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मंगलवार, 12 जून 2018

जो खुद समस्या है वे ही समाधान नहीं हो सकते हैं


-अरुण माहेश्वरी

आज के ‘टेलिग्राफ’ में एक खबर है - ‘शाह ने तीन राज्यों में चुनाव के लिये टोही गतिविधि शुरू कर दी’ (Shah starts poll recce of 3 states) ।

इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों के हवाले से इसमें कहा गया है कि इन राज्यों में जमा सरकार-विरोधी गुस्से का मुकाबला करने के लिये वे अपने कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करेंगे । मध्य प्रदेश पहुंच कर उन्होंने अपने जिन कार्यकर्ताओं के साथ खास बैठक की उनमें उनके सोशल मीडिया के स्वयंसेवक प्रमुख रूप से थे ।

इस रिपोर्ट में भाजपा के एक नेता की बात का हवाला है कि जिसमें वे कहते हैं कि “जब भी जनता हमारी सरकार से नाखुश होती है, पार्टी के कार्यकर्ता निरुत्साहित हो कर पीछे हट जाते हैं । बहुत सी जगहों पर हम इसलिये हारे क्योंकि हमारे समर्थक वोट देने के लिये नहीं उतरे । “

इस रिपोर्ट को पढ़ने से एकबारगी हमारे मन में यही सवाल पैदा हुआ कि पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं का जो तंत्र ही जनता में किसी भी पार्टी की स्थिति का मूल कारण होते हैं उसकी गिरती हुई साख का भी प्रमुख कारण हैं । पार्टी के अदूरदर्शी नेताओं को घेर कर रखने वाला यह कैसा दुष्चक्र है जो उसकी समस्या के कारणों को ही समस्याओं का समाधान मान कर इन कारणों को ही और ज्यादा हवा देने में लग जाते हैं, और इस प्रकार पार्टी के कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के नाम पर अपनी कब्र ही और तेजी से खोदने लगते है ?

जनता के बीच पार्टी और उसकी सरकार की छवि उसके कार्यकर्ताओं की ही छवि होती है, जिनमें खुद अमित शाह अपने मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों आदि को भी शामिल मानते रहे हैं । राज्य की नौकरशाही की कोई सूरत नहीं होती है क्योंकि उसकी कोई प्रकट राजनीतिक आकांक्षा नहीं होती है । इसीलिये भला-बुरा जो होता है, जनता आपकी पार्टी से नाराज होती है या खुश, वह सब जनता के बीच इन तमाम ‘कार्यकर्ताओं’ की ही करतूतों का परिणाम होता है । और इन सबके जरिये ही मूर्त होती है किसी भी पार्टी की नीतियां ।

अगर आपकी पार्टी की नीतियां सांप्रदायिक होगी, जनता को आपस में लड़ा कर मुट्ठी भर पूंजीपतियों के, कालाबाजारियों, माफियाओं और ठगों के हितों को साधने की जन-विरोधी नीतियां होगी, तो आपके नेताओं, कार्यकर्ताओं और उनके अधीन सरकार के तंत्र को अंतत: जनता में भारी असंतोष और आक्रोश पैदा करने से कोई नहीं रोक सकता । आपकी गलत नीतियां ही आपके कथित कार्यकर्ताओं के तंत्र को जनता के जीवन में रौरव नर्क पैदा करने के हथियारों का रूप देती है । और जब आप अपनी तमाम नीतियों की गहराई से समीक्षा करने के बजाय पार्टी के तंत्र के ऐसे हथियारों को ही और धारदार बनाने की बात कहते हैं, तो प्रकारांतर से आप उन कारणों को और घना करने पर ही बल दे रहे होते हैं, जो आपके पतन के मूल में हैं ।

अमित शाह ने मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी के ‘सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं’ से खास तौर पर मुलाकात की । पिछले चार सालों में भाजपा के इन ‘सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं’ को लोग एक खास नाम, ट्रौल्स’ के रूप में पहचानते हैं - आन लाइन गुंडों के रूप में । यह जाहिल अनपढ़ों की एक फौज है जो अपने हर विरोधी को गंदी से गंदी, मां-बहन की गालियां देने में सिद्ध हस्त होती है । इनके विरोध का लक्ष्य यदि कोई स्त्री होती है तो ये सबके सब आम तौर पर उसकी योनी की चीर-फाड़ में लग जाते हैं ; उसके साथ संभोग से लेकर बलात्कार और हत्या तक की धमकियां देने लगते हैं । इन ट्रौल्स की बदौलत ही सभी भाजपा शासित प्रदेशों में बलात्कार की, नाबालिगों तक पर बलात्कार की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है । जम्मू में तो एक गरीब गरेड़िये की नाबालिग बेटी आसिफा पर बलात्कार करके उसकी हत्या को न्यायोचित बताने के लिये भाजपा के वकीलों ने बाकायदा प्रदर्शन किये । उत्तर प्रदेश का एक मंत्री भी कुछ इसी प्रकार पूरी दबंगई से स्त्री पर बलात्कार को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान कर इस अपराध के लिये जेल की सलाखों में बंद है ।

यही अमित शाह की ट्रौल्स वाहिनी है जिसने मोदी के सत्ता में आने के पहले से ही आरएसएस की विचारधारा का अनुसरण करते हुए देश के मुसलमानों के खिलाफ जिस प्रकार से जहर उगलना शुरू किया था, इसके भयंकर सामाजिक दुष्परिणामों को हम सभी जानते हैं । गोमांस, गोरक्षा, लव जेहाद के नाम पर इसने समाज में एक असभ्य हत्यारों की भीड़ पैदा कर दी है, जिसके कारण देश में विकास तो सिर्फ बकवास की बातें बन कर रह गया और पूरा समाज देखते-देखते तमाम वैश्विक मानदंडों पर पिछड़ता चला गया। भारत आज दुनिया में हैप्पीनेस सूचकांक तक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे हैं ।

इस प्रकार, एक बात तो साफ है कि मोदी के शासन में आने के बाद से जो तमाम सामाजिक और नैतिक विकृतियां तेजी से बढ़ी है, उनके मूल में एक प्रमुख कारण मोदी-शाह-संघ के ये ऑन लाइन गुंडे हैं और अमित शाह आज भी आगामी चुनावों में अपनी डूब रही नांव को बचाने के लिये इन्हें ही सक्रिय करना चाहते हैं ! नोटबंदी करने वाला मोदी का तुगलकी दिमाग इन ट्रौल्स को ही अपना सबसे भरोसेमंद सिपाही मान कर इनके सरगनाओं से सीधे संपर्क में रहता है और उन्हें प्रधानमंत्री निवास पर भोज के लिये आमंत्रित भीकरता है ।

यह है पार्टी, कार्यकर्ता और जनता के बीच संबंधों की यांत्रिकता का दुश्चक्र । पार्टी अपने संदेश को ले जाने के लिये कार्यकर्ताओं के तंत्र को तैयार करती है, जनता के बीच कार्यकर्ता ही पार्टी का चेहरा होता है । लेकिन जब पार्टी की जनता के बीच साख गिरने लगती है, बुद्धिहीन नेतृत्व इन कार्यकर्ताओं की सक्रियता-निष्क्रियता को ही इसके लिये जिम्मेदार मानने लगता है । यह नहीं सोचता की कार्यकर्ता तो एक खाली कनस्तर भर होता है, उसमें चरित्र तो भरती है पार्टी की नीतियां और सत्ता के प्रति सर्वोच्च नेतृत्व की मनोदशा और उसकी राजनीतिक नैतिकता ।

जो पार्टी और नेतृत्व अपनी जन-विरोधी नीतियों और राजनीतिक -अनैतिकताओं के कारण आम लोगों में एक विकर्षण का भाव पैदा कर रहा है, वह सोचता है कि अपने ही प्रतिरूप कार्यकर्ताओं को उत्साहित करके जनता के मन को जीत लेगा - यह या एक भारी विभ्रम है या कोरी ठग-विद्या का मंत्र । अन्यथा, तर्क तो यही कहता है कि इस सत्ता के मद में चूर, अहंकारी, गुंडा और बलात्कारी कार्यकर्ता सेना को आप जितना ही अधिक उत्साहित और प्रेरित करेंगे, आने वाले चुनाव में आप उतने ही गहरे गर्त में गिरने के लिये अभिशप्त होंगे । भाजपा की समस्या का निदान उसके मोदी-शाह के विश्वस्त कार्यकर्ताओं को जगाने में नहीं, मोदी-शाह को नेतृत्व से हटाने में है और मोदी के प्रत्यक्ष संपर्क में रहने वाले तमाम तत्वों से मुक्ति में है ।

चूंकि 2014 ने भाजपा का पूर्ण कायांतर मोदी पार्टी में हो गया है, इसीलिये यह काम तब तक मुमकिन नहीं है जब तक भाजपा का अपना पूर्ण प्रत्यावर्त्तन, अर्थात उसका खोल-पलट नहीं होता है । इसीलिये यदि जनता में भारी असंतोष और रोष पैदा हो गया है तो मोदी-शाह-संघ के वर्तमान शासन के अंत को शायद ईश्वर भी नहीं टाल सकता, शाह खुद को और अपने आका मोदी को दिलासा देने के लिये शहर-शहर घूमने की कितनी भी कसरत क्यों न कर ले । इनसे वे जो भी सड़क बनायेंगे, मोदी के द्वारा अनैतिक तरीके से बागपत में लोकार्पित एक्सप्रेस वे की तरह ही, विपक्ष की आंधी-बारिस के एक झटके में ढह कर किसी भी वाहन के चलने लायक नहीं बचेगी । बनारस में ढह गये पुल के अपराधी ठेकेदार, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बेटे की तरह ही, भाजपा के अपराधी कार्यकर्ता अपना दौरात्म्य जारी रखेंगे और चुनाव के वक्त जनता की आंखों में शूल की तरह चुभते रहेंगे ।

अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष पद से अपनी अवधि के पूरा होने पर विदा हो जायेंगे, मोदी हार कर किसी कोने में अकेले बैठे शाह से जज लोया की हत्या के मुकदमे के बारे में विचार करते रहेंगे, और तब इस बीच विकसित हुए विदेशी संपर्क इन सबको दूसरे प्रकार से सतायेंगे । संघ के नेता ‘स्थितप्रज्ञ’ मुद्रा ओढ़ कर कुछ बची हुई जगहों पर शाखाएं लगाते हुए अंदर ही अंदर कोई और साजिश रचने में अपना बुढ़ापा बितायेंगे । संघ की राजनीति के भविष्य की यह सूरत, पता नहीं क्यों, आज ही साफ दिखाई देने लगी है ।


https://www.telegraphindia.com/india/shah-starts-poll-recce-of-3-states-237452?ref=india-new-stry