शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

बंगाल के इतिहास का पुनर्लेखन या इतिहास का राजनीतिक पुनरुत्पादन?

 

−अरुण माहेश्वरी 



अब बीजेपी के सत्ता पर आने के साथ ही लगता है बंगाल के इतिहास लेखन की नई शैली आकार लेना चाहती है।

यहां हमारा संकेत हितेन्द्र पटेल जी की 3 जुलाई की एक फेसबुक पोस्ट की ओर है । इसमें वे इतिहास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति न्याय करने के लिए एक पूरी बुकलेट लिखने की घोषणा करते हैं । हितेंद्र जी की परियोजना को हम यदि सिर्फ किसी अवसरवादी समायोजन के खाते में डालने के बजाय गंभीरता से लें, तो इस पर इतिहास लेखन संबंधी एक अन्य प्रकार की गंभीर अकादमिक चर्चा की जा सकती है ।

वे कहते हैं कि अब तक “मार्क्सवादी”, “कैम्ब्रिज”, “एलीट” इतिहासकारों ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि की उपेक्षा की । 

इतिहास में किसी का उपेक्षित रह जाना कोई नई बात नहीं है । वास्तव में कुछ अर्थ में किसी का वहां न होना ही इतिहास का होना भी होता है । पूर्ण इतिहास तो यूं भी इतिहास की ‘पूर्ण गति’ के समान होता है!

बहरहाल, सवाल यह है कि अब तक के इतिहास को ‘एलीट’ का धोखा बता कर उपेक्षित तथ्यों को सामने लाने का दावा क्या सिर्फ उपेक्षित के प्रति न्याय तक ही सीमित है या न्याय के नाम पर इसमें इतिहास की खुली दरारों को किसी नए खास प्रकार के आख्यान से पाटने की परियोजना भी है; अर्थात् उपेक्षित के पुनरुद्धार के नाम पर अतीत के किसी वृत्तांत को एक नई विचारधारा के अनुरूप तैयार करने की कोशिश तो नहीं है!

हम सारी दुनिया में दक्षिणपंथ की तमाम वैचारिक मुहिम को न्याय करने के नारों की ओट में ही ऐसे ही काम करते हुए देख सकते हैं। 

ट्रंप का ‘मागा’ (make America great again) अमेरिकी ‘एलीट’ से लड़ते हुए गाजा के ध्वंस-स्तूप पर एक और ‘एलीट’ के लिये ही पर्यटन केंद्र बनाने और ‘आतंकवादी’ ईरान के विध्वंस से धनाढ्य विस्तारवादी यहूदियों के ग्रेटर इज़रायल के निर्माण की घोषणाएँ कर रहा है।

इतिहास के उपेक्षित तथ्यों को सामने लाना तभी एक विश्लेषणात्मक कर्म है जब वे इतिहास की दरारों को और चौड़ा करें ताकि उसके सामाजिक सत्य पर रोशनी गिरे। लेकिन जब उन्हीं तथ्यों को किसी नए राजनीतिक प्रभुत्व के ज्ञान-तंत्र में व्यवस्थित कर बांधा जाता है, तब वह विश्लेषण नहीं, एक नया विश्वविद्यालयी विमर्श कहलाता है । इतिहास किसी प्रश्न के बजाय नए प्रभुओं को ज्ञान की वैधता देने का पाठ्यक्रम बन जाता है।

अब हम आते हैं हितेंद्र पटेल जी के विषय पर । उनका विषय है बंगाल के राष्ट्रवाद का इतिहास और उसमें हिंदुत्व या श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्थान।

सब जानते हैं कि उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक बंगाली राष्ट्रवाद पर हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का गहरा प्रभाव था। बंकिम, विवेकानंद, अरविन्द, बिपिन पाल और रवीन्द्रनाथ भी — इन सबके यहाँ हिंदू सांस्कृतिक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं । पर जो नोट करने की बात है कि इनमें से किसी की राजनीतिक कल्पना धार्मिक राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना की नहीं थी।

इसके विपरीत जहां तक हिंदू महासभा और हिंदुत्व का सवाल है, वे एक अलग, शुद्ध राजनीतिक परियोजना है जिसका विकास विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ।

इसीलिए यह निष्कर्ष सही नहीं है कि बंगाली राष्ट्रवाद में हिंदुत्व के तत्व हिंदू महासभा के हिंदुत्व के पूर्वरूप थे । इन दोनों को एक ही ऐतिहासिक धारा में मिलाना न सिर्फ इतिहास का सरलीकरणवादी है, बल्कि बंगाली राष्ट्रवाद में मौजूद हिंदू सांस्कृतिक तत्त्वों से हिंदुत्व के धार्मिक राष्ट्र-राज्य की प्रतिस्थापना की वैसी ही कोशिश है जिसे हमने ऊपर न्याय के नाम पर पुराने औजारों से ही किसी ‘नए विश्वविद्यालयी विमर्श की प्रतिस्थापना’ कहा है । 

अब विशेष रूप से श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिया जाए । वे एक गंभीर शिक्षाविद् थे और उन्होंने एक समय बंगाल के हिंदुओं की आशंकाओं को भी उठाया था । 1947 के बंगाल विभाजन में उन्होंने हिंदू-बहुल क्षेत्र को भारत में रखने की मांग का साथ दिया था । यह इतिहास का तथ्य है और इसे दर्ज जरूर किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने अंततः हिंदू महासभा का राजनीतिक मंच स्वीकार किया। इसलिए उनकी ऐतिहासिक भूमिका का आकलन केवल उनकी आशंकाओं से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक विकल्पों से भी होगा।

इतिहास किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक विकल्पों से करता है जिन्हें उसने उन परिस्थितियों में चुना।

इसी प्रकार, ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और राज करो” की नीति एक ऐतिहासिक तथ्य है । पर इसी से बंगाल के सारे सामाजिक अंतर्विरोधों की पर्याप्त व्याख्या नहीं मिलती । मुस्लिम किसानों की आर्थिक शिकायतें और आकांक्षाएँ, जातिगत असमानताएँ, नमशूद्र राजनीति का उदय और भद्रलोक समाज का वर्चस्व, इन सबको केवल औपनिवेशिक षड्यंत्र का परिणाम मान लेना इतिहास की आंतरिक जटिलताओं से आँख मूँद लेना है । प्रो. सुशोभन सरकार आदि के बंगाल रिनैसां संबंधी कामों में इन पहलुओं पर काफी प्रकाश डाला गया है जो इतिहास की ऐसी दरारों को खोलते हैं जिनसे उससे जुड़ा सामाजिक सत्य प्रकाश में आता है । तभी इतिहास समाज के गतिशील वर्गीय अन्तर्विरोधों के अध्ययन का सजीव स्रोत बनता है । 

दरार किसी पाठ की कमी नहीं होती । यह वह स्थान है जहाँ कोई वैचारिक रूप अपने ही सामाजिक आधार को पूरी तरह ढँक नहीं पाता। इतिहासकार उसी असंगति को बड़ा करता है। 

हितेंद्र जी ने प्रो.सव्यसाची भट्टाचार्य का खास ज़िक्र किया है। यह सच है कि प्रो. भट्टाचार्य ने बंगाल के इतिहास के कुछ ऐसे प्रसंगों को भी दर्ज किया जिन्हें आसानी से छोड़ा जा सकता था। उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सांप्रदायिक तनाव और बंगाल के हिंदू समाज की आशंकाओं को भी इतिहास का हिस्सा माना। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि उन्होंने इन तथ्यों से हिंदुत्व का कभी कोई वैचारिक आख्यान निर्मित नहीं किया। 

लकान के यहाँ विश्लेषक (Analyst) कभी नया गुरु नहीं बनता। वह विश्लेष्य को कोई नया अंतिम सत्य नहीं देता। कोई वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत नहीं करता। इतिहास की प्रगति किसी आख्यान के पूर्ण होने से नहीं, बल्कि समाज के अन्तर्विरोधों के उद्घाटन से होती है । 

प्रचारक पहले कहता है कि पुराने इतिहासकारों ने दरार छिपा दी थी। फिर उसी दरार पर अपने राजनीतिक आख्यान का नया प्लास्टर चढ़ा देता है। इस प्रकार पुराना आवरण हटता है, पर उसकी जगह नया आवरण आ जाता है। 

नए इतिहास-लेखन की बड़ी विशेषता यह नहीं होती कि वह नए तथ्य खोजती है। नए तथ्य तो हर पीढ़ी खोजती है। जो इतिहासकार उसकी जटिलता को बचाते हैं, वे इतिहास को समृद्ध करते हैं; और जो उसे एक वैचारिक आख्यान में समेटना चाहते हैं, वे चाहे कितने ही नए तथ्य क्यों न प्रस्तुत करें, अंततः इतिहास नहीं, स्मृति-राजनीति (politics of memory) का लेखन करते हैं। 

कुल मिला कर इतिहास का विश्लेषक उसकी दरारों को चौड़ा करता है; इतिहास का प्रचारक उन्हें अपने नए प्रभुत्व के गारे से भर देता है। 

अब जब हम स्मृति-राजनीति (politics of memory) की बात कर रहे हैं, हितेंद्र जी के द्वारा गुरुदत्त के उपन्यासों का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है । गुरुदत्त हिंदुत्ववादी वैचारिक पृष्ठभूमि के एक लोकप्रिय उपन्यासकार थे। उनके उपन्यास स्वतंत्रता, विभाजन और हिंदू समाज की कुछ खास प्रकार की स्मृतियों का लेखन है । उन्हें किसी मानसिक संसार को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत कहेंगे । लेकिन वे इतिहास के प्राथमिक स्रोत नहीं हैं।

साहित्य इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, इतिहास की चेतना का दस्तावेज़ होता है। यदि उपन्यासों को अभिलेखीय प्रमाणों के समकक्ष रख दिया जाए, तो इतिहास और साहित्य दोनों की प्रकृति विकृत हो जाती है। 

इतिहासकार का काम किसी दल की ओर से मुकदमा लड़ना नहीं है। लकान की भाषा में कहें तो विश्लेषक S₁ (मास्टर-संकेतक) का उत्पादक नहीं होता। वह उस स्थान को सक्रिय करता है जहाँ $ (विभाजित प्रमाता) (barred subject) अपने सत्य के साथ उपस्थित हो सकता है। 

अंत में हम यही कहेंगें कि इतिहास का विषय वैचारिक आकृतियाँ नहीं, उन आकृतियों को जन्म देने वाले सामाजिक अन्तर्विरोध हैं। राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और सांस्कृतिक पहचान इतिहास की गतिशील शक्तियाँ नहीं, बल्कि उन शक्तियों के वैचारिक रूप हैं। इतिहासकार यदि इन्हीं रूपों को विश्लेषण की अंतिम इकाई मान ले, तो वह स्वयं विचारधारा के भीतर काम करने लगता है। इतिहास का काम इन वैचारिक रूपों के आवरण को काटकर उन सामाजिक अन्तर्विरोधों को दृश्य बनाना है जिनकी वास्तविक गति इन रूपों के भीतर छिप जाती है।




बुधवार, 1 जुलाई 2026

राम मंदिर में चोरी और धर्म के राजनीतिकरण का संकट

— अरुण माहेश्वरी





अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोपों और उससे जुड़ी गिरफ्तारियों ने करोड़ों श्रद्धालुओं को स्तब्ध कर दिया है। यदि जांच अंततः इन आरोपों की पुष्टि करती है और यह सिद्ध होता है कि श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित धन का व्यवस्थित दुरुपयोग हुआ है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं होगी; यह उस संस्थागत संरचना पर भी गंभीर प्रश्न होगा जिसके अधीन इस मंदिर का संचालन किया जा रहा है।


सबसे पहले एक बुनियादी बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए। यह चोरी किसी हिंदू मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था में हुई चोरी नहीं है। भारत के हजारों मंदिरों में चढ़ावे से पुजारियों, सेवायतों और धार्मिक संस्थाओं का निर्वाह होता है। यदि वह स्थापित परंपरा और नियमों के अनुरूप है, तो उसे चोरी नहीं कहा जाता। चोरी तब कहलाती है जब श्रद्धा से समर्पित धन को नियमों के विरुद्ध निजी संपत्ति में बदल दिया जाए।


लेकिन अयोध्या का प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।

यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं रहा। इसका निर्माण एक विशाल राजनीतिक आंदोलन की परिणति के रूप में हुआ। इसे केवल भगवान राम के मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष राजनीतिक परियोजना के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसीलिए यहाँ जो कुछ घटित होता है, वह केवल धार्मिक घटना नहीं रह जाता; वह राजनीति, सत्ता और संस्थागत संस्कृति के प्रश्नों को भी जन्म देता है।


समाजशास्त्र का एक सामान्य सिद्धांत है कि संस्था का स्वरूप उसके संचालन के स्वरूप को भी प्रभावित करता है। संस्था जिस उद्देश्य से निर्मित होती है, जिस प्रकार की सत्ता-संरचना उसके भीतर स्थापित की जाती है और जिन प्रोत्साहनों पर उसका प्रशासन चलता है, वही उसकी कार्य-संस्कृति को आकार देते हैं।


भारत का दुर्भाग्य यह है कि सार्वजनिक जीवन का शायद ही कोई क्षेत्र भ्रष्टाचार के संकट से पूरी तरह मुक्त रहा हो। सरकारी संस्थाएँ, सार्वजनिक उपक्रम, अनेक प्रशासनिक निकाय और राजनीतिक संगठन बार-बार इसी समस्या से ग्रस्त पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई धार्मिक संस्था स्वयं एक प्रकार के अर्ध-सरकारी या राजनीतिक प्रतिष्ठान का रूप ग्रहण कर ले, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह भी उसी संस्थागत संस्कृति से प्रभावित नहीं होगी जो हमारे सार्वजनिक जीवन में पहले से व्याप्त है ?


यहीं से अयोध्या के राम मंदिर का प्रश्न एक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है।


प्राचीन हिंदू धर्म का ऐतिहासिक स्वरूप किसी एक केंद्रीय धर्मसत्ता पर आधारित नहीं रहा है। उसकी शक्ति उसकी बहुलता में रही है—असंख्य तीर्थ, असंख्य परंपराएँ, असंख्य संप्रदाय, स्थानीय देवस्थानों की स्वायत्तता और साधना के विविध मार्ग। उसके पास न कोई एक सर्वोच्च धर्माध्यक्ष रहा, न कोई एक अनिवार्य धार्मिक राजधानी और न ही एक केंद्रीकृत धार्मिक अनुशासन। यही उसकी ऐतिहासिक विशेषता रही है।


इसके विपरीत, आधुनिक राजनीतिक हिंदुत्व की परियोजना हिंदू समाज को एक केंद्रीय प्रतीक, एक केंद्रीय धार्मिक-राजनीतिक स्थल और एक प्रकार के आधिकारिक प्रतिनिधित्व के अंतर्गत संगठित करने का प्रयास करती दिखाई देती है। यह प्रक्रिया हिंदू धर्म के स्वाभाविक ऐतिहासिक विकास का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीति द्वारा निर्मित एक कृत्रिम केंद्रीकरण का प्रयास है।


और, हमारी नजर में यहीं सबसे बड़ा खतरा निहित है।


जब किसी बहुलतावादी लोकधर्म को सत्ता की केंद्रीय परियोजना में रूपांतरित किया जाता है, तब उसके भीतर भी वही प्रशासनिक तर्क प्रवेश करते हैं जो आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की पहचान हैं—सत्ता का केंद्रीकरण, संसाधनों का केंद्रीकरण, नियंत्रण का केंद्रीकरण, भाई-भतीजावाद और संरक्षण की राजनीति। श्रद्धा का स्थान प्रबंधन लेने लगता है, नैतिक अनुशासन की जगह प्रशासनिक अनुशासन आ जाता है, और धार्मिक उत्तरदायित्व की जगह राजनीतिक उत्तरदायित्व प्रमुख हो जाता है।


ऐसी स्थिति में यदि भ्रष्टाचार जन्म लेता है, तो उसे केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक विफलता कहकर टालना पर्याप्त नहीं होता। वह किसी न किसी रूप में उस संस्थागत रूपांतरण की भी अभिव्यक्ति बन जाता है जिसके द्वारा धर्म को राजनीति की भाषा में संगठित किया गया।


इसीलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह किसी हिंदू मंदिर में हुई चोरी भर नहीं है। यह उस मंदिर में हुई चोरी है जिसे राजनीतिक हिंदुत्व की केंद्रीय परियोजना का प्रतीक बनाया गया। यह टिप्पणी हिंदू धर्म पर नहीं, बल्कि धर्म के राजनीतिकरण पर है।


विडंबना यह है कि भगवान राम भारतीय सांस्कृतिक चेतना में मर्यादा, न्याय और धर्म के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। यदि उन्हीं के नाम पर निर्मित सबसे बड़े सार्वजनिक मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा पर प्रश्न उठने लगें, तो यह केवल धन के गबन का मामला नहीं रहता । यह उस दावे की भी परीक्षा है कि क्या राजनीति धर्म की रक्षा कर सकती है? 


शायद इस घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि धर्म की सबसे बड़ी सुरक्षा उसके राजनीतिक अधिग्रहण में नहीं, बल्कि उसकी नैतिक स्वायत्तता में निहित होती है। जिस दिन कोई धार्मिक संस्था सत्ता का विस्तार बन जाती है, उसी दिन उसमें सत्ता की बीमारियों के प्रवेश का खतरा पैदा हो जाता है। और जहाँ सत्ता की संस्कृति का प्रवेश होता है, वहाँ श्रद्धा भी प्रशासनिक फ़ाइलों और राजनीतिक संरक्षण के बीच खोने लगती है।


यदि अयोध्या की यह घटना अंततः सिद्ध होती है, तो उसका सबसे गहरा संदेश यही होगा कि किसी भी धर्म की रक्षा राजनीति के द्वारा नहीं, बल्कि उस नैतिक चेतना के द्वारा होती है जो सत्ता से बड़ी होती है। जब सत्ता स्वयं धर्म का रूप धारण कर लेती है, तब सबसे पहले धर्म की आत्मा ही संकट में पड़ती है।


आगे के लिए कुछ सुझावः


इस संदर्भ में कुछ ठोस कदमों पर विचार किया जाना आवश्यक है। 

सबसे पहले, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए—नियमित ऑडिट, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और स्वतंत्र निगरानी तंत्र के माध्यम से। 

दूसरा, धार्मिक संस्थाओं के संचालन को राजनीतिक प्रभाव से यथासंभव मुक्त रखने की दिशा में स्पष्ट नीतियाँ बननी चाहिए, ताकि उनकी नैतिक स्वायत्तता बनी रहे। 

तीसरा, यह भी विचार किया जा सकता है कि क्या ऐसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में पारंपरिक धार्मिक प्राधिकारों—जैसे शंकराचार्यों या अन्य मान्य आध्यात्मिक संस्थाओं—की अधिक भूमिका सुनिश्चित की जाए, ताकि संचालन का आधार राजनीतिक संरचना के बजाय धार्मिक उत्तरदायित्व और परंपरा पर टिका रहे। 

चौथा, श्रद्धालुओं और समाज की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिससे जवाबदेही केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित न रहे। अंततः, धर्म के मूल नैतिक मूल्यों—ईमानदारी, सेवा और उत्तरदायित्व—को संस्थागत व्यवहार का आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि श्रद्धा और विश्वास की रक्षा केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में भी दिखाई दे।

सोमवार, 29 जून 2026

क्यों हमने इस उपन्यास के दो अध्यायों के बाद ही उसे छोड़ दिया!

 

(अलका सरावगी के उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें” के अधूरे पठन पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी 



अलका सरावगी के उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें” के पहले अध्याय “कोई बीसेक बरस बाद प्रेम” के बमुश्किल बारह पन्नों के बाद जब उसके दूसरे अध्याय “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” पढ़ा तो हमारा धीरज जवाब दे गया। हम आगे और इस उपन्यास को पढ़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा सके ।

इन दो अध्यायों ने ही स्पष्ट कर दिया कि अलका सरावगी जिस उपन्यास-दृष्टि के संकट से अपने आरंभिक लेखन से जूझती रही हैं, समय के साथ उससे बाहर नहीं निकलीं; बल्कि इस उपन्यास में वह संकट और अधिक गहरा होकर सामने आता है। इस उपन्यास के प्रारंभ में ही यह नजर आने लगा कि लेखिका ज़िद की हद तक अपने पात्रों को कभी बोलने नहीं देती; वह खुद उनके भीतर बैठकर लगातार खुद ही बोलती रहती है। 

यह वह स्थिति है जिसे मनोविश्लेषण की भाषा में कहा जा सकता है कि विश्लेष्य (analysand) की जगह विश्लेषक (analyst) स्वयं बोलने लगें । और, जिस क्षण ऐसा होता है, उसी क्षण विश्लेषण समाप्त हो जाता है; केवल आरोप, संकेत और पूर्वग्रह शेष रह जाते हैं । 

उपन्यास के पहले अध्याय, “कोई बीसेक बरस बाद प्रेम”, में सुनील बोस उर्फ़ मोहम्मद दानियाल की कहानी है । एक ऐसा व्यक्ति जिसने मुस्लिम लड़की दीबा से विवाह किया, परिवार से कट गया, बीस साल बाद माँ के पास लौटा और फिर माँ की भयावह आत्महत्या का सामना किया। 

जाहिर है कि यह कथा गहरी मानवीय करुणा की माँग करती थी। पर लेखिका इसे पात्रों की भीतरी आवाज़ से नहीं, अपने बाहरी व्याख्यात्मक चाबुक से चलाती है। “सच बोलो...”, “क्या तुम सिर्फ़ माँ के दिल की सोचकर गए थे?”, “क्या एक अदद विलेन के बिना कहानी पूरी नहीं होती?” जैसे कोष्ठकों में बार-बार आने वाले वाक्यों से पुलिसिया पूछताछ के लहजे में लेखक का हस्तक्षेप कथा के खुलने की संभावनाओं को लगातार बंद करता जाता है। कहना न होगा, पात्र के अचेतन को सुनने के बजाय उस पर अर्थ का आरोपण विश्लेषण को चौपट करने के लिए काफी होता है। 

उपन्यास के दूसरे अध्याय, “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” में तो यह दोष जैसे सिर पर चढ़ कर बोलने लगता है। इसके पात्र बोड़ो बाबू को कम्युनिस्ट सिद्ध करने के लिए लेखिका कुछ बाहरी चिह्नों का प्रयोग करती है, जैसे वे ‘गणशक्ति’ (सीपीआईएम का बांग्ला दैनिक मुखपत्र), रूसी साहित्य पढ़ते हैं, यूनियन की बैठकों में जाते हैं, पूजा से चिढ़ते हैं और मुसलमानों के इलाके में घर बनाते हैं। मानो कम्युनिस्ट होना कोई ऐतिहासिक, वर्गीय और वैचारिक चेतना न होकर अख़बार, चश्मा, गंभीर चेहरा, दाढ़ी और कुछ आदतों का जोड़ मात्र हो।

इसमें दूसरा और सबसे गंभीर उदाहरण बाबरी मस्जिद प्रकरण का है। यह इस अंश का सबसे निर्णायक दृश्य भी है। बिना किसी पूर्ववर्ती मानसिक प्रक्रिया, किसी वैचारिक संकट, किसी सामाजिक दबाव या किसी व्यक्तिगत अनुभव की तैयारी के एक जीवन-भर का ‘कम्युनिस्ट’ अचानक टीवी पर बाबरी मस्जिद गिरते देखकर उछल-उछलकर ताली बजाने लगता है! 

यदि लेखक वास्तव में यह दिखाना चाहता कि किसी कम्युनिस्ट के भीतर सांप्रदायिक चेतना दबे रूप में मौजूद होती है, तो उसे उस चेतना के बनने की प्रक्रिया दिखानी चाहिए । साहित्य में आकस्मिक घटनाएँ भी असंभव नहीं होतीं; पर आकस्मिकता तभी विश्वसनीय बनती है जब उसका मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार कथा के भीतर निर्मित किया गया हो । पर यहाँ तो केवल एक दृश्य है, जो इसलिए उपस्थित है कि पाठक चौंक जाए और निष्कर्ष निकाल ले कि कम्युनिस्ट भी अंततः भीतर से हिंदुत्ववादी ही निकलते हैं। 

इसे आलोचना की भाषा में, साहित्यिक अन्वेषण नहीं, वैचारिक युक्ति (device) कहते हैं। लेखक ऐसे ही चरित्रों पर सवार होकर बोला करता है।

तीसरा उदाहरण मुसलमानों के बीच घर बनाने की घटना को भी लिया जा सकता है। लेखिका इसे बार-बार इस प्रकार रखती है कि जैसे यह कम्युनिस्टों की कोई हास्यास्पद नैतिक नुमाइश हो। जबकि बंगाल में विशेषकर वामपंथी ट्रेड यूनियन आंदोलन के इतिहास में मिश्रित आबादी वाले इलाक़ों में रहना कोई असाधारण घटना नहीं थी। अनेक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता वास्तव में उन्हीं मज़दूर बस्तियों में रहते थे जहाँ हिन्दू-मुस्लिम साथ रहते थे। इससे किसी भोले आदर्शवाद का उपहास करना स्वयं इतिहास की अज्ञानता का परिचायक है।

बोड़ो बाबू का चरित्र वास्तव में कहीं अधिक जटिल हो सकता था। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, एक असफल पिता, एक मूक पति, एक वैचारिक मनुष्य, एक दुख से टूटा हुआ इंसान—इन सबके बीच का तनाव एक बड़े उपन्यास का आधार बन सकता था। लेकिन लेखिका को ऐसी जटिलता पसंद नहीं हैं। वह उसे सरल बनाती हैं, फिर उस सरलता पर व्यंग्य करती हैं। इस प्रकार चरित्र का नहीं, चरित्र के कैरिकेचर का निर्माण करती है।

चौथा उदाहरण बोस और दीबा के विवाह का है। ऊपर से तो उपन्यास मानो अंतर-धार्मिक विवाह का समर्थन करता दिखाई देता है, पर उसके पूरे भाव-संयोजन में यह विवाह लगातार “समस्याग्रस्त”, “बेमेल”, और “त्रासद” रूप में उपस्थित होता है। सुनील का मोहम्मद दानियाल बनना प्रेम का विस्तार नहीं, लगभग सामाजिक दुर्घटना जैसा दिखाई देता है। अंततः पाठक के भीतर यह भाव पैदा होता है कि ऐसी शादियाँ स्वभावतः विफल होती हैं। इस प्रकार, लेखक बिना प्रत्यक्ष घोषणा किए अपने पूरे भाव-संयोजन से वही प्रभाव पैदा करता है जिसे आज का हिंदुत्ववादी सामाजिक विमर्श लगातार प्रचारित कर रहा है।

कोलकाता का चित्रण भी इसी प्रकार सुनी-सुनाई सूचनाओं का कोलाज है—मटियाबुर्ज, वाजिद अली शाह, दर्जी, मुस्लिम बस्ती, बंगाली उच्चारण, रवीन्द्र-संगीत, गणशक्ति, यूनियन, बाबरी, CAA—सब कुछ मौजूद है, पर किसी की ऐतिहासिक आत्मा नहीं है। शहर यहां महज एक दृश्य-सामग्री है, जीवित अनुभव नहीं।

इस दूसरे अध्याय का शीर्षक है, “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” । पर वास्तव में यहां किसी मनुष्य का निर्माण नहीं होता। यहाँ पहले से तय वैचारिक निष्कर्षों के अनुसार मनुष्य की एक आकृति गढ़ी जाती है। चरित्र का स्थान रूढ़ छवि (stereotype) ले लेती है। 

इस प्रकार के लेखन की बुनियादी विफलता का कारण यही होता है कि लेखक पात्रों पर विश्वास नहीं करता। वह पहले निष्कर्ष तय करता है, फिर पात्रों से वैसा व्यवहार करवाता है जिससे निष्कर्ष सिद्ध हो जाए। फलतः बोड़ो बाबू चरित्र नहीं, कम्युनिस्ट का कैरिकेचर बन जाते हैं; बोस प्रेमी नहीं, भ्रमित पहचान का नमूना बन जाता है; दीबा स्वतंत्र स्त्री नहीं, तनाव का कारण बन जाती है; माँ करुणा की जगह भावुकता का यंत्र बन जाती है। उपन्यास अपने पात्रों का उपन्यास नहीं रहता; यह लेखिका की पूर्वधारणाओं का आख्यान, बन जाता है। 

अच्छा उपन्यास अर्थ को आरोपित नहीं करता, उसे जन्म लेने देता है। पर यहां मनुष्य नहीं, मनुष्य पर बनी-बनाई राय बोलती है। और जब राय कथा पर हावी हो जाती है, तब साहित्य मर जाता है—केवल टिप्पणी ही बचती है। 

“कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन” के दो अध्यायों तक आते-आते ही हमारे लिए उपन्यास को आगे पढ़ना कठिन हो गया। इसका कारण भाषा या कथन-कौशल नहीं था। अलका सरावगी इन पहलुओं को निभा लेती हैं। पर हमारे तई समस्या उनके लेखन की मूलभूत दृष्टि की संरचना में है । उनके लेखन पर हमारा यह अनुभव नया भी नहीं है।

लगभग तीस वर्ष पहले जब हमने उनके चर्चित उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ की तुलना प्रभा खेतान के ‘पीली आँधी’ से करते हुए एक टिप्पणी लिखी थी, तब भी हमने पाया था कि दोनों लेखिकाएँ लगभग एक ही सामाजिक संसार, एक ही मारवाड़ी परिवेश और एक ही कलकत्ता को आधार बनाती हैं; लेकिन प्रभा खेतान के यहाँ वही संसार जीवित मनुष्यों, उनके श्रम, उनकी महत्वाकांक्षाओं, उनकी विफलताओं और इतिहास की ठोस प्रक्रियाओं से बनता है, जबकि अलका सरावगी के यहाँ वही संसार धीरे-धीरे एक विचारधारात्मक आख्यान में बदल जाता है। इतिहास अपनी जटिलता में नहीं आता;  किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष का बयान बन जाता है।

उस समीक्षा में हमने लिखा था कि कलिकथा का दोष उसका इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि इतिहास का विकृतिकरण है। उसमें स्वतंत्रता आन्दोलन, बंगाल का सामाजिक जीवन, मारवाड़ी समुदाय, गांधीवादी, सुभाषवादी, सांप्रदायिक तनाव—सब कुछ इस प्रकार संयोजित होता है ताकि अंततः एक निर्मित "मारवाड़ी अस्मिता" का आख्यान तैयार हो सके। इसके विपरीत पीली आँधी में माधो बाबू जैसे पात्र अपने कर्म, अपने व्यापार, अपने समय और अपने अंतर्विरोधों से बनते हैं। उनकी अस्मिता विचारधारा से आरोपित नहीं होती; जीवन से अर्जित होती है।

आज कलकत्ता : कॉस्मोपॉलिटन दिल और दरारें के केवल दो अध्याय पढ़कर ही हममें फिर वही पुरानी अनुभूति लौट आई।

यहाँ भी कलकत्ता अपने बहुस्तरीय ऐतिहासिक यथार्थ में नहीं, कुछ चुने हुए प्रसंगों और सुनी-सुनाई स्मृतियों के सहारे उपस्थित होता है। शहर की वह जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया, जिसमें बंगाली, मारवाड़ी, अंग्रेज़, चीनी, यहूदी, बिहारी मजदूर, शिक्षित मध्यवर्ग, उद्योगपति, ट्रेड यूनियन, अकाल, विभाजन, नक्सलबाड़ी और उदारीकरण—सब मिलकर आधुनिक कलकत्ता का निर्माण करते हैं—वह लगभग अनुपस्थित है। उसकी जगह घटनाओं के ऐसे सरलीकृत रेखाचित्र हैं जिनमें लेखक की वैचारिक धारणा अधिक दिखाई देती है, शहर का वास्तविक जीवन कम।

यथार्थवादी साहित्य की पहली शर्त होती है कि लेखक अपने पात्रों और इतिहास, दोनों से कुछ सीखने के लिए तैयार हो। विचार उसके अनुभव से निकले, अनुभव विचार की कठपुतली न बने। यहाँ हमें बार-बार उलटी प्रक्रिया दिखाई देती है। जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं, पात्र बोलते कम हैं, लेखक की धारणाएं उनके माध्यम से अधिक बोलती हैं। इतिहास खुलता नहीं, समझाया जाता है। स्मृति खोज नहीं करती, प्रमाण जुटाती है।

यही कारण है कि दूसरे अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते हमारे भीतर यह विश्वास नहीं बचा कि आगे का पाठ इस पहली छाप को बदलेगा। अनुभव ने उलटे यही बताया कि ‘कलिकथा वाया बाईपास’ के समय अनुभूति के जिस उथलेपन को हमने पहचाना था, वही उनके और भी कुछ परवर्ती उपन्यासों की भांति फिर से एक नए शीर्षक और नए प्रसंग के साथ उपस्थित हो गया है। 

विचारधारा अपने-आप में लेखक को यथार्थ के प्रति अंधा नहीं बनाती। हर बड़ा लेखक किसी-न-किसी विचारधारा या विश्वदृष्टि से संचालित होता है । वह यथार्थ की खोज का उपकरण होती है, लेखक की दृष्टि को पैना बनाती है। लेकिन जब विचारधारा यथार्थ पर आरोपित निष्कर्ष बन जाती है, तब वह लेखक को यथार्थ के प्रति अंधा कर देती है। लेखक तब जीवन से सीखना बंद कर देता है; वह जीवन से केवल अपने लिए प्रमाण जुटाने लगता है। 

यथार्थवादी साहित्य की पहली शर्त यह नहीं कि लेखक विचारधारा से मुक्त हो; बल्कि यह कि उसकी विचारधारा यथार्थ की खोज का साधन बने, उसका विकल्प नहीं। और यदि वह आरोपित विचारधारा प्रतिक्रियावादी हो, तो वह मनुष्य को उसके कर्म, संघर्ष और इतिहास से काटकर पूर्वनिर्धारित पहचानों में बदल देती है। वहाँ साहित्य अपनी सबसे बड़ी शक्ति, मानव-मुक्ति की कल्पना को ही खो देता है।

इसी कारण 'कलकत्ता : कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें' के केवल दो अध्यायों के बाद ही हमें आगे बढ़ना निरर्थक लगा। हमारे लिए यह किसी नए साहित्यिक अनुभव की शुरुआत नहीं थी; यह उस दृष्टि की पुनरावृत्ति थी जिसे हम लगभग तीन दशक पहले 'कलिकथा वाया बाईपास' की समीक्षा में पहचान चुके थे। उपन्यास समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन उसके देखने का ढंग हमारे सामने पूरा खुल चुका था। आगे के पृष्ठ शायद नए प्रसंग देते, पर नई दृष्टि नहीं!

पुनः, जब लेखक अपने पात्रों और इतिहास से सीखना बंद कर देता है और उन्हें अपनी पूर्वधारणाओं के प्रमाण में बदल देता है, उसी क्षण उपन्यास का यथार्थ समाप्त होने लगता है।







सोमवार, 22 जून 2026

सड़कों के नाम बदलना स्मृतियों पर बुलडोजर चलाने जैसा है !

 

(सुहरावर्दी एवेन्यू से गोपाल मुखर्जी रोड के बहाने इतिहास, स्मृति और नाजी सत्ता पर एक टिप्पणी)

-अरुण माहेश्वरी



कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड करना पहली नज़र में किसी को भी एक सामान्य राजनीतिक घटना लग सकती है। लेकिन यह प्रसंग केवल नाम बदलने का नहीं, इतिहास को पहचानने और उसके साथ व्यवहार करने के मूलभूत दृष्टिकोण का है।

यदि कोई सरकार यह कहे कि वह इतिहास का न्याय कर रही है, तो उससे सबसे पहली अपेक्षा तो यह होती है कि वह इतिहास के तथ्यों की तो सटीक पहचान करें । जिस व्यक्ति के नाम को हटाया जा रहा है और जिसे स्थापित किया जा रहा है, उनके बारे में ठोस तथ्यों की तो उसे सही जानकारी हो ! 

यहाँ विडंबना यह है कि जिस सड़क को हटाया गया, वह उस सुहरावर्दी के नाम पर थी ही नहीं जिसे हटाने का नैतिक तर्क दिया गया है । 

1933 में नामित यह सड़क उन सर हसन सुहरावर्दी की स्मृति में थी जिन्होंने बंगाल की शिक्षा, चिकित्सा और सार्वजनिक जीवन में काम किया था । वे चिकित्सक थे, विश्वविद्यालय प्रशासक और सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे। जिस 1946 की कोलकाता किलिंग की बात की जा रही है उस राजनीति से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था । 

हमारी नजर में यह केवल तथ्यगत भूल नहीं है। यह स्मृति का राजनीतिक पुनर्लेखन है। 

हिटलर के थर्ड राइख के इतिहासकार विलियम शिरर ने दिखाया है कि 1933 के बाद नाज़ी शासन ने जर्मन जीवन के ‘हर कोने’ को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी—शिक्षा, प्रेस, कला, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, यहाँ तक कि नगरों की दृश्य संरचना तक को। सड़कों और सार्वजनिक स्थलों का पुनर्नामकरण इसी व्यापक नाज़ीकरण परियोजना का हिस्सा था।


हिटलर ने देश भर में सैकड़ों सड़कों, चौकों और सार्वजनिक स्थलों को नए नाम दिए । इनमें से तमाम नाम नाज़ी आंदोलन के शहीदों, सैनिक प्रतीकों और स्वयं हिटलर से जुड़े हुए थे। इस नामकरण का ही दूसरा पक्ष था, नामों को मिटाना। हिटलर ने चुन-चुन कर यहूदी मूल के व्यक्तियों के, समाजवादी नेताओं के, उदारवादी और लोकतांत्रिक परंपरा के प्रतीकों और वाइमर गणराज्य से जुड़े नामों को हटाया था । इतिहास की किताबों में इसके सारे तथ्य मौजूद हैं । पूर्वी प्रशिया में तो 1938 में हजारों गाँवों और कस्बों के नाम बदल दिए गए ताकि पोलिश, लिथुआनियाई और पुराने प्रुशियाई सांस्कृतिक चिह्न ही मिट जाएँ। 


यहाँ नाम बदलना प्रशासनिक काम नहीं था, इतिहास के स्वामित्व का दावा था। आज भी जर्मनी में संग्रहालय, स्मारक और अभिलेख बताते हैं कि कौन-सी सड़क कब बदली, क्यों बदली और किस इतिहास से जुड़ी थी। 1945 के बाद जर्मनी ने नाज़ी नाम तो हटाए, पर उसने नाज़ी अतीत को मिटाया नहीं। स्मृति को नष्ट नहीं किया गया; उसे आलोचनात्मक रूप से संरक्षित किया गया।

अब हम फिर कोलकाता के सुहरावर्दी प्रसंग पर आते हैं । सुहरावर्दी की जगह गोपाल मुखर्जी को लाने के निर्णय के समर्थकों का तर्क है कि 1946 की कोलकाता हिंसा में हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भूमिका को भूलना नहीं चाहिए। 

यह सही है कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी का नाम 1946 के डायरेक्ट एक्शन से अलग नहीं किया जा सकता। उनके आलोचक उन्हें प्रशासनिक विफलता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जोड़ते हैं। लेकिन हुसैन शहीद सुहरावर्दी राजनीति की विरासत भी इतनी सरल नहीं, बल्कि काफी जटिल रही है । वही व्यक्ति 1947 में गांधीजी के साथ कोलकाता में शांति स्थापित करने के प्रयासों में भी दिखाई देता है।

इतिहास में किसी व्यक्ति की भूमिका एकरेखीय नहीं होती । और यहाँ तो एक अलग ही प्रश्न उठ गया है कि क्या किसी व्यक्ति के अपराध की स्मृति दूसरे व्यक्ति के नाम पर दर्ज की जा सकती है ?  यह कैसा प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन है!

जहां तक गोपाल चंद्र मुखर्जी का सवाल है, उनकी स्मृति बंगाल के विभाजन-पूर्व लोकजीवन की स्मृति है। वे मांस-व्यवसाय और अखाड़ा-संस्कृति से जुड़े थे, और 1946 के दंगों के दौरान स्थानीय प्रतिरोध के एक लोकप्रिय पात्र बन गये थे। उनके परिवार के अनुसार उन्होंने हिंदुओं की रक्षा की और निर्दोष मुसलमानों को हानि न पहुँचाने की भी सलाह दी। पर उनके आलोचक उनकी दूसरी तस्वीर भी रखते हैं। यह बहस भी इतिहास का एक हिस्सा है।

शहरों के नाम स्मृति की परतें होते हैं । क्या किसी शहर को उसके अतीत से काट कर नया बनाया जा सकता है? शहर केवल सड़कें और इमारतें नहीं होते, वे स्मृति के अभिलेख होते हैं । सड़कों, चौकों और मोहल्लों के नाम केवल दिशा बताने के लिए नहीं होते। वे बताते हैं कि शहर स्वयं को कैसे याद करता है।

इस संदर्भ में आज लाहौर का उदाहरण सबसे ताजा और उल्लेखनीय है। लाहौर में भी पुराने हिंदू-सिख नामों और नगर-स्मृतियों को पुनः दृश्य बनाने की चर्चाएँ सामने आई हैं । वहाँ यही तर्क काम कर रहा है कि शहर की संस्कृति उसकी बहुस्तरीय स्मृति में बसती है; उसे मिटाकर नया राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता। लाहौर को उसके पहले के सांस्कृतिक स्तरों सहित पढ़ने का आग्रह स्मृति-संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण काम है । यदि यह प्रवृत्ति सचमुच शहर को उसके बहुलतावादी अतीत से जोड़ने की है, तो उससे जाहिर होता है कि  इतिहास को सुधारने का अर्थ इतिहास को संक्षिप्त करना नहीं होता।

हम इस घटना में कोलकाता की स्मृतियों पर छाये संकट के अशनि संकेत देख रहे हैं । किसी शहर की सड़क का नाम बदलना आसान है पर उसकी स्मृति को बचाए रखना कठिन। और किसी भी जाति या समाज को उसके अतीत की बहुलता से काट देना, चाहे वह गौरवपूर्ण हो या त्रासद, केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, सांस्कृतिक विस्मरण का आरंभ कहलायेगा । 

कोलकाता ने पहले भी सड़कें बदली हैं। औपनिवेशिक नाम हटे, नए आए। यह नई बात नहीं। विद्वानों ने उस स्वेच्छाचार की भी निंदा की क्योंकि शहर केवल वर्तमान का निवास नहीं, अतीत का अभिलेख भी होता है। किसी समाज की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने नाम हटाए; बल्कि इस बात से कि वह अपने कठिन, विरोधाभासी और असुविधाजनक अतीत को कितनी जगह देता है। 

जो शहर अपने इतिहास को काटता है, वह अंततः अपने ही अनुभव को काटता है। और जो समाज अपने अतीत की बहुलता से डरता है, वह अंततः अपने भविष्य की संभावनाओं से भी डरने लगता है। स्मृति का संकुचन अंततः सत्य के संकुचन में बदल जाता है; और जहाँ सत्य को एकक घोषित कर दिया जाता है, वहाँ इतिहास धीरे-धीरे मिथक में बदलने लगता है। 




रविवार, 21 जून 2026

‘इतिहास फिर से खुल गया है’


(ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध और इस्लामाबाद एमओयू पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी




ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को केवल एक और पश्चिम एशियाई युद्ध कह कर नहीं छोड़ा जा सकता। यह युद्ध अपने सैन्य परिणामों से कहीं अधिक अपने प्रतीकात्मक परिणामों के कारण महत्वपूर्ण है। इसने उस अमेरिकी प्रभुत्व की संरचना की आंतरिक संगति को झकझोर दिया है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से स्वयं को विश्व-व्यवस्था की अंतिम गारंटी के रूप में प्रस्तुत करती आई है । 

28 फ़रवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हमलों की शुरुआत की। लक्ष्य था ईरान की सैन्य क्षमता, वायु-रक्षा, मिसाइल ढाँचे, परमाणु कार्यक्रम और नेतृत्व-संरचना को निर्णायक रूप से खत्म कर देना। आरंभिक हमले ही अत्यंत क्रूर और व्यापक थे। अमेरिका और इज़राइल की रणनीति साफ थी कि ईरान को ऐसा झटका दिया जाए कि वह न केवल सैनिक रूप से पंगु हो, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अस्थिर हो जाए। यह अमेरिका-इजरायल का मध्यपूर्व पर पूर्ण और प्रश्नातीत प्रभुत्व कायम करने का एक निर्णायक अभियान था । 

लेकिन युद्ध की असली कहानी तब शुरू हुई, जब ईरान ने जवाबी हमला किया। उसने इज़राइल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिकी सैनिक अड्डो की क्षेत्रीय संरचनाओं को अपना निशाना बनाया। युद्ध लेबनान, खाड़ी, होरमुज़ जलडमरूमध्य से लेकर मध्य पूर्व के तमाम ऊर्जा-केंद्रों तक फैल गया। ईरान के साथ ताल-मेल रखते हुए हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के मोर्चे पर भी इज़राइल को उत्तर की दिशा से बुरी तरह उलझाए रखा। सर्वोपरि, होरमुज़ के संकट ने दुनिया को बता दिया कि भू-राजनीति केवल वाशिंगटन या तेल अवीव की इच्छा से संचालित नहीं होती।   

जिसे अमेरिका अपनी अजेय शक्ति के प्रदर्शन और ईरान के खिलाफ निर्णायक दंडात्मक कार्रवाई मान रहा था, वही धीरे-धीरे उसके प्रभुत्व की सीमाओं को अनावृत करने लगा।

और, यहीं से युद्ध का चरित्र ही बदल गया।

अमेरिका अपनी जिस सैन्य शक्ति पर सबसे अधिक भरोसा करता था, वही शक्ति इस युद्ध में उसके लिए समुद्र की चोर बालू साबित होने लगी । उसका हमला भले ही कितना भी विनाशकारी क्यों न हो, निर्णायक नहीं साबित हुआ। वह न ईरान को मिटा सका, न उसे अलग-थलग ही कर सका। यहां तक की दूसरे क्षेत्रीय प्रतिरोधों को भी समाप्त नहीं कर सका। उल्टे, ऊर्जा-मार्गों पर से उसका नियंत्रण खत्म हो गया । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह दुनिया को यह विश्वास नहीं दिला सका कि उसके बिना विश्व-व्यवस्था असंभव है।

हम इसे लकानियन अर्थ में भू राजनीति का वह बिंदु कहेंगे जब इसमें बहु-ध्रुवीय जगत के ‘रीयल’ का प्रवेश होता है।

यह लकानियन ‘रीयल’ कोई बाहरी वस्तु की तरह नहीं होता। यह अंतर की वह असंभवता है जिसे प्रतीकात्मक व्यवस्था लगातार ढँकती रहती है। अमेरिकी प्रभुत्व का प्रतीकात्मक संसार इस गहरे विश्वास पर टिका था कि अमेरिका ही अंतिम निर्णायक शक्ति है; उसकी सैन्य उपस्थिति ही सुरक्षा है; उसके नियम ही अंतरराष्ट्रीय नियम हैं; उसका दंड ही न्याय है; और उसकी स्वीकृति ही वैधता है। ट्रंप हर वक्त अपनी श्रेष्ठता के बखान से इसी प्रतीकात्मक विश्वास को दोहराया करते हैं । 

पर ईरान ने इसी आत्म-संसार को उसके रीयल के सामने खड़ा कर दिया। उसने दिखाया कि कोई भी ‘बड़ा अन्य’ (big other) स्वयं में पूर्ण नहीं है। अमेरिका कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है और न इज़राइल अजेय है। प्रतिबंध अंतिम हथियार नहीं हैं। सैन्य शक्ति राजनीतिक सत्य की गारंटी नहीं है। इतिहास किसी एक केंद्र की ही पटकथा के अनुसार नहीं चलता है। 

हमारी नजर में, इस युद्ध का यही सबसे बड़ा निष्कर्ष है।

इस युद्ध में ईरान की जीत को केवल इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि उसने अमेरिका को किसी पारंपरिक युद्धक्षेत्र में हरा दिया। निस्संदेह, इस युद्ध के अंतिम मुकाम पर अमेरिका के पास कोई दूसरी कारगर सैन्य रणनीति नहीं बची थी । पर इससे भी बड़ी बात यह है कि उसने अमेरिकी महाशक्ति के भ्रम को तोड़ दिया। 

इस अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन और रूस की भूमिका इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाती है। वे इसमें केवल ईरान के समर्थक नहीं रहे; वे उस नई वैश्विक गणना के संकेतक के रूप में सामने आएं जिसमें अमेरिका अब विश्व का अकेला व्याख्याता नहीं रह गया है। 

हम जानते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि अब कोई नई आदर्श व्यवस्था स्थापित हो चुकी है, जैसा कि हमारे इस काल के प्रमुख युद्ध रणनीति के विशेषज्ञ प्रवीण साहनी लगातार कह रहे हैं । वे इससे एक ऐसी नई विश्व-व्यवस्था के उदय का दावा कर रहे हैं, जिसमें युद्ध नहीं, शांति और विकास ही दुनिया के देशों के बीच व्यवहार के अकेले कारक रह जायेंगे । 

हमें लगता है कि अभी ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं होगा । बल्कि यह फिर एक नए भ्रम में गिरने के समान भी हो सकता है। हम इसे कहीं ज्यादा व्यापक और यथार्थ रूप में देखते हुए संक्षेप में यही कहेंगे कि यह वह घटना है जब इतिहास का वह अध्याय, जिसे अमेरिका ने अपने प्रभुत्व के अंतर्गत बंद कर देने की कोशिश की थी, फिर से खुल गया है।

बाद्यू की भाषा में, घटना वही होती है जो किसी स्थापित संसार की गणना में दर्ज नहीं होती, लेकिन उसी संसार की पूर्णता को संदिग्ध बना देती है। ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध इसी अर्थ में एक घटना है । 

अमेरिका ने युद्ध शुरू किया था इस विश्वास से कि वह ईरान को निर्णायक रूप से झुका देगा। लेकिन उसे अंततः ‘इस्लामाबाद एमओयू’ की दिशा में जाना पड़ा। यह एमओयू केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है। 

इस एमओयू में सैन्य कार्रवाइयों की समाप्ति, 60 दिनों की वार्ता, होरमुज़ जलडमरूमध्य के खुलने, प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, संपत्तियों की मुक्ति और पुनर्निर्माण की संभावनाओं का उल्लेख केवल तकनीकी बातें नहीं हैं। ये युद्ध के पीछे के उस तर्क का प्रत्याख्यान है जो ईरान को केवल दंडित करने पर आधारित था। यहीं हमें ईरान आज के विश्व में एक ‘संभावित प्रमाता’ की स्थिति ग्रहण करता दिखाई देता है।

गौर करें कि हम ईरान को 'प्रमाता' नहीं, ‘संभावित प्रमाता’ कह रहे हैं । अगर सीधे 'प्रमाता'  कहते, तो यह देखना पड़ता कि ईरान ने इस युद्ध को किस हद तक अपनी नई पहचान का आधार बनाया है, कि उसके भीतर का राजनीतिक-सांस्कृतिक ताना-बाना इस घटना के अनुसार कितना पुनर्व्यवस्थित हुआ है, और वह इसके सत्य को दुनिया के सामने स्थायी रूप से पेश करने में कितना सक्षम है।

वह इस युद्ध के बाद 'प्रमाता' बनने की क्षमता (संभावना) रखता है, परंतु वह अभी वहां तक गया नहीं है। उसने ‘बड़े अन्य’ को खंडित किया है, लेकिन उस खंडन के बाद की विश्व-दृष्टि अभी उसके भीतर पूरी तरह संगठित नहीं हुई है। इस लिहाज से वह अभी इस 'घटना' के प्रति निष्ठा (Fidelity) की प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में है।

'संभावित प्रमाता' होने के नाते, ईरान अभी भी विजयी की तरह नहीं, उसी पुराने ढांचे (प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, पुनर्निर्माण) के भीतर बातचीत कर रहा है, हालाँकि अब उसकी बातचीत की स्थिति बहुत मजबूत है। यानी, उसने व्यवस्था को झकझोरा है, लेकिन नई विश्व-गणना का बोध अभी भी संभावनाओं के गर्भ में ही है।

प्रमाता कोई नैतिक नायक तो नहीं होता है लेकिन वह उस सत्य का वाहक जरूर होता है जो घटना से पैदा होता है। ईरान ने यह सत्य सामने रखा कि विश्व अब अमेरिकी सैन्य-संरचना की एकरेखीय गणना में नहीं समा रहा है; अमेरिकी प्रभुत्व की जकड़ अटूट नहीं है; उसमें दरार आ चुकी है।

और, यह दरार ही रीयल है। दुनिया अब पहले जैसी नहीं रह गई है। यह इस युद्ध का सत्य है।

इसीलिये, अमेरिका–इज़राइल धुरी का यह संकट हमारी नजर में, दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

इस पूरे प्रसंग को और भी गहराई से पूरे परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए हमें बीसवीं शताब्दी के अंत की दो अत्यंत प्रभावशाली घोषणाओं को याद करना चाहिए।




पहली थी फ्रांसिस फुकुयामा की “इतिहास का अंत और अंतिम मनुष्य” (The end of History and the Last Man) की घोषणा।

सोवियत संघ के विघटन के बाद फुकुयामा ने दावा किया था कि अब वैचारिक संघर्ष का युग समाप्त हो चुका है। उदार लोकतंत्र और पूँजीवादी विश्व-बाज़ार मानव राजनीतिक विकास के अंतिम रूप के रूप में सामने आ चुके हैं। युद्ध, संघर्ष और वैकल्पिक विश्व-दृष्टियाँ अब केवल अवशेष भर होंगी; इतिहास अपने अंतिम संगठन तक पहुँच चुका है।

यह घोषणा केवल राजनीतिक नहीं थी; यह पश्चिमी प्रभुत्व की दार्शनिक आत्म-घोषणा थी। उसमें अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं था; वह इतिहास के अंतिम रूप का संरक्षक बन गया था।

लेकिन इतिहास की विडंबना यही है कि वह अपने अंत की ऐसी  घोषणाओं को कभी स्वीकार नहीं सकता है । ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को भी इसकी पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास बंद नहीं हुआ था; उसे बंद मान लिया गया था। पर, इतिहास की वापसी किसी नए यूटोपिया के रूप में नहीं हुई है, बल्कि उस रीयल के रूप में हुई जिसे अंतिम घोषित व्यवस्था दबा नहीं सकी। 

बीसवीं सदी के अंत में की गई दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना थी सैमुअल हंटिंगटन (Samuel P. Huntington) की, वर्तमान विश्व में “सभ्यताओं का संघर्ष” की स्थापना।

फुकुयामा जहाँ संघर्ष के अंत की बात कर रहे थे, वहीं हंटिंगटन कह रहे थे कि संघर्ष जारी रहेगा, लेकिन उसका आधार विचारधारा नहीं, सभ्यता होगी। उनकी दृष्टि में पश्चिम और उसके संस्थान अंततः इस संघर्ष के केंद्रीय नियामक बने रहेंगे। 

ईरान हंटिंगटन की विश्व संबंधी इस रूपरेखा में लंबे समय से एक “सभ्यतामूलक अन्य”(civilizational Other) की तरह उपस्थित रहा, वह जो पश्चिम की सांस्कृतिक–राजनीतिक सार्वभौमिकता में वैसे ही पूरी तरह समाहित नहीं होता, जैसे, उनके अनुसार, इस्लामी, सिनिक (चीनी), ऑर्थोडॉक्स आदि सभ्यताएं भी नहीं होती । 

यहां यदि हम ‘अन्य’ के बारे में लकानियन धारणा का प्रयोग करें कि वह कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि वह स्थान है जिससे कोई व्यवस्था अपनी पहचान बनाती है, (मैं स्वयं को “मैं” तभी कहता हूँ जब कोई “अन्य” हो !), तो कहेंगे कि ईरान सभ्यता के बाहर नहीं था, वह उस बिंदु का नाम था जहाँ पश्चिम स्वयं को सार्वभौमिक सिद्ध करने में अटकने लगा, वह पश्चिम की सीमाओं को उजागर करने वाले बाह्य-आंतरिक बिंदु के रूप में मौजूद रहा। 

लेकिन इस युद्ध ने विचित्र रूप से सब उलटफेर कर दिया है। यदि इसे केवल सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में पढ़ा जाए, तो संभव है कि हम उसके कईं, अधिक निर्णायक पहलू को खो दें।

इसे एक दूसरी भाषा में, हम अपना अंतहीन विस्तार चाहने वाले जुएसॉंस (jouissance) की राजनीतिक प्रवृत्तियों और शांति और स्थिरता की homeostasis की राजनीति की प्रवृत्तियों के बीच के तनाव के रूप में भी देख सकते हैं । यहाँ jouissance का अर्थ वह जिद, विस्तार और ऐतिहासिक नियंता बनने की राजनीति है जो स्वयं को सार्वभौमिक बनाने की ओर प्रवृत्त होती है। इसके विपरीत homeostasis उस संतुलन, सीमांकन और अस्तित्वगत स्थिरता का नाम है, जो व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश करती है। 

इस अर्थ में संघर्ष केवल सांस्कृतिक पहचान का नहीं रह जाता; वह उस प्रश्न का रूप ले लेता है कि विश्व किस प्रकार की ऐतिहासिक ऊर्जा पर संगठित होगा। यह विभाजन न तो अपने में पूर्ण है और न ही नैतिक है। संभव है कि इसकी रूपरेखा में कुछ अधिक आदर्शवाद झलकता हो।

पर हम इसे बीसवीं शताब्दी की उस पुरानी प्रतिद्वंद्विता के एक नए रूप के रूप में देख सकते हैं जिसे कभी साम्राज्यवाद और समाजवाद के बीच के प्रमुख अन्तर्विरोध के रूप में विवेचित किया जाता था।

इसीलिये, अब प्रश्न यह नहीं है कि नई विश्व-व्यवस्था कितनी सुंदर होगी। प्रश्न यह है कि क्या इस दरार से नए प्रमाता पैदा होंगे। क्या गरीब और परिधीय देश इस खुले हुए इतिहास में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराएँगे। क्या वे केवल नए ध्रुवों के ग्राहक बनेंगे या स्वयं विश्व की पुनर्गणना में भाग लेंगे।

फुकुयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की थी। हंटिंगटन ने संघर्ष के स्थायी भूगोल की कल्पना की थी। इस युद्ध ने दोनों को एक साथ चुनौती दी है।

इतिहास समाप्त नहीं हुआ। सभ्यताओं की रेखाएँ भी अंतिम सिद्ध नहीं हुईं। विश्व फिर से एक खुले समुच्चय की तरह सामने आया है।

ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध का सबसे बड़ा निचोड़ यही नहीं कि किसने किसे हराया। उसका सबसे बड़ा निचोड़ यह है कि कोई भी शक्ति इतिहास को अंतिम रूप नहीं दे सकती। 

यहां रीयल ने इतिहास को कोई दिशा नहीं दी है, उसने केवल यह सिद्ध किया कि इतिहास अभी समाप्त नहीं हुआ था । 

इतिहास का अर्थ तभी बनता है जब वह बंद न हो। 

इतिहास फिर से खुल गया है।








गुरुवार, 11 जून 2026

पश्चिम बंगाल के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम पर एक टिप्पणीः

 −अरुण माहेश्वरी



पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद जिस तेजी से उसके राजनीतिक निष्कर्ष घोषित किये जा रहे हैं, वे स्वयं राजनीति के बारे में हमारी समझ के संकट के उदाहरण प्रतीत होते हैं। चुनावी परिणामों के तुरंत बाद अनेक टिप्पणीकारों और विपक्षी नेताओं ने लगभग उत्सवधर्मी अंदाज़ में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का समाधि-लेख लिखना शुरू कर दिया। यह मान लिया गया कि सत्ता परिवर्तन केवल सरकार का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग का अंत है।

लेकिन राजनीति की विडंबना यही है कि वह बार-बार उन लोगों को झुठलाती है जो उसे किन्हीं अंतिम रूपों में बाँधना चाहते हैं।

तथ्यों को देखें तो पता चलेगा कि तस्वीर इतनी सरल नहीं, बल्कि कहीं ज्यादा जटिल है। तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई है, लेकिन उसे मिला लगभग 41 प्रतिशत मत कोई मामूली अवशेष नहीं कहा जा सकता। यह किसी ऐसे सामाजिक-राजनीतिक आधार का संकेत भी है जो चुनावी हार के बावजूद तत्काल समाप्त नहीं हुआ करता है, यदि पराजित शक्ति ने आत्म-हत्या का रास्ता न चुन लिया हो। 

इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है कि पश्चिम बंगाल में परिणाम आने के बाद जो दृश्य सामने आया, उसमें चुने हुए विधायकों के एक हिस्से ने विभिन्न कारणों से नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह का रास्ता चुना; विपक्ष के नेता के चयन को लेकर विवाद खड़ा हुआ; अनेक नेताओं पर कार्रवाई, गिरफ्तारियों और राजनीतिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए; दिल्ली में संसदीय दल के टूटने और बड़ी संख्या में सांसदों के अलग होने की चर्चाएँ चलीं; और इसके चलते ही आम स्तर पर यह धारणा फैलने लगी कि अब तृणमूल केवल औपचारिक अस्तित्व भर रह जाएगी।

लेकिन गौर करने की बात है कि इसी बिंदु पर यहां की राजनीति ने फिर अपना दूसरा चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है।

जब अधिकांश लोग बंगाल के मैदान में तृणमूल की अंतिम पराजय का दृश्य देख रहे थे, उसी समय ममता बनर्जी ने संघर्ष का केंद्र ही बदल दिया है। उन्होंने राज्य की तत्कालीन शक्ति-संरचना के भीतर सीमित लड़ाई के बजाय राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में नए संयोजन की संभावना तलाशनी शुरू कर दीं। कांग्रेस के साथ संवाद, इंडिया ब्लॉक के मंच पर सक्रियता, और राष्ट्रीय विपक्षी धुरी में अपने लिए नई जगह बनाने की कोशिश—इन सबसे यही संकेत मिला कि राजनीति हमेशा उसी जगह नहीं लड़ी जाती जहाँ हार दिखाई देती है।

इसा बिंदु को हम यदि गणित के आधुनिक समुच्चय सिद्धांत (set theory) के रचयिता जॉर्ज कैंटर और हमारे समय के सबसे बड़े दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के विचारों की रोशनी में देखें तो बात और स्पष्ट हो जाती है।

कैंटर ने बताया था कि कोई भी समुच्चय अपनी वर्तमान गणना से समाप्त नहीं हो जाता। उसके भीतर उपसमुच्चयों (subsets) और संबंधों की अनंत संभावनाएँ होती हैं। बाद्यू ने राजनीति को इसी अनेकता का क्षेत्र माना। कोई भी भुवन (world) वस्तुओं का स्थिर संग्रह नहीं होता है बल्कि उपस्थितियों की एक ऐसी संरचना होता है जिसमें कुछ तत्वों को अधिक दृश्यता और कुछ को न्यून दृश्यता प्राप्त होती है। किसी भी भुवन में जो उपस्थित है, वही संपूर्ण नहीं होता; उसके भीतर ऐसी संभावनाएँ भी रहती हैं जिन्हें वर्तमान सत्ता-दृष्टि गिनती में शामिल नहीं कर पाती है।

इस दृष्टि से तृणमूल की पराजय को उसका अंत मान लेना राजनीति को समुच्चयों की गतिशील अनेकता के बजाय वर्तमान गणना के स्थिर परिणाम में सीमित कर देना है। यह वही दृष्टि है जो किसी समुच्चय की किसी एक आकृति को ही पूरा समुच्चय मान लेती है। आकृति को समुच्चय मान लेना ही हर विश्लेषण की मूलभूत भूल होती है; क्योंकि समुच्चय संभावनाओं का क्षेत्र है और आकृति उसकी किसी विशेष ऐतिहासिक अभिव्यक्ति का नाम।

पश्चिम बंगाल के इस पूरे उभरते हुए दृश्य में हमें सबसे विचित्र स्थिति वामपंथ की दिखाई देती है।

बंगाल का वाम, जो हमेशा इतिहास की लंबी दृष्टि और संरचनात्मक विश्लेषण का दावा करता रहा है, इस पूरे प्रसंग में कई बार एक अजीब अनुभववाद में फँसा दिखाई देता है। उसका एक हिस्सा मानो इस विश्वास में ही फंसा हुआ है कि तृणमूल का पतन अपने आप उसके लिए राजनीतिक रिक्त स्थान बना देगा। “पहले राम, बाद में वाम” जैसी राजनीतिक मनोवृत्ति—अर्थात पहले वर्तमान प्रतिद्वंद्वी का अंत हो, आगे की राजनीति बाद में देखी जाएगी—वास्तव में राजनीति को एक यांत्रिक क्रम में बदल देती है।

इसीलिये हमें, वाम की समस्या केवल रणनीतिक नहीं, ज्ञानमीमांसात्मक भी लगती है।

कल ही हम बंगाल में सीपीएम के सचिव मोहम्मद सलीम का एक साक्षात्कार सुन रहे थे । वे उसमें जिस प्रकार राजनीति को ‘ऊपर वालों और जमीन वालों’ में विभाजित करके कह रहे थे कि दिल्ली में लोग जितनी भी ऊंची बात कर लें, पर जमीनी अनुभव बिल्कुल अलग है । इससे लगता था मानों उनके लिए सांप्रदायिक फासीवाद की चुनौती केवल दिल्ली की उच्च राजनीति का विषय है और स्थानीय असंतोष अंततः स्वतः वाम की वापसी का कारण बन जायेगा। ‘पहले राम बाद में वाम’ के स्थानीय रूझान में मूलतः यही समझ प्रतिध्वनित होती है ।   

हमारी नजर में यह समुच्चय की राजनीति नहीं, एक प्रकार से रिक्त स्थान की राजनीति है। समुच्चय में रिक्त स्थान कभी रिक्त नहीं रहता है।

बंगाल के पिछले डेढ़ दशक का अनुभव भी यही बताता है। 2011 के बाद से वाम का मताधार लगातार सिकुड़ता गया और 2026 में भी उसमें कोई निर्णायक सुधार नहीं दिखा। यह केवल संगठन की समस्या नहीं; राजनीतिक दृश्यता की समस्या भी है। यदि कोई शक्ति स्वयं को केवल दूसरे की विफलता के सहारे पुनर्स्थापित करना चाहती है, तो वह अपने लिए नए प्रमाता, नए सत्य और नए गठबंधन की खोज छोड़ देती है।

वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि इसमें विडंबना यह हो सकती है कि जो शक्ति अब तक क्षेत्रीय मानी जाती थी, वह संकट की स्थिति में राष्ट्रीय गठबंधनों के माध्यम से अपना दायरा बढ़ा लें; और जो शक्ति स्वयं को ऐतिहासिक-वैचारिक केंद्र मानती रही, वह आगे और सिकुड़ते हुए अपने अनुशासित कैडरों के छोटे दायरे में ही सिमट जाए।

यह कोई भविष्यवाणी नहीं है। क्योंकि, राजनीति कभी बंद समुच्चय नहीं होती। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने ममता बनर्जी का समाधि-लेख लिख दिया, वे राजनीति को स्थिर चित्र की तरह पढ़ रहे हैं। और जो लोग तृणमूल के समाधि-स्थल पर वाम के पुनर्जन्म का स्वप्न देख रहे हैं, वे भी उसी भूल के दूसरे रूप में फँसे हुए हैं।

राजनीति का सत्य न तो टीवी की रनिंग कमेंट्री में मिलता है, न चुनावी जीत या लूट के उत्सव में। वह उन संबंधों के पुनर्गठन में प्रकट होता है जिन्हें पहले असंभव माना जाता था।

और शायद बंगाल का यह क्षण फिर एक बार हमें यही याद दिला रहा है कि राजनीति में असंभव नाम की कोई श्रेणी नहीं है; उसमें केवल ऐसी संभावनाएँ होती हैं जिन्हें वर्तमान अभी देख नहीं पा रहा होता है। 

बंगाल में विधायकों का टूटना, नेताओं पर मुक़दमे, संसदीय दल में विद्रोह की अफ़वाहें, विपक्षी नेता के चयन का विवाद, दिल्ली में नए गठबंधन—ये सब भी किसी “अंतिम सत्य” के तथ्य नहीं हैं; ये भुवन की पुनर्गणना (re-counting) की प्रक्रियाएँ हैं। 

भुवन की पुनर्गणना की प्रक्रिया, अर्थात् जिसमें वही तत्व नई आकृति ग्रहण करते हैं और पुराने समुच्चयों के बीच संबंध बदल जाने से नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। यह इस बात की पुनर्गणना नहीं कि कितने बचे; यह पुनर्गणना है कि अब कौन किसके साथ गिना जाएगा।यद्यपि भुवन की पुनर्गणना अपने-आप में घटना (event) नहीं होती, पर वह ऐसी अस्थिरता का निर्माण कर सकती है जिसमें कोई नया सत्य प्रकट हो और उसके साथ उसके वाहक प्रमाता का जन्म संभव हो।

 



बुधवार, 3 जून 2026

सारस्वत साधना के पक्ष में –

 

−अरुण माहेश्वरी



इधर हमने राधावल्लभ त्रिपाठी जी के भारतीय ज्ञान परंपरा पर यू ट्यूब पर कई वक्तव्यों को सुना । खुद त्रिपाठी जी जिस परंपरा को अपनी किताब में “भारत की सारस्वत साधना” कहते हैं, अब वे अभी की धारा में बहते हुए उसके ‘ज्ञान मीमांसक’ पर चर्चा में लग गये हैं और इस परंपरा के कथित विउपनिवेशीकरण की चिंता में भी शामिल हो गये हैं ।  

दरअसल, त्रिपाठी जी की विशेषता है कि वे अपने वक्तव्यों में यूँ तो आम तौर पर काफी निर्लिप्त भाव से विषय का यथासंभव परिचय कराते हैं, किन्हीं प्रचलित धारणाओं को अनावश्यक रूप से चुनौती नहीं देते। परंतु उनकी पुस्तक की संरचना पर गौर करने से लगता है कि वे सूक्ष्म रूप से वर्तमान ज्ञान-चर्चा से अपने को थोड़ा अलग रख रहे हैं। 

हमारी समझ में, ज्ञान मीमांसा (Epistemology) और सारस्वत साधना एक नहीं हैं । इनमें एक सूक्ष्म, पर गहरा भेद है । यह कुछ वैसा ही भेद है जो ज्ञान की संरचना और ज्ञान के प्रस्फुटन के बीच का भेद होता है। एक में ज्ञान विषय (object) के रूप में विश्लेषित होता है, दूसरे में वह प्रमाता की चेतना के रूप में साधित होता है। 

ज्ञान मीमांसा में प्रश्न होता है कि ज्ञान क्या है, कैसे उत्पन्न होता है, उसका प्रमाण क्या है? यहाँ ज्ञान एक वस्तु (object) है, जिसका अध्ययन किया जाना है । जैसे हमारा न्याय दर्शन करता है और कांट अपने   ‘Critique of Pure Reason’ में तत्त्वमीमांसा की सीमाओं और संभावनाओँ को अध्ययन का विषय बना कर करते हैं । यहाँ प्रमाता स्वयं भी विश्लेषण का विषय बन सकता है।

पर सारस्वत साधना का सवाल यह नहीं है कि ज्ञान क्या है। यह स्वयं को उस स्थिति में ले जाती है जहाँ से ज्ञान स्वतः प्रवाहित होता है। यह ज्ञान को विषय नहीं, बल्कि चेतना की शक्ति (चिति-शक्ति) मानती है। यहाँ प्रश्न है कि कोई उस स्रोत तक कैसे पहुँचे जहाँ से वाणी और ज्ञान उत्पन्न होते हैं? 

ज्ञान मीमांसा मस्तिष्क का एक बौद्धिक अनुशासन, विश्लेषणात्मक, तार्किक कार्य है। सारस्वत साधना चित्त का परिष्करण, संवेदनशीलता का विकास और मौन का अनुशासन, चिति का कार्य है। इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का विश्लेषण है तो सारस्वत साधना ज्ञान का अवतरण ।

जैसे अभिनवगुप्त के शब्दों में वाक् साध्य नहीं, सिद्ध है, उसे केवल अवरोधों से मुक्त करना होता है। ज्ञान मीमांसा भाषा को चिह्नों, प्रतीकों, प्रतिनिधित्व के रूप में देखती है जबकी सारस्वत साधना उसे स्फोट के रूप में जहाँ शब्द प्रकट नहीं होता बल्कि फूटता है । 

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ज्ञान मीमांसा प्रमाता का अध्ययन करती है जबकि सारस्वत साधना प्रमाता का रूपांतरण । ज्ञान मीमांसा में ज्ञान लक्ष्य है सारस्वत साधना में परिणाम । इसमें लक्ष्य है प्रमाता की वह स्थिति जहाँ ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता है। ज्ञान मीमांसा प्रमाण का अध्ययन है और सारस्वत साधना प्रमाता की प्रत्यभिज्ञा । 

इसे यदि हम लकानियन पदावली में समझे तो पायेंगे कि ज्ञान मीमांसा विश्वविद्यालयी विमर्श (University discourse) है, जबकि सारस्वत साधना विश्लेषक का विमर्श (Analyst discourse) जहाँ ज्ञान दिया नहीं जाता, बल्कि ज्ञान उत्पन्न होने की स्थिति निर्मित की जाती है । हम जिस बात को "प्रमाता से अनीहा क्यों?" के सवाल के साथ उठाना चाहते हैं, वह भी कहा जा सकता है कि सारस्वत साधना का ही आधुनिक दार्शनिक रूप है क्योंकि हमारा जोर ज्ञान के सिद्धांत पर नहीं प्रमाता की संरचना पर हैं। 

इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान को जानती है, सारस्वत साधना ज्ञान को जन्म देती है । 

राधावल्लभ जी ने भारतीय ज्ञान चर्चा को शंकर के वेदांत अथवा बौद्ध दर्शन की सीमाओं को पार कर पाणिनी, कौटिल्य, वात्स्यायन, भरतमुनि, भृतहरि से लेकर आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, पण्डितराज जगन्नाथ से होते हुए गोपीनाथ कविराज, रामावतार शर्मा, रेवाप्रसाद द्विवेदी तक का जो विस्तार दिया है, वह ज्ञान के सत्य के असीम-अनंत शाश्वत रूपों की निरंतरता से जुड़ने का उपक्रम हैं न कि उसे कोरा विश्वकोशों के स्तंभों में समेटने का । 

“ज्ञान मीमांसा ज्ञान का अध्ययन है।” जब हम यह कहते हैं तो जाहिर है कि प्रमाता स्वयं यहाँ एक तटस्थ पर्यवेक्षक (observer) के रूप में आता है। भारतीय न्याय दर्शन से लेकर कांट तक यही संरचना है। जब हम ज्ञान को प्रमाता का गुण मान लेते हैं तब स्वयं प्रमाता हमारे सवालों के दायरे के बाहर हो जाता है। इसी में ज्ञान मीमांसा की सीमा निहित है।

जब हम कहते हैं कि “सारस्वत साधना ज्ञान का साधन है।” तब यहाँ पूरा परिप्रेक्ष्य बदल जाता है। ज्ञान यहाँ object नहीं है। ज्ञान यहाँ प्रमाता की चेतना की अवस्था है। इसलिए सारस्वत साधना का प्रश्न है: प्रमाता किस स्थिति में ज्ञान का स्रोत बनता है? यहाँ ज्ञान अर्जित नहीं अवतरित होता है। हम पुनः दोहरायेंगे, ज्ञान मीमांसा में ज्ञान लक्ष्य है, सारस्वत साधना में ज्ञान परिणाम है।

दोनों के बीच यह भेद अत्यंत निर्णायक भेद है। ज्ञान मीमांसा में ज्ञान साध्य है, सारस्वत साधना में एक चर्वणा का महज सह-उत्पाद । इस चर्वणा का लक्ष्य है: प्रमाता की वह संरचना जहाँ ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता है।

“ज्ञान मीमांसा प्रमाता की संरचना का विश्लेषण करती है; सारस्वत साधना प्रमाता की संरचना में हस्तक्षेप करती है।”

यहाँ पहली बार प्रमाता स्वयं प्रश्न बन जाता है। ज्ञान मीमांसा प्रमाता को प्रदत मानती है। सारस्वत साधना उसे प्रक्रिया । अभिनवगुप्त का प्रत्यभिज्ञा दर्शन इसी बिंदु पर निर्णायक है। प्रमाता स्थिर सत्ता नहीं बल्कि अन्य के अभिज्ञान से लगातार अस्थिर चिति की गतिशीलता है। 

जब हम कहते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञान का संग्रह है, भारतीय सारस्वत साधना ज्ञान का स्रोत है, तो तात्पर्य होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा शास्त्रों में है; सारस्वत साधना चेतना में है। शास्त्र ज्ञान नहीं ज्ञान का अक्स है। अभिनवगुप्त स्पष्ट कहते हैं: शास्त्र ज्ञान उत्पन्न नहीं करता, ज्ञान प्रमाता में प्रकट होता है।

जब हम कहते हैं कि ज्ञान मीमांसा भाषा को चिन्ह मानती है, सारस्वत साधना भाषा को स्फोट मानती है, तब ज्ञान मीमांसा भाषा को प्रतिनिधित्व मानती है। इसके बजाय सारस्वत साधना में भाषा को प्रकाश का प्रस्फुटन माना जाता हैं। शब्द चिह्न नहीं शक्ति है।

ज्ञान मीमांसा विश्वविद्यालयी विमर्श है और सारस्वत साधना विश्लेषक का विमर्श (Analyst discourse) है। यह एक लकानियन समझ है जिसमें जॉक लकान के अनुसार ज्ञान मीमांसा का संस्थागत रूप विश्वविद्यालयी विमर्श की ओर झुकता है; सारस्वत साधना विश्लेषक-विमर्श की तरह उस बिंदु की खोज करती है जहाँ प्रमाता स्वयं अपनी संरचना से विचलित होता है। इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का उत्पादन करती है तो सारस्वत साधना प्रमाता का । 

यहां एक सबसे निर्णायक सूत्र आता है कि ज्ञान मीमांसा ज्ञान को जानती है, सारस्वत साधना ज्ञान को जन्म देती है। ज्ञान मीमांसा ज्ञान का ज्ञान है (knowledge of knowledge) पर सारस्वत साधना में ज्ञान एक सृजन है । यहाँ प्रमाता सर्जक होता है। हमारे अभिनवगुप्त इसी  सारस्वत साधना के दार्शनिक हुए हैं, इसीलिये हम उन्हें आधुनिक मनोविश्लेषकों की श्रेणी में रख कर विचार का विषय बनाते हैं । उनका पूरा कार्य ज्ञान मीमांसा नहीं, सारस्वत साधना का दर्शन है। उनके लिए ज्ञान प्रमाता की स्वातन्त्र्य शक्ति है। ज्ञान अर्जित नहीं अभिज्ञात है। प्रत्यभिज्ञा ज्ञान मीमांसा नहीं तात्विक जागृति है। 

जॉक लकान भी आधुनिक सारस्वत साधना के दार्शनिक है, इसीलिये उन्हें कार्ल मार्क्स की तरह ही हम गैर-दार्शनिक दार्शनिकों की श्रेणी में रखते हैं । लकान का पूरा मनोविश्लेषण ज्ञान का सिद्धांत है, प्रमाता का रूपांतरण जैसे मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत और सर्वहारा के रूप में समाज के हरावल दस्ते का निर्माण है । मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में उस ऐतिहासिक प्रमाता की खोज है जो मनुष्य को उसके पराधीन सामाजिक रूपों से मुक्त कर स्वतंत्र मनुष्य (free man) की स्थिति तक ले जाता है; यह स्थिति अभिनवगुप्त के भैरव भाव की तरह किसी स्थिर सार की नहीं, बल्कि स्वातन्त्र्य की सक्रिय अवस्था है। इसीलिये मार्क्स का सर्वहारा वर्ग नहीं, स्वतंत्र प्रमाता है ।

लकान कहते हैं: सत्य को सिखाया नहीं जा सकता, उसे सिर्फ उत्पन्न किया जा सकता है (truth cannot be taught it can only be produced) । लकान की विश्लेषणात्मक प्रक्रिया, ट्रांसफरेंस (आनयन), और ‘प्रमाता को पता हो’ (subject supposed to know) की उनकी धारणा अनायास ही उसे सारस्वत साधना से जोड़ती है।

अपनी पुस्तकों, “अथातो चित्त जिज्ञासा”, “प्रमाता का आवास”,“प्रमाता से अनीहा क्यों” आदि में हमने सचेत रूप से उन्हें ज्ञान मीमांसा की पुस्तक बनने से बचाने की कोशिश की हैं। वहां ज्ञान का संग्रह नहीं, फ्रायडियन- लकानियन मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के आलोक में भारतीय चिंतन के तंत्र साहित्य, शैवमत और खास तौर पर अभिनवगुप्त की चर्वणा से एक आधुनिक भारतीय मनोविश्लेषण की दृष्टि पाने की कोशिश है । इस अर्थ में वे वर्तमान काल की सारी विसंगतियों में एक नये प्रमाता की संरचना को उद्घाटित करने का प्रयास हैं। उनमें उपलब्ध ज्ञान का विश्लेषण नहीं प्रमाता का प्रकटीकरण है। 

कुल मिला कर, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का विज्ञान है सारस्वत साधना ज्ञान का जन्मस्थान है और कह सकते हैं कि प्रमाता उन दोनों के बीच का गुप्त सेतु।

इसी संदर्भ में हम आगे, जब संभव हुआ, कुछ चर्चा ‘ज्ञान के विउपनिवेशीकरण’ की धारणा पर भी करना चाहेंगे, जिसे लेकर हमारे सामने बहुत गहरी समस्याएं हैं ।


रविवार, 24 मई 2026

धरती का जीव होने पर भी “कॉकरोच” को पृथ्वीत्व होना अभी बाकी है


अरुण माहेश्वरी 

  

कॉकरोच जनता पार्टी के बारे में राजनीतिक चर्चाओं में अब यह स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि इस कॉकरोच की आखिर ठोस राजनीतिक पहचान क्या है? भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह चाहती क्या है, और इससे जुड़ रहे लोग भी आखिर इससे क्या उम्मीद रखते हैं?

Slavoj Žižek की पुस्तक The Sublime Object of Ideology में एक लेख का शीर्षक है “Che vuoi?”। इतालवी भाषा के इस वाक्य का शाब्दिक अर्थ है — “आप क्या चाहते हैं?”

जैसा कि हम जानते हैं कि लकानियन मनोविश्लेषण में प्रमाता की इच्छा का अर्थ होता है ‘अन्य की इच्छा । (Other’s desire) । इसीलिये  “Che vuoi?” का अर्थ हो जाता है: “अन्य (the Other) मुझसे क्या चाहता है? लकान के अनुसार मनुष्य की इच्छा कभी पूरी तरह स्वायत्त नहीं होती। हम हमेशा इस प्रश्न से घिरे रहते हैं कि समाज हमसे क्या चाहता है, माता-पिता क्या चाहते हैं, सत्ता क्या चाहती है,  प्रेमी/प्रेमिका क्या चाहते हैं और अंततः “दूसरा” (the Other) हमारी पहचान से क्या अपेक्षा करता है। अर्थात् इससे यह प्रश्न उठ जाता है कि मेरी इच्छा वास्तव में किसकी इच्छा से संचालित है?

यही कारण है कि “Che vuoi?” चिंता (anxiety) से भी जुड़ जाता है। और, जब हमें यह समझ में नहीं आता कि “दूसरा” हमसे क्या चाहता है, तब हममें एक स्वाभाविक बेचैनी पैदा होती है। इस प्रकार, इच्छा हमेशा एक बेचैनी की सबब होती है । 

लकानियन मनोविश्लेषण के अनुसार, बच्चा माँ की दृष्टि में लगातार यह पढ़ने की कोशिश करता है कि माँ मुझसे क्या चाहती है? नागरिक सत्ता से पूछता है कि राष्ट्र मुझसे क्या चाहता है; प्रेम में व्यक्ति पूछता है कि तुम वास्तव में मुझसे क्या चाहते हो? 

इस प्रकार Che vuoi? इच्छा, पहचान, सत्ता और चिंता—इन सबके केंद्र में स्थित प्रश्न होता है। यह केवल एक भाषिक प्रश्न नहीं, विचारधारा के हृदय में स्थित उस खालीपन का नाम होता है जहाँ प्रमाता स्वयं से बराबर पूछता है कि “चाहते क्या हो?” लकान और उनके शिष्य जिजेक आदि की सबसे बड़ी खोज यही है कि प्रमाता अपनी चाहत को कभी सीधे नहीं जानता। वह हमेशा दूसरे की चाहत के रास्ते से अपनी चाहत तक पहुँचता है। इसीलिए “Che vuoi?” का तात्पर्य ही है कि “दूसरा मुझसे क्या चाहता है?” और इसी प्रश्न से प्रमाता की पहचान (identity) का निर्माण शुरू होता है।

जिजेक आम धारणा के विपरीत विचारधारा को किसी स्थिर सिद्धांत या मान्यता के रूप में रखने के बजाय उसे एक ऐसी रजाई (quilt) की तरह रखते हैं जो जीवन के तमाम तरल, बिखरे हुए संकेतकों को अपने अंदर ढंक कर एक अस्थायी स्थिरता प्रदान करती है। समाज में राष्ट्र, धर्म, जाति, भ्रष्टाचार, जनता, सुरक्षा, संस्कृति, देशद्रोह, क्रांति आदि को लेकर विचार के असंख्य संकेतक तैरते रहते हैं जिनका अपने आप में कोई निश्चित अर्थ नहीं होता है। वे “खुले” संकेतक की तरह होते हैं। ये हमेशा श्रृंखला की अन्य कड़ियों से जुड़ कर ही अपना खास अर्थ ग्रहण करते हैं । राष्ट्र, धर्म, जाति, संस्कृति, क्रांति आदि सबके अर्थ सबके लिए एक नहीं होते । यहां तक कि भ्रष्टाचार, जनता, सुरक्षा, देशद्रोह का भी सबके लिए एक मायने नहीं होता । इसीलिये जिजेक कहते हैं कि विचारधारा की भूमिका किसी “खाली कनस्तर” की तरह होती है जो अपने भीतर कोई ठोस सार नहीं रखती; बल्कि वह विभिन्न असंतोषों, कुंठाओं, भय और इच्छाओं को अपने अंदर समेट कर उन्हें एक काल्पनिक एकता प्रदान करती है। रजाई के टांकें (quilting point) उसकी रूई को अस्थायी स्थिरता देते हैं । जिजेक के शब्दों में विचारधारा वास्तविकता को छिपाती नहीं, बल्कि वह उस रिक्ति को ढँकती है जिसके बिना सामाजिक वास्तविकता स्वयं ही टूट-फूट कर बिखर जायेगा । 

आज जब हम इस “चाहते क्या हो?” के सवाल की रोशनी में अचानक प्रकट हुई “भारतीय कोकरोच पार्टी” जैसी घटना को देखते हैं तो हमारे सामने “कॉकरोच” केवल एक कीट नहीं, एक ऐसे ही तरल संकेतक (floating signifier) के रूप में आता है जिसमें व्यवस्था से बाहर फेंके गये, तिरस्कृत, अदृश्य और गंदगी मान लिये गये लोगों की सामूहिक पहचान भरती हुई नजर आती है। हमने अपने पिछले लेखों में यह गौर किया है कि कैसे जो सत्ता सामान्यतः “कोकरोच” शब्द का उपयोग अपमान के लिए करती है, वही एक विचारधारात्मक प्रक्रिया में उसके बिल्कुल उलट प्रतिरोध का भाव बन जाता है। इसीलिये इसके उदय ने अनायास ही हमारे सामने रोम में गुलामों के विद्रोह से लेकर 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, 1917 की समाजवादी क्रांति फिर सन् ’60 के फ्रांस के कैंपस विद्रोह, अमेरिका के ब्लैक, भारत के अछूत, अरब स्प्रिंग की नई डिजिटल पीढ़ी से लेकर हाल की जेन जी की परिघटनाओं और उनमें अलग-अलग काल और भुवनों में शाश्वत राजनीतिक सत्य के प्रमाता के लौट-लौट कर नये-नये नामों से आने के पूरे इतिहास को खड़ा कर दिया । यह पूरा इतिहास इस बात का भी प्रमाण है कि कैसे अपमान का शब्द अचानक एक राजनीतिक आत्म-पहचान में बदल जाता है।

यहीं “Che vuoi?” का प्रश्न विस्फोटक हो उठता है। व्यवस्था कहती है कि “तू क्या है?”  और दबा हुआ प्रमाता उसी भाषा में व्यवस्था से पूछने लगता है — “तुम हमसे क्या चाहते हो? क्या हम हमेशा अदृश्य ही बने रहें? कूड़े में, समाज की नीचे की अंधेरी सतहों में ही जिएँ? केवल श्रम और उपभोग की वस्तु बने रहें?” वह जो अंधेरे से रोशनी में आने को आकुल है, वही इतिहास के अलग-अलग भुवनों में अलग-अलग नामों के साथ सामने आ जाता है । 

भारत में चल रही अभी की कॉकरोच चर्चा से हमें ऐसा लगता है कि जैसे जिस विचारधारा को हम एक खाली कनस्तर, या सब पहचानों पर पड़ी कंबल के रूप में देख रहे हैं, उस कनस्तर को ही हमारे मुख्य न्यायाधीश ने अनायास ही एक नाम दे दिया है − “कॉकरोच”। वह जो  एक जैविक सत्ता नहीं, पर विचारधारात्मक रिक्ति का प्रतीक जरूर है ।  वह उस अंधेरी सड़ांध को प्रकट करता है जिसे व्यवस्था अपने चमकीले राष्ट्रवादी, विकासवादी और सांस्कृतिक कंबल के नीचे छिपाए रखती है।

जिजेक कहते हैं कि विचारधारा तभी सबसे अधिक तब सक्रिय होती है जब विचारधारा का सबसे अधिक अभाव होता हैं। आज का डिजिटल-उपभोक्तावादी समाज भी स्वयं को “व्यावहारिक”(pragmatic), “पोस्ट-आइडियोलॉजिकल”, “सिर्फ विकासोन्मुख” कहता है। पर इसी की सतह के नीचे असंख्य तिरस्कृत जीवन जमा हो रहे हैं। जाहिर है कि कॉकरोच उन्हीं उत्पीड़ित-दमित जिंदगियों का भयावह प्रतीक बन सकता है।

इसलिए हमारे सामने यह कोई महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है कि कॉकरोच पार्टी वास्तव में क्या है । हम तो यह समझना चाहते हैं कि उसने सामाजिक कल्पना में कौन सी रिक्ति को छू लिया है। कौन-सी दबी हुई चाहत, कौन-सा अपमान, कौन-सी अदृश्यता उसके माध्यम से बोलने लगी है।

और हमें लगता है कि शायद यही कारण है कि सत्ता ही नहीं, शायद सत्ता-तंत्र में किसी भी रूप में अपनी जगह बना चुकी अन्य सत्ता के बाहर की विपक्ष की ताकतें भी उसे लेकर आशंकित है, उस पर सवाल उठाती है और थोड़ा मज़ाक भी। क्योंकि हर विचारधारा जानती है कि कभी-कभी सबसे छुद्र समझा गया संकेतक ही पूरी प्रतीकात्मक व्यवस्था की सिलाई को उधेड़ सकता है।

हम कॉकरोच जनता पार्टी की परिघटना को किसी घटना के बीच से सामने आने वाले सत्य के प्रमाता की सत्य-विधि (truth procedure) की तरह देख पा रहे हैं जो हमें यह आश्वस्त करती है कि मोदी-सूर्यकांत-ज्ञानेश कुमार आदि जितनी भी सघन बुनावट की रजाई से सत्य को आवृत करने की कोशिश क्यों न करें, सत्य शाश्वत है जो असीम और अनंत रूपों में कहीं से भी छेद करके अपने को प्रकट कर लेता है । यह वह शिव तत्त्व है जो अपने स्वातंत्र्यवश ही अनेक प्रकारों में भासित हो कर पृथ्वीत्व होता है । 
हमारे अभिनवगुप्त कहते हैः

“तथाहि कालसदनाद्वीरभद्रपुरान्तगम् । 
धृतिकाठिन्यगरिमाद्यवभासाद्धरात्मता।।

(यह “कालसदन” (चित्त) से “वीरभद्रपुर” तक की यात्रा वास्तव में चेतना के क्रमिक संकोच और स्थिरीकरण की यात्रा है, जिसका अंतिम परिणाम “पृथ्वीत्व”, अर्थात् स्थूल, कठोर, वस्तुगत जगत, के रूप में सामने आता है। अभी हमें कॉकरोच का अवभास हो गया है, आगे उसे पृथ्वीत्व होते देखना है । वह विपक्ष के प्रभावी नेता राहुल गांधी के जरिये होता है, या कुछ और ही घटित होता है, कहना मुश्किल है । उसकी बात करके अभी की कॉकरोच पार्टी पर राय सुनाना निहायत तात्कालिकता में जीने वाली पत्रकारिता की गति का रूप है, सत्य का इससे कोई लेना-देना नहीं है ।

शुक्रवार, 22 मई 2026

पुनश्च: कोकरोच : एक राजनीतिक सत्य का प्रमाता

−अरुण माहेश्वरी



भारत के सीजेआई सूर्यकांत ने बेरोजगार नौजवानों के लिए ‘काकरोच’ शब्द का प्रयोग करके अनजाने में एक नए राजनीतिक नामकरण की जमीन तैयार कर दी । यह नामकरण नहीं बल्कि फ्रैंज काफ्का के कायांतरण का ही पुनर्कायांतरण है। काफ्का में कायांतरण अस्तित्वगत त्रासदी था; यहाँ वही रूपांतरण राजनीतिक प्रतिप्रत्यय (reversal) बन जाता है। अर्थात् जिसे व्यवस्था “कीट” कहती है, वही सत्य का वाहक बनता है। काफ्का ने विश्वयुद्धों की त्रासदी में फंसे मनुष्यों की विडंबना को तुच्छ कीट में रूप में देखा था । सीजेआई ने फासीवादी सत्ता के जोम में उसी जीव को राजनीति के सत्य के प्रमाता में कायांतरित कर दिया ।

काकरोच! स्थापित मानव पहचान के सब रूपों से परे राजनीति के सामान्य सत्य का प्रमाता जो किसी जाति, धर्म, भाषा या वर्ग का नहीं है, जो व्यवस्था की घृणा का ऐसा पात्र है जो हर दमन के बाद फिर लौट आता है, और जिसे पूरी तरह समाप्त कर पाना असंभव होता है। इसीलिये अब वह केवल अपमानसूचक शब्द नहीं है । वह राजनीतिक सत्य की प्रमात्रिकता (subjectivity) का एक नया नाम है।

ऐलेन बाद्यू के दर्शन में “राजनीतिक सत्य” का प्रमाता न तो केवल एक नागरिक होता है, न किसी समुदाय का प्रतिनिधि, न किसी जातीय, धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का वाहक। वह उस सत्य-प्रक्रिया का धारक-वाहक होता है जो स्वयं समुदायों, पहचानों और स्थापित वर्गीकरणों की सीमाओं को तोड़ती है। और जब कोई प्रमाता किसी राजनीतिक सत्य का प्रमाता बनता है, तब वह अपने को हर पूर्व-निर्धारित पहचान से विस्थापित कर देता है। इस मायने में उसकी भूमिका मूलतः “विस्थापनकारी” (displacing) होती है।

जहां तक राजनीतिक सत्य का सवाल है, वह इतिहास के भीतर पैदा होता है, लेकिन वह इतिहास से निःसृत या अलग नहीं होता। इतिहास उसका भुवन (world) होता है, उसका आधार नहीं। यह ठीक वैसे ही है जैसे गणित का सत्य केवल उसकी भाषा से पैदा नहीं होता, कला का सत्य केवल प्रतीकों से नहीं निकलता, वैसे ही राजनीति का सत्य केवल संस्कृति, परंपरा और पहचान की सीमाओं से नहीं निकलता। वह एक घटना (event) के रूप में स्फुटित होता है — ऐसी घटना, जो राज्य और समाज की स्थापित गिनती में एक छेद पैदा करती है।

ऐलेन बाद्यू के लंबे अर्से से एक राजनीतिक मित्र रहे सिल्वैन लाजारस (Sylvain Lazarus) जो खुद फ्रांस में एक बड़े समाजशास्त्री और राजनीतिक सिद्धांतकार के रूप में ख्यातिलब्ध रहे, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है  Anthropology of the Name (नाम का मानव विज्ञान) लाजारस ने इस पुस्तक में राजनीतिक नामों और वर्गीकरणों की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण किया है। इतिहास में कैसे राजनीतिक सत्य का प्रमाता किसी नए नाम से अवतरित होता रहा है! जैसे जन-विद्रोही स्पार्टा, फ़्रांसीसी क्रांति के “साँ-क्यूलोत” (sans-culottes), (कुलीनता-विरोधी जन), समाजवादी क्रांति में मज़दूर वर्ग, भारत के अछूत, अमेरिका के काले और आज की दुनिया के एलजीबीटी प्लस भी । ये नाम केवल सामाजिक श्रेणियाँ नहीं है; ये खास क्षण के राजनीतिक सत्य के वाहक के नाम हैं। इतिहास और अकादमिक चिंतन के लिए यह विश्लेषण निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन दर्शन के लिहाज से राजनीतिक सत्य का वास्तविक प्रमाता ऐसी किसी भी स्थायी पहचान में सीमित नहीं रह सकता है। वह हर नाम को पार कर जाता है; हर भुवन में लौट-लौट कर आता है । कोकरोच हमें इस सत्य का सबसे उपयुक्त नाम प्रतीत होता है । हम देखेंगे कि बहुत जल्द ही इसे एक दार्शनिक श्रेणी के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिलेगी ।

यहां “काकरोच” का रूपक एक नया अर्थ ग्रहण कर रहा है। वह किसी जैविक जीव का नाम नहीं रह जाता; वह उस प्रमाता का नाम बन जाता है जिसे राज्य और अभिजन राजनीति अपनी गिनती से बाहर फेंक देना चाहती है, लेकिन जो हर बार एक नए रूप में लौट आता है। वह व्यवस्था के लिए घृणित हो सकता है, पर राजनीतिक सत्य के लिए सबसे उपयुक्त वाहक है। इस प्रकार “काकरोच” अपमान का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सत्य का नाम बन जाता है जो हर स्थापित पहचान, हर अभिजन नैतिकता और हर राज्य-निर्धारित गिनती को भेद कर उभरता है। यही उसकी सार्वभौमिकता है, और यही उसका भयावह आकर्षण भी।

बाद्यू जब कहते हैं कि राजनीति एक घटना-जनित सत्य-प्रक्रिया है, तब उनका तात्पर्य यह होता है कि यह प्रक्रिया राज्य द्वारा पहले से “गिने जा चुके” सामाजिक वर्गों से पैदा नहीं होती। राज्य समाज को अपनी प्रशासनिक और वैचारिक गिनती में बाँध कर रखता है। पर राजनीतिक घटना हमेशा “गिनती से बाहर” (uncounted) स्थलों से फूटती है। घटना राज्य की गिनती में एक छेद पैदा करती है। 

यही कारण है कि आधुनिक राजनीति में कभी-कभी ऐसे उभार दिखाई देते हैं जो पारंपरिक दलगत और वैचारिक संरचनाओं के बाहर से आते हैं। भारत में जब एक ओर चुनावी प्रक्रिया से एक सर्वग्रासी फासीवादी प्रवृत्ति का उभार दिखाई देता है, तो वहीं दूसरी ओर राजनीति के भीतर ऐसे विचित्र और अनपेक्षित उभार भी पैदा होते हैं — जैसा हमने आम आदमी पार्टी या तमिलनाडु में विजय की टीवीके में देखा है। इनका महत्व केवल इनके कार्यक्रमों में नहीं, बल्कि इस तथ्य में भी होता है कि ये राजनीति को केवल राजसत्ता प्राप्ति की मशीन में बदल देने से इंकार करने की संभावना भी खोलते है । इनका महत्व उनके कार्यक्रमों से अधिक उनके अनपेक्षित उभार में है । 

यहीं से राजनीति स्वयं को राज्य से अलग करके सोचने लगती है। ठीक उसी तरह जैसे माओ की “सनातन क्रांति” का विचार इस धारणा पर टिका था कि क्रांति केवल सत्ता पर कब्ज़े की घटना नहीं, बल्कि सत्य की सतत पुनरावृत्ति है।

बाद्यू राजनीति के सत्यों की कुछ सामान्य विशेषताओं की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि हर राजनीतिक सत्य किसी ऐतिहासिक अनुक्रम में प्रकट होता है; हर सत्य का अपना एक प्रमात्रिक रूप (subjective form) होता है। इसलिए रोबेस्पिएर, लेनिन या माओ जैसे “राजसत्तावादी क्रांतिकारी” और स्पार्टाकस, म्युंत्सर या तुपाक अमारू जैसे जन-विद्रोही एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार, सत्य एक नहीं, सत्यों की बहुलता होती है — the multiple of truths।

लेकिन यह बहुलता केवल विचार में नहीं रहती। उसे किसी संगठित भौतिक शरीर (political body) की आवश्यकता होती है। लेनिनवादी पार्टी, लाल सेना, जन-संगठन — ये सब सत्य के उसी निकाय के रूप हैं, जिनके माध्यम से सत्य किसी ऐतिहासिक भुवन में प्रकट होता है।

बाद्यू के अनुसार हर राजनीतिक सत्य के मूल में कुछ उत्समूलक तत्व (generic kernel) होते हैं। इसमें पहला है इच्छा (desire) — सामाजिक-आर्थिक अनिवार्यता और दमन के विरुद्ध उठने की इच्छा। दूसरा है समानता (egalitarianism) — संपत्ति और सत्ता के स्थापित रूपों का निषेध। तीसरा है विश्वास (confidence) — जनता की सामूहिक शक्ति में विश्वास, उस अभिजनवादी संदेह का विरोध जो हमेशा जनता को अक्षम मानता है। और चौथा है रोब या दबदबा (terror) — अर्थात् वह शक्ति जो “मुक्त प्रतिस्पर्धा” के तथाकथित प्राकृतिक नियमों को अंतिम सत्य मानने से इंकार करती है और राज्य की हिंसा को सीधी जन-शक्ति से चुनौती देती है।

इसीलिए “सर्वहारा की तानाशाही” को मार्क्सवादी राजनीति में केवल दमनकारी अवधारणा के रूप में नहीं देखा गया था। वह राजनीतिक सत्य की इन चारों शर्तों को एक ठोस रूप देने का प्रयास था — समता की इच्छा, मजदूर वर्ग की शक्ति में विश्वास, स्थापित संपत्ति-सत्ता की संरचना का विरोध और मजदूर वर्ग की शक्ति के प्रत्यक्ष प्रदर्शन का रूप।

कोकरोच जनता पार्टी इन सब शर्तों को पूरा करेगी या नहीं, हम नहीं जानते । पर इसके गठन के साथ आज की राजनीति में दिखाई दे रहे आलोड़न से इतना साफ है कि भारत का दमित राजनीतिक सत्य अपने नए ऐतिहासिक रूप को पाने के लिए आकुल-व्याकुल है । अहंकारी सीजेआई ने उसकी जमीन तैयार कर दी है । जिस शब्द का प्रयोग अपमान के लिए किया गया था, वही अब एक नए राजनीतिक सत्य के नाम में बदलता दिखाई दे रहा है।