मंगलवार, 24 नवंबर 2020

बंगाल के चुनाव में बिहार का अधूरा काम पूरा होगा

 

—अरुण माहेश्वरी 


जो भी बिहार के चुनाव को मोदी की लोकप्रियता का प्रमाण मानता है, वैसे, कवि कैलाश वाजपेयी के शब्दों में, “चुका हुआ / नंगे पत्थर के आगे झुका हुआ/ औरों के वास्ते विपदाएं मांगता / नाली में पानी रुका हुआ !” ‘ईश्वरभक्त’ को यदि हम अभी किनारे छोड़ दें, तो कोई अंधा भी देख सकता है कि बिहार का चुनाव मोदी और नीतीश के स्तर के उसके सारे पंडों को एक सिरे से खारिज करने वाला चुनाव रहा है । जब चुनाव का ऐलान हुआ था, वहां प्रत्यक्षतः हालत यह थी कि जैसे चुनाव में सिवाय मोदी-शाह के करोड़ों-अरबों के काले धन के अलावा और किसी का कुछ भी नहीं चलेगा । लालू तो वैसे ही जेल में हैं, कांग्रेस की दशा हर कोई जानता है और वामपंथी तो जैसे अस्तित्व का संकट झेलते दिखाई दे रहे थे । कोरोना के कारण न कोई सभा-प्रदर्शन होंगे, न किसी को घर-घर प्रचार के कार्यकर्ता ही मिलेंगे । मीडिया पर मोदी-शाह के एकाधिकार के कारण और भी कहीं से कोई दूसरी बात के उभरने की संभावना नहीं दिखाई देती थी । अर्थात् लगता था कि चारों ओर जैसे किसी शीश महल में सिर्फ अमित शाह की वर्चुअल सभाओं के नजारे होंगे । रोते हुए प्रवासी मजदूर, बेसहारा किसान और बेरोजगारों की अंतहीन फौज, आम लोगों की दुख-दर्द की कहानियां इस महल से बाहर किसी उपेक्षित कोने में सिसकियां भरती हुई अपने भाग्य को कोसेगी । अर्थात् बिहार में रावण की कथित सोने की लंका का दृश्य पूरी तरह साकार हो उठेगा ।  

अपनी लंका की इतनी मोहक तस्वीर की कल्पना की तरंग में ही तो अमित शाह ने अपनी कथित ‘चाणक्य बुद्धि’ का डंका बजाने के लिए चुनाव के मूल नाटक के साथ ही नीतीश बनाम चिराग पासवान वाले एक अतिरिक्त प्रहसन का अंक भी इसमें जोड़ दिया ताकि चुनाव का यह खेल पूरी तरह से ऊबाऊ होने के बजाय उसमें कुछ मजाक, कुछ रोमांच बना और उसी के अंदर से नीतीश का चुनाव के अंत में हमेशा के लिए राम नाम सत्य करके अमित शाह को महाबली घोषित कर दिया जाए ; चुनाव के अंत में बादशाह सलामत की छाया तले ‘चाणक्य पहलवान’ अमित शाह की शान में चारों ओर से तुरहियां गूंजती रहे । 

बहरहाल, बिहार के चुनाव ने दिखा दिया कि वह सब पूरी तरह से अपनी रंगरेलियों में डूबे हुए अय्यास शासकों का हसीन सपना भर था । लोग जब वैसे ही अपने जीवन-जीविका मात्र के लिए रोजाना मास्क जैसी मामूली चीज को हिकारत के साथ ठुकराते हुए देखे जाते हैं, वैसी स्थिति में ये महामारी और उसकी सारी मास्क और सामाजिक दूरी की नियामतें चुनाव जैसे मौके पर निर्णायक साबित होगी, यह कोई ऐसा पहलवान चाणक्य ही सोच सकता था, जिसने फर्जी डिग्रियां और उपाधियां देने वाले स्कूल से अपने लिये वह उपाधि खरीदी होगी । चाणक्य तो बहुत दूर की बात है, उस स्कूल में तो हर रोज किसी को नेहरू की डिग्री बांटी जाती है तो किसी को पटेल की, तो कभी-कभी गांधी भी हत्थे चढ़ा लिए जाते हैं । 

जो भी हो, बिहार के चुनाव का प्रचार शुरू होते ही, जो बिल्कुल स्वाभाविक और अपेक्षित था, जो सतह पर न होने पर भी सबसे प्रबल था, एक तुगलकी राज के खिलाफ लोगों का चरम गुस्सा, नौजवानों में बेरोजगारी की ज्वाला और प्रवासी मजदूरों के जीवन के सबसे यातनादायी अनुभवों की यादें — इन सबका किसी बड़े विस्फोट की तरह फट पड़ना, उसे सामने आने में जरा सा भी समय नहीं लगा  । थोड़े से समय के प्रचार में ही यह साफ हो चुका था कि बिहार में बदलाव की लहर बह रही है । मोदी-नीतीश की हैसियत जनता की नजर में खलनायकों से बेहतर नहीं है । और, देखते-देखते सत्ताधारियों का टाट पूरी तरह से उलटता हुआ दिखाई देने लगा । पहलवान चाणक्य को तो इस लड़ाई में पीठ दिखाते जरा सा भी समय नहीं लगा । दो सौ सीटों की उनकी शुरू की हुंकारें किस अंतरिक्ष में खो गई, कि बाद में तो मुहंजोर प्रधानमंत्री के मुंह से भी उसकी आहट तक नहीं सुनाई दी ।   

बिहार के चुनाव परिणाम बताते हैं कि पहले चरण के चुनाव में तो एनडीए बुरी तरह पराजित हुआ ; दूसरे-तीसरे चरण में रुपयों के दूसरे खेलों से सांप्रदायिक और जातिवादी गोटियों के जरिये स्थिति को बदलने की ताबड़तोड़ कोशिशें हुईं, फिर भी सच पूछा जाए तो उनसे भी एनडीए की पराजय को पूरी तरह से रोका नहीं जा सका । अंत में चुनाव के जनतंत्र को दरकिनार कर के नंगा हिटलरी खेल खेला गया, पूरी बेशर्मी से गिनती में हेरा-फेरी हुई और नौकरशाही की जोर-जबर्दस्ती से किसी प्रकार से एनडीए के लिए बहुमत के आंकड़े को कागजों पर लिख दिया गया । आगे, कागज पर लिखे की हिफाजत के लिए राजसत्ता के सारे यंत्र तो तैयार थे ही ! मुख्यमंत्री बन कर भी  नीतीश आज सिर्फ एक कठपुतला है और उनका बाकी मंत्रिमंडल छटियल भ्रष्ट तत्त्वों का निंदित जमावड़ा । मतलब, जो हासिल हुआ है उसे राजनीति नहीं, शुद्ध लूट-खसोट का अधिकार छीन लेना कहना उचित होगा ; गरीब बिहार के शरीर पर से बचे-खुचे कपड़ों को भी उतारने के अश्लील खेलों का अधिकार । 

बहरहाल, इस चुनाव से बिहार की राजनीति अगर किसी रूप में पटरी पर आई है तो यही कि आगे के लिए वह भारत में जनतांत्रिक आंदोलनों की फसल की सबसे उर्वर जमीन बन गई है । बिहार वामपंथी, सामाजिक न्यायवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ताकतों की एकता का नया मंच बन कर उभरा है ।  

और, अभी से हम यह साफ देख पा रहे हैं कि बिहार की इस नई राजनीति की फसल बहुत जल्द ही उसके पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में कटने वाली है, जहां आगामी चंद महीनों बाद ही चुनाव होने वाले हैं । राजनीतिक पंडितों की चर्चाओं में अभी बंगाल ही तो छाया हुआ है ।

बंगाल के बारे में मीडिया की चर्चा की छटा देख कर अभी तो लगता है जैसे यहां अभी से बीजेपी का एकछत्र वर्चस्व कायम हो चुका है । पहलवान चाणक्य के शाही दौर-दौरें शुरू हो गए है और उनकी वे ही बार-बार हुआ-हुआ साबित हो चुकी हुंकारे, ‘आपरेशन 1000, 500, 400, 200’ के शोर की गूंज-अनुगूंज भी सुनाई देने लगी है । लेकिन कोई भी गंभीर राजनीतिक विश्लेषक न्यूनतम इतना तो जानता ही है कि पश्चिम बंगाल भी इस देश का ही हिस्सा है और कुछ हद तक यह भी जानता है कि इसकी अपनी खास रंगत होने के बावजूद कश्मीर-हिमाचल से शुरू होने वाली शीत लहरों की चपेट में आने वाले उत्तर भारत के राज्यों में ही बंगाल भी किसी न किसी रूप से शामिल होता ही है । उसमें किसी विंध्य-रेखा का अवरोध नहीं होता है । इसीलिये आराम से यह कहा जा सकता है कि आज राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के बाद बिहार में जिस परिवर्तन का सैलाब साफ दिखाई दे रहा है, उस सुनामी की लहरों से बंगाल अछूता नहीं रहने वाला है । मोदी की मूर्खतापूर्ण लॉकडाउन की करतूत के कारण रोजगार से उखाड़ दिये गए प्रवासी मजदूर बिहार में जितनी बड़ी तादाद में लौटे थे, उससे कम पश्चिम बंगाल में भी नहीं लौटे हैं । इसी प्रकार, पूरे कृषि क्षेत्र को कारपोरेट को सौंप देने की मोदी की नंगी कोशिशों की चिंता बंगाल के लोगों को किसी से कम नहीं है । इन सबके ऊपर, बंगाल में मजदूरों और किसानों के हितों की रक्षा की लड़ाई लड़ने वाले वामपंथ का ताना-बाना देश के किसी भी कोने से बंगाल में कहीं ज्यादा व्यापक और गहरा भी है । इसी वामपंथ की छुअन ने बिहार के चुनाव में वह जादू पैदा किया था, जिसका पहले किसी को जरा सा भान भी नहीं था । आज यदि बंगाल के चुनाव में मतदाताओं में व्यवस्था-विरोध की कोई लहर पैदा होती है, जैसी बिहार में देखी गई तो उसका आधार कत्तई कोई जाहिल सांप्रदायिक सोच नहीं हो सकता है । मुट्ठी भर उग्र सांप्रदायिक विचार के लोग अपने मन में यह कल्पना कर सकते हैं मोदी का सांप्रदायिक जहर बंगाल के लोगों को पागल बनाने में असरदार साबित होगा, लेकिन किसी  भी संतुलित आदमी के सामने बिहार ने सबसे पहला यही सवाल तो पैदा किया है कि जब बिहार में उनकी सरकार के रहते हुए मोदी का सांप्रदायिक विष कारगर नहीं हो पाया तो वह बंगाल में कैसे प्रभावी हो सकता है ? आगे के चुनाव अभियानों में अगर कोई नया आलोड़न पैदा होगा तो इसे तय मानने में जरा भी हर्ज नहीं है वह उस आलोड़न को सिर्फ और सिर्फ रोजगार और कृषि अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर ही केंद्रित होना होगा । 

आगामी 26 नवंबर को भारत-व्यापी किसानों, मजदूरों और बेरोजगारों से जुड़े मुद्दों पर जिस आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी है, इसकी गूंज अभी से बंगाल के कोने-कोने में किसी न किसी रूप में सुनाई देने लगी है । इसी से इस बात का भी बिल्कुल सटीक  अनुमान मिल जाता है कि बंगाल में यदि किसी प्रकार के परिवर्तन की हवा पैदा होती है तो उस हवा का रुख किस ओर होगा ।

दक्षिणपंथ सारी दुनिया में अपने रौरव रूप को दिखा कर अब बुरी तरह से ठुकरा दिये जाने के लिए अभिशप्त नजर आने लगा है । इसके संकेत सिर्फ अमेरिका में नहीं, दुनिया के दूसरे कोनों में भी दिखाई देने लगे है । ब्रिटेन की लेबर पार्टी में जिम कोर्बिन को वापस लाने की मांग कम तात्पर्यपूर्ण नहीं है । अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी में अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले बर्नी सैंडर्स आज एक सबसे सम्मानित राजनीतिक आवाज माने जाते हैं ।

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि बंगाल का आगामी चुनाव अगर अपेक्षित दिशा ग्रहण करता है तो इसमें आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए कि जो काम बिहार में मोदी-शाह की अतिम वक्त की करतूतों के चलते अधूरा रह गया, वह बंगाल में पूरा होगा । कम से कम इतना तो अभी से तय है कि बंगाल का चुनाव सांप्रदायिक एजेंडे पर नहीं लड़ा जा सकेगा और इसीलिए अभी से यह भी तय है कि अरबों रुपये खर्च कर के भाजपा अभी जो हवा बांध रही है, उसके गुब्बारे की हवा निश्चित तौर पर असली चुनाव प्रचार शुरू होने के चंद रोज में ही निकल जाएगी । बैठे ठाले लोग इन चुनावों की चर्चा करते वक्त जिस ‘नेता’ नामक तत्व की तलाश में मुब्तिला है, उनके लिए हम इतना ही कहेंगे कि जब कोई नई हवा बहेगी तो वैसे चुंबकीय व्यक्तित्व को सामने आने में भी अधिक समय नहीं लगेगा । अभी से वाम-कांग्रेस गठजोड़ में ऐसे नेताओं के उभार की तस्वीर साफ दिखाई दे रही है, इसके बावजूद अभी की राजनीतिक चर्चा में किसी के नाम का जिक्र करना यथोचित नहीं लगता है । और किसी भी वजह से, ममता बनर्जी के प्रयत्नों से बिहार की तरह की परिवर्तन की कोई लहर पैदा नहीं हो पाती है, तब बात दूसरी है । 

अंत में हम पुनः इस बात को दोहराएंगे कि बिहार के चुनावों को देखते हुए बंगाल के आगामी चुनाव में भी यदि वैसा ही कोई माहौल बनता है तो इसके अंजाम के तौर पर यहां बीजेपी नहीं आएगी, बिहार में जो काम अधूरा रह गया, वही काम पूरा होगा । वामपंथी और जनतांत्रिक ताकतों की वापसी होगी ।                       


रविवार, 22 नवंबर 2020

अपरिभाषेय राष्ट्रवाद की परिभाषा !

 -अरुण माहेश्वरी



जेएनयू के परिसर में सन् 2016 की सर्दियों में हुए राष्ट्रवाद पर भाषणों के संकलन, ‘What the nation really needs to know’ के बाद अभी हाल में अनामिका प्रकाशन से राष्ट्रवाद के बारे में लेखों का एक महत्वपूर्ण संकलन, “राष्ट्रवाद, देशभक्ति और देशद्रोह” आया है — सर्वश्री अरुण कुमार त्रिपाठी, प्रदीप कुमार सिंह और राम किशोर द्वारा संपादित संकलन । 364 पृष्ठों के इस संकलन की विशेषता है कि इसमें राष्ट्रवाद और उसके अनुषंगी इस विषय-त्रयी पर सिर्फ अभी के कुछ लेखकों-विचारकों के लेख ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इसमें महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू , मौलाना अबुल कलाम आजाद, भगत सिंह, प्रेमचंद, भीमराव अंबेडकर, दीनदयाल उपाध्याय, विनायक दामोदर सावरकर, राममनोहर लोहिया, आदि ऐसे इतिहास पुरुषों के लेख भी शामिल है, जो समग्र रूप से इस पूरे विषय को एक व्यापक शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में पेश करते हैं । इसके अन्तरराष्ट्रीय संदर्भों की कमी को संपादक त्रय की एक लंबी प्रस्तावना में राष्ट्रवाद को गंभीर विवेचन का विषय बना कर लिखने वाले अनेक लेखकों-विचारकों के मंतव्यों के उद्धरणों से पूरा करने की कोशिश की गई है । इस प्रकार, कुल मिला कर यह संकलन निश्चित तौर पर ‘राष्ट्रवाद’ को मानव सभ्यता की विकास यात्रा की एक ऐसी ऐतिहासिक परिघटना के रूप में पेश करता है जिसमें इतिहास में इसकी उपस्थिति किसी सर्वकालिक युगीन सत्य की तरह सामने आती है । 

पर, जैसा कि संपादकों ने ही अपनी प्रस्तावना के प्रारंभ की पंक्तियों में यह माना है कि “राष्ट्रवाद दृश्य भी है और अदृश्य भी । वह जरूरी भी है और गैर-जरूरी भी । वह एक हद तक व्यापक है तो व्यापक रूप में संकीर्ण भी । वह युद्धों को रोके हुए हैं तो वही युद्धों का कारण है। वह नागरिकों को सुरक्षा देता है तो वही उसे सर्वाधिक प्रताड़ित भी करता है और असुरक्षा देता है । वह सुरक्षा के नाम पर आता है और असुरक्षा देकर जाता है । वह हमें बड़े-बड़े काम करने के लिए प्रेरित करता लेकिन वह हमें और हमारे समाज को बीमार भी बना देता है और उससे कई क्षुद्रताएँ कराता है जिन्हें देखकर मानवता शर्मसार हो जाती है ।” 

इसीलिए संपादकों का यह सही मानना है कि “राष्ट्रवाद को परिभाषित करना जितना कठिन है उतना ही कठिन है, अपरिभाषित राष्ट्रवाद के साथ रह पाना ।’ अर्थात् कुल मिला कर यह कुछ ऐसा सत्य है जिसे छोड़ा भी नहीं जा सकता है और पूरी तरह से अपनाया भी नहीं जा सकता । इसकी मौजूदगी मानव इतिहास की एक आरोपित अपरिहार्यता की तरह है ; आपकी इच्छा-अनिच्छा से स्वतंत्र, एक आरोपित चयन (forced choice) । एक ऐसा चयन जिसके विकल्प के तौर पर वैश्विकता और अन्तर्राष्ट्रीयतावाद आज के संचार क्रांति के काल में भी किसी गहरी-अंधेरी खाई समान ही प्रतीत होते हैं , अर्थात् जैसे एक मृत्यु । यही वजह है कि राष्ट्रवाद स्वयं में जो है,  और अपने जिन-जिन पहचानमूलक रूपों में लंबे काल से लगातार उपस्थित है, उन सबमें विश्व मानवता का एक भारी अभाव हमेशा बना रहता है, और यही अभाव इसकी संरचना में ही इसके उत्तरण का दबाव भी हमेशा कायम रहता है, कह सकते हैं, इसे गति प्रदान करता है । यह अमान्य हो कर भी मान्य तथा मान्य हो कर भी अमान्य बना हुआ है । जहां तक अन्तर्राष्ट्रीयतावाद का प्रश्न है, वह भी किसी की इच्छा-अनिच्छा से स्वतंत्र मनुष्यों के आर्थिक एकीकरण के सत्य का अपरिहार्य क्षितिज है । कबीलों के विकास का तर्क ही वैश्विकता के विकास पर भी लागू होता है । इसीलिए किसी भी प्रकार की पश्चगामिता में राष्ट्रवाद से उत्पन्न समस्याओं का समाधान संभव नहीं है ।   

बहरहाल, ज्ञान की ऐसी किसी भी सर्वकालिक, पर ऐतिहासिक, युगीन श्रेणी पर विचार की हर कोशिश की यह विडंबना ही है कि वह कोशिश अंतत: हमेशा शिव के किसी संकुचित रूप तक में सीमित रहने की एक नितांत असंतोषजनक कोशिश साबित होती है । यह किसी सार्विक सत्य को ठोस रूप का जामा पहनाने से पैदा होने वाली क्षुद्रताओं की समस्या है । ऐसी श्रेणियों पर केंद्रित सभी प्रकार के अध्ययनों का समुच्चय-रूप भी सिर्फ इसलिए कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बना सकता है क्योंकि इन सब विवेचनों को साथ रखने का मतलब होता है, अलग-अलग धारणाओं की परत-दर-परत, न जाने कितने आड़े-तिरछे तरल प्रतिच्छेदनों (intersections) की एक जटिल तस्वीर बनाना । सारा मामला अंधों के हाथ का हाथी वाला हो जाता है, जिसमें हर कोई हाथी के अलग-अलग अंगों का भी कुछ इस प्रकार बयान करता है कि उन सबकों मिलाने पर जो सामने आता है वह महज पहेलीनुमा कुछ ऐसा होता है जिस पहेली का समाधान उसके खुद के दायरे में असंभव होता है ।

सचमुच, राष्ट्रवाद की तरह के एक सार्विक विषय को स्वतंत्र और समग्र रूप में विचार का विषय बनाने का सही मतलब कुछ इसी प्रकार का सिंपोजियम-नुमा संकलन हो सकता है, जैसा कि यह संकलन बना है । इस पर यदि किसी प्रकार की ठोस, उपयोगी और ज़रूरी चर्चा करनी हो तो ज़रूरी है कि इसे ज्ञान की किसी सामान्य श्रेणी के बजाय बिल्कुल वर्गीकृत, विशेषीकृत श्रेणी के रूप में तब्दील किया जाए या इसका आयोजन कुछ ऐसा हो जिसमें विवेचन की प्रक्रिया के ज़रिये इसके कुछ खास आयामों पर ही केंद्रित करके उसके समाधान का रास्ता ढूंढा जाए । अर्थात् राष्ट्रवाद के दायरे में ही इसके समस्यामूलक अंगों का निदान किया जाए । अन्यथा, राष्ट्रवाद को स्वयं में एक स्वतंत्र और समग्र रूप में विवेचन का विषय बनाना, तमाम ऐतिहासिक संदर्भों में हमें असाध्य सा जान पड़ता है ।   

संयोग से इस संकलन में इस लेखक का भी एक लेख शामिल है — ‘अपने-अपने राष्ट्रवाद’ । उस लेख में भी राष्ट्रवाद की कोटि के नाना रूपों के बीच से उत्पादन की आधुनिक प्रणालियों के युग में जनतंत्र के उत्तरित रूप समाजवादी जनतंत्र और उसके पतनशील रूप फासीवाद की श्रेणियों को विचार का विषय बनाया गया है । ‘एक देश में समाजवाद’ के संभावनामय काल में, राष्ट्रवाद इन तीनों अवस्थाओं में ही अक्षुण्ण बना रहता है । 

इस संकलन में सर्वश्री आनंद कुमार, गिरीश्वर मिश्र, अरुण कुमार त्रिपाठी, राम किशोर, सुप्रिया पाठक, प्रभाकर सिन्हा, अप्रमेय मिश्र, राकेश दीवान, भगवान स्वरूप कटियार, प्रेम सिंह, धीररंजन मालवे, आलोक टंडन, शंभूनाथ शुक्ल, शंकर शरण, ईश्वर दोस्त, लाल्टू, सुरेन्द्र कुमार, राम नरेश राम, हितेंद्र पटेल, रोमिला थापर, दीपक गुप्ता, जयशंकर पांडेय, चिन्मय मिश्र, रघु ठाकुर, सुरेश खैरनार, धर्मेन्द्र कमरिया, अनिल चतुर्वेदी, प्रभात कुमार राय, कौशल्या वाजपेयी, कृपाशंकर चौबे, किशन पटनायक और सच्चिदानंद सिन्हा के लेख भी शामिल हैं ।    


सोमवार, 16 नवंबर 2020

मोदी का आत्म-विनाश का कार्यक्रम अपने शिखर पर

 -अरुण माहेश्वरी 



मोदी का आत्म-निर्भर कैसे आत्म-विनाश का कार्यक्रम हैइसे विश्व अर्थ-व्यवस्था के एक तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले 15 देशों के बीच रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप (आरसेपवाणिज्य संधि में भारत के  शामिल होने से अच्छी तरह से समझाजा सकता है  कल, 15 नवंबर को ही पूरी हुए यह स्वतंत्र वाणिज्य संधि आज की दुनिया में सबसे बड़ी स्वतंत्र वाणिज्य संधि है  इसमेंशामिल 15 देशों में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के संगठन एशिआन के दस देशों के अलावा दक्षिण कोरियाचीनजापानआस्ट्रेलियाऔर न्यूजीलैंड भी शामिल है  एशिआन के सदस्य देश हैं - ब्रुनेईकंबोडियाइंडोनेशियालाओसमलयेशियाम्यांमारफ़िलिपींससिंगापुरथाईलैण्ड और वियतनाम  


दुनिया की इतनी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय वाणिज्य संधि से भारत ने अपने को अलग रख कर कौन सी बुद्धिमानी का परिचय दिया हैइसे मोदीके सिवाय शायद ही दूसरा कोई जानता होगा  इतना जरूर जाहिर है कि इसके मूल में मोदी की ‘आत्म-निर्भर’ भारत की अमूर्त सीसमझ जरूर काम कर रही है , जिसमें शायद दुनिया से पूरी तरह कट कर चलने और चरम ग़रीबी की दशा में जीने को ही ‘आत्म-निर्भरता’ मान लिया गया हैं  


कहना  होगामोदी का यह फ़ैसला भारतीय अर्थ-व्यवस्था के विकास की संभावनाओं पर ही रोक लगा देने की तरह का एक चरमआत्म-घाती फ़ैसला साबित होगा  नोटबंदीविकृत जीएसटी की श्रृंखला में ही यह निर्णय भी अमेरिकी इशारों पर भारतीय अर्थ-व्यवस्थाकी तबाही का एक और फ़ैसला है  



शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

कुणाल कामरा ने क्या किया ?

अरुण माहेश्वरी 




कहते हैं कि स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल पर अदालत की अवमानना के लिए सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा चलाया जाएगा - उस कोर्ट में जिसनेचार दिन पहले अर्नब गोस्वामी के स्तर के बदमिजाज एंकर की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह फ़ैसला दिया था कि जिसे वह बुरा लगताहैवह उसे देखता क्यों है ? अर्थात् माना जा रहा है कि अब देश में बुरा लगने का अधिकार भी अकेले सुप्रीम कोर्ट के पास बच गया है बाक़ी सब की आबरू सरे बाज़ार उछलेकोई फ़र्क़ नहीं पड़तापर सुप्रीम कोर्ट पर इस कीचड़ उछालने के पागल दौर में भी कहीं से कोईछींटा नहीं पड़ना चाहिए  


बहरहालदेखने की बात यह है कि आख़िर कुणाल कामरा ने किया क्या है ? कुणाल के जिन ट्वीट्स को निशाना बनाया जा रहा हैवेट्वीट्स भी अर्नब गोस्वामी के के मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जाहिर की गई अपेक्षाकृत बेइंतहा बेचैनी के बारे में हैं  किसी भी स्थिति मेंकिसी का इस कदर बेचैन हो कर बिल्कुल कपड़ों के बाहर आकर खड़े हो जाना स्वयं में ही बहुत कुछ कहता है  उस पर अलग से कुछकहने की ज़रूरत नहीं होती है  इसीलिये यदि कोई बिना किसी अतिरिक्त टिप्पणी के ही सिर्फ उस बेचैनी के अतिरेक को ही व्यक्त करदेंतो कहने के लिए उतना ही काफ़ी होता है  और कुछ करने की ज़रूरत नहीं रहती है  


किसी भी अतिरेक का चित्रण हमेशा सामान्य की पृष्ठभूमि में ही किया जा सकता है  कामरा ने बिल्कुल यही किया था  उसने सुप्रीमकोर्ट की बेचैनी के इस अतिरेक को दिखाने के लिए  उसके उस सामान्य को पेश किया जो हज़ारों कश्मीरियों जाने दूसरे कितनेपत्रकारोंसामाजिक कार्यकर्ताओंऔर लेखकों-बुद्धिजीवियों की लगातार गिरफ़्तारियों के प्रति सुप्रीम कोर्ट की चरम उदासीनता के रूपमें हर रोज़ दिखाई देता है  बोम्बे हाईकोर्ट ने अर्नब गोस्वामी को ज़मानत  देकर सुप्रीम कोर्ट की इसी महान परंपरा का को पूरी निष्ठा सेपालन किया था ! हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार की इच्छा का मान रखा थाजैसे सुप्रीम कोर्ट हमेशा केंद्र सरकार के इशारों कापालन करके किया करता है ! 


कुणाल ने अपने ट्वीट में कहा था कि “आत्म-सम्मान तो इस भवन ( सुप्रीम कोर्टसे बहुत पहले ही विदा हो चुका है ” और “इस देश कीसर्वोच्च अदालत इस देश के सर्वोच्च मज़ाक़ का रूप ले चुकी है “ इसके साथ ही उसने सुप्रीम कोर्ट के भवन की केसरिया रंग में रंगीएक तस्वीर भी लगाई थी  


कुणाल पर अवमानना की कार्रवाई के लिए भारत के एडवोकेट जनरल वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में मामले को लाने की घोषणा कीजिसके उत्तर में कुणाल ने उन्हें और  सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को लिखा है कि भारत के एक प्राइम टाइम लाउडस्पीकर के पक्ष मेंसुप्रीम कोर्ट के पक्षपातपूर्ण फ़ैसले पर अपनी राय देते हुए मैंने ट्वीट किया था  हमारे जैसे सीमित श्रोताओं वाले व्यक्ति के श्रोताओं मेंएक सर्वोच्च क़ानून अधिकारी और सुप्रीम कोर्ट के जजों का आना वीआईपी दर्शकों का आना है  “लेकिन मुझे लगता है कि किसीमनोरंजन स्थल के बजाय सुप्रीम कोर्ट जैसी जगह पर मुझे अपना काम करने का मौक़ा मिलना एक दुर्लभ चीज़ है ” 


मेरा नज़रिया बदला नहीं है क्योंकि अन्य लोगों की निजी स्वतंत्रता के बारे में सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी पर चुप नहीं रहा जा सकता है  मैंअपने ट्वीट्स के लिए कोई क्षमा नहीं माँगूँगा  वे खुद अपनी बात कहते हैं “ 

सुप्रीम कोर्ट ने अब तक मेरे ट्वीट्स पर कुछ कहा नहीं हैलेकिन यदि वह ऐसा करता है तो उन्हें अदालत की अवमानना करार देने केपहलेउम्मीद है उसे कुछ हंसी आए  मैंने अपने एक ट्वीट में सुप्रीम कोर्ट में महात्मा गांधी की तस्वीर की जगह हरीश साल्वे की तस्वीरलगाने की बात भी कही है  और कहना चाहूँगा कि पंडित नेहरू की तस्वीर के स्थान पर महेश जेठमलानी की तस्वीर लगानी चाहिए  “ 


महेश जेठमलानी ने कुणाल को एक छुद्र कीड़ा कहा है  


बहरहालभारत के एडवोकेट जैनरल ने कुणाल कामरा के ट्वीट को हज़ारों-लाखों लोगों तक पहले ही पहुँचा दिया है  अब शायद खुदसुप्रीम कोर्ट उसे घर-घर तक पहुँचाने का बीड़ा उठाने वाला है  यह प्रकारांतर से सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान सच को घर-घर तक पहुंचाने काउपक्रम ही होगा  कुणाल कामरा का कथित व्यंग्य सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान सामान्य व्यवहार का चित्रण भर है  सचमुचव्यंग्यकार कोअपनी बात के लिए यथार्थ के बाहर कहीं और भटकने की ज़रूरत नहीं हुआ करती है