(अमेरिकी प्रमाता के संकट की एक मनोविश्लेषणात्मक-भूराजनीतिक व्याख्या की कोशिश)
– अरुण माहेश्वरी
आज ईरान के साथ अमेरिका और उसके सहयोगियों का युद्ध केवल एक क्षेत्रीय सैन्य संघर्ष नहीं है। इसे केवल मिसाइलों, विमानों, या सामरिक चालों के स्तर पर समझना इस घटना के वास्तविक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह युद्ध वस्तुतः उस महाशक्ति के अस्तित्वगत संकट का प्रकटीकरण है, जिसने लगभग आठ दशकों तक स्वयं को विश्व-व्यवस्था के अंतिम संरक्षक और निर्णायक केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यह संकट केवल बाहरी शक्ति-संतुलन का संकट नहीं है; यह स्वयं अमेरिका के प्रमाता-स्वरूप—उसके subject-position—के भीतर उत्पन्न हुआ संकट है। यह वह क्षण है जब एक सत्ता अपनी ही निर्मित पूर्णता की छवि के विघटन से गुजर रही है, और उसी विघटन की बदहवासी में अपने सबसे गहरे सत्य को उजागर कर रही है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने जो स्थान प्राप्त किया, वह केवल सैन्य विजय का परिणाम नहीं था। उसने एक ऐसी प्रतीकात्मक व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें उसकी शक्ति विश्व-व्यवस्था की अनिवार्य शर्त बन गई। डॉलर वैश्विक विनिमय का आधार बना, अमेरिकी सैन्य गठबंधनों ने सुरक्षा की अंतिम गारंटी का रूप लिया, और उसकी सांस्कृतिक-तकनीकी शक्ति ने उसे आधुनिकता के छविमूलक केंद्र के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं रहा; वह एक प्रतीकात्मक सत्ता बन गया—एक ऐसा “विश्व-प्रमाता” जिसके अस्तित्व पर पूरी पूंजीवादी विश्व-व्यवस्था का विश्वास टिका हुआ था।
परंतु मनोविश्लेषण हमें बताता है कि कोई भी सत्ता अपने भीतर एक अभाव (lack) को छिपाए बिना इस प्रकार की पूर्णता का दावा नहीं कर सकती। सत्ता की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि इस अभाव को अभाव के रूप में पहचाना न जाए। जैसे ही यह अभाव प्रकट होता है, सत्ता का अस्तित्वगत संकट प्रारंभ हो जाता है। आज अमेरिका की स्थिति में यही हो रहा है। वह विश्व का सबसे अधिक ऋण-ग्रस्त राष्ट्र है। उसकी सैन्य संरचना पर होने वाला व्यय उसकी आर्थिक संरचना पर असाधारण दबाव डाल रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण, चीन का उदय पहली बार उसके अद्वितीय प्रभुत्व के मिथक को वास्तविक चुनौती दे रहा है। यह चुनौती केवल शक्ति-संतुलन का परिवर्तन नहीं है; यह उसकी आत्म-छवि पर लगा हुआ आघात है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि अमेरिका का यह संकट केवल मनोवैज्ञानिक या प्रतीकात्मक स्तर का संकट नहीं है। इसके पीछे एक ठोस भौतिक आधार है। अमेरिकी प्रभुत्व की आर्थिक संरचना लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र के तेल और पेट्रो-डॉलर व्यवस्था पर टिकी रही है। तेल केवल एक ऊर्जा-संसाधन नहीं है; वह उस वित्तीय संरचना का आधार है जिसने डॉलर को वैश्विक मुद्रा के रूप में स्थापित किया। खाड़ी के तेल के वैश्विक व्यापार का डॉलर में होना ही अमेरिकी वित्तीय शक्ति की वास्तविक नींव रहा है। इसी ने अमेरिका को यह क्षमता दी कि वह अपने बढ़ते ऋण-भार के बावजूद विश्व-अर्थव्यवस्था का केंद्र बना रहे।
इस प्रकार खाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण अमेरिका के लिए केवल सामरिक प्रश्न नहीं है; यह उसके आर्थिक अस्तित्व का प्रश्न है। यदि इस क्षेत्र पर उसका निर्णायक प्रभाव कमजोर पड़ता है, यदि तेल-व्यापार में वैकल्पिक व्यवस्थाएँ उभरती हैं, यदि खाड़ी के देश अन्य शक्तियों—विशेषतः चीन—की ओर झुकते हैं, तो यह केवल एक क्षेत्रीय परिवर्तन नहीं होगा। यह अमेरिकी प्रभुत्व की वित्तीय नींव को ही हिला देगा। इस अर्थ में ईरान के साथ उसका संघर्ष केवल सुरक्षा-संबंधी संघर्ष नहीं है; यह उस आर्थिक संरचना को बनाए रखने का संघर्ष है जिस पर उसका वैश्विक प्रभुत्व टिका हुआ है।
परंतु यहीं एक निर्णायक विरोधाभास उत्पन्न होता है। जब किसी शक्ति को अपने आर्थिक प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए बार-बार सैन्य आक्रामकता का सहारा लेना पड़े, तो यह उसकी शक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि उसके संकट का संकेत बन जाता है। क्योंकि वास्तविक प्रभुत्व वह होता है जिसे बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता न पड़े। जिस क्षण प्रभुत्व को सिद्ध करना पड़े, उसी क्षण उसका अभाव प्रकट हो चुका होता है।
डोनाल्ड ट्रंप का “Make America Great Again” का नारा इसी अभाव की राजनीतिक अभिव्यक्ति है। यह नारा केवल एक चुनावी नारा नहीं है; यह उस खोई हुई पूर्णता को पुनः प्राप्त करने की सामूहिक कल्पना है, जिसका अस्तित्व अब केवल अतीत में है। “फिर से महान बनाना” इस बात की स्वीकारोक्ति है कि महानता अब स्वयंसिद्ध नहीं रही। इस प्रकार यह नारा समाधान नहीं, बल्कि संकट का लक्षण है—एक ऐसी कल्पना जो अभाव को ढँकने का प्रयास करती है, पर उसे समाप्त नहीं कर सकती।
मनोविश्लेषण के सिद्धांत के अनुसार, जब सत्ता अपने प्रतीकात्मक आधार को खोने लगती है, तो वह वास्तविक हिंसा के माध्यम से अपनी शक्ति को प्रमाणित करने का प्रयास करती है। यही वह बिंदु है जहाँ बदहवासी जन्म लेती है। बदहवासी केवल भय की अवस्था नहीं है; यह उस आक्रामक सक्रियता की अवस्था है जिसमें सत्ता अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लगातार क्रिया करती रहती है। परंतु यही क्रिया उसके अभाव को और अधिक स्पष्ट कर देती है।
ईरान के साथ युद्ध इसी बदहवासी का परिणाम है। यह युद्ध केवल ईरान को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं है; यह उस प्रतीकात्मक संरचना को बनाए रखने का प्रयास है जिसमें अमेरिका विश्व-प्रमाता के रूप में स्थापित रहा है। परंतु युद्ध-क्षेत्र से आ रही घटनाएँ—चाहे वे सैन्य क्षति की खबरें हों, या सहयोगियों की असुरक्षा की भावना—इन सबका महत्व केवल उनके सामरिक परिणाम में नहीं है। उनका महत्व इस तथ्य में है कि वे उस अजेयता के मिथक में दरार के संकेतक बन रही हैं जिस पर अमेरिकी प्रभुत्व टिका हुआ था।
इस युद्ध का एक और महत्वपूर्ण परिणाम खाड़ी के देशों की प्रतिक्रिया में दिखाई देता है। दशकों से ये देश अमेरिकी सुरक्षा-गारंटी पर निर्भर रहे हैं। परंतु आज यदि वे यह अनुभव करने लगते हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की सार्वभौमिक गारंटी नहीं रहा, बल्कि एक सीमित और पक्षधर शक्ति बन गया है, तो यह एक गहरे प्रतीकात्मक परिवर्तन का संकेत है। यह उस विश्वास के विघटन का संकेत है जिस पर अमेरिकी प्रभुत्व टिका हुआ था।
जब सहयोगी अपने संरक्षक पर से विश्वास खोने लगते हैं, तो यह किसी भी महाशक्ति के संकट का सबसे स्पष्ट संकेत होता है। क्योंकि महाशक्ति की शक्ति केवल उसके शत्रुओं पर नहीं, बल्कि उसके सहयोगियों के विश्वास पर टिकी होती है। जैसे ही यह विश्वास डगमगाने लगता है, उसकी शक्ति का प्रतीकात्मक आधार टूटने लगता है।
इस स्थिति को यदि हम एक व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका का वर्तमान संकट केवल एक राष्ट्र का संकट नहीं है। यह उस पूरी विश्व-व्यवस्था का संकट है जिसका केंद्र वह रहा है। यह उस ऐतिहासिक संरचना का संकट है जिसमें पूंजीवादी प्रभुत्व, तेल-आधारित वित्तीय व्यवस्था, और सैन्य शक्ति का संयोजन शामिल रहा है।
अभिनवगुप्त के स्पन्द सिद्धांत की भाषा में कहें तो यह चिति के विक्षोभ का क्षण है—वह क्षण जब चेतना अपनी ही सीमा का अनुभव करती है। यह विक्षोभ केवल विघटन नहीं है; यह एक नई संरचना के जन्म का संकेत भी है। इसी प्रकार अमेरिका का संकट केवल उसके प्रभुत्व के अंत का संकेत नहीं है; यह एक नई विश्व-व्यवस्था के उद्भव का संकेत भी है।
इस प्रकार अमेरिका की आक्रामकता को उसकी शक्ति के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि उसके प्रतीकात्मक और आर्थिक अभाव के लक्षण के रूप में देखना चाहिए। उसकी हर आक्रामक कार्रवाई उसके उस प्रयास का हिस्सा है जिसके माध्यम से वह अपने प्रभुत्व को बनाए रखना चाहता है। परंतु उसी प्रयास में उसका अभाव और अधिक स्पष्ट होता जाता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि महाशक्तियों का वास्तविक संकट उनकी सैन्य पराजय में नहीं, बल्कि उस क्षण में निहित होता है जब उनकी अपरिहार्यता का विश्वास टूट जाता है। आज अमेरिका इसी क्षण से गुजर रहा है। उसकी आक्रामकता उसके प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, पर उसी में उसके प्रभुत्व की सीमाएँ भी उजागर हो रही हैं।
और हम यह भी जोड़ना चाहेंगे कि ऐसे संकट में फँसी महाशक्तियाँ अपनी पराजय से नहीं, बल्कि अपनी बदहवासी से पहचानी जाती हैं।

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