शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

बंगाल-चुनाव के मध्य वामपंथ पर एक क्षण

- अरुण माहेश्वरी



बंगाल में वाम के उम्मीदवारों और प्रचार को देखते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि जैसे भारतीय वामपंथ ने भीतर ही भीतर मान लिया है कि भारत अब एक विकसित, स्थिर और लगभग अंतिम रूप ले चुकी सामाजिक संरचना है—जहाँ नेतृत्व का प्रश्न किसी वर्गीय उभार या सामाजिक विघटन से नहीं, बल्कि एक पढ़े-लिखे, प्रखर वक्ता से हल हो सकता है।

ऐसी समझ उसी बिंदु पर पर्दा डाल देती है जहाँ से राजनीति का वास्तविक सत्य फूटता है। समाज को “पूर्ण” मानते ही उसकी हर संभावित दरार नकार दी जाती है—और राजनीति सत्य की खोज नहीं, ज्ञान की पुनरावृत्ति बन जाती है; ऐसी भाषा, जो सब कुछ जानती है, पर कुछ नया घटित नहीं करती।

यही कारण है कि जहाँ कभी कम्युनिस्ट आंदोलन का नेतृत्व मज़दूर और किसान आंदोलनों की भट्ठी में तपकर निकलता था—जहाँ व्यवस्था अपने ही नियमों में टूटती थी—वहीं आज उसकी जगह छात्र आंदोलन ने ले ली है। यह केवल सामाजिक आधार का परिवर्तन नहीं, सत्य के स्रोत का परिवर्तन है।

मज़दूर और किसान आंदोलन वे स्थल थे जहाँ अदृश्य वर्ग स्वयं को दृश्य बनाता था, जहाँ वह बोलता था जिसे बोलने का अधिकार नहीं था। वहीं से राजनीति में धार आती थी। छात्र आंदोलन जब तक इन स्थलों से जुड़ा रहता है, वह इस धार को ग्रहण करता है; पर अपने तक सीमित होते ही वह भाषा का खेल बन जाता है—सत्य नहीं, उसकी नकल पैदा करता है।

इसीलिए वर्गीय संगठनों में तपकर निकला नेतृत्व जन-सेवा से वैधता अर्जित करता था, जबकि आज का छात्र नेता वाग्-वीरता और पार्टी चैनल से उभरता है। यह मामूली फर्क नहीं है। एक ओर वह नेतृत्व है जो दीर्घ प्रतिबद्धता और अनुशासन से बना है; दूसरी ओर वह, जो भाषा की तीक्ष्णता से चमकता है, पर जिसके पीछे कोई जीवित सामाजिक प्रक्रिया नहीं होती।

यहीं से संकट शुरू होता है। छात्र नेता कमेटियों पर क़ाबिज़ हो जाते हैं—जनता पर नहीं। पार्टी की आंतरिक संरचना उन्हें जगह दे देती है, पर समाज नहीं। क्योंकि प्रतिनिधित्व वहाँ से आता है जहाँ व्यवस्था टूटती है, न कि जहाँ वह दोहराई जाती है।

इस विच्छेद के संकेत हम पहले भी देख चुके हैं—1996 में ज्योति बसु प्रकरण और 2008 की परमाणु संधि पर ‘प्रकाश करात परिघटना’ उसी दूरी के लक्षण थे।

तभी पार्टी के भीतर क्रांति की बातें जितनी बढ़ती हैं, जनता से दूरी उतनी ही बढ़ती जाती है। भाषा और यथार्थ के बीच उल्टा अनुपात बन जाता है—जितनी अधिक “क्रांति” बोली जाती है, उतनी ही कम वह दिखाई देती है। क्रांति एक जीवित प्रक्रिया नहीं, एक भाषिक मुद्रा बन जाती है—जो वास्तविक संघर्ष की अनुपस्थिति को ढँकती है।

इसका परिणाम केवल चुनावी पराजय नहीं, प्रतिनिधित्व का क्षय है। पार्टी बहुलता को समेटने के बजाय सिकुड़ने लगती है और धीरे-धीरे मठ में बदल जाती है—जहाँ दीया-बत्ती और प्रवचन तो हैं, पर जीवन नहीं।

यही कारण है कि आज यह सुनकर आश्चर्य नहीं होता कि सीपीआईएम को “मीनाक्षियों की पार्टी” कहा जाने लगा है। जब किसी पार्टी की पहचान संघर्ष से नहीं, छवि से बनने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसका स्रोत बदल चुका है।

और फिर वह दृश्य—वयोवृद्ध विमान बसु अपने छात्र उम्मीदवारों के साथ “दादूर संगे शहर भ्रमण” करते हुए। दृश्य ममतामय है, आकर्षक भी। पर राजनीति वहाँ नहीं जन्म लेती जहाँ हाथ पकड़कर चलाया जाता है; वह वहाँ जन्म लेती है जहाँ लोग खुद चल पड़ते हैं।

इसलिए अंततः प्रश्न वहीं लौट आता है—मतदाता ऐसे उम्मीदवारों को कितना अपनाएंगे? यही इस पूरे क्षण का सबसे सच्चा बिंदु है।

यहीं तय होगा कि क्या वामपंथ फिर से उस स्रोत से जुड़ सकता है जहाँ से उसका सत्य कभी फूटा था, या वह अपनी ही भाषा और संरचना में सिमट जाएगा।

जन पार्टी और क्रांतिकारी पार्टी की अभाज्यता कोई संगठनात्मक सूत्र नहीं है। वह तभी संभव है जब दोनों का स्रोत एक हो—जब प्रतिनिधित्व उसी जगह से निकले जहाँ से प्रतिरोध जन्म लेता है।

जब तक यह संबंध नहीं जुड़ता, एक ओर क्रांति की भाषा होगी, दूसरी ओर जनता की चुप्पी—और यही दूरी हमारी राजनीति की असली त्रासदी है।



9 टिप्‍पणियां:

  1. सारगर्भित टिप्पणी!

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  2. विजयशंकर चतुर्वेदी24 अप्रैल 2026 को 11:26 pm बजे

    यह लेख एक गहरी चेतावनी है: वामपंथ का संकट चुनावी नहीं, स्रोत का संकट है। जब राजनीति का स्रोत जीवित सामाजिक संघर्षों से हटकर केवल भाषिक कौशल और संगठनीय पुनरावृत्ति में बदल जाता है, तब प्रतिनिधित्व खोखला हो जाता है।
    आपकी पंक्ति—“जहाँ व्यवस्था टूटती है, वहीं से प्रतिनिधित्व जन्म लेता है”—पूरे लेख का केन्द्रीय सत्य है।
    दरअसल, वाम की समस्या यह नहीं कि वह बोल नहीं रहा, बल्कि यह कि जहाँ से उसे बोलना चाहिए, वहाँ से उसका संबंध टूट रहा है।

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  3. NCR और उसके आसपास के क्षेत्रों में मजदूर वर्ग का गुस्सा स्वतः स्फूर्त रूप से फूट पड़ा है. उसकी ताकत इतनी है कि यदि राज्य की शक्ति ने उनका रास्ता न रोका होता तो वे पूंजीपतियों से निपट लेते. मजदूर वर्ग का संघर्ष आज इसी कारण राजनैतिक हो चला है उन्हें एक ट्रेडयूनियन से अधिक एक पार्टी की जरूरत है. कोई पार्टी वहाँ पहुँचे, उन्हें दीक्षित करें और उनके संगठन को मजदूर वर्ग की पार्टी में तब्दील करने का काम करें. पार्टियों को चुनावी पार्टियाँ बना देने से वे नष्ट ही होंगी.

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