रविवार, 24 मई 2026

धरती का जीव होने पर भी “कॉकरोच” को पृथ्वीत्व होना अभी बाकी है


अरुण माहेश्वरी 

  

कॉकरोच जनता पार्टी के बारे में राजनीतिक चर्चाओं में अब यह स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि इस कॉकरोच की आखिर ठोस राजनीतिक पहचान क्या है? भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह चाहती क्या है, और इससे जुड़ रहे लोग भी आखिर इससे क्या उम्मीद रखते हैं?

Slavoj Žižek की पुस्तक The Sublime Object of Ideology में एक लेख का शीर्षक है “Che vuoi?”। इतालवी भाषा के इस वाक्य का शाब्दिक अर्थ है — “आप क्या चाहते हैं?”

जैसा कि हम जानते हैं कि लकानियन मनोविश्लेषण में प्रमाता की इच्छा का अर्थ होता है ‘अन्य की इच्छा । (Other’s desire) । इसीलिये  “Che vuoi?” का अर्थ हो जाता है: “अन्य (the Other) मुझसे क्या चाहता है? लकान के अनुसार मनुष्य की इच्छा कभी पूरी तरह स्वायत्त नहीं होती। हम हमेशा इस प्रश्न से घिरे रहते हैं कि समाज हमसे क्या चाहता है, माता-पिता क्या चाहते हैं, सत्ता क्या चाहती है,  प्रेमी/प्रेमिका क्या चाहते हैं और अंततः “दूसरा” (the Other) हमारी पहचान से क्या अपेक्षा करता है। अर्थात् इससे यह प्रश्न उठ जाता है कि मेरी इच्छा वास्तव में किसकी इच्छा से संचालित है?

यही कारण है कि “Che vuoi?” चिंता (anxiety) से भी जुड़ जाता है। और, जब हमें यह समझ में नहीं आता कि “दूसरा” हमसे क्या चाहता है, तब हममें एक स्वाभाविक बेचैनी पैदा होती है। इस प्रकार, इच्छा हमेशा एक बेचैनी की सबब होती है । 

लकानियन मनोविश्लेषण के अनुसार, बच्चा माँ की दृष्टि में लगातार यह पढ़ने की कोशिश करता है कि माँ मुझसे क्या चाहती है? नागरिक सत्ता से पूछता है कि राष्ट्र मुझसे क्या चाहता है; प्रेम में व्यक्ति पूछता है कि तुम वास्तव में मुझसे क्या चाहते हो? 

इस प्रकार Che vuoi? इच्छा, पहचान, सत्ता और चिंता—इन सबके केंद्र में स्थित प्रश्न होता है। यह केवल एक भाषिक प्रश्न नहीं, विचारधारा के हृदय में स्थित उस खालीपन का नाम होता है जहाँ प्रमाता स्वयं से बराबर पूछता है कि “चाहते क्या हो?” लकान और उनके शिष्य जिजेक आदि की सबसे बड़ी खोज यही है कि प्रमाता अपनी चाहत को कभी सीधे नहीं जानता। वह हमेशा दूसरे की चाहत के रास्ते से अपनी चाहत तक पहुँचता है। इसीलिए “Che vuoi?” का तात्पर्य ही है कि “दूसरा मुझसे क्या चाहता है?” और इसी प्रश्न से प्रमाता की पहचान (identity) का निर्माण शुरू होता है।

जिजेक आम धारणा के विपरीत विचारधारा को किसी स्थिर सिद्धांत या मान्यता के रूप में रखने के बजाय उसे एक ऐसी रजाई (quilt) की तरह रखते हैं जो जीवन के तमाम तरल, बिखरे हुए संकेतकों को अपने अंदर ढंक कर एक अस्थायी स्थिरता प्रदान करती है। समाज में राष्ट्र, धर्म, जाति, भ्रष्टाचार, जनता, सुरक्षा, संस्कृति, देशद्रोह, क्रांति आदि को लेकर विचार के असंख्य संकेतक तैरते रहते हैं जिनका अपने आप में कोई निश्चित अर्थ नहीं होता है। वे “खुले” संकेतक की तरह होते हैं। ये हमेशा श्रृंखला की अन्य कड़ियों से जुड़ कर ही अपना खास अर्थ ग्रहण करते हैं । राष्ट्र, धर्म, जाति, संस्कृति, क्रांति आदि सबके अर्थ सबके लिए एक नहीं होते । यहां तक कि भ्रष्टाचार, जनता, सुरक्षा, देशद्रोह का भी सबके लिए एक मायने नहीं होता । इसीलिये जिजेक कहते हैं कि विचारधारा की भूमिका किसी “खाली कनस्तर” की तरह होती है जो अपने भीतर कोई ठोस सार नहीं रखती; बल्कि वह विभिन्न असंतोषों, कुंठाओं, भय और इच्छाओं को अपने अंदर समेट कर उन्हें एक काल्पनिक एकता प्रदान करती है। रजाई के टांकें (quilting point) उसकी रूई को अस्थायी स्थिरता देते हैं । जिजेक के शब्दों में विचारधारा वास्तविकता को छिपाती नहीं, बल्कि वह उस रिक्ति को ढँकती है जिसके बिना सामाजिक वास्तविकता स्वयं ही टूट-फूट कर बिखर जायेगा । 

आज जब हम इस “चाहते क्या हो?” के सवाल की रोशनी में अचानक प्रकट हुई “भारतीय कोकरोच पार्टी” जैसी घटना को देखते हैं तो हमारे सामने “कॉकरोच” केवल एक कीट नहीं, एक ऐसे ही तरल संकेतक (floating signifier) के रूप में आता है जिसमें व्यवस्था से बाहर फेंके गये, तिरस्कृत, अदृश्य और गंदगी मान लिये गये लोगों की सामूहिक पहचान भरती हुई नजर आती है। हमने अपने पिछले लेखों में यह गौर किया है कि कैसे जो सत्ता सामान्यतः “कोकरोच” शब्द का उपयोग अपमान के लिए करती है, वही एक विचारधारात्मक प्रक्रिया में उसके बिल्कुल उलट प्रतिरोध का भाव बन जाता है। इसीलिये इसके उदय ने अनायास ही हमारे सामने रोम में गुलामों के विद्रोह से लेकर 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, 1917 की समाजवादी क्रांति फिर सन् ’60 के फ्रांस के कैंपस विद्रोह, अमेरिका के ब्लैक, भारत के अछूत, अरब स्प्रिंग की नई डिजिटल पीढ़ी से लेकर हाल की जेन जी की परिघटनाओं और उनमें अलग-अलग काल और भुवनों में शाश्वत राजनीतिक सत्य के प्रमाता के लौट-लौट कर नये-नये नामों से आने के पूरे इतिहास को खड़ा कर दिया । यह पूरा इतिहास इस बात का भी प्रमाण है कि कैसे अपमान का शब्द अचानक एक राजनीतिक आत्म-पहचान में बदल जाता है।

यहीं “Che vuoi?” का प्रश्न विस्फोटक हो उठता है। व्यवस्था कहती है कि “तू क्या है?”  और दबा हुआ प्रमाता उसी भाषा में व्यवस्था से पूछने लगता है — “तुम हमसे क्या चाहते हो? क्या हम हमेशा अदृश्य ही बने रहें? कूड़े में, समाज की नीचे की अंधेरी सतहों में ही जिएँ? केवल श्रम और उपभोग की वस्तु बने रहें?” वह जो अंधेरे से रोशनी में आने को आकुल है, वही इतिहास के अलग-अलग भुवनों में अलग-अलग नामों के साथ सामने आ जाता है । 

भारत में चल रही अभी की कॉकरोच चर्चा से हमें ऐसा लगता है कि जैसे जिस विचारधारा को हम एक खाली कनस्तर, या सब पहचानों पर पड़ी कंबल के रूप में देख रहे हैं, उस कनस्तर को ही हमारे मुख्य न्यायाधीश ने अनायास ही एक नाम दे दिया है − “कॉकरोच”। वह जो  एक जैविक सत्ता नहीं, पर विचारधारात्मक रिक्ति का प्रतीक जरूर है ।  वह उस अंधेरी सड़ांध को प्रकट करता है जिसे व्यवस्था अपने चमकीले राष्ट्रवादी, विकासवादी और सांस्कृतिक कंबल के नीचे छिपाए रखती है।

जिजेक कहते हैं कि विचारधारा तभी सबसे अधिक तब सक्रिय होती है जब विचारधारा का सबसे अधिक अभाव होता हैं। आज का डिजिटल-उपभोक्तावादी समाज भी स्वयं को “व्यावहारिक”(pragmatic), “पोस्ट-आइडियोलॉजिकल”, “सिर्फ विकासोन्मुख” कहता है। पर इसी की सतह के नीचे असंख्य तिरस्कृत जीवन जमा हो रहे हैं। जाहिर है कि कॉकरोच उन्हीं उत्पीड़ित-दमित जिंदगियों का भयावह प्रतीक बन सकता है।

इसलिए हमारे सामने यह कोई महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है कि कॉकरोच पार्टी वास्तव में क्या है । हम तो यह समझना चाहते हैं कि उसने सामाजिक कल्पना में कौन सी रिक्ति को छू लिया है। कौन-सी दबी हुई चाहत, कौन-सा अपमान, कौन-सी अदृश्यता उसके माध्यम से बोलने लगी है।

और हमें लगता है कि शायद यही कारण है कि सत्ता ही नहीं, शायद सत्ता-तंत्र में किसी भी रूप में अपनी जगह बना चुकी अन्य सत्ता के बाहर की विपक्ष की ताकतें भी उसे लेकर आशंकित है, उस पर सवाल उठाती है और थोड़ा मज़ाक भी। क्योंकि हर विचारधारा जानती है कि कभी-कभी सबसे छुद्र समझा गया संकेतक ही पूरी प्रतीकात्मक व्यवस्था की सिलाई को उधेड़ सकता है।

हम कॉकरोच जनता पार्टी की परिघटना को किसी घटना के बीच से सामने आने वाले सत्य के प्रमाता की सत्य-विधि (truth procedure) की तरह देख पा रहे हैं जो हमें यह आश्वस्त करती है कि मोदी-सूर्यकांत-ज्ञानेश कुमार आदि जितनी भी सघन बुनावट की रजाई से सत्य को आवृत करने की कोशिश क्यों न करें, सत्य शाश्वत है जो असीम और अनंत रूपों में कहीं से भी छेद करके अपने को प्रकट कर लेता है । यह वह शिव तत्त्व है जो अपने स्वातंत्र्यवश ही अनेक प्रकारों में भासित हो कर पृथ्वीत्व होता है । 
हमारे अभिनवगुप्त कहते हैः

“तथाहि कालसदनाद्वीरभद्रपुरान्तगम् । 
धृतिकाठिन्यगरिमाद्यवभासाद्धरात्मता।।

(यह “कालसदन” (चित्त) से “वीरभद्रपुर” तक की यात्रा वास्तव में चेतना के क्रमिक संकोच और स्थिरीकरण की यात्रा है, जिसका अंतिम परिणाम “पृथ्वीत्व”, अर्थात् स्थूल, कठोर, वस्तुगत जगत, के रूप में सामने आता है। अभी हमें कॉकरोच का अवभास हो गया है, आगे उसे पृथ्वीत्व होते देखना है । वह विपक्ष के प्रभावी नेता राहुल गांधी के जरिये होता है, या कुछ और ही घटित होता है, कहना मुश्किल है । उसकी बात करके अभी की कॉकरोच पार्टी पर राय सुनाना निहायत तात्कालिकता में जीने वाली पत्रकारिता की गति का रूप है, सत्य का इससे कोई लेना-देना नहीं है ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. काक्रोच अभी तक एक आभासी जनसमूह के रूप में प्रचार-प्रसार पा रहा है। अभी उसका मूल रूप प्रकट होना बाकी है।

    जवाब देंहटाएं
  2. काक्रोच जनता पार्टी अभी तक एक आभासी रूप में प्रचार-प्रसार पा रही है लेकिन उसका मूल रूप प्रकट होना अभी बाकी है।

    जवाब देंहटाएं