-अरुण माहेश्वरी
आज गुरु पूर्णिमा है । इस मौके पर दिल्ली में जेएनयू में नामवर सिंह के ‘जीवन और साहित्य के अनछुए पहलू’ पर एक सेमिनार हो रहा है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर नब्बे की उम्र पार कर चुके एक श्रेष्ठ गुरू नामवर सिंह पर विचार अनेक अर्थों में समीचीन है ।
कुछ महीनों पहले ही हमें और सरला को उनसे लंबी बात करने का सुयोग मिला था । वे प्रफुल्ल, प्रसन्न चित्त और उत्साहित थे । घर में अकेले, आत्म-निर्भर, किताबों से बनाये गये अपने परिवेश में निश्चिंत । और, कुछ बताने, अपनी बात कहने के लिये हमेशा की तरह उत्सुक । इस मामले में उम्र की थकान के कोई खास लक्षण नहीं थे ।
लेकिन, जब हम नामवर जी को एक विचार का विषय बनाते है तो उनके सारे उत्साह, उनकी कहने की उत्सुकता और एक प्रकार की आत्म-निश्चिंतता के बावजूद, यह कहने में हमें कोई हिचक नहीं महसूस होती है कि वे अपनी एक पूरी इनिंग, क्रियात्मक जीवन की, कुछ नया कर गुजरने की संभावनापूर्ण इनिंग को खेल चुके हैं । अर्थात अपनी प्राणी सत्ता के संभावनापूर्ण क्रियाशील पहलू के अंत तक को जी चुके हैं । अब हिंदी साहित्य के परिदृश्य में उनकी उपस्थिति, उनके जिंदा रहते ही, उनसे इतर अन्य जनों की चीज हो गई है । अब जब तक उनके लेखन की प्रासंगिकता बनी रहेगी, नामवर जी की उपस्थिति बनी रहेगी । कुछ-कुछ उनके शिष्यों और उनके द्वारा उपकृत जनों के रहते भी कायम रहेगी ।
नामवर जी की तरह के हिंदी के अकादमिक और साहित्यिक परिदृश्य में लगभग पैंसठ साल से छाये हुए सक्रिय व्यक्तित्व का अब क्रमश: अपने लेखन की संभावनाओं में सिमट जाना, निश्चित रूप से, आंशिक तौर पर ही क्यों न हो, उनका क्षय ही कहलायेगा । नामवर सिंह जितना एक आलोचक, लेखक रहे, उससे कम अकादमिक प्रशासक और वक्ता नहीं रहे हैं । और उनके लेखन-विश्लेषणों में भी हमेशा किसी नई उद्भावना की संभावना बनी रहती थी । अब लगता है, उनकी उपस्थिति का वह एक अपूर्ण पर संभावनाओं से परिपूर्ण पहलू खत्म हो गया है और नामवर सिंह काल के सुपुर्द हो गये हैं । उनकी अंतिम चमक थी 90 वें जन्मदिन पर अपने ‘रिश्तेदार’ राजनाथ सिंह के हाथ से श्रीफल लेना और मोदी सरकार के द्वारा अभिनंदित होना । लेखक के बजाय राजनेता की उनकी एक अधूरी कामना की पूर्ण अभिव्यक्ति या कहा जा सकता है - पूर्ण गति ।
नामवर जी हिंदी के एक प्रखर बुद्धिजीवी रहे । बड़े मान और लालसा से हम सब उनको सुनते रहे हैं । साहित्य-केंद्रित होने पर भी उनके पास एक वृहत्तर प्रगतिशील और मार्क्सवादी विश्व दृष्टिकोण था, अर्थात एक सत्य था जो उन्हें अपने समकालीन डा. नगेन्द्र आदि की तरह के साहित्य के अलंकारवादी-रसवादी पुरातनपंथी अध्यापकों से अलग करता था और अज्ञेय की तरह के प्रगतिवाद-विरोधी आधुनिक साहित्यकारों के प्रतिपक्ष में खड़ा करता था । इसी अर्थ में वे दिमाग में विश्वकोषों के स्तंभ की तरह ज्ञान की जमा उक्तियों का प्रदर्शन भर करने वाले पंडिताऊ, बुद्धि के चतुर कारोबारी नहीं थे, जैसा आम तौर पर अकादमिक दुनिया में रचे-बसे लोग हुआ करते हैं । उनमें एक जैविक, जन-बुद्धिजीवी की सत्य की शक्ति थी जो उन्हें अपने सभी अकादमिक समकालीनों से आगे ले जाती थी तो साहित्य के विमर्शों के बीच उनकी एक शक्तिशाली उपस्थिति को भी संभव बनाती थी ।
नामवर जी की अधिकतम सक्रियता का काल जहां शीतयुद्ध का काल था, वही समाजवादी जगत में स्तालिन के मिथक के टूटने का भी काल था । इसने सारी दुनिया में नए वैचारिक विमर्शों के लिये जगह बनाई थी । यह सर्वत्र एक नयेपन की तलाश का दौर था, नव जनवाद, नववाम का, नई समीक्षा - हिंदी में नई कविता, नई कहानी का दौर । नामवर जी उस काल में नई समीक्षा के प्रवर्त्तक के रूप में सामने आए थे । नई कहानी के उस दौर की रचनाशीलता को उन्होंने एक नई पहचान दी । रचना के जिन नये रूपों के लिये प्रगतिशील साहित्य-विमर्श में जगह नहीं थी, नामवर जी के जरिये उन्हें जगह मिली। निर्मल वर्मा नई कहानी के केंद्र में आ गए । यशपाल, कृशन चंदर , बेदी आदि को पीछे छोड़ मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मार्कण्डेय आदि ने मोर्चा संभाल लिया । आलोचना में डा. रामविलास शर्मा व्यतीत दिखाई देने लगे और अज्ञेय को चुनौती देते हुए डा. नामवर सिंह ने उस काल के हिंदी साहित्य के परिदृश्य को अपने ढंग से निरूपित किया । अज्ञेय उस काल में धर्मवीर भारती की तरह के कृत्रिम कथाकार में हिंदी के कथा साहित्य की नई संभावनाओं का निर्णय दे रहे थे । हिंदी के प्रगतिशील साहित्य का दुनिया के बौद्धिक विमर्शों की संगति में बदलाव के एक नये बिंदु पर जब एक नये वृत्त में प्रत्यावर्त्तन होता है, नामवर सिंह अपने लेखन, ‘आलोचना’ की तरह की पत्रिका के संपादन और परवर्ती काल में हिंदी के अकादमिक जगत की एक बड़ी हस्ती के रूप में उसमें एक निर्णायक भूमिका अदा करते दिखाई दिये थे ।
लेकिन समय कहीं भी ठहरता नहीं है । देखते-देखते सोवियत समाजवाद पराभूत हो गया और इसके साथ ही पूरे मार्क्सवादी वैचारिक जगत में एक नए स्वात्म-विमर्श का प्रारंभ हुआ । इसके तमाम प्रारंभिक सूत्र साठ के दशक में ही माओ की सांस्कृतिक क्रांति, फ्रांस के कैंपस विद्रोह और अमेरिकी नारीवाद के बेट्टी फ्रीडेन वाले दूसरे दौर के समय से ही पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में सामने आ चुके थे । इसकी एक कम्युनिस्ट-विरोधी बुनियाद 1949 में प्रकाशित आर्थर कौसलर, लुई फिशर, ओंद्रे जीद, इम्याफियो हिलोनया, स्टीफेन स्पेंडर और रिचर्ड राइट के छ: लेखों के संकलन ‘ द गाड दैट फेल्ड’ ने रख दी थी जिनमें कई पूर्व-कम्युनिस्ट भी थे । परवर्ती काल में 1968 में चेकोस्लोवाकिया में वारसा संधि के देशों की सेना के कूच ने पूर्वी यूरोप के पूरे समाजवादी ब्लाक को हिला दिया था और समाजवादी विमर्श में समानता के साथ ही स्वतंत्रता के पहलू को नई अहमियत प्रदान की । इसी दौर में सोवियत संघ में सोल्झेनित्सीन को 1970 में नोबेल पुरस्कार मिला और 1975 में चेक लेखक मिलान कुंदेरा चेकोस्लोवाकिया को छोड़ कर पैरिस में जा बसे । यह परिस्थिति किसी भी प्रकृत मार्क्सवादी जन बौद्धिक के लिये नई चुनौतियों से भरी स्थिति थी । वैचारिक जगत में आगे उसका अवदान द्वंद्वात्मकता के सत्य को नये सिरे से आत्मसात करके, इसके बहु-स्तरीय बहुविध रूप को अपना कर ही मुमकिन हो सकता था । यही शिव का विषपान है । इसके ताप को अस्वीकार करके अब और कुछ भी हासिल करना नामुमकिन था । हिंदी के बौद्धिक जगत में नामवर सिंह से ही यह उम्मीद की जाती थी - नयी उद्भावनाओं के प्रगतिशील चिंतन की दिशा में बढ़ने की उम्मीद । लेकिन इसके लिये जिस साहस और दर्शन तथा तत्वमीमांसा के क्षेत्र में जिन तैयारियों की जरूरत थी, नामवर जी उस कसौटी पर विफल साबित होने लगे । हम सबके देखते-देखते, अपनी सक्रियता के काल में ही वे सिर्फ मंच के व्यक्ति, कोरे वाद-विवाद के खिलाड़ी, अर्थात बुद्धि के कारोबारी बन कर रह गये । सत्य की लड़ाई छूटती चली गई क्योंकि सत्य की चुनौतियों के बीच जीने की तासीर छूटती चली गई ।
बहरहाल, डा. रामविलास शर्मा तो बहुत पहले ही द्वंद्वात्मक विचार की राह को छोड़ अतीत की आधिभौतिक साधना की ओर रुख कर चुके थे, नामवर जी ने अभिनंदन-मंचों की शोभा बढ़ाने का रास्ता पकड़ मौज में बचे हुए दिन बिताने का पथ चुन लिया । अब सत्ता भले कांग्रेस की हो या मोदी की, नामवर जी का उसके प्रति समान मोह बना रहा । कथित तौर पर साहित्य अकादमी के पुरस्कार की जरूरतों के लिये ‘कविता के नये प्रतिमान’ (1968) के बाद ‘दूसरी परंपरा की खोज’ (1982) तक आते-आते ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कहानी, नई कहानी’ के नामवर जी उसी अतीत की मरुभूमि की ओर कदम बढ़ा कर विलीन हो गये जो अक्सर तमाम अकादमिक बुद्धिजीवियों का गंतव्य हुआ करता है ।
उनके पीछे तो सिर्फ नामवर जी के चेले अथवा डा. शर्मा के भक्त बचे रह गये । हिंदी आलोचना के इसी वर्तमान परिदृश्य को हमने ‘आलोचना का कब्रिस्तान’ कहा है ।
बहरहाल, गुरु पूर्णिमा के संदर्भ में, व्यक्ति के स्वतंत्र चित्त के निर्माण के सोपानों में आणव योग, जिसमें गुरू का ज्ञान और ध्यान भी शामिल है, प्रथम सोपान ही है । परवर्ती शाक्त और शांभव योग से ही आत्म का विस्तार और मानव कल्याण की दिशा में निवेदित स्वतंत्र चित्त को प्राप्त किया जा सकता है । और तब आणव योग के स्तर के मंत्रोच्चार, पूजा, अर्चना और भक्ति व्यक्ति को जहर समान लगने लगते हैं । तंत्र शास्त्र के महावेत्ता अभिनवगुप्त का यही कहना है ।
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