रविवार, 14 जनवरी 2018

'आशा अमर धन' और मनु जोसेफ

—अरुण माहेश्वरी


'लाइव मिंट' के 23 दिसंबर 2017 के अंक में मनु जोसेफ की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई थी — जो बुद्धिजीवी अक्सर गलत होते हैं वे हमें कौन सी आशा का पाठ पढ़ाते हैं ( What intellectuals who are often wrong teach us about hope) ।

दो टूक शब्दों की मनु जोसेफ की खास शैली में लिखी गई टिप्पणी । एक मदारी की तरह मजमा जमाने के लिये ही वे सबसे पहले उकसावे भरे सवालों की फिसलन में पाठकों को खींच कर फिर उसे विषय की तह में ले जाना चाहते हैं, या कहा जा सकता है, खुद ही विषय में उतरते हैं । इस टिप्पणी का प्रारंभ वे इस प्रकार करते हैं — “आशा ध्यान का भंग होना है । निश्चय ही यह बहुत सुंदर चीज है, लेकिन इसके मूल में एक प्रकार से ध्यान का भटकना है जो विश्लेषण का स्वांग भरता है ।” (Hope is a lapse in concentration. It is, of course, many beautiful things but at its core it is a distraction that pretends to be analysis)

इस कथन के बाद ही वे मोदी के अंत की भारत के बुद्धिजीवियों की कामना और हर चुनाव में उनकी गलत साबित होने वाली भविष्यवाणियों के संदर्भ में खास तौर पर योगेन्द्र यादव की चर्चा करते हैं कि कैसे उन्होंने चुनावी सर्वेक्षणों के आंकड़ों के साथ अपनी आशा को गड्ड-मड्ड कर दिया था ।

जोसेफ आगे लिखते हैं कि आशाओं की सार्वजनिक प्रदर्शनी कैसे राजनीतिक विश्लेषण का भट्टा बैठा देती है, इसे जानने के लिये क्यों न हम आशा की ही निजी जिंदगी को टटोले और ऐसा कहते हुए वे आशा की अपनी सत्ता की मीमांसा में उतर जाते हैं । एक बड़े विषय में प्रवेश का सुराख पैदा करते हैं । पूछते हैं, क्या आशा ही चीजों के गलत होने का कारण है, आशा के कुहासे में जीने की कामना की तरह । अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण फैसले करते वक्त हम कितना आशा पर निर्भर करते हैं ? क्या अपने विवेक को आशा से मुक्त करना संभव है ?

इसी सिलसिले में जोसेफ कुछ लोगों की अनोखी अंत:प्रज्ञा की शक्ति की बात भी कहते हैं जो “आशा के जंगल में सच्चाई को देख लेते है, भले ही उससे उनका सबसे बड़ा अनिष्ट ही क्यों न जाहिर हो रहा हो ।...ऐसी अंत:प्रज्ञा के लोग दूसरों की तुलना में चीजों को साफ दृष्टि से देख पाते हैं । लेकिन जिनके पास वह नहीं होती उनमें आशा का प्रकोप होता है, जो विपरीत परिणाम आने पर निराशा में बदल जाती है ।”

इसके आगे वे अनायास ही कहते हैं — आशा एक प्रकार की क्लांति का रूप भी है । (Hope is also a form of fatigue.) भविष्य पर बहुत गहन सोच हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है ।...जो सिद्धांतकार मोदी की चुनावी पराजय को देखते हैं, वे क्लांत होकर सुखदायी मरीचिका देखा करते हैं । तब उनकी आशा जनता के पिछड़ेपन की धारणा में बदल जाती है और फिर अगले चुनाव-प्रचार में वे उसे 'शिक्षित' करने की आशा पालने लगते हैं ।

इसमें वे आस्ट्रेलिया के 2014 में बूकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार रिचर्ड फ्लैनागन से अपनी बात को भी लाते हैं जिसमें वे रिचर्ड से पूछते हैं कि क्या आशा की प्रमुखता युगों से कथाकारों की देन है क्योंकि आशा किसी भी कथानक का सबसे बड़ा औजार होती है ? इस पर रिचर्ड ने उनसे कहा कि बिना आशा की एक भी कहानी लिख कर देखों या कोई ऐसा सिनेमा देखों जिसमें कोई आशा ही न हो, तब तुम जान जाओगे । रिचर्ड ने कहा कि आशा मनुष्य की नैसर्गिकता है जिससे वह संस्कृति में अपना योगदान करता है ।

बहरहाल, जोसेफ अपनी टिप्पणी का अंत इन शब्दों से करते हैं — “तब क्या स्पष्टता सचमुच आशा से ज्यादा महत्वपूर्ण है, खास तौर पर यदि स्पष्टता स्वभावत: उन बुद्धिजीवियों में विषाद पैदा करती हो जिनका भविष्य मोदी के अंत पर निर्भर है ? शायद अधिकांश लोग दृष्टि की स्पष्टता के बजाय आशा की अंधता में पूरे वैभव के साथ अपना जीवन जी लेते हैं । मजेदार बात यह है कि राजनीतिक विश्लेषक भी ।” 
(So, is clarity really more important than hope, especially if clarity brings gloom, as it should, to the intellectuals whose prospects depend on the end of Modi? Most people probably pass through life with great grace, blinded by hope rather than the clarity of vision. It is amusing that even political analysts do.)

बात यदि महज बुद्धिजीवी के निजी स्वार्थ की छुद्रता भर की हो, तो आशा-निराशा के इस पूरे विमर्श का शायद ही कोई विशेष मायने हो । तब मामला 'आशा' की 'निजी जिंदगी' का नहीं, जिसे टटोलने की प्रतिज्ञा के साथ इस टिप्पणी के शुरू में विषय की ओर प्रस्थान किया गया था, बुद्धिजीवी या बुद्धिजीवियों की निजी जिंदगी का हो जाता है । लेकिन जब सचमुच 'आशा' की निजी जिंदगी की बात आती है, तो हमें विजयदान देथा की अत्यंत मार्मिक कहानी 'आशा अमर धन' की याद आ जाती है जिसे सत्रह साल पहले 'स्वाधीनता' के शारदीय विशेषांक में प्रकाशित किया गया था जिसके विशेष संपादक उदय प्रकाश थे ।

देथा उस कहानी का प्रारंभ इस प्रकार करते हैं — “समंदर गहरा कि आशा गहरी । धरती भारी कि आशा भारी । पहाड़ अविचल कि आशा अविचल । फूल हलका कि आशा हलकी । हवा सत्वर कि आशा सत्वर । सूर्य प्रखर कि आशा प्रखर । ईश्वर अमर कि आशा अमर कि ...”

इस कहानी में किसान बाप अपने दो अबोध बच्चों को उनकी सौतेली मां के बहकावे में अकाल के दिनों में घर में आठ-दस सोगरों और हँड़िया भर राब रख कर लंबे काल के लिये ताले में बंद कर पत्नी के साथ मालवा की ओर चला जाता हैं । अबोध बच्चे दरवाजे की सांकल पर कान लगाये, बिना खाये-पीये सूख कर कांटा हो कर भी इस आशा में जिंदा रहे कि मां-बापू आयेंगे तो सारे कष्ट दूर हो जायेंगे । काफी दिनों बाद जब मां-बाप लौटे तो दोनों बच्चे तालियां बजा कर नाचने लगे, लेकिन मां ने तभी बच्चों को दो-दो तमाचे मारते हुए कहा — “दुष्ट, हरामजादो, तुम अभी तक जीवित हो ? मरे नहीं ?...”

मां के इतना कहते ही “दोनों बच्चे चकरघिन्नी खाकर अदेर लुढ़क पड़े । मां का विकराल रूप देख कर मौत ने उन्हें तुरंत गले लगा लिया ।”

देथा आगे लिखते हैं — “कुदरत किसी के लिये आहत या संतप्त नहीं होती । वह तो अपनी मौज में हर कार्य-व्यापार में मशगूल रहती है ।...उस दिन वह अपनी मौज में झमाझम बरस रही थी । ...झोपड़े के भीतर सोगरों पर दीमक की परतें उभर आयी थीं ।...और टीमची पर रखी मटकी का पानी मटकी में ही नि:शेष हो गया था ।”
देथा पूछते हैं —“यदि पड़ी-पड़ी मटकियां यों पानी सोखती रहें तो प्यासे का क्या हाल होगा ?

“यह मामूली सा प्रश्न आज भी युग युगान्तर से अनुत्तरित है । क्योंकि समन्दरों के होठ सिले हुए हैं और बादलों के कण्ठ अवरुद्ध है !!”

कहना न होगा, समझदारों के लिये इशारा काफी है । ऊपर पूरी टिप्पणी में जिसे दृष्टि की स्पष्टता का झंडा फहराया गया है वह यही सिले हुए होठों वाले समन्दर और अवरुद्ध कंठ वाले बादलों की स्पष्टता है, किसी के लिये आहत या संतप्त न होने वाली कुदरत की स्पष्टता है ! लेकिन जब आशा की बात आती है तो वह मनुष्यों की प्राणी सत्ता से जुड़ी बात होती है । वह इन कुदरत की बातों में कहा है ? दृष्ट यथार्थ का जितना ही विस्तार क्यों न हो, उसमें आशा-निराशा के तत्व का कोई स्थान नहीं होता । हाइडेगर की शब्दावली में आशा-निराशा तो प्राणी के अस्तित्व में निहित प्राणी की नैसर्गिकता की पूर्व सत्ता-मिमांसामूलक समझ (pre-ontological understanding) का हिस्सा है ।

मनु जोसेफ उसके पास पहुंचते, उसके पहले ही दृष्टि की 'स्पष्टता' की संकीर्णता ने उन्हें घेर कर, बुद्धिजीवियों के निजी स्वार्थ तक सीमित कर दिया । और विवेचन की एक बड़ी प्रस्तावना का अंत एक प्रकार की कोरी फतवेबाजी की खाई में गिर कर हुआ !   


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