सोमवार, 16 नवंबर 2020

मोदी का आत्म-विनाश का कार्यक्रम अपने शिखर पर

 -अरुण माहेश्वरी 



मोदी का आत्म-निर्भर कैसे आत्म-विनाश का कार्यक्रम हैइसे विश्व अर्थ-व्यवस्था के एक तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले 15 देशों के बीच रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप (आरसेपवाणिज्य संधि में भारत के  शामिल होने से अच्छी तरह से समझाजा सकता है  कल, 15 नवंबर को ही पूरी हुए यह स्वतंत्र वाणिज्य संधि आज की दुनिया में सबसे बड़ी स्वतंत्र वाणिज्य संधि है  इसमेंशामिल 15 देशों में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के संगठन एशिआन के दस देशों के अलावा दक्षिण कोरियाचीनजापानआस्ट्रेलियाऔर न्यूजीलैंड भी शामिल है  एशिआन के सदस्य देश हैं - ब्रुनेईकंबोडियाइंडोनेशियालाओसमलयेशियाम्यांमारफ़िलिपींससिंगापुरथाईलैण्ड और वियतनाम  


दुनिया की इतनी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय वाणिज्य संधि से भारत ने अपने को अलग रख कर कौन सी बुद्धिमानी का परिचय दिया हैइसे मोदीके सिवाय शायद ही दूसरा कोई जानता होगा  इतना जरूर जाहिर है कि इसके मूल में मोदी की ‘आत्म-निर्भर’ भारत की अमूर्त सीसमझ जरूर काम कर रही है , जिसमें शायद दुनिया से पूरी तरह कट कर चलने और चरम ग़रीबी की दशा में जीने को ही ‘आत्म-निर्भरता’ मान लिया गया हैं  


कहना  होगामोदी का यह फ़ैसला भारतीय अर्थ-व्यवस्था के विकास की संभावनाओं पर ही रोक लगा देने की तरह का एक चरमआत्म-घाती फ़ैसला साबित होगा  नोटबंदीविकृत जीएसटी की श्रृंखला में ही यह निर्णय भी अमेरिकी इशारों पर भारतीय अर्थ-व्यवस्थाकी तबाही का एक और फ़ैसला है  



कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें