मंगलवार, 30 जनवरी 2024

विकृत किए गए शब्द भी अपने मूल अर्थ में लौटा करते हैं

 

(आज के ‘टेलिग्राफ’ में जी एन देवी के लेख पर) 

—अरुण माहेश्वरी 



‘टेलिग्राफ’ में अपने साठवें लेख में श्री जी एन देवी ने कहा था कि अब आगे वे अपनी बची-खुची ऊर्जा को सभ्यताओं के बीच संवाद की तरह के विषय पर शोध के काम में लगाना चाहते हैं । इस प्रकार, उन्होंने एक बार के लिए टेलिग्राफ को अलविदा कह दिया था । उनके शब्दों में — “have decided to sacrifice the privilege of writing in The Telegraph as I turn my limited energies to a large mission of reviving conversations between civilisations that stand today in clashing positions “ । 


देवी की इस घोषणा से टेलिग्राफ के पृष्ठों में पैदा होने वाले में संभावित अभाव के अंदेशे ने हमारे सामने इस अख़बार में अक्सर लिखने वाले लेखकों के विषयों और उनकी शैलियों का एक समग्र चित्र उपस्थित कर दिया था । तभी श्री देवी के उस लेख के मूल बिंदुओं को प्रस्तुत करते हुए ही हमने अपने ब्लाग पर टेलिग्राफ के संपादकीय पृष्ठ की ही एक समीक्षा लिखी थी — ‘टेलिग्राफ का संपादकीय पृष्ठ और जी एन देवी का लेख ‘ ।


लेकिन आज के ‘टेलिग्राफ‘ में पुनः उनकी एक टिप्पणी ने सुखद आश्चर्य से भर दिया । जो व्यक्ति सभ्यताओं के बीच संवाद के सूत्रों की तलाश कर रहा हो और वह तथाकथित सभ्यता के सबसे मूल घटक शब्द और वाक्य अर्थात् भाषा के प्रश्नों से न टकराये, यह संभव ही नहीं है । सभ्यता स्वयं में एक अवबोध है जिसका सारा माजरा शब्दों के खेल से ही बनता है । देवी का काम ही गवाह है कि वे कैसे शब्दों के अध्ययन से सभ्यता के प्रश्नों तक पहुँचे और पुनः सभ्यता के सवाल ही उन्हें शब्दों के चातुर्य की ओर आकर्षित कर रहे हैं । 


जी एन देवी के आज के लेख का शीर्षक है — चतुर शब्द (Tricky words) (बदलते हुए मुहावरें, बदलते हुए अर्थ ) 


इस टिप्पणी का प्रारंभ वे राम शब्द की माया से करते हैं । जब हमने भी मिस्र की यात्रा की थी तो वहाँ के पिरामिडों में उकेरे हुए वहाँ के फैरों (pharaoh)(राजाओं) के नाम अक्सर रामसेस (Ramesses) वन, टू , थ्री सुनते-सुनते हम परेशान हो गए थे । देवी ने बताया है कि वाल्मीकि ने तो ईसा के लगभग दो सौ साल पहले के पुष्यमित्र शुंग के शासन काल के एक चरित्र को लेकर राम की कथा कही थी, पर इस शब्द की गूंज तो हज़ारों साल पहले, सुमेरियन काल (6500-4100 BCE) तक में सुनाई देती है — महाराजा सरगोन का बेटा राजा रिमि़श । 


भारत में वैयाकरणों ने तो, ख़ास कर भर्तृहरि के ‘वाक्यपदीयम्’ में राम नाम का एकवचन, द्विवचन और बहुवचन से शब्द रूपों में बदलाव की शिक्षा के लिये प्रयोग किया गया है । यही राम आयाराम गयाराम से लेकर अब पल्टूराम तक में जिस प्रकार बैठा हुआ है, उससे मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । 


देवी ने अपने लेख में बताया है कि जिस संसद का अर्थ कभी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बहस का प्रमुख स्थल होता था, आज अब उसका बहस या विचार-विमर्श से कोई संबंध नहीं रहा है । और मीडिया का अर्थ तो गोदी मीडिया हो गया है । 


कैसे परिस्थितियों की छाया शब्दों के अर्थ पर पड़ा करती है, इसके कई उदाहरण देवी ने जार्ज ऑरवेल के क्लासिक उपन्यास ‘1984’ और ‘एनिमल फ़ार्म’ से दिए हैं कि लोगों को यातना देने वाले मंत्रालय का नाम मिनिस्ट्री ऑफ लव रखा गया था और युद्ध के काम करने वाले मंत्रालय को मिनिस्ट्री आफ पीस कहा गया । 


इस लेख के अंत में देवी ने ऐसे सभी धोखेबाज शब्दों की समस्या गिनाते हुए कहा है कि अक्सर ये शब्द अपने पर लदे सारे अनर्थकारी लबादों को झाड़ कर फिर अपने मूल रूप में लोगों की स्मृतियों में भी लौट आया करते हैं । “कौन जानता है, भविष्य में कब, जनता की स्मृतियों में इंडिया अर्थात् भारत की आधारशिला के रूप में ‘संविधान’ पद फिर से उभर आए ।” 


सभ्यताओं में शब्दों के खेल पर जी एन देवी के इस अनोखे लेख को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए : 


https://epaper.telegraphindia.com/imageview/460110/22651781/undefined.html


‘टेलिग्राफ का संपादकीय पृष्ठ और जी एन देवी का लेख

15 जून 2023

−अरुण माहेश्वरी




‘टेलिग्राफ’ अखबार के संपादकीय पृष्ठ में कुछ लेखकों के लेख अक्सर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं । उनमें उठाये गये विषयों में एक प्रकार की ताजगी होती है, किंचित विचारोत्तेजना और इतिहास के नाम पर कोरी कहानियों तथा आर्थिक आंकड़ों की फोटोग्राफिक तस्वीरों वाली जड़ता के बखान के बजाय हमारे आज के वैशिष्ट्य के बारे में कहीं ज्यादा मूलगामी दृष्टि पर आधारित एक गतिशील समझ के संकेत देने की कोशिश पाई जाती हैं । यहां हम खास तौर पर वरिष्ठ पत्रकार सुनंदा के. दत्ता-राय, प्रभात पटनायक, जी एन देवी, ए. रघुरामराजू और इधर चंद दिनों से ही लिखना शुरू करने वाले हिलाल अहमद का नाम लेना चाहेंगें । अक्सर उनके लेख हमें आगे टिप्पणी करने या उन लेखों की संस्तुति करने के लिए उकसाते हैं । 


यह सच है कि पढ़ने के लिए आकर्षित तो रामचंद्र गुहा के लेख भी करते हैं, पर उनमें किसी विचारोत्तेजना के बजाय इतिहास के कथामूलक ब्यौरों का आधिक्य होता है । इसी प्रकार रुचिर जोशी की मन की उड़ानों और उड्डालक मुखर्जी की ललित निबंधों वाली शैली का भी एक आकर्षण होता है । भाजपा के पूर्व सांसद स्वपन दासगुप्त को सिर्फ इसलिए पढ़ने की इच्छा होती है ताकि भारत में गोयेबल्सीय प्रचार की धारा की सूक्ष्मताओं की सिनाख्त की जा सके । अक्सर वे शुद्ध रूप से झूठी बातों को ही अपनी ‘गंभीर टिप्पणियों’ का आधार बनाया करते हैं । गोपालकृष्ण गांधी के लेखों में तीक्ष्ण बौद्धिक दृष्टि के बजाय आदर्शवाद ज्यादा होता है । रेणु कोहली या उन जैसे ही आर्थिक विषयों के चंद लेखक परिशुद्ध आर्थिक टिप्पणीकार की नैतिक सीमाओं के कायल होने के कारण किसी भी क्रिया के दूरगामी, विपरीत सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों की चर्चा से परहेज करते हैं और यही वजह है कि वे आर्थिक आंकड़ों का प्रयोग हमारे पूण्यप्रसून वाजपेयी की तरह लक्षणों के नए विश्लेषणों के बीच टिप्पणी के विस्तार के लिए भरती के माल की तरह न करने पर भी एक सीमित विषय पर सीमित दायरे में महज एक रनिंग कमेंट्री करते से जान पड़ते हैं ।


बहरहाल, आज के ‘टेलिग्राफ’ में जी एन देवी के लेख ‘भारत का विशिष्ट मिश्रित सर्वाधिकारवाद : प्रेत की वापसी’ (India’s totalitarianism is of a peculiar mix : The spectre returns) ने हमारा विशेष ध्यान आकर्षित किया है । उन्होंने इस टिप्पणी में भारत में नेहरू की मिश्रित अर्थनीति की तरह ही नरेन्द्र मोदी की मिश्रित तानाशाही की बात कही है । जैसे नेहरू समाजवाद के विस्तार के युग में जनतांत्रिक पूंजीवाद का प्रयोग कर रहे थे, देवी कह रहे हैं कि मोदी कृत्रिम बुद्धि (एआई) के युग में हिटलर-स्तालिन की दमनकारी, उन्मूलनवादी तानाशाही का प्रयोग कर रहे हैं । देवी दो लेखक हाना ओरंत और मेतिआस दिसमित की क्रमशः दो किताबों, The Origins of Totalitarianism (1951) और  The Psychology of Totalitarianism के उल्लेख से बताते हैं कि कैसे हिटलर और स्तालिन के जमाने में लोगों को ऐतिहासिक न्याय पाने के लिए आक्रामक बना कर एक चरम दमनकारी राज्य के प्रति स्वीकार्यता के लिए उन्हें तैयार किया जाता था और अब दुनिया में खुद के हितों के प्रति अति-सुरक्षा का भाव पैदा करके लोगों को अगाध डिजिटल नियंत्रण की शक्ति से लैस राज्य के हाथ में अपनी निजता और स्वायत्तता को सौंप देने के लिए तैयार किया जा रहा है । ये दोनों किताबें ही अलग-अलग समय में तानाशाही को स्वीकारने के लिए जनता के मनोविज्ञान को तैयार करने की पेशकश की कहानियां कहती है । देवी बताते हैं कि भारत में आज मोदी के तानाशाही शासन की विशेषता यह है कि वह तानाशाही के पक्ष में जन-मानस को तैयार करने के इन दोनों उपायों के एक अनोखे संकर का उदाहरण पेश कर रही है । जैसा कि नेहरू ने बताया था कि भारत में गोबर युग और राकेट युग साथ-साथ वास करते हैं, भारत में चल रहे तानाशाही शासन का सत्य उसी के सादृश्य है जिसमें दमन के आदिम और आधुनिकतम औजारों का साथ-साथ प्रयोग करने की कोशिश की जा रही है । इससे भारतीय राज्य के दमनकारी रूप के भावी विकास के बहुत गहरे संकेत पाए जा सकते हैं । यह भारतीय राज्य का अपना विशिष्ट रूप होगा । 


पिछले दिनों इसी प्रकार सुनंदा के. दत्ता-राय ने 10 जून के अपने लेख ‘Missing the sparks’ (चमक की कमी) में सेंगोल के संदर्भ में भारत में राजशाही की दमित आकांक्षाओं की ओर वैश्विक संदर्भ में जो संकेत किया था और इधर 12 जून को रघुरामराजु ने ‘Macaulay’s Trap’ (मैकाले का जाल) शीर्षक लेख में शिक्षा के क्षेत्र में परंपरा और आधुनिकता के बीच के द्वंद्व का जो चित्र रखा, जी एन देवी का लेख कुछ उसी प्रकार राज्य के स्वरूप के विकास के एक संक्रमण काल की सूरत पेश करता है ।

     

जी एन देवी के इस लेख को भी जरूर पढ़ा जाना चाहिए :

https://mail.google.com/mail/u/0/#inbox/FMfcgzGsnBlBXlnnPLZnZXsXBtLVLVjs

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

क्या सीजेआई का ज्ञान ही उनका दुश्मन बन गया है ?

(सीजेआई चंद्रचूड़ पर एक मनोविश्लेषणात्मक टिप्पणी) 


—अरुण माहेश्वरी 

आज क़ानून संबंधी विमर्शों की जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति यह जान चुका है कि हमारे सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने ही रामजन्मभूमि विवाद, धारा 370 जैसे भारत के संविधान के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण विवादों पर राय को लिखने में प्रमुख भूमिका अदा की है । ये वे मुद्दे हैं, जिन पर वर्तमान शासक आरएसएस और बीजेपी की हिंदू राष्ट्र की वह पूरी विचारधारा टिकी हुई है जो संविधान के मूलभूत ढाँचे को परिभाषित करने वाले पंथ-निरपेक्ष और संघवाद के प्रमुख तत्वों के पूरी तरह से विरोध की विचारधारा है । 

इसके अलावा हर आदमी यह भी जानता है कि चंद्रचूड़ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस रंजन गोगोई की तरह के भ्रष्ट और पदलोभी व्यक्ति नहीं हैं । ज्ञान की दृष्टि से अपेक्षाकृत ज़्यादा कुशाग्र और समृद्ध व्यक्ति के रूप में भी उनकी एक स्वीकृति रही है, क्योंकि हाईकोर्ट के जज के वक्त से ही अन्य न्यायाधीशों की तुलना में फ़ैसलों को लिखने के कौशल के मामले में वे पारंगत माने जाते हैं । वे जिस विश्वास के साथ संविधान में प्रदत्त नागरिक स्वतंत्रता की बात किया करते हैं, उसे संविधान के प्रति उनकी निष्ठा का भी एक संकेत समझा जाता है। 

लेकिन जब एक ऐसा कथित रूप से ज्ञानी, तार्किक, और संविधान की मूल भावनाओं की क़सम खाने वाला मुख्य न्यायाधीश ही संविधान के मूलभूत ढाँचे को तहस-नहस करके एक धर्म-आधारित राज्य और संघीय ढाँचे की जगह धर्म-आधारित एकीकृत, तानाशाही राज्य की स्थापना की राजनीति का रास्ता साफ़ करने वाले संविधान-विरोधी फ़ैसलों में प्रमुख भूमिका अदा करता हुआ दिखाई दें, तो स्वाभाविक रूप में वह एक ऐसे विशिष्ट चरित्र के रूप में उभर कर आता है जिसकी मनोविश्लेषणात्मक व्याख्या से किसी भी ज्ञानी चरित्र में विक्षिप्तता की हद तक जाने वाले मनोरोग के कुछ सामान्य कारणों की सिनाख्त की जा सकती है । 

चंद्रचूड़ महोदय ने अपने फ़ैसलों से ही नहीं, चंद रोज़ पहले अपनी गुजरात यात्रा और मंदिरों के शिखर पर उड़ने वाले ध्वजों को न्याय के ध्वज बता कर भी अपने इन लक्षणों के संकेत दिए थे । 

यही वजह रही कि हाल में जब सुप्रीम कोर्ट से बिलकीस बानो के अपराधियों को फिर से जेल भेजने और मथुरा की ईदगाह मस्जिद में सर्वे कराने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के बेतुके फ़ैसले पर रोक लगाने के महत्वपूर्ण और स्पष्ट फ़ैसले आए, तब हम यह कहने से खुद को रोक नहीं पाए कि सारी संभावित क़ानूनी पेचीदगियों को ख़ारिज करते हुए ये फ़ैसले इसीलिए संभव हुए क्योंकि इन फ़ैसलों पर सीजेआई चंद्रचूड़ की ‘विद्वता’ की कोई छाया नहीं पड़ पाई थी । 

बहरहाल, मनोविश्लेषण के सिद्धांतों में विवाद का हर प्रश्न स्वंय में एक प्रमाता (subject) के साथ ही एक संकेतक (signifier) की तरह भी होता है । इसमें सुप्रीम कोर्ट की भूमिका संविधान के परिप्रेक्ष्य में उस संकेतक की व्याख्या करने की भूमिका की होती है । अर्थात् उस मामले का जो पहलू अव्यक्त है पर वह प्रमाता के अवचेतन की भाँति उसमें अन्तर्निहित है, सुप्रीम कोर्ट की भूमिका उस अवचेतन को प्रस्तुत करने की होती है । मनोविश्लेषण में व्याख्या का अर्थ ही होता है अवचेतन को रखना । 

जैसे कोई विश्लेषक मनोरोग के संकेतों से उसके लक्षणों को पकड़ कर विश्लेषण के ज़रिए रोगी को उसकी बाधा से मुक्त करता है और उसे सामान्य जीवन में वापस लाता है, उसी प्रकार हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की तरह की अदालतें भी, जो ट्रायल कोर्ट नहीं होतीं बल्कि नीचे की अदालतों और कार्यपालिका आदि के फ़ैसलों और क़ानूनी पेचीदगियों की व्याख्या करती हैं, विवाद के मसलों की क़ानूनी व्याख्याओं के ज़रिए उन्हें भारत के संविधान के द्वारा प्रस्तावित विधियों की संगति में स्थापित करती है । इस उपक्रम में ज़रूरत पड़ने पर वह प्रचलित विधियों की भी नये सिरे से व्याख्या करके उन्हें संविधान की मूलभूत भावना और उसके मूल ढाँचे के अनुरूप पुनर्गठित भी करती है । जो अन्याय समाज में प्रचलित है पर संविधान जिनकी अनुमति नहीं देता है, न्यायपालिका उन अन्यायों को दूर करने के लिए भी प्रभाव डालने की विधायी भूमिका अदा करती है।  

इस प्रकार, कुल मिला कर, साधारण भाषा में, अंतिम निष्कर्ष में अदालत की भूमिका विवाद के मसले का संविधान-सम्मत हल ढूँढ कर क़ानून के शासन को क़ायम करना होता है । 

साधारण जीवन वैसे भी सामान्यतः तमाम मूलभूत नैतिकताओं के पालन के ज़रिए एक प्रकार के क़ानून के शासन के अधीन चला करता है । पर जब उसमें मूलभूत नैतिकताओं से, ‘जीओ और जीने दो’ के मूलभूत मानवीय व्यवहार से विचलन होता है, तो समाज प्रचलित मान्यताओं और उनके क़ानूनी प्रावधानों के ज़रिए उसे नियंत्रित करता है । जनतंत्र में दैनंदिन जीवन के इस काम का मूल दायित्व अदालत का होता है जो जन-प्रतिनिधियों के द्वारा बनाए गए क़ानूनों पर अमल को ही सुनिश्चित नहीं करती है, बल्कि संविधान के मूलभूत आदर्शों की कसौटी पर समय-समय बनाए जाने वाले क़ानूनों या क़ानून में संशोधनों की भी समीक्षा करती है। 

मनुष्य अपने निजी जीवन में जिस प्रकार सामाजिक मान्यताओं और मर्यादाओं का पालन करते हुए जीने की कोशिश करता है, सिगमंड फ्रायड ने इसे आनंद सिद्धांत (pleasure principle) कहा था । जब कोई मनोरोगी विक्षिप्त होकर सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता है तब उसे पुनः मर्यादाओं के दायरे में लाने का काम मनोविश्लेषक का होता है, जो उसके सोच की व्याख्या से उसे सामान्य बनाता है । इसप्रकार, मनोविश्लेषण का काम यथार्थ की व्याख्या से आनंद सिद्धांत की सेवा करना होता है। महान मनोविश्लेषक जॉक लकान कहते हैं कि ‘यथार्थ सिद्धांत (reality principle) आनंद सिद्धांत की सेवा करता है ।’ 

मनोविश्लेषण के इसी सूत्र को यदि हम न्यायपालिका की व्याख्यामूलक भूमिका पर लागू करके देखें तो कहना होगा कि न्यायपालिका का काम विवाद के विषयों की व्याख्या के ज़रिए चीजों को संविधान के दायरे में स्थित रखने का होता है । न्यायपालिका की भूमिका संविधान और क़ानून के पालन के आनंद सिद्धांत की सेवा की भूमिका होती है । 

जैसा कि हमने पहले ही कहा , न्यायपालिका के सामने विवाद का हर प्रश्न स्वयं में एक संकेतक की तरह होता है । जॉक लकान कहते हैं कि किसी भी अकेले संकेतक का स्वयं में कोई मायने नहीं होता है । अकेला संकेतक ऐसे विरही की तरह होता है जो अपने होने के अर्थ की तलाश में अन्य संकेतक की बाट जोह रहा होता है, उसके लिए तड़पता है और यह अन्य संकेतक ज्ञान के क्षेत्र से आता है । ऐसे में अक्सर एक नियम की तरह ही वहां विवादी पक्ष की दलीलें उसे भटकाने के लिए पहले से मौजूद रहती हैं। उनकी भूमिका परोक्षतः विचार को भटकाने की, अर्थात् भ्रम पैदा करने की होती है । मज़े की बात यह है कि विचार, अर्थात् संकेतक की व्याख्याओं का प्रस्थान इसी विपरिसंकेत से हुआ करता है । इसे ही बिल्कुल सही कहा गया हैं — व्याख्या का मतिभ्रम (Interpretation of delusion)। हर व्याख्या में इस मतिभ्रम का ढाँचा अनिवार्यतः मौजूद रहता है । 

जॉक लकान ने ऐसी स्थिति में ही सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा था कि जब विश्लेषक कोई व्याख्या करता है और किसी भी कारण या दबाव के चलते यह आशंका हो कि उससे विश्लेषण के बजाय उल्टे नये भ्रम पैदा होंगे, तब विश्लेषक के लिए यही उचित होता है कि वह एक बार के लिए चुप्पी साध ले । अर्थात्, यदि परिस्थितिवश न्यायाधीशों को संविधान-सम्मत उपाय से राय देने में बाधा महसूस हो रही हो, तो उनके लिए संविधान के प्रति अपनी निष्ठा पर बने रहने के लिए ही चुप्पी साध लेना ज़्यादा बेहतर होता है, बजाय इसके कि वह बढ़-चढ़ कर अपने खुद के ज्ञान का परिचय देने के लिए ही, खुद ही संविधान की सीमाओं का अतिक्रमण करने लगे और भ्रम निवारण के बजाय और भी नये भ्रम उत्पन्न करने लग जाए। 

मनोविश्लेषण की भाषा में कहें तो इसे इस प्रकार कहा जाता है कि जब विश्लेषक के सामने विश्लेषण से नए भ्रम उत्पन्न होने की आशंका हो तब उसे मूल संकेतक S1 तक ही खुद को सीमित रखना चाहिए और अपने पांडित्य के अन्य संकेतक S2 , जो उसे सीमा का अतिक्रमण करके भटकने के लिए उकसाता है, पर लगाम लगानी चाहिए । 

कहना न होगा, हमारे सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ को भी आज उनका यह पांडित्य ही सता रहा है और उनमें वह अति-उत्साह पैदा कर रहा है जिसके कारण वे संविधान के मूल भाव और मूल ढाँचे का अक्सर अतिक्रमण करने के लिए मचल उठते हैं और आज के संविधान-विरोधी मोदी शासन के जाल में फँस जाते हैं । इसके चलते ही उनके अनेक फ़ैसले संविधान की रक्षा की क़सम खाते हुए भी संविधान पर प्राणघाती हमला साबित होते हैं । सीजेआई का यह अतिरिक्त ज्ञान ही उन्हें सिखाता है कि न्यायपालिका का कर्तव्य है शासन की मदद करना । पर जो शासन ही राज धर्म का पालन नहीं करता है, उसके प्रति न्यायपालिका का नज़रिया क्या होना चाहिए, यह तय करने में वे पूरी तरह से चूक जाते हैं । 

इस प्रकार, कहना न होगा, हमारे सीजेआई अपनी पूरी ईमानदारी और अपने अगाध ज्ञान के साथ बड़ी आसानी से बार-बार न्यायपालिका को एक परम दमनकारी और अनैतिक शासन के हाथ के औज़ार में बदल देने का भारी दोष कर बैठते हैं । उनका ज्ञान ही उन्हें एक निष्ठावान न्यायाधीश से अपेक्षित प्रचार-विमुखता के शील का भी पालन नहीं करने देता हैं । वे अक्सर बहुत ज़्यादा भाषणबाज़ी और प्रचार पाने के चक्कर में सार्वजनिक जीवन में ऐसे स्खलन का प्रदर्शन करते हैं, जिसकी एक निष्ठावान न्यायाधीश से उम्मीद नहीं की जाती है । वे गेरुआ वस्त्र धारण करके मंदिरों के ध्वज को भारतीय राज्य के तिरंगा ध्वज की तरह न्याय का ध्वज तक बताने से परहेज़ नहीं करते ! 

अंत में हम यही कहेंगे कि हमारे सीजेआई महोदय क़ानूनी व्याख्याओं के लिए संविधान के संकेतों तक ही अपने को सीमित रखें और अपने ज्ञान के प्रदर्शन के लोभ से बचें, इसी में हमारे राष्ट्र की भलाई है । उनका प्रदर्शनकारी ज्ञान अब शुद्ध रूप में फासिस्टों की, अर्थात् संविधान पर कुठाराघात करने के लिए आमादा शक्तियों की मदद कर रहा है । उस पर वे जितना लगाम लगायेंगे, उतना ही हमारे संविधान का भला होगा  । 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

क्या आरएसएस और शंकराचार्यों के बीच का तनाव अब अपनी ऐतिहासिक तार्किक परिणति की दिशा में बढ़ रहा है ?

— अरुण माहेश्वरी 



राम मंदिर पर शंकराचार्यों के द्वारा उठाए गए धर्मशास्त्रीय विवाद में अब स्थिति साफ़ तौर पर उस तार्किक परिणति तक जाती हुई दिखाई देने लगी है, जो वास्तव में आरएसएस का लंबे अरसे से एक सबसे गहरा अभीप्सित लक्ष्य रहा है । 


अभी से छः दशक पहले, सन् 1964 में आरएसएस ने जिस उद्देश्य से विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की थी, आज मोदी और मोहन भागवत का मानना है कि वह उचित समय आ गया है, जब पूरी शक्ति के साथ उस उद्देश्य की पूर्ति की ओर कदम बढ़ा दिए जाए । 

आज सबको इस बात को जानने की ज़रूरत है कि आरएसएस के सांगठनिक ताने-बाने में राज सत्ता को हासिल करने के लिए जो महत्व कभी जनसंघ, और अभी भारतीय जनता पार्टी का है, उसी प्रकार जनता के आध्यात्मिक जगत की धर्म सत्ता पर अपना एकाधिकार क़ायम करने के लिए उतना ही बड़ा महत्व विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का रहा है । खुद को मूलतः एक सांस्कृतिक संगठन बताने वाले आरएसएस के लिए आध्यात्मिक जगत पर अधिकार के सपने का कितना मूल्य हो सकता है, इसे शायद किसी को भी अलग से समझाने की ज़रूरत नहीं है । 


आरएसएस के तमाम इतिहासकारों ने उसके इतिहास में जनसंघ के गठन के बाद विश्व हिंदू परिषद के गठन को जिस प्रकार एक सबसे बड़ी घटना माना है, वह अनायास नहीं है । 


आरएसएस के इतिहासकारों में एक प्रमुख गंगाधर इंदूरकर, जो खुद भी एक कट्टर सांप्रदायिक व्यक्ति और आरएसएस के स्वयंसेवक थे, वे आरएसएस के नागपुर कार्यालय में काम करते थे और उसके प्रचार विभाग का दायित्व सँभाले हुए थे, उन्हें गांधी हत्या के आरोप में पकड़ कर जेल में भी डाला गया था, उनकी एक पुस्तक है — “ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : अतीत और वर्तमान “ । इस पुस्तक में उन्होंने विहिप के बारे लिखा था कि “ संघ द्वारा स्थापित अन्य संस्थाओं की अपेक्षा इस संस्था के विषय में गुरुजी ( गुरु गोलवलकर) को अधिक आत्मीयता थी । मेरे इस विचार के लिए सबूत भी है । वह यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अतिरिक्त किसी अन्य संस्था के साथ गुरुजी का नाम नहीं जुड़ा, किंतु विश्व हिंदू परिषद के लिए 22 व्यक्तियों का जो प्रथम ट्रस्ट बना, उसमें तेरहवें क्रमांक पर श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, यह नाम दिखाई देता है ।” (पृः 138) 


इसमें ही आगे इंदूरकर की एक टिप्पणी से हिंदू धर्माचार्यों के प्रति आरएसएस के अंदर के लोगों की भावनाओं का भी परिचय मिलता है जिसमें वे लिखते हैं :


“किसी भी शंकराचार्य का आज वह सम्मान नहीं, जो कि बीस-पच्चीस या पचास वर्ष पूर्व मिलता था । अनेक लोगों को संदेह होता है कि शायद इन धर्माचारयों की सत्ता बनाए रखने के लिए विश्व हिंदू परिषद के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही तो वह कार्य नहीं कर रहा है ।” ( इंदूरकर, वही, पृः 142) 


इस प्रकार ज़ाहिर है कि विहिप का गठन हिंदू समाज की तमाम धार्मिक संस्थाओं के खिलाफ एक अन्य सत्ता केंद्र की स्थापना की साजिश के तौर पर किया गया था। आर एस एस के सांगठनिक सिद्धांत का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व रहा है एकचालाकानुवर्तित्व का सिद्धांत । इसका अर्थ है नेता के आदेश का आंख मूंदकर पालन करना। सब प्रकार के भेदों को परे करके सब को एक रंग में रंग देना होगा । संगठन के संचालन का यह सिद्धांत आर एस एस पूरे देश और इसकी सभी संस्थाओं पर लागू करना चाहता है। इसी दृष्टि से उन्होंने विहिप के ज़रिए धार्मिक जगत को अपने एक रंग में रंगने का बीड़ा उठाया था ।


हर कोई जानता है कि हिंदू धर्म कोई पैगंबरी धर्म नहीं रहा है। भारतीय दर्शन का वैविध्य ही हिंदू धर्म के क्षेत्र में भी प्रतिफलित हुआ है । ब्राह्मणों के छह मान्य दर्शनों में भी तीन सांख्य, वैशेषिक और मीमांसा ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इनकार करते हैं। अन्य भारतीय दर्शनों को मिला लेने पर भारतीय चिंतन परंपरा में अनीश्वरवादियों की संख्या काफी बड़ी दिखाई देती है। बौद्ध और जैन दर्शन अनादि, अपौरुषेय वेद तथा ईश्वर से साफ इनकार करते हैं। चार्वाक तो घोर भौतिकवादी थे। संस्कृत में प्रसिद्ध कहावत ही है- "वेदाविभिन्नाः स्मृतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।" यही हिंदू समाज का मूल चरित्र और विशिष्टता रही है। अनीश्वरवादी बुद्ध और महावीर को भी यहां समान सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है। 


आर एस एस ने भारतीय दर्शन की इस वैविध्यपूर्ण विशिष्टता को हमेशा अपने रास्ते की एक सबसे बड़ी बाधा समझा तथा गिरजाघरों, मस्जिदों की तरह किसी एक संस्था के द्वारा हिंदू धर्मावलंबियों के जीवन को चालित करने की योजना बनाई। हिंदू धर्म को एक पैग़म्बरी धर्म के ढाँचे में ढालने की कोशिश के लिए ही विहिप का गठन किया गया । 


इंदूरकर ने अपनी पुस्तक में इस बात को लक्ष्य किया कि विहिप के गठन के द्वारा पहली बार आर एस एस ने “आध्यात्मिक विचारों के प्रचार के कार्य को अपनाया।” 


इंदूरकर ने इसे आर एस एस के जीवन में एक बड़े मोड़ की तरह रखा है। उनके शब्दों में —


"संघ व्यवस्था में समस्त भारतीय परंपराओं को स्वीकार किया गया किंतु वहां किसी भी प्रकार की उपासना पद्धति का सहारा नहीं है।... विशिष्ट उद्दिष्ट के कारण परिषद् में आध्यात्मिक तथा धार्मिकता का भी समावेश हुआ। परिषद् की स्थापना के समय इस बात का भी ध्यान था कि हिंदुत्व के नैतिक तथा आध्यात्मिक सिद्धांत नए युग में उनके पुराने स्वरूप में उपयोगी नहीं होंगे, इसलिए उनका संसार में प्रचार करने के हेतु आधुनिक काल के उपयुक्त यह प्रावधान भी उसमें जोड़ दिया गया है ।”


यहां इंदूरकर के द्वारा प्रयुक्त ‘विशिष्ट उद्दिष्ट’ पद पर गौर करने की ज़रूरत है । जिस आरएसएस के लिए उपासना पद्धति आदि का कभी कोई मतलब नहीं था, उसी ने ‘विशिष्ट उद्दिष्ट’ से, अर्थात् ख़ास मक़सद से अपने यहाँ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश कराया ! 


खुद इंदूरकर में धार्मिक आचार-आचरण को लेकर कैसी वितृष्णा का भाव था, इसका परिचय उनके इस कथन से मिलता है — 


“ विश्व हिंदू परिषद् ने जो कार्य हाथ में लिए हैं उनके संदर्भ में एक और विचार मन में आता है। …किसी तिथि को गणेश मंदिर में, मंगलवार को देवी मंदिर में अथवा शनिवार को हनुमान जी के मंदिर में भक्तजनों की जो भीड़ दिखाई पड़ती है, उसका वास्तव में क्या कारण है? क्या सच में भक्ति भावना बढ़ी है अथवा सर्वसाधारण मनुष्य की मानसिक कमजोरी का यह द्योतक है । गरीब लोगों को प्रकार से लूटने वाला महाजन उसी काले धन से मंदिर बनवाता है और वह धर्म कहलाता है, छोटे पैमाने पर यह भी वैसा ही उदाहरण है । आज की परिस्थिति है कि झूठ और बेईमानी के कार्य के लिए मनुष्य का मन उसे कहीं पर दबोच खसोटता रहता है। उससे मुक्त होने का सहारा ढूंढ़ने के लिए वह मंदिर में जाता है। यह धार्मिक प्रवृत्ति नहीं है। जो इस प्रवृत्ति का नेतृत्व करते हैं, उनके हाथों समाज परिवर्तन होना असंभव है।" (गंगाधर इंदूरकर, पूर्वोक्त, पृ. 143) 


यह भाव अकेले इंदूरकर का नहीं था, आरएसएस के नेतृत्व से लेकर सामान्य स्वयंसेवकों तक के मन का भाव था । इस प्रकार, जिन बातों पर संघ को ही कोई विश्वास नहीं था, उन्हीं बातों को उसने सिर्फ़ इसलिए अपनाया ताकि धर्म के जगत पर उसके वर्चस्व का कोई रास्ता खुल सके । इस लेखक ने तीस साल पहले अपनी पुस्तक “आरएसएस और उसकी विचारधारा “ में विहिप के साथ जुड़े आरएसएस के इस ख़ास उद्देश्य के बारे में काफ़ी विस्तृत चर्चा की थी । 



आज जब आरएसएस ने मोदी के ज़रिए देश की सत्ता पर अपना एकाधिकार क़ायम कर लिया है, तब उसका मानना है कि यही सबसे उचित समय है जब वह धर्म के जगत के भी सब स्वतंत्र पीठासीनों को अपदस्थ करके खुद को इस जगत एकछत्र सम्राट घोषित कर दे । राम मंदिर की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर धर्म शास्त्र की कसौटियों के आधार पर ख़ास तौर पर सभी शंकराचार्यों के साथ जो विवाद उत्पन्न हुआ है, मोदी और आरएसएस इस विवाद को अपने अभीप्सित लक्ष्य की पूर्ति के लिए एक सबसे मुफ़ीद अवसर के रूप में देख रहे हैं । उनमें अन्य कई विषयों की तरह ही, धर्म जगत पर अपना झंडा गाड़ने को लेकर ‘अभी नहीं को कभी नहीं का’ जुझारू भाव पैदा हो गया है । वर्चस्व की अपनी इस लड़ाई में वे राम मंदिर को लेकर पैदा हो रही जन-भावनाओं का भी भरपूर इस्तेमाल कर पाने की उम्मीद रखते हैं।  


इसीलिए हमारी यह धारणा निराधार नहीं है कि अब हिंदू धर्माचार्यों और आरएसएस के बीच का अन्दरूनी द्वंद्व तेज़ी के साथ अपने तार्किक समाधान की दिशा में बढ़ रहा है।  2024 के चुनाव में मोदी यदि फिर से जीत जाते हैं, तो यह तय है कि हिटलर की शिक्षा पर अमल करते हुए आरएसएस अपने घूँसे की ताक़त के बल पर शंकराचार्यों की तरह की धर्म पीठों को भी अपने कदमों तले ले आने की किसी भी हरकत से बाज नहीं आयेगा । अभी जिन धर्माचार्यों को हिंदू धर्मावलंबियों पर अपने प्रभाव का भारी गुमान हैं, हम देखेंगे कि 2024 के चुनाव के साथ ही कैसे इन सबको दिन में तारे नज़र आने लगेंगे और कैसे उस चुनाव को हिंदू धर्म के एकमात्र प्रवक्ता के रूप में आरएसएस और विहिप के चयन के जनमत संग्रह के रूप में पेश किया जाएगा । 

बुधवार, 3 जनवरी 2024

भारतीय न्यायपालिका में पोस्ट-ट्रुथ युग


—अरुण माहेश्वरी 




नये साल के प्रारंभ के साथ ही जब 3 जनवरी को अडानी समूह की अपने शेयरों की क़ीमतों के मामले में हेराफेरियों के बारे में प्रसिद्ध हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का वक्त आया, उसके ठीक पहले इस लेखक ने फ़ेसबुक पर यह भविष्यवाणीमूलक टिप्पणी की थी कि “आज हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर जाँच को ठुकराया जायेगा !”


इस टिप्पणी में कहा गया था कि “आज अडानी समूह के ग़ैर-क़ानूनी वित्तीय क्रियाकलापों पर प्रसिद्ध हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर हमारे सुप्रीम कोर्ट के महाज्ञानी मुख्य न्यायाधीश की बेंच फ़ैसला सुनाने वाली है ।अब यह जग ज़ाहिर है कि हमारे वर्तमान ज्ञानी सीजेआई आज के पोस्ट ट्रुथ युग की एक विशेष उपज हैं ।”


इसमें पोस्ट-ट्रुथ को परिभाषित करते हुए कहा गया था कि “हमारा पोस्ट-ट्रुथ है - धर्म-निरपेक्ष राज्य और जनतंत्र के सत्य के विपरीत धर्म-आधारित सांप्रदायिक राज्य और तानाशाही । क़ानून के शासन के विपरीत शासक की मनमर्ज़ी ।”


जैसे किसी भी युग के सत्य को उसका परमार्थ कहा जाता है जो उस युग के सभी प्रमाता रूपों में किसी न किसी रूप में अपने को प्रकट करता है । हमारे शैव धर्मशास्त्रों में इसे ही शंभु कहा गया है । उसी प्रकार जब हम किसी युग को पोस्ट-ट्रुथ अर्थात् असत्य का युग कहते हैं तो उस पोस्ट-ट्रुथ को ही उस युग का परमार्थ कहा जायेगा । 


परमार्थ अर्थात् प्रमाता से परे अनादि रूप में स्थित समस्त चराचर पर व्याप्त अर्थ जो एक या अनेक रूपों में समस्त प्रमाताओं में प्रविष्ट होता है । समग्र प्रतीतियों का प्रमाता अथवा उनके अनुभवित होने का कारण ।


हमारे अभिनवगुप्त की शब्दावली में - 


“परं परस्थं गहनाद् अनादिम्

एकं विशिष्टं बहुदा गुहासु ।

सर्वालयं सर्वचराचरस्थं

त्वामेब शम्भुं शरणं प्रपद्ये ।।” (परमार्थसार -१)


हम सभी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने रफ़ायल मामले में मोदी के भ्रष्टाचार की जाँच से इंकार करने के बाद राम जन्मभूमि के मामले में बहुसंख्यक धर्म के प्रति पक्षपात करके नग्न रूप में न्यायपालिका में पोस्ट-ट्रुथ युग का प्रारंभ किया था। अभी हम उसी पोस्ट-ट्रुथ के युग में जी रहे हैं । 


हमारे संविधान का अपना सत्य है मानवता, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा अर्थात् न्याय और धर्म-निरपेक्षता । और, इसका पोस्ट-ट्रुथ है — धर्म की प्रधानता, भेद-भाव, ग़ैर-बराबरी, स्वतंत्रताओं का हनन, नागरिक का दमन अर्थात् शोषण, जुल्म, सांप्रदायिक और जातिवादी भेद-भाव — समग्र रूप से फासीवाद । 


ऐसे में वर्तमान काल को पोस्ट-ट्रुथ का काल कहने का तात्पर्य है कि प्रमाता के सारे संकेतक मानव-केंद्रिक सत्य के बजाय धर्म, सांप्रदायिकता और फासीवाद के असत्य की ओर धावित होने लगते हैं । इस युग का परमार्थ यह असत्य ही है । 


इसी प्रसंग में, सुप्रीम कोर्ट के पिछले कई फ़ैसलों, ख़ास तौर पर धारा 370 पर सुनाए गए अविवेकपूर्ण फैसले की पृष्ठभूमि में हमने लिखा था कि 


“हमारे सीजेआई के मुखारबिंद से यही पोस्ट-ट्रुथ नाना रूपों में अविरल रूप में व्यक्त होता रहा है। आज उसी का एक और रूप देखने को मिलेगा ।


“सीजेआई पूरी मौज में आज हिंडनबर्ग रिपोर्ट की धज्जियाँ उड़ाते दिखाई देंगे, क्योंकि वे इस पोस्ट-ट्रुथ युग के ट्रुथ को व्यक्त कर रहे होंगे।” 


उसी दिन बाद में जब हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर सेबी की जाँच के मामले में जब अंतिम फ़ैसला आया तो हुबहू हमारी आशंका के अनुरूप ही सुप्रीम कोर्ट ने अडानी के रक्षक सेबी को ही हिंडनबर्ग मामले की जाँच को जारी रखने का आदेश दे दिया । उल्टे, एक दमनकारी शासन के चरित्र को ज़ाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फ़रियादी को ही दंड सुनाने का भी फ़ैसला किया और सरकार से कहा कि वह हिंडनबर्ग रिपोर्ट की जाँच करें कि उसके पीछे असली मंशा क्या थी ! 


इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने अडानी और सरकार, दोनों को अभय दिया, और अडानी की करतूतों पर सवाल उठाने वालों को एक कड़ी चेतावनी भी दे डाली । 


कहना न होगा, आज हमारे सीजेआई भारतीय न्यायपालिका में पोस्ट-ट्रुथ युग के प्रमुख प्रतीक बन चुके हैं । भारत में फासीवाद की स्थापना में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका के इतिहास में रंजन गोगई के पद-चिह्नों पर चलने वाले दूसरे प्रमुख नाम के तौर पर डी वाई चंद्रचूड़ के नाम को भी याद रखा जायेगा ।