रविवार, 10 नवंबर 2019

महाराष्ट्र में शिवसेना एनसीपी की सरकार — सिद्धांत और व्यवहार की इस अनोखी गुत्थी पर एक नोट


—अरुण माहेश्वरी




अभी जब हम यह लिख रहे हैं, कांग्रेस कार्यसमिति महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी की सरकार को समर्थन देने, न देने के सवाल पर किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचने के लिये मगजपच्ची कर रही है । यह ‘मगजपच्ची’ शब्द ही इस बात का सूचक है कि जो भी समस्या है, उसे राजनीतिक व्यवहार की समस्या कहा जाए या एक सैद्धांतिक समस्या, कोशिश उसका एक भाषाई समाधान पाने की है ।

व्यवहारिक समस्या यह है कि महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना का गठबंधन ऐतिहासिक कारणों से ही अभी साथ-साथ आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं रह गया है । इसके पीछे ऐतिहासिक कारण यही है कि ये दोनों अपने को हिंदुत्ववादी कहने पर भी अलग-अलग दल हैं और इनमें शिवसेना मराठा पहचान के प्रतिनिधित्व पर अपनी इजारेदारी कायम करना चाहती है । अर्थात् सिर्फ हिंदुत्व नहीं, मराठावाद, जय महाराष्ट्र, मराठा जातीयतावाद का इन्हें अलगाने वाला मुद्दा एक जीवित मुद्दा है । मोदी के हिंदू, हिंदी, हिंदुस्थान के दबाव की स्वाभाविक उत्पत्तियों का एक रूप ।

पिछले लोकसभा चुनाव के समय जब बहादुर मोदी-शाह के दिल कांप रहे थे, उद्धव ठाकरे ने चाणक्य से राज्य में सत्ता की बराबर भागीदारी का करार लिया था । ‘कल की कल देखेंगे’ वाली चालाक बुद्धि ने तब जान बचाने के लिये हर कुछ के लिये हामी भर दी थी । लोक सभा चुनाव ने उनके अंदेशे को सही साबित किया और मोदी-शाह जोड़ी को फूल कर कुप्पा होने में क्षण भर का भी समय नहीं लगा । मीडिया तो गैस भरने का ही पैसा ले रहा था । मान लिया गया था कि हरियाणा और महाराष्ट्र में मोदी-शाह के घोड़े दौड़ेंगे । विपक्ष मैदान से गायब है, मीडिया रोज इसकी कहानियां सुना रहा था । लेकिन लोगों के दुखों से ही नित नई कहानी गढ़ी जाती है, इस साधारण बात की ओर किसी का ध्यान नहीं था । जनतंत्र में पक्ष-विपक्ष अंततः जनता तय करती है, और देखते-देखते पार्टियों के बड़े-बड़े महल वीरान खंडहरों में बदल जाते हैं, इन सचाइयों को सब भूल चुके थे ।

बहरहाल, हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह ही बीजेपी अपनी अपेक्षाओं के मानदंड पर बुरी तरह से पराजित हुई । हरियाणा में तो उसे अपनी मदद के लिये अमित शाह के जाल में फंसा दुखियारा अजय चौटाला मिल गया, लेकिन महाराष्ट्र में पहली बार शिव सेना के लिये अपने सपनों को पर देने के लिये जरूरी खुला आसमान मिल गया ।

अहंकार में डूबे मोदी ने पहले से ही फडनवीस को मुख्यमंत्री घोषित करके शिव सेना से वार्ता के दरवाजे बंद कर दिये थे । अब आज शिव सेना एनसीपी और कांग्रेस के सहयोग से अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही है । इस प्रकार महाराष्ट्र में खास मराठा राजनीति का सूत्रपात होने जा रहा है ।

एनसीपी खुद को इस मराठा राजनीति की हमेशा की एक स्वाभाविक मगर धर्म-निरपेक्ष संघटक शक्ति मानती रही है, इसलिये शिव सेना के साथ जाने के लिये उसे बहुत ज्यादा भाषाई मशक्कत करने की जरूरत नहीं है । इस मामले में थोड़ा सा पेचीदा मसला कांग्रेस के लिये जरूर है ।

दरअसल, राजनीतिक कार्रवाई का सैद्धांतिक निरूपण एक बहुत दिलचस्प विषय हुआ करता है । सिद्धांतों का राजनीतिक व्यवहारिक निरूपण तो इसलिये साधारण बात होती है कि उसमें जो भी किया जा रहा है, उसे पहले से ही बता दिया गया है । उसमें छिपा हुआ या लाक्षणिक प्रकार का कुछ नहीं होता है । चमत्कारों की संभावना तो लक्षणों में हुआ करती है जो यथार्थ में उतरने के पहले तक हवा में कहीं छिपे होते हैं । राजनीति का सौन्दर्यशास्त्र इसी में है । इसीलिये एक समय में अपने एक लेख में हमने हरियाणा के ‘आया राम गया राम’, लालू और मायावती की भूमिकाओं के सिलसिले में राजनीति के सौन्दर्यशास्त्र की चर्चा की थी जो चमत्कारी ढंग से असंभव को संभव बना कर राजनीति के गतिरोधों को तोड़ने और आगे का रास्ता बनाने का काम किया करती है।

आज कांग्रेस के सामने मूलतः जितनी एक सैद्धांतिक समस्या है, उतनी व्यवहारिक नहीं । जब महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम आए थे, 24 अक्तूबर को ही फेसबुक पर इस लेखक की पहली प्रतिक्रिया थी —
“ हवा से फुलाए गए मोदी के डरावने रूप में सुई चुभाने का एक ऐतिहासिक काम कर सकती है शिव सेना । वह ऐसा कुछ करेगी, नहीं कहा जा सकता है !”

इसके साथ ही आगे अपने एक लेख में लिखा था कि “सचमुच, यथार्थ का विश्लेषण कभी बहुत साफ-साफ संभव नहीं होता है । यथार्थ के अन्तर्विरोध कई अन्य अन्तर्विरोधों के समुच्चयों से घटित होते हैं, जिनका अलग-अलग समुच्चयों के स्वरूप पर भी असर पड़ता हैं। जनता के बीच कोई रहेगा और शासन की छड़ी कोई और , दूर बैठा तानाशाह घुमायेगा, जनतंत्र के अंश मात्र के रहते भी इसमें दरार की संभावना बनी रहती है। लड़ाई यदि सांप्रदायिकता वनाम् धर्म-निरपेक्षता की है तो तानाशाही वनाम् जनतंत्र की भी कम नहीं है । बस यह समय की बात है कि दृश्यपट को कब और कौन कितना घेर पाता है ।

“किसी भी निश्चित कालखंड के लिये कार्यनीति के स्वरूप को बांध देने और उससे चालित होने की जड़सूत्रवादी पद्धति ऐसे मौक़ों पर पूरी तरह से बेकार साबित होती है ।यह कार्यनीति के नाम पर कार्यनीति के अस्तित्व से इंकार करने की पद्धति किसी को भी कार्यनीति-विहीन बनाने, अर्थात् समकालीन संदर्भों में हस्तक्षेप करने में असमर्थ बनाने की आत्म-हंता पद्धति है । इस मामले में शिव सेना जन-भावनाओं के ज़्यादा क़रीब, एक ज़रूरी राजनीतिक दूरंदेशी का परिचय देती दिखाई पड़ रही है । यह शिव सेना की राजनीति के एक नये चरण का प्रारंभ होगा, भारत की राजनीति में उसकी कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका का चरण ।

“यह शिव सेना के लिये इतिहास-प्रदत्त वह क्षण है जिसकी चुनौतियों को स्वीकार कर ही वह अपने को आगे क़ायम रख सकती है । ऐसे समय में कायरता का परिचय देना उसके राजनीतिक भविष्य के लिये आत्म-विलोप के मार्ग को अपनाने के अलावा और कुछ नहीं होगा । समय की गति में ठहराव का मतलब ही है स्थगन और अंत । कोई भी अस्तित्व सिर्फ अपने बूते लंबे काल तक नहीं रहता, उसे समय की गति के साथ खुद को जोड़ना होता है ।

“एक केंद्रीभूत सत्ता इसी प्रकार अपना स्वाभाविक विलोम, स्वयंभू क्षत्रपों का निर्माण करती है । बड़े-बड़े साम्राज्य इसी प्रकार बिखरते हैं । यह एक वाजिब सवाल है कि क्यों कोई अपनी गुलामगिरी का पट्टा यूँ ही लिखेगा ! ऐसे में विचारधारा की बातें कोरा भ्रम साबित होती हैं ।”

सचमुच, महाराष्ट्र में इस बार न सिर्फ़ मोदी-शाह को, बल्कि सेना, पुलिस के साथ ही सीबीआई, ईडी, आईटी आदि की सम्मिलित राजनीतिक दमन की शक्ति को भी ललकारा गया है । हाल-फिलहाल इनमें न्यायपालिका का भी शुमार हो चुका है ।

कहना न होगा, यहीं से पूरे विषय का परिप्रेक्ष्य भी बदल जाता है । बात बीजेपी-आरएसएस के वृहत्तर विचारधारात्मक परिवार से बाहर निकल जाती है । मसला फासीवादी तानाशाही के प्रतिरोध और प्रतिकार का आ जाता है ।

किसी भी कार्यनीति का हर मसला इसी प्रकार अंततः एक ऩई भाषाई संरचना का मसला ही हुआ करता है । जैसे मनोरोगी में कुछ बेकार के विचारों से होने वाले काल्पनिक दर्द के निवारण के लिये ज़रूरत सिर्फ़ इस बात की होती है कि दमित विचारों को नये संकेतकों की श्रृंखला से जोड़ दिया जाए ताकि वह चीजों को एक प्रकार के नये तर्जुमा के जरिये पढ़ सके । यही इलाज है, तमाम राजनीतिक सिद्धांतकारों को भी उनकी अपनी जड़ीभूत लाक्षणिक मानसिकता के रोग से मुक्त कराने का । यद्यपि इस क्रम में इस बात का खतरा हमेशा प्रबल रूप से बना रहता है कि उसके शरीर के बाक़ी अंग कहीं नष्ट न हो जाए । इसके लिये आगे की अतिरिक्त मेहनत और रणनीति को तैयार करने की जरूरत रहती है, जो किसी भी राजनीतिक पार्टी का दैनन्दिन काम हुआ करता है ।

देखना है कांग्रेस कार्य समिति कैसे इसे संभालती है । अब तक एनसीपी और कांग्रेस शिव सेना के प्रति जिस प्रकार के लचीलेपन का परिचय दे रही है, वह स्वागतयोग्य है । देश की पूर्ण तबाही के मोदी के एकाधिकारवादी राज से मुक्ति का रास्ता कुछ इसी प्रकार तैयार होगा ।

(11 नवंबर 2019, अपरान्ह डेढ़ बजे )

शनिवार, 9 नवंबर 2019

आधुनिक समाज के कानूनी विवेक को नहीं, कब्जे की वास्तविकता को सुप्रीम कोर्ट ने तरजीह दी है

—अरुण माहेश्वरी 


न्याय, सद्भाव, मानवीय मर्यादा और सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति समानता के नाम पर सुनाये गये अयोध्या के फैसले में कहा गया है कि

1. बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को गिरा कर नहीं किया गया है । उसके नीचे मिलने वाले ढांचे 12वीं सदी के हैं जबकि मस्जिद का निर्माण 15वीं सदी में किया गया था ।

2. 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर राम लला की मूर्ति को बैठाना गैर-कानूनी काम था ।

3. 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना कानून के शासन के उल्लंघन का एक सबसे जघन्य कदम था ।

4. बाबरी मस्जिद पर शिया वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया ।

5. निर्मोही अखाड़े के दावे को भी खारिज कर दिया गया है ।

6. विवादित जमीन पर सिर्फ दो पक्ष, सुन्नी वक्फ बोर्ड और राम लला विराजमान के दावों को विचार का विषय माना गया ।

7. चूंकि विवादित स्थल पर 1857 से लगातार राम लला की पूजा चल रही है और उस जमीन पर हिंदुओं का कब्जा बना हुआ है, इसीलिये विवादित 2.77 एकड़ जमीन को रामलला विराजमान के नाम करके उसे केंद्र सरकार को सौंप दिया गया जिस पर मंदिर बनाने के लिये केंद्र सरकार एक ट्रस्ट का गठन करेगी । केंद्र सरकार तीन महीने के अंदर ट्रस्ट का गठन करके उस ट्रस्ट के जरिये मंदिर के निर्माण की दिशा में आगे बढ़े । उस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा का एक प्रतिनिधि रखा जाए ।

8. चूंकि 1992 में मस्जिद को ढहा कर मुसलमानों को उनकी जगह से वंचित किया गया, और चूंकि मुसलमानों ने उस मस्जिद को त्याग नहीं दिया था बल्कि 1949 तक वहां नमाज पढ़ी जाती थी, इसीलिये सुन्नी वक्फ बोर्ड को केंद्र सरकार अथवा उत्तर प्रदेश सरकार अयोध्या में ही एक प्रमुख और उपयुक्त स्थान पर 5 एकड़ जमीन मस्जिद के निर्माण के लिये देगी, ताकि मुसलमानों के साथ हुए अन्याय का निवारण हो सके ।

इस प्रकार इस फैसले में मूलत: कानून की भावना को नहीं, ‘कब्जे की वास्तविकता’ को तरजीह दी गई है । यद्यपि इस फैसले में ‘ न्याय, सद्भाव, मानवीय मर्यादा और सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति समानता’ की दुहाई दी गई है, लेकिन इस प्रकार की किसी विवेकशील प्रक्रिया पर पूरा जोर देने के बजाय कानून को घट चुकी घटनाओं को मान कर चलने का एक माध्यम बना दिया गया है । यह एक प्रकार से राजनीति के सामने कानून का आत्म-समर्पण कहलायेगा । यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने इस अभियोग से बचने के लिये ही धारा 142 का इस्तेमाल करते हुए मुसलमानों को पहुंचाए गये नुकसान की भरपाई की बात कही है । 

शनिवार, 2 नवंबर 2019

अगला हफ़्ता सुप्रीम कोर्ट के नाम होगा

-अरुण माहेश्वरी



सुप्रीम कोर्ट का जज दूध पीता बोधशून्य बच्चा नहीं होता  जिसे अपनी शक्ति का अहसास नहीं होता है। राजनीति के बजाय वह अपनीकुर्सी की नैतिकता से भी बंधा होता है  वह सरकार में थोड़े समय के लिये आए नेताओं का दास नहीं होता है  प्रेमचंद की ‘नमक का दरोगा’ कहानी को कमतर नहीं समझना चाहिए  यह आदमी के अहम् से जुड़ा पहलू है जिसे छोड़ कर वह अपनी पहचान को लुप्त कियाकरता है  

इसीलिये सत्ता के दलाल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे जब सुप्रीम कोर्ट को सरकार के इशारों पर नाचने वाले कठपुतले की तरह चित्रित कर रहे थेवे कर्नाटक के भ्रष्ट मुख्यमंत्री येदीरप्पा जैसे ही दिखाई दे रहे थे जो अमित शाह को सुप्रीम कोर्ट का भगवान समझते हैं  

सुप्रीम कोर्ट को इस हफ़्ते भारतीय राष्ट्र और प्रशासन के बारे कुछ दूरगामी महत्व के फ़ैसले सुनाने हैं  बाबरी मस्जिद का मामला हैराफ़ेल की ख़रीद की जाँच कावित्त विधेयकों को धन विधेयकों के रूप में पारित कराके राज्य सभा के साथ धोखाधड़ी का और कश्मीरका भी मामला है  

मोदी पहले ही भारत की शक्ल सूरत बिगाड़ चुके हैं  इसके सर के ताज जम्मू और कश्मीर को खंडित कर चुके हैं  राम मंदिर को लेकर वे इसी बिखराव को जनमन में स्थाई करने की फ़िराक़ में हैं  सत्ता पर एकाधिकार और भ्रष्टाचार का चोली दामन का संबंध हुआ करता है  वित्त विधेयक और राफ़ेल की ख़रीद इसी के प्रतीक हैं  कश्मीर का विषय भारत के संघीय ढाँचे और नागरिक अधिकारों के हनन काअर्थात् हमारे संविधान की आत्मा से जुड़ा मुद्दा बन गया है  इसे आतंकवाद से निपटने की क़ानून और व्यवस्था की बात भर नहीं समझा जा सकता है  

मोदी अभी आदतन विदेश यात्रा पर हैं  जब भी भारत में कुछ कठिन बातें होने की होती हैंविदेश चले जाना उनकी फ़ितरत बन चुका है 

नोटबंदीजीएसटी के वार से अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने वाले मोदी अभी आरसीईपी पर हस्ताक्षर करके भारत की अर्थ-व्यवस्था कोपूरी तरह से विदेशियों को सौंप देने का कुकर्म करने की फ़िराक़ में हैं  उन्हें एशियान की बैठक(2-4 नवंबरमें भारत को सुर्ख़ियों में रखनेकी सनक है। सुर्ख़ियों में ही तो उनके प्राण बसते हैं !

बहरहालहमारी नज़र आगामी हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट पर होगी  हरीश साल्वे की बातों में इस सच को ज़रूर नोट किया था कि जजों कीअपनी विचारधारा नाम की भी कोई चीज़ होती है  लेकिन न्याय और सत्य अभी भारत की नियति से जुड़ गये हैं  भारत का खंडित मुकुटभी इसकी गवाही दे रहा है  हमें इसी न्याय और सत्य की  स्वतंत्र भूमिका का इंतज़ार रहेगा  

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

क्या शिव सेना इतिहास की चुनौती को स्वीकार कर आगे बढ़ेगी या बीजेपी के दरवाज़े पर बंधे पालतू जीव की भूमिका अपनायेगी !


-अरुण माहेश्वरी


महाराष्ट्र के हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों पर हमारी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि “महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की जीत बताती है कि जनता के दुख और ग़ुस्से की आवाज़ को दबाने में मोदी सरकार अब भी सफल है ।”

लेकिन बहुत जल्द ही वहाँ की राजनीति ने एक नई करवट लेनी शुरू कर दी । चुनाव परिणामों का असली सच अब सीटों की संख्या के बजाय राजनीतिक दलों की गतिविधियों से ज़ाहिर होने लगा । लेकिन इसके पीछे भी सीटों के संख्या तत्व की ही प्रमुख भूमिका थी । बीजेपी-शिवसेना दोनों की ही सीटों में कमी आई थी । ख़ास तौर पर अमित शाह के सुर में सुर मिला कर पूरा मीडिया जिस प्रकार इस शासक गठबंधन को दो सौ के पार और बीजेपी को अकेले बहुमत के क़रीब पहुँचा दे रहा था, वह कोरी कपोल कल्पना साबित हुआ । कुछ सीटों पर तो लोगों ने बीजेपी की तुलना में नोटा के पक्ष में ज्यादा मत दिये । कांग्रेस और एनसीपी, दोनों की सीटें बढ़ी । बीजेपी बहुमत के लिये ज़रूरी 144 के आँकड़े से काफ़ी पीछे सिर्फ 105 में सिमट कर रह गई ।

इस प्रकार, सच यही था कि बीजेपी महाराष्ट्र में पराजित हुई थी, लेकिन सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के खेल के आज की राजनीति के सबसे बड़ी उस्ताद जोड़ी मोदी-शाह ने बीजेपी की ‘ऐतिहासिक’ जीत का गीत गाना शुरू कर दिया, फडनवीस को दुबारा मुख्यमंत्री बनने की बधाइयाँ भी दी जाने लगी ।

यही वह बिंदु था, जहां से चीजें बदलने लगीं । बीजेपी शिवसेना के बिना सत्ता से बहुत दूर थी, लेकिन मोदी-शाह ने उसे अपना ज़रख़रीद गुलाम मान कर उसके अस्तित्व से ही इंकार का रास्ता अपना लिया था । उनका यह रवैया अकारण नहीं था । हरियाणा में साफ़ तौर पर पराजित होने पर भी दुष्यंत चौटाला नामक जीव जिस प्रकार इस जोड़ी के चरणों में गिर कर उन्हें अपनी सेवाएँ देने के लिये सामने आ गया था, उससे अपनी अपराजेयता के बारे में भ्रम का पैदा होना बिल्कुल स्वाभाविक था । यह उनकी मूलभूत राजनीतिक समझ भी है कि अब ‘मोदी बिना चुनाव लड़े ही भारत की सत्ता पर बने रहने में समर्थ है ।’

ऐसे मौक़े पर ही जब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अमित शाह के साथ सत्ता के आधार-आधे बँटवारे की बात उठाई, तभी इस बात के संकेत मिल गये थे कि जो मोहभंग जनता के स्तर पर इन चुनावों से जाहिर हुआ था,  राजनीतिक दलों के स्तर पर भी वे दरारें दिखाई देने लगी है । जनता तो मोदी-शाह को ठुकरा चुकी है, बस इस सच को राजनीतिक दलों के पटल पर प्रतिध्वनित होना बाक़ी था । उद्धव ठाकरे की बातों से उसके संकेत मिले थे । मोदी-शाह की महाबली वाली झूठी छवि को तोड़ने का ऐतिहासिक क्षण तैयार हो रहा था । साफ़ लग रहा था कि हवा से फुलाए गए मोदी के डरावने रूप में सुई चुभाने का एक ऐतिहासिक काम कर सकती है शिव सेना । पर वह ऐसा कुछ करेगी,यह पूरे निश्चय के साथ कहना मुश्किल था ।

बहरहाल, जब महाराष्ट्र के राज्यपाल से मुख्यमंत्री फड़नवीस और शिवसेना के नेता अलग-अलग मिले, यह साफ लगने लगा था कि मोदी के माया जाल को तोड़ने में शिव सेना की भूमिका कितनी ही संदेहास्पद क्यों न लगे, सच साबित हो सकती है ।

सचमुच, यथार्थ का विश्लेषण कभी बहुत साफ-साफ संभव नहीं होता है । यथार्थ के अन्तर्विरोध कई अन्य अन्तर्विरोधों के समुच्चयों से घटित होते हैं, जिनका अलग-अलग समुच्चयों के स्वरूप पर भी असर पड़ता हैं। जनता के बीच कोई रहेगा और शासन की छड़ी कोई और , दूर बैठा तानाशाह घुमायेगा, जनतंत्र के अंश मात्र के रहते भी इसमें दरार की संभावना बनी रहती है। लड़ाई यदि सांप्रदायिकता वनाम् धर्म-निरपेक्षता की है तो तानाशाही वनाम् जनतंत्र की भी कम नहीं है । बस यह समय की बात है कि दृश्यपट को कब और कौन कितना घेर पाता है ।

किसी भी निश्चित कालखंड के लिये कार्यनीति के स्वरूप को बांध देने और उससे चालित होने की जड़सूत्रवादी पद्धति ऐसे मौक़ों पर पूरी तरह से बेकार साबित होती है ।यह कार्यनीति के नाम पर कार्यनीति के अस्तित्व से इंकार करने की पद्धति किसी को भी कार्यनीति-विहीन बनाने, अर्थात् समकालीन संदर्भों में हस्तक्षेप करने में असमर्थ बनाने की आत्म-हंता पद्धति है । इस मामले में शिव सेना जन-भावनाओं के ज़्यादा क़रीब, एक ज़रूरी राजनीतिक दूरंदेशी का परिचय देती दिखाई पड़ रही है । यह शिव सेना की राजनीति के एक नये चरण का प्रारंभ होगा, भारत की राजनीति में उसकी कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका का चरण ।

यह शिव सेना के लिये इतिहास-प्रदत्त वह क्षण है जिसकी चुनौतियों को स्वीकार कर ही वह अपने को आगे क़ायम रख सकती है । ऐसे समय में कायरता का परिचय देना उसके राजनीतिक भविष्य के लिये आत्म-विलोप के मार्ग को अपनाने के अलावा और कुछ नहीं होगा । समय की गति में ठहराव का मतलब ही है स्थगन और अंत । कोई भी अस्तित्व सिर्फ अपने बूते लंबे काल तक नहीं रहता, उसे समय की गति के साथ खुद को जोड़ना होता है । 

एक केंद्रीभूत सत्ता इसी प्रकार अपना स्वाभाविक विलोम, स्वयंभू क्षत्रपों का निर्माण करती है । बड़े-बड़े साम्राज्य इसी प्रकार बिखरते हैं । यह एक वाजिब सवाल है कि क्यों कोई अपनी गुलामगिरी का पट्टा यूँ ही लिखेगा ! ऐसे में विचारधारा की बातें कोरा भ्रम साबित होती हैं ।

अब तक की स्थिति में एनसीपी और कांग्रेस शिव सेना के प्रति जिस प्रकार के लचीलेपन का परिचय दे रही है, वह स्वागतयोग्य है । देश की पूर्ण तबाही के मोदी के एकाधिकारवादी राज से मुक्ति का रास्ता बहुत जल्द, शायद इसी प्रकार के नये समीकरणों से तैयार होगा ।


गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

संविधान, कोर्ट और विचारधारा


—अरुण माहेश्वरी




आज ही ‘द वायर’ पर कश्मीर, धारा 370, भारतीय राज्य का संघीय ढांचा और नागरिक के मूलभूत अधिकार के बारे में जाने-माने संविधान विशेषज्ञ हरीश साल्वे के साथ करण थापर की लगभग पचास मिनट की लंबी बातचीत सुन रहा था ।

हरीश साल्वे जितनी आश्वस्ति के साथ धारा 370, 35 ए, राज्यों को तोड़ने, राज्यों के अस्तित्व को मिटा देने और नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के हनन तक को मूड़ी-चना खाने जितना एक मामूली और सहज काम बता रहे थे, वह किसी को भी दंग करने के लिये काफी था । भारतीय राज्य का सर्वाधिकारी राष्ट्रपति है जो देश की सरकार के इशारों पर चलता है । इस राज्य से जुड़ा हर मसला राष्ट्रपति की मन-मर्जी का मसला होता है, अर्थात् प्रकारांतर से सरकार का । इसीलिये इसमें संविधान या अदालत की बाधा जैसी किसी चीज की कोई अपनी निश्चित भूमिका नहीं है । अगर वे अपनी कोई अलग भूमिका जाहिर करते हैं तो यह उनकी मर्जी है, लेकिन नहीं करते हैं तो उसमें कोई बाधा नहीं है । संविधान उसकी पूरी अनुमति देता है ।

कल तक हम जिस धारा 370 को भारत के संविधान का एक अविभाज्य हिस्सा मानते थे, कश्मीर को भारत से जोड़ने वाली धारा, अब साल्वे के अनुसार इसे हटाना उतनी ही साधारण बात थी जितनी साधारण बात हमारा भोजन करना है । यहां तक कि कश्मीर को तीन भागों में बांटना भी कार्यकारिणी का बहुत मामूली प्रकार का उपक्रम है । वे कहते हैं कि जब भी किसी राज्य विधानसभा को भंग करके वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है, विधान सभा की सारी शक्तियां राष्ट्रपति में न्यस्त कर दी जाती है । ऐसे में राष्ट्रपति केंद्र सरकार को राज्य के पुनर्विन्यास की सिफारिश कर ही सकता है और केंद्र सरकार उस पर अमल करके पूरी तरह से संविधान-सम्मत काम करेगी ।

साल्वे एक विशेषज्ञ की निष्पृह कठोरता के साथ बता रहे थे कि भारत का संघीय ढांचा वास्तव में एक कोरा छलावा है । इसकी पवित्रता की रक्षा के लिये किसी भी अदालत को सामने आने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है । ‘सच कहा जाए तो हमारा संविधान प्रकट रूप में एकात्मकता की ओर झुका हुआ है ।’

एक संविधान-विशेषज्ञ की इस प्रकार की असंभव किस्म की खरी बाते सुन कर किसी के भी मन में यह पहला सवाल उठेगा कि आखिर यह संविधान बला क्या है ? कानून का शासन क्या चीज है ?

आप माने तो वह है और न माने तो कोरी हवा है । वह है भी और नहीं भी है । सब कुछ शासक की नैतिकताओं और जनता की संस्कृति पर निर्भर है । इसकी किसी धारा के पीछे मूलतः कोई तर्क नहीं है । सामाजिक विश्वास और परंपराएं उनके अर्थ सुनिश्चित करते हैं । उनमें अगर फर्क आ जाए तो लिखित-अलिखित, किसी भी प्रकार के संविधान या कानून का अपना कोई अर्थ नहीं होता है ।

हम भारत में संविधान के लिखित स्वरूप की बहुत चर्चा करते हैं, जबकि इसे जन्म देने वाले ब्रिटेन और अमेरिका तक में यह लिखित नहीं है । उपरोक्त चर्चा से ही साफ है कि लिखित संविधान के भाषायी विन्यास, शब्दों और व्याकरण के नियमों के आधार पर तैयार की गई उसकी संरचना का कोई मायने नहीं है । अधिक से अधिक इसे चंद संकेतों का समुच्चय कहा जा सकता है, संकेतकों और संकेतितों के संबंधों का वह ताना-बाना जो मूलतः अपने समय की संस्कृति और मान्यताओं से ही अर्थ पाते हैं, अन्यथा इनके कोई निश्चित अर्थ नहीं होते । संविधान का विन्यास व्याख्याओं की प्रणाली से तैयार होता है । इसके पीछे कोई सुनिश्चित तर्क नहीं होते । यहां तक कि संविधान के कथित निदेशक सिद्धांत भी वास्तव में व्याख्याओं के अधीन ही होते हैं ।

अर्थात् संविधान के नाम पर आप जिसे मान लें, वही सत्य है । आप यदि राज्य के संघीय ढांचे के प्रति निष्ठावान है तो आपके लिये वह अनुलंघनीय होगा, और अगर नहीं है तो उसे किसी भी क्षण ठुकराया जा सकता है । संविधान उसकी पूरी अनुमति देता है । इसी प्रकार नागिरक के मूलभूत अधिकार तभी तक है जब तक उन्हें पवित्र माना जाए, वर्ना किसी की भी निवारक नजरबंदी के सारे अधिकार राज्य को सहज उपलब्ध है । जेल-बेल की सारी चर्चाएं इसीलिये बार-बार निरर्थक जान पड़ती है । यही हाल धर्म-निरपेक्षता और धर्म-आधारित राज्य के विषय में हैं । धार्मिक विश्वास कब सामान्य जीवन-पद्धति और नैतिकता माने जाने लगे और कब अवांछित, अवैज्ञानिक और सांप्रदायिक विभाजन के मूल, इसे हम हर रोज देख रहे हैं ।

यद्यपि कुल मिला कर हरीश साल्वे की संविधान संबंधी सारी व्याख्याएँ एक दक्षिणपंथी, सर्वाधिकारवादी संविधान विशेषज्ञ की बातें ही थी, लेकिन वे इतना तो बताती ही थी कि उनके जैसे लोग ही न्यायाधीशों की कुर्सी पर बैठ सकते हैं । न्यायाधीशों की अपनी ‘संवैधानिक निष्ठा’ किसी धोखे के अलावा कोई मायने नहीं रखती है । और कुछ भी क्यों न हो, साल्वे की बातों से प्रकारांतर से संविधानवादियों की सोच की सीमाओं का पूरा पता चल जाता है । भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश को अपनी सेवा-निवृत्ति के अंतिम सात दिनों में कश्मीर, अयोध्या सहित आठ महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी राय सुनानी है । देखना है, वे अपने को धुर दक्षिणपंथी सांप्रदायिक विचारों का व्यक्ति साबित करते हैं या एक मानवतावादी, वैज्ञानिक चेतना संपन्न व्यक्ति । संविधान की बाध्यताएं तो कोरा छल ही हैं ।   

हरीश साल्वे जब बीच-बीच में अपने को उदारतावादी बताते हुए कश्मीर में मानव-अधिकारों के उल्लंघन के बारे में अनभिज्ञता जाहिर कर रहे थे तब शुद्ध मिथ्याचारी और हंसी के पात्र  प्रतीत हो रहे थे । खास तौर पर मीडिया के कुछ हिस्सों और कुछ टिप्पणीकारों के द्वारा न्यायाधीशों के बारे में टिप्पणियों पर साल्वे का सात्विक रोष और भी उपहास-योग्य लग रहा था । 

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

भागवत ‘लिंचिंग‘ को अभिहित करने वाला कोई भारतीय शब्द बताए !

—अरुण माहेश्वरी


मोहन भागवत शब्दों की बाजीगरी से जीवन के सच को अपसारित करना चाहते हैं । वे कहते हैं लिंचिंग एक विदेशी अवधारणा है, इसे भारत पर लागू नहीं करना चाहिए । भारत में हो रही भीड़ की हत्याओं को लिंचिंग नहीं कहा जाना चाहिए ।

हमारा उनसे सबसे पहला सवाल तो यही है कि वे खुद कौन सी अवधारणा (विचारधारा) की उपज है ? आरएसएस कौन सी अवधारणा है ? अतीत से लेकर आज तक हिटलर और मुसोलिनी तथा यहूदीवादी इसराइल उनके आदर्श कैसे हैं ?

1925 में जब आरएसएस का गठन हुआ था, वह काल दुनिया के नक्शे पर हिटलर और मुसोलिनी के उदय का काल था । मोहन भागवत क्या इस बात का जवाब देंगे कि किस समझ के तहत उनके गुरू गोलवलकर ने हिटलर के जर्मनी की तारीफ के पुल बाधंते हुए कहा था कि “जर्मनों का जाति सम्बन्धी गर्वबोध चर्चा का विषय है। अपनी जाति और संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों - यहूदियों का सफाया करके विश्व को चौका दिया है। जाति पर गर्वबोध वहाँ अपने सर्वोच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हों, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता। हिन्दुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक है।”

हम सब जानते हैं कि आरएसएस का जन्म ब्रह्मा के पेट से नहीं हुआ है । वह बहुत हाल की, भारत में हिटलर-मुसोलिनी भक्तों की करतूतों की उपज है । उनके कृत्यों की सही व्याख्या भी उन पदों के जरिये ही हो सकती है जो दुनिया को हिटलर-मुसोलिनी की देन रहे हैं । इसीलिये भागवत से सिर्फ यह पूछा जाना चाहिए कि क्या गाय के नाम पर, बीफ के नाम पर, दलितों के नाम पर, अल्पसंख्यकों के नाम पर लोगों को पीट-पीट कर या दंगें लगा कर मार डालना कोरा शाब्दिक खेल है, कि इन पर उठाये जा रहे सवालों को आप शब्दों की बाजीगरी से उड़ा देना चाहते हैं !

ये सब शुद्ध रूप से संगठित सामूहिक हत्याएं है, अभी के हमारे समाज की ठोस, चिंताजनक और घृणित सचाई । दुनिया के आधुनिक काल के अनुभवों के आधार पर ही इन हत्याओं के विचारधारात्मक स्वरूप और इनके पीछे काम कर रही साजिशों और मानसिकताओं की खास सिनाख्त की जा सकती है ।

मसलन् 2002 का गुजरात का जनसंहार बताता है कि हमारे देश में हिटलर का शासन पैदा हो चुका है । गोगुंडों की करतूतें और संघ के कार्यकर्ताओं की नैतिक पुलिस की भूमिका भी इसी सच्चाई की और पुष्टि करती है । कश्मीर में उठाया गया कदम भारत में आक्रामक विस्तारवादी, प्रभुत्ववादी यहूदीवादी हिंदुत्व के सत्य का बयान करता है । इन सबके लिये प्राचीन साहित्य से सुंदर से स उपसर्ग वाले तत्सम शब्द नहीं ढूंढे जा सकते हैं ।

हत्या को हत्या कहे जाने पर भागवत को आपत्ति है । लेकिन इन हत्याओं को वे खुद भारत के प्राचीन काल में किये गये जन-संहारों की किस निन्दित श्रेणी में रखेंगे, इसके लिये उनके पास कोई देशी शब्द या अवधारणा नहीं है ! उनके शब्द भंडार का यह अभाव ही बताता है कि आरएसएस के लोगों की ये तमाम करतूतें किसी भारतीय आदर्श  से प्रेरित नहीं हैं । यह सब जिन विदेशी आदर्शों से प्रेरित हैं, उनकी चर्चा न करने की हिदायत दे कर भागवत यही कह रहे हैं कि भारत के इस उभरते हुए जघन्य यथार्थ की चर्चा ही न की जाए ; इन्हें सिर्फ होने दिया जाए ! और अगर चर्चा हो भी तो उनके ‘भारतीय वीरों‘ के महान राष्ट्रवादी कृत्यों के तौर पर हो ।

लेकिन सबसे मुश्किल की बात यह है कि इनका राष्ट्रवाद भी बिना हिटलर-मुसोलिनी की चर्चा किये कभी भी परिभाषित नहीं हो सकता है ! भागवत लिंचिंग का कोई भारतीय शब्द बताए !

रविवार, 6 अक्तूबर 2019

कश्मीर किधर !

-अरुण माहेश्वरी


ऐसा लगता है कि मोदी कश्मीर के लॉक डाउन को कम से कम दो साल तक चलाना चाहते हैं । उन्हें आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे सख़्त और साहसी प्रशासक का ख़िताब हासिल करना है और वह इंदिरा गाँधी के 19 महीने के आपातकाल को मात दिये बिना कैसे संभव होगा ! साहसी दिखने का जो फ़ितूर उन्हें नेशनल जोगरफी की डाक्यूमेंट्री तक ले गया, वही इंदिरा गांधी की प्रतिद्वंद्विता में भी खींच ले रहा है । कोई भी मनमाना विध्वंसक कदम उठा कर उसे कुछ काल के लिये भूल जाने के लिये विदेश यात्राओं पर निकल पड़ना मोदी जी की कार्यशैली की पहचान बन चुका है । जुनूनी मनोरोगी इसी प्रकार अपने ग़ुरूर में जीया करता है ।

लेकिन कश्मीर का मसला कोई नोटबंदी या जीएसटी की तरह का पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला नहीं है । उन मामलों में आप मरे या जीए, दुनिया को परवाह नहीं थी । कश्मीर और धारा 370 को भारत का अपना विषय कहने मात्र से वह ‘अपना’ हो नहीं जाता है । इस पर पहले भी पाकिस्तान के साथ संधियाँ हो चुकी है और दोनों देशों के बीच सीमा का मसला कभी भी समाप्त नहीं हुआ है । ऊपर से, इसी में चीन का भी अपना दावा जुड़ गया है ।कश्मीर से लगे अक्साई चीन के इलाक़े में वह अभी अपनी पूरी ताक़त के साथ मौजूद है ।

भारत में एक दीर्घ जनतांत्रिक प्रक्रिया के बीच से जिस प्रकार राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सफलता के साथ मज़बूत किया गया है, कश्मीर भी भारतीय राज्य के उसी प्रकल्प का हिस्सा रहा है । कश्मीर में उग्रवाद का मुक़ाबला सिर्फ सेना-पुलिस के बल पर नहीं बल्कि कश्मीर के लोगों के नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी के ज़रिये कहीं ज्यादा हुआ है । यही वजह रही कि कश्मीर की एक विभाजनवादी पार्टी के साथ मिल कर वहाँ बीजेपी तक ने अपनी सरकार बनाने से गुरेज़ नहीं किया था ।

लेकिन 2019 के चुनाव में मोदी जी की भारी जीत ने जैसे पूरे दृश्यपटल को बदल दिया । मोदी जी की आरएसएस की बौद्धिकी की सीखें कुलाँचे भरने लगी। ऊपर से दुस्साहसी अमित शाह का साथ मिल गया। बिना आगे-पीछे सोचे, वे कश्मीर पर टूट पड़े और जुनूनियत में अपनी जहनियत के सही साबित होने के वक़्त का इंतज़ार करने लगे कि जिस सोच को सारी उम्र सहेजे हुए थे, वह सेना, पुलिस की ताकत से लैस होकर खुद ही अपने औचित्य को प्रमाणित करने का रास्ता बना लेगी ।

इसमें इधर इसराइल के साथ मोदी जी की बढ़ती हुई रब्त-ज़ब्त ने भी सरकार को इस विषय में और उलझा दिया है । इसराइल ने जिस प्रकार शुद्ध सैनिक शक्ति के बल पर फिलिस्तीनियों को उजाड़ने और जॉर्डन की ज़मीन पर क़ब्ज़ा ज़माने का जो उदाहरण पेश किया है, आरएसएस वालों के लिये उसका एक नये आदर्श के रूप में उभरना स्वाभाविक है । ताकत की अंधता के चलते इनका न भूगोल का, और न ही इतिहास का कोई बोध बचा है !

दूसरी ओर पाकिस्तान है, जिसके लिये कश्मीर उसके अस्तित्व के औचित्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय रहा है । मोदी सरकार यदि कश्मीर पर इसराइल-फ़िलिस्तीन के इतिहास को दोहराने की झूठी कल्पना कर रही है तो पाकिस्तान इसमें बांग्लादेश के प्रतिशोध की पूरी संभावना देख रहा है । उसके पास यदि चीन का खुला समर्थन है, तो इससे भी बड़ी बात यह है कि उसके इरादों पर दुनिया के किसी भी देश का विरोध नहीं है ।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप तो अजीब तरीक़े से बार-बार कश्मीर में मध्यस्थता की ज़िद कर रहे हैं । मोदी उनके प्रस्ताव से क़तरा रहे हैं, लेकिन वे ट्रंप को बार-बार इसे उठाने से रोक नहीं पा रहे हैं । इसके साथ ही ट्रंप ने भारत पर दबाव बढ़ाने की दूसरी तैयारियाँ भी शुरू कर दी है । जिस समय मोदी ह्युस्टन में ‘हाउडी मोदी’ के शोर से आसमान को सर पर उठाए हुए थे, ऐन उसी समय अमेरिकी सिनेटरों के एक समूह ने सीनेट की कमेटी के सामने कश्मीर पर रिपोर्ट पेश की जिसमें कश्मीर को एक विश्व मानवीय चिंता का विषय बताते हुए भारत सरकार पर दबाव डाल कर कश्मीरियों पर लगी सभी पाबंदियों को ख़त्म कराने और हाल में गिरफ्तार किये गये सभी लोगों को रिहा कराने की बात कही गई है । चंद रोज़ बाद ही वहाँ की सीनेट कमेटी में 2020 के लिये विदेश नीति के प्रकल्पों का विधेयक तैयार होगा, उसमें कश्मीर को शामिल करने की बात कही गई है । यह खुद में कश्मीर में अमेरिकी हस्तक्षेप की बड़ी तैयारी का संकेत है ।

बर्नी सैन्डर्स

इस विषय में कुल मिला कर आज की स्थिति यह है कि मोदी कश्मीर के लॉकडाउन को दो साल तक खींचना चाहते हैं और अमेरिका ने 2020 में ही इस विषय में कूद जाने की तैयारियाँ शुरू कर दी है । मोदी का ट्रंप के प्रस्ताव पर कन्नी काटना भी ट्रंप को उकसाने का एक सबब बन सकता है । ट्रंप और मोदी की इस न समझ में आने वाली जुगलबंदी का अंतिम परिणाम क्या होगा, कहना मुश्किल है । लेकिन इस बार मोदी ने जो खेल खेला है वह पाकिस्तान या कश्मीर का भले कुछ न बिगाड़ पाए पर भारत के लिये बहुत ज्यादा महँगा साबित हो सकता है । कहना न होगा, आज की दुनिया में कश्मीर के विषय पर भारत पूरी तरह से अलग-थलग हो गया दिखाई पड़ रहा है ।




रविवार, 22 सितंबर 2019

बाबरी मस्जिद-राममंदिर मामला भारत में चल रहे कानून के वास्तविक चरित्र को परिभाषित करेगा

—अरुण माहेश्वरी


सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद विवाद पर अभी लगातार सुनवाई चल रही है । इस देश में एनआरसी की जंग को छेड़ने वाले अभी के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई की पांच सदस्यों की संविधान पीठ इसमें लगी हुई है ।

मुख्य न्यायाधीश नवंबर महीने में सेवा-निवृत्त होने वाले हैं । वे इसके पहले ही इस मामले को निपटा देना चाहते हैं । इस मामले की सुनवाई में जिस प्रकार रात-दिन एक किया जा रहा है, उससे लगता है जैसे अब मामला न्याय से कहीं ज्यादा मुख्य न्यायाधीश की सेवा-निवृत्ति की तारीख से होड़ का हो गया है । वे चाहते हैं कि अक्तूबर तक सुनवाई पूरी हो जाए ताकि सुप्रीम कोर्ट छोड़ने और केंद्र सरकार की दी हुई कोई दूसरी चाकरी में लगने के पहले वे इस अभागे भारत पर अपनी कीर्ति की कोई महान छाप छोड़ जाए !

यह मामला जिस प्रकार अभी चलता दिखाई दे रहा है, और भाजपा के नेता सुप्रीम कोर्ट को लेकर जिस प्रकार के अश्लील से उत्साह से भरे हुए हैं, उनके एक सांसद ने तो साफ शब्दों में कहा भी है कि अभी सुप्रीम मोदी सरकार की मुट्ठी में है, इसे देखते हुए हमें अनायास ही रोमन साम्राज्य के कानून की बातें याद आती हैं ।

कार्ल मार्क्स के कानून के इतिहास के गुरू कार्ल वॉन सेविनी ने रोमन कानून में 'अधिकार/कब्जे के कानून' (लॉ आफ पोसेसन) पर एक महत्वपूर्ण किताब लिखी थी । इसमें रोमन कानून के इस पहलू के बारे में कहते हैं कि रोमन कानून किसी संपत्ति पर अधिकार को उस पर कब्जे का सिर्फ परिणाम नहीं मानता, बल्कि कब्जे को ही किसी अधिकार की आधारशिला मानता है । इस प्रकार, वे कानून की सारी नैतिकतावादी और आदर्शवादी अवधारणा को खारिज कर देते हैं । वे साफ बताते हैं कि कानून, खास तौर पर निजी संपत्ति की पूरी धारणा तर्क से पैदा नहीं होते हैं । यह इतिहास में खास विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों के आचार और दस्तावेजों/भाषाओं अर्थात् विचारों में निहित 'कब्जे के भाव' से पैदा होती है ।
“सभी कानून जीवन की बदलती हुई जरूरतों और इन लोगों (विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों) के बदलते हुए अभिमतों (मिजाज) पर निर्भर होते हैं, जिनके आदेशों को ही कानून मान कर लोग उनका पालन किया करते हैं ।”

इस प्रकार, सिद्धांत रूप में सेविनी कह रहे थे कि कानून बनाये नहीं जाते, कानून पाए जाते हैं । विवेक का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है, जब तक वह भाषा और व्यवहार से नहीं जुड़ा होता है । देशकाल से स्वतंत्र विवेक का कोई अस्तित्व नहीं है । विवेक का इतिहास भाषा और संस्कृति से जुड़ा होता है और भाषा और संस्कृति समय के साथ अलग-अलग स्थान पर बदलते रहते हैं । इसीलिये न्याय के किसी भी औपचारिक मानदंड में विवेक को शामिल नहीं किया जा सकता है । (देखें, अरुण माहेश्वरी, बनना कार्ल मार्क्स का, पृष्ठ 63-64)

हमने अपनी उपरोक्त किताब में कार्ल मार्क्स के कानून का दर्शन संबंधी विचारों की पृष्ठभूमि को प्रकाशित करने के लिये इस विषय को थोड़ा विस्तार से रखा है । रोमन कानून एक साम्राज्य का कानून था, राजा और विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों की इच्छा और स्वार्थों पर चलने वाले साम्राज्य का कानून । इसके विपरीत, जनतंत्र को जनता के कानून का शासन कहा जाता है, अर्थात् इसमें किसी तबके विशेष की इच्छा नहीं, कानून के अपने घोषित विवेक की भूमिका को प्रमुख माना जाता है । जिसकी लाठी उसकी भैंस जनतांत्रिक कानून की धारणा का एक प्रत्यक्ष निषेध है ।

तथापि, अभी हमारे यहां जनतंत्र पर ही राजशाही किस्म के शासन की जिस प्रणाली को लादने की कोशिशें चल रही है और एक के बाद एक सभी जनतांत्रिक और स्वायत्त संस्थाओं को इससे दूषित किया जा चुका है, उसे देखते हुए यह बाबरी मस्जिद से जुड़ा विवाद भारत के सुप्रीम कोर्ट के लिये किसी अम्ल परीक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं है । इससे पता चलेगा कि हमारे देश पर साम्राज्य के दिनों का कानून पूरी तरह से लौट चुका है, या 'वी द पिपुल' के द्वारा अंगीकृत समाजवादी, जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और संघीय राज्य का कानून ।     

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

चाकर रहसूं, बाग लगासूं नित उठ दर्शन पासूं । श्याम ! मने चाकर राखो जी !


कॉरपोरेट भक्त सरकार की आर्त विनती
—अरुण माहेश्वरी

आज, यानी 19 सितंबर 2019 के दिन को भारतीय पूंजीवाद के इतिहास के ऐसे स्वर्णिम दिन के रूप में याद किया जायेगा जब भारत के कॉरपोरेट जगत ने अपनी ताकत का भरपूर परिचय दिया और 2014 और 2019 में महाबली मोदी के फूल कर कुप्पा हुए व्यक्तित्व में पिन चुभा कर उसे बौना बना के उसे उसकी सही जगह, कॉरपोरेट जगत के चौकीदार वाली जगह पर बैठा दिया, जिस काम के लिये सचमुच बुद्धि की कोई जरूरत नहीं होती है । मोदी कॉरपोरेट के चरणों में पड़े दिखाई दिये । चंद रोज पहले उन्होंने रिजर्व बैंक के हाथ मरोड़ कर उससे जो 1.76 लाख करोड़ झटके थे, लगभग उस पूरी राशि को कॉरपोरेट के चरणों में सौंप कर आज वे धन्य-धन्य हो गये !

दो महीने पहले, जब मोदी की अपनी शान शिखर पर थी, इन्हीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट में कारपोरेट को किसी भी प्रकार की अतिरिक्त छूट न देने का बहादुरी का स्वांग रचा था । लेकिन उसके चंद दिनों बाद ही कॉरपोरेट के दबाव की पैंतरेबाजियां शुरू हो गई । ईश्वर ने भक्त को उसकी औकात में लाने का जाल रचना शुरू कर दिया । अर्थ-व्यवस्था का मूल संकट अपने कारणों से, नोटबंदी और जीएसटी की वजह से आम जनता की बढ़ती हुई कंगाली और मांग की भारी कमी से पैदा होने वाली मंदी के कारण था, लेकिन माहौल ऐसा बनाया जाने लगा जैसे कॉरपोरेट ने इस सरकार के खिलाफ हड़ताल की घोषणा कर दी हो और जो हो रहा है, उनके कोपभवन में जाने की वजह से ही हो रहा है । छोटे-बड़े, सारे औद्योगिक घराने खुले आम निवेश के मामले में फूंक फूंक कर कदम उठाने, बल्कि उससे विरत रहने के संकेत देने लगे । कॉरपोरेट की यह मामूली बेकरारी ही सेवक मोदी को नाकारा साबित करने के लिये काफी थी । चारो ओर से उनके निकम्मेपन की गूंज-अनुगूंज सुनाई भी देने लगी । कुल मिला कर, अंत में मोदी ने भगवान के सामने समर्पण कर ही दिया, अर्थात् अर्थ-व्यवस्था के सभी क्षेत्रों के संकट का कॉरपोरेट ने अपने हित में भरपूर लाभ उठाया और मोदी को दो महीने पहले के अपने तेवर को त्याग कर कॉरपोरेट के सामने साष्टांग लेट जाने के लिये मजबूर कर दिया ।

कॉरपोरेट के नग्न सेवक का यह सेवा भाव बैंकों और ऐनबीएफसी के मामलों के वक्त से ही टपकने लगा था और बैंकों को कहा गया था कि उन्हें महाप्रभु कॉरपोरेट को संकट से निकालने के लिये दिन-रात एक कर देने हैं । और अब आज, पिछले बजट के सारे तेवर को त्याग कर दास ने अपने को प्रभु के हाथ में पूरी तरह से सौंप देने का अंतिम कदम उठाया है । इसके बाद से भारत का कॉरपोरेट जगत किस प्रकार के अश्लील उल्लास से फट पड़ा है, इसे एक दिन में शेयर बाजार में 2000 प्वायंट के उछाल से अच्छी तरह से समझा जा सकता है । इसे कहते हैं पूंजीवाद में कारपोरेट की अंतिम हंसी !

निर्मला सीतारमण ने आज जो घोषणाएं की, उन्हें बिन्दुवार इस प्रकार समेटा जा सकता है —
1. कॉरपोरेट टैक्स में भारी कटौती ; कंपनियों पर कर की प्रभावी दर 25.17% होगी जो पहले 34.94 प्रतिशत थी ; दूसरी कोई छूट न लेने पर यह दर सिर्फ 22% होगी ; इस पर भी अतिरिक्त और सबसे बड़ी बात यह रही कि कंपनियों पर अब मैट जमा करने की कोई मजबूरी नहीं रही रहेगी ।
2. मैनुफैक्चरिंग में निवेश करने वाली नई कंपनी पर कॉरपोरेट टैक्स सिर्फ 17.01% होगा ।
3. MAT की दर को कम करके 15% कर दिया ।
4. जो कंपनियाँ बाजार से अपने शेयरों को वापस ख़रीदने में निवेश करना चाहती है, अभी तक के नियमों के अनुसार उनकी इस ख़रीद से होने वाले मुनाफ़े पर कोई उन्हें कोई कर नहीं देना पड़ेगा।
5. जो मोदी सरकार पिछले छ: सालों से औपनिवेशिक शासकों की तरह सिर्फ राजस्व वसूलने में लगी हुई थी जिसके कारण कृषि क्षेत्र की वास्तविक कंगाली के साथ ही कॉरपोरेट क्षेत्र भी अपने को कंगाल बताने लगा था, उसे तक़रीबन सालाना 1.45 लाख करोड़ की राजस्व की राहत दी दी गई ।

निर्मला सीतारमण की इन घोषणाओं से इस प्रकार के एक नतीजे पर भी पहुंचा जा सकता है कि मोदी ने एक प्रकार से भारत को कॉरपोरेट दुनिया के लिये आयकर-मुक्त देश बना दिया है । जो लोग उनकी MAT (Minimum Alternative Tax) संबंधी घोषणा के प्रभाव को नहीं समझ रहे हैं, वे शायद हमारी इस बात को पूरी तरह से नहीं समझ पायेंगे ।

आयकर कानून में मैट, अर्थात् मिनिमम अल्टरनेट टैक्स 1987 में तब लाया गया था जब कंपनियों में कंपनी लॉ के अनुसार अपने खाते तैयार करके मशीनों पर छीजत का लाभ उठा कर, मुनाफ़े को नये निवेश में दिखा कर टैक्स नहीं देने का रुझान बढ़ गया था । तब एक प्रकार के अग्रिम कर के रूप में ही मैट की व्यवस्था की गई ताकि मुनाफा करने वाली हर कंपनी सरकार के राजस्व में हर साल कुछ न कुछ योगदान करती रहे, भले उसके खातों में पुराना घाटा चल रहा हो अथवा तमाम प्रकार की छूटों का लाभ लेने पर उन्हें आयकर को पूरी तरह से बचाने का मौका मिल जाता हो । सिद्धांततः मैट के रूप में चुकाये गये रुपये का कंपनी आगे के सालों में अपनी आयकर की लागत से समायोजन कर सकती है, लेकिन इसमें समय सीमा आदि की कई बाधाओं के चलते आम तौर पर उसे हासिल करना संभव नहीं होता था । इसीलिये मैट अग्रिम आयकर कहलाने के बावजूद वास्तव में एक प्रकार का अतिरिक्त आयकर का ही हो गया था ।

बहरहाल, 1991 में भी, उदारवादी आर्थिक नीति के प्रारंभ में एक बार मैट की बाध्यता ख़त्म कर दी गई थी, लेकिन 1996 में इसे फिर से शुरू कर दिया गया था । अब फिर से एक बार मैट देने की बाध्यता को ख़त्म करके जाहिरा तौर पर पुरानी ज़ीरो टैक्स कंपनी की प्रथा के पनपने की ही जमीन तैयार कर दी गई है । सीतारमण ने साफ कहा है कि मुनाफे पर 22 प्रतिशत आयकर देने वाली कंपनियों पर मैट देने की बाध्यता ख़त्म हो जायेगी ; अर्थात् वे छीजत आदि का पूरा लाभ उठा कर बाकी के मुनाफे पर आयकर चुका पायेगी । इससे अब एक साथ पुराने जमा घाटे को मुनाफ़े के साथ समायोजित कर ज़ीरो टैक्स कंपनी बनने के नये अवसर पैदा कर दिये गये हैं ।

हम यहां फिर से दोहरायेंगे कि भारत के कॉरपोरेट जगत के सामने मोदी जी की सारी हेकड़ी ढीली हो गई है । पिछले कई दिनों से वित्त मंत्रालय में कॉरपोरेट के लोगों का जो ताँता लगा हुआ था, वह असरदार साबित हुआ है । पिछले बजट तक में कॉरपोरेट को कोई छूट नहीं देने का जो रौब गाँठा गया था, वह अब पानी-पानी हो चुका है । और, यह भी साफ हो गया है कि मोदी जी की हेकड़ी का चाबुक सिर्फ ग़रीब किसानों, मज़दूरों और अनौपचारिक क्षेत्र के कमजोर लोगों पर ही चलता है ।

ये चले थे कॉरपोरेट के आयकर-चोरों को जेल में बंद करने, लेकिन अब कॉरपोरेट पर आयकर को ही लगभग ख़त्म सा कर दिया है । अब आयकर वस्तुत: सिर्फ मध्यमवर्गीय कर्मचारियों और दुकानदारों के लिये रह गया है । कॉरपोरेट से आयकर वसूलने के सारे लक्ष्य त्याग दिये गये हैं । कहना न होगा, बहुत जल्द हमें कॉरपोरेट से वसूले जाने वाले आयकर के रूप में राजस्व की अकिंचनता और निरर्थकता के पाठ पढ़ाये जायेंगे । एक अर्से से ‘रोज़गार और संपदा पैदा करने वाले’ कॉरपोरेट का सम्मान करने की जो हवा बनाई जा रही थी, आज उस अभियान का वास्तविक मक़सद सामने आ गया है । भारत कॉरपोरेट के लिये वास्तव अर्थों में एक प्रकार का आयकर-मुक्त देश हो गया है ।

सीतारमण की आज की घोषणाओं में कॉरपोरेट की सामाजिक सेवा ज़िम्मेदारियों के दायरे को भी जिस तरह सरकारी सेवाओं के क्षेत्र में भी ले जाने की पेशकश की गई है, उससे साफ है कि सरकार ने जन-कल्याण के सारे कामों से अपने को पूरी तरह से अलग कर लेने का निर्णय ले लिया है । यह सरकार आर्थिक मंदी के मूल में कारपोरेट की खस्ता वित्तीय हालत और निवेश के प्रति उसकी कथित बेरुखी को देख रही है, जब कि वास्तव में इसके मूल में जनता की बढ़ती हुई कंगाली और आम आदमी की बाजार-विमुखता है । यही वजह है कि यदि कोई यह कल्पना कर रहा है कि सरकार के इन कदमों से अर्थ-व्यवस्था में जान आएगी तो वह मूर्खों के स्वर्ग में वास कर रहा है । यह कॉरपोरेट जगत को जरूर खुशी देंगे । जब तक बाजार में मांग पैदा नहीं होगी, मैनुफैक्चरिंग और उसी अनुपात में रोजगार में वृद्धि की कोई संभावना नहीं बनेगी । अब यह भी साफ पता चल रहा है कि हमारे देश को इस सरकार ने किस भारी संकट में डाल दिया है, इसका डर अब उसे भी सताने लगा है ।







गुरुवार, 19 सितंबर 2019

भाषा के प्रश्न को कभी भी किसी सत्ता के संरक्षण अथवा बंधन से जोड़ कर देखना सही नहीं है

हिंदी दिवस के अवसर पर अभिनंदन समारोह में अरुण माहेश्वरी का वक्तव्य




आज हिंदी दिवस है । इस दिन को इसलिये हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि 14 सितंबर 1948 के दिन ही हमारे देश की संविधान सभा में भारतीय राज्य में हिंदी की स्थिति और भूमिका के बारे में कई फैसले लिये गये थे । उनमें एक प्रमुख फैसला यह था कि हिंदी को भारत की राजभाषा का, अर्थात् सरकारी काम-काज की भाषा का दर्जा प्रदान किया जायेगा । इसमें एक और प्रतिश्रुति भी शामिल थी कि क्रमशः हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा का रूप भी दिया जायेगा । इस मामले में कितना आगे बढ़ा गया, कितना नहीं, यह हमारी चिंता का विषय ही नहीं है ।

यहां हमारे कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि हिंदी दिवस का यह आयोजन वस्तुतः हिंदी के सरकारी कामों में प्रयोग को मिली एक संवैधानिक स्वीकृति का आयोजन है । जो हिंदी राजस्थान से लेकर बिहार के मिथलांचल तक फैले एक विशाल भू भाग के लोगों की मातृ-भाषा के रूप में विकसित हो रही है और जिसमें ये लगभग पचास करोड़ से ज्यादा लोग अपनी साहित्य-संस्कृति से जुड़ी सूक्ष्मतर भावनाओं का आदान-प्रदान किया करते हैं, हिंदी दिवस का वास्तव में उस, हम सबकी विशेष पहचान और अस्मिता से जुड़ी भाषा से कोई खास संबंध नहीं है । खींच-तान कर कोई भी कुतर्क के जरिये कह सकता है कि भाषाओं की रक्षा और विकास में सरकारी संरक्षण की काफी भूमिका हुआ करती है । लेकिन हम व्यक्तिगत तौर पर इस मत के सर्वथा विरोधी है । बल्कि मानते हैं कि भाषाओं के क्षेत्र में राजसत्ता का दखल भाषा के साथ जुड़ी आदमी की नैसर्गिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में दखलंदाजी की तरह है ।

भाषाएं किसी राजसत्ता, दरबार या सरकार के संरक्षण में न जन्म लेती है और न ही विकसित होती है । भाषा को उसके जन्म साथ ही उसकी विमर्श शक्ति से जोड़ कर देखा जाता है, अन्य के साथ संवाद की जरूरत से जोड़ कर देखा जाता है, और विमर्श हमेशा मुक्तिदायक होता है, वह तत्वत: मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रतीक होता है ।
हमारे शास्त्रकारों के शब्दों में — “स्वातंत्र्यं हि विमर्श इत्युच्यते, स चास्य मुख्यः स्वभावः । (स्वातंत्र्य ही विमर्श कहलाता है और वह इसका प्रमुख स्वभाव है )

इसीलिये भाषा के प्रश्न को कभी भी किसी सत्ता के संरक्षण अथवा बंधन से जोड़ कर देखना सही नहीं है । यह पनपती, फलती-फूलती है आदमी के भावों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के क्षेत्र से, साहित्य से, स्वतंत्र विमर्श अर्थात् चिंतन से । अगर सत्ता ही भाषाओं के स्थायित्व का आधार होती तो न हम आज संस्कृत को, न पाली, प्राकृत और फारसी को, और यूरोप में ग्रीक और लैटिन के स्तर की भाषाओं को ही पोस्टमार्टम की मेज पर अध्ययन मात्र के विषय के तौर पर देख रहे होते और न अपभ्रंशों के नाना रूपों के विकास से उत्पन्न आधुनिक भारतीय भाषाओं के इतने बड़े खजाने से अपने देश की वैविध्यमय समृद्धि का उत्सव मना रहे होते ।

बहरहाल, हिंदी हमारी मातृभाषा, हमारे चित्त के प्रसार और हमारे अहम्, हमारे व्यक्तित्व से जुड़ी हमारी समग्र पहचान की भाषा है, इसीलिये इससे जुड़े किसी भी उत्सव में हम अपनी ही समृद्धि का उत्सव मनाने की तरह के सुख का अनुभव करते हैं ।

आप सबको हिंदी दिवस की आंतरिक बधाई देते हैं ।

आज यह अवसर हमारे लिये और भी खास इसलिये हो गया है क्योंकि हम कोलकाता के इस बहुत पुराने क्षेत्र के एक बेहद पवित्र और गौरवपूर्ण स्थल, माहेश्वरी पुस्तकालय में अपने ही लोगों के द्वारा प्रशंसित किये जाने के कार्यक्रम में उपस्थित हुए हैं । यह हमारे लिये किसी आत्म-प्रशंसा के कार्यक्रम से भिन्न कार्यक्रम नहीं है । खुद की खुद के ही लोगों के द्वारा प्रशंसा वृहत्तर अर्थ में आत्म-प्रशंसा ही कहलायेगी । यह क्षेत्र हमारी जन्मभूमि और कर्मभूमि, दोनों ही रहा है और आज तक भी हमारे सपनों में, अर्थात् हमारे अवचेतन में उभरने वाले दृश्यों की आदिम, मूल भूमि । यहां से हम सिर्फ अपने उस आत्म को ही पा सकते हैं, जिसे फ्रायड की तरह के मनोविश्लेषक व्यक्ति के चित्त और उसकी क्रियात्मकता की अभिव्यक्ति की भाषा का उत्स मानते हैं ।   

बहरहाल, आत्म-प्रशंसा, एक आत्मतोष जिसे मनोविश्लेषण की भाषा में एक प्रकार की आत्ममुग्धता भी कहा जाता है, आदमी की यदि एक प्रकार की कमजोरी है तो यही है जिसके जरिये आदमी अपने अहम् के निर्माण की प्रक्रिया में अपने लिये बहुत कुछ अलग से अर्जित भी किया करता है । फ्रायड कहते हैं कि “बच्चे की मोहकता के पीछे भी काफी हद तक उसकी आत्म-मुग्धता, उसका आत्म-तोष और किसी अन्य को अपने पास न आने देने का रुझान काम करता है । ... यहां तक कि साहित्य में आने वाले बड़े-बड़े अपराधी और विनोदी चरित्र भी, अपनी आत्म-मुग्धता के जरिये ही हमें अपनी ओर खींचते हैं, क्योंकि इसी के बल पर वे उन सब चीजों को अपने से दूर रखने में समर्थ होते हैं जो उनके अहम् पर चोट करती है । उनकी यह मौज, एक ऐसी उनमुक्तता जिसे हम काफी पहले गंवा चुके होते हैं, हमारी ईर्ष्या का और इसीलिये हमारे आकर्षण का भी पात्र बनते हैं ।”

लेकिन मजे की बात यह भी है कि अपनी इसी आत्म-मुग्धता के लिये आदमी को कम कीमत नहीं चुकानी पड़ती है । फ्रायड ही अपने 'Introduction to narcissism’ लेख में बताते हैं कि “अपने रूप के प्रति आत्ममुग्ध सुंदरी की मोहकता की वजह से ही अक्सर उसका प्रेमी उससे असंतुष्ट भी रहता है, क्योंकि उसके मन में उस सुंदरी ने उसे क्यों चुना इसके बारे में हमेशा एक संशय का भाव होता है जो उसे उसके प्रेम के प्रति भी शंकित करता है, उसे वह अपने लिये एक पहेली समझता है ।”

अतिशय आत्ममुग्धता, तमाम सामाजिक मानदंडों पर एक मनोरोग मानी जाती है । इसीलिये एक स्वस्थ और संतुलित जीवन के लिये इससे बचने की जरूरत होती है । सभ्य और भद्र आदमी का अकिंचन-भाव आत्म-मुग्धता का ही प्रति-भाव है । यह भी एक विचित्र कारण है जिसके चलते कला और साहित्य की रचनात्मक दुनिया में भद्रता को भी किसी आत्म-दंड से कम दमनकारी नहीं माना जाता है । इसी से कलाकारों के कुछ-कुछ असामाजिक प्रकार के व्यवहार की समझ मिलती है, जिसे समाज के संरक्षणवादी तत्त्व नापसंद करते है और दंड का अधिकारी मानते हैं । जबकि उन्हीं के कामों के जरिये आदमी का आत्मजगत अपने को किसी भी प्रकार की जड़ता से मुक्त करता हुआ मनुष्य के आत्म-प्रसार का रास्ता खोलता है । दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस समाज में भी रूढ़िवाद प्रबल होता है, वह समाज खुद को ऐसी अंतरबाधाओं से जकड़ लेता है, जिसमें उसके विकास की संभावनाओं का क्रमशः अस्त होता जाता है ।

जो भी हो, आज संजय ने और माहेश्वरी पुस्तकालय के सभी कर्ता-धर्ताओं ने, जो इस क्षेत्र के इस सच्चे गौरव की रक्षा का भार उठाये हुए हैं, इस आयोजन के जरिये हमें जो मान दिया है, हमारे जीवन में यह अपने किस्म का पहला आयोजन ही है ।

हमारे कवि मुक्तिबोध रचनाधर्मिता और समारोह-धर्मिता को एक दूसरे का शत्रु मानते थे । आज हिंदी में पुरस्कारों की स्थिति से आप सब परिचित ही होंगे । हमने अपने एक लेख में इस तथ्य को नोट किया था कि 'वागर्थ' जैसी पत्रिका में छपने वाले लगभग प्रत्येक लेखक के सर पर एक नहीं, अनेक पुरस्कारों की कलंगी लगी रहती है, जबकि हिंदी के विशाल पाठक समुदाय में लोग उनके नाम से भी परिचित नहीं होते हैं, रचना तो बहुत दूर की बात । साहित्य समाज में जितना अप्रासंगिक होता जा रहा है, पुरस्कारों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है । इसीलिये किसी भी प्रकार के पुरस्कार या सार्वजनिक प्रशंसा का लेखक की अपनी पहचान से कितना संबंध हो सकता है, यह बहुत गहरे संदेह का विषय है । तथापि आप तमाम, अपने ही लोगों के बीच उपस्थित होने का सुख ही हमारे लिये कम मूल्यवान नहीं है ।

आप सभी इस मौके पर हमारे साथ कुछ क्षण बिताने के लिये उपस्थित हुए, इसके लिये मैं आप सबके प्रति तहे दिल से आभार व्यक्त करता हूं । इस खुशी के मौके पर अपनी बहक में क्या-क्या बोल गया हूं, उसके लिये इसलिये क्षमाप्रार्थी हूं क्योंकि ये सारी बातें इस आयोजन की औपचारिकता के लिये अनुपयुक्त भी हो सकती है । लेकिन यह ज्ञान का एक सार्वजनिक केंद्र है । शैवमत के महागुरू हमारे अभिनवगुप्त का यह प्रसिद्ध कथन है —
“स्वतन्त्रात्यरिक्तस्तु तुच्छोऽ तुच्छोऽपि कश्र्चन ।
न मोक्षो नाम तन्नास्य पृथङनामापि गृह्यते ।।
(स्वतंत्र आत्मा के अतिरिक्त मोक्ष नामक कोई तुच्छ या अतुच्छ पदार्थ नहीं है । इसीलिये मोक्ष का अलग से नाम भी नहीं लिया जाता, (लक्षण आदि की चर्चा तो बहुत दूर की बात है )

हमारा धर्म ही हमें भैरवी स्वातंत्र्य के भाव को साधने की शिक्षा देता है । हम मोक्ष और वैराग्य के नैगमिक दर्शनों के मिथ्याचारों और दासता के भाव से अपने को जोड़ने के पक्ष में नहीं हैं । इसीलिये हम औपचारिकताओं के नहीं, अनौपचारिकताओं के समर्थक है ।

अंत में कवितानुमा चंद पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात खत्म करूंगा —
साफ कहना

एक अनुभव है साफ कहना
जैसे हो नदी का बहना
ढलान में अलमस्त उतरना
पत्थरों की दरारों से
नया रास्ता बनाना
साफ मन का जैसे खुद को कहना ।

जब गुत्थियाँ सुलझती है
तो अंग-अंग बिखर जाते हैं
नदी के रास्ते में उगे शहर
दरारों में समा जाते हैं
सामने का इंद्रजाल
एक पल में
हवा हो जाता है
ज़र्रा-ज़र्रा बिखरा हुआ
एक कातर दृश्य
बनाता है ।

इसी में अभी मैं
ठिठका खड़ा,
आने वाला समय,
प्रतीक्षा में हूँ कि
व्यतीत को बस
उसका ठाव मिल जाए ।

सचमुच
मैं विगत की
राख में लिपटा दिखूँ
वह समय नहीं हूँ ।

इसीलिये साफ कहूँ
अबाध बहूँ
प्रेम का
खुद ही एक संसार बनूँ
यह वासना ही
मेरा ठोस रूप है ।

आप सबको इस आयोजन के लिये अशेष धन्यवाद ।