बुधवार, 3 जून 2026

सारस्वत साधना के पक्ष में –

 

−अरुण माहेश्वरी



इधर हमने राधावल्लभ त्रिपाठी जी के भारतीय ज्ञान परंपरा पर यू ट्यूब पर कई वक्तव्यों को सुना । खुद त्रिपाठी जी जिस परंपरा को अपनी किताब में “भारत की सारस्वत साधना” कहते हैं, अब वे अभी की धारा में बहते हुए उसके ‘ज्ञान मीमांसक’ पर चर्चा में लग गये हैं और इस परंपरा के कथित विउपनिवेशीकरण की चिंता में भी शामिल हो गये हैं ।  

दरअसल, त्रिपाठी जी की विशेषता है कि वे अपने वक्तव्यों में यूँ तो आम तौर पर काफी निर्लिप्त भाव से विषय का यथासंभव परिचय कराते हैं, किन्हीं प्रचलित धारणाओं को अनावश्यक रूप से चुनौती नहीं देते। परंतु उनकी पुस्तक की संरचना पर गौर करने से लगता है कि वे सूक्ष्म रूप से वर्तमान ज्ञान-चर्चा से अपने को थोड़ा अलग रख रहे हैं। 

हमारी समझ में, ज्ञान मीमांसा (Epistemology) और सारस्वत साधना एक नहीं हैं । इनमें एक सूक्ष्म, पर गहरा भेद है । यह कुछ वैसा ही भेद है जो ज्ञान की संरचना और ज्ञान के प्रस्फुटन के बीच का भेद होता है। एक में ज्ञान विषय (object) के रूप में विश्लेषित होता है, दूसरे में वह प्रमाता की चेतना के रूप में साधित होता है। 

ज्ञान मीमांसा में प्रश्न होता है कि ज्ञान क्या है, कैसे उत्पन्न होता है, उसका प्रमाण क्या है? यहाँ ज्ञान एक वस्तु (object) है, जिसका अध्ययन किया जाना है । जैसे हमारा न्याय दर्शन करता है और कांट अपने   ‘Critique of Pure Reason’ में तत्त्वमीमांसा की सीमाओं और संभावनाओँ को अध्ययन का विषय बना कर करते हैं । यहाँ प्रमाता स्वयं भी विश्लेषण का विषय बन सकता है।

पर सारस्वत साधना का सवाल यह नहीं है कि ज्ञान क्या है। यह स्वयं को उस स्थिति में ले जाती है जहाँ से ज्ञान स्वतः प्रवाहित होता है। यह ज्ञान को विषय नहीं, बल्कि चेतना की शक्ति (चिति-शक्ति) मानती है। यहाँ प्रश्न है कि कोई उस स्रोत तक कैसे पहुँचे जहाँ से वाणी और ज्ञान उत्पन्न होते हैं? 

ज्ञान मीमांसा मस्तिष्क का एक बौद्धिक अनुशासन, विश्लेषणात्मक, तार्किक कार्य है। सारस्वत साधना चित्त का परिष्करण, संवेदनशीलता का विकास और मौन का अनुशासन, चिति का कार्य है। इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का विश्लेषण है तो सारस्वत साधना ज्ञान का अवतरण ।

जैसे अभिनवगुप्त के शब्दों में वाक् साध्य नहीं, सिद्ध है, उसे केवल अवरोधों से मुक्त करना होता है। ज्ञान मीमांसा भाषा को चिह्नों, प्रतीकों, प्रतिनिधित्व के रूप में देखती है जबकी सारस्वत साधना उसे स्फोट के रूप में जहाँ शब्द प्रकट नहीं होता बल्कि फूटता है । 

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ज्ञान मीमांसा प्रमाता का अध्ययन करती है जबकि सारस्वत साधना प्रमाता का रूपांतरण । ज्ञान मीमांसा में ज्ञान लक्ष्य है सारस्वत साधना में परिणाम । इसमें लक्ष्य है प्रमाता की वह स्थिति जहाँ ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता है। ज्ञान मीमांसा प्रमाण का अध्ययन है और सारस्वत साधना प्रमाता की प्रत्यभिज्ञा । 

इसे यदि हम लकानियन पदावली में समझे तो पायेंगे कि ज्ञान मीमांसा विश्वविद्यालयी विमर्श (University discourse) है, जबकि सारस्वत साधना विश्लेषक का विमर्श (Analyst discourse) जहाँ ज्ञान दिया नहीं जाता, बल्कि ज्ञान उत्पन्न होने की स्थिति निर्मित की जाती है । हम जिस बात को "प्रमाता से अनीहा क्यों?" के सवाल के साथ उठाना चाहते हैं, वह भी कहा जा सकता है कि सारस्वत साधना का ही आधुनिक दार्शनिक रूप है क्योंकि हमारा जोर ज्ञान के सिद्धांत पर नहीं प्रमाता की संरचना पर हैं। 

इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान को जानती है, सारस्वत साधना ज्ञान को जन्म देती है । 

राधावल्लभ जी ने भारतीय ज्ञान चर्चा को शंकर के वेदांत अथवा बौद्ध दर्शन की सीमाओं को पार कर पाणिनी, कौटिल्य, वात्स्यायन, भरतमुनि, भृतहरि से लेकर आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, पण्डितराज जगन्नाथ से होते हुए गोपीनाथ कविराज, रामावतार शर्मा, रेवाप्रसाद द्विवेदी तक का जो विस्तार दिया है, वह ज्ञान के सत्य के असीम-अनंत शाश्वत रूपों की निरंतरता से जुड़ने का उपक्रम हैं न कि उसे कोरा विश्वकोशों के स्तंभों में समेटने का । 

“ज्ञान मीमांसा ज्ञान का अध्ययन है।” जब हम यह कहते हैं तो जाहिर है कि प्रमाता स्वयं यहाँ एक तटस्थ पर्यवेक्षक (observer) के रूप में आता है। भारतीय न्याय दर्शन से लेकर कांट तक यही संरचना है। जब हम ज्ञान को प्रमाता का गुण मान लेते हैं तब स्वयं प्रमाता हमारे सवालों के दायरे के बाहर हो जाता है। इसी में ज्ञान मीमांसा की सीमा निहित है।

जब हम कहते हैं कि “सारस्वत साधना ज्ञान का साधन है।” तब यहाँ पूरा परिप्रेक्ष्य बदल जाता है। ज्ञान यहाँ object नहीं है। ज्ञान यहाँ प्रमाता की चेतना की अवस्था है। इसलिए सारस्वत साधना का प्रश्न है: प्रमाता किस स्थिति में ज्ञान का स्रोत बनता है? यहाँ ज्ञान अर्जित नहीं अवतरित होता है। हम पुनः दोहरायेंगे, ज्ञान मीमांसा में ज्ञान लक्ष्य है, सारस्वत साधना में ज्ञान परिणाम है।

दोनों के बीच यह भेद अत्यंत निर्णायक भेद है। ज्ञान मीमांसा में ज्ञान साध्य है, सारस्वत साधना में एक चर्वणा का महज सह-उत्पाद । इस चर्वणा का लक्ष्य है: प्रमाता की वह संरचना जहाँ ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता है।

“ज्ञान मीमांसा प्रमाता की संरचना का विश्लेषण करती है; सारस्वत साधना प्रमाता की संरचना में हस्तक्षेप करती है।”

यहाँ पहली बार प्रमाता स्वयं प्रश्न बन जाता है। ज्ञान मीमांसा प्रमाता को प्रदत मानती है। सारस्वत साधना उसे प्रक्रिया । अभिनवगुप्त का प्रत्यभिज्ञा दर्शन इसी बिंदु पर निर्णायक है। प्रमाता स्थिर सत्ता नहीं बल्कि अन्य के अभिज्ञान से लगातार अस्थिर चिति की गतिशीलता है। 

जब हम कहते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञान का संग्रह है, भारतीय सारस्वत साधना ज्ञान का स्रोत है, तो तात्पर्य होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा शास्त्रों में है; सारस्वत साधना चेतना में है। शास्त्र ज्ञान नहीं ज्ञान का अक्स है। अभिनवगुप्त स्पष्ट कहते हैं: शास्त्र ज्ञान उत्पन्न नहीं करता, ज्ञान प्रमाता में प्रकट होता है।

जब हम कहते हैं कि ज्ञान मीमांसा भाषा को चिन्ह मानती है, सारस्वत साधना भाषा को स्फोट मानती है, तब ज्ञान मीमांसा भाषा को प्रतिनिधित्व मानती है। इसके बजाय सारस्वत साधना में भाषा को प्रकाश का प्रस्फुटन माना जाता हैं। शब्द चिह्न नहीं शक्ति है।

ज्ञान मीमांसा विश्वविद्यालयी विमर्श है और सारस्वत साधना विश्लेषक का विमर्श (Analyst discourse) है। यह एक लकानियन समझ है जिसमें जॉक लकान के अनुसार ज्ञान मीमांसा का संस्थागत रूप विश्वविद्यालयी विमर्श की ओर झुकता है; सारस्वत साधना विश्लेषक-विमर्श की तरह उस बिंदु की खोज करती है जहाँ प्रमाता स्वयं अपनी संरचना से विचलित होता है। इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का उत्पादन करती है तो सारस्वत साधना प्रमाता का । 

यहां एक सबसे निर्णायक सूत्र आता है कि ज्ञान मीमांसा ज्ञान को जानती है, सारस्वत साधना ज्ञान को जन्म देती है। ज्ञान मीमांसा ज्ञान का ज्ञान है (knowledge of knowledge) पर सारस्वत साधना में ज्ञान एक सृजन है । यहाँ प्रमाता सर्जक होता है। हमारे अभिनवगुप्त इसी  सारस्वत साधना के दार्शनिक हुए हैं, इसीलिये हम उन्हें आधुनिक मनोविश्लेषकों की श्रेणी में रख कर विचार का विषय बनाते हैं । उनका पूरा कार्य ज्ञान मीमांसा नहीं, सारस्वत साधना का दर्शन है। उनके लिए ज्ञान प्रमाता की स्वातन्त्र्य शक्ति है। ज्ञान अर्जित नहीं अभिज्ञात है। प्रत्यभिज्ञा ज्ञान मीमांसा नहीं तात्विक जागृति है। 

जॉक लकान भी आधुनिक सारस्वत साधना के दार्शनिक है, इसीलिये उन्हें कार्ल मार्क्स की तरह ही हम गैर-दार्शनिक दार्शनिकों की श्रेणी में रखते हैं । लकान का पूरा मनोविश्लेषण ज्ञान का सिद्धांत है, प्रमाता का रूपांतरण जैसे मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत और सर्वहारा के रूप में समाज के हरावल दस्ते का निर्माण है । मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में उस ऐतिहासिक प्रमाता की खोज है जो मनुष्य को उसके पराधीन सामाजिक रूपों से मुक्त कर स्वतंत्र मनुष्य (free man) की स्थिति तक ले जाता है; यह स्थिति अभिनवगुप्त के भैरव भाव की तरह किसी स्थिर सार की नहीं, बल्कि स्वातन्त्र्य की सक्रिय अवस्था है। इसीलिये मार्क्स का सर्वहारा वर्ग नहीं, स्वतंत्र प्रमाता है ।

लकान कहते हैं: सत्य को सिखाया नहीं जा सकता, उसे सिर्फ उत्पन्न किया जा सकता है (truth cannot be taught it can only be produced) । लकान की विश्लेषणात्मक प्रक्रिया, ट्रांसफरेंस (आनयन), और ‘प्रमाता को पता हो’ (subject supposed to know) की उनकी धारणा अनायास ही उसे सारस्वत साधना से जोड़ती है।

अपनी पुस्तकों, “अथातो चित्त जिज्ञासा”, “प्रमाता का आवास”,“प्रमाता से अनीहा क्यों” आदि में हमने सचेत रूप से उन्हें ज्ञान मीमांसा की पुस्तक बनने से बचाने की कोशिश की हैं। वहां ज्ञान का संग्रह नहीं, फ्रायडियन- लकानियन मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के आलोक में भारतीय चिंतन के तंत्र साहित्य, शैवमत और खास तौर पर अभिनवगुप्त की चर्वणा से एक आधुनिक भारतीय मनोविश्लेषण की दृष्टि पाने की कोशिश है । इस अर्थ में वे वर्तमान काल की सारी विसंगतियों में एक नये प्रमाता की संरचना को उद्घाटित करने का प्रयास हैं। उनमें उपलब्ध ज्ञान का विश्लेषण नहीं प्रमाता का प्रकटीकरण है। 

कुल मिला कर, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का विज्ञान है सारस्वत साधना ज्ञान का जन्मस्थान है और कह सकते हैं कि प्रमाता उन दोनों के बीच का गुप्त सेतु।

इसी संदर्भ में हम आगे, जब संभव हुआ, कुछ चर्चा ‘ज्ञान के विउपनिवेशीकरण’ की धारणा पर भी करना चाहेंगे, जिसे लेकर हमारे सामने बहुत गहरी समस्याएं हैं ।