Google+ Followers

मंगलवार, 19 जून 2018

राजनीति का सत्य राजनीतिक दलों की दुनिया के बाहर जनता में स्थित होता है : संदर्भ दिल्ली


-अरुण माहेश्वरी


अभी से लेकर 2019 के चुनाव की घोषणा के वक्त तक भारत की राजनीति का यह चुनाव पूर्व छोटा सा काल प्रत्यक्ष के चरम विभ्रम का काल बना रहेगा, इसमें कोई शक नहीं है । राजनीति के असली खिलाड़ी अभी पर्दे की ओट में रहेंगे और गहरे जाकर खोजने की दृष्टिहीन नजरों को अभी मैदान में सिर्फ सीबीआई और ईडी दिखाई देंगे । सबसे मजे की बात यह है कि गुह्यता-प्रेमी सभी स्तर के संघी तत्वों की इन ‘भीतर-घात’ करने वाली राजनीति की अदृश्य ताकतों की गतिविधियों से बांछे खिली रहेगी । और तो और, इन राज्य खुफिया एजेंसियों के गोपनीय ऑपरेशनों की पूरी जानकारी परपीड़क मोदी-शाह को भी खुशियों से आप्लूत रखेगी । चैनलों में बैठे उनके सारे गदहें भी खुशी के मारे ढेंचू-ढेंचू कर विपक्षी एकता में बिखराव का शोर मचाते रहेंगे । कुल मिला कर, राजनीति का असली सत्य अभी कुछ दिनों के लिये सात पर्दों के पीछे इस कदर छिपा रहेगा जिसे पकड़ना सिर्फ उसी के लिये मुमकिन होगा जो आदमी के अपने कर्त्तृत्व पर न्यूनतम यकीन रखता है, परिस्थितियों के संयोग पर नजर और विश्वास रखता है ।

राजनीति की दुनिया का सबसे बड़ा सच यह है कि इसमें जो घटित होता है, उसका सत्य इस जगत के खिलाड़ियों के अपने सत्य के बाहर स्थित होता है । वह है जनता का सत्य । जब जनता मन बना लेती है तो पार्टियों के सारे गणित धरे के धरे रह जाते हैं । पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी की कैराना सीट पर भाजपा को पचास प्रतिशत से ज्यादा मत मिले थे । अर्थात, सिर्फ विपक्षी एकता के बल पर भाजपा का हारना असंभव था । लेकिन उसी कैराना में हाल के उपचुनाव में भाजपा चारों खाने चित्त पड़ी थी । एड़ी-चोटी का दम लगा कर भी किसी जगह मोदी अपने मतों में लगातार गिरावट को रोक नहीं पा रहे हैं । और यह अकेला, जनता के रुख का सत्य ही हर राजनीतिक पार्टी के अपने रुख को भी तय करने में निर्णायक भूमिका अदा करेगा । ऐसे में विपक्ष की वही पार्टी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मोदी के लिये मददगार होगी, जिसने नीतीश कुमार की तरह आत्म-हत्या करने का निर्णय न ले लिया हो ।

इस परिस्थिति में, दिल्ली में राजनीति के समीकरणों के विषय को राजनीतिक जगत की अपनी चंद जटिलताओं की जांच के एक विषय के रूप में लिया जा सकता है ।



सब जानते हैं दिल्ली में शीला दीक्षित के लगातार पंद्रह साल के रेकर्ड शासन के बाद 2012 में बनी आम आदमी पार्टी (आप) 2013 के चुनाव में दूसरे नंबर की अल्पमत की पार्टी होने पर भी कांग्रेस के समर्थन से ही सत्ता पर आ गई थी । उस सरकार ने सिर्फ 49 दिन के बाद ही यह कह कर इस्तीफा दे दिया कि कांग्रेस दल उसके जन लोकपाल विधेयक का समर्थन नहीं कर रही है। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी । तब भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के रूप में ‘आप’ में भारत की राजनीति की एक नई अखिल भारतीय परिघटना दिखाई दी थी । इसने राजनीतिक संगठन और तीव्र क्रियाशीलता के कई आधुनिक और पारदर्शी तौर-तरीके पेश किये थे जिनका प्रभाव अन्य पारंपरिक राजनीतिक दलों की प्रचार शैली पर भी पड़ा । 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने अपने तूफानी अभियान में इन सभी औजारों का जम कर प्रयोग किया और परिणाम यह हुआ कि नवजात ‘आप’ महज एक नये तकनीकी प्रयोग के बजाय एक नयी राजनीति के प्रवर्त्तन के साथ सामने आती, मोदी की भाजपा के तूफान ने सब कुछ को धो डाला । 2014 में मोदी सब जगह भारी मतों से जीते । लेकिन मजे की बात रही कि साल भर बाद ही 2015 के दिल्ली विधान सभा के चुनाव के वक्त तक ‘आप’ की ‘भ्रष्टाचार-विरोधी’ राजनीति की चमक म्लान नहीं हुई थी, जबकि मोदी के सत्ता पर आने के लाथ ही भाजपा अपनी पुरानी सारी संघी मलिनताओं और अहंकार से भरी वैचारिक दरिद्रताओं का परिचय देने लगी थी । दिल्ली के लोगों के पास ‘आप’ का अभी भी तरोताजा विकल्प मौजूद था । 2015 में ‘आप’ की ऐसी अभूतपूर्व जीत हुई कि विधान सभा की 70 में से 67 सीटें अकेले उसके पास चली गई ।

मोदी की जीत के महज साल भर बाद ‘आप’ की इस जीत ने देश भर में ‘आप’ के प्रति एक बार के लिये नये आकर्षण को पैदा किया । उसके नेतृत्व के योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण की तरह के लोग राजनीति के कुछ नये मुहावरों को गढ़ते हुए दिखाई दे रहे थे, लेकिन दिल्ली की इस मदहोश कर देने वाली सत्ता ने ‘आप’ के खुद के सारे संतुलन को डगमगा दिया । ‘आप’ की राजनीति, जो वस्तुत: पहले से ही थी ही नहीं, उसी तरह काफूर हो गई जैसे अन्ना हजारे के गांधी बन कर घूमने का स्वांग कोरा मजाक बन गया । ‘आप’ में बची रह गई कोरी दिल्ली की सत्ता और उसके चुने हुए नेताओं में उस सत्ता के भोग की उद्दाम आकांक्षा । योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की तरह के लोग जो एक ‘नयी राजनीति’ के भ्रम को पाले हुए थे, अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी को उन्हें उनकी जमीन पर उतारने में समय नहीं लगा । आम आदमी पार्टी दिल्ली की एक सत्ताधारी पार्टी बन कर रह गई जिस पर मोहल्लों तक सीमित एनजीओ छाप राजनीति की समझ रखने वाले केजरीवाल ने अपना पंजा गाड़ दिया ।

बहरहाल, ‘आप’ के उदय और उसके वर्तमान स्वरूप की इस कहानी का वर्तमान राजनीतिक संदर्भ सिर्फ इतना है कि ‘आप’ की आज अपनी कोई स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारात्मक स्थिति नहीं बची है । चूंकि वह दिल्ली में सत्ता पर है जहां वह भाजपा को चुनौती दे रही है, इसीलिये भाजपा-विरोधी किसी भी मंच पर उसका एक स्थान हो जाता है । लेकिन इतना ही बड़ा सच यह भी है कि दिल्ली के शासन पर कांग्रेस का दावा भाजपा की तुलना में भी बहुत ज्यादा है । ‘आप’ कांग्रेस को पराजित करके ही दिल्ली में सत्ता पर आई थी । इसीलिये वह सिर्फ भाजपा-विरोध का नहीं, कांग्रेस-विरोध का भी प्रतिनिधित्व करती है, जिसे चालू राजनीतिक पदावली में तीसरा मोर्चा कहा जाता है । इसीलिये कांग्रेस का उसके प्रति वही रुख नहीं हो सकता है जो तेलुगु देशम, तृणमूल, जेडीयू आदि का होगा ।

यहां हम फिर से इस टिप्पणी के प्रारंभिक बिंदु पर लौटना चाहेंगे कि मोदी को पराजित करने के लिये पूरे विपक्ष की एकजुटता के भारी महत्व के बावजूद, सब कुछ सिर्फ राजनीतिक दलों की एकता पर निर्भर नहीं करेगा । जो राजनीतिक प्रक्रिया चार साल के मोदी शासन के तीखे अनुभवों के बाद जनता के बीच शुरू हो चुकी है, उसके परिणाम सिर्फ राजनीतिक दलों के आपसी समझौतों पर अब निर्भर नहीं रहेंगे । दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस का दावा किसी भी दूसरे दल से ज्यादा है और भाजपा-विरोधी अखिल भारतीय राजनीतिक मुहिम का नेतृत्व भी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों के बाद कांग्रेस के अलावा किसी और दल के हाथ में रहने वाला नहीं है । इसी बीच सभी राजनीतिक पर्यवेक्षक और सर्वेक्षक भी राहुल गांधी के प्रति आम मतदाता में बढ़ते हुए समर्थन और मोदी की तेजी से गिरती छवि को साफ देख रहे है ।


ऐसे समय में, दिल्ली में आम आदमी पार्टी को कांग्रेस दल के पूरे समर्थन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । जिन दलों का दिल्ली की राजनीति में कोई दावा नहीं हैं, वे आज अरविंद केजरीवाल के एल जी के खिलाफ उठाये गये वाजिब सवालों का समर्थन कर सकते हैं और अपनी शक्ति भर उनके साथ खड़े भी दिखाई दे सकते हैं । लेकिन कांग्रेस दल इस बात को जानता है कि दिल्ली की राजनीति अभी इस प्रकार के सैद्धांतिक सवालों से तय नहीं होने वाली है । जैसे हिंदू-मुस्लिम बातों से ही अब भारत की राजनीति तय नहीं होगी । यह तय होगी दिल्ली निवासियों के जीवन की वास्तविक समस्याओं से । तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद, ‘आप’ सरकार यदि सीलिंग, प्रदूषण, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा तथा परिवहन की तरह के विषयों पर दिल्ली वासियों को आश्वस्त कर पाती है तो अभी भी भाजपा-विरोधी नये तूफानी दौर में ‘आप’ को जनता का समर्थन मिल सकता है, अन्यथा महज नौकरशाही के असहयोग और एल जी के दुरुपयोग की तरह के सवालों पर उन्हें ज्यादा लाभ नहीं होगा । इस मामले में भाजपा-विरोधी हवा का भरपूर लाभ उठाने के लिये दिल्ली में कांग्रेस दल अपने पुराने लंबे शासन की बदौलत ही उससे कहीं ज्यादा सक्षम है ।

यही वजह है कि मोदी-विरोधी विपक्ष के संयुक्त मोर्चा की रणनीति में सभी मोदी-विरोधी दल उस लड़ाई में अपने राजनीतिक मत के जरिये योगदान करेंगे, लेकिन इसका वास्तविक लाभ स्थानीय स्तर पर किसे मिलेगा, किसे नहीं, इसे अभी से कोई सुनिश्चित नहीं कर सकता है । इतना जरूर तय है कि इस मोदी-विरोधी नये जन -उभार में जो भी अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के लिहाज से इसके बाहर रहेगा, या इसमें दरार डालने वाले खलनायक की तरह नजर आयेगा, उसे निश्चित तौर पर इसका खामियाजा चुकाना पड़ेगा । राजनीति के नये समीकरण राजनीतिक जगत के बाहर का जनता का सत्य तय करते हैं, सिर्फ राजनीतिक दल नहीं ।