Google+ Followers

शनिवार, 23 सितंबर 2017

आरएसएस का 'हिंदुत्व' हिंदू धर्म के खिलाफ एक सबसे बड़ी साजिश है ; यह शैव मत का दुश्मन है ।

-अरुण माहेश्वरी

आज जगदीश्वर चतुर्वेदी नेअपनी वाल पर एक पंक्ति की पोस्ट लगाई है: "शिव राष्ट्रीय एकता के प्रतीक देवता हैं।काहे को राम -राम रट लगाए हो।"

इस पर एक प्रवाह में हमने जो लिखा, उसे अपने सभी मित्रों और अन्यों के साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ। उम्मीद है, इसमें मित्रों को अनेक विचारोत्तेजक विषय मिलेंगे

आपने यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर, भाजपा और आरएसएस की एक प्रकार की दुखती रग पर उँगली रख दी है इनकी राम और कृष्ण की वैष्णव परंपरा के हिंदुत्व के अतिरिक्त शैवमत का नाम सुनते ही रूह काँपने लगती है और कान खड़े हो जाते हैं  

भारत में अार्यों के साथ पितृ-सत्तात्मक समाज आया और समाज के जातिवादी विभाजन की मनुवादी वैदिक परंपरा भी आई, जिसे पुराने पंचरात्र के सूत्रों से जोड़ कर वैष्णवों ने जन-जन तक पहुँचाने का काम किया  

इसमें कुछ भी कपोल कल्पना नहीं है अभी हाल में आनुवंशिक (genetic) अघ्ययन के आधार पर आक्रमणकारी आर्यों के भारत में आने के बारे में जो अंतिम अध्ययन सामने आये हैं, उनसे आर्यों की पितृसत्तात्मकता और जाति-विभाजन की सामाजिक प्रणाली के बारे में तथ्य निर्विवादित साबित हो गये हैं
(देखें, 'A Genetic Chronology for the Indian Subcontinent Points to Heavily Sex-biased Dispersals”, 16 scientists led by Prof. Martin P. Richards of the University of Huddersfield, U.K.)

भारत में पंचरात्र की तरह ही शैवमत के सारे तत्व वैदिक काल से भी पहले से मौजूद रहे हैं बाद में वैदिक मत के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ इसी मत के आधार पर लगातार सवाल उठाये जाते रहे, शैवमत के आगम ग्रंथों के अलावा जात-पात विरोधी धार्मिक पंथों का भी विकास हुआ जिनमें प्रमुख रूप से जो सबसे बड़े धर्म मत पैदा हुए उनमें बौद्ध धर्म का विस्तार तो सारी दुनिया में हुआ लेकिन हमारे यहाँ जैन धर्म और सबसे नये सिख धर्म के पीछे भी शैव मत के एकेश्वरवाद के तमाम सूत्र मौजूद थे, जो शंकर की वैदिक मान्यता के खिलाफ इस जगत को मिथ्या नहीं मानते थे बल्कि इसे ईश्वर के ही अनेक रूप, एक शिव के नाना रूपों में प्रकाश को मानने के कारण हर मनुष्य में ईश्वर को देखते थे और मनुवादी व्यवस्था के विरोधी थे बौद्धों, जैनों और वैष्णवों के अलावा लगभग 92 शैवागमों पर आधारित शैवमत ब्राह्मणवादी वैदिक मत के खिलाफ भारत की व्यापक जनता का सबसे बड़ा धार्मिक मत रहा है, जिसे धर्म के कारोबारी ब्राह्मणों ने अपने कारोबार के हित के लिये ही ख़ुद भी मान कर चलने में ही अपनी भलाई को देखा और ब्रह्मा, विष्णु के साथ ही शिव को भी बैठा दिया ब्रह्म प्रतीक थे वैदिक ब्रह्म के, विष्णु पंचरात्र से जुड़े वैष्णव मत के और शिव शैवमत के  

लेकिन गहराई से देखने पर यह जाहिर होता है कि शैवागमों पर आधारित दक्षिण के शैव मत से लेकर कश्मीर के शैवमत और अभिनवगुप्त के प्रत्यभिज्ञा दर्शन का वैदिक मत से गहरा मतभेद रहा है इसमें 11वीं सदी में इस्लाम के समानतावादी जात-पात विरोधी विचारों के आगमन के साथ ही भारत की जनता में शैवमत और वैष्णव मत की धारा को भी बल मिला मजे की बात यह है कि जहाँ तक इस्लामिक शासकों का सवाल है, खास तौर पर मुग़लों ने अपने दरबार में ब्राह्मणों को ज्यादा स्थान दिया बनिस्बत शैव गुरुओं को शैवमत के गुरू और उनके अनुयायी स्वातंत्र्य के प्रति अपनी मूलभूत आस्था के कारण ही शासकों से दूर रहते थे और अपने तांत्रिक दार्शनिक विचारों तथा क्रियाओं के विकास के कार्यों में ज्यादा मसगूल इसलिये भी बादशाहों का दरबार उन्हें रास नहीं आता था , लेकिन संस्कृत के पंडित ब्राह्मण उनके संरक्षण से अपने सामाजिक रुतबे को कायम रखने में सिद्धहस्त थे आज जिसे हिंदी पट्टी कहा जाता है, इसमें राम नहीं, वैष्णव भक्तों का, नाथपंथी शैवों का और इस्लाम का ही प्रभुत्व रहा है राम तो मुग़ल दरबारों में पले संस्कृत के पंडितों और अंग्रेज़ों के नस्लवादी प्रयोगों के तहत ब्राह्मणों को मिले अतिरिक्त संरक्षण के बीच से रामचरितमानस की कथा के नायक से ईश्वरीय सत्ता के रूप में सामने आगये उन्हें मनु की सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करने वाले एक मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में कल्पित किया गया जो सहज ही सामाजिक पटल पर अपनी ताकत को गँवा चुके ब्राह्मणों के लिये एक संबल और आस्था के प्रतीक बन गये  

बहरहाल, वैदिक धर्म और शैवमत के बीच के टकरावों के, जो किसी किसी रूप में ब्राह्मणों और बौद्धों के बीच खूनी संघर्षों के जरिये भी व्यक्त हुआ था, इतने लंबे अतीत पर और विस्तार में जाने के बजाय सबसे दिलचस्प होगा, इस विषय के सबसे ताज़ा उदाहरण कर्नाटक में लिंगायतों द्वारा ख़ुद को हिंदू धर्म से पूरी तरह स्वतंत्र एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देने के लिये शुरू हुए ज़बर्दस्त आंदोलन की बिल्कुल ताज़ा घटनाओं को देखना कल्पना कीजिये कि वैदिक धर्मों के प्रति शैव मत में कितनी गहरी अनास्था और तिरस्कार की भावना रही होगी कि आज भी 12 वी सदी के वीरशैव मत के कवि और दार्शनिक बासव के वचनों पर आधारित लिंगायत मतावलंबी हिंदुत्व को ठुकराते हुए लिंगायत को अलग धर्म मानने की आवाज उठा रहे हैं !

अभी चंद रोज पहले, इसी 10 सितंबर को लिंगायतों के कर्नाटक के सिद्दगंगा मठ के 110 साल की उम्र के वयोवृद्ध गुरू शिवकुमार स्वामी ने ज़ोरदार शब्दों में सरकार से यह माँग की है कि लिंगायत को पूरी तरह से स्वतंत्र, हिंदू धर्म से हर मायने में भिन्न एक अलग धर्म की मान्यता दी जाए इसके पहले अगस्त महीने में इनके तक़रीबन दो लाख अनुयायियों ने एक सभा करके यह प्रस्ताव पारित किया था  

वयोवृद्ध शिवकुमार स्वामी ने जब अपने इस निश्चय का ऐलान किया तो कर्नाटक की ही नहीं, पूरी भाजपा और आरएसएस में आतंक की सिहरन दौड़ गई उसी दिन नरेन्द्र मोदी के दूत स्वामी के पास उन्हें मनाने पहुंच गये तथा और भी राजनीतिज्ञों का ताँता  लग गया लेकिन सत्ता के दबावों से सदा मुक्त रहने की शैव परंपरा के अनुसार ही शिवकुमार स्वामी और उनके घोषित वारिस पर भी इसका कोई असर नहीं पड़ा है और वे अपनी इस सुचिंतित राय पर पूरी तरह से अटल है  

यहाँ गौर करने की एक और बात यह भी है कि कर्नाटक में लिंगायतों की आबादी लगभग 17 प्रतिशत है इनके अनुयायी बड़ी संख्या में केरल, तमिलनाड, आंध्र और महाराष्ट्र में भी फैले हुए हैं और चुनावों में इस संप्रदाय के लोग व्यवहारत: भाजपा के वोट बैंक बने हुए थे कर्नाटक के सबसे बदनाम भाजपा के मुख्यमंत्री और आज भी सबसे शक्तिशाली नेता येदियुरप्पा भी लिंगायत हैं  

ऐसे में भाजपा लिंगायत की अलग धर्म की माँग में अपने लिये वोट के लिहाज से भी एक भारी नुक़सान देखती है और आरएसएस का ब्राह्मणवाद तो शैव मत के इस प्रकार के उत्थान में अपने अस्तित्व के संकट को देखता है इसीलिये, यह रुझान अन्य क्षेत्रों में भी फैलने पाये और शैव मत भारत के हिंदू दलितों और वंचित जनों के एक स्वतंत्र धर्म के रूप में फिर से उभरने पाये, आरएसएस और भाजपा इस मुद्दे को बहुत संवेदनशील समझती है और इसके उभार को रोकने के लिये हर संभव उपाय में लगी हुई है  

कर्नाटक में कन्नड़ विश्वविद्यालय के उपकुलपति एम एम कलबुर्गी बासव के वचन साहित्य के भारत में सर्वमान्य पंडित के रूप में ख्यात रहे हैं और वे भी लिंगायत में हिंदू धर्म की कई चीज़ों का प्रवेश होने के बावजूद उसे हिंदू धर्म से अलग मानते थे इसी प्रकार, हाल में बंगलुरु में मार दी गयी पत्रकार गौरी लंकेश भी लिंगायत थी वे नास्तिक और वामपंथी विचारों की होने पर भी लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग मानती थी और इस पर कई मर्तबा उन्होंने लिखा भी था कन्नड़ भाषा के बौद्धिक समुदाय की इन दो प्रमुख लिंगायत हस्तियों की एक ही प्रकार से सुनियोजित निर्मम हत्याएँ और इनमें उग्र हिंदुत्ववादियों का हाथ होने के बारे में मिल रहे सबूतों से साफ पता चलता है कि हिन्दुत्ववादी ताक़तें शैव मत की विभिन्न धाराओं के इस नये उभार को अपने लिये कितना खतरनाक मान रही है !

शैवमत का अपना कोई एक धर्म ग्रंथ नहीं है, जिसे आम तौर पर किसी भी स्वतंत्र धर्म के अस्तित्व के लिये जरूरी माना जाता है लेकिन यही वह बात है जो शैव मत को दूसरे धर्मों से अलग भी करती है यह अनेक आगम ग्रंथों पर आधारित एक अति-प्राचीन धारा है जिसे आगमिक धर्म की धारा कहा जाता है और इसके बाहर की वैदिक, बौद्ध या वैष्णव धारा को इसमें नैगमित धारा माना जाता है शैव मत के 11 वीं सदी के अब तक के सबसे अप्रतिम गुरु, दार्शनिक, भाषाशास्त्री और कवि अभिनवगुप्त ने अपने समय तक के 92 शैवागमों का उल्लेख करते हुए यह बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी कि ये सभी परस्पर-विरोधी नहीं, बल्कि आवयविक रूप से एक है इनमें से प्रत्येक के अनुयायी मुक्ति की दिशा के अनुसंधानकत है, ये संसार और जीवन में वैविध्य को स्वीकारते हैं, वैविध्य में एकता और पुन: एकता में वैविध्य इनकी मूलभत मान्यता है यथार्थ के विविध पक्षों पर मनन का इनका यही तरीक़ा है जीवन में विकल्पमूलकता इनकी आस्था का विषय है  

किसी भी समाज में समरसता कायम करने के लिये मनुष्य की प्राणीसत्ता में स्वातंत्र्य के तत्व के असीम महत्व को मानते हुए अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रालोक में घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील और जातिवाद - इन्हें आठ पाश अर्थात आठ बंधन बताया है इनके परित्याग को ही इन पाशों पर विजय प्राप्त कर चुके पशुपति नाथ का संदेश बताया है शूद्र को भी शिक्षा पाने का अधिकार है वे कहते है कि कोई विप्र है लेकिन पापी है और कोई शूद्र है लेकिन पुण्यात्मा है - इसमें जाति-विचार कहाँ आता है ? इसीलिये वे शुद्धि को वस्तु का धर्म नहीं, बल्कि एक दुराग्रह मानते थे  

एक ऐसे शैव मत, जिसके लाभ से संस्कृत साहित्य को नैगमिक धारा की श्रेष्ठता को बनाये रखने के लिये काफी हद तक वंचित रखा गया था, हज़ार साल के अंतराल पर पुनरोदय का संकेत ही ब्राह्मणवादियों के माथे पर लकीरें खींचने के लिये काफी है कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याओं में हम इसकी एक हिंसक अभिव्यक्ति भी देख पा रहे हैं  


लेकिन यह सच है कि आरएसएस का एकचालिकानुवर्तित्व का सिद्धांत कि संघ के एक मठ के निर्देशों पर पूरे भारत का संचालन किया जाए, भारत के मूलभूत, वैविध्य में एकता और एकता में वैविध्य को स्वीकार कर चलने के इस प्राचीनतम मत के विरुद्ध है और इसीलिये यह शैव मत की उस मूलभूत भावना के भी विरुद्ध है जिसके तत्वों को आत्मसात करके ही वास्तव में हिंदू धर्म ने भी भारत में अपने को मज़बूती से कायम कर रखा है कहना होगा, आरएसएस का 'हिंदुत्व' हमारे हिंदू धर्म के खिलाफ एक सबसे बड़ी साजिश है और इसीलिये यह भारत -विरोधी भी है