सोमवार, 19 जनवरी 2026

“Board of Peace” : शेखचिल्ली का महल, जिसकी इतिहास में कोई ज़मीन नहीं है

-अरुण माहेश्वरी

 

जिस गति से चीन का उभार हो रहा है और ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका जिस तेज़ी से अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिकाओं से पैर खींच रहा है, उससे अब यह साफ़ हो चला है कि वर्तमान विश्व-व्यवस्था के भीतर ही वह दबाव पैदा हो रहा है जो एक नई व्यवस्था को जन्म देगा।

कोई भी व्यवस्था तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उसकी अंदरूनी संभावनाएँ चुक नहीं जातीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से चली आ रही अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था में आज संसाधनों की खींच-तान, वैधता का क्षरण, और वैश्विक गठबंधनों में शिथिलता के चलते क्षय के वही लाइलाज लक्षण दिखाई देने लगे हैं जो उसकी मृत्यु को लगभग तय कर रहे हैं।

यदि हम इस प्रक्रिया को गणित की सेट थियरी की भाषा में कहें तो यह एक ऐसी आंतरिक बाध्यता (forcing) की तरह है जो पुराने ढाँचे के भीतर ही नई स्थिति को “अपरिहार्य” बना देती है। परिवर्तन किसी घोषणापत्र या रणभेरी से नहीं आता—वह व्यवस्था के भीतर जमा हुए अन्तर्विरोधों के दबाव से जन्म लेता है।

लेकिन ठीक इसी ऐतिहासिक मोड़ पर ट्रंप का ग़ज़ा को केंद्र में रखकर बहुदेशीय “Board of Peace” (शांति-निकाय) का प्रस्ताव—कुछ चुनिंदा देशों को पत्र लिखकर संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुस्तरीय संस्था के स्थान पर अपने सीधे प्रभुत्व वाली बहुदेशीय संस्था की परिकल्पना—दरअसल इसी फोर्सिंग की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया को पहले ही रोककर उलट देने की एक कोशिश है। जो परिवर्तन भीतर ही भीतर पक चुका है, उसे बाहर से शक्ति के प्रयोग द्वारा बलपूर्वक मोड़ देने का प्रयास है।

यहीं फ्रेडरिक एंगेल्स का लेख “इतिहास में बल प्रयोग की भूमिका” याद आता है। लेख के बिल्कुल आरंभ में ही उन्होंने एक प्रमेय की तरह यह सवाल रखा था कि “ख़ून और तलवार की नीति” कुछ समय के लिए सफल क्यों होती है—और अंततः उसका विफल होना क्यों लाज़िमी है। एंगेल्स का निष्कर्ष साफ़ था: बल प्रयोग किसी समय तक परिणाम दे सकता है, पर वह इतिहास का नियम नहीं बन सकता। इतिहास का नियम अंततः आर्थिक संरचना और उत्पादन-सम्बन्धों की गति से तय होता है। सत्ता का अंतिम संतुलन वहीं टिकता है जहाँ उसकी आर्थिक ज़मीन मौजूद होती है।

ट्रंप का “शांति-निकाय” इसी अर्थ में सचमुच शेखचिल्ली का महल है।

वे यह मानकर चल रहे हैं कि हिंसा, धमकी, प्रतिबंध, और मनमाने ढंग से चुने गए देशों तथा प्रतिनिधियों की सूची से एक नई वैश्विक संरचना बनाई जा सकती है। उन्होंने विश्व-व्यवस्था को एक निजी क्लब समझ लिया है। उनका जड़ राजनीतिक विवेक शायद यह देख ही नहीं पा रहा कि विश्व-व्यवस्था उत्पादन, व्यापार, तकनीक, वित्त, ऊर्जा और श्रम जैसे आर्थिक कारकों के विश्व-स्तरीय रिश्तों का एक अत्यंत जटिल जाल होती है। संयुक्त राष्ट्र की बहुस्तरीयता भी कोई महज नैतिक आदर्श या सुविधाजनक व्यवस्था नहीं, बल्कि उसी जाल का संस्थागत रूप है।

ट्रंप इस जाल को काटकर अपना एक नया “शॉर्टकट” बनाना चाहते हैं, पर इतिहास में शॉर्टकट व्यवस्था नहीं बनाते, केवल अराजकता पैदा करते हैं। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में इसके असंख्य उदाहरण मौजूद हैं।

ट्रंप की मूर्खता का आलम यह है कि वे नोबेल शांति पुरस्कार देने वाले देश नार्वे से धमकी के बल पर पुरस्कार “ऐंठने” को भी “अमेरिका को फिर से महान” बनाने का कोई नुस्ख़ा मान बैठे हैं।

दरअसल, बल प्रयोग पर भरोसा करने वालों का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वे मानते हैं कि कोरा बल “निर्माण” भी कर सकता है। उन्हें यह अहसास नहीं होता कि बल से अधिकतम ध्वंस संभव है, निर्माण नहीं।

नई विश्व-व्यवस्था तभी बनती है जब उत्पादन और तकनीक के नए केंद्र उभरते हैं, व्यापार के नए मार्ग स्थिर होते हैं, वित्तीय शक्ति का नया अनुशासन जन्म लेता है, और दुनिया के देशों के ज़ेहन में वैधता का कोई नया प्रतीकात्मक रूप बन चुका होता है।

ट्रंप की घोषणाएँ इनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं करतीं—वे तो इन सबको एक सिरे से नकारती हैं। वे नई व्यवस्था की ज़मीन नहीं बनातीं; वे केवल पुराने ढाँचे को और अधिक कमजोर करती हैं।

अपने ‘MAGA’ कार्यक्रम के तहत ट्रंप जिस “नई विश्व-व्यवस्था” को खुद गढ़ना चाहते हैं, वह उसी निर्माण-प्रक्रिया में केवल बाधा बन सकती है। जिस तरह नैटो के सदस्य देश चीन की ओर झुकने लगे हैं, वर्षों के विरोध के बाद भी कनाडा चीन में एक विकल्प देख रहा है, और चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना को जिस प्रकार दुनिया में समर्थन मिल रहा है—ये सब प्रमाण हैं कि ट्रंप की नीतियाँ ही अमेरिका के मित्रों को उससे दूर धकेल रही हैं।

इसीलिए यदि यह ‘शांति-निकाय’ कभी बन भी गया तो उसके स्थायित्व की कोई गारंटी नहीं होगी। वह शुद्ध रूप से एक विघटनकारी निकाय होगा—एक ऐसी संरचना जो स्वयं अपने भीतर अस्थिरता, अविश्वास और विद्रोह के बीज लिए होगी।

जिस व्यवस्था की नींव साझा आर्थिक-ऐतिहासिक ज़मीन पर नहीं, बल्कि किसी एक शक्ति के स्वेच्छाचार पर रखी जाती है, वह व्यवस्था नहीं—एक सामयिक ज़ोर-ज़बर्दस्ती होती है।

ट्रंप की पैंतरेबाज़ी इतिहास की धारा को नहीं मोड़ सकती। वह केवल शोर पैदा कर सकती है।

अंत में हम फिर एंगेल्स के कथन को ही दोहराएँगे: “ख़ून और तलवार की नीति” कुछ समय तक सफल लग सकती है, पर उसका विफल होना लाज़िमी है। अंतिम विजय हमेशा उन्हीं शक्तियों की होती है जिनके पीछे इतिहास की वास्तविक ज़मीन होती है। और आज की दुनिया में वह ज़मीन किसी एक की नहीं—अनेकों की है। दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं, बहुध्रुवीय है।

ट्रंप जिस महल का नक्शा बना रहे हैं, उसके लिए इस दुनिया में रत्ती भर ज़मीन नहीं बची है—न किसी के पिछवाड़े में, न किसी के कथित “प्रभाव क्षेत्र” मे !

ट्रंप का यह महल शेखचिल्ली का सपना है । इतिहास की मिट्टी पर अब उसका निर्माण तो दूर, उसके नक़्शे को उकेरना भी संभव नहीं होगा ।


बुधवार, 14 जनवरी 2026

ट्रंप की सनक या अमेरिकी साम्राज्यवाद का असल रूप !

 



-अरुण माहेश्वरी

ट्रंप ने आज सारी दुनिया को जैसे किसी हुक पर टांग कर रख दिया है । सामान्य बुद्धि का कोई भी आदमी, जो खास तौर पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के विगत 80 साल में दुनिया की एक निश्चित प्रतीकात्मक व्यवस्था के दायरे में सोचने का अभ्यस्त हो चुका है, ट्रंप के टैरिफ युद्ध से लेकर एक राष्ट्रपति दंपत्ति का खुले आम अपहरण और दुनिया के किसी भी कोने में सैनिक हस्तक्षेप करने की रणनीति को पूरी तरह से समझ ही नहीं पा रहा है । महाशक्तियों द्वारा अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में पूर्ण वर्चस्व बनाने का कथित मुनरो डाक्ट्रिन, जिसे अभी ट्रंप के नाम पर डोनरो डाक्ट्रिन कहा जाने लगा है, उससे भी ट्रंप की वर्तमान रणनीति की कोई संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती है ।      

हमारे सामने अभी मूल प्रश्न यह है कि ट्रंप की वर्तमान आक्रामक वैश्विक नीति क्या सिर्फ एक व्यक्ति की अनियंत्रित सनक है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह अमेरिका में अगले संतुलित बुद्धि के राष्ट्रपति के आने तक की समस्या भर है या यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का असल, अब तक छिपा कर काबू में रखा गया रूप है जो अभी हमें सीधे विश्व की लकानियन प्रतीकात्मक (Symbolic), छविमूलक (Imaginary) और रीयल (Real) की गांठ के अंदर की उस कसमसाहट का साक्षी बना रहा है, जिसमें यह विश्व-व्यवस्था अपनी समग्रता की छतरी के नीचे तार-तार होकर फटती हुई दिखाई दे रही है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी कानून-आधारित विश्व व्यवस्था मूलतः संप्रभु राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र, और परमाणु प्रतिरोध (डेटरेंस) के संतुलन एक प्रतीकात्मक संरचना रही है, जिसके प्रति सभी संप्रभु राष्ट्रों के साझा मौन समर्थन के बल पर युद्ध का पूर्ण-विनाशकारी ‘रीयल’ खुल कर खेल नहीं पाता है । इधर-उधर बल का प्रयोग होता रहा है, पर वह कुछ इस प्रकार हुआ है ताकि इस प्रतीकात्मक संरचना के दबाव से काफी हद तक नियंत्रित हो जाए ।  

पर अब ट्रंप तो इस प्रतीकात्मक अनुबंध को ही खुले आम चुनौती देते हुए अपनी मनमर्जी के नियमों की रचना करने पर उतारू हैं। ट्रंप का राजनीतिक आचरण हमें केवल एक व्यक्ति का अहंकार नहीं, बल्कि उस अमेरिकी दैत्याकार शक्ति का सभी आवरणों को चीर कर प्रकट होना प्रतीत होता है, जिसे कई दशकों तक पाल-पोस कर तैयार करने पर भी संस्थागत विवेक के जरिये  ढँक कर रखा जा रहा था। पिछले तमाम दशकों से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की छवि को दुनिया के सबसे ताकतवर इंसान के रूप में गढ़े जाने के बावजूद किसी राष्ट्रपति ने उस सर्वशक्तिमानता को अपने चरित्र में इतने आक्रामक स्वरूप में नहीं ढाला जैसा ट्रंप अभी करते दिखाई देते हैं । वे हर डर से मुक्त, नियमों से परे हैं और अपने को “अमेरिका” का पर्याय मान चुके हैं । अपनी इस आत्म-छवि से कि जैसे वे खुद ही अमेरिका है, उन्हें ऐसा लगता है कि मानो वे जो चाहें, कर सकते हैं !

दरअसल, मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के अनुसार, प्रमाता की छवि, प्रतीकात्मक जगत और इनके इतर यथार्थ (रीयल) की गांठ के अंदर के तनाव में विस्फोटक मोड़ तब आता है जब उसका छविमूलक अहंकार रीयल की भूमिका को अनियंत्रित खुला छोड़ देता है। इससे अमेरिकी सत्ता की राक्षसी शक्ति उसके राष्ट्रपति को, अर्थात् उसके प्रतिनिधि को राजनीति के शर्तों के परे साक्षात राक्षस बना देती है । 

मानव-संहार और पूर्ण-प्रभुत्व की लालसा के राक्षसी तंत्र के यथार्थ से निर्मित ट्रंप के लिए डर मानव जीवन का अवांछित सत्य नहीं, बल्कि राजनीति का एक वांछित, जरूरी और सक्रिय हथियार हो गया है। वे विश्व राजनीति में नाभिकीय हथियारों से उत्पन्न अस्तित्वगत संकट के आतंक को सुनियोजित ढंग से तेजी से उभार रहे हैं, जिसे हिटलर की पराजय के बाद की प्रतीकात्मक व्यवस्था ने वर्षों से दबाकर रखा है । नाभिकीय विनाश, अनियंत्रित युद्ध, मानव सभ्यता मात्र के अंत की आशंका के इस चुनौतीपूर्ण रीयल का अब ट्रंप प्रत्यक्ष धमकी के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यही कारण है कि ट्रंप के वक्तव्यों और कार्रवाइयों में शांति, कूटनीति या नैतिक तर्क जैसी चीजें हास्यास्पद हो जाते हैं । वे अपनी राक्षसी शक्ति के रीयल से दुनिया की प्रतीकात्मक व्यवस्था को पूरी तरह से निरस्त कर देना चाहते हैं।

उनके लिए ‘गोल्डन डोम’ जैसी अमेरिका को सुरक्षित करने की अवधारणाएँ किसी तकनीकी श्रेष्ठता से अधिक, एक मनोवैज्ञानिक संरचना हैं। यह विश्वास कि अमेरिका स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित कर सकता है, और शेष विश्व को असुरक्षा में धकेल सकता है, रीयल पर अपने नियंत्रण का एक कोरा भ्रम है। इसी भ्रम से उत्पन्न विश्वास के साथ वे समग्र वैश्विक परिस्थिति (टोपोलॉजी) में असंतुलन पैदा कर रहे है। इस परिस्थिति में चीन और रूस जैसी महाशक्तियां भौंचक है, पर इसका कारण जितना उनकी सामरिक तैयारियों में कमी नहीं है, उससे बहुत ज्यादा उन पर वर्तमान प्रतीकात्मक व्यवस्था का आत्मानुशासन या बंधन है जो उन्हें रीयल के जोखिम से सतर्क बनाता है । वे यह तय नहीं कर पा रहे लगते है कि उनका मुकाबला एक वास्तविक युद्ध-रणनीति से है या यह महज एक अमेरिकी राष्ट्रपति का आत्मघाती उकसावा है ! हमारी नजर में चीन और रूस में यह अनिर्णय की स्थिति ही ट्रंप की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य है जिसका लाभ ट्रंप को उसके टैरिफ युद्ध, वेनेजुएला के तेल पर कब्जे और अभी ईरान तक में अपने हितों को साधने में मिल रहा है । 

इस पूरे संदर्भ में किसी के भी दिमाग में हिटलर की ऐतिहासिक स्मृतियां उभर सकती है । हिटलर ने भी ट्रंप की भांति ही प्रतीकात्मक व्यवस्था को ध्वस्त कर अपनी ताकत के रीयल को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करना चाहा था। लेकिन आज के रीयल की विनाशकारी क्षमता असीमित है, उसका विस्फोट किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं रह सकता, वह पूरी मानव जाति को निगल सकती है। हिटलर के हाथ में तब वह ताकत नहीं लगी थी । 

लकानियन समग्रता की भाषा में कहें तो, आज की दुनिया एक ऐसे बोरोमियन विन्यास में फँसी हुई है जिसमें प्रतीकात्मक, छविमूलक और रीयल की गाँठ ढीली हो चुकी है। ट्रंप इस गाँठ को और कसने की बजाय उसे ऐसे झटके से खींच रहे हैं कि उसमें से रीयल अलग से बाहर निकल आए, और वह अपना वर्चस्व स्थापित कर लें । उन्हें इस बात की जरा भी फिक्र नहीं है कि इस गांठ के खुलने का अर्थ है कि प्रतीकात्मक और छविमूलक, वर्तमान की पूरी संरचना ही बिखर जायेगी । वे सचेत रूप में इसे बिखेरना चाहते हैं, बिना यह सोचे कि इसका अंतिम अंजाम क्या होगा । इसी राजनीति के तहत वे नहीं चाहते कि रूस-चीन धुरी अपनी शक्ति का संतुलित प्रदर्शन भी करें । वे उसे डरा कर निष्क्रिय रखना चाहते हैं और कम से कम अपने प्रभाव क्षेत्र में अपने हिसाब का एक नया संसार गढ़ लेने पर उतारू हैं । चीन और रूस को परोक्ष रूप में यह लालच भी दे रहे हैं कि क्यों न वे भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में अपने रीयल के अनुरूप नया विश्व गढ़ लें । रीयल को इस प्रकार, लगातार उकसाने का अर्थ है विश्व को समग्र-विस्फोट के कगार पर ले जाना । इसकी उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है।

इसलिए ट्रंप द्वारा पैदा की जा रही समस्या को द्वंद्वात्मक रूप में समझने की जरूरत है । यह न तो केवल ट्रंप की निजी सनक है, न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद की कोई सुविचारित, अजेय रणनीति। यह अमेरिकी शक्ति का वह नग्न रूप है, जो अपने ही छविमूलक अहंकार में डूबकर अपनी प्रतीकात्मक सीमाओं को नकार रहा है। यही कारण है कि यह राजनीति जितनी दूसरों के लिए घातक है, उतनी ही अंततः स्वयं अमेरिका के लिए आत्मघाती भी हो सकती है। डर से क्षणिक प्रभुत्व तो स्थापित किया जा सकता है, पर कोई नई स्थायी विश्व-व्यवस्था तैयार नहीं हो सकती जिसका सपना ट्रंप देख रहे हैं । रीयल की स्वतःस्फूर्त चुनौती जहां प्रगति का वाहक बनती है, वहीं उसे हथियार बनाने की नीति अंततः उस स्वार्थ, शक्ति और हिंसा से लबरेज, अनियंत्रित रीयल को उनमुक्त कर देती है, जिसे सभ्यता ने सदियों की मेहनत से निर्मित प्रतीकात्मक व्यवस्था से बाँध रखा है और जिसे काबू में रखने के लिए अभी सिर्फ पचासी साल पहले द्वितीय विश्वयुद्ध में तकरीबन बारह करोड़ से ज्यादा लोगों की कुर्बानियां दी गई थी।

ट्रंप की कार्रवाइयां अमेरिकी साम्राज्यवाद की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से "सनक" या सिर्फ ट्रंप तक सीमित करना भी सही नहीं है। अमेरिकी इतिहास में मुनरो डाक्ट्रिन से लेकर अभी की ट्रंप की  हेमिस्फेरिक डोमिनेंस (प्रभावक्षेत्र पर वर्चस्व) की प्रवृत्ति लंबे समय से मौजूद है। 2025 की अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी में "फ्लेक्सिबल रियलिज्म" का उल्लेख इसी दिशा में इशारा करता है, जो अमेरिका पर दुनिया के प्रबंधन के बोझ को कम करते हुए अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देता है । यही ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ (मागा) की नीति के मूल में है । वेनेजुएला में निकोलस मदुरो का अपहरण और ग्रीनलैंड पर कब्जे की बातें एक नई तरह के "नग्न साम्राज्यवाद" को दर्शाती हैं, जहां अमेरिका खुले तौर पर प्राकृतिक संसाधनों और क्षेत्रीय प्रभुत्व पर अपने को केंद्रित कर रहा है।  पर यही अंतरराष्ट्रीय कानून और गठबंधनों को कमजोर भी कर रहा है। इस प्रकार, यह अमेरिकी सत्ता की एक निरंतरता ही है, न कि सिर्फ एक व्यक्ति का अहंकार। 

पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भी इराक, अफगानिस्तान में जैसे हस्तक्षेप किए, ट्रंप इसे बिना किसी वैचारिक आवरण के कर रहे हैं । इसे अभी की भाषा में ‘ट्रांजैक्शनल रिलेशन्स’ कहा जाता है। 

हमें याद रखना चाहिए कि साम्राज्यवाद अमेरिकी विदेश नीति के डीएनए में है, और ट्रंप इसे ही बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने ला रहे हैं। अगर चीन और रूस जैसी शक्तियां संयम बरतती रहीं, तो ट्रंप की रणनीति कामयाब हो सकती है । लेकिन इन सबसे वैश्विक विस्फोट का जोखिम हमेशा बना रहेगा।


सोमवार, 22 दिसंबर 2025

संघ के अवलोपीकरण की भागवत की उलटबांसी !


−अरुण माहेश्वरी 


दो दिन पहले कोलकाता में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ क्या है और क्या नहीं है, इस पर रोशनी डालते हुए अनायास ही अपने संगठन की उस सचाई पर से पर्दा उठा दिया कि आरएसएस माफिया गिरोहों की तर्ज पर एक गोपनीय ढंग से काम करने वाला ऐसा संगठन है जिसका अपना वास्तव में कोई संविधान नहीं है; वह सभी कानूनी- गैर-कानूनी उपायों से समाज पर हिंदू वर्चस्व को कायम करने के लिए अनेक स्तरों पर काम करता है । 

उन्होंने कहा कि संघ क्या है इसे कभी कोई नहीं जान सकता, उसे तो सिर्फ अनुभूत किया जा सकता है । वह अनंत स्तरों पर असंख्य संगठनों के जरिये काम करता है । उसे सिर्फ बीजेपी के कामों के जरिये नहीं पहचाना जा सकता है । 

दरअसल, आरएसएस की अपनी सचाई का बयान करने वाला यह खुद के बारे में उनका कोई नया कथन नहीं है । आरएसएस का शुरू से ही कोई लिखित संविधान नहीं था । उनसे जब संगठन के उद्देश्यों और काम के तौर-तरीकों को स्पष्ट करने के लिए उनके संविधान के बारे में पूछा जाता था, तो उनका एक ही जवाब होता था – ‘भला हिंदू संयुक्त परिवार का भी कोई संविधान होता है ?’ वह तो एक अलिखित, सदियों की परंपराओं से स्वतः निर्मित एक आत्म-शील है, जिसमें बस परिवार के कर्ता की इच्छा ही शिरोधार्य, सर्वोपरि होती है । कर्ता के विवेक को कभी कोई चुनौती नहीं दी जा सकती है । 

इस प्रकार, ‘संयुक्त हिंदू परिवार’ के नाम पर वे हमेशा से एक पूरी तरह से तानाशाह, माफियागिरी के उसूलों पर चलने वाले गोपनीय संगठन की बात ही करते रहे हैं । हास्यास्पद ढंग से इनके लोग संघ को लगभग एक ईश्वरीय सत्ता के रूप में रखते हुए गीता का यह श्लोक भी उद्धृत करते रहे हैं – 

‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः ।

अभ्युत्थानं धर्मस्यः तदात्मानं सृजभ्याहम ।।’

गौर करने की बात है कि आरएसएस का पहला लिखित, एक तथाकथित संविधान (जिसका वास्तव में कोई मूल्य नहीं है) तब बना जब गांधीजी की हत्या के बाद हिरासत में लिये गये इसके प्रमुख सिद्धांतकार गुरु गोलवलकर को तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने मजबूर किया कि वे संघ का एक संविधान तैयार करके अपने उद्देश्यों और काम के तौर-तरीकों की जानकारी सार्वजनिक करें । जेल में रख कर ही उन्होंने गोलवलकर से संघ का संविधान तैयार करवाया । उस संविधान में अस्वाभाविक रूप में यह भी लिखवाया गया कि संघ भारत के राष्ट्रीय झंडे का सम्मान करता है, जो स्वयं में आरएसएस की राष्ट्रीय निष्ठा के बारे में भी बहुत कुछ कहता है !

कहना न होगा, आरएसएस तब भी अपनी किसी स्पष्ट सार्वजनिक पहचान से परहेज करता था ताकि उसके गोपनीय षड़यंत्रकारी कामों के लिए कोई उसे जिम्मेदार न करार सके, और आज भी अपने को हर लौकिक सांगठनिक क्रियाकलाप से, खास तौर पर तमाम प्रकार के भ्रष्टाचार और गैर-कानूनी कामों में लिप्त अभी की बीजेपी सरकार की करतूतों से अलग कर रहा है ताकि इस सरकार के विरुद्ध जमा हो रहे तीव्र जन-असंतोष के रोष के प्रभाव से वह अपने को सुरक्षित रख सके ।

भागवत ने अपने कोलकाता उद्बोधन से संघ को ऐसी आदिम सत्ता में बदलने की कोशिश की जो अपने प्रकट अनंत रूपों से लगभग एक जादू के बल पर अदृश्य शक्ति का रूप ले लेती है । विज्ञान के अनुसार तो संख्यात्मक या परिमाणात्मक परिवर्तन वस्तु में गुणात्मक परिवर्तन का कारण बनता है । पर यहां वे संख्यात्मकता से संघ को बिल्कुल निर्गुण बना देने, अर्थात् उसके गुणात्मक अवलोप की बाजीगरी करना चाहते है, ताकि संघ को उसके कथित विस्तार के हवाले से ही इतना अमूर्त बना दिया जाए कि उसे उसकी गतिविधियों से समाज में पैदा हो रही गलाजतों के अपराध से बिल्कुल मुक्त रखा जा सके । 

हमारे शास्त्रों के अनुसार भी, शक्ति के योग से ही शिव की कोई पहचान होती है, अन्यथा शिव तो शव होता है । जब तक सत्ता का बल से संपर्क नहीं होता, उस पर कोई विमर्श संभव नहीं होता है । प्रमाता के तौर पर वह अवलुप्त होता हैं । संघ को तमाम सचेत विमर्शों से बाहर रखने के लिए ही भागवत सचेत रूप से उसे महज एक अदृश्य, शुद्ध गुण में बदल कर उसके प्रमातृत्व को छिपाना चाहते हैं । यह शुद्ध धार्मिक अद्वैतवादी तर्क का चमत्कार है जो परमशिव को जगत के बाहर अधिष्ठित करके जगत को उसके उल्लास के अनंत रूपों का समुच्चय मानता है ! 

कहना न होगा, जो विमर्श में नहीं आता, वही सबसे अधिक हिंसक होता है।

भागवत कभी नहीं बताते कि असल में आरएसएस क्या है । सिर्फ इस पर बल देते हैं कि वह अन्य जैसा नहीं है; उसे देखा नहीं, सिर्फ महसूस किया जा सकता है ! लेकिन हम भारत के लोग, हर दिन अपने अनुभवों से संघ को सांप्रदायिक जहर फैलाने वाले बहुमुखी नाग के ठोस रूप में देखते हैं । सांप्रदायिक संगठनों के एक समुच्चय, एक संजाल, आज की भाषा में नेटवर्क के रूप में आरएसएस की ठोस पहचान को भागवत अपने थोथे दार्शनिक अंदाज से झुठला नहीं सकते हैं । हम जानते हैं कि जो स्वयं को सब जगह फैलाता है, वही सबसे अधिक ठोस सत्ता होता है।


सोमवार, 15 दिसंबर 2025

कम्प्यूटर क्रांति महज युवाओं का मसला नहीं है

-अरुण माहेश्वरी 




 

जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की ‘ कंप्यूटर क्रांति और युवा ‘ विषय पर वार्ता से ऐसा आभास हो रहा था कि जैसे यह कोई महज एक नैतिक विचलन का सवाल हो जिसमें पूंजीवाद और उसके नव-उदारवाद के उपभोक्तावादी दलदल में मनुष्य, खास कर युवा फँसा हुआ है। 

 

दरअसल, हम पूरे विषय को बिल्कुल भिन्न धरातल से देखते है। युवाओं के खास संदर्भ में जिस कंप्यूटर क्रांति की बात हो रही है, उसमें शुरू में ही यह भेद किया जाना चाहिए है कि वह क्रांति जो हमारे लिए तो एक माध्यम की तरह आई थी, युवाओं के लिए वह उसका परिवेश है । 

 

हमारी पीढ़ी के लिए कम्प्यूटर एक औज़ार था, एक बाहरी संरचना पर युवा वर्ग के लिए वह एक संपूर्ण डिजिटल संसार है, उसकी सामाजिकता का प्राथमिक क्षेत्र, बल्कि मैं तो कहूँगा, उसकी पहचान की जन्मभूमि । युवाओं का बाकी, आफलाइन  जीवन अब क्रमशः किनारे खिसकता जा रहा है । उनके लिए क्रमशः डिजिटल में होना न होना, कोई आप्शन नहीं । उनके लिए महत्वपूर्ण यह है कि डिजिटल में वह किस रूप में मौजूद रहेगा।

 

पहले प्रमाता की पहचान वर्ग, परिवार, जाति या वैचारिक प्रतिबद्धता से बनती थी। अब युवा की पहचान उसका प्रोफ़ाइल है, एक स्टोरी है, उसकी एल्गोरिद्मिक उपस्थिति, visibility है। यह पहचान भी कोई स्थिर संरचना नहीं, बल्कि लगातार अद्यतन होने वाला समुच्चय है। युवा ‘मैं कौन हूँ’ से अधिक ‘मैं कैसा दिख रहा हूँ’ के प्रश्न में जीता है। लकानियन भाषा में, यह प्रमाता के चित्त के छविमूलक (Imaginary) पहलू का अभूतपूर्व विस्तार है। प्रमाता का होना, न होना उसके शरीर और उसकी छवि का द्वंद्व भी माना जा सकता है ।

 

लकान के यहाँ जहाँ चित्त का छविमूलक अंश (imaginary register) हमेशा प्रतीकात्मक (symbolic) के अधीन रहता था, लगता है जैसे अब डिजिटल संसार में यह क्रम उलटने लगा है। आज का युवा पहले दिखता है, फिर बोलता है, और कई बार बिना बोले ही अपनी पहचान बना लेता है ।  

 

मनोविश्लेषण में प्रमाता की पहचान के लिए उसकी बात का अतीव महत्व रहा है, वह ‘बात’ अब गौण हो रही है । प्रमाता बोलने वाला नहीं, देखे जाने वाला बन रहा है । इससे प्रमाता की चिंता (anxiety) का नया रूप पैदा होता है, जो उसकी भाषा से नहीं उसके दिखने, न दिखने से तय होने लगता है जिसका हम शरीर और छवि के संदर्भ में उल्लेख कर चुके हैं।  इसमें और भी अनोखा पहलू यह है कि पहले के जाति, धर्म, विचारधारा के सुपर स्ट्रक्चर के विपरीत वह क्या दिखेगा, किसे दिखेगा, कितनी बार दिखेगा, यह मशीनी एल्गोरिद्म तय करता है। 

 

हमारे समय के प्रमुख दार्शनिक एलेन बाद्यू कहते हैं कि घटना वह होती है जो यथास्थिति को तोड़ती है। पर युवा डिजिटल संसार में तो स्थिति लगातार स्वयं बदलती रहती है, पर कोई घटना घटती नहीं। सब कुछ ट्रेंड, वायरल होकर खुद ही मिट भी जाता है। एक प्रकार का ऐसा सतत उल्लासोद्वेलन, जिससे किसी सत्य का संकेत आभासित नहीं होता । इससे एक अजीब से नई थकान जन्म लेती है, निरर्थक सक्रियता की थकान।

 

फिर भी हम कहेंगे कि युवा वर्ग के लिए कम्प्यूटर युग का अर्थ केवल उसकी लत, अस्थिरता या सतहीपन नहीं है। बल्कि यह एक संक्रमण काल है, जहाँ प्रमाता पहली बार बिना परम्परागत प्रतीकात्मक सहारे के, बिना स्थिर पहचान, बिना अपने साथ जुड़ी पुरानी पुरखों की अलौकिक कथाओं के जीना सीख रहा है। निश्चित रूप से यह जोखिम भरा है, पर इसमें एक संभावना भी छिपी है । बहुलताओं के बीच रहते हुए प्रमाता स्वयं को स्वतंत्र रूप से ज्यादा आसानी से पुनर्रचित कर सकता है।  

 

दरअसल, यहीं से उस नए दर्शन की जन्मभूमि तैयार होती है जिसे ऐलेन बाद्यू की बहुलता के समुच्चित संसार, बहुल द्वंद्वों के भुवन के दर्शन की भूमि कहते हैं ।

 

हमारी पीढ़ी डिजिटल संसार की आलोचना कर सकती है। पर युवा वर्ग उसमें प्रयोग कर रहा है।इसीलिए युवा सिर्फ समस्या नहीं हैं, वे भविष्य की प्रयोगशाला हैं।

 

प्रश्न यह नहीं कि उन्हें डिजिटल से कैसे बचाया जाए, बल्कि यह है कि उन्हें मनुष्य के स्थायी भावों से सिंचित प्रमाता होने की भाषा से इस नये बहुल-समुच्चयी संसार में कैसे प्रशिक्षित किया जाए?

 



दरअसल, युवा का वर्तमान परिवेश ही भविष्य का सामान्य परिवेश होता है । वही कुछ समय बाद मनुष्य मात्र का परिवेश बनता है।यह बात हर युग में सच रही है।औद्योगिक युग में, फैक्टरी पहले युवाओं को खींचती है, फिर वही जीवन-लय पूरे समाज की बन जाती है।

 

इसी प्रकार, डिजिटल संसार पहले युवाओं का परिवेश है, पर वही शीघ्र ही मानव जीवन का सामान्य ढाँचा बनेगा, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए । इस अर्थ में युवा पर विचार करना कोई विशेष बात नहीं, बल्कि मानवता के आगत सामान्य स्वरूप के अध्ययन जैसा ही है । 

 

जीवन में किसी भी क्रांति पर विचार उसके भावी प्रभावों के साथ ही संभव है। कोई भी क्रांति अपने वर्तमान रूप से नहीं, बल्कि उसके भविष्य के सामान्यीकृत स्वरूप से समझी जाती है। इसलिए लकान प्रमाता पर विचार की भाषा को अनिवार्यतः वर्तमान-निरंतर काल ( present continuous tense) की भाषा कहते हैं । 

 

कम्प्यूटर क्रांति को समझने के लिए हमें यह समझना चाहिए कि जब डिजिटल परिवेश कोई विशेष बात नहीं रहेगी, जब वह अदृश्य सामान्यता बन जाएगा, तब मनुष्य कैसा होगा? युवा इसी भविष्य का प्रयोग-स्थल है । 

 

इसीलिए हम फिर से दोहरायेंगे कि आज युवा-संदर्भ में विचार का औचित्य यह नहीं है कि युवा अलग हैं, या उनमें कोई नैतिक कमी है।इसका औचित्य इस बात में है कि युवा वह स्थान है जहाँ भविष्य अपने अधूरे, अस्थिर रूप में आभासित होता है। यह घटना के सत्य के प्रकटीकरण का स्थान है । युवा में जो अस्थिरता, चिंता, छविमूलकता, पहचान की तरलता दिखती है, वह उनका निजी दोष नहीं, बल्कि आने वाले सामान्य जीवन का प्रारूप है। यह अगर एक रोग हैं, तो हमारे सामान्य जीवन का ही रोग है । 

 

लकान के अनुसार, किसी भी क्रांति से जीवन की सारी संरचनाएँ एक साथ नहीं बदलतीं। सबसे पहले वह प्रमाता को अस्थिर, समस्याग्रस्त बनाती है, उसकी पहचान को हिलाती है, फिर प्रतीकात्मक व्यवस्था को झकझोरती है। युवा समुदाय इस अस्थिरता के वार का पहला निशाना होता है । इसलिए युवा का अध्ययन उनका निजी मनोवैज्ञानिक नहीं, समग्र रूप से समाज का संरचनात्मक अध्ययन भी है।

 

एलेन बाद्यू सत्य के स्वरूप के बारे में अपने UCE ( Universal Concrete Exception) की अवधारणा में यही संकेत देते हैं कि कोई स्थिति तभी ऐतिहासिक होती है जब उसका अपवाद ही सामान्य बन जाए। युवा आज डिजिटल युग के अपवाद नहीं, वे इसके सामान्यीकरण का पहला रूप हैं। कल यही स्थिति हर बुज़ुर्ग, मज़दूर, लेखक, नेता, आदि सबकी होगी । 

 

फलतः, युवा पर विचार इसलिए नहीं ज़रूरी है कि वे अलग हैं, बल्कि इसलिए ज़रूरी है कि वे सभ्यता के सत्य के आभास के प्रथम स्थल हैं।वे वह स्थान हैं जहाँ कम्प्यूटर-बहुलता का समुच्चय पहली बार मानव जीवन का परिवेश बन रहा है। युवा-संदर्भ में सोचना नैतिक उपदेश और पीढ़ियों के बीच फर्क का विषय नहीं, सभ्यता के भविष्य का दार्शनिक पूर्वानुमान है।

 

हम कंप्यूटर या डिजिटल युग को सभ्यता के विकासक्रम में एक अनोखे विच्छेद के रूप में साफ तौर पर देख सकते हैं । प्रारंभिक पाषाण, ताम्र और लौह युग में मनुष्य की रचनात्मकता का लक्ष्य प्रकृति के भीतर हस्तक्षेप था। इनमें औज़ार और तकनीक प्रकृति को मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार ढालने के माध्यम थे।

 

कम्प्यूटर युग को हम इसमें एक निर्णायक विच्छेद के रूप में पाते हैं । यह वह पहला चरण है जब मनुष्य किसी पदार्थ को आधार बना कर अपने उत्पादन संबंधों का संसार नहीं रचता है , बल्कि स्वयं से ही एक स्वायत्त प्रति-संसार की संरचना को जन्म देता है; एक ऐसी संरचना को जो स्वयं में एक भुवन की तरह कार्य करती है । 

 

इस अर्थ में कम्प्यूटर युग औज़ारों का नहीं, संसारों का युग है। इसे बाद्यू के ‘भुवनों के तर्क’ से अच्छी तरह समझा जा सकता है जो व्यवस्था के अंदर ही एक स्वायत्त संसार रचते हुए स्थापित संसार को विस्थापित कर उसका स्थान लिया करता है । इस नये युग में सभ्यता का भौतिक आधार औज़ारों के बजाय संसारों, सत्यों के समुच्चयों, बहुलताओं के अपवाद-स्वरूप भौतिक स्वरूपों से निर्मित होता है । 

 

यह एक प्रकार से मनुष्यों का आत्म-विस्थापन है । इसमें मनुष्य पहली बार अपने ही संज्ञानात्मक और प्रतीकात्मक कार्यों को अपने से काट कर अलग कर देता है। स्मृति डाटा बन जाती है, निर्णय एल्गोरिद्म, संबंध नेटवर्क और इच्छा प्रोफ़ाइल । 

 

यह प्रक्रिया केवल तकनीकी नहीं, तात्विक  (ontological) है। मनुष्य अपने ही भीतर की क्रियाओं को एक बाह्य संरचना में बदल देता है जिसमें वह स्वयं को ही पहचानने के लिए बाध्य होती है। मार्क्स ने इस स्थिति को ही ‘पूंजी’ में पण्यों के प्रति अंध श्रद्धा (commodity fetishism) से सबसे पहले व्याख्यायित किया था । यह स्थिति आत्म-प्रतिबिम्ब (self-reflection) की नहीं, बल्कि आत्म-विस्थापन (self-alienation) की है, जो पारम्परिक अर्थों में मार्क्स की 1844 की पांडुलिपियों में व्यक्त विच्छिन्नता (alienation) मात्र नहीं, बल्कि पण्यों के एक संसार के व्यापक ताने-बाने में प्रमाता को उसकी अपनी जगह से विस्थापित कर रोपित करने जैसा है। 1844 की पांडुलिपियों के युवा मार्क्स का ‘पूंजी’ के परिपक्व मार्क्स में अतिक्रमण होता हैं और वे सत्य के स्थानीय, ठोस, अपवाद-स्वरूप समुच्चयों के भुवन के आधुनिक दार्शनिक सिद्धांत की आधारशिला रखते हैं । 

 

जॉक लकान ने तो प्रतीकात्मक व्यवस्था (Symbolic Order) को पहले से ही प्रमाता से स्वतंत्र कहा है। भाषा, क़ानून और संरचना, सब प्रमाता से पहले मौजूद रहते हैं। कम्प्यूटर युग में यह प्रतीकात्मक व्यवस्था और प्रबल, स्वचालित और निर्णयात्मक (decisive) बन जाती है।प्रतीकात्मकता सिर्फ अर्थ का स्रोत नहीं, उसका कारक हो जाती है। हम देख सकते हैं कि इस नये रीयल में व्यवधान पैदा करने वाले रीयल का भी अपना विशेष रूप होगा जिसे एल्गोरिद्मिक गड़बड़ी, सिस्टम क्रैश, डेटा लीक आदि के रूप में वर्णित किया जा सकता है । ये वे बिंदु हैं जहां गणना विफल हो जाती है। इसमें हैकिंग या सिस्टम से खिलवाड़ की तरह की करतूतों को प्रमाता का जुएसॉंस कहा जायेगा। 

 

कंप्यूटर क्रांति और उसका नया संसार वर्तमान की भांति ही न तो पूर्णतः प्रतीकात्मक है, न छविमूलक । यह भी रियल के लगातार हस्तक्षेप के लिए एक खुला क्षेत्र है, पर निस्संदेह अपने प्रकार का । यह उतना ही बहुल है जितना अभी का सामान्य संसार क्योंकि इसमें भी गणना में गड़बड़ की संभावना हमेशा रहेगी, अनंतता की ख़लल रोकी नहीं जा सकेगी, अर्थात् अभाव से जुड़ी इच्छा का जुएसॉंस तक का पहलू किसी न किसी रूप में बरकरार रहेगा । युवा कत्तई इसमें अनिवार्यतः गुलाम नहीं होता है ।

 

 

 

 


गुरुवार, 27 नवंबर 2025

बंगाल में दुर्गा पूजा !

 

-अरुण माहेश्वरी 





डा. शंभुनाथ इस उम्र में भी कोलकाता के पूजा पंडालों में घूमने का उत्साह और साहस रखते हैं, इसे उनकी फ़ेसबुक पोस्ट पर देख कर भारी प्रसन्नता हुई । हम उन्हें हृदय से बधाई देते हैं । 


उन्होंने इस पोस्ट में पंडाल-भ्रमण के अपने अनुभव का ब्यौरा दिया है और साथ ही दुर्गा पूजा की पुराण कथा के रूप में कृत्तिवासकृत रामायण में आए एक प्रसंग को बताया है । उन्होंने और भी धर्म-पुराण की कुछ बातें लिखी हैं जिन पर कुछ मित्रों ने कई प्रकार भी की टिप्पणियाँ की है । 


यह सच है कि दुर्गापूजा के पीछे की धार्मिक कथा के रूप में आम तौर पर 15वीं सदी के ‘कृत्तिवास रामायण’ में आए ‘अकाल बोधन’ प्रसंग की चर्चा की जाती है । कृत्तिवास की रामायण में लंका गमन के वक्त राम शिव के बजाय शक्ति की देवी दुर्गा की आराधना करते हैं । इस पर कृत्तिवास ने लिखाः


“अकाल बोधन कोरिला रघुवीर

शरत् काले देवी पूजिलेन धीर।”


कृत्तिवास ने राम के द्वारा देवी की इस प्रार्थना को ‘अकाल बोधन’ अर्थात् असामयिक पुकार कहा, क्योंकि आम तौर पर तो देवी की पूजा बसंत ऋतु में होती है, पर राम के लंका गमन के वक्त वसंत नहीं, शरत् ऋतु थी ।


बहरहाल, इसी प्रसंग में हमें याद आया कि अभिनवगुप्त के “तंत्रालोक” के प्रथमाह्निकम् में ही में शिव पुत्र गणेश और कार्त्तिक के बारे में श्लोक आता है - 


“गणेशस्कन्दसंज्ञाद्याः शक्तेः शक्त्युपजीविनः ।

तेऽपि तस्याः प्रसादेन सिद्धिं यान्ति स्वकां ध्रुवम् ॥”


जैसा कि सब जानते हैं, कश्मीरी शैवमत में शक्ति ही सर्वोच्च है जिसके बिना संसार में शिव शव के समान होते हैं। उपरोक्त श्लोक में कहा गया है कि शिव की संतानें गणेश और स्कन्द (कार्त्तिक) दुर्गा ( शक्ति) पर आश्रित है । इसी तरह ब्रह्मा-विष्णु की शक्तियां सरस्वती और लक्ष्मी भी उसी आदिशक्ति दुर्गा के ही अलग-अलग रूप है। इस प्रकार, आदि पराशक्ति दुर्गा और उस पर आश्रित शक्तियों का जो एक पूरा परिवार तैयार होता है वह ‘परिवार’ तंत्रशास्त्र में पुराणिक पारिवारिक संरचना के बजाय एक तांत्रिक एकता का प्रतीक बन कर आता है।


पता नहीं, हमें क्यों लगता हैं कि इस प्रकार बुराई से संघर्ष के मनुष्य के संकल्प की तांत्रिक एकाग्रता को ही आख्यान का रूप देते हुए, from logos to mythos की सत्तर्क क्रिया को विश्वास में बदलने की प्रक्रिया से एक युद्धरत परिवार की पौराणिक कथा का रूप दिया गया है । और शिवस्तोत्रों  की परंपरा से दुर्गा सप्तशती का चण्डीपाठ तैयार हुआ है । 


बहरहाल, जो भी हो, हमें बंगाल में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा का आधुनिक इतिहास इस पुराण चर्चा से कहीं ज्यादा दिलचस्प और मानीखेज लगता है । इससे जो सबसे बड़ी बात प्रमाणित होती है कि यह उत्सव जितना धार्मिक उत्सव रहा है, उससे कहीं ज्यादा इसका संबंध बंगाल में सत्ता के समीकरण से रहा है। औपनिवेशिक संक्रमण के काल में स्थानीय हिंदू जमींदारों ने अपने अस्तित्व के लिए एक अलग ही प्रकार के सामाजिक-राजनीतिक उपकरण के रूप में इसे विकसित किया था । दुर्गा पूजा के इस जमींदारी रूप को समझे बिना इसके मर्म को शायद कभी भी पूरी तरह से नहीं समझा जा सकेगा । 


सन् 1757 में प्लासी युद्ध में सिराजुद्दौला की पराजय के बाद बंगाल में मुग़ल सल्तनत का सूरज तेज़ी से ढलने लगा और अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कंपनी का वर्चस्व स्थापित हुआ । तब बंगाल के जमींदार वर्ग की ज़रूरत थी कि वह मुग़ल दरबार के बजाय अंग्रेज़ों की नई सत्ता की छाया प्राप्त करें । अंग्रेज़ों के सामने अपनी सामाजिक शक्ति के वैभव का प्रदर्शन करें । 

तभी बारह ज़मींदार मित्रों ने मिल कर दुर्गा पूजा के एक भव्य उत्सव के आयोजन की परंपरा शुरू  की । इसीलिए दुर्गा पूजा का मूल नाम भी बारो-यारी पूजा था । कोलकाता शहर की राजबाड़ियों, शोभाबाज़ार राजबाड़ी, रानी रासमणि के परिवार में इसका आयोजन होने लगा । और इन आयोजनों में बड़े ताम-झाम के साथ अंग्रेज़ अधिकारियों और स्थानीय समाज दोनों को बुलाया जाने लगा । क्रमशः कोलकाता में यह पूजा एक प्रकार के सामाजिक दरबार का रूप लेती चली गई । बड़े-बड़े भोज आयोजित होने लगे जिसमें शहर के गणमान्य लोगों के साथ ही यूरोपीय अतिथियों को बड़े आदर से आमंत्रित किया जाता था । 


तभी से थियेटर, नृत्य, नौटंकी जैसी कलाओं का प्रदर्शन भी इस उत्सव से अभिन्न रूप में जुड़ गया। जमींदार अपनी धन-संपत्ति और भक्ति-भाव का इसमें खुल कर प्रदर्शन करते और खूब ख़र्च किया करते थे । इस सांस्कृतिक-धार्मिक वैभव और अपनी सामाजिक हैसियत के प्रदर्शन से वे अंग्रेज़ों के साथ निकटता बनाया करते । अंग्रेज़ अधिकारियों को बड़ी-बड़ी डालियां भेजी जाने लगी। 


और, अंग्रेज़ अधिकारियों के लिए दुर्गा पूजा का उत्सव स्थानीय कुलीन तबकों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता था। वे इन उत्सवों में भारी उत्साह से शामिल होते । इस प्रकार, दुर्गापूजा के मंच पर एक तरह की सांस्कृतिक कूटनीति भी चला करती थी। अंग्रेज़ इन आयोजनों में हर प्रकार का प्रशासनिक सहयोग भी दिया करते थे ताकि ज़मींदारों का उन्हें सहयोग और समर्थन मिलता रहे । 


इस प्रकार, बंगाल में दुर्गोत्सव का विकास शुरू से धर्म से अधिक राजनीतिक-सामाजिक संवाद के मंच के रूप में ही हुआ है। यह महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक के आह्वान पर शुरू हुए गणपति- उत्सव के ‘राष्ट्रवाद’ के बिल्कुल विपरीत रहा है। 


जहां तक आम जनता का सवाल है, उसके लिए जमींदारों की यह पूजा भक्ति और मनोरंजन दोनों का केंद्र हुआ करती थी । पर इस उत्सव का एक वर्गीय चरित्र बिल्कुल साफ था । पूजा का वैभव ऐसा था जिसे सामान्य लोग केवल दूर से ही देख सकते थे। रवीन्द्रनाथ की ठाकुरबाड़ी में देवेन्द्रनाथ ठाकुर के बाद से दुर्गा पूजा का आयोजन बंद हो गया था क्योंकि उनके ब्रह्मो समाज में उसकी मान्यता नहीं थी । उनके पहले द्वारकानाथ ठाकुर के काल तक जोड़ासांको की दुर्गापूजा सांस्कृतिक भव्यता के कारण ही शहर में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करती थी । रवीन्द्रनाथ के रचनाओं में शरद्-उत्सव के रूप में इसके सांस्कृतिक पहलू की गूँज मिलती है।  


काफी बाद के दिनों में, खास तौर पर आज़ादी के बाद से “बारो-यारी” पूजा ने “सार्वजनिक पूजा” का रूप ले लिया, जिसमें जनता स्वयं ही ऐसे सार्वजनिक उत्सव का आयोजक बनने लगी, इसमें लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ती चली गई । पर मज़े की बात यह है कि धार्मिकता के अतिरिक्त इसके साथ शुरू से ही सांस्कृतिक और कलात्मक वैभव का जो पहलू जुड़ गया था, वह न सिर्फ आगे भी बना रहा, बल्कि अब तो उसमें आश्चर्यजनक रूप से एक विस्फोटक विस्तार दिखाई देने लगा है । बंगाल की दुर्गा पूजा जितना धार्मिक उत्सव नहीं बची है, उससे कहीं ज्यादा बंगालियों के राष्ट्रीय उत्सव का रूप ले चुकी है । इसे आम तौर पर शारदोत्सव के रूप में ही ज्यादा जाना जाता है । 


इन दिनों तो दुर्गा पूजा के अभूतपूर्व कलात्मक स्वरूप के विकास और इसमें बढ़ती हुई जनता की भागीदारी ने इसे संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड हेरिटेज के रूप में मान्यता दिला दी है। 


हम लोग, जो बचपन से ही इस उत्सव के वैभव के साक्षी रहे हैं, हमें भी इसके वर्तमान रूप से भारी विस्मय होता है । इसकी तुलना ब्राज़ील के कार्निवाल आदि से होने लगी है । यहां भी अब क्रमशः डिजिटल युग की छाया दिखाई देने लगी है।  


पंडालों में उमड़ती भीड़ को देखते हुए हम तो इस उम्र में आज घूम-घूम कर उन्हें देखने का सोच भी नहीं सकते । यू ट्यूब के चैनलों से सब पता चल जाता है । पर हमारे बेटे के आवासन कम्प्लेक्स के आयोजन में हम जरूर शामिल हुए। 


यहां हम उसकी चंद तस्वीरें मित्रों से साझा कर रहे है । इसमें शामिल किए गए वीडियो के अंश में महाभारत के प्रारंभ के शांतनु-गंगा संवाद का वह अंश है जिसमें गंगा अपनी आठवीं संतान को शांतनु को सौंप देती है।