−अरुण माहेश्वरी
भारत के सीजेआई सूर्यकांत ने बेरोजगार नौजवानों के लिए ‘काकरोच’ शब्द का प्रयोग करके अनजाने में एक नए राजनीतिक नामकरण की जमीन तैयार कर दी । यह नामकरण नहीं बल्कि फ्रैंज काफ्का के कायांतरण का ही पुनर्कायांतरण है। काफ्का में कायांतरण अस्तित्वगत त्रासदी था; यहाँ वही रूपांतरण राजनीतिक प्रतिप्रत्यय (reversal) बन जाता है। अर्थात् जिसे व्यवस्था “कीट” कहती है, वही सत्य का वाहक बनता है। काफ्का ने विश्वयुद्धों की त्रासदी में फंसे मनुष्यों की विडंबना को तुच्छ कीट में रूप में देखा था । सीजेआई ने फासीवादी सत्ता के जोम में उसी जीव को राजनीति के सत्य के प्रमाता में कायांतरित कर दिया ।
काकरोच! स्थापित मानव पहचान के सब रूपों से परे राजनीति के सामान्य सत्य का प्रमाता जो किसी जाति, धर्म, भाषा या वर्ग का नहीं है, जो व्यवस्था की घृणा का ऐसा पात्र है जो हर दमन के बाद फिर लौट आता है, और जिसे पूरी तरह समाप्त कर पाना असंभव होता है। इसीलिये अब वह केवल अपमानसूचक शब्द नहीं है । वह राजनीतिक सत्य की प्रमात्रिकता (subjectivity) का एक नया नाम है।
ऐलेन बाद्यू के दर्शन में “राजनीतिक सत्य” का प्रमाता न तो केवल एक नागरिक होता है, न किसी समुदाय का प्रतिनिधि, न किसी जातीय, धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का वाहक। वह उस सत्य-प्रक्रिया का धारक-वाहक होता है जो स्वयं समुदायों, पहचानों और स्थापित वर्गीकरणों की सीमाओं को तोड़ती है। और जब कोई प्रमाता किसी राजनीतिक सत्य का प्रमाता बनता है, तब वह अपने को हर पूर्व-निर्धारित पहचान से विस्थापित कर देता है। इस मायने में उसकी भूमिका मूलतः “विस्थापनकारी” (displacing) होती है।
जहां तक राजनीतिक सत्य का सवाल है, वह इतिहास के भीतर पैदा होता है, लेकिन वह इतिहास से निःसृत या अलग नहीं होता। इतिहास उसका भुवन (world) होता है, उसका आधार नहीं। यह ठीक वैसे ही है जैसे गणित का सत्य केवल उसकी भाषा से पैदा नहीं होता, कला का सत्य केवल प्रतीकों से नहीं निकलता, वैसे ही राजनीति का सत्य केवल संस्कृति, परंपरा और पहचान की सीमाओं से नहीं निकलता। वह एक घटना (event) के रूप में स्फुटित होता है — ऐसी घटना, जो राज्य और समाज की स्थापित गिनती में एक छेद पैदा करती है।
ऐलेन बाद्यू के लंबे अर्से से एक राजनीतिक मित्र रहे सिल्वैन लाजारस (Sylvain Lazarus) जो खुद फ्रांस में एक बड़े समाजशास्त्री और राजनीतिक सिद्धांतकार के रूप में ख्यातिलब्ध रहे, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है Anthropology of the Name (नाम का मानव विज्ञान) लाजारस ने इस पुस्तक में राजनीतिक नामों और वर्गीकरणों की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण किया है। इतिहास में कैसे राजनीतिक सत्य का प्रमाता किसी नए नाम से अवतरित होता रहा है! जैसे जन-विद्रोही स्पार्टा, फ़्रांसीसी क्रांति के “साँ-क्यूलोत” (sans-culottes), (कुलीनता-विरोधी जन), भारत के अछूत, अमेरिका के काले और आज की दुनिया के एलजीबीटी प्लस भी । ये नाम केवल सामाजिक श्रेणियाँ नहीं है; ये खास क्षण के राजनीतिक सत्य के वाहक के नाम हैं। इतिहास और अकादमिक चिंतन के लिए यह विश्लेषण निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन दर्शन के लिहाज से राजनीतिक सत्य का वास्तविक प्रमाता ऐसी किसी भी स्थायी पहचान में सीमित नहीं रह सकता है। वह हर नाम को पार कर जाता है; हर भुवन में लौट-लौट कर आता है । कोकरोच हमें इस सत्य का सबसे उपयुक्त नाम प्रतीत होता है । हम देखेंगे कि बहुत जल्द ही इसे एक दार्शनिक श्रेणी के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिलेगी ।
यहां “काकरोच” का रूपक एक नया अर्थ ग्रहण कर रहा है। वह किसी जैविक जीव का नाम नहीं रह जाता; वह उस प्रमाता का नाम बन जाता है जिसे राज्य और अभिजन राजनीति अपनी गिनती से बाहर फेंक देना चाहती है, लेकिन जो हर बार एक नए रूप में लौट आता है। वह व्यवस्था के लिए घृणित हो सकता है, पर राजनीतिक सत्य के लिए सबसे उपयुक्त वाहक है। इस प्रकार “काकरोच” अपमान का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सत्य का नाम बन जाता है जो हर स्थापित पहचान, हर अभिजन नैतिकता और हर राज्य-निर्धारित गिनती को भेद कर उभरता है। यही उसकी सार्वभौमिकता है, और यही उसका भयावह आकर्षण भी।
बाद्यू जब कहते हैं कि राजनीति एक घटना-जनित सत्य-प्रक्रिया है, तब उनका तात्पर्य यह होता है कि यह प्रक्रिया राज्य द्वारा पहले से “गिने जा चुके” सामाजिक वर्गों से पैदा नहीं होती। राज्य समाज को अपनी प्रशासनिक और वैचारिक गिनती में बाँध कर रखता है। पर राजनीतिक घटना हमेशा “गिनती से बाहर” (uncounted) स्थलों से फूटती है। घटना राज्य की गिनती में एक छेद पैदा करती है।
यही कारण है कि आधुनिक राजनीति में कभी-कभी ऐसे उभार दिखाई देते हैं जो पारंपरिक दलगत और वैचारिक संरचनाओं के बाहर से आते हैं। भारत में जब एक ओर चुनावी प्रक्रिया से एक सर्वग्रासी फासीवादी प्रवृत्ति का उभार दिखाई देता है, तो वहीं दूसरी ओर राजनीति के भीतर ऐसे विचित्र और अनपेक्षित उभार भी पैदा होते हैं — जैसा हमने आम आदमी पार्टी या तमिलनाडु में विजय की टीवीके में देखा है। इनका महत्व केवल इनके कार्यक्रमों में नहीं, बल्कि इस तथ्य में भी होता है कि ये राजनीति को केवल राजसत्ता प्राप्ति की मशीन में बदल देने से इंकार करने की संभावना भी खोलते है । इनका महत्व उनके कार्यक्रमों से अधिक उनके अनपेक्षित उभार में है ।
यहीं से राजनीति स्वयं को राज्य से अलग करके सोचने लगती है। ठीक उसी तरह जैसे माओ की “सनातन क्रांति” का विचार इस धारणा पर टिका था कि क्रांति केवल सत्ता पर कब्ज़े की घटना नहीं, बल्कि सत्य की सतत पुनरावृत्ति है।
बाद्यू राजनीति के सत्यों की कुछ सामान्य विशेषताओं की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि हर राजनीतिक सत्य किसी ऐतिहासिक अनुक्रम में प्रकट होता है; हर सत्य का अपना एक प्रमात्रिक रूप (subjective form) होता है। इसलिए रोबेस्पिएर, लेनिन या माओ जैसे “राजसत्तावादी क्रांतिकारी” और स्पार्टाकस, म्युंत्सर या तुपाक अमारू जैसे जन-विद्रोही एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार, सत्य एक नहीं, सत्यों की बहुलता होती है — the multiple of truths।
लेकिन यह बहुलता केवल विचार में नहीं रहती। उसे किसी संगठित भौतिक शरीर (political body) की आवश्यकता होती है। लेनिनवादी पार्टी, लाल सेना, जन-संगठन — ये सब सत्य के उसी निकाय के रूप हैं, जिनके माध्यम से सत्य किसी ऐतिहासिक भुवन में प्रकट होता है।
बाद्यू के अनुसार हर राजनीतिक सत्य के मूल में कुछ उत्समूलक तत्व (generic kernel) होते हैं। इसमें पहला है इच्छा (desire) — सामाजिक-आर्थिक अनिवार्यता और दमन के विरुद्ध उठने की इच्छा। दूसरा है समानता (egalitarianism) — संपत्ति और सत्ता के स्थापित रूपों का निषेध। तीसरा है विश्वास (confidence) — जनता की सामूहिक शक्ति में विश्वास, उस अभिजनवादी संदेह का विरोध जो हमेशा जनता को अक्षम मानता है। और चौथा है रोब या दबदबा (terror) — अर्थात् वह शक्ति जो “मुक्त प्रतिस्पर्धा” के तथाकथित प्राकृतिक नियमों को अंतिम सत्य मानने से इंकार करती है और राज्य की हिंसा को सीधी जन-शक्ति से चुनौती देती है।
इसीलिए “सर्वहारा की तानाशाही” को मार्क्सवादी राजनीति में केवल दमनकारी अवधारणा के रूप में नहीं देखा गया था। वह राजनीतिक सत्य की इन चारों शर्तों को एक ठोस रूप देने का प्रयास था — समता की इच्छा, मजदूर वर्ग की शक्ति में विश्वास, स्थापित संपत्ति-सत्ता की संरचना का विरोध और मजदूर वर्ग की शक्ति के प्रत्यक्ष प्रदर्शन का रूप।
कोकरोच जनता पार्टी इन सब शर्तों को पूरा करेगी या नहीं, हम नहीं जानते । पर इसके गठन के साथ आज की राजनीति में दिखाई दे रहे आलोड़न से इतना साफ है कि भारत का दमित राजनीतिक सत्य अपने नए ऐतिहासिक रूप को पाने के लिए आकुल-व्याकुल है । अहंकारी सीजेआई ने उसकी जमीन तैयार कर दी है । जिस शब्द का प्रयोग अपमान के लिए किया गया था, वही अब एक नए राजनीतिक सत्य के नाम में बदलता दिखाई दे रहा है।
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