−अरुण माहेश्वरी
पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद जिस तेजी से उसके राजनीतिक निष्कर्ष घोषित किये जा रहे हैं, वे स्वयं राजनीति के बारे में हमारी समझ के संकट के उदाहरण प्रतीत होते हैं। चुनावी परिणामों के तुरंत बाद अनेक टिप्पणीकारों और विपक्षी नेताओं ने लगभग उत्सवधर्मी अंदाज़ में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का समाधि-लेख लिखना शुरू कर दिया। यह मान लिया गया कि सत्ता परिवर्तन केवल सरकार का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग का अंत है।
लेकिन राजनीति की विडंबना यही है कि वह बार-बार उन लोगों को झुठलाती है जो उसे किन्हीं अंतिम रूपों में बाँधना चाहते हैं।
तथ्यों को देखें तो पता चलेगा कि तस्वीर इतनी सरल नहीं, बल्कि कहीं ज्यादा जटिल है। तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई है, लेकिन उसे मिला लगभग 41 प्रतिशत मत कोई मामूली अवशेष नहीं कहा जा सकता। यह किसी ऐसे सामाजिक-राजनीतिक आधार का संकेत भी है जो चुनावी हार के बावजूद तत्काल समाप्त नहीं हुआ करता है, यदि पराजित शक्ति ने आत्म-हत्या का रास्ता न चुन लिया हो।
इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है कि पश्चिम बंगाल में परिणाम आने के बाद जो दृश्य सामने आया, उसमें चुने हुए विधायकों के एक हिस्से ने विभिन्न कारणों से नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह का रास्ता चुना; विपक्ष के नेता के चयन को लेकर विवाद खड़ा हुआ; अनेक नेताओं पर कार्रवाई, गिरफ्तारियों और राजनीतिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए; दिल्ली में संसदीय दल के टूटने और बड़ी संख्या में सांसदों के अलग होने की चर्चाएँ चलीं; और इसके चलते ही आम स्तर पर यह धारणा फैलने लगी कि अब तृणमूल केवल औपचारिक अस्तित्व भर रह जाएगी।
लेकिन गौर करने की बात है कि इसी बिंदु पर यहां की राजनीति ने फिर अपना दूसरा चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है।
जब अधिकांश लोग बंगाल के मैदान में तृणमूल की अंतिम पराजय का दृश्य देख रहे थे, उसी समय ममता बनर्जी ने संघर्ष का केंद्र ही बदल दिया है। उन्होंने राज्य की तत्कालीन शक्ति-संरचना के भीतर सीमित लड़ाई के बजाय राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में नए संयोजन की संभावना तलाशनी शुरू कर दीं। कांग्रेस के साथ संवाद, इंडिया ब्लॉक के मंच पर सक्रियता, और राष्ट्रीय विपक्षी धुरी में अपने लिए नई जगह बनाने की कोशिश—इन सबसे यही संकेत मिला कि राजनीति हमेशा उसी जगह नहीं लड़ी जाती जहाँ हार दिखाई देती है।
इसा बिंदु को हम यदि गणित के आधुनिक समुच्चय सिद्धांत (set theory) के रचयिता जॉर्ज कैंटर और हमारे समय के सबसे बड़े दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के विचारों की रोशनी में देखें तो बात और स्पष्ट हो जाती है।
कैंटर ने बताया था कि कोई भी समुच्चय अपनी वर्तमान गणना से समाप्त नहीं हो जाता। उसके भीतर उपसमुच्चयों (subsets) और संबंधों की अनंत संभावनाएँ होती हैं। बाद्यू ने राजनीति को इसी अनेकता का क्षेत्र माना। कोई भी भुवन (world) वस्तुओं का स्थिर संग्रह नहीं होता है बल्कि उपस्थितियों की एक ऐसी संरचना होता है जिसमें कुछ तत्वों को अधिक दृश्यता और कुछ को न्यून दृश्यता प्राप्त होती है। किसी भी भुवन में जो उपस्थित है, वही संपूर्ण नहीं होता; उसके भीतर ऐसी संभावनाएँ भी रहती हैं जिन्हें वर्तमान सत्ता-दृष्टि गिनती में शामिल नहीं कर पाती है।
इस दृष्टि से तृणमूल की पराजय को उसका अंत मान लेना राजनीति को समुच्चयों की गतिशील अनेकता के बजाय वर्तमान गणना के स्थिर परिणाम में सीमित कर देना है। यह वही दृष्टि है जो किसी समुच्चय की किसी एक आकृति को ही पूरा समुच्चय मान लेती है। आकृति को समुच्चय मान लेना ही हर विश्लेषण की मूलभूत भूल होती है; क्योंकि समुच्चय संभावनाओं का क्षेत्र है और आकृति उसकी किसी विशेष ऐतिहासिक अभिव्यक्ति का नाम।
पश्चिम बंगाल के इस पूरे उभरते हुए दृश्य में हमें सबसे विचित्र स्थिति वामपंथ की दिखाई देती है।
बंगाल का वाम, जो हमेशा इतिहास की लंबी दृष्टि और संरचनात्मक विश्लेषण का दावा करता रहा है, इस पूरे प्रसंग में कई बार एक अजीब अनुभववाद में फँसा दिखाई देता है। उसका एक हिस्सा मानो इस विश्वास में ही फंसा हुआ है कि तृणमूल का पतन अपने आप उसके लिए राजनीतिक रिक्त स्थान बना देगा। “पहले राम, बाद में वाम” जैसी राजनीतिक मनोवृत्ति—अर्थात पहले वर्तमान प्रतिद्वंद्वी का अंत हो, आगे की राजनीति बाद में देखी जाएगी—वास्तव में राजनीति को एक यांत्रिक क्रम में बदल देती है।
इसीलिये हमें, वाम की समस्या केवल रणनीतिक नहीं, ज्ञानमीमांसात्मक भी लगती है।
कल ही हम बंगाल में सीपीएम के सचिव मोहम्मद सलीम का एक साक्षात्कार सुन रहे थे । वे उसमें जिस प्रकार राजनीति को ‘ऊपर वालों और जमीन वालों’ में विभाजित करके कह रहे थे कि दिल्ली में लोग जितनी भी ऊंची बात कर लें, पर जमीनी अनुभव बिल्कुल अलग है । इससे लगता था मानों उनके लिए सांप्रदायिक फासीवाद की चुनौती केवल दिल्ली की उच्च राजनीति का विषय है और स्थानीय असंतोष अंततः स्वतः वाम की वापसी का कारण बन जायेगा। ‘पहले राम बाद में वाम’ के स्थानीय रूझान में मूलतः यही समझ प्रतिध्वनित होती है ।
हमारी नजर में यह समुच्चय की राजनीति नहीं, एक प्रकार से रिक्त स्थान की राजनीति है। समुच्चय में रिक्त स्थान कभी रिक्त नहीं रहता है।
बंगाल के पिछले डेढ़ दशक का अनुभव भी यही बताता है। 2011 के बाद से वाम का मताधार लगातार सिकुड़ता गया और 2026 में भी उसमें कोई निर्णायक सुधार नहीं दिखा। यह केवल संगठन की समस्या नहीं; राजनीतिक दृश्यता की समस्या भी है। यदि कोई शक्ति स्वयं को केवल दूसरे की विफलता के सहारे पुनर्स्थापित करना चाहती है, तो वह अपने लिए नए प्रमाता, नए सत्य और नए गठबंधन की खोज छोड़ देती है।
वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि इसमें विडंबना यह हो सकती है कि जो शक्ति अब तक क्षेत्रीय मानी जाती थी, वह संकट की स्थिति में राष्ट्रीय गठबंधनों के माध्यम से अपना दायरा बढ़ा लें; और जो शक्ति स्वयं को ऐतिहासिक-वैचारिक केंद्र मानती रही, वह आगे और सिकुड़ते हुए अपने अनुशासित कैडरों के छोटे दायरे में ही सिमट जाए।
यह कोई भविष्यवाणी नहीं है। क्योंकि, राजनीति कभी बंद समुच्चय नहीं होती। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने ममता बनर्जी का समाधि-लेख लिख दिया, वे राजनीति को स्थिर चित्र की तरह पढ़ रहे हैं। और जो लोग तृणमूल के समाधि-स्थल पर वाम के पुनर्जन्म का स्वप्न देख रहे हैं, वे भी उसी भूल के दूसरे रूप में फँसे हुए हैं।
राजनीति का सत्य न तो टीवी की रनिंग कमेंट्री में मिलता है, न चुनावी जीत या लूट के उत्सव में। वह उन संबंधों के पुनर्गठन में प्रकट होता है जिन्हें पहले असंभव माना जाता था।
और शायद बंगाल का यह क्षण फिर एक बार हमें यही याद दिला रहा है कि राजनीति में असंभव नाम की कोई श्रेणी नहीं है; उसमें केवल ऐसी संभावनाएँ होती हैं जिन्हें वर्तमान अभी देख नहीं पा रहा होता है।
बंगाल में विधायकों का टूटना, नेताओं पर मुक़दमे, संसदीय दल में विद्रोह की अफ़वाहें, विपक्षी नेता के चयन का विवाद, दिल्ली में नए गठबंधन—ये सब भी किसी “अंतिम सत्य” के तथ्य नहीं हैं; ये भुवन की पुनर्गणना (re-counting) की प्रक्रियाएँ हैं।
भुवन की पुनर्गणना की प्रक्रिया, अर्थात् जिसमें वही तत्व नई आकृति ग्रहण करते हैं और पुराने समुच्चयों के बीच संबंध बदल जाने से नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। यह इस बात की पुनर्गणना नहीं कि कितने बचे; यह पुनर्गणना है कि अब कौन किसके साथ गिना जाएगा।यद्यपि भुवन की पुनर्गणना अपने-आप में घटना (event) नहीं होती, पर वह ऐसी अस्थिरता का निर्माण कर सकती है जिसमें कोई नया सत्य प्रकट हो और उसके साथ उसके वाहक प्रमाता का जन्म संभव हो।
भारत की राजनीति में जिस तरह से मानसिक गिरावट आ रही है वह बेहद ही शोचनीय है । कुछ अंध भक्तों को ऐसा लगता है की जातिवाद के बल पर वह सत्ता ले लेंगे क्यों शायद कुछ ही समय का भ्रम है।
जवाब देंहटाएंममता के साथ 41%मत हो सकते हैं , विभाजन के बावज़ूद उनकी कुछ ताकत बरकरार रहे . सवाल है ,2011 के बाद कुछ सालों तक उनका कहर जिस तरह वाम कार्यकर्ताओं पर बरपा था , जिस तरह बीजेपी के साथ कदमताल किया ऐसी पार्टी का होना न होना लोकतंत्र के लिए कोई मायने नहीं रखता .
जवाब देंहटाएंआगे आगे देखिए होता है क्या? आपका विश्लेषण सटीक हैं।
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