शुक्रवार, 13 मार्च 2026

‘अब युद्ध का अंत ईरान ही करेगा !’


(इस युद्ध के सत्य के उद्घाटक, घटनामूलक (evental) चरित्र पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी  


ईरान-अमेरिका युद्ध अब महज एक राजनीतिक या सैन्य घटना नहीं रह गई है । अमेरिका ने इस युद्ध का प्रारंभ किया पर इसका अंत अब उसके वश में नहीं रहा है । यह क्रमशः एक ऐसी वैश्विक चर्वणा का रूप ले चुका है जिसका परिणाम बिल्कुल अपरिमेय है । अभी तो अमेरिका अपने मृत सैनिकों की गिनती कर पा रहा है और इजरायल भी बर्बादियों के कुछ झूठे-सच्चे आँकड़े रख पा रहा है, पर इसमें आश्चर्य नहीं कि जल्द ही इन आँकड़ों की कोई अहमियत ही नहीं बचेगी । बमों और मिसाइलों के धमाकों के धूल-धुएं में जैसे सारी दुनिया ही ओझल होती दिखाई देगी । कल तक जो सच था, आज अचानक इतना बदल चुका होगा कि उसकी सूरत ही पहचान में नहीं आएगी । 

ट्रंप ने सत्ता पर आने के साथ ही ‘अमेरिका के हित’ के नाम पर दुनिया को अस्थिर करने की जो सुचिंतित मुहिम शुरू की थी, वह अब हमारी दृष्टि में ‘दुनिया के हित’ में अंगड़ाई लेते हुए विश्व-व्यवस्था के एक बिल्कुल नये आकार में उभरने के अविश्वसनीय आलोड़न का रूप लेती जा रही है । आज अमेरिका में ही यह चर्चा सरगर्म है कि एपस्टीन फाइल में फंसा डोनाल्ड ट्रंप न सिर्फ शारीरिक रूप में सड़ चुका है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी प्रति पल बद से बदतर होता जा रहा है । यह व्यक्ति ट्रंप का ही सच नहीं है, बल्कि काफी हद तक पूरी अमेरिकी सत्ता का, मध्यपूर्व और पूरे विश्व में फैले सैनिक अड्डों और उस पर आश्रित राजनीतिक सत्ताओं का भी सच है । इन अड्डों का और लंबे समय तक यूं ही बने रहना संभव नहीं लगता है क्योंकि इस युद्ध ने खाड़ी के देशों के सामने इनके होने की अहमियत के खोखलेपन को जाहिर कर दिया है ।  

इसीलिए, हमारा मानना है कि ईरान तो महज एक बहाना है, वास्तविकता यह है कि जैसे अमेरिका-केंद्रित आज की दुनिया का अंतःस्थित सत्य ही अपने परम आत्म-संहारक रूप को प्रकट करने को मचल उठा है । वर्तमान का असहनीय यथार्थ अब विश्व के समूचे प्रतीकात्मक जगत को उलट-पुलट कर, भू-राजनीति की अब तक की पहचानी हुई सूरत को ध्वस्त कर, एक नये यथार्थ-प्रतीकात्मक-छविमूलक समग्र रूप को तैयार करने की दिशा में बढ़ रहा है । ईरान के नेतृत्व का आलम यह है कि उसने शहादत की अपनी मूलगामी परंपरा पर अपने अंत के साथ पूरे मध्यपूर्व के अन्यायपूर्ण स्वरूप के अंत की ठान ली है, जो वहां के शासन को पहले की तुलना में अंदर से कहीं ज्यादा मजबूत बना रहा है । ट्रंप-नेतन्याहू अब युद्ध विराम चाहते हैं और ईरान उसके लिए भारी शर्तों को रख कर इसे टालते हुए एक तार्किक अंत तक ले जाने पर आमादा है ।  

इस घटना को यदि हम खास ईरान और इस्लामी इतिहास के संदर्भ में ही देखें तो लगेगा कि कर्बला के युद्ध में हुई शहादत ने आज उनके लिए एक नया रास्ता तैयार करना शुरू कर दिया है । कर्बला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इमाम हुसैन की युद्ध में जीत की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी। फिर भी उन्होंने संघर्ष चुना। यहीं से शहादत का वह दर्शन पैदा होता है जिसमें शहादत केवल मृत्यु नहीं, एक सत्य की सार्वजनिक घोषणा है। इस अर्थ में इमाम हुसैन ने एक प्रकार के नैतिक उद्घाटन (revelation) का काम किया था। शिया चिंतन में कर्बला को केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं माना जाता। इसे हमेशा मौजूद रहने वाली आज की घटना समझा जाता है। हुसैन की हार वास्तव में एक नैतिक विजय बन गई। शिया परंपरा में कर्बला केवल एक युद्ध नहीं है, बल्कि एक स्थायी नैतिक घटना है। “हर दिन आशूरा है, हर ज़मीन कर्बला है”— यह कथन इसी अर्थ को व्यक्त करता है।

इस प्रकार, इमाम हुसैन की शहादत ने इस्लामी चेतना में जो एक विशेष नैतिक संरचना पैदा की, उस संरचना में किसी अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने सत्य की गवाही, पराजय के बावजूद नैतिक विजय, स्मृति और शहादत के माध्यम से इतिहास के पुनर्लेखन को उसके मुख्य तत्त्व कहा जा सकता है । 

आज के आधुनिक दर्शन की भाषा में हम इसे सत्य के विस्फोट की तरह की ऐतिहासिक घटना की तरह भी देख सकते हैं । ऐलन बाद्यू ऐसी घटना को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं को इस प्रकार गिनाते हैं कि वह मौजूदा व्यवस्था से बाहर से आती है, स्थापित व्यवस्था के नियमों को चुनौती देती है और एक नई सत्य-विधि (Truth-process) की शुरुआत करती है । पुरानी व्यवस्था अपनी ही भाषा में स्वयं को समझाने में अक्षम नजर आने लगती है। वे फ्रांसीसी क्रांति, पेरिस कम्यून या कुछ महान कलात्मक आविष्कारों को भी ऐसी घटनाओं के उदाहरण बताते हैं। इसका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है सत्य-घटना के प्रति दीर्घकालिक निष्ठा और उसके अनुसार व्यवहारिक-संगठित प्रतिबद्धता। अर्थात्, घटना से उद्घाटित सत्य को जन-गण की व्यापक स्वीकृति और तदनुरूप सामाजिक रूपांतरण की एक लंबी प्रक्रिया का प्रारंभ । कर्बला इसीलिये एक घटना कहलायेगा क्योंकि उसने शिया समुदाय के रूप में एक नए सामूहिक प्रमाता (subject) को जन्म दिया । 

ईरान का आधुनिक इतिहास, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का इतिहास गवाह है कि वहां कर्बला की स्मृति को एक राजनीतिक रूप दिया गया। इसने वहां राजनीति को धर्म और नैतिकता के संघर्ष के रूप में देखने की नई परंपरा शुरू की, शहादत को प्रतिरोध की शक्ति बनाया और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को धार्मिक-ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ा । इसीलिये यह अकारण नहीं है कि आधुनिक ईरानी राजनीतिक भाषा में कर्बला का संदर्भ बार-बार आता है। 

बहरहाल, आज के ईरान और अमेरिका-इजरायल की लड़ाई में कर्बला ही इस युद्ध के ईरानी नैरेटिव की संरचना में एक प्रमुख भूमिका अदा कर रहा है । इसी के चलते यह युद्ध केवल हथियारों से लड़ा जा रहा रणनीतिक संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि सत्य और शक्ति का टकराव का रूप लेता जा रहा है। बाद्यू के सत्य-विधि (truth-procedure) की प्रक्रिया में हमेशा नई राजनीतिक कल्पनाएँ जन्म लेती हैं, नए गठबंधन बनते हैं और पुराने शक्ति-संतुलन टूट जाते हैं । इतिहास में बार-बार देखा गया है कि बड़े युद्धों के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदल जाती है। प्रथम विश्व युद्ध से राष्ट्र संघ की उत्पत्ति हुई, द्वितीय विश्व युद्ध से संयुक्त राष्ट्र संघ बना । इसके अलावा समकालीन राजनीति में युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं होता, वह प्रतीकात्मक युद्ध भी होता है। नैरेटिव, स्मृति, धार्मिक प्रतीक − इन सबका प्रयोग राजनीतिक वैधता पाने के लिए भी किया जाता है। कर्बला का प्रतीक इसी कारण मध्य-पूर्व की राजनीति में अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक है।

यह सच है कि हर युद्ध को “सत्य की घटना” नहीं कहा जा सकता है । यह घटना (Event) केवल संघर्ष नहीं, बल्कि ऐसा क्षण होता है जो मानवता के लिए एक नए सार्वभौमिक सत्य का द्वार खोलता है। आज यह एक अनोखी बात है कि इस युद्ध के बीच से एक ‘शहादत-स्मृति से संचालित’ राज्य ईरान एक ऐसे प्रमाता के रूप में उभर कर सामने आया है जो दुनिया को एक नई विश्व-व्यवस्था के सत्य के उदय का साक्षात्कार कराता जान पड़ता है । अयातुल्ला अली खामनेई ने अमेरिकी साम्राज्यवाद-जियोनवादी इज़रायल के एपस्टीनपंथी, दुनिया के सबसे ताक़तवर अनैतिक गठबंधन को सीधी चुनौती दे कर ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी कि अब ईरान के नए सुप्रीम नेता मुज्तबा खामनेई युद्ध के अंत की ऐसी शर्तें पेश कर पा रहे हैं जो अभी की विश्व-व्यवस्था की सीमाओं से परे जाती है । वे सीधे मांग कर रहे हैं कि अमेरिका को पूरे मध्यपूर्व से अपने सैनिक अड्डों को समेट लेना होगा, ईरान की सार्वभौमिकता का सम्मान करना होगा, उस पर लगी सब पाबंदियों को खत्म करना होगा । अन्यथा, ईरान परमाणु बम को भी उतारेगा, नए वैश्विक सामरिक गठबंधन में शामिल होगा । इन शर्तों को मानने का अर्थ होगा विश्व शक्ति-संतुलन का पूरी तरह से उलट-पुलट जाना ।  

इसीलिये हम यह देख पा रहे हैं कि अमेरिका ने युद्ध शुरू किया होगा, पर उसका ऐतिहासिक अर्थ अब उसके नियंत्रण में नहीं रहा ।  अब इसका अंत ईरान ही करेगा । 


सोमवार, 2 मार्च 2026

ईरान युद्ध, तेल और प्रभुत्व की चिंता से जुड़ी अमेरिकी बदहवासी

(अमेरिकी प्रमाता के संकट की एक मनोविश्लेषणात्मक-भूराजनीतिक व्याख्या की कोशिश) 


– अरुण माहेश्वरी





आज ईरान के साथ अमेरिका और उसके सहयोगियों का युद्ध केवल एक क्षेत्रीय सैन्य संघर्ष नहीं है। इसे केवल मिसाइलों, विमानों, या सामरिक चालों के स्तर पर समझना इस घटना के वास्तविक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह युद्ध वस्तुतः उस महाशक्ति के अस्तित्वगत संकट का प्रकटीकरण है, जिसने लगभग आठ दशकों तक स्वयं को विश्व-व्यवस्था के अंतिम संरक्षक और निर्णायक केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यह संकट केवल बाहरी शक्ति-संतुलन का संकट नहीं है; यह स्वयं अमेरिका के प्रमाता-स्वरूप—उसके subject-position—के भीतर उत्पन्न हुआ संकट है। यह वह क्षण है जब एक सत्ता अपनी ही निर्मित पूर्णता की छवि के विघटन से गुजर रही है, और उसी विघटन की बदहवासी में अपने सबसे गहरे सत्य को उजागर कर रही है।


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने जो स्थान प्राप्त किया, वह केवल सैन्य विजय का परिणाम नहीं था। उसने एक ऐसी प्रतीकात्मक व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें उसकी शक्ति विश्व-व्यवस्था की अनिवार्य शर्त बन गई। डॉलर वैश्विक विनिमय का आधार बना, अमेरिकी सैन्य गठबंधनों ने सुरक्षा की अंतिम गारंटी का रूप लिया, और उसकी सांस्कृतिक-तकनीकी शक्ति ने उसे आधुनिकता के छविमूलक केंद्र के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं रहा; वह एक प्रतीकात्मक सत्ता बन गया—एक ऐसा “विश्व-प्रमाता” जिसके अस्तित्व पर पूरी पूंजीवादी विश्व-व्यवस्था का विश्वास टिका हुआ था।


परंतु मनोविश्लेषण हमें बताता है कि कोई भी सत्ता अपने भीतर एक अभाव (lack) को छिपाए बिना इस प्रकार की पूर्णता का दावा नहीं कर सकती। सत्ता की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि इस अभाव को अभाव के रूप में पहचाना न जाए। जैसे ही यह अभाव प्रकट होता है, सत्ता का अस्तित्वगत संकट प्रारंभ हो जाता है। आज अमेरिका की स्थिति में यही हो रहा है। वह विश्व का सबसे अधिक ऋण-ग्रस्त राष्ट्र है। उसकी सैन्य संरचना पर होने वाला व्यय उसकी आर्थिक संरचना पर असाधारण दबाव डाल रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण, चीन का उदय पहली बार उसके अद्वितीय प्रभुत्व के मिथक को वास्तविक चुनौती दे रहा है। यह चुनौती केवल शक्ति-संतुलन का परिवर्तन नहीं है; यह उसकी आत्म-छवि पर लगा हुआ आघात है।


यहाँ यह समझना आवश्यक है कि अमेरिका का यह संकट केवल मनोवैज्ञानिक या प्रतीकात्मक स्तर का संकट नहीं है। इसके पीछे एक ठोस भौतिक आधार है। अमेरिकी प्रभुत्व की आर्थिक संरचना लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र के तेल और पेट्रो-डॉलर व्यवस्था पर टिकी रही है। तेल केवल एक ऊर्जा-संसाधन नहीं है; वह उस वित्तीय संरचना का आधार है जिसने डॉलर को वैश्विक मुद्रा के रूप में स्थापित किया। खाड़ी के तेल के वैश्विक व्यापार का डॉलर में होना ही अमेरिकी वित्तीय शक्ति की वास्तविक नींव रहा है। इसी ने अमेरिका को यह क्षमता दी कि वह अपने बढ़ते ऋण-भार के बावजूद विश्व-अर्थव्यवस्था का केंद्र बना रहे।


इस प्रकार खाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण अमेरिका के लिए केवल सामरिक प्रश्न नहीं है; यह उसके आर्थिक अस्तित्व का प्रश्न है। यदि इस क्षेत्र पर उसका निर्णायक प्रभाव कमजोर पड़ता है, यदि तेल-व्यापार में वैकल्पिक व्यवस्थाएँ उभरती हैं, यदि खाड़ी के देश अन्य शक्तियों—विशेषतः चीन—की ओर झुकते हैं, तो यह केवल एक क्षेत्रीय परिवर्तन नहीं होगा। यह अमेरिकी प्रभुत्व की वित्तीय नींव को ही हिला देगा। इस अर्थ में ईरान के साथ उसका संघर्ष केवल सुरक्षा-संबंधी संघर्ष नहीं है; यह उस आर्थिक संरचना को बनाए रखने का संघर्ष है जिस पर उसका वैश्विक प्रभुत्व टिका हुआ है।


परंतु यहीं एक निर्णायक विरोधाभास उत्पन्न होता है। जब किसी शक्ति को अपने आर्थिक प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए बार-बार सैन्य आक्रामकता का सहारा लेना पड़े, तो यह उसकी शक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि उसके संकट का संकेत बन जाता है। क्योंकि वास्तविक प्रभुत्व वह होता है जिसे बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता न पड़े। जिस क्षण प्रभुत्व को सिद्ध करना पड़े, उसी क्षण उसका अभाव प्रकट हो चुका होता है।


डोनाल्ड ट्रंप का “Make America Great Again” का नारा इसी अभाव की राजनीतिक अभिव्यक्ति है। यह नारा केवल एक चुनावी नारा नहीं है; यह उस खोई हुई पूर्णता को पुनः प्राप्त करने की सामूहिक कल्पना है, जिसका अस्तित्व अब केवल अतीत में है। “फिर से महान बनाना” इस बात की स्वीकारोक्ति है कि महानता अब स्वयंसिद्ध नहीं रही। इस प्रकार यह नारा समाधान नहीं, बल्कि संकट का लक्षण है—एक ऐसी कल्पना जो अभाव को ढँकने का प्रयास करती है, पर उसे समाप्त नहीं कर सकती।


मनोविश्लेषण के सिद्धांत के अनुसार, जब सत्ता अपने प्रतीकात्मक आधार को खोने लगती है, तो वह वास्तविक हिंसा के माध्यम से अपनी शक्ति को प्रमाणित करने का प्रयास करती है। यही वह बिंदु है जहाँ बदहवासी जन्म लेती है। बदहवासी केवल भय की अवस्था नहीं है; यह उस आक्रामक सक्रियता की अवस्था है जिसमें सत्ता अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लगातार क्रिया करती रहती है। परंतु यही क्रिया उसके अभाव को और अधिक स्पष्ट कर देती है।


ईरान के साथ युद्ध इसी बदहवासी का परिणाम है। यह युद्ध केवल ईरान को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं है; यह उस प्रतीकात्मक संरचना को बनाए रखने का प्रयास है जिसमें अमेरिका विश्व-प्रमाता के रूप में स्थापित रहा है। परंतु युद्ध-क्षेत्र से आ रही घटनाएँ—चाहे वे सैन्य क्षति की खबरें हों, या सहयोगियों की असुरक्षा की भावना—इन सबका महत्व केवल उनके सामरिक परिणाम में नहीं है। उनका महत्व इस तथ्य में है कि वे उस अजेयता के मिथक में दरार के संकेतक बन रही हैं जिस पर अमेरिकी प्रभुत्व टिका हुआ था।


इस युद्ध का एक और महत्वपूर्ण परिणाम खाड़ी के देशों की प्रतिक्रिया में दिखाई देता है। दशकों से ये देश अमेरिकी सुरक्षा-गारंटी पर निर्भर रहे हैं। परंतु आज यदि वे यह अनुभव करने लगते हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की सार्वभौमिक गारंटी नहीं रहा, बल्कि एक सीमित और पक्षधर शक्ति बन गया है, तो यह एक गहरे प्रतीकात्मक परिवर्तन का संकेत है। यह उस विश्वास के विघटन का संकेत है जिस पर अमेरिकी प्रभुत्व टिका हुआ था।


जब सहयोगी अपने संरक्षक पर से विश्वास खोने लगते हैं, तो यह किसी भी महाशक्ति के संकट का सबसे स्पष्ट संकेत होता है। क्योंकि महाशक्ति की शक्ति केवल उसके शत्रुओं पर नहीं, बल्कि उसके सहयोगियों के विश्वास पर टिकी होती है। जैसे ही यह विश्वास डगमगाने लगता है, उसकी शक्ति का प्रतीकात्मक आधार टूटने लगता है।


इस स्थिति को यदि हम एक व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका का वर्तमान संकट केवल एक राष्ट्र का संकट नहीं है। यह उस पूरी विश्व-व्यवस्था का संकट है जिसका केंद्र वह रहा है। यह उस ऐतिहासिक संरचना का संकट है जिसमें पूंजीवादी प्रभुत्व, तेल-आधारित वित्तीय व्यवस्था, और सैन्य शक्ति का संयोजन शामिल रहा है।


अभिनवगुप्त के स्पन्द सिद्धांत की भाषा में कहें तो यह चिति के विक्षोभ का क्षण है—वह क्षण जब चेतना अपनी ही सीमा का अनुभव करती है। यह विक्षोभ केवल विघटन नहीं है; यह एक नई संरचना के जन्म का संकेत भी है। इसी प्रकार अमेरिका का संकट केवल उसके प्रभुत्व के अंत का संकेत नहीं है; यह एक नई विश्व-व्यवस्था के उद्भव का संकेत भी है।


इस प्रकार अमेरिका की आक्रामकता को उसकी शक्ति के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि उसके प्रतीकात्मक और आर्थिक अभाव के लक्षण के रूप में देखना चाहिए। उसकी हर आक्रामक कार्रवाई उसके उस प्रयास का हिस्सा है जिसके माध्यम से वह अपने प्रभुत्व को बनाए रखना चाहता है। परंतु उसी प्रयास में उसका अभाव और अधिक स्पष्ट होता जाता है।


अंततः यह कहा जा सकता है कि महाशक्तियों का वास्तविक संकट उनकी सैन्य पराजय में नहीं, बल्कि उस क्षण में निहित होता है जब उनकी अपरिहार्यता का विश्वास टूट जाता है। आज अमेरिका इसी क्षण से गुजर रहा है। उसकी आक्रामकता उसके प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, पर उसी में उसके प्रभुत्व की सीमाएँ भी उजागर हो रही हैं।


और हम यह भी जोड़ना चाहेंगे कि ऐसे संकट में फँसी महाशक्तियाँ अपनी पराजय से नहीं, बल्कि अपनी बदहवासी से पहचानी जाती हैं।