(हितेन्द्र पटेल द्वारा फेसबुक पर साझा की गई कुनाल चट्टोपाध्याय की एक टिप्पणी पर)
अरुण माहेश्वरी
कुनाल चट्टोपाध्याय ने पश्चिम बंगाल के वामपंथ की वर्तमान स्थिति पर एक विचारोत्तेजक टिप्पणी लिखी है। उनका मुख्य निष्कर्ष है कि सीपीआई जैसे दलों का निरंतर संकुचन मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड़कर सीपीआई(एम) पर निर्भर रहने की नीति अपनाई। उनके अनुसार यदि वे अपने स्वतंत्र संगठन, स्वतंत्र आंदोलनों और स्वतंत्र राजनीतिक आलोचना का विकास नहीं करेंगे, तो उनका यह सिकुड़ना जारी रहेगा।
यह विश्लेषण अपने भीतर निस्संदेह एक महत्वपूर्ण सत्य समेटे हुए है। लेकिन हमारा सवाल है कि क्या यही पूरा सत्य है? हमें ऐसा नहीं लगता । ऐसा इसलिए क्योंकि यह विश्लेषण मुख्यतः राजनीतिक रणनीति के स्तर पर ही रुक जाता है। यह उस गहरे संरचनात्मक नियम तक नहीं पहुँचता जो किसी भी राजनीतिक दल (समुच्चय) के विस्तार और संकुचन को नियंत्रित करता है।
इस पूरे विषय को, हमारे अनुसार, एक अलग धरातल से देखने की जरूरत है ।
सबसे पहले हमें इस मूल सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि राजनीति सत्य की एक प्रक्रिया है, और प्रत्येक सत्य की तरह उसका अस्तित्व भी समुच्चयों के रूप में ही संगठित होता है। कोई भी राजनीतिक दल केवल व्यक्तियों का इकट्ठा होना नहीं होता। वह मूलतः एक समुच्चय होता है, जिसकी एकता उसकी राजनीतिक लाइन और संगठनात्मक ढाँचे से निर्मित होती है।
राजनीतिक दल अपने बाहर समाज में मौजूद समानधर्मा खास सामाजिक तत्वों को लगातार अपनी ओर आकर्षित करता है। यही उसकी जीवन-प्रक्रिया, बल्कि जीवन धर्म है । जिस दिन यह प्रक्रिया रुक जाती है, उसी दिन वास्तव में उसका संकुचन शुरू हो जाता है।
यहीं पर राजनीति के फ्रैक्टल चरित्र का एक बहुत खास पहलू सामने आता है।
फ्रैक्टल गणित की एक ऐसी ज्यामितीय संरचना है जिसमें किसी सम्पूर्ण की निर्माण-पद्धति विभिन्न पैमानों पर उसके प्रत्येक हिस्से में पुनरावर्तित होती है। इसलिए प्रत्येक छोटा भाग किसी अर्थ में सम्पूर्ण का ही पुनरावर्तन होता है।
राजनीति का स्वरूप भी कुछ ऐसा ही होता है । राष्ट्रीय दल एक समुच्चय है तो उसका प्रांतीय संगठन भी एक समुच्चय है। जिला समिति और स्थानीय शाखा भी। यहाँ तक कि प्रत्येक जनसंगठन और प्रत्येक स्थानीय आंदोलन भी समुच्चय ही होते हैं । इन सभी पर एक ही नियम लागू होता है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर स्तर पर संगठन की आकृति एक जैसी दिखाई देती है ।
इसका वास्तविक अर्थ यह है कि जिस राजनीतिक लाइन और संगठनात्मक प्रभाव से कोई दल अपने सबसे छोटे स्तर पर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है, वही बड़े स्तरों पर भी उसके विस्तार का आधार बनती है। नीचे जो प्रभावी नहीं है, वह ऊपर कभी स्थायी रूप से प्रभावी नहीं हो सकता।
इसीलिए किसी भी दल की वास्तविक शक्ति उसके शीर्ष नेतृत्व में नहीं, बल्कि उसके सबसे छोटे पुनरुत्पादक समुच्चयों में निहित होती है। ऊपर वही जीवित रहता है जो नीचे जीवित है।
यहीं पर हमारे सामने कुनाल चट्टोपाध्याय की टिप्पणी की सीमा जाहिर हो जाती है।
वे सीपीएम की अधीनता को सीपीआई के पतन का कारण मानते हैं। लेकिन समुच्चय सिद्धांत के आधार पर देखें तो यह अधीनता शायद स्वयं एक पहले से उपस्थित सीपीआई की संरचनात्मक दुर्बलता की अभिव्यक्ति थी।
जिस दल की स्थानीय इकाइयाँ समाज में अपना विस्तार नहीं कर रही हो, वह ऊपर जाकर स्वतंत्र कैसे रह सकता है? इसीलिए किसी भी प्रकार का पिछलग्गूपन कारण कम, परिणाम अधिक होता है।
हम और एक कदम आगे जाते हुए यह भी कहना चाहेंगे कि सीपीएम भी इस तर्क से ऊपर नहीं है ।
यदि सीपीएम खुद नए सामाजिक तत्वों को अपनी ओर आकर्षित कर रही होती, तब भी वाम समुच्चय में विस्तार की प्रक्रिया बनी रहती। लेकिन जब उसका ही जैविक विस्तार रुक गया, तो पूरे वाम समुच्चय का संकुचन शुरू हो गया। छोटे वाम दलों का क्षय उसी बड़े संकट का भी एक खास परिणाम हो सकता है।
कुनाल जी की टिप्पणी में जो एक और महत्वपूर्ण सवाल आता है, वह है राज्य और राजनीति के संबंध का सवाल। कुनाल कहते हैं कि सीपीएम ने सत्ता के बल पर सीपीआई जैसे दलों को निगल जाने की अतिरिक्त क्षमता पा ली थी ।
हमारा मानना है कि राजनीतिक दलों का भविष्य उनके आकार और राज्य की ताक़त मात्र से तय नहीं होता । वह हमेशा उनके सबसे छोटे स्तरों पर राजनीतिक सक्रियता अर्थात् उनकी अपनी जैविक पुनरुत्पादन-क्षमता से निर्धारित होता है।
लेकिन राज्य की तर्क-पद्धति अलग होती है। राज्य को स्थिरता चाहिए, प्रशासन चाहिए, आनुगत्य और नियंत्रण चाहिए; समझौते चाहिए।
अर्थात राज्य का स्वाभाविक झुकाव पुनरुत्पादन की राजनीतिक प्रक्रिया के बजाय व्यवस्था के संरक्षण की ओर होता है।
बाद्यू की भाषा में राजनीति का उद्देश्य नित नए प्रमाताओं का निर्माण होता है और राज्य का उद्देश्य व्यवस्था का पुनरुत्पादन। इसीलिए बाद्यू राजनीति और राज्य के बीच स्थायी तनाव की बात करते हैं।
जब कोई भी राजनीतिक दल समाज में अपना आधार विकसित करने के बजाय दूसरे दलों के नेताओं, संगठनों और प्रभाव क्षेत्रों को अपने भीतर समाहित करके बढ़ने लगता है, तब उसका विस्तार मुख्यतः संख्यात्मक होता है। समकालीन भारत में इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण भारतीय जनता पार्टी के विस्तार में देखा जा सकता है।
ऐसा विस्तार अंततः अपने भीतर अनेक परस्पर विरोधी उपसमुच्चयों तैयार करता है।इसमें जब तक सत्ता का केंद्रीकरण बना रहता है, वे साथ रहते हैं। सत्ता ढीली पड़ते ही वही अंतर्विरोध उभर आते हैं। इसलिए हमारी दृष्टि में ऐसा अवसरवादी विस्तार वास्तव में स्थगित विघटन होता है।
जो दल समाज के भीतर नए राजनीतिक प्रमाताओं का निर्माण करते रहते हैं, वही दीर्घजीवी होते हैं। इसके बजाय जो दल केवल दूसरे समुच्चयों को तोड़कर बढ़ते हैं, वे अपने भीतर भविष्य के विखंडन के बीज भी साथ-साथ बोते चलते हैं।
राजनीति का इतिहास ऊपर से नहीं लिखा जाता। वह नीचे की उन असंख्य जीवित इकाइयों में रचा जाता है जहाँ पहली बार कोई नया राजनीतिक प्रमाता जन्म लेता है। जो दल इन इकाइयों का सतत पुनरुत्पादन करते हैं, वही इतिहास में टिकते हैं; जो उनसे कट जाते हैं, उनका क्षय केवल समय का प्रश्न रह जाता है।
