शुक्रवार, 19 जून 2020

भारत चीन सीमा संघर्ष : एक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम


—अरुण माहेश्वरी



पिछली 6 से 16 जून के बीच चीन के साथ उत्तर-पश्चिम की सीमा पर गलवान नदी की घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई झड़प और उस पर भारत में सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के बाद आज हवा में एक ही सवाल रह गया है — ‘आखिर भारत के सैनिक मार मार के कहां मरें ?’

सवाल उठता है कि हमारे बहादुर सैनिक, भले मार मार के ही, क्यों मरें ? मोदी के इस भाषण के अनुसार तो चीन ने भारत की सीमा में कोई अनुप्रवेश ही नहीं किया था । न उसने भारत के किसी पोस्ट पर हाथ लगाया । और, यही बात चीन भी कह रहा है कि उसने किसी की सीमा में कोई अनुप्रवेश नहीं किया है ।

तब क्या चीन ने जो आरोप लगाया है कि भारत के सैनिकों ने उसके क्षेत्र में घुसने की कोशिश की, वही सही है ? प्रधानमंत्री की बाते भी घुमा कर क्या चीन की इसी बात की पुष्टि नहीं करती है ? तब क्या गलवान में जो हुआ, उसे चीन की नहीं, भारत की करतूतों का परिणाम माना जाएगा ? चीन तो इस घाटी के पूरे इलाके को उसका सार्वभौमिक क्षेत्र बता रहा है !

जाहिर है कि भारत में कोई भी, यहां तक कि सरकार भी, प्रधानमंत्री की बातों से ऐसे किसी सीधे नतीजे पर पहुंचने के लिये तैयार नहीं होगा । गलवान घाटी का यह क्षेत्र आज से नहीं, 1962 के वक्त से ही दोनों देशों के बीच संघर्ष का एक प्रमुख क्षेत्र रहा है । सन् ’62 में इसी घाटी में भारत ने एक चौकी बनाने की कोशिश की थी जिसे दोनों देशों के बीच युद्ध के प्रारंभ का बिंदु माना जाता है । यह वह क्षेत्र है जिससे काराकोरम पर्वतमाला के पूरब में चीन की गतिविधियों पर नजरदारी करना संभव हो सकता है । कहा जाता है कि 4 जुलाई 1962 के दिन जब भारत ने वहां अपनी चौकी बनाई, उसके छः दिनों के अंदर ही चीन की सेना उसके पास पहुंच गई थी, जिस पर तब नई दिल्ली में चीन के राजदूत के साथ आपात बैठक की गई थी । आज वही इलाका फिर से एक बार दोनों देशों के बीच संघर्ष के प्रारंभ का बिंदु बन गया है । 

भारत के कईं पूर्व सैनिक अधिकारियों ने सर्वदलीय बैठक में मोदी के भाषण पर कई सीधे सवाल किये हैं । उन्होंने साफ तौर पर मोदी को अपराधी के कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि क्या अपने इस भाषण से मोदी ने भारत-चीन सीमा को नए सिरे से नहीं खींच दिया है ? क्या उन्होंने चीन को गलवान नदी की घाटी और पैंगोंग सो की फ़िंगर 4-8 तक की जगह नहीं सौंप दी है, जो दोनों एलएसी में हमारी ओर पड़ते हैं, और जहां अभी चीनी सेना बैठ गई है ? मोदी यदि आज कहते हैं कि भारत की सीमा में किसी ने भी अनुप्रवेश नहीं किया है तो फिर झगड़ा किस बात का है ? क्यों सेना-सेना में संवाद हो रहा है, क्यों कूटनीतिक बातें चल रही है, सेनाओं के पीछे हटने का क्या मायने है, क्यों 20 सैनिक शहीद हुए ?

सबका यह साफ सवाल है कि जहां भारत के 20 सैनिकों ने भारत की सीमा में घुस आए अनुप्रवेशकारियों को पीछे खदेड़ने के लिये अपने प्राण गँवाए हैं, वहीं मोदी क्यों कहते हैं कि भारत की सीमा में कोई आया ही नहीं ? तब उन सैनिकों ने जान कहाँ गँवाई ? क्या मोदी चीन की बात को ही नहीं दोहरा रहे हैं कि उन्होंने चीन की सीमा में अनुप्रवेश किया था ?

एक सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जैनरल प्रकाश मेनन ने आरोप लगाया है कि “मोदी ने समर्पण कर दिया है और कह रहे हैं कि कुछ हुआ ही नहीं है । भगवान बचाए ! उन्होंने चीन की बात को ही दोहरा कर क्या राष्ट्रद्रोह नहीं किया है ? इसमें क़ानूनी/संवैधानिक स्थिति क्या है । कोई बताए !” सेवानिवृत्त मेजर जैनरल सैन्डी थापर कहते हैं कि “क्या हमारे लड़के चीन की सीमा में घुसे थे उन्हें ‘खदेड़ने’ के लिए ? यही तो पीएलए कह रही है । हमारे बहादुर बीस जवानों के बलिदान पर, जिनमें 16 बिहार के हैं, महज 48 घंटों में पानी फेर दिया गया ! शर्मनाक !” मेजर बीरेन्दर धनोआ का कहना है कि — “क्या हम यह पूछ सकते हैं कि ‘मारते-मारते कहाँ मरें ?” ( देखे टेलिग्राफ, 20 जून 2020, Is Modi redrawing the map : Veteran)

कहना न होगा, मोदी के स्वभावगत मिथ्याचार ने राष्ट्रीय अखंडता के इस एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय में भी सारे मामले में इस प्रकार का एक घाल-मेल तैयार कर दिया है, जिसके गदलेपन में हर लिहाज से सिर्फ भारत की हेठी के अलावा अब और कुछ नजर नहीं आता है । भारत के 20 सैनिकों की शहादत के अलावा उसके और दस सैनिकों को चीन ने गिरफ्तार कर लिया था । इस तथ्य को भी भारत की ओर से जिस भद्दे ढंग से छिपाने की कोशिश की जा रही है, वह भी कम शर्मनाक नहीं है । 

बहरहाल, हम तो इस पूरी खूनी घटना को भारतीय उपमहाद्वीप के इस क्षेत्र में इधर के सालों की एक सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना समझते है । कहाँ तो सात साल पहले चीन ने वन बेल्ट वन रोड की वैश्विक योजना में भारत को उसका साझेदार बनाने का प्रस्ताव रखा था, और कहां वह आज दोनों देशों के बीच अचिन्हित सीमा के लद्दाख के इन दुर्गम, निर्जन क्षेत्रों में अपनी चौकियों को एलएसी के आगे स्थापित करने के क्रम में भारत के सैनिकों की हत्या कर रहा है ! यह बात जहाँ समझ के बाहर है, वहीं पूरी तरह से अस्वीकार्य है ।

पिछले तमाम सालों में इन्हीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मोदी के साथ ख़ूब पींगें लगाई थी । दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी काफ़ी बढ़े थे । इस बढ़ी हुई परस्पर-निर्भरता की वजह से ही यह उम्मीद की जाती थी कि दोनों देशों के बीच सीमा-संघर्ष की आदिमता के प्रदर्शन की नौबत अब कभी नहीं आएगी । लेकिन पिछले साल चीन से लगी उत्तर-पूर्वी सीमा में भूटान से लगे डोकलाम के बाद अब उत्तर-पश्चिम सीमा में यह दूसरी घटना है, जिससे पूरी भारत-चीन सीमा पर दोनों पक्षों की सरगर्मियाँ बेइंतहा बढ़ गई है । भारत का ठंडा रेगिस्तान कहलाने वाला लद्दाख का यह वह इलाक़ा है जहाँ की भयंकर ठंड ने सैकड़ों सालों के इतिहास के लंबे काल में न जाने कितने लश्करों को निगल अब तक निगल चुकी है । गलवान घाटी की इस घटना में ठंडी नदी के पानी में ढकेल दिये जाने से जवानों ने जिस प्रकार अपनी जान गंवाई, उससे भी इस क्षेत्र की प्रकृति का एक अनुमान मिलता है ।

बहरहाल, हम पूरे विषय को कुछ दूसरे मूलभूत सवालों के साथ देखना चाहते हैं । हमारा सबसे पहला और बड़ा प्रश्न यह है कि आख़िर भारत और चीन चाहते क्या है ? क्या आपस में एक पूरी लड़ाई या इसी प्रकार चोरी-छिपे दूसरे की जमीन हड़पना ? इस पुरानी बात को दोहराने का तुक नहीं है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है । इसके अलावा न चीन में इतनी शक्ति है कि वह भारत पर अपना अधिकार क़ायम कर लें, न भारत में चीन पर अधिकार क़ायम करने की शक्ति है । इन दो पड़ौसी, प्राचीन सभ्यताओं वाले विशाल देशों की इसके अलावा दूसरी कोई नियति नहीं हो सकती है कि वे आपस में सहयोग करते हुए शांत पड़ौसियों की तरह अपना सह-अस्तित्व बनाये रखे और परस्पर समृद्धि में सहायक हो । चीन के ओबेर प्रकल्प के पीछे कुछ वैसी भावना भी नजर आती थी । लेकिन उसके इतर, युद्ध की तरह की कोई भी बात सोचना किसी के लिये भी एक आत्मघाती मूर्खता के अलावा कुछ नहीं होगा । पर आज अपनी इस नियति से बंधे दोनों देश सीमा पर प्राणघाती मल्लयुद्ध कर रहे हैं ! 1962 के बाद से अब तक के लंबे अनुभव भी यही बताते है कि एशिया के इन दो, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले पड़ौसी देशों के बीच की शत्रुता से दोनों में से किसी को भी कोई लाभ नहीं हुआ है । उल्टे इससे पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों को ही लाभ हुआ । लेकिन लगता है कोई भी उस अनुभव से सही सबक़ लेने के लिये तैयार नहीं है ।

इसमें सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि सीमाओं को लेकर उठने वाला कोई भी मसला राष्ट्रवादी उत्तेजना में इतना संवेदनशील बना दिया जाता है कि उसमें सारी सरकारें भूल करने के बावजूद उसे स्वीकारने के लिये तैयार नहीं होती है और इसीलिये उसमें सुधार भी नहीं कर पाती है ; अपने देश की जनता की भावनाओं के साथ खेलती रहती हैं । अन्यथा कोई वजह नहीं है कि 1962 के इतने तीखे अनुभवों और उसके बाद की वैश्विक परिस्थितियों और दोनों पक्षों की सैनिक तैयारियों की रोशनी में दोनों सरकारों को आगे बढ़ कर आपस के सीमा विवादों को साहस के साथ निपटा नहीं लेना चाहिए था । वे दिन पूरी तरह से लद चुके हैं, जब कोई दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच किसी युद्ध में कोई विजयी और कोई पराजित हो सकता है । चीन को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि वह भारत को दबा कर अपना कोई हित साध सकता है ।

अभी की सारी उत्तेजनाओं के बावजूद यह कहने और समझने की ज़रूरत है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने चीन के साथ भारत की सीमाओं के बारे में इस विवाद को हमें विरासत के तौर पर सौंपा है । चीन और भारत की स्वतंत्र सरकारों का शुरू से दायित्व था कि वे समझदारी के साथ इस मसले को तय करके सीमाओं को साफ रूप में जमीन पर अंकित कर देती । शुरू के दिनों में दोनों के बीच ऐसी सद्भावना दिखाई भी दे रही थी । लेकिन अक्साई चिन सहित कुछ जगहों को लेकर गाड़ी ऐसी अटक गई कि चीन ने बातचीत के बजाय बल प्रयोग का रास्ता अपना लिया और 1962 में हमला करके की मनमाने तरीक़े से इसे अपने हिसाब से तय कर दिया । लेकिन सीमाओं पर अंतिम रूप से कोई समझौता करने में आज तक दोनों पक्ष विफल रहे हैं । दोनों के बीच ज़मीन पर अचिन्हित सीमा आज तक दोनों देशों के बीच एक तनाव का विषय बनी हुई है ।

इतिहासकार आर्नोल्ड टायनबी ने लिखा था कि “यह देख कर अजीब लगता है कि ब्रिटिश अफ़सरों ने जो लाइनें खींच दीं उसे बाद के ग़ैर-ब्रिटिश राज्य ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की मूल्यवान राष्ट्रीय संपदा के रूप में देख रहे हैं। इन रेखाओं को खींचते वक़्त जो रुपये ख़र्च किये गये थे, भारतीयों ने तब उस पर कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि वे उसे ब्रिटिश राजा का ख़र्च मान रहे थे । तब डुराण्ड और मैक्मोहन जो कर रहे थे, उस पर यदि किसी ने ध्यान दिया होता तो भारत के करदाताओं की क़ीमत पर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के सत्ता के अनैतिक राजनीतिक खेल पर विराम लग सकता था । आज अब नए राज्यों का अंग्रेज़ों की खींची हुई लाइनों को अपनी विरासत समझना इतिहास के चक्के का अनपेक्षित और दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ है ।”

दोनों देशों के बीच विवादित क्षेत्र में, जैसा कि हमने पहले ही कहा है, खास तौर पर चीन के अधिकार का अक्साई चिन का क्षेत्र वह प्रमुख मसला है जो शुरू से इस विवाद के समाधान में मुख्य बाधा बना हुआ है । यह पूरा क्षेत्र काराकरम पहाड़ियों के पार लगभग 5800 वर्ग कीलोमीटर का क्षेत्र है । भारत इस पर तभी से ही कोई बात करने के लिये तैयार नहीं था, क्योंकि वह इसे ऐतिहासिक तौर पर अपना अंग मानता है । चीन उस पर अपने क़ब्ज़े को प्रमुखता दे रहा था । 1960 में जब चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने भारत आ कर यह प्रस्ताव दिया कि कथित विवादित क्षेत्र में जो ज़मीन जिसके पास है, वह उसे रख ले और ख़ाली ज़मीन भारत की रहे, तब अक्साई चिन का मसला ही समझौते में बाधक बना था । भारत उसे ऐतिहासिक तौर पर अपना क्षेत्र मानता है क्योंकि ब्रिटिश अधिकारी डब्लू एच जान्सन ने 1865 में लाइन खींच कर उसे जम्मू और कश्मीर में शामिल दिखाया था, पर चीन उसे उसके बाद की मैकार्नी-मैक्डोनेल्ड लाइन (1899) के आधार पर अपना मानता है और उस पर उसने कब्जा भी कर लिया था । इसी लाइन के आधार पर चीन ने 1963 में पाकिस्तान के साथ सीमा समझौता किया है । गलवान घाटी का सामरिक महत्व इसी बात में है कि वह भारत के अधिकार के काराकोरम के दर्रे के बहुत निकट का क्षेत्र है, जहां से सियाचीन के बर्फीले इलाके की ओर जाया जाता है ।

अब अक्साई चिन के साथ ही पाक अधिकृत कश्मीर के उस हिस्से का मसला भी लगभग इसी प्रकार से इस पूरी समस्या में जुड़ गया है जिसे पाकिस्तान ने हाल के सालों में चीन को सौंप दिया है । चूँकि भारत पूरे पीओके को अपना मानता है, इसीलिये चीन के साथ भारत के सीमा संबंधी विवाद में यह नया क्षेत्र आ गया है, जिसे ऐतिहासिक तौर पर भारत अपना अभिन्न अंग मानता है । यही वजह है कि अब प्रकारांतर से भारत की कश्मीर समस्या सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का विषय नहीं रह गई है, इसमें चीन का एक तीसरा पक्ष भी शामिल हो गया है ।

सब जानते हैं कि राष्ट्रों के बीच इस प्रकार के सीमा विवाद आसानी से नहीं सुलझ पाते हैं । इनके समाधान के लिये राष्ट्रीय नेतृत्व में दूरदर्शितापूर्ण संयम और साहस की ज़रूरत होती है और साथ ही परस्पर विश्वास पर टिके संबंधों के लंबे अंतराल की भी ज़रूरत पड़ती है । इसके सबसे ज्वलंत उदाहरण के रूप में सोवियत संघ के साथ चीन के सीमा विवाद को भी लिया जा सकता है जिसका समाधान 55 साल के लंबे काल के बाद 2005 की व्लादीवास्टक संधि के रूप में हुआ था । 1991 के बाद से अब तक भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंधों का जिस प्रकार विकास हुआ है, वह एक ऐसा मज़बूत आधार है जिस पर दोनों के बीच की बाकी समस्याओं का भी समाधान हासिल किया जा सकता है । लेकिन इस प्रकार की सीमाई झड़पें इन संभावनाओं पर पानी फेरने का काम करती है । और विश्व साम्राज्यवादी ताक़तें तो घात लगाए बैठी है कि कैसे इन दरारों को और चौड़ा करके इस पूरे क्षेत्र को अशांत रखा जाए ताकि वे अपने हथियारों आदि का व्यवसाय कर सके । इसी अर्थ में ये झड़पें बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं ।  ऐसे में किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा ‘मार मार कर मरे’ की मार-काट वाली आदिमता की भाषा का प्रयोग सही नहीं है । कुल मिला कर यह हमारी मजबूती को नहीं, कमजोरी को ही बताती है ।

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