग'' पत्रिका के संपादक बने। इसके पहले तक इस अखबार की स्थिति यह थी कि इस पर यंग हेगेलियन एडगर बावर और “द फ्री'' कहलाने वाले लफ्फाजों ने कब्जा जमा रखा था। मार्क्स इनकी धर्म के विरुद्ध लफ्फाजी की थोथी बहसों को पहचानने लगे थे और उन्हें लगने लगा था कि ये लोग उग्र बातों के आवरण में अपने दर्शन की अस्पष्टता और उसके बेतुकेपन को छिपाने की कोशिश करते हैं।


आरनोल्ड रूज को उन्होंने लिखा “मैं चाहता था कि धर्म की आलोचना राजनीतिक परिस्थिति की आलोचना में अधिक की जानी चाहिए न कि धर्म की आलोचना के अंतर्गत राजनीतिक परिस्थिति की आलोचना। यही दृष्टिकोण किसी भी अखबार की प्रकृति और जनता की शिक्षा के स्तर के लिहाज से अधिक उपयुक्त है, क्योंकि धर्म की स्वयं में कोई अंतर्वस्तु नहीं होती। वह स्वर्ग के बल पर नहीं, बल्कि धरती के बल पर जीवित है तथा उस विकृत यथार्थ की समाप्ति के साथ ही स्वत: गिर जाता है जिस यथार्थ का यह सैद्धांतिक रूप है। अंत में, मैं यह चाहता था कि यदि दर्शन के बारे में बात करनी हो तो “नास्तिकता'' की चिप्पी के साथ छिछोरापन अधिक नहीं होना चाहिए, (यह हमें उन बच्चों की याद दिला देता है जो उन्हें सुनने के लिए तैयार हर किसी को यह कहते रहते हैं कि उन्हें भूत-प्रेत से डर नहीं लगता) बल्कि दर्शन की अंतर्वस्तु को लोगों के सामने लाना चाहिए।“


धर्म के बारे में मार्क्स का यह कथन उनके विचारों में एक बहुत बड़े मोड़ का सूचक था। 1839 से 1843 तक पूरे पांच वर्षों तक धर्म के विषय से लगातार टकराते हुए, एक पत्रकार और संपादक के अनुभवों से मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुँच गये थे कि धर्म की बेसिर-पैर की बातों के तर्कपूर्ण जवाब मात्र से ही समाज को धर्म रूपी बीमारी से मुक्त नहीं कराया जा सकता। धर्म स्वर्ग के बल नहीं, धरती के बल जीवित है और समाज की पार्थिव जरूरतों की पूर्ति करके ही वास्तव में धर्म की जरूरत से मुक्ति पायी जा सकती है।

इन्हीं दिनों लिखी गयी मार्क्स की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति “यहूदी प्रश्न पर'' (On the Jewish Question) का इस संदर्भ में विस्तार से जिक्र करना और भी प्रासंगिक होगा। धर्म और नागरिक जीवन से उसके संबंध के प्रश्न पर मार्क्स के दृष्टिकोण का खुलासा करने वाली यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। मार्क्स ने यह लम्बा लेख ब्रुनो बावर के दो लेखों के जवाब में लिखा था। बावर ने यहूदियों की मुक्ति की समस्या को यहूदी धर्म से उनकी मुक्ति की समस्या बना दिया था। एक भाववादी विचारक के रूप में बावर धार्मिक पूर्वाग्रह से उबरने को ही तमाम राष्ट्रीय अंतर्विरोधों की समाप्ति का निर्णायक उपाय मानते थे। बावर के तर्कों की धज्जियां उड़ाते हुए मार्क्स ने पूरी समस्या पर भौतिकवादी दृष्टि से विचार किया और सिर्फ यहूदियों को नहीं, पूरी मानवता को ही आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक बेड़ियों से आजाद करने की बात की थी।


यहूदी प्रश्न पर बावर की यह मान्यता थी कि यहूदियों की वर्तमान बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार राज्य का ईसाई चरित्र है और उस वक्त तक किसी राज्य को उसके धार्मिक चरित्र से मुक्त नहीं किया जा सकता है जब तक उस राज्य के सभी नागरिक धर्म को त्याग नहीं देते। यहूदी यदि समानता का अधिकार चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी यह है कि पहले वे खुद यहूदी धर्म को त्यागे और उनके साथ ही दूसरे तमाम लोग भी अपने-अपने धर्मों को त्याग दें। धर्म-निरपेक्ष राज्य का समाज भी धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए।

“जर्मनी के यहूदी आजादी चाहते हैं। वे किस प्रकार की आजादी चाहते हैं? नागरिक, राजनीतिक आजादी?“ ब्रुनो उनसे कहते हैं '' जर्मनी में राजनीतिक तौर पर कोई आजाद नहीं है। जब हम खुद ही स्वतंत्र नहीं हैं तो आप कैसे स्वतंत्र होंगे? आप यहूदी यदि यहूदी के नाते अपने लिए किसी प्रकार की विशेष स्वतंत्रता चाहते हैं तो आप अहमवादी हैं।''(MECW, Vol.-3 , page 146)

“यहूदी ईसाई राज्य से मांग करते हैं कि वह अपने धार्मिक पूर्वाग्रह को त्याग दें, तो क्या यहूदी ने अपने धार्मिक पूर्वाग्रह को त्याग दिया है?''

“अपनी प्रकृति से ही ईसाई राज्य यहूदियों को स्वतंत्रता देने में असमर्थ है लेकिन अपनी प्रकृति से यहूदी भी स्वतंत्र नहीं हो सकता। जब तक राज्य ईसाई है तथा यहूदी यहूदी है, एक आजादी देने में असमर्थ है तथा दूसरा उसे हासिल करने में असमर्थ है।''(MECW, Vol.-3 , page 146-147)

ब्रुनो बावर

बावर के इन तमाम तर्कों का हवाला देने के बाद मार्क्स ने अपने लेख में यह सवाल किया था कि “तब बावर के लिए यहूदी समस्या का समाधान क्या है? क्या फल निकला? कहावत है कि प्रश्न उठाना ही समस्या का समाधान होता है। यहूदी प्रश्न की आलोचना ही यहूदी प्रश्न का जवाब है। इसीलिए मुख्तसर में निष्कर्ष यह निकला, दूसरों को आजाद करने के पहले हमें खुद को आजाद करना होगा।“(MECW, Vol.-3 , page 147)

इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए मार्क्स लिखते हैं कि “यदि बावर यहूदियों से पूछते हैं- क्या आपको अपने ही मत के मुताबिक राजनीतिक स्वतंत्रता चाहने का अधिकार है? तो उलट कर हमारा प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक स्वतंत्रता का मत यह अधिकार देता है कि यहूदियों से यहूदी धर्म के खात्मे की मांग की जाय तथा मनुष्य से धर्म के खात्मे की मांग की जाय।''(MECW, Vol.-3 , page 150)

(क्रमशः)

सचमुच आज जो सीपीआई (एम) में चल रहा है, वामपंथी आंदोलन से हमदर्दी रखने वाले तमाम लोगों के लिये बेहद चिंताजनक है


फेसबुक पर चली एक चर्चा का ब्यौरा 



-अरुण माहेश्वरी

4 अगस्त को अपने 'चतुर्दिक' ब्लाग पर हमने लिखाः

“क्या सीपीएम में बहुमतवादियों ने पार्टी को फिर एक बार तोड़ने का निर्णय ले लिया है?“

“ऐसा लगता है कि सीपीआई(एम) में प्रकाश करात के नेतृत्व में बहुमतवादियों ने भाजपा के खिलाफ एकजुट प्रतिरोध में कांग्रेस को शामिल करने के मामले में चल रहे मतभेदों को उनकी अंतिम परिणति तक ले जाने, अर्थात पार्टी को तोड़ डालने तक का निर्णय ले लिया है ।

“पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डेमोक्रेसी' में, जिसके संपादक प्रकाश करात है, बिहार में नीतीश के विश्वासघात के प्रसंग में निहायत अप्रासंगिक तरीक़े से कांग्रेस को घसीट कर यह फैसला सुनाया गया है कि भाजपा के खिलाफ ऐसा कोई भी संयुक्त प्रतिरोध सफल नहीं हो सकता है जिसमें कांग्रेस दल शामिल होगा ।

“इसमें कांग्रेस को नव-उदारवादी नीतियों को लादने के लिये मुख्य रूप से ज़िम्मेदार बताते हुए कहा गया है कि भाजपा को हराने के लिये जरूरी है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता के साथ ही नव-उदारवाद से भी लड़ा जाए ।

“हमारा इन 'सिद्धांतकारों' से एक छोटा सा सवाल है कि नव-उदारवाद से उनका तात्पर्य क्या है ? क्या यह इक्कीसवी सदी के पूँजीवाद से भिन्न कोई दूसरा अर्थ रखता है ? तब क्या फासीवाद-विरोधी किसी भी संयुक्त मोर्चे की यह पूर्व-शर्त होगी कि उसे पूँजीवाद-विरोधी भी होना पड़ेगा ? क्या मार्क्सवादी सिद्धांतकारों ने फासीवाद को पूँजीवाद के दायरे में भी एक अलग स्थान पर नहीं रखा था ? स्टालिन ने जब कहा था कि जनतंत्र के जिस झंडे को पूँजीवाद ने फेक दिया है, उसे उठा कर चलने का दायित्व कम्युनिस्टों का है, तब क्या वे प्रकारांतर से पूँजीवाद की ताक़तों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की पैरवी ही नहीं कर रहे थे ?

“दरअसल, सीपीआई(एम) का यह बहुमतवादी धड़ा शुद्ध गुटबाज़ी में लगा हुआ दिखाई देता है जो एक सैद्धांतिक संघर्ष की आड़ में पार्टी की पिछली कांग्रेस में सीताराम येचुरी को महासचिव बनाये जाने की अपनी पराजय का आगामी कांग्रेस में प्रतिशोध लेना चाहता है । इसके लिये थोथी लफ़्फ़ाज़ी के जरिये वह अभी जो खेल खेल रहा है, कहना न होगा, वह पार्टी को अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिये विभाजित कर देने तक की हद तक चले जाने के उन्माद की दशा में पहुंचता जा रहा है । पार्टी के अख़बारों का इस प्रकार की झूठी अंदरूनी सैद्धांतिक लड़ाई में खुल्लम-ख़ुल्ला प्रयोग करना कुछ इसी प्रकार के संकेत देता है ।

“इसे भूला नहीं जा सकता है कि प्रकाश करात ने ही पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में यह लिखा था कि वे अभी भाजपा को फासीवादी नहीं कहेंगे । इस पर भारी विवाद हुआ था, लेकिन किसी भी सवाल का जवाब देने के बजाय वे चुप्पी साध कर बैठे रहे थे ।“

हमने इसे फेसबुक पर भी साझा किया । स्वभाविक तौर पर हमारी इस टिप्पणी को कुछ और मित्रों ने भी साझा किया और कुछ मित्रों ने विषय को और भी खोलने के उद्देश्य से कुछ भी सवाल उठायें । खास तौर पर Santosh Kumar Jha जी के वाल पर ।

अच्युत ठाकुर जी ने कांग्रेस दल के बारे में कुछ वाजिब सवाल उठाते हुए लिखा कि “जहां तक सीपीआइम का प्रश्न है-उसमें नीचे से ऊपर तक सुदृहड़ आंतरिक प्रजातन्त्र है! राजनीतिक परिस्थियों के परिपेक्ष्य में- कार्ययोजना में सुधार हेतु स्वस्थ बहस को आप जैसे बौद्धिक-चिंतक का गुटबाज़ी कह कर प्रचारित करना, अनुचित ओर अस्वीकार्य है! शोषल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रिया देना मुझे आपके स्तर से इतर लगता है! हो सकता है मेरी समझदारी में कुछ कमी हो? लेकिन समीक्षा ओर आत्म आलोचना आवश्यक मानता हूं! आपकी विश्लेषणात्म वा विस्तृत टिप्पणी की प्रतीक्षा रहेगी!“

इसपर हमारा संक्षिप्त सा जवाब था कि “मेरे अनुसार सोशल मीडिया का इससे बेहतर इस्तेमाल नहीं हो सकता । आज किसी भी पार्टी का कोई भी विषय उसके कथित 'आंतरिक जनतंत्र' की सीमाओं का मुँहताज नहीं है ।

बाक़ी विषय पर मैं नहीं समझता कोई सफ़ाई देने की ज़रूरत है । हम भाजपा और कांग्रेस को समतुल्य नहीं मानते । इसीलिये दोनों से समान व्यवहार के किसी भी विचार को ग़लत मानते हैं । और जहाँ तक गुटबाज़ी का सवाल है, इस ग़लत समझ को पार्टी कांग्रेस में लिये गये फ़ैसले पर अमल के नाम पर ज़बर्दस्ती चलाने की कोशिश के पीछे दूसरी कोई मंशा नहीं हो सकती है ।“

इसके बाद Mukesh Aseem जी लिखते हैं - “प्रकाश करात तो नहीं कह रहे, कह भी नहीं सकते, लेकिन आज पूँजीवाद विरोध के बगैर फासीवाद से नहीं लडा जा सकता, यह सच है क्योंकि पूँजीवाद में आज ऐसी कोई शक्तियाँ शेष नहीं जो फासीवादी नीति से मूलतः असहमत हों। यही वजह है कि हर बुर्जुआ पार्टी की सरकार में फासीवादी शक्तियाँ सत्ता तंत्र में मजबूती से घुसपैठ करती रही हैं और आज हर सत्ता संस्था उनके कब्जे में है।“

हमने एक पंक्ति में लिखा — “जरा सोचिए, आपकी बात से कोई भी इसी नतीजे पर पहुँचेगा कि फासीवाद से लड़ा ही नहीं जा सकता है ।“
उनका तुरंत जवाब था — “हाँ, पूँजीपतियों के सहयोग से नहीं लडा जा सकता।“

हमने लिखा — “अब आपने पूंजीवाद को व्यक्ति का जामा पहना दिया है । किसी भी क्रांतिकारी लड़ाई में नाना प्रकार के स्वार्थ के चलते कितने तत्व इकट्ठा हो जाते है, इसे अलग से बताने की जरूरत नहीॆ है । ऐसे तत्व संघर्ष की तात्विकता को नहीं बदल सकते ।“

मुकेश जी फिर लिखते हैं — “व्यक्ति की बात नहीं है। लम्बे समय तक पूँजीपति वर्ग की सबसे विश्वस्त रही पार्टी के साथ फासीवाद से लडने की सोच पर सवाल है जबकि यह पार्टी वर्तमान में शासन करती फासिस्ट पार्टी की किसी नीति से कोई मूल असहमति नहीं रखती। इसका मजदूर वर्ग के आंदोलनों को बेरहमी से कुचलने और कार्यकर्ताओं की हत्यायें करवाने का भी लम्बा इतिहास है।“

तब थोड़ा और विस्तार देते हुए हमने लिखा — “आप के अनुसार वामपंथियों को किसी से हाथ नहीं मिलाना चाहिए । पार्टियों के बारे में लेनिनवादी समझ कहती है कि वे प्रत्येक किसी ख़ास वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । सीपीएम के अलावा जो भी पार्टी है, वह किसी न किसी रूप में सर्वहारा के हितों से समझौता कर रही है । फिर उनसे मिल कर संयुक्त मोर्चा की रणनीति का सोच बुनियादी रूप से ग़लत कहलायेगा । ऊपर ट्राटस्कीपंथी राजेश त्यागी की बातों से आपकी बात का देखिए कैसे मेल बैठ जाता है । गुटबाज़ी हमेशा इसीप्रकार की विचारधारात्मक शुद्धता की आड़ में सामने आती है । सीपीएम में शुद्ध रूप से यही हो रहा है ।“

इसी बीच Akhilesh Prabhakar जी ने टिप्पणी की — “ मोदी रथ को रोकने के नाम पर कांग्रेस और छोटी बुर्जुआ पार्टियों के साथ वामदलों का सहयोग इस बात पर निर्भर करता है कि ऐसे राजनीतिक दल दृढ़ता के ''हिंदुत्व-फासीवाद'' के खिलाफ लड़ाई में वामदलों के साथ जनांदोलनों में कितनी भागीदार होती है... सिर्फ चंद नेताओं द्वारा मीडिया में बयानबाजी करने से फासीवाद का मुकाबला नहीं किया जा सकता. प्रकाश करात के बारे में अरूण माहेश्वरी की प्रतिक्रिया का स्तर बहुत ही निम्न (ओछे) दर्जे का है जो भरम फ़ैलाने वाला है...“

हमने उन्हें सिर्फ इतना ही कहना उचित समझा — “जब हम इतनी ही साफगोई से मोदी, नीतीश या किसी के बारे में प्रतिक्रिया देते हैं, तब वह 'निम्न दर्जे ' की नहीं होती है !“

इसके बाद ही बंधुवर Ganesh Tiwari जी ने लिखा — “ज्यादा कुछ नहीं मालूम, लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि हम 1980 से पार्टी में मैं इसलिए नहीं आया था कि कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के साथ वाम जाए। क्षेत्रीय दलों को मजबूत करने के लिए अपना अस्तित्व दांव पर लगा दे। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़कर लेफ्ट और माकपा ने क्या हासिल कर लिया? अरुण माहेश्वरी से असहमत होते हुए एक बात साफ समझ में आती है वह सिर्फ यह है कि अपनी ताकत और विचारों पर दृढ़ रहे बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता। कांग्रेस में होंगे धर्मनिरपेक्ष लोग, अभी सिर्फ लम्पटों और नव उदारवाद के समर्थकों का जमावड़ा है।“

हमने इस पर जरा विस्तार से टिप्पणी की — “यही वह समूह है जिसने यूपीए-1 से निकल कर वामपंथ के 'अभूतपूर्व विस्तार' की दिशा में छलाँग लगाई थी । इसके पहले के ज्योति बसु वाले प्रसंग को तो भूला ही नहीं जा सकता है जब केंद्रीय कमेटी में बहुमत जुटा कर भारतीय राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई से वामपंथ को हमेशा के लिये अलग कर लिया गया था और प्रकारांतर से इसकी लगाम को भाजपा के सुपुर्द करने का महान कृत्य किया गया ।

"कोई भी दल सत्ता में हो, परिस्थिति अंतर्विरोधों से रहित नहीं रह सकती । उसकी दरारों में हमेशा बदलाव के लक्षणों को पाया जा सकता है । संसदीय राजनीति में जनवादी ताक़तों की कार्यनीति की भूमिका यह है कि उन दरारों का लाभ कैसे क्रमश: प्रगतिशील शक्तियों के पक्ष में उठाया जाए न कि प्रतिक्रियावादियों को उनका लाभ उठाने की अनुमति दी जाए । कार्यनीति कभी भी तथाकथित शुद्धतावाद की बहादुरी से तय नहीं की जाती है । शुद्धतावाद आपको पार्टी में गुटबाज़ी के लिये एक आड़ तो प्रदान कर सकता है, कभी किसी दल के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की अनुमति नहीं दे सकता । जैसा कि ट्राटस्कीपंथियों की लंबी-चौड़ी, लेकिन खोखली दलीलों में देखा जा सकता है ।

"कार्यनीति का मतलब ही है राजनीति में अपने वर्तमान के हित को साधो, अपने मित्रों के दायरे को बढ़ाओ । और जो अपने वर्तमान को नहीं साध सकते वे भविष्य के लिये भी किसी काम के नहीं रहते हैं । जिस महान नैतिकता के लक्ष्य के लिये ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया और फिर भारत को साम्राज्यवाद से मुक्त करने के जिस महान लक्ष्य के लिये यूपीए-1 से समर्थन वापस लिया गया, भारतीय वामपंथ उन्हीं 'शौर्य गाथाओं' के खोखलेपन का भुक्त भोगी है । आज फिर सीपीएम में ये बहुमतवादी अपनी गुटबाज़ी के स्वार्थ में उसी प्रकार का थोथी वीरता के प्रदर्शन वाला डान क्विगजोटिक खेल खेल रहे हैं ।

"नव-उदारवाद से लड़ाई का जो अर्थ पश्चिम के विकसित साम्राज्यवादी देशों में है, भारत की तरह के विकासशील देश में नहीं है । अमेरिका में ओबामा केयर के लिये लड़ाई भी नव-उदारवाद के खिलाफ लड़ाई है । यह वहाँ विकसित हुए व्यापक सामाजिक सुरक्षा के नेटवर्क की रक्षा की लड़ाई है जिसके हवाले से पश्चिम के बुद्धिजीवी इन विकसित देशों को साम्यवाद से सिर्फ एक कदम पीछे बताने की तरह की व्याख्याएँ भी किया करते है। उस लड़ाई को गोरक्षा, लिंचिंग और राममंदिर में अटके हुए भारत की लड़ाई बताना स्वयं में एक बहुत बड़ी विच्युति है ।“

आगे Shiv Shanker Gehlot जी की स्वीकृतिमूलक टिप्पणी थी — “जी आपने सब बातों को खोल कर बयान कर दिया है। ये बड़े बड़े नाम मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, ट्राटस्की और भारी भरकम टर्म्स बुर्जुआ, सर्वहारा, फासीवादी + पूंजीवादी के इस्तेमाल करके एक जर्जर और निष्फल राजनीति को महान दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। मैने हरिकिशन सिंह सुरजीत को कभी ऐसी भारी भरकम भाषा या शब्दों का इस्तेमाल करते नहीं सुना पर उनके समय में वामपंथ की प्रासंगिकता बनी हुई थी। करात ने तो इसे अप्रासंगिक बनाया है। अभी भी सिद्धांत के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करके वामपंथ को समूल नष्ट करने का काम करेंगें ये लोग ।“

हमने उनके कथन को और भी साफ करते हुए लिखा — “दुनिया के सारे छुद्र काम महत उद्देश्यों के नाम पर ही किये जाते हैं । मार्क्स दांते की इन पंक्तियों को उद्धृत किया करते थे - 'नरक का रास्ता नेक इरादों से पटा हुआ है ' ।

जनतंत्र पर तंज करता हुआ इक़बाल का यह मशहूर शेर है -
'जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में
बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते'

सीपीएम के बहुमतवादी प्रकाश करात के नेतृत्व में पार्टी के अंदर इसी प्रकार के जनतंत्र को साधने में लगे हुए हैं। इन्हें ऐतिहासिक क्षणों में भी शुद्ध संख्याबल पर निर्णय लेने में कोई संकोच नहीं होता और उसे 'आंतरिक जनतंत्र' की जीत बता कर डुगडुगी बजाते हैं ।

चंद रोज पहले इन्होंने आरएसएस के बारे में सारे अध्येताओं के परिश्रम को धत्ता बताते हुए यह बयान दे दिया कि इन्हें नहीं लगता कि भाजपा को अभी फासीवाद कहा जाएँ ! यही तो है 'हार्वर्ड बनाम हार्ड वर्क' का वामपंथी संस्करण । जो दक्षिणपंथी समूह अपने जन्म काल से ही तात्विक संरचना में फासीवादी है, उसे प्रकाश जी ने अपनी अनुभूतियों के बल पर ग़ैर- फासीवादी बता दिया !

दुर्भाग्य की बात यह है कि इन्होंने ही इस 'क्रांतिकारी' पार्टी के बंद ढाँचे में एक लंबे अर्से से अपने पक्ष के लोगों की गिनती बढ़ा रखी है । पार्टी की पिछली कांग्रेस में इनकी यह गिनती उस हद तक कारगर नहीं हुई, इसका ग़म इन्हें सता रहा दिखता है । और, इसीलिये आगामी कांग्रेस के पहले फिर एक बार अपनी महान सैद्धांतिक लड़ाई के आवरण में अकूत संसाधनों से युक्त इस पार्टी को ये फिर से अपने क़ब्ज़े में लेना चाहते हैं । सिर्फ सदिच्छाओं से इस खेल को कभी नहीं समझा जा सकता है ।“

आज कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी सीपीएम के इस कथित सैद्धांतिक संघर्ष को अंदुरूनी सत्ता संघर्ष कहा है, जिसे 'टेलिग्राफ' ने अपनी रिपोर्ट में सीपीएम में कालेजों के स्तर की बहस बताया है ।

सचमुच आज जो सीपीआई (एम) में चल रहा है, वामपंथी आंदोलन से हमदर्दी रखने वाले तमाम लोगों के लिये बेहद चिंताजनक है और बाकी लोगों के लिये हास्यास्पद ।





























शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (25)


-अरुण माहेश्वरी

धर्म के प्रति नफरत से विचार के एक नये धरातल तक

यह सच है कि मार्क्स ने धर्म को हमेशा एक भूल, एक भ्रम माना। अपने वैचारिक जीवन का प्रारम्भ उन्होंने धर्म के प्रति सख्त नफरत के साथ किया था। लेकिन उनके विचारों के विकास के क्रम में ही धर्म के प्रति प्रारम्भिक घृणा ने जुगुप्सा का रूप नहीं लिया, जैसाकि अन्य तमाम नास्तिकतावादियों के मामले में दिखाई देता है।

एक वर्गीय समाज के अन्य तमाम पक्षों की तरह ही धर्म भी उनके लिए मानव अस्तित्व के साथ जुड़े एक ठोस यथार्थ के रूप में सामने आया। उन्होंने देखा कि धर्म उत्पीड़ित जनता के जीवन में एक सांत्वना के समान है, एक ऐसी जरूरी सांत्वना जिसके बिना आदमी का अपनी कठिन परिस्थितियों में जीना दूभर हो जायेगा। धर्म का नाश भ्रमों के नाश के लिए, आदमी को ठोस यथार्थ के सम्मुख लाने के लिए करना है लेकिन भ्रमों का नाश उस वक्त तक नहीं किया जा सकता जब तक मानव जीवन की उन परिस्थितियों को नहीं बदला जाता जिन्हें भ्रमों की आवश्यकता होती है।

“मनुष्य से यह मांग करना कि वह अपने जीवन की परिस्थिति के बारे में भ्रमों से मुक्त हो जाय, मनुष्य से ऐसी मांग करने के समान है कि वह ऐसे जीवन की परिस्थिति से मुक्त हो जाए जिसे भ्रमों की जरूरत पड़ती है।'' दुनिया को एक वास्तविक और सच्चा हृदय प्रदान करो, नकली हृदय की जरूरत नहीं रह जायेगी। परिवेश को इस प्रकार बदलो कि उसमें सच्ची आत्मा की प्रतिष्ठा हो तो आपको आत्मा की किसी नकली प्रेत छाया की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।

मार्क्स का धर्म के प्रति यह नजरिया धर्म की प्रशंसा का भाव तो था ही नहीं, लेकिन थोथी आलोचना का भाव भी नहीं था।


मार्क्स अपने बौद्धिक जीवन के कौन से रास्ते से होकर धर्म के बारे में इस प्रकार की एक समग्र समझ तक पहुँचे थे, उस पर यदि हम किंचित विस्तार से गौर करें तो हमारे लिए भी धर्म की आलोचना की मार्क्सवादी दृष्टि को आत्मसात करना आसान होगा। मार्क्स के प्रारंभिक बौद्धिक विकास, बर्लिन विश्वविद्यालय, डाक्टर्स क्लब, यंग हेगेलियन्स के बारे में हम पहले काफी चर्चा कर चुके हैं । फिर भी यहां संक्षेप में उस चर्चा के कुछ बिंदुओं को दोहराना उपयोगी होगा ।

जर्मनी के जिस परिवेश में मार्क्स ने अपने बौद्धिक जीवन का प्रारम्भ किया था उसमें दर्शन-शास्त्रीय प्रश्नों की तरह ही तमाम सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न भी एक प्रकार के धर्मशास्त्रीय चिंतन के दायरे में ही विवेचित होते थे। स्कूली जीवन में ही होमर, शेक्सपियर और विद्रोही चिंतक सेंट साइमन के साहित्य और विचारों से संस्कारित मार्क्स जब विश्वविद्यालय में गये उस समय वे हेगेल के से प्रभावित हुए थे। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, 1831 में हेगेल की मृत्यु तथा 1837 में हेगेलियन चिंतन पद्धति के प्रगतिशील नौजवानों ने मिलकर जिस डाक्टर्स क्लब की स्थापना की उसमें मार्क्स भी एक सक्रिय सदस्य बने।

हेगेल नास्तिक नहीं थे। वे ईसाई धर्म को एक सुसंगत धर्म मानते थे जो दर्शन शास्त्र के प्रश्नों की एक वास्तविक तस्वीर पेश करता है। धर्म और विवेकसंगत दर्शनशास्त्र को वे सारत: एक ही मानते थे। लेकिन हेगेल के बाद हेगेल की यह मान्यता वहां के किसी भी तबके के लिए मान्य नहीं रही। रेशनलिस्ट दर्शनशास्त्रियों ने तो इसे ठुकराया ही, पोप और पादरियों ने भी उनका तिरस्कार किया, क्योंकि हेगेल के लिए बाइबिल की कथाओं का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं था जबकि चर्च की तमाम स्थापनाएं उन्हें ऐतिहासिक सच मानने के विश्वास पर ही टिकी हुई थी। इसी बहस से यंग हेगेलियन्स का नया विद्रोही स्कूल पैदा हुआ। मार्क्स भी इसमें शामिल हुए। उन्हीं दिनों मार्क्स ने कैथोलिक धर्मशास्त्री हर्मेस की खिंचाई करते हुए एक लेख लिखने की योजना बनाई थी क्योंकि हर्मेस ने कांट के दर्शन और कैथोलिक विश्वास के बीच एक सामंजस्य बैठाने की कोशिश की थी।


दरअसल, यंग हेगेलियन्स शुरू में धर्म मात्र को अपने हमले का निशाना नहीं बनाया करते थे। जैसे आज भी अनेक लोग विचार में ही भौतिक प्रगति के गोमुख की तलाश करते हैं, उसी प्रकार वे भी प्रोटेस्टेंट धर्म को दुनिया की प्रगति का कारण समझते थे। लेकिन इन यंग हेगेलियन्स को धर्म के प्रति तमाम भ्रमों से मुक्त कराने में ब्रुनो बावर ने एक बड़ी भूमिका अदा की तथा उनकी संगत से ही मार्क्स भी इस निष्कर्ष पर पहुँच गये थे कि अकादमिक दृष्टि से धर्म महज एक धोखा तथा सामाजिक रूप में एक अवांछित वस्तु है। किसी ईश्वरीय सत्ता के बजाय मनुष्य की आत्म चेतना को दार्शनिक चिंतन के सर्वोच्च स्थान पर रखने की हेगेलीय अवधारणा को मार्क्स ने डॉक्टरेट के लिए तैयार की गयी अपनी थिसिस “डिफरेंस बिट्वीन द डेमोक्रेटियन एण्ड ऐपीक्यूरीयन फिलासाफी ऑफ नेचर'' के प्राक्कथन में प्रोमेथियस की आत्मस्वीकृति को दर्शन के राज के तौर पर उद्धृत करते हुए कहा था “साफ शब्दों में, मैं तमाम ईश्वरों से नफरत करता हूँ।''

मार्क्स के अनुसार प्रोमेथियस की यह आत्म-स्वीकृति है जिसमें स्वर्ग और धरती के ऐसे तमाम भगवानों से नफरत जाहिर की गया है जो मनुष्य की आत्मचेतना को सर्वोच्च दैवी स्थान प्रदान नहीं करते हैं। (MECW, Vol-1 पृष्ठ 30)।


1841 में प्रकाशित मार्क्स के इस कथन में भी सीधे तौर पर धर्म को हमले का निशाना नहीं बनाया गया था। धर्म के प्रति मार्क्स का आक्रोश आगे उस वक्त जाहिर होने लगा जब वे धर्म के तात्विक आलोचक के बजाय सामाजिक आलोचक हो गये ; नास्तिकतावादी हो गये। 1841 में ही उन्होंने बावर के साथ मिलकर बॉन से “एथीस्टिक आरकाइव्ज'' शीर्षक से एक पत्रिका के संपादन की योजना भी बनायी थी। लेकिन जब बावर को उनके नास्तिक और विद्रोही विचारों के कारण बॉन विश्वविद्यालय के प्राइवेट डासेंट ऑफ थियोलाजी के पद से हटा दिया गया तो यह योजना खटाई में पड़ गयी।

आरनोल्ड रूज

इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि फायरबाख से मार्क्स का सबसे पहले साबका धर्म और उससे जुड़े विषयों पर विचार के क्रम में ही पड़ा था। मार्क्स उन दिनों आरनोल्ड रूज द्वारा संपादित विपक्षी विचारों के पत्र “Deutsche Jahrbücher'' में नियमित लिखा करते थे। उन्हीं दिनों रूज के साथ मार्क्स के पत्राचार से पता चलता है कि मार्क्स ने ईसाई कला पर एक लेख लिखा था जो ब्रुनो बावर की एक पुस्तक के दूसरे खंड में प्रकाशित होने वाला था। इस लेख में वे फायरबाख के विचारों से टकराये थे। मार्क्स के शब्दों में “यह टकराहट सिद्धांत को लेकर नहीं बल्कि उसकी अवधारणा के बारे में थी। किसी भी हालत में इससे धर्म को कोई लाभ होने वाला नहीं था''।

फायरबाख से मार्क्स को नास्तिकता की शिक्षा नहीं मिली थी, लेकिन उनके द्वंद्वात्मक सोच को इस प्रकार के विचार अवश्य मिले थे कि ईश्वर एक कोरा धोखा है जिसके जरिये मनुष्य खुद को दैवी सत्ता प्रदान करता है। इस वक्त तक मार्क्स पूरी तरह भौतिकवादी नहीं हुए थे। 1843 के पहले तक दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में मार्क्स फायरबाख के विचारों का प्रयोग नहीं कर पाये थे। एक भौतिकवादी दार्शनिक के रूप में मार्क्स की यात्रा 1843 से शुरू हई और मार्क्स के चिंतन में इस रूपांतरण के साथ ही धर्म के प्रति उनकी आलोचना का पूरा आधार भी बदल गया।

(क्रमशः)