-अरुण माहेश्वरी
देखते-देखते, दक्षिणपंथ से तानाशाही की ओर बढ़ रहे विश्व में हम यौन कुंठाओं से भरे, बच्चों तक के यौन शोषण के राक्षसी कृत्य करने वाले पेडोफाइल्स ( पेडोफाइल्स) शासकों के उभार के अजीब से क्रम को देख रहे हैं ।
जो कल तक दक्षिणपंथी रुझान नज़र आता था, अब क्रमशः अपने कपड़े उतारते हुए युद्धखोर तानाशाह, स्वेच्छाचार से पेडोफाइल्स की जमात में शामिल होने की सीमा तक अपने को नंगा कर चुके हैं ।
लकानियन दृष्टि से संरचना के भीतर अवरोही तर्क से देखें, तो दक्षिणपंथ की यह परिणति सत्ता-कामना के इसी मूल तल तक उतरती हुई दिखाई देती है। यह पेडोफाइल का शाब्दिक रूप नहीं, उसकी संरचनात्मक तार्किक -परिणति है। तानाशाही की संरचना ही पेडोफिलिक कामना जैसी सत्ता-प्रधान विकृतियों की ओर झुकाव पैदा करती है।
लकानियन दृष्टि से आदमी के मस्तिष्क की पेडोफिलिक संरचना का प्रमुख तत्व है, पूर्ण नियंत्रण (absolute control ) की कामना।
बच्चा एक ऐसी वस्तु है, जिस पर एकतरफ़ा शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है जहाँ बराबरी का कोई प्रतीकात्मक रिश्ता नहीं बनता । इसलिए बच्चे का यौन-शोषण सिर्फ यौन नहीं है, यह सत्ता-जन्य कामना भी है। यह प्रमाता की ऐसी स्थिति है जहाँ अन्य को प्रमाता बनने का अधिकार ही नहीं दिया जाता। ऐसे स्वेच्छाचारी की कामना ‘अन्य’ (other) के अभाव से नहीं, बल्कि ‘अन्य’ की उपस्थिति से घबराती है। इसलिए वह ऐसे व्यक्ति को चुनती है जो ‘अन्य’ बन ही न पाए।
बच्चा प्रतिरोध नहीं करता, कोई सामाजिक-प्रतीकात्मक उत्तर नहीं देता, तानाशाह की कामना पर सवाल नहीं उठाता।इसलिए बच्चा यहाँ ‘अन्य’ (Other) के रूप में नहीं बल्कि एक सुरक्षित वस्तु के रूप में चुना जाता है।यही दूसरे से डरने वाली संरचना सत्ता-राजनीति में तानाशाही मानसिकता में बदलती है।
इसके अलावा, लकान कामना के गठन को हमेशा प्रतीकात्मक व्यवस्था के जरिये बनते हुए देखते हैं । इसे ही आम बोलचाल की भाषा में सांस्कृतिक परिवेश कहा जाता है । उम्र के बढ़ने के साथ व्यक्ति के संपर्कों का यह संसार अर्थात् उसका प्रतीकात्मक जगत बदलता जाता है, उसकी इच्छाएँ, रुचियाँ भी बदलती जाती है ।
जो लोग सामान्यतः बच्चों का यौन शोषण जैसे घिनौने काम करते हैं, उनकी समस्या यह भी है कि उनकी कामनाएँ वयस्क पुरुष के प्रतीकात्मक संबंध के बजाय पूर्व-वयस्क वस्तु से ही चिपकी रहती है। वे हमेशा परिपक्व संबंध से पलायन करते हैं । पेडोफाइल की कामना उस अन्य से डरती है जो बोल सकता है, प्रश्न कर सकता है, इंकार कर सकता है, चुनौती दे सकता है । यह मानसिकता मूलतः प्रतीकात्मक संबंध से पलायन की संरचना भी है।
मनोविश्लेषण की दृष्टि से पेडोफाइल वह व्यक्ति है जिसकी कामना प्रतीकात्मक संबंध, बराबरी और दूसरे की स्वायत्तता को सहन नहीं कर पाती और इसीलिए वह ऐसे ऑब्जेक्ट का चुनाव करता है जो बोल न सके, विरोध न कर सके और प्रश्न न उठा सके।
इसीलिए हमें आश्चर्य नहीं होता हैं कि आरएसएस जैसे बंद, अनुशासनात्मक और सत्ता-केन्द्रित संगठनों के परिवेश में पली मानसिकता में, ऐसी विकृत सत्ता-कामनाएँ पनपने की संभावना सबसे अधिक होती है। इसे हम इधर बढ़ते हुए यौन अपराधों के साथ संघ और बीजेपी के लोगों की अधिक से अधिक संलग्नता के उदाहरणों से जोड़ कर देख सकते हैं । एपस्टीन फ़ाइल के संदर्भ में मोदी का नाम और उनका ट्रंप जैसे गंभीर नैतिक और आपराधिक विवादों से घिरे व्यक्ति को लगातार ‘माई डीयर फ्रेंड’ कहकर संबोधित करना भी, इस राजनीतिक नैतिकता के संकट का एक गहरा संकेत है।
