गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

प्रकृत मानवीय विकल्प के उभार तक यथास्थिति ही बनी रहेगी

 (पश्चिम बंगाल में एक अजीब सी विडंबना में फँसा मतदाता )


—अरुण माहेश्वरी 





बंगाल की राजनीति का आज का संकट केवल इस बात का संकट नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि इस बात का कहीं ज्यादा है कि जनता के सामने “विकल्प” किस रूप में उपस्थित है। लोकतंत्र में सामान्यतः माना जाता है कि सत्ता का विरोध स्वयं किसी नये विकल्प को जन्म देता है। लेकिन वास्तविकता हमेशा इतनी सरल नहीं होती। कई बार सत्ता का विरोध मात्र ही किसी और भी अधिक पतनशील, अधिक संकीर्ण और फासिस्ट शक्ति को भी जन्म देता है। ऐसी स्थिति में जनता के सामने यथास्थिति और एक अंधकारमय मिथ्या विकल्प के बीच चुनाव का संकट खड़ा हो जाता है।


पश्चिम बंगाल में आज कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। पिछले पंद्रह वर्षों से यहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। इस पूरे दौर में भ्रष्टाचार, स्थानीय गुंडागर्दी, पुलिस का राजनीतिक उपयोग, और व्यक्ति-केन्द्रित सत्ता-संरचना के तमाम निंदनीय रूप सामने आए हैं। इससे जनता में स्वाभाविक रूप से व्यापक असंतोष है। 


परंतु यह असंतोष सबसे दृश्य रूप में जिस शक्ति के पक्ष में जाता दिखाई देता है, वह बीजेपी का है । तृणमूल से भी कहीं ज्यादा भ्रष्ट, ग़ैर-लोकतांत्रिक और चरम सांप्रदायिक पार्टी । 



और बंगाल का एक बड़ा हिस्सा यह अनुभव करता है कि भाजपा तृणमूल का वास्तविक विकल्प नहीं, बल्कि उससे भी अधिक खतरनाक संभावना है।


यहीं आज के समय के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू की ‘घटना’ (event) संबंधी अवधारणा उपयोगी हो जाती है। बाद्यू के अनुसार कोई भी विकल्प केवल इसलिए सत्य नहीं हो जाता कि वह वर्तमान सत्ता का विरोध कर रहा है। सत्य का अर्थ है—एक ऐसी नयी संभावना जो परिस्थिति के भीतर दबे हुए सार्वभौमिक तत्व को सामने लाए और उसे आगे बढ़ाए। 


यदि कोई विकल्प वर्तमान से भी अधिक संकीर्ण, अधिक विभाजक और अधिक प्रतिक्रियावादी हो, तो वह सत्य का वाहक नहीं, बल्कि “अंधकारमय मिथ्या प्रमाता” (obscure subject) का रूप है। वह जनता की पीड़ा, असंतोष और क्रोध को अपने पक्ष में खींचता तो है, पर उसे किसी अधिक मानवीय दिशा में नहीं ले जाता। वह उसे और अधिक भय, घृणा, पहचान-आधारित राजनीति और मिथकीय आत्ममुग्धता की ओर मोड़ देता है।


बंगाल में भाजपा की भूमिका उसके अखिल भारतीय चरित्र के अनुरूप ही बिल्कुल इसी प्रकार की है। वह तृणमूल के भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध जनता के असंतोष का लाभ उठाना चाहती है, पर उसे किसी अधिक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष या समानतामूलक राजनीति की ओर नहीं ले जाती। वह उस असंतोष को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सत्ता के केंद्रीकरण और बहुसंख्यकवादी फासिस्ट राष्ट्रवाद की दिशा में ले जाने में लगी हुई है। इसीलिए वह तथाकथित विकल्प होते हुए भी प्रकृत विकल्प नहीं है। वह परिवर्तन की बात करती है, पर उसके परिवर्तन की दिशा पतनशील है।


ऐसी परिस्थिति में वाम मोर्चा और कांग्रेस ही संभावित सही विकल्प के रूप में दिखाई देते हैं। उनके भीतर अभी भी धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, वर्गीय समानता, शिक्षा, श्रम, किसान, सार्वजनिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक जीवन की वे परंपराएँ मौजूद हैं जो बंगाल की ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा रही हैं। 


परंतु विडंबना यह है कि यह सही विकल्प नाना कारणों से जनता के लिए दृश्य विकल्प नहीं बन पा रहा है । वह राजनीतिक रूप से इतना कमजोर हो चुका है कि उसे वोट देना बहुत से मतदाताओं को वोट को व्यर्थ करना लग सकता है। मतदाता सोचता है कि यदि उसने वाम को वोट दिया, तो उसका वोट विभाजित होगा और भाजपा को लाभ मिलेगा। 


इस प्रकार वाम की राजनीतिक अनुपस्थिति भाजपा को तृणमूल का विकल्प बना देती है, चाहे वह वस्तुतः कितना ही अंधकारमय मिथ्या विकल्प क्यों न हो! 


यहीं पर लकान की प्रमाता की इच्छा-संरचना की अवधारणा ( desire-structure of the subject) इस विडंबनापूर्ण परिस्थिति और इसके परिणाम की ओर सटीक इशारा कर सकती है । 


लकान के अनुसार प्रमाता की इच्छा कभी सीधी रेखा में नहीं चलती। वह एक संकेतक से दूसरे संकेतक तक, कई कल्पनाओं और विकल्पों के बीच भटकती रहती है। कई बार उसे लगता है कि वह किसी नये विकल्प की ओर बढ़ रहा है, जबकि वास्तव में वह उसी पुरानी संरचना में फँसा रहता है। इच्छा का मुक़ाबला कई बार ऐसा मिथ्या विकल्प से होने लगता है जो उसे अपनी जगह से हिलने नहीं देता। वह उसे चक्कर कटवाता है, पर कहीं पहुँचने नहीं देता।


पश्चिम बंगाल का मतदाता आज इसी वृत्ताकार गति में फँसा हुआ दिखाई देता है। वह तृणमूल से असंतुष्ट है, पर भाजपा को लेकर उससे भी अधिक भयभीत है। वह वाम को अधिक मानवीय विकल्प मान सकता है, पर उसे प्रभावी विकल्प नहीं मानता। इसीलिए उसकी इच्छा एक वृत्त बनाकर फिर उसी यथास्थिति की ओर लौट आती है जिससे वह स्वयं असंतुष्ट था । 


पश्चिम बंगाल का मतदाता परिवर्तन चाहता है, पर परिवर्तन के नाम पर उसके सामने जो सबसे बड़ा विकल्प उपस्थित है, वह उसे अपनी ही सांस्कृतिक-सामाजिक जमीन के विनाश के डर से जकड़ देता है। इसीलिए वह वापस उसी सत्ता को चुन लेता है जिसे वह भीतर से अस्वीकार करता है।


यह बंगाल के लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना है। यहाँ यथास्थिति इसलिए नहीं बची हुई है कि जनता उससे प्रेम करती है, बल्कि इसलिए बची हुई है कि जनता के सामने उपस्थित विकल्पों में वही तुलनात्मक रूप से कम बुरा दिखाई देती है। भाजपा जैसे विकल्प के रहते तृणमूल की पराजय नामुमकिन लगती है । 


लकान के शब्दों में कहें तो यहाँ “भटकाने वाला विकल्प” इच्छा को मुक्त नहीं करता, बल्कि उसे उसी बिंदु पर वापस ले आता है जहाँ से वह चली थी। भाजपा का विकल्प तृणमूल से मुक्ति का मार्ग नहीं बनता; वह तृणमूल को ही टिकाए रखने का माध्यम बन जाता है।


और, भाजपा का उभार जितना भाजपा की शक्ति का परिणाम है, उससे कहीं अधिक वह वाम की विफलता का परिणाम है। यदि वाम एक जीवित, संघर्षशील, विश्वसनीय और भविष्यसूचक विकल्प के रूप में वास्तविक दृष्यपट पर अपनी उपस्थिति को प्रमाणित कर पाता, तो बंगाल की राजनीति का पूरा संतुलन बदल सकता था। परंतु आज वाम वह एक “अदृष्ट विकल्प” है, सैद्धांतिक रूप से मौजूद, पर व्यवहार में अनुपस्थित। उसके छात्र नेता जनता की सेवा की आग से तप कर अपने को स्थापित नहीं कर पाए हैं।  


वाम की भाषा अभी भी जनता को यह अनुभव नहीं करा पा रही कि वह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। जब तक वह जनता के अनुभवों, असुरक्षाओं, बेरोज़गारी, ग्रामीण संकट, स्थानीय भ्रष्टाचार और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्नों को एक नए सार्वभौमिक फ्रेम में नहीं बाँधेगा, तब तक वह निष्ठावान प्रमाता (faithful subject) की जगह स्मृतिमुग्ध प्रमाता (nostalgic subject) बन कर रह जाएगा—ऐसा प्रमाता जो अपने गौरवशाली अतीत से तो जुड़ा है, पर वर्तमान में किसी नयी घटना को जन्म नहीं दे पा रहा।


ऐलेन बाद्यू के शब्दों में कहें तो इस स्थिति को कुछ इस प्रकार रखा जा सकता है कि इन्हीं कारणों से बंगाल में अभी कोई नयी ‘घटना’ नहीं हुई है। अभी तक ऐसा कोई राजनीतिक हस्तक्षेप सामने नहीं आया है जो जनता को यह महसूस करा सके कि वह तृणमूल और भाजपा दोनों के परे भी किसी तीसरी संभावना की वाहक हो सकती है। 


और जब तक ऐसी घटना नहीं होती, तब तक बंगाल का मतदाता उसी लकानियन वृत्त में घूमता रहेगा—असंतोष से भरा हुआ, पर परिवर्तन से भयभीत; विकल्प की तलाश में, पर मिथ्या विकल्पों से घिरा हुआ; और अंततः उसी यथास्थिति में लौटता हुआ जिसे वह स्वयं बदलना चाहता है। वह जानता है कि सामने उपस्थित विकल्प वस्तुतः विकल्प नहीं, बल्कि एक और भी अधिक संकीर्ण, अधिक विभाजक और अधिक दमनकारी व्यवस्था का संकेत है। भाजपा की ओर जाने का अर्थ तो उसके लिए अपने सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को ही नष्ट करना है। वह परिवर्तन चाहता है, पर परिवर्तन का दृश्य रूप उसे भयभीत करता है। इसीलिए वह फिर उसी यथास्थिति की ओर लौट आता है जिससे वह स्वयं असंतुष्ट था।


दरअसल, यह विडंबना केवल बंगाल की नहीं, बल्कि लोकतंत्र मात्र की एक बड़ी संरचनात्मक विडंबना है। जब कोई वास्तविक प्रगतिशील विकल्प लंबे समय तक जनता के सामने स्वयं को जीवित रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाता, तब जनता के सामने दो ही रास्ते बचते हैं—या तो वह प्रतिक्रियावादी विकल्प की ओर जाए, या फिर उसी व्यवस्था से चिपकी रहे जिससे वह स्वयं असंतुष्ट है। बंगाल में अभी यही हो रहा है। जब तक वाम जनता के भीतर एक नयी घटना, नयी भाषा, नयी आकांक्षा और नयी सामूहिकता की अनुभूति पैदा नहीं करेगा, तब तक बंगाल का मतदाता लकान की इच्छा की उसी वृत्ताकार गति में घूमता रहेगा—परिवर्तन की चाह के साथ, पर परिवर्तन के भय से बँधा हुआ।


इस अर्थ में बंगाल का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं है; यह इस बात का प्रश्न है कि क्या वहाँ कोई ऐसी नयी राजनीतिक घटना संभव है जो तृणमूल और भाजपा, दोनों की सीमाओं को पार करके जनता के सामने एक तीसरी, अधिक ऊर्ध्वगामी संभावना रख सके। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक यथास्थिति ही लोगों को तुलनात्मक रूप से कम बुरा विकल्प लगती रहेगी, चाहे उसके भीतर कितनी भी थकान, असंतोष और विघटन क्यों न जमा होता जाए।

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