सोमवार, 22 जून 2026

सड़कों के नाम बदलना स्मृतियों पर बुलडोजर चलाने जैसा है !

 

(सुहरावर्दी एवेन्यू से गोपाल मुखर्जी रोड के बहाने इतिहास, स्मृति और नाजी सत्ता पर एक टिप्पणी)

-अरुण माहेश्वरी



कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड करना पहली नज़र में किसी को भी एक सामान्य राजनीतिक घटना लग सकती है। लेकिन यह प्रसंग केवल नाम बदलने का नहीं, इतिहास को पहचानने और उसके साथ व्यवहार करने के मूलभूत दृष्टिकोण का है।

यदि कोई सरकार यह कहे कि वह इतिहास का न्याय कर रही है, तो उससे सबसे पहली अपेक्षा तो यह होती है कि वह इतिहास के तथ्यों की तो सटीक पहचान करें । जिस व्यक्ति के नाम को हटाया जा रहा है और जिसे स्थापित किया जा रहा है, उनके बारे में ठोस तथ्यों की तो उसे सही जानकारी हो ! 

यहाँ विडंबना यह है कि जिस सड़क को हटाया गया, वह उस सुहरावर्दी के नाम पर थी ही नहीं जिसे हटाने का नैतिक तर्क दिया गया है । 

1933 में नामित यह सड़क उन सर हसन सुहरावर्दी की स्मृति में थी जिन्होंने बंगाल की शिक्षा, चिकित्सा और सार्वजनिक जीवन में काम किया था । वे चिकित्सक थे, विश्वविद्यालय प्रशासक और सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे। जिस 1946 की कोलकाता किलिंग की बात की जा रही है उस राजनीति से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था । 

हमारी नजर में यह केवल तथ्यगत भूल नहीं है। यह स्मृति का राजनीतिक पुनर्लेखन है। 

हिटलर के थर्ड राइख के इतिहासकार विलियम शिरर ने दिखाया है कि 1933 के बाद नाज़ी शासन ने जर्मन जीवन के ‘हर कोने’ को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी—शिक्षा, प्रेस, कला, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, यहाँ तक कि नगरों की दृश्य संरचना तक को। सड़कों और सार्वजनिक स्थलों का पुनर्नामकरण इसी व्यापक नाज़ीकरण परियोजना का हिस्सा था।


हिटलर ने देश भर में सैकड़ों सड़कों, चौकों और सार्वजनिक स्थलों को नए नाम दिए । इनमें से तमाम नाम नाज़ी आंदोलन के शहीदों, सैनिक प्रतीकों और स्वयं हिटलर से जुड़े हुए थे। इस नामकरण का ही दूसरा पक्ष था, नामों को मिटाना। हिटलर ने चुन-चुन कर यहूदी मूल के व्यक्तियों के, समाजवादी नेताओं के, उदारवादी और लोकतांत्रिक परंपरा के प्रतीकों और वाइमर गणराज्य से जुड़े नामों को हटाया था । इतिहास की किताबों में इसके सारे तथ्य मौजूद हैं । पूर्वी प्रशिया में तो 1938 में हजारों गाँवों और कस्बों के नाम बदल दिए गए ताकि पोलिश, लिथुआनियाई और पुराने प्रुशियाई सांस्कृतिक चिह्न ही मिट जाएँ। 


यहाँ नाम बदलना प्रशासनिक काम नहीं था, इतिहास के स्वामित्व का दावा था। आज भी जर्मनी में संग्रहालय, स्मारक और अभिलेख बताते हैं कि कौन-सी सड़क कब बदली, क्यों बदली और किस इतिहास से जुड़ी थी। 1945 के बाद जर्मनी ने नाज़ी नाम तो हटाए, पर उसने नाज़ी अतीत को मिटाया नहीं। स्मृति को नष्ट नहीं किया गया; उसे आलोचनात्मक रूप से संरक्षित किया गया।

अब हम फिर कोलकाता के सुहरावर्दी प्रसंग पर आते हैं । सुहरावर्दी की जगह गोपाल मुखर्जी को लाने के निर्णय के समर्थकों का तर्क है कि 1946 की कोलकाता हिंसा में हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भूमिका को भूलना नहीं चाहिए। 

यह सही है कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी का नाम 1946 के डायरेक्ट एक्शन से अलग नहीं किया जा सकता। उनके आलोचक उन्हें प्रशासनिक विफलता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जोड़ते हैं। लेकिन हुसैन शहीद सुहरावर्दी राजनीति की विरासत भी इतनी सरल नहीं, बल्कि काफी जटिल रही है । वही व्यक्ति 1947 में गांधीजी के साथ कोलकाता में शांति स्थापित करने के प्रयासों में भी दिखाई देता है।

इतिहास में किसी व्यक्ति की भूमिका एकरेखीय नहीं होती । और यहाँ तो एक अलग ही प्रश्न उठ गया है कि क्या किसी व्यक्ति के अपराध की स्मृति दूसरे व्यक्ति के नाम पर दर्ज की जा सकती है ?  यह कैसा प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन है!

जहां तक गोपाल चंद्र मुखर्जी का सवाल है, उनकी स्मृति बंगाल के विभाजन-पूर्व लोकजीवन की स्मृति है। वे मांस-व्यवसाय और अखाड़ा-संस्कृति से जुड़े थे, और 1946 के दंगों के दौरान स्थानीय प्रतिरोध के एक लोकप्रिय पात्र बन गये थे। उनके परिवार के अनुसार उन्होंने हिंदुओं की रक्षा की और निर्दोष मुसलमानों को हानि न पहुँचाने की भी सलाह दी। पर उनके आलोचक उनकी दूसरी तस्वीर भी रखते हैं। यह बहस भी इतिहास का एक हिस्सा है।

शहरों के नाम स्मृति की परतें होते हैं । क्या किसी शहर को उसके अतीत से काट कर नया बनाया जा सकता है? शहर केवल सड़कें और इमारतें नहीं होते, वे स्मृति के अभिलेख होते हैं । सड़कों, चौकों और मोहल्लों के नाम केवल दिशा बताने के लिए नहीं होते। वे बताते हैं कि शहर स्वयं को कैसे याद करता है।

इस संदर्भ में आज लाहौर का उदाहरण सबसे ताजा और उल्लेखनीय है। लाहौर में भी पुराने हिंदू-सिख नामों और नगर-स्मृतियों को पुनः दृश्य बनाने की चर्चाएँ सामने आई हैं । वहाँ यही तर्क काम कर रहा है कि शहर की संस्कृति उसकी बहुस्तरीय स्मृति में बसती है; उसे मिटाकर नया राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता। लाहौर को उसके पहले के सांस्कृतिक स्तरों सहित पढ़ने का आग्रह स्मृति-संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण काम है । यदि यह प्रवृत्ति सचमुच शहर को उसके बहुलतावादी अतीत से जोड़ने की है, तो उससे जाहिर होता है कि  इतिहास को सुधारने का अर्थ इतिहास को संक्षिप्त करना नहीं होता।

हम इस घटना में कोलकाता की स्मृतियों पर छाये संकट के अशनि संकेत देख रहे हैं । किसी शहर की सड़क का नाम बदलना आसान है पर उसकी स्मृति को बचाए रखना कठिन। और किसी भी जाति या समाज को उसके अतीत की बहुलता से काट देना, चाहे वह गौरवपूर्ण हो या त्रासद, केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, सांस्कृतिक विस्मरण का आरंभ कहलायेगा । 

कोलकाता ने पहले भी सड़कें बदली हैं। औपनिवेशिक नाम हटे, नए आए। यह नई बात नहीं। विद्वानों ने उस स्वेच्छाचार की भी निंदा की क्योंकि शहर केवल वर्तमान का निवास नहीं, अतीत का अभिलेख भी होता है। किसी समाज की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने नाम हटाए; बल्कि इस बात से कि वह अपने कठिन, विरोधाभासी और असुविधाजनक अतीत को कितनी जगह देता है। 

जो शहर अपने इतिहास को काटता है, वह अंततः अपने ही अनुभव को काटता है। और जो समाज अपने अतीत की बहुलता से डरता है, वह अंततः अपने भविष्य की संभावनाओं से भी डरने लगता है। स्मृति का संकुचन अंततः सत्य के संकुचन में बदल जाता है; और जहाँ सत्य को एकक घोषित कर दिया जाता है, वहाँ इतिहास धीरे-धीरे मिथक में बदलने लगता है। 




रविवार, 21 जून 2026

‘इतिहास फिर से खुल गया है’


(ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध और इस्लामाबाद एमओयू पर एक टिप्पणी)

−अरुण माहेश्वरी




ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को केवल एक और पश्चिम एशियाई युद्ध कह कर नहीं छोड़ा जा सकता। यह युद्ध अपने सैन्य परिणामों से कहीं अधिक अपने प्रतीकात्मक परिणामों के कारण महत्वपूर्ण है। इसने उस अमेरिकी प्रभुत्व की संरचना की आंतरिक संगति को झकझोर दिया है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से स्वयं को विश्व-व्यवस्था की अंतिम गारंटी के रूप में प्रस्तुत करती आई है । 

28 फ़रवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हमलों की शुरुआत की। लक्ष्य था ईरान की सैन्य क्षमता, वायु-रक्षा, मिसाइल ढाँचे, परमाणु कार्यक्रम और नेतृत्व-संरचना को निर्णायक रूप से खत्म कर देना। आरंभिक हमले ही अत्यंत क्रूर और व्यापक थे। अमेरिका और इज़राइल की रणनीति साफ थी कि ईरान को ऐसा झटका दिया जाए कि वह न केवल सैनिक रूप से पंगु हो, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अस्थिर हो जाए। यह अमेरिका-इजरायल का मध्यपूर्व पर पूर्ण और प्रश्नातीत प्रभुत्व कायम करने का एक निर्णायक अभियान था । 

लेकिन युद्ध की असली कहानी तब शुरू हुई, जब ईरान ने जवाबी हमला किया। उसने इज़राइल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिकी सैनिक अड्डो की क्षेत्रीय संरचनाओं को अपना निशाना बनाया। युद्ध लेबनान, खाड़ी, होरमुज़ जलडमरूमध्य से लेकर मध्य पूर्व के तमाम ऊर्जा-केंद्रों तक फैल गया। ईरान के साथ ताल-मेल रखते हुए हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के मोर्चे पर भी इज़राइल को उत्तर की दिशा से बुरी तरह उलझाए रखा। सर्वोपरि, होरमुज़ के संकट ने दुनिया को बता दिया कि भू-राजनीति केवल वाशिंगटन या तेल अवीव की इच्छा से संचालित नहीं होती।   

जिसे अमेरिका अपनी अजेय शक्ति के प्रदर्शन और ईरान के खिलाफ निर्णायक दंडात्मक कार्रवाई मान रहा था, वही धीरे-धीरे उसके प्रभुत्व की सीमाओं को अनावृत करने लगा।

और, यहीं से युद्ध का चरित्र ही बदल गया।

अमेरिका अपनी जिस सैन्य शक्ति पर सबसे अधिक भरोसा करता था, वही शक्ति इस युद्ध में उसके लिए समुद्र की चोर बालू साबित होने लगी । उसका हमला भले ही कितना भी विनाशकारी क्यों न हो, निर्णायक नहीं साबित हुआ। वह न ईरान को मिटा सका, न उसे अलग-थलग ही कर सका। यहां तक की दूसरे क्षेत्रीय प्रतिरोधों को भी समाप्त नहीं कर सका। उल्टे, ऊर्जा-मार्गों पर से उसका नियंत्रण खत्म हो गया । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह दुनिया को यह विश्वास नहीं दिला सका कि उसके बिना विश्व-व्यवस्था असंभव है।

हम इसे लकानियन अर्थ में भू राजनीति का वह बिंदु कहेंगे जब इसमें बहु-ध्रुवीय जगत के ‘रीयल’ का प्रवेश होता है।

यह लकानियन ‘रीयल’ कोई बाहरी वस्तु की तरह नहीं होता। यह अंतर की वह असंभवता है जिसे प्रतीकात्मक व्यवस्था लगातार ढँकती रहती है। अमेरिकी प्रभुत्व का प्रतीकात्मक संसार इस गहरे विश्वास पर टिका था कि अमेरिका ही अंतिम निर्णायक शक्ति है; उसकी सैन्य उपस्थिति ही सुरक्षा है; उसके नियम ही अंतरराष्ट्रीय नियम हैं; उसका दंड ही न्याय है; और उसकी स्वीकृति ही वैधता है। ट्रंप हर वक्त अपनी श्रेष्ठता के बखान से इसी प्रतीकात्मक विश्वास को दोहराया करते हैं । 

पर ईरान ने इसी आत्म-संसार को उसके रीयल के सामने खड़ा कर दिया। उसने दिखाया कि कोई भी ‘बड़ा अन्य’ (big other) स्वयं में पूर्ण नहीं है। अमेरिका कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है और न इज़राइल अजेय है। प्रतिबंध अंतिम हथियार नहीं हैं। सैन्य शक्ति राजनीतिक सत्य की गारंटी नहीं है। इतिहास किसी एक केंद्र की ही पटकथा के अनुसार नहीं चलता है। 

हमारी नजर में, इस युद्ध का यही सबसे बड़ा निष्कर्ष है।

इस युद्ध में ईरान की जीत को केवल इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि उसने अमेरिका को किसी पारंपरिक युद्धक्षेत्र में हरा दिया। निस्संदेह, इस युद्ध के अंतिम मुकाम पर अमेरिका के पास कोई दूसरी कारगर सैन्य रणनीति नहीं बची थी । पर इससे भी बड़ी बात यह है कि उसने अमेरिकी महाशक्ति के भ्रम को तोड़ दिया। 

इस अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन और रूस की भूमिका इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाती है। वे इसमें केवल ईरान के समर्थक नहीं रहे; वे उस नई वैश्विक गणना के संकेतक के रूप में सामने आएं जिसमें अमेरिका अब विश्व का अकेला व्याख्याता नहीं रह गया है। 

हम जानते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि अब कोई नई आदर्श व्यवस्था स्थापित हो चुकी है, जैसा कि हमारे इस काल के प्रमुख युद्ध रणनीति के विशेषज्ञ प्रवीण साहनी लगातार कह रहे हैं । वे इससे एक ऐसी नई विश्व-व्यवस्था के उदय का दावा कर रहे हैं, जिसमें युद्ध नहीं, शांति और विकास ही दुनिया के देशों के बीच व्यवहार के अकेले कारक रह जायेंगे । 

हमें लगता है कि अभी ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं होगा । बल्कि यह फिर एक नए भ्रम में गिरने के समान भी हो सकता है। हम इसे कहीं ज्यादा व्यापक और यथार्थ रूप में देखते हुए संक्षेप में यही कहेंगे कि यह वह घटना है जब इतिहास का वह अध्याय, जिसे अमेरिका ने अपने प्रभुत्व के अंतर्गत बंद कर देने की कोशिश की थी, फिर से खुल गया है।

बाद्यू की भाषा में, घटना वही होती है जो किसी स्थापित संसार की गणना में दर्ज नहीं होती, लेकिन उसी संसार की पूर्णता को संदिग्ध बना देती है। ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध इसी अर्थ में एक घटना है । 

अमेरिका ने युद्ध शुरू किया था इस विश्वास से कि वह ईरान को निर्णायक रूप से झुका देगा। लेकिन उसे अंततः ‘इस्लामाबाद एमओयू’ की दिशा में जाना पड़ा। यह एमओयू केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है। 

इस एमओयू में सैन्य कार्रवाइयों की समाप्ति, 60 दिनों की वार्ता, होरमुज़ जलडमरूमध्य के खुलने, प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, संपत्तियों की मुक्ति और पुनर्निर्माण की संभावनाओं का उल्लेख केवल तकनीकी बातें नहीं हैं। ये युद्ध के पीछे के उस तर्क का प्रत्याख्यान है जो ईरान को केवल दंडित करने पर आधारित था। यहीं हमें ईरान आज के विश्व में एक ‘संभावित प्रमाता’ की स्थिति ग्रहण करता दिखाई देता है।

गौर करें कि हम ईरान को 'प्रमाता' नहीं, ‘संभावित प्रमाता’ कह रहे हैं । अगर सीधे 'प्रमाता'  कहते, तो यह देखना पड़ता कि ईरान ने इस युद्ध को किस हद तक अपनी नई पहचान का आधार बनाया है, कि उसके भीतर का राजनीतिक-सांस्कृतिक ताना-बाना इस घटना के अनुसार कितना पुनर्व्यवस्थित हुआ है, और वह इसके सत्य को दुनिया के सामने स्थायी रूप से पेश करने में कितना सक्षम है।

वह इस युद्ध के बाद 'प्रमाता' बनने की क्षमता (संभावना) रखता है, परंतु वह अभी वहां तक गया नहीं है। उसने ‘बड़े अन्य’ को खंडित किया है, लेकिन उस खंडन के बाद की विश्व-दृष्टि अभी उसके भीतर पूरी तरह संगठित नहीं हुई है। इस लिहाज से वह अभी इस 'घटना' के प्रति निष्ठा (Fidelity) की प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में है।

'संभावित प्रमाता' होने के नाते, ईरान अभी भी विजयी की तरह नहीं, उसी पुराने ढांचे (प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, पुनर्निर्माण) के भीतर बातचीत कर रहा है, हालाँकि अब उसकी बातचीत की स्थिति बहुत मजबूत है। यानी, उसने व्यवस्था को झकझोरा है, लेकिन नई विश्व-गणना का बोध अभी भी संभावनाओं के गर्भ में ही है।

प्रमाता कोई नैतिक नायक तो नहीं होता है लेकिन वह उस सत्य का वाहक जरूर होता है जो घटना से पैदा होता है। ईरान ने यह सत्य सामने रखा कि विश्व अब अमेरिकी सैन्य-संरचना की एकरेखीय गणना में नहीं समा रहा है; अमेरिकी प्रभुत्व की जकड़ अटूट नहीं है; उसमें दरार आ चुकी है।

और, यह दरार ही रीयल है। दुनिया अब पहले जैसी नहीं रह गई है। यह इस युद्ध का सत्य है।

इसीलिये, अमेरिका–इज़राइल धुरी का यह संकट हमारी नजर में, दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

इस पूरे प्रसंग को और भी गहराई से पूरे परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए हमें बीसवीं शताब्दी के अंत की दो अत्यंत प्रभावशाली घोषणाओं को याद करना चाहिए।




पहली थी फ्रांसिस फुकुयामा की “इतिहास का अंत और अंतिम मनुष्य” (The end of History and the Last Man) की घोषणा।

सोवियत संघ के विघटन के बाद फुकुयामा ने दावा किया था कि अब वैचारिक संघर्ष का युग समाप्त हो चुका है। उदार लोकतंत्र और पूँजीवादी विश्व-बाज़ार मानव राजनीतिक विकास के अंतिम रूप के रूप में सामने आ चुके हैं। युद्ध, संघर्ष और वैकल्पिक विश्व-दृष्टियाँ अब केवल अवशेष भर होंगी; इतिहास अपने अंतिम संगठन तक पहुँच चुका है।

यह घोषणा केवल राजनीतिक नहीं थी; यह पश्चिमी प्रभुत्व की दार्शनिक आत्म-घोषणा थी। उसमें अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं था; वह इतिहास के अंतिम रूप का संरक्षक बन गया था।

लेकिन इतिहास की विडंबना यही है कि वह अपने अंत की ऐसी  घोषणाओं को कभी स्वीकार नहीं सकता है । ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को भी इसकी पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास बंद नहीं हुआ था; उसे बंद मान लिया गया था। पर, इतिहास की वापसी किसी नए यूटोपिया के रूप में नहीं हुई है, बल्कि उस रीयल के रूप में हुई जिसे अंतिम घोषित व्यवस्था दबा नहीं सकी। 

बीसवीं सदी के अंत में की गई दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना थी सैमुअल हंटिंगटन (Samuel P. Huntington) की, वर्तमान विश्व में “सभ्यताओं का संघर्ष” की स्थापना।

फुकुयामा जहाँ संघर्ष के अंत की बात कर रहे थे, वहीं हंटिंगटन कह रहे थे कि संघर्ष जारी रहेगा, लेकिन उसका आधार विचारधारा नहीं, सभ्यता होगी। उनकी दृष्टि में पश्चिम और उसके संस्थान अंततः इस संघर्ष के केंद्रीय नियामक बने रहेंगे। 

ईरान हंटिंगटन की विश्व संबंधी इस रूपरेखा में लंबे समय से एक “सभ्यतामूलक अन्य”(civilizational Other) की तरह उपस्थित रहा, वह जो पश्चिम की सांस्कृतिक–राजनीतिक सार्वभौमिकता में वैसे ही पूरी तरह समाहित नहीं होता, जैसे, उनके अनुसार, इस्लामी, सिनिक (चीनी), ऑर्थोडॉक्स आदि सभ्यताएं भी नहीं होती । 

यहां यदि हम ‘अन्य’ के बारे में लकानियन धारणा का प्रयोग करें कि वह कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि वह स्थान है जिससे कोई व्यवस्था अपनी पहचान बनाती है, (मैं स्वयं को “मैं” तभी कहता हूँ जब कोई “अन्य” हो !), तो कहेंगे कि ईरान सभ्यता के बाहर नहीं था, वह उस बिंदु का नाम था जहाँ पश्चिम स्वयं को सार्वभौमिक सिद्ध करने में अटकने लगा, वह पश्चिम की सीमाओं को उजागर करने वाले बाह्य-आंतरिक बिंदु के रूप में मौजूद रहा। 

लेकिन इस युद्ध ने विचित्र रूप से सब उलटफेर कर दिया है। यदि इसे केवल सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में पढ़ा जाए, तो संभव है कि हम उसके कईं, अधिक निर्णायक पहलू को खो दें।

इसे एक दूसरी भाषा में, हम अपना अंतहीन विस्तार चाहने वाले जुएसॉंस (jouissance) की राजनीतिक प्रवृत्तियों और शांति और स्थिरता की homeostasis की राजनीति की प्रवृत्तियों के बीच के तनाव के रूप में भी देख सकते हैं । यहाँ jouissance का अर्थ वह जिद, विस्तार और ऐतिहासिक नियंता बनने की राजनीति है जो स्वयं को सार्वभौमिक बनाने की ओर प्रवृत्त होती है। इसके विपरीत homeostasis उस संतुलन, सीमांकन और अस्तित्वगत स्थिरता का नाम है, जो व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश करती है। 

इस अर्थ में संघर्ष केवल सांस्कृतिक पहचान का नहीं रह जाता; वह उस प्रश्न का रूप ले लेता है कि विश्व किस प्रकार की ऐतिहासिक ऊर्जा पर संगठित होगा। यह विभाजन न तो अपने में पूर्ण है और न ही नैतिक है। संभव है कि इसकी रूपरेखा में कुछ अधिक आदर्शवाद झलकता हो।

पर हम इसे बीसवीं शताब्दी की उस पुरानी प्रतिद्वंद्विता के एक नए रूप के रूप में देख सकते हैं जिसे कभी साम्राज्यवाद और समाजवाद के बीच के प्रमुख अन्तर्विरोध के रूप में विवेचित किया जाता था।

इसीलिये, अब प्रश्न यह नहीं है कि नई विश्व-व्यवस्था कितनी सुंदर होगी। प्रश्न यह है कि क्या इस दरार से नए प्रमाता पैदा होंगे। क्या गरीब और परिधीय देश इस खुले हुए इतिहास में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराएँगे। क्या वे केवल नए ध्रुवों के ग्राहक बनेंगे या स्वयं विश्व की पुनर्गणना में भाग लेंगे।

फुकुयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की थी। हंटिंगटन ने संघर्ष के स्थायी भूगोल की कल्पना की थी। इस युद्ध ने दोनों को एक साथ चुनौती दी है।

इतिहास समाप्त नहीं हुआ। सभ्यताओं की रेखाएँ भी अंतिम सिद्ध नहीं हुईं। विश्व फिर से एक खुले समुच्चय की तरह सामने आया है।

ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध का सबसे बड़ा निचोड़ यही नहीं कि किसने किसे हराया। उसका सबसे बड़ा निचोड़ यह है कि कोई भी शक्ति इतिहास को अंतिम रूप नहीं दे सकती। 

यहां रीयल ने इतिहास को कोई दिशा नहीं दी है, उसने केवल यह सिद्ध किया कि इतिहास अभी समाप्त नहीं हुआ था । 

इतिहास का अर्थ तभी बनता है जब वह बंद न हो। 

इतिहास फिर से खुल गया है।








गुरुवार, 11 जून 2026

पश्चिम बंगाल के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम पर एक टिप्पणीः

 −अरुण माहेश्वरी



पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद जिस तेजी से उसके राजनीतिक निष्कर्ष घोषित किये जा रहे हैं, वे स्वयं राजनीति के बारे में हमारी समझ के संकट के उदाहरण प्रतीत होते हैं। चुनावी परिणामों के तुरंत बाद अनेक टिप्पणीकारों और विपक्षी नेताओं ने लगभग उत्सवधर्मी अंदाज़ में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का समाधि-लेख लिखना शुरू कर दिया। यह मान लिया गया कि सत्ता परिवर्तन केवल सरकार का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग का अंत है।

लेकिन राजनीति की विडंबना यही है कि वह बार-बार उन लोगों को झुठलाती है जो उसे किन्हीं अंतिम रूपों में बाँधना चाहते हैं।

तथ्यों को देखें तो पता चलेगा कि तस्वीर इतनी सरल नहीं, बल्कि कहीं ज्यादा जटिल है। तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई है, लेकिन उसे मिला लगभग 41 प्रतिशत मत कोई मामूली अवशेष नहीं कहा जा सकता। यह किसी ऐसे सामाजिक-राजनीतिक आधार का संकेत भी है जो चुनावी हार के बावजूद तत्काल समाप्त नहीं हुआ करता है, यदि पराजित शक्ति ने आत्म-हत्या का रास्ता न चुन लिया हो। 

इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है कि पश्चिम बंगाल में परिणाम आने के बाद जो दृश्य सामने आया, उसमें चुने हुए विधायकों के एक हिस्से ने विभिन्न कारणों से नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह का रास्ता चुना; विपक्ष के नेता के चयन को लेकर विवाद खड़ा हुआ; अनेक नेताओं पर कार्रवाई, गिरफ्तारियों और राजनीतिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए; दिल्ली में संसदीय दल के टूटने और बड़ी संख्या में सांसदों के अलग होने की चर्चाएँ चलीं; और इसके चलते ही आम स्तर पर यह धारणा फैलने लगी कि अब तृणमूल केवल औपचारिक अस्तित्व भर रह जाएगी।

लेकिन गौर करने की बात है कि इसी बिंदु पर यहां की राजनीति ने फिर अपना दूसरा चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है।

जब अधिकांश लोग बंगाल के मैदान में तृणमूल की अंतिम पराजय का दृश्य देख रहे थे, उसी समय ममता बनर्जी ने संघर्ष का केंद्र ही बदल दिया है। उन्होंने राज्य की तत्कालीन शक्ति-संरचना के भीतर सीमित लड़ाई के बजाय राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में नए संयोजन की संभावना तलाशनी शुरू कर दीं। कांग्रेस के साथ संवाद, इंडिया ब्लॉक के मंच पर सक्रियता, और राष्ट्रीय विपक्षी धुरी में अपने लिए नई जगह बनाने की कोशिश—इन सबसे यही संकेत मिला कि राजनीति हमेशा उसी जगह नहीं लड़ी जाती जहाँ हार दिखाई देती है।

इसा बिंदु को हम यदि गणित के आधुनिक समुच्चय सिद्धांत (set theory) के रचयिता जॉर्ज कैंटर और हमारे समय के सबसे बड़े दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के विचारों की रोशनी में देखें तो बात और स्पष्ट हो जाती है।

कैंटर ने बताया था कि कोई भी समुच्चय अपनी वर्तमान गणना से समाप्त नहीं हो जाता। उसके भीतर उपसमुच्चयों (subsets) और संबंधों की अनंत संभावनाएँ होती हैं। बाद्यू ने राजनीति को इसी अनेकता का क्षेत्र माना। कोई भी भुवन (world) वस्तुओं का स्थिर संग्रह नहीं होता है बल्कि उपस्थितियों की एक ऐसी संरचना होता है जिसमें कुछ तत्वों को अधिक दृश्यता और कुछ को न्यून दृश्यता प्राप्त होती है। किसी भी भुवन में जो उपस्थित है, वही संपूर्ण नहीं होता; उसके भीतर ऐसी संभावनाएँ भी रहती हैं जिन्हें वर्तमान सत्ता-दृष्टि गिनती में शामिल नहीं कर पाती है।

इस दृष्टि से तृणमूल की पराजय को उसका अंत मान लेना राजनीति को समुच्चयों की गतिशील अनेकता के बजाय वर्तमान गणना के स्थिर परिणाम में सीमित कर देना है। यह वही दृष्टि है जो किसी समुच्चय की किसी एक आकृति को ही पूरा समुच्चय मान लेती है। आकृति को समुच्चय मान लेना ही हर विश्लेषण की मूलभूत भूल होती है; क्योंकि समुच्चय संभावनाओं का क्षेत्र है और आकृति उसकी किसी विशेष ऐतिहासिक अभिव्यक्ति का नाम।

पश्चिम बंगाल के इस पूरे उभरते हुए दृश्य में हमें सबसे विचित्र स्थिति वामपंथ की दिखाई देती है।

बंगाल का वाम, जो हमेशा इतिहास की लंबी दृष्टि और संरचनात्मक विश्लेषण का दावा करता रहा है, इस पूरे प्रसंग में कई बार एक अजीब अनुभववाद में फँसा दिखाई देता है। उसका एक हिस्सा मानो इस विश्वास में ही फंसा हुआ है कि तृणमूल का पतन अपने आप उसके लिए राजनीतिक रिक्त स्थान बना देगा। “पहले राम, बाद में वाम” जैसी राजनीतिक मनोवृत्ति—अर्थात पहले वर्तमान प्रतिद्वंद्वी का अंत हो, आगे की राजनीति बाद में देखी जाएगी—वास्तव में राजनीति को एक यांत्रिक क्रम में बदल देती है।

इसीलिये हमें, वाम की समस्या केवल रणनीतिक नहीं, ज्ञानमीमांसात्मक भी लगती है।

कल ही हम बंगाल में सीपीएम के सचिव मोहम्मद सलीम का एक साक्षात्कार सुन रहे थे । वे उसमें जिस प्रकार राजनीति को ‘ऊपर वालों और जमीन वालों’ में विभाजित करके कह रहे थे कि दिल्ली में लोग जितनी भी ऊंची बात कर लें, पर जमीनी अनुभव बिल्कुल अलग है । इससे लगता था मानों उनके लिए सांप्रदायिक फासीवाद की चुनौती केवल दिल्ली की उच्च राजनीति का विषय है और स्थानीय असंतोष अंततः स्वतः वाम की वापसी का कारण बन जायेगा। ‘पहले राम बाद में वाम’ के स्थानीय रूझान में मूलतः यही समझ प्रतिध्वनित होती है ।   

हमारी नजर में यह समुच्चय की राजनीति नहीं, एक प्रकार से रिक्त स्थान की राजनीति है। समुच्चय में रिक्त स्थान कभी रिक्त नहीं रहता है।

बंगाल के पिछले डेढ़ दशक का अनुभव भी यही बताता है। 2011 के बाद से वाम का मताधार लगातार सिकुड़ता गया और 2026 में भी उसमें कोई निर्णायक सुधार नहीं दिखा। यह केवल संगठन की समस्या नहीं; राजनीतिक दृश्यता की समस्या भी है। यदि कोई शक्ति स्वयं को केवल दूसरे की विफलता के सहारे पुनर्स्थापित करना चाहती है, तो वह अपने लिए नए प्रमाता, नए सत्य और नए गठबंधन की खोज छोड़ देती है।

वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि इसमें विडंबना यह हो सकती है कि जो शक्ति अब तक क्षेत्रीय मानी जाती थी, वह संकट की स्थिति में राष्ट्रीय गठबंधनों के माध्यम से अपना दायरा बढ़ा लें; और जो शक्ति स्वयं को ऐतिहासिक-वैचारिक केंद्र मानती रही, वह आगे और सिकुड़ते हुए अपने अनुशासित कैडरों के छोटे दायरे में ही सिमट जाए।

यह कोई भविष्यवाणी नहीं है। क्योंकि, राजनीति कभी बंद समुच्चय नहीं होती। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने ममता बनर्जी का समाधि-लेख लिख दिया, वे राजनीति को स्थिर चित्र की तरह पढ़ रहे हैं। और जो लोग तृणमूल के समाधि-स्थल पर वाम के पुनर्जन्म का स्वप्न देख रहे हैं, वे भी उसी भूल के दूसरे रूप में फँसे हुए हैं।

राजनीति का सत्य न तो टीवी की रनिंग कमेंट्री में मिलता है, न चुनावी जीत या लूट के उत्सव में। वह उन संबंधों के पुनर्गठन में प्रकट होता है जिन्हें पहले असंभव माना जाता था।

और शायद बंगाल का यह क्षण फिर एक बार हमें यही याद दिला रहा है कि राजनीति में असंभव नाम की कोई श्रेणी नहीं है; उसमें केवल ऐसी संभावनाएँ होती हैं जिन्हें वर्तमान अभी देख नहीं पा रहा होता है। 

बंगाल में विधायकों का टूटना, नेताओं पर मुक़दमे, संसदीय दल में विद्रोह की अफ़वाहें, विपक्षी नेता के चयन का विवाद, दिल्ली में नए गठबंधन—ये सब भी किसी “अंतिम सत्य” के तथ्य नहीं हैं; ये भुवन की पुनर्गणना (re-counting) की प्रक्रियाएँ हैं। 

भुवन की पुनर्गणना की प्रक्रिया, अर्थात् जिसमें वही तत्व नई आकृति ग्रहण करते हैं और पुराने समुच्चयों के बीच संबंध बदल जाने से नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। यह इस बात की पुनर्गणना नहीं कि कितने बचे; यह पुनर्गणना है कि अब कौन किसके साथ गिना जाएगा।यद्यपि भुवन की पुनर्गणना अपने-आप में घटना (event) नहीं होती, पर वह ऐसी अस्थिरता का निर्माण कर सकती है जिसमें कोई नया सत्य प्रकट हो और उसके साथ उसके वाहक प्रमाता का जन्म संभव हो।

 



बुधवार, 3 जून 2026

सारस्वत साधना के पक्ष में –

 

−अरुण माहेश्वरी



इधर हमने राधावल्लभ त्रिपाठी जी के भारतीय ज्ञान परंपरा पर यू ट्यूब पर कई वक्तव्यों को सुना । खुद त्रिपाठी जी जिस परंपरा को अपनी किताब में “भारत की सारस्वत साधना” कहते हैं, अब वे अभी की धारा में बहते हुए उसके ‘ज्ञान मीमांसक’ पर चर्चा में लग गये हैं और इस परंपरा के कथित विउपनिवेशीकरण की चिंता में भी शामिल हो गये हैं ।  

दरअसल, त्रिपाठी जी की विशेषता है कि वे अपने वक्तव्यों में यूँ तो आम तौर पर काफी निर्लिप्त भाव से विषय का यथासंभव परिचय कराते हैं, किन्हीं प्रचलित धारणाओं को अनावश्यक रूप से चुनौती नहीं देते। परंतु उनकी पुस्तक की संरचना पर गौर करने से लगता है कि वे सूक्ष्म रूप से वर्तमान ज्ञान-चर्चा से अपने को थोड़ा अलग रख रहे हैं। 

हमारी समझ में, ज्ञान मीमांसा (Epistemology) और सारस्वत साधना एक नहीं हैं । इनमें एक सूक्ष्म, पर गहरा भेद है । यह कुछ वैसा ही भेद है जो ज्ञान की संरचना और ज्ञान के प्रस्फुटन के बीच का भेद होता है। एक में ज्ञान विषय (object) के रूप में विश्लेषित होता है, दूसरे में वह प्रमाता की चेतना के रूप में साधित होता है। 

ज्ञान मीमांसा में प्रश्न होता है कि ज्ञान क्या है, कैसे उत्पन्न होता है, उसका प्रमाण क्या है? यहाँ ज्ञान एक वस्तु (object) है, जिसका अध्ययन किया जाना है । जैसे हमारा न्याय दर्शन करता है और कांट अपने   ‘Critique of Pure Reason’ में तत्त्वमीमांसा की सीमाओं और संभावनाओँ को अध्ययन का विषय बना कर करते हैं । यहाँ प्रमाता स्वयं भी विश्लेषण का विषय बन सकता है।

पर सारस्वत साधना का सवाल यह नहीं है कि ज्ञान क्या है। यह स्वयं को उस स्थिति में ले जाती है जहाँ से ज्ञान स्वतः प्रवाहित होता है। यह ज्ञान को विषय नहीं, बल्कि चेतना की शक्ति (चिति-शक्ति) मानती है। यहाँ प्रश्न है कि कोई उस स्रोत तक कैसे पहुँचे जहाँ से वाणी और ज्ञान उत्पन्न होते हैं? 

ज्ञान मीमांसा मस्तिष्क का एक बौद्धिक अनुशासन, विश्लेषणात्मक, तार्किक कार्य है। सारस्वत साधना चित्त का परिष्करण, संवेदनशीलता का विकास और मौन का अनुशासन, चिति का कार्य है। इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का विश्लेषण है तो सारस्वत साधना ज्ञान का अवतरण ।

जैसे अभिनवगुप्त के शब्दों में वाक् साध्य नहीं, सिद्ध है, उसे केवल अवरोधों से मुक्त करना होता है। ज्ञान मीमांसा भाषा को चिह्नों, प्रतीकों, प्रतिनिधित्व के रूप में देखती है जबकी सारस्वत साधना उसे स्फोट के रूप में जहाँ शब्द प्रकट नहीं होता बल्कि फूटता है । 

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ज्ञान मीमांसा प्रमाता का अध्ययन करती है जबकि सारस्वत साधना प्रमाता का रूपांतरण । ज्ञान मीमांसा में ज्ञान लक्ष्य है सारस्वत साधना में परिणाम । इसमें लक्ष्य है प्रमाता की वह स्थिति जहाँ ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता है। ज्ञान मीमांसा प्रमाण का अध्ययन है और सारस्वत साधना प्रमाता की प्रत्यभिज्ञा । 

इसे यदि हम लकानियन पदावली में समझे तो पायेंगे कि ज्ञान मीमांसा विश्वविद्यालयी विमर्श (University discourse) है, जबकि सारस्वत साधना विश्लेषक का विमर्श (Analyst discourse) जहाँ ज्ञान दिया नहीं जाता, बल्कि ज्ञान उत्पन्न होने की स्थिति निर्मित की जाती है । हम जिस बात को "प्रमाता से अनीहा क्यों?" के सवाल के साथ उठाना चाहते हैं, वह भी कहा जा सकता है कि सारस्वत साधना का ही आधुनिक दार्शनिक रूप है क्योंकि हमारा जोर ज्ञान के सिद्धांत पर नहीं प्रमाता की संरचना पर हैं। 

इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान को जानती है, सारस्वत साधना ज्ञान को जन्म देती है । 

राधावल्लभ जी ने भारतीय ज्ञान चर्चा को शंकर के वेदांत अथवा बौद्ध दर्शन की सीमाओं को पार कर पाणिनी, कौटिल्य, वात्स्यायन, भरतमुनि, भृतहरि से लेकर आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, पण्डितराज जगन्नाथ से होते हुए गोपीनाथ कविराज, रामावतार शर्मा, रेवाप्रसाद द्विवेदी तक का जो विस्तार दिया है, वह ज्ञान के सत्य के असीम-अनंत शाश्वत रूपों की निरंतरता से जुड़ने का उपक्रम हैं न कि उसे कोरा विश्वकोशों के स्तंभों में समेटने का । 

“ज्ञान मीमांसा ज्ञान का अध्ययन है।” जब हम यह कहते हैं तो जाहिर है कि प्रमाता स्वयं यहाँ एक तटस्थ पर्यवेक्षक (observer) के रूप में आता है। भारतीय न्याय दर्शन से लेकर कांट तक यही संरचना है। जब हम ज्ञान को प्रमाता का गुण मान लेते हैं तब स्वयं प्रमाता हमारे सवालों के दायरे के बाहर हो जाता है। इसी में ज्ञान मीमांसा की सीमा निहित है।

जब हम कहते हैं कि “सारस्वत साधना ज्ञान का साधन है।” तब यहाँ पूरा परिप्रेक्ष्य बदल जाता है। ज्ञान यहाँ object नहीं है। ज्ञान यहाँ प्रमाता की चेतना की अवस्था है। इसलिए सारस्वत साधना का प्रश्न है: प्रमाता किस स्थिति में ज्ञान का स्रोत बनता है? यहाँ ज्ञान अर्जित नहीं अवतरित होता है। हम पुनः दोहरायेंगे, ज्ञान मीमांसा में ज्ञान लक्ष्य है, सारस्वत साधना में ज्ञान परिणाम है।

दोनों के बीच यह भेद अत्यंत निर्णायक भेद है। ज्ञान मीमांसा में ज्ञान साध्य है, सारस्वत साधना में एक चर्वणा का महज सह-उत्पाद । इस चर्वणा का लक्ष्य है: प्रमाता की वह संरचना जहाँ ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता है।

“ज्ञान मीमांसा प्रमाता की संरचना का विश्लेषण करती है; सारस्वत साधना प्रमाता की संरचना में हस्तक्षेप करती है।”

यहाँ पहली बार प्रमाता स्वयं प्रश्न बन जाता है। ज्ञान मीमांसा प्रमाता को प्रदत मानती है। सारस्वत साधना उसे प्रक्रिया । अभिनवगुप्त का प्रत्यभिज्ञा दर्शन इसी बिंदु पर निर्णायक है। प्रमाता स्थिर सत्ता नहीं बल्कि अन्य के अभिज्ञान से लगातार अस्थिर चिति की गतिशीलता है। 

जब हम कहते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञान का संग्रह है, भारतीय सारस्वत साधना ज्ञान का स्रोत है, तो तात्पर्य होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा शास्त्रों में है; सारस्वत साधना चेतना में है। शास्त्र ज्ञान नहीं ज्ञान का अक्स है। अभिनवगुप्त स्पष्ट कहते हैं: शास्त्र ज्ञान उत्पन्न नहीं करता, ज्ञान प्रमाता में प्रकट होता है।

जब हम कहते हैं कि ज्ञान मीमांसा भाषा को चिन्ह मानती है, सारस्वत साधना भाषा को स्फोट मानती है, तब ज्ञान मीमांसा भाषा को प्रतिनिधित्व मानती है। इसके बजाय सारस्वत साधना में भाषा को प्रकाश का प्रस्फुटन माना जाता हैं। शब्द चिह्न नहीं शक्ति है।

ज्ञान मीमांसा विश्वविद्यालयी विमर्श है और सारस्वत साधना विश्लेषक का विमर्श (Analyst discourse) है। यह एक लकानियन समझ है जिसमें जॉक लकान के अनुसार ज्ञान मीमांसा का संस्थागत रूप विश्वविद्यालयी विमर्श की ओर झुकता है; सारस्वत साधना विश्लेषक-विमर्श की तरह उस बिंदु की खोज करती है जहाँ प्रमाता स्वयं अपनी संरचना से विचलित होता है। इस प्रकार, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का उत्पादन करती है तो सारस्वत साधना प्रमाता का । 

यहां एक सबसे निर्णायक सूत्र आता है कि ज्ञान मीमांसा ज्ञान को जानती है, सारस्वत साधना ज्ञान को जन्म देती है। ज्ञान मीमांसा ज्ञान का ज्ञान है (knowledge of knowledge) पर सारस्वत साधना में ज्ञान एक सृजन है । यहाँ प्रमाता सर्जक होता है। हमारे अभिनवगुप्त इसी  सारस्वत साधना के दार्शनिक हुए हैं, इसीलिये हम उन्हें आधुनिक मनोविश्लेषकों की श्रेणी में रख कर विचार का विषय बनाते हैं । उनका पूरा कार्य ज्ञान मीमांसा नहीं, सारस्वत साधना का दर्शन है। उनके लिए ज्ञान प्रमाता की स्वातन्त्र्य शक्ति है। ज्ञान अर्जित नहीं अभिज्ञात है। प्रत्यभिज्ञा ज्ञान मीमांसा नहीं तात्विक जागृति है। 

जॉक लकान भी आधुनिक सारस्वत साधना के दार्शनिक है, इसीलिये उन्हें कार्ल मार्क्स की तरह ही हम गैर-दार्शनिक दार्शनिकों की श्रेणी में रखते हैं । लकान का पूरा मनोविश्लेषण ज्ञान का सिद्धांत है, प्रमाता का रूपांतरण जैसे मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत और सर्वहारा के रूप में समाज के हरावल दस्ते का निर्माण है । मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में उस ऐतिहासिक प्रमाता की खोज है जो मनुष्य को उसके पराधीन सामाजिक रूपों से मुक्त कर स्वतंत्र मनुष्य (free man) की स्थिति तक ले जाता है; यह स्थिति अभिनवगुप्त के भैरव भाव की तरह किसी स्थिर सार की नहीं, बल्कि स्वातन्त्र्य की सक्रिय अवस्था है। इसीलिये मार्क्स का सर्वहारा वर्ग नहीं, स्वतंत्र प्रमाता है ।

लकान कहते हैं: सत्य को सिखाया नहीं जा सकता, उसे सिर्फ उत्पन्न किया जा सकता है (truth cannot be taught it can only be produced) । लकान की विश्लेषणात्मक प्रक्रिया, ट्रांसफरेंस (आनयन), और ‘प्रमाता को पता हो’ (subject supposed to know) की उनकी धारणा अनायास ही उसे सारस्वत साधना से जोड़ती है।

अपनी पुस्तकों, “अथातो चित्त जिज्ञासा”, “प्रमाता का आवास”,“प्रमाता से अनीहा क्यों” आदि में हमने सचेत रूप से उन्हें ज्ञान मीमांसा की पुस्तक बनने से बचाने की कोशिश की हैं। वहां ज्ञान का संग्रह नहीं, फ्रायडियन- लकानियन मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के आलोक में भारतीय चिंतन के तंत्र साहित्य, शैवमत और खास तौर पर अभिनवगुप्त की चर्वणा से एक आधुनिक भारतीय मनोविश्लेषण की दृष्टि पाने की कोशिश है । इस अर्थ में वे वर्तमान काल की सारी विसंगतियों में एक नये प्रमाता की संरचना को उद्घाटित करने का प्रयास हैं। उनमें उपलब्ध ज्ञान का विश्लेषण नहीं प्रमाता का प्रकटीकरण है। 

कुल मिला कर, ज्ञान मीमांसा ज्ञान का विज्ञान है सारस्वत साधना ज्ञान का जन्मस्थान है और कह सकते हैं कि प्रमाता उन दोनों के बीच का गुप्त सेतु।

इसी संदर्भ में हम आगे, जब संभव हुआ, कुछ चर्चा ‘ज्ञान के विउपनिवेशीकरण’ की धारणा पर भी करना चाहेंगे, जिसे लेकर हमारे सामने बहुत गहरी समस्याएं हैं ।