मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

एक दलील

 (अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध पर चर्चा के केंद्र में नई विश्व-व्यवस्था के उदय के प्रश्न को उठाने के पक्ष में):

 −अरुण माहेश्वरी



अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध पर इधर जो कुछ लिखा जा रहा है, उसमें अधिकांश केवल तत्काल दृश्य पर टिका होता है। कौन-सा मिसाइल हमला हुआ, किस बंदरगाह पर रोक लगी, किसने किस को कितना तबाह किया,  किस दिन वार्ता हुई, वार्ता में कौन से दांव-पेंच चले गए, ट्रंप-नेतन्याहू लगातार दगाबाजियों और कूटनीति के नाम पर बेसिर-पैर की बातों के एक नए इतिहास की रचना करते हुए कैसे कूटनीति मात्र की बारह बजा रहे है, किस दिन युद्धविराम टूटा, किस दिन तेल की कीमत बढ़ी—ये सब महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ हैं, पर फिर भी हमें हमेशा लगता है कि इन सब सतह की बातों को कहना ही यथेष्ट नहीं है । इन सबके पीछे सत्य के खास पैटर्न, अर्थात् घटनाक्रम की एक बड़ी प्रक्रिया का संधान जरूरी है । 

सतह का अपना महत्व है, पर केवल सतह से किसी घटनामूलक इतिहास को नहीं पढ़ा जा सकता। इतिहास को हमेशा उसकी गति में पढ़ना पड़ता है। वह गति होते जाने की प्रक्रिया (present continuous tense) में घटित होती है—यानी कुछ समाप्त नहीं होता है, पर समाप्ति की एक दिशा में जा रहा होता है; कुछ पूरी तरह बना नहीं है, पर निश्चित तौर पर बनने की एक दिशा में बढ़ रहा है।

यानी घटना को केवल “जो अभी हुआ” के रूप में नहीं, बल्कि “जो अभी हो रहा है और अपनी नियति की दिशा में बढ़ रहा है” के रूप में पढ़ना जरूरी है। वह कहती नहीं कि सब कुछ घट चुका है; वह यह कहती है कि संरचना अपने अंतस्थ सत्य (immanent truth) दिशा में चल रही है।

बहुत-से पाठकों को हमारा यह रूझान किसी विचारधारात्मक पूर्वाग्रह का  लक्षण लगता है, क्योंकि वे पत्रकारिता की उस आदत (भाषा) के ही अभ्यस्त हैं जिसमें केवल तात्कालिक तथ्य ही “वास्तविक” माने जाते हैं। पर हम इसे विचारधारात्मक पूर्वाग्रह नहीं, एक जरूरी विश्लेषणात्मक पद्धति समझते हैं जिसका उद्देश्य ही है − सतह पर उपस्थित वर्तमान को उसके भीतर क्रियाशील नियतिमूलक दिशा के साथ पढ़ना।

आज के प्रमुख मार्क्सवादी ऐलेन बाद्यू का दर्शन के जगत में प्रमुख योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने दर्शन को गणितीय तर्क पर आधारित किया । गणित किसी परिघटना का जीवित विकल्प नहीं होता पर वह उसकी नियति को निश्चयात्मक भाषा में व्यक्त करने की शक्ति रखता है। राजनीतिक तर्क के आधार पर हम किसी भी वास्तविकता को किसी प्रमेय की तरह नहीं कह सकते कि फलाँ विश्व-व्यवस्था आज यहां समाप्त हो गई, क्योंकि राजनीतिक यथार्थ वह सत्य है जिसमें किसी न किसी प्रकार का अवरोध, प्रत्यावर्तन, संधि, छल, पुनर्गठन और अपूर्णता की तरह के तत्त्व हमेशा उपस्थित रहते हैं।

इसके विपरीत, गणितीय तर्क हमें यह ठोस रूप में दिखा सकता है कि कोई भी संयुक्त संरचना किन मूल अवयवों से बनी है, उसके अंतर्विरोध कहाँ हैं, और उसकी सतही पूर्णता के नीचे कौन-सी विघटनकारी दिशा काम कर रही है। इस अर्थ में गणित वर्तमान का प्रतिरूप नहीं, बल्कि उसकी नियति का सूचक होता है। राजनीति के तर्क और गणित के दर्शन के बीच यह एक बुनियादी  फर्क है । राजनीतिक घटनाक्रमों पर गणित के तर्क से विश्लेषण की ओर बढ़ने का मतलब ही है कि उन घटनाक्रमों की नियति को हमेशा अपनी नजर के सामने रखते हुए विचार करना । 

ईरान-अमेरिका-इज़रायल युद्ध और उसके संदर्भ में एक नई विश्व-व्यवस्था की बात पर हम जिस प्रकार लगातार बल दे रहे हैं, उसे भी कुछ इसी प्रकार से देखने की जरूरत है । यद्यपि ऐसा सोचने के पीछे हमारी नजर में वर्तमान विश्व की आर्थिक-सामरिक और शक्तियों के संतुलन की संरचना का बनता-बिगड़ता वह ढांचा लगातार मौजूद रहता है जिसका संकेत साम्राज्यवाद की पतनशीलता के तमाम आर्थिक सिद्धांतकारों से लेकर हमारे यहां के खास रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी तक देते रहते हैं । प्रवीण साहनी तो 21वीं सदी के नए युद्ध-सिद्धांतों के आधार पर सारी दुनिया में 800 से ज्यादा सामरिक अड्डों वाले अमेरिका के सामरिक-वर्चस्व के अंत की और नई सभी राष्ट्रों की सुरक्षा की अविभाज्य प्रणाली वाली नई विश्व-व्यवस्था के उदय की सच्चाई को अपनी हर चर्चा के केंद्र में बराबर रखते हैं । 

अब हम ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के विषय पर आते हैं । इस युद्ध की वर्तमान स्थिति यह है कि 28 फरवरी से शुरू युद्ध के पहले चरण में ईरान ने अमेरिका का पराजित कर युद्ध विराम के लिए मजबूर कर दिया और अब इस्लामाबाद में शांति वार्ता का दूसरा दौर कभी भी शुरू हो सकता है । जो लड़ाई ईरान के संवर्धित यूरेनियम को केंद्र में रख कर शुरू हुई, वह पहले चरण में ही हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर केंद्रित हो गई और यह लड़ाई न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि इसने एक वैश्विक रूप ग्रहण कर लिया । अमेरिका-इजरायल सारी दुनिया में अलग-थलग पड़ गए, हार्मुज पर ईरान की सार्वभौमिकता एक अकाट्य सत्य बन गई और उसे खोलना विश्व-अर्थव्यवस्था की सबसे प्राथमिक जरूरत बन गई । ट्रंप जैसे विक्षिप्त जंगखोर को भी पता चल गया कि वह अपनी अपराजेयता का चाहे जितना खुद ही गुणगान क्यों न करें, दुनिया में एक भी देश का उसकी ताकत पर रत्ती भर भरोसा नहीं रहा है । खाड़ी के कुछ अमेरिका के गुलाम देशों और भारत की तरह की एपस्टीन के जाल में फंसी सरकारों के अलावा किसी को ट्रंप के साथ खड़ा होने तक गंवारा नहीं है । 

इसी दौरान अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच तनाव भी स्पष्ट रूप से उभरा है। ट्रंप ने नाटो से बाहर निकलने की धमकी दी है तो ईरान युद्ध के कारण ही यूरोपीय देशों को हथियार आपूर्ति में विलंब की आशंका जताई जा रही, और यूरोप के भीतर सामरिक स्वायत्तता तथा अमेरिकी सुरक्षा की विश्वसनीयता पर चर्चा तेज हो गई है। इसका अर्थ साफ है कि नाटो में दरार पैदा हो गई है भले ही वह अभी टूट कर पूरी तरह से बिखर न गया हो । 

दूसरी तरफ चीन, रूस और ईरान के बीच कुछ बुनियादी सामरिक मुद्दों और राष्ट्रों की सार्वभौमिकता तथा हॉर्मुज पर ईरान के सार्वभौमिक अधिकार की तरह के सवालों पर एक साझा समझ दिखाई देती है । यद्यपि इसका अर्थ यह नहीं है कि इन देशों के बीच एक समग्र विचारधारात्मक एकता बन गई है। पर घटनाएँ इस ओर संकेत कर रही हैं कि पश्चिम-प्रधान व्यवस्था के विरुद्ध एक वैश्विक व्यावहारिक समन्वय निर्मित हो रहा है। चीन और रूस ने हॉर्मुज़ से जहाजों के आवागमन पर उस यूएन प्रस्ताव को वीटो किया जिसे वे ईरान-विरोधी मानते थे । रूस के विदेश मंत्री लावरोव इसी महीने चीन पहुँचे जहाँ ईरान युद्ध और यूक्रेन दोनों पर चर्चा हुई । शी जिनपिंग ने रूस के साथ भरोसा और पारस्परिक समर्थन गहरा करने की बात कही और चीन पश्चिमी देशों के साथ बातचीत में मध्य-पूर्व में युद्धविराम तथा नौवहन की सुरक्षा पर अपनी कूटनीतिक भूमिका बढ़ा रहा है। यह सही है कि यह कोई स्वतःसिद्ध नया ब्लॉक नहीं है, लेकिन इतना तो साफ़ है कि पुरानी एकध्रुवीयता की भाषा में इस घटनाक्रम की व्याख्या कठिन होती जा रही है।

इस पर, अब यदि हम बाद्यू के गणितीय उदाहरण, विशेषतः अभाज्य संख्याओं (primary numbers) और संयुक्त संख्या (joint numbers) की संरचना की रोशनी में इसे देखें तो हमारे सामने इस घटनाक्रम का एक अलग रूपक उभरता है। अमेरिका-प्रधान विश्व-व्यवस्था को हम एक संयुक्त संख्या की तरह सोच सकते हैं: डॉलर-प्रभुत्व, नाटो-सुरक्षा, समुद्री नियंत्रण, पश्चिमी वित्तीय संस्थाएँ, तकनीकी वर्चस्व, और उदार वैधता की भाषा — इन सबका एक संयुक्त गुणनफल। लंबे समय तक यह संरचना दुनिया में अपने को पूर्ण, स्वाभाविक और अविभाज्य रूप में दिखाती रही है। पर जैसे गणितीय दृष्टि बताती है कि किसी भी संयुक्त संख्या के भीतर अभाज्य अवयवों की संरचना काम करती रहती है, वैसे ही आज की विश्व-व्यवस्था के भीतर ऐसे अवयव सक्रिय हो रहे हैं जिनका पुराने पश्चिमी समेकन में पूरी तरह से मेल नहीं हो पा रहा है । चीन, रूस, ईरान—इन तीनों को एक ही विचारधारा में बाँधना गलत है, तथापि इन्हें इस अर्थ में “संरचनात्मक अवयव” कहा जा सकता है कि ये पुरानी पूर्णता को अविभाज्य बने रहने नहीं दे रहे। कह सकते हैं कि यह एक दार्शनिक निष्कर्ष है, कोई शुद्ध तथ्यात्मक बयान नहीं। पर इस निष्कर्ष का आधार वह घटनामूलक रुझान है, जिसकी चर्चा हम इस संघर्ष के संदर्भ में हर रोज सुनते हैं।

जाहिर है कि यहीं हमारा नजरिया चालू पत्रकारिता के नजरिये से अलग हो जाता है। पत्रकारिता कहेगी कि आज वार्ता हुई, आज जहाज़ गुज़रे, आज युद्धविराम है, आज फिर अवरोध है, आज ट्रंप ने यह कहा, आज यूरोप ने वह कहा। और यह सब जरूरी भी है। लेकिन हम पूछते हैं कि  इन सब “आज” के भीतर कौन-सी दिशा काम कर रही है? रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी भी अपने कोण से बराबर वही सवाल कर रहे होते हैं । यदि अमेरिका हॉर्मुज़ की सुरक्षा के प्रश्न पर यूरोप से दबाव बनाना चाहता है, फिर उन्हीं यूरोपीय देशों को हथियार आपूर्ति में देर करता है, और साथ ही यूरोप ऊर्जा व रक्षा के वैकल्पिक ढाँचे सोचने लगता है, तो यह केवल समाचार नहीं रह जाता; यह एक ऐसी संयुक्त संरचना के भीतर दरार का संकेत बनता है जो अभी औपचारिक रूप से कायम है, पर पहले जैसी दृढ़ नहीं रही है।

इसी तरह ईरान युद्ध को केवल किसी सैन्य कार्रवाई या तेल की आवाजाही के मार्ग संकट की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं है। इस युद्ध ने एक साथ कई स्तरों पर अमेरिकी शक्ति की सीमाओं को उजागर कर दिया है। एक तरफ अमेरिका आर्थिक दबाव, प्रतिबंध, सैन्य समर्थन और समुद्री नियंत्रण के जरिये अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है, दूसरी ओर उसे पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली वार्ताओं, अंतरिम समझौते की चर्चा, और ईरान के साथ गहरे मतभेदों को मानते हुए अपनी रणनीति बनानी पड़ रही है । यह सही है कि अमेरिकी शक्ति अभी भी भारी है, लेकिन अब वह चुनौती-विहीन और सर्वशक्तिमान नहीं बची है। उसकी कोई भी कार्रवाई अब किसी स्थिर समाधान का कारक नहीं बची है । वह संकट को फैलाती भी है, उसे नया मोड़ भी देती है, पर सब कुछ किसी अस्थायी प्रबंधन से अधिक कुछ नहीं रहता है। उसके प्रबंधन की स्थिरता प्रतिदिन के हिसाब से अल्पजीवी साबित होती जा रही है । 

इस बिंदु पर बाद्यू के गणितीय दर्शन से हमें एक बहुत महत्त्वपूर्ण शिक्षा मिलती है। गणित हमें यह नहीं बताता कि कोई राजनीतिक सत्य आज ही विजयी हो गया है। पर वह यह निश्चयात्मक रूप में बताता है कि किसी भी संरचना के मूल अवयव क्या है और उसका विघटन किस दिशा में चल रहा है। जैसे “अभाज्य संख्याएँ अनंत हैं” का अर्थ केवल यह नहीं कि वे बहुत अधिक हैं, बल्कि यह है कि संख्या-जगत की संरचना कभी बंद नहीं होती, वैसे ही आज का भू-राजनीतिक संकेत यह है कि विश्व-व्यवस्था अब अमेरिका-नाटो के वर्चस्व की पूर्णता में बंद नहीं रह सकती। भले इसका अर्थ यह नहीं कि नया विश्व तैयार हो चुका है, पर इतना अवश्य है कि पुरानी पूर्णता अब अपनी पूर्ववत् सार्वभौमिकता खो रही है। हमारा मानना है कि ऐसे निष्कर्ष भले “आज की पुष्टि” नहीं करते लेकिन “आने वाली संरचना की रेखाएँ” जरूर पेश करते हैं।

इसीलिए सतह के स्थैर्य के भीतर उसकी ऐतिहासिक अस्थिरता को पढ़ने का प्रयास वैचारिक पूर्वाग्रह नहीं होता । जो लोग केवल तात्कालिक घटना को देखते हैं, वे कहते हैं: नाटो अभी है, डॉलर अभी है, अमेरिका अभी सबसे शक्तिशाली है, यूरोप अभी अलग नहीं हुआ, चीन-रूस-ईरान अभी एक नहीं हैं। यह सब तथ्यात्मक रूप से सही है। पर हम कहेंगे कि बिल्कुल इसी वर्तमान के भीतर भविष्य की दिशा काम कर रही है। present continuous का अर्थ ही यह है कि प्रक्रिया अपनी नियति को अभी से लिख रही है। यहाँ विश्लेषण का प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी संस्था औपचारिक रूप से खत्म हो गई, बल्कि यह कि कौन-सी संरचना अपनी पुरानी वैधता खोते हुए भी जड़त्व के बल पर चल रही है, और कौन-से नए अवयव अभी अधूरे रूप में उभर रहे हैं।

यही कारण है कि इस पूरे युद्ध और नई विश्व-व्यवस्था के प्रसंग को लिखते समय हम अपने आशय में स्पष्ट होते हुए भी किसी घोषणापत्र की भाषा से बचते हैं । हम नई विश्व-व्यवस्था के उदय की कसमसाहट का जिक्र करते हैं न कि उसके पूर्ण निर्माण का । जो कहते हैं कि  “कुछ भी नहीं बदला”, वह शुद्ध वैचारिक अंधता है। मार्क्सवादी दर्शन की तरह ही बाद्यू हमें सिखाते हैं कि जो हेगेलियन दर्शन घटना के घट जाने के बाद ही अपनी उड़ान के पंख फैलाता है, उसकी जगह यह भौतिकवादी द्वंद्वात्मक दर्शन घटना की दिशा में हमारे सोच को शामिल करता है । दर्शन इसी अर्थ में व्याख्या के बजाय परिवर्तन की भूमिका अपनाता है । 

बाद्यू के लिए सत्य किसी रिपोर्ट का नाम नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया का नाम है। गणित उसके लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह प्रक्रिया की नियति को निश्चयात्मक रूप में सोचने की शक्ति देता है। पत्रकारिता वर्तमान के धूल-धुएँ को दर्ज करती है, गणितीय-दर्शन उस धूल-धुएँ के भीतर चल रही संरचनात्मक रेखा को पकड़ने में सहायता करता है। 

इसीलिए हम फिर दोहरायेंगे कि ईरान-अमेरिका-इज़रायल युद्ध केवल एक क्षेत्रीय सैन्य संकट नहीं है । यह कथित अमेरिकी एकध्रुवीय विश्व की संयुक्त संख्या के भीतर काम कर रहे अभाज्य अंतर्विरोधों को सामने ला रहा है। यूरोप और अमेरिका के बीच तनाव, हॉर्मुज़ पर वैश्विक निर्भरता, ऊर्जा-व्यवस्था की अस्थिरता, चीन-रूस-ईरान का आंशिक समन्वय, और पश्चिमी संस्थागत वैधता की सीमाएँ—ये सभी मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि विश्व अब पुरानी एकध्रुवीय गणना में नहीं समा रहा। एक नया विश्व अभी निर्मित हो रहा है, पर उसकी भाषा अभी पूरी तरह बनी नहीं है । उसके घटकों में अभी आपसी विषमता हैं । लेकिन उसकी दिशा अब केवल अनुमान नहीं रही, एक संरचनात्मक संकेत बन चुकी है। 

यही वह जगह है जहाँ हम चालू पत्रकारिता से अपने को अलगाते हैं और पाठक का नियति से साक्षात्कार कराने वाली लेखन की present continuous शैली की दुहाइयां देते हैं । 





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