गुरुवार, 5 नवंबर 2020

ढीठ ट्रंप और दक्षिणपंथी राजनीति

-अरुण माहेश्वरी 




यह कहने में अब ज़रा भी संकोच नहीं रह गया है कि ट्रंप पराजित हो चुके है । अमेरिकी चुनाव प्रणाली की वजह मात्र से इसकी घोषणा में देर हो रही है, पर बची हुई मतगणना के रुझानों से साफ है कि 540 के इलेक्टोरल कालेज में जो बिडेन को साफ बहुमत मिल रहा हैं । इसके बावजूद, जब सिर्फ आधे वोटों की गिनती हुई थी, ट्रंप ने अपने को विजेता घोषित कर दिया और आगे की गिनती को एक धोखा, अमेरिका के साथ विश्वासघात बताना शुरू कर दिया । गिनती को रुकवाने के लिए उन्होंने अदालतों तक में जाने की बात कहनी शुरू कर दी ।


इस प्रकार, ट्रंप साफ़तौर पर पराजित तो हो रहे हैं, और उनके और बिडेन के बीच मतों का फ़ासला भी कम नहीं रहने वाला है, इसके बावजूद कहना पड़ेगा कि उनकी इस पराजय के साथ भी उनके चरित्र का ढीठपन चुनाव परिणाम के अंत तक जुड़ा हुआ है । अंतिम समय तक यह संशय क़ायम है कि हार कर भी ट्रंप अमेरिकी जनता का पिंड छोड़ेंगे या नहीं !


ट्रंप का यह आचरण बताता है कि वे किस हद तक एक आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित चरित्र हैं ; एक सिंग के प्राणी, जो बस संकेतों की किसी एक ही अटल दिशा की ओर भागते रहते हैं । दरअसल, अपने से बाहर उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई देता है । दूसरों पर या किसी भी बात पर उल्टी-सीधी टिप्पणियाँ करने के पहले वे ज़रा भी सोचते नहीं है, क्योंकि उन्हें दूसरों की किसी प्रतिक्रिया की परवाह ही नहीं है । मनोविश्लेषण के अनुसार हर आदमी के मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा वास्तव में अन्य का क्षेत्र हुआ करता है । उसकी हर अनुभूति में अन्य से विमर्श की बड़ी भूमिका होती है । किसी भी चीज को कोई सीधे ग्रहण नहीं करता है । जिस अनुपात में कोई चीज़ों को सीधा ग्रहण करने लगता है, अन्यों की मध्यस्थता के बिना, उसी अनुपात में वह विक्षिप्त, संवेदनहीन, और रुच्छ भी हुआ करता है ।


पर राजनीति में अक्सर ऐसे चरित्रों में एक विशेष प्रकार का आकर्षण पाया जाता है । आम लोगों का बड़ा हिस्सा अपने जीवन की दमित परिस्थितियों के कारण ही इसके प्रति आकर्षित होता है । ऐसे चरित्रों के रुच्छ, विवेकशून्य और अक्सर निष्ठुर व्यवहार में बहुत सी चीजों को देख कर भी अनदेखा करने के अभ्यस्त दमित भाव के लोग अपनी दमित भावनाओं की अभिव्यक्ति देखते हैं । राजनीति में तथाकथित कुलीनतावाद के ख़िलाफ़ भदेसपन का सौन्दर्य भी कुछ ऐसा ही है और अक्सर ऐसे चरित्र अजीब प्रकार से अपने पीछे लोगों की भीड़ को आकर्षित कर लेते हैं ।


ट्रंप अमेरिकी राजनीति का ऐसा ही एक निष्ठुर, बेपरवाह चरित्र है जो अजीब क़िस्म का भदेसपन लिए हुए हैं । वह मुँहफट है और राजनीति के किसी भी प्रचलित शील के प्रति लापरवाह । वह अपने पैसों और शक्ति के बल पर वहाँ की राजनीति के अन्य सभी लोगों को अपने पैरों की जूती और प्रचलित मान-मर्यादाओं को नग्न तिरस्कार की वस्तु मानता है । इसीलिए वहाँ की जनता का एक कम पढ़ा-लिखा पिछड़ा हुआ हिस्सा उसे बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखता हैं । हर कोई इस बात को जानता है कि ट्रंप से न उनका कुछ भला होने वाला है न अमेरिका का । फिर भी वह अमेरिकी राजनीति के पारंपरिक रूप को पटखनी देने की जिस प्रकार की हुंकारें भरता है, उससे इन लोगों को कुछ वैसा ही आनंद मिलता है जैसा डब्लूडब्लूएफ की कुश्तियों में पहलवानों की थोथी चिंघाड़ों पर लोग उत्तेजना में पागल हो जाते हैं या मज़े में लहालोट । ट्रंप खुद ऐसी कु़श्तियों के आयोजन कराते रहे हैं । ट्रंप का पूरा जीवन सेक्स और हिंसा के ऐसे ही तमाम कुत्सित प्रयोगों का पिटारा रहा हैं । बड़ी संख्या में औरतों ने ट्रंप पर बलात्कार के आरोप लगाए हैं और ट्रंप पूरी बेशर्मी से उन सब आरोपों पर खीसे निपोड़ते रहे हैं । ऐसे लोग बार-बार जनतांत्रिक राजनीति में किसी तूफ़ान की तरह आते हैं और भारी तबाही मचा कर पट से बाहर भी हो जाते हैं ।


जनतंत्र के बारे में हैरोल्ड लास्की का यह एक प्रसिद्ध कथन है कि यह शासन की एक ऐसी पद्धति है जिसमें शासन को किसी सम्राट या एक व्यक्ति का हित नहीं साधना होता है बल्कि उस व्यापक जनसमूह का हित साधना होता है, जो अपने हितों के प्रति सचेत नहीं होता हैं । इसीलिये जनतांत्रिक व्यवस्था की मज़बूती के लिए ही यह ज़रूरी होता है कि जनतांत्रिक राजनीति जनता को उसके हितों के प्रति सचेत बनाए । यह काम शासन के स्तर पर भी पूरी ईमानदारी से जनता के हितों की सेवा करके, उनके जीवन में सुधार करके किया जाता है । यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है ।


पर जब काल क्रम में जनतांत्रिक शासन में देखते हैं कि शासन जनता के बजाय मुट्ठी भर लोगों के लठैत के तौर पर काम कर रहा है, राजनीतिज्ञ अपने घरों को भरने के लिये ज़्यादा उत्सुक हैं, तभी लोगों के बीच शासन की इस पूरी प्रणाली के प्रति एक विक्षोभ जमा होने लगता है । यही वह परिस्थिति होती है जिसमें ट्रंप की तरह के सनकी और स्वेच्छाचारी चरित्रों के उभरने की ज़मीन तैयार होती है । इस परिस्थिति का सही विकल्प तो पटरी से उतर रहे जनतंत्र को पटरी पर लाने के लिए जनता के सच्चे जनतंत्र को क़ायम करना है । पर जब किन्ही कारणों से ऐसी किसी प्रक्रिया की सूरत उभरती दिखाई नहीं देती है, तब विक्षिप्त बौने तानाशाहों के उभरने की संभावना हमेशा बनी रहती है । फासीवाद ऐसी निष्ठुर और बर्बर तानाशाहियों का बाक़ायदा एक सुसंगठित, व्यापक सामाजिक संजाल से युक्त तंत्र हुआ करता है, वह महज व्यक्तिवाद नहीं होता है । इतिहास में इसके चरम उदाहरण मुसोलिनी का फासीवाद, हिटलर का नाज़ीवाद रहे हैं, जिसकी श्रेणी में हमारे यहाँ का आरएसएस का संघवाद आता है ।


बहरहाल, ट्रंप जैसे व्यक्ति जो एक काल के लिए जनतंत्र की जोंक के रूप में सामने आते हैं और राष्ट्र का ख़ून पीकर उसे अंदर से जर्जर कर दिया करते हैं , वे भी आसानी से शरीर से निकलते नहीं हैं, चिपके रहना चाहते हैं । यह तो दुनिया के सबसे पुराने और शक्तिशाली जनतंत्र का मामला था कि अमेरिका ने इस जोंक से चार साल में ही मुक्ति पा ली । अन्यथा यदि उसका वश चलता, जैसा कि अनेक छोटे-छोटे देशों में होता भी है, तो ट्रंप की मनोदशा यह थी कि वह बाक़ायदा सैनिक विद्रोह कराके सत्ता पर बना रहता ।


अमेरिका के चुनाव के बीच ट्रंप के सारे आचरणों को देख कर हमें यह लगा था कि अमेरिका जैसे इतने शक्तिशाली जनतंत्र में ट्रंप की तमाम बेहूदगियां, खास तौर पर कोरोना के प्रति उसके मूर्खतापूर्ण नज़रिये और भारी संख्या में लोगों की मृत्यु के प्रति उसकी नग्न संवेदनहीनता को ज़रा भी बर्दाश्त नही किया जाएगा, चुनाव में उसके परखचे उड़ जाएँगे । पर चुनाव परिणामों से हमारा वह अनुमान सही साबित नहीं हुआ है । ट्रंप की लोकप्रियता में बहुत ज़्यादा कमी नहीं आई थी ।


यह वास्तविकता ही अमेरिकी जनतंत्र में कहीं बहुत गहरे पैठ चुकी कई विकृतियों को जाहिर करती है । वहाँ के जनतंत्र को जनता के हितों को साधने वाली एक व्यवस्था के रूप में लोगों का विश्वास पुख़्ता करने के लिए शायद आगे एक और लंबी यात्रा को तय करना होगा ।


जो लोग अमेरिका को पूँजीवादी बता कर कुछ इस प्रकार का संदेश देना चाहते हैं कि वहाँ के तमाम लोग पूँजीवादी हैं, अर्थात् मुनाफेबाज, हम उनके इस नज़रिये को एक बहुत ही तंग और विकृत नज़रिया मानते हैं । अमेरिका को दुनिया के श्रेष्ठ मस्तिष्कों का एक विलय-पात्र भी कहा जाता है जहाँ व्यक्ति के श्रम का बहुत मान है । ऐसे लोगों की मानसिकता की चर्चा परजीवी मुनाफ़ाख़ोरों की मानसिकता से कत्तई नहीं की जा सकती है ।


इसी प्रकार हम उन महापंडितों में भी नहीं है जो अमेरिकी चुनाव के प्रति एक उदासीन भाव का अभिनय सिर्फ यह कहते हुए करते हैं कि वहाँ किसी के भी आने से हमारे लिए, और दुनिया के लिए भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है । इस मामले में नोम चोमस्की की इस बात को हम एक महत्वपूर्ण दिशा-निदेशक की तरह लेते हैं जिसमें वे कहते है कि आज के विश्व में अमेरिका की स्थिति ऐसी है कि उसकी नीतियों में मामूली सा परिवर्तन भी विश्व की परिस्थितियों के लिए एक बड़े परिवर्तन का सूचक होता है ।


इसीलिये अमेरिका में ट्रंप के स्तर के एक स्वेच्छाचारी, दक्षिणपंथी निष्ठुर चरित्र की पराजय का हम दोनों हाथ खोल कर स्वागत करेंगे । ट्रंप की हार अमेरिका में जनतंत्र की ताक़त की सूचक है और सारी दुनिया के जनतंत्रप्रेमी लोगों के लिए एक उत्साहजनक घटना होगी ।


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