शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

मोदी सरकार पर संघ के विचारों की प्रेत छाया

अरुण माहेश्वरी


केंद्र सरकार में अभी क्या चल रहा है ? एक अजीबोगरीब, बंद संसार का घुटन भरा माहौल है। आडवाणीजी को आपातकाल की याद दिलाता हुआ। योग तो ऊपरी दिखावा है, अंदर ही अंदर पता नहीं यहां कौन सी गुह्य तंत्र-विद्या को साधा जा रहा है? किसी बात का कोई ठौर-ठिकाना नहीं मिलता। आदमी के अवचेतन की दमित आकांक्षाएं जैसे कभी-कभी अचानक ही प्रकट होकर उसके व्यवहार को संदिग्ध बना देती है, अभी वही स्थिति है।
यह सरकार जो भी करती है, तत्काल या चंद दिनों के अंदर ही उसका एक विभत्स किस्म का परिणाम सामने आने लगता है। इसकी ताजपोशी बड़े उत्साह से सार्क देशों के प्रधानों की उपस्थिति में हुई और चंद दिनों में यही सरकार सार्क का भट्टा बैठा देने का कारण दिखाई देने लगी। ताजपोशी के आयोजन में पुरोहिती के लिये खास तौर पर आमंत्रित पाकिस्तान के वजीरेआजम से आज बातचीत तक के संपर्क नहीं है। नेपाल को हमारे प्रधानमंत्री का आलिंगन जल्द ही किसी नागपाश की तरह सताने लगा और इस जकड़न की गर्मी को वह बर्दाश्त नहीं कर पाया। यहां तक कि भूकंप की तरह की महाविपत्ति में भारत की सहायता भी उसे रास नहीं आई और भारत के प्रचार-माध्यमों तथा राहतकर्मियों को यथाशीघ्र देश छोड़ कर जाने का आदेश देना पड़ा। चीन के राष्ट्रपति से हमारे प्रधानमंत्री ने इतने उत्साह के साथ हाथ मिलाया कि ऐन संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन ने पाकिस्तानी आतंकवादी लखवी पर कार्रवाई के प्रस्ताव पर वीटो लगा कर भारत को एक करारा झटका दिया। हद तो तब होगयी जब मोदी के मित्र बराक ने गणतंत्र दिवस की परेड का सारा यश लूट लेने के दूसरे दिन ही भारत सरकार को उसीके संविधान की प्रतिश्रुतियों की याद दिलाई और ऊपर से तोहमत कि भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित नहीं दिखाई देते।
भारत के प्रधानमंत्री इस देश की गर्मी और गर्द से बचने के लिये जितना ज्यादा विदेश में रहते हैं, दुनिया में भारत की साख उतनी ही गिरती जाती है। विदेशों में मजमेबाजी की इनकी नाटकीय करतूतों का कोई खरीदार नहीं है।
यह हाल है कूटनीति के क्षेत्र का। दरअसल, स्वतंत्र और स्वायत्त देशों का यह क्षेत्र ही ऐसा है कि जहां किसी भी सरकार का दोहरापन एक क्षण के लिये भी नहीं टिकता। आपके असल मंसूबों को पढ़ने और उसपर प्रतिक्रिया देने में किसी को जरा सा भी समय नहीं लगता, क्योंकि यहां कोई आप पर आश्रित नहीं होता है।
इसकी तुलना में घरेलू क्षेत्र का मामला आम तौर थोड़ा अलग हुआ करता है। यहां अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है वाली कहावत लागू होती है। राजसत्ता की ताकत के बल पर यहां सच को झूठ और झूठ को सच बनाने का कारोबार अपेक्षया ज्यादा समय तक चल जाता है। लेकिन यहां भी अभी हालत इतनी गंभीर है कि इस सरकार का दुरंगापन और पंगुपन छिपाये नहीं छिप रहा है।
पहले राष्ट्रीय इतिहास के विषय को ही लिया जाए। सत्तारोहण के बाद ही, नेहरू को हटा कर पटेल को उठाते-उठाते अचानक मोदी में खुद को चाचा नेहरू के रूप में पेश करने की ललक पैदा होगयी। गांधी के नाम पर अन्तरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस को उन्हीं के स्वच्छता अभियान से स्थानापन्न करने के चक्कर में अरबों रुपये पानी की तरह बहा दिये लेकिन देश के गांवों-शहरों का कूड़ा साफ करने की व्यवस्थाओं में रत्ती भर का सुधार नहीं हुआ। जन-धन योजना के नाम पर खोले गये असंख्य बैंक खाते एक पैसे की जमा राशि तक के लिये तरस रहे हैं। वे बैंकों के लिये एक बोझ और आम लोगों ( जिनमें खाताधारक भी शामिल हैं ) के लिये सिर्फ मजाक के विषय है। सिर्फ एक काम चल रहा है - प्रचार और कोरा प्रचार, और वह भी सिर्फ एक आदमी का प्रचार। जिस काम में प्रधानमंत्री नहीं, वह काम भी नहीं। सरकार अर्थात सिर्फ प्रधानमंत्री का कार्यालय। बाकी सब शून्य।
और सत्ता पर आने के साथ ही जिस बात का सबसे अधिक ढोल पीटा जा रहा था कि ‘न खायेंगे, न खाने देंगे’, उसकी तो एक साल बीतते न बीतते ऐसी भद हुई है कि अब चारो दिशाओं से एक केंद्रीय मंत्री और एक मुख्यमंत्री समेत भ्रष्ट करतूतों के किस्से गूंजने लगे हैं। देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने एक रईस भगोड़े की मदद की। राजे कह रही थी कि ललित मोदी से उनका पुराना पारिवारिक रिश्ता है। पर इस संबंध के कुछ और भी पहलू रहे हैं, वरना वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह - जो झालावाड़ से सांसद भी है - की कंपनी के दस रुपये की दर वाले आठ सौ पंद्रह शेयर करीब छियानबे हजार रुपये की दर से ललित मोदी क्यों खरीदते ?
इन सब घटनाओं का सबसे चिंताजनक पहलू वह है जब आरएसएस के लोग बार-बार सीधे तौर पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को सिर्फ उनकी धार्मिक पहचान के कारण खुले आम जलील करने की कोशिश करते हैं। पहले गणतंत्र दिवस की परेड में राष्ट्रीय झंडे को सलामी की झूठी बात उठा कर ऐसा किया गया और अब तो केंद्र सरकार में संघ की ओर से भेजे गये पार्टी के महामंत्री राम माधव ने ही योग के आयोजन में उनकी अनुपस्थिति के प्रसंग को उठा कर उन पर कीचड़ उछाला। बाद में पता चला कि उपराष्ट्रपति को आमंत्रित ही नहीं किया गया था, और राम माधव को माफी मांगनी पड़ी।
संघी मानसिकता का ऐसा ही एक और रूप गृहमंत्री राजनाथ सिंह में देखने को मिला जब भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिर चुकी केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग पर उन्होंने कहा कि यह यूपीए नहीं है कि मंत्री लोग इतने सस्ते में इस्तीफा दे देंगे। लगता था कि जैसे वे कह रहे हो कि जब तुमने हमें चुना है तो अब उसका स्वाद भी चखो !
इधर आम जनता की हालत यह है कि तेल के अन्तरराष्ट्रीय दामों में भारी गिरावट के बावजूद वह महंगाई के पिशाच से मुक्त नहीं हो पाई है। अर्थ-व्यवस्था भारी गतिरोध में फंसी हुई है। अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा जैसे इनके नेता ही कहने लगे है कि आर्थिक विकास कोरे भाषणों से नहीं हुआ करता। जमीन के विषय से लेकर आर्थिक सुधार के जितने भी झूठे-सच्चे वादे इस सरकार ने देशी-विदेशी पूंजीपतियों से किये थे, उन पर भी अमल का इनके पास कोई नक्शा न होने के कारण निवेश के मामले में भारत की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ खड़े हुए हैं। पूरे उद्योग जगत में गहरी निराशा छाई हुई है।
प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। सत्ता पर आने के समय मोदीजी ने अपनी विशिष्टता जाहिर करने के लिये कहा था कि वे लुटियन की दिल्ली के लिये एक बाहरी व्यक्ति है। लेकिन सत्ता पर आकर वे इस लुटियन की दिल्ली के लिये अयोग्यता की हद तक ‘बाहरी’ साबित होंगे, इसकी किसी ने बारह साल तक एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके व्यक्ति से उम्मीद नहीं की थी।
हमारा सवाल है कि आखिर हर मोर्चे पर मोदी सरकार के इतना विफल साबित की वजह क्या है? इस सवाल के जवाब की तलाश में हमें एक सूत्र इसी 25 जून के इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर से मिलता है। यह खबर 2008 में रमजान के दिनों में मुंबई के मालेगांव में हुए बम विस्फोट के बारे में है, जिसमें चार मुसलमान मारे गये थे और कई लोग जख्मी हुए थे। इस मुकदमे के अभियुक्त कुछ हिंदू आतंकवादी संगठन और व्यक्ति हैं। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट में इस मामले की विशेष सरकारी वकील रोहिणी सालियां का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है - ‘‘ जबसे नई सरकार आई है, मुझसे अभियुक्तों ( हिंदू आतंकवादियों ) के साथ नर्मी बरतने के लिये कहा जा रहा है : विशेष सरकारी वकील’’।
अड़सठ वर्षीय रोहिणी सालियां अपने पेशेवर जीवन में इसप्रकार के कई जटिल और महत्वपूर्ण मामलों में एक दक्ष सरकारी वकील के तौर पर प्रसिद्धी पा चुकी है। वे बताती है कि किस प्रकार इस मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंशी (एनआईए) के एक अधिकारी ने उनसे मिल कर कहा कि वे इस मामले को लटका कर छोड़ दे। इसी 12 जून को मामले की सुनवाई के ठीक पहले इस अधिकारी ने कहा कि उन्हें अब इस मामले सरकार की ओर से खड़े होने की जरूरत नहीं है। ‘सरकार नहीं चाहती कि इस मुकदमे का फैसला उनके पक्ष में जाएं’।
मालेगांव विस्फोट मुकदमे को जो जानते हैं, वे इसमें आरएसएस की भूमिका के बारे में भी कुछ खबर जरूर रखते हैं। इसके बाद शायद इस मामले में मोदी सरकार के रुख के कारण पर और कुछ कहने की जरूरत नहीं है। और कहना न होगा, यही वह बिंदु है जो इस सरकार के पंगुपन का, इसके अंदर घर किये हुए दुरंगेपन का, और इसकी चौतरफा विफलता का भी एक प्रमुख कारण है।
भारत की मुश्किल या कहे तो विशेषता यह है कि पिछले अड़सठ सालों में तमाम घात-प्रतिघातों के बीच से यहां भारतीय समाज के वैविध्य के साथ संगति रखते हुए एक जन-कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य के साथ जनतंत्र का एक व्यापक सांस्थानिक रूप विकसित हो चुका है। इसके कायदे-कानून सुपरिभाषित है और इसकी परंपराएं सुस्थापित। ऐसी स्थिति में, कोई कितने ही विद्रोही तेवर के साथ यहां सत्ता पर क्यों न आए, इस संस्थान की एक चूल भी हिलाना उसके लिये भारी है। और आरएसएस की मुसीबत यह है कि उसका इस संस्थान के साथ कोई ताल-मेल ही नहीं है। वह गोपनीय ढंग से, हिंदू राष्ट्र के एक हिंसक सैन्य रूप के निर्माण में लगा हुआ संगठन है। वह न भारत की विविधता को स्वीकारता है, न सभी धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के लोगों की समानता के अधिकार को। खास तौर पर मुसलमानों को तो उसने घोषित रूप से अपना परम शत्रु मान रखा है और उनके समूल नाश को अपना परम कत्र्तव्य।
आदमी अवचेतन की दमित कामनाओं को आम तौर पर व्यक्त नहीं करता, लेकिन अपने दैनंदिन कामों में उनसे हमेशा चालित होता रहता है। जो भी व्यक्ति आरएसएस को जानता है, वह इस बात को भी जानता है कि संघ परिवार का सच्चा और पूर्ण सदस्य बनने के लिये उसकी घोषित प्रतीकात्मक गतिविधियों से जुड़ना ही काफी नहीं होता, इस परिवार की परंपरा को जीवित रखने वाले जो प्रेतात्मक पहलू है, उन्हें भी अपनाना होता है; गांधी हत्या, राममंदिर आंदोलन और सांप्रदायिक दंगों की तरह के हिंसक अपराधों से जुड़े गोपनीय इतिहास की प्रेतग्रंथी को भी अपनाना पड़ता है। जिस व्यक्ति के मन में गांधी हत्या के प्रति सच्चा दुख या 2002 के गुजरात केे जनसंहार के प्रति सच्ची नफरत होगी, वह कभी भी आरएसएस का सच्चा सिपाही नहीं हो सकता।
संघ परिवार के लोगों पर छाया हुआ अवचेतन का यही प्रेत, समय-समय पर जाहिर होने वाला उसका प्रकट रूप, जैसा सार्क के मामले में सामने आया, जैसा मुसलमानों के मामले में आता रहता है, आदि, आदि उन्हें सभ्य दुनिया में वैसे लोगों की कतार में खड़ा कर देता है, जिसमें आईएस (इस्लामिक स्टेट्स) की तरह के उग्रपंथी जिहादी खड़े हैं। आरएसएस अपनी इस प्रेत-दशा से मुक्त होने में असमर्थ है, इसीलिये यह सरकार भी। न चाहने पर भी, रह-रह कर उसके कामों में अवचेतन के ये सारे प्रेत-तत्व जाहिर हो ही जाते हैं। इसीप्रकार, भेद-भाव को ही अपनी नीतियों का प्रमुख अंग समझने के नाते राष्ट्रीय नीतियों पर अमल के मामले में भी इसकी निष्ठा संदेहास्पद हो जाती है। इसका सारा जोर विभाजन और धार्मिक वर्चस्व पर रहता है। वह जन-स्वास्थ्य की कल्याणकारी योजनाओं के बजाय हिंदू बाबाओं के नेतृत्व में योग और उसके चमत्कारों पर ज्यादा यकीन करती है। जो सरकार अपने कामों के बजाय ढोंगी चमत्कारों पर ज्यादा भरोसा करेगी, उसकी सफलताओं का ग्राफ कैसा होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। भारतीय जनतांत्रिक संस्थानों के प्रति अनास्था और विद्वेष से प्रेरित सोच ही इस सरकार की सबसे बड़ी समस्या है।

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