(ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध और इस्लामाबाद एमओयू पर एक टिप्पणी)
−अरुण माहेश्वरी
ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को केवल एक और पश्चिम एशियाई युद्ध कह कर नहीं छोड़ा जा सकता। यह युद्ध अपने सैन्य परिणामों से कहीं अधिक अपने प्रतीकात्मक परिणामों के कारण महत्वपूर्ण है। इसने उस अमेरिकी प्रभुत्व की संरचना की आंतरिक संगति को झकझोर दिया है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से स्वयं को विश्व-व्यवस्था की अंतिम गारंटी के रूप में प्रस्तुत करती आई है ।
28 फ़रवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हमलों की शुरुआत की। लक्ष्य था ईरान की सैन्य क्षमता, वायु-रक्षा, मिसाइल ढाँचे, परमाणु कार्यक्रम और नेतृत्व-संरचना को निर्णायक रूप से खत्म कर देना। आरंभिक हमले ही अत्यंत क्रूर और व्यापक थे। अमेरिका और इज़राइल की रणनीति साफ थी कि ईरान को ऐसा झटका दिया जाए कि वह न केवल सैनिक रूप से पंगु हो, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अस्थिर हो जाए। यह अमेरिका-इजरायल का मध्यपूर्व पर पूर्ण और प्रश्नातीत प्रभुत्व कायम करने का एक निर्णायक अभियान था ।
लेकिन युद्ध की असली कहानी तब शुरू हुई, जब ईरान ने जवाबी हमला किया। उसने इज़राइल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिकी सैनिक अड्डो की क्षेत्रीय संरचनाओं को अपना निशाना बनाया। युद्ध लेबनान, खाड़ी, होरमुज़ जलडमरूमध्य से लेकर मध्य पूर्व के तमाम ऊर्जा-केंद्रों तक फैल गया। ईरान के साथ ताल-मेल रखते हुए हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के मोर्चे पर भी इज़राइल को उत्तर की दिशा से बुरी तरह उलझाए रखा। सर्वोपरि, होरमुज़ के संकट ने दुनिया को बता दिया कि भू-राजनीति केवल वाशिंगटन या तेल अवीव की इच्छा से संचालित नहीं होती।
जिसे अमेरिका अपनी अजेय शक्ति के प्रदर्शन और ईरान के खिलाफ निर्णायक दंडात्मक कार्रवाई मान रहा था, वही धीरे-धीरे उसके प्रभुत्व की सीमाओं को अनावृत करने लगा।
और, यहीं से युद्ध का चरित्र ही बदल गया।
अमेरिका अपनी जिस सैन्य शक्ति पर सबसे अधिक भरोसा करता था, वही शक्ति इस युद्ध में उसके लिए समुद्र की चोर बालू साबित होने लगी । उसका हमला भले ही कितना भी विनाशकारी क्यों न हो, निर्णायक नहीं साबित हुआ। वह न ईरान को मिटा सका, न उसे अलग-थलग ही कर सका। यहां तक की दूसरे क्षेत्रीय प्रतिरोधों को भी समाप्त नहीं कर सका। उल्टे, ऊर्जा-मार्गों पर से उसका नियंत्रण खत्म हो गया । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह दुनिया को यह विश्वास नहीं दिला सका कि उसके बिना विश्व-व्यवस्था असंभव है।
हम इसे लकानियन अर्थ में भू राजनीति का वह बिंदु कहेंगे जब इसमें बहु-ध्रुवीय जगत के ‘रीयल’ का प्रवेश होता है।
यह लकानियन ‘रीयल’ कोई बाहरी वस्तु की तरह नहीं होता। यह अंतर की वह असंभवता है जिसे प्रतीकात्मक व्यवस्था लगातार ढँकती रहती है। अमेरिकी प्रभुत्व का प्रतीकात्मक संसार इस गहरे विश्वास पर टिका था कि अमेरिका ही अंतिम निर्णायक शक्ति है; उसकी सैन्य उपस्थिति ही सुरक्षा है; उसके नियम ही अंतरराष्ट्रीय नियम हैं; उसका दंड ही न्याय है; और उसकी स्वीकृति ही वैधता है। ट्रंप हर वक्त अपनी श्रेष्ठता के बखान से इसी प्रतीकात्मक विश्वास को दोहराया करते हैं ।
पर ईरान ने इसी आत्म-संसार को उसके रीयल के सामने खड़ा कर दिया। उसने दिखाया कि कोई भी ‘बड़ा अन्य’ (big other) स्वयं में पूर्ण नहीं है। अमेरिका कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है और न इज़राइल अजेय है। प्रतिबंध अंतिम हथियार नहीं हैं। सैन्य शक्ति राजनीतिक सत्य की गारंटी नहीं है। इतिहास किसी एक केंद्र की ही पटकथा के अनुसार नहीं चलता है।
हमारी नजर में, इस युद्ध का यही सबसे बड़ा निष्कर्ष है।
इस युद्ध में ईरान की जीत को केवल इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि उसने अमेरिका को किसी पारंपरिक युद्धक्षेत्र में हरा दिया। निस्संदेह, इस युद्ध के अंतिम मुकाम पर अमेरिका के पास कोई दूसरी कारगर सैन्य रणनीति नहीं बची थी । पर इससे भी बड़ी बात यह है कि उसने अमेरिकी महाशक्ति के भ्रम को तोड़ दिया।
इस अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन और रूस की भूमिका इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाती है। वे इसमें केवल ईरान के समर्थक नहीं रहे; वे उस नई वैश्विक गणना के संकेतक के रूप में सामने आएं जिसमें अमेरिका अब विश्व का अकेला व्याख्याता नहीं रह गया है।
हम जानते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि अब कोई नई आदर्श व्यवस्था स्थापित हो चुकी है, जैसा कि हमारे इस काल के प्रमुख युद्ध रणनीति के विशेषज्ञ प्रवीण साहनी लगातार कह रहे हैं । वे इससे एक ऐसी नई विश्व-व्यवस्था के उदय का दावा कर रहे हैं, जिसमें युद्ध नहीं, शांति और विकास ही दुनिया के देशों के बीच व्यवहार के अकेले कारक रह जायेंगे ।
हमें लगता है कि अभी ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं होगा । बल्कि यह फिर एक नए भ्रम में गिरने के समान भी हो सकता है। हम इसे कहीं ज्यादा व्यापक और यथार्थ रूप में देखते हुए संक्षेप में यही कहेंगे कि यह वह घटना है जब इतिहास का वह अध्याय, जिसे अमेरिका ने अपने प्रभुत्व के अंतर्गत बंद कर देने की कोशिश की थी, फिर से खुल गया है।
बाद्यू की भाषा में, घटना वही होती है जो किसी स्थापित संसार की गणना में दर्ज नहीं होती, लेकिन उसी संसार की पूर्णता को संदिग्ध बना देती है। ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध इसी अर्थ में एक घटना है ।
अमेरिका ने युद्ध शुरू किया था इस विश्वास से कि वह ईरान को निर्णायक रूप से झुका देगा। लेकिन उसे अंततः ‘इस्लामाबाद एमओयू’ की दिशा में जाना पड़ा। यह एमओयू केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है।
इस एमओयू में सैन्य कार्रवाइयों की समाप्ति, 60 दिनों की वार्ता, होरमुज़ जलडमरूमध्य के खुलने, प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, संपत्तियों की मुक्ति और पुनर्निर्माण की संभावनाओं का उल्लेख केवल तकनीकी बातें नहीं हैं। ये युद्ध के पीछे के उस तर्क का प्रत्याख्यान है जो ईरान को केवल दंडित करने पर आधारित था। यहीं हमें ईरान आज के विश्व में एक ‘संभावित प्रमाता’ की स्थिति ग्रहण करता दिखाई देता है।
गौर करें कि हम ईरान को 'प्रमाता' नहीं, ‘संभावित प्रमाता’ कह रहे हैं । अगर सीधे 'प्रमाता' कहते, तो यह देखना पड़ता कि ईरान ने इस युद्ध को किस हद तक अपनी नई पहचान का आधार बनाया है, कि उसके भीतर का राजनीतिक-सांस्कृतिक ताना-बाना इस घटना के अनुसार कितना पुनर्व्यवस्थित हुआ है, और वह इसके सत्य को दुनिया के सामने स्थायी रूप से पेश करने में कितना सक्षम है।
वह इस युद्ध के बाद 'प्रमाता' बनने की क्षमता (संभावना) रखता है, परंतु वह अभी वहां तक गया नहीं है। उसने ‘बड़े अन्य’ को खंडित किया है, लेकिन उस खंडन के बाद की विश्व-दृष्टि अभी उसके भीतर पूरी तरह संगठित नहीं हुई है। इस लिहाज से वह अभी इस 'घटना' के प्रति निष्ठा (Fidelity) की प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में है।
'संभावित प्रमाता' होने के नाते, ईरान अभी भी विजयी की तरह नहीं, उसी पुराने ढांचे (प्रतिबंध-राहत, तेल निर्यात, पुनर्निर्माण) के भीतर बातचीत कर रहा है, हालाँकि अब उसकी बातचीत की स्थिति बहुत मजबूत है। यानी, उसने व्यवस्था को झकझोरा है, लेकिन नई विश्व-गणना का बोध अभी भी संभावनाओं के गर्भ में ही है।
प्रमाता कोई नैतिक नायक तो नहीं होता है लेकिन वह उस सत्य का वाहक जरूर होता है जो घटना से पैदा होता है। ईरान ने यह सत्य सामने रखा कि विश्व अब अमेरिकी सैन्य-संरचना की एकरेखीय गणना में नहीं समा रहा है; अमेरिकी प्रभुत्व की जकड़ अटूट नहीं है; उसमें दरार आ चुकी है।
और, यह दरार ही रीयल है। दुनिया अब पहले जैसी नहीं रह गई है। यह इस युद्ध का सत्य है।
इसीलिये, अमेरिका–इज़राइल धुरी का यह संकट हमारी नजर में, दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस पूरे प्रसंग को और भी गहराई से पूरे परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए हमें बीसवीं शताब्दी के अंत की दो अत्यंत प्रभावशाली घोषणाओं को याद करना चाहिए।
पहली थी फ्रांसिस फुकुयामा की “इतिहास का अंत और अंतिम मनुष्य” (The end of History and the Last Man) की घोषणा।
सोवियत संघ के विघटन के बाद फुकुयामा ने दावा किया था कि अब वैचारिक संघर्ष का युग समाप्त हो चुका है। उदार लोकतंत्र और पूँजीवादी विश्व-बाज़ार मानव राजनीतिक विकास के अंतिम रूप के रूप में सामने आ चुके हैं। युद्ध, संघर्ष और वैकल्पिक विश्व-दृष्टियाँ अब केवल अवशेष भर होंगी; इतिहास अपने अंतिम संगठन तक पहुँच चुका है।
यह घोषणा केवल राजनीतिक नहीं थी; यह पश्चिमी प्रभुत्व की दार्शनिक आत्म-घोषणा थी। उसमें अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं था; वह इतिहास के अंतिम रूप का संरक्षक बन गया था।
लेकिन इतिहास की विडंबना यही है कि वह अपने अंत की ऐसी घोषणाओं को कभी स्वीकार नहीं सकता है । ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध को भी इसकी पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास बंद नहीं हुआ था; उसे बंद मान लिया गया था। पर, इतिहास की वापसी किसी नए यूटोपिया के रूप में नहीं हुई है, बल्कि उस रीयल के रूप में हुई जिसे अंतिम घोषित व्यवस्था दबा नहीं सकी।
बीसवीं सदी के अंत में की गई दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना थी सैमुअल हंटिंगटन (Samuel P. Huntington) की, वर्तमान विश्व में “सभ्यताओं का संघर्ष” की स्थापना।
फुकुयामा जहाँ संघर्ष के अंत की बात कर रहे थे, वहीं हंटिंगटन कह रहे थे कि संघर्ष जारी रहेगा, लेकिन उसका आधार विचारधारा नहीं, सभ्यता होगी। उनकी दृष्टि में पश्चिम और उसके संस्थान अंततः इस संघर्ष के केंद्रीय नियामक बने रहेंगे।
ईरान हंटिंगटन की विश्व संबंधी इस रूपरेखा में लंबे समय से एक “सभ्यतामूलक अन्य”(civilizational Other) की तरह उपस्थित रहा, वह जो पश्चिम की सांस्कृतिक–राजनीतिक सार्वभौमिकता में वैसे ही पूरी तरह समाहित नहीं होता, जैसे, उनके अनुसार, इस्लामी, सिनिक (चीनी), ऑर्थोडॉक्स आदि सभ्यताएं भी नहीं होती ।
यहां यदि हम ‘अन्य’ के बारे में लकानियन धारणा का प्रयोग करें कि वह कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि वह स्थान है जिससे कोई व्यवस्था अपनी पहचान बनाती है, (मैं स्वयं को “मैं” तभी कहता हूँ जब कोई “अन्य” हो !), तो कहेंगे कि ईरान सभ्यता के बाहर नहीं था, वह उस बिंदु का नाम था जहाँ पश्चिम स्वयं को सार्वभौमिक सिद्ध करने में अटकने लगा, वह पश्चिम की सीमाओं को उजागर करने वाले बाह्य-आंतरिक बिंदु के रूप में मौजूद रहा।
लेकिन इस युद्ध ने विचित्र रूप से सब उलटफेर कर दिया है। यदि इसे केवल सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में पढ़ा जाए, तो संभव है कि हम उसके कईं, अधिक निर्णायक पहलू को खो दें।
इसे एक दूसरी भाषा में, हम अपना अंतहीन विस्तार चाहने वाले जुएसॉंस (jouissance) की राजनीतिक प्रवृत्तियों और शांति और स्थिरता की homeostasis की राजनीति की प्रवृत्तियों के बीच के तनाव के रूप में भी देख सकते हैं । यहाँ jouissance का अर्थ वह जिद, विस्तार और ऐतिहासिक नियंता बनने की राजनीति है जो स्वयं को सार्वभौमिक बनाने की ओर प्रवृत्त होती है। इसके विपरीत homeostasis उस संतुलन, सीमांकन और अस्तित्वगत स्थिरता का नाम है, जो व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश करती है।
इस अर्थ में संघर्ष केवल सांस्कृतिक पहचान का नहीं रह जाता; वह उस प्रश्न का रूप ले लेता है कि विश्व किस प्रकार की ऐतिहासिक ऊर्जा पर संगठित होगा। यह विभाजन न तो अपने में पूर्ण है और न ही नैतिक है। संभव है कि इसकी रूपरेखा में कुछ अधिक आदर्शवाद झलकता हो।
पर हम इसे बीसवीं शताब्दी की उस पुरानी प्रतिद्वंद्विता के एक नए रूप के रूप में देख सकते हैं जिसे कभी साम्राज्यवाद और समाजवाद के बीच के प्रमुख अन्तर्विरोध के रूप में विवेचित किया जाता था।
इसीलिये, अब प्रश्न यह नहीं है कि नई विश्व-व्यवस्था कितनी सुंदर होगी। प्रश्न यह है कि क्या इस दरार से नए प्रमाता पैदा होंगे। क्या गरीब और परिधीय देश इस खुले हुए इतिहास में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराएँगे। क्या वे केवल नए ध्रुवों के ग्राहक बनेंगे या स्वयं विश्व की पुनर्गणना में भाग लेंगे।
फुकुयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की थी। हंटिंगटन ने संघर्ष के स्थायी भूगोल की कल्पना की थी। इस युद्ध ने दोनों को एक साथ चुनौती दी है।
इतिहास समाप्त नहीं हुआ। सभ्यताओं की रेखाएँ भी अंतिम सिद्ध नहीं हुईं। विश्व फिर से एक खुले समुच्चय की तरह सामने आया है।
ईरान–अमेरिका–इज़राइल युद्ध का सबसे बड़ा निचोड़ यही नहीं कि किसने किसे हराया। उसका सबसे बड़ा निचोड़ यह है कि कोई भी शक्ति इतिहास को अंतिम रूप नहीं दे सकती।
यहां रीयल ने इतिहास को कोई दिशा नहीं दी है, उसने केवल यह सिद्ध किया कि इतिहास अभी समाप्त नहीं हुआ था ।
इतिहास का अर्थ तभी बनता है जब वह बंद न हो।
इतिहास फिर से खुल गया है।

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