शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

चुनाव के ऐन वक्त ईडी की करतूतें क्या कहती है ?


— अरुण माहेश्वरी



जैसे जैसे पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव क़रीब आ रहे हैं, मोदी में अपनी शक्ति के क्षरण के लक्षण तेज़ी के साथ प्रगट होने लगे हैं । अभी राजस्थान में चुनावी आचार संहिता के लागू हो जाने के बाद के काल में मुख्यमंत्री के घर पर ईडी आदि अपनी एजेंशियों के शिकारी कुत्तों से हमला करवाना भी उनके उन लक्षणों के ही संकेत हैं । आसन्न पराजय के साफ अंदेशों से अपनी अब तक की एकछत्र सम्राट वाली उनकी ग्रंथी उन्हें बुरी तरह से सताने लगी है ।

फ्रायडियन मनोविश्लेषण के सिद्धांतों से परिचित लोग जानते हैं कि आदमी के अचेतन में इस प्रकार का castration complex, शक्तियों के छीन लिये जाने की बधियाकरण ग्रंथी किस प्रकार लक्षणों की एक गाँठ के रूप में काम किया करती है । इस गाँठ के कई रूप होते हैं। इनमें एक गतिशील, लचीला रूप भी होता है जिसमें विक्षिप्तता की स्थिति के विश्लेषण अर्थात् निदान की संभावना बनी रहती है । पर दूसरा रूप वह है जो निदान की हर कोशिश के साथ उसी अनुपात में और जटिल होता जाता है, अर्थात् रोग पर क़ाबू के बजाय वह बढ़ता ही चला जाता है । व्यक्ति अपनी वास्तविकता को पहचान ही नहीं पाता है, बल्कि उससे और और दूर होता चला जाता है । वह अपनी अपेक्षित भूमिका के निर्वाह में हर दिन ज्यादा से ज्यादा असमर्थ साबित होता जाता है । उसके कारण जो स्थितियाँ पैदा होती है वह तो और भी जटिल होती है जिनकी मांगों को मनोरोगी जरा भी छू भी नहीं पाता है । 

यह मनोरोगी की शक्ति के क्रमिक अनिवार्य क्षय का ऐसा उपक्रम है जिसमें बधियाकरण के बाद की कल्पना से वह उभर ही नहीं पाता है । इसमें विडंबना की बात यह है कि मनोरोगी की अपनी पहचान ही  उसमें एक विप्रतिषेध तैयार करती है । वह जिसे अपनी भूमिका मान कर चलता है, जिसे लेकर उसे खतरा महसूस होता है, अर्थात् जिसके अभाव के बारे में सोच-सोच कर उसे वंचना का भाव सताया करता है, वह भावबोध उसमें कोई क्षणिका या तात्कालिक रूप में पैदा नहीं होता है बल्कि यह उसकी शक्ति में एक अनिवार्य गड़बड़ी के तौर पर स्थायी रूप में मौजूद होता है । हमारी ये बातें कोरी कपोल कल्पनाएं नहीं है । फ्रायड के अनुभवों और आदमी के मनोविज्ञान के बारे में उनके प्रयोगों से ये सिद्ध हैं । यह लोक रीति से जुड़ी हुई बातें हैं । 

मोदी लगता है अभी से अपनी पहचान को लेकर कुछ ऐसी ही मनोदशा के दुष्चक्र में फँस चुके हैं । 

शुरू में उन्होंने अपनी इस शक्ति के क्षरण को कुछ खास प्रकार की चुनावी रणनीतियों, सांसदों और पार्टी के नेताओं को विधायकी की लड़ाई में उतारने की क़वायदों आदि से रोकने की कोशिश की थी । लेकिन अब क्रमशः जब यह साफ होता जा रहा है कि उनके पतन के लक्षणों में इतनी लोच नहीं बची है कि उनमें इस प्रकार के हस्तक्षेप से एक दूसरे शक्तिमान का आकार पाया जा सकता है । तब अंत में अब मोदी पूरी तरह से अपने पर, अपनी राजनीति के मूलभूत चरित्र, अपनी मूलभूत संघी सच्चाई पर उतर आए हैं, अर्थात् तानाशाही तौर-तरीक़ों, विपक्ष के खिलाफ पूरी बेशर्मी से राजसत्ता के बेजा उपायों से जनतंत्र में अपनी खोई हुई शक्ति को पाना चाहते हैं । 

आदमी की अपनी मूल पहचान का पहलू कुछ इसी प्रकार से उसे संकट के समय में नियंत्रित करने लगता है । इसीलिए कहते हैं कि संकट के वक्त ही आदमी के चरित्र की मूल पहचान सामने आती है । राजनीति में जनतांत्रिक और तानाशाही चरित्र की पहचान ऐसे अवसरों पर ही होती है जब व्यक्ति अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए किन रास्तों के उपयोग को अपने लिए श्रेयस्कर मान कर अपनाता है । 

विश्लेषकों के लिए जरूरी है कि उन्हें किसी की राजनीति के मूल चरित्र के इन लक्षणों की सचाई का पूर्व ज्ञान होना चाहिए । तभी वे इन्हें महज एक फोबिया या विकृति मानने के बजाय राजनीति के चरित्र और उसकी पहचान से जोड़ कर समझ सकते हैं । 

दरअसल आदमी की खुद की चारित्रिक पहचान भी उसके के भावों के निर्माण में प्रसंस्करण की प्रमुख भूमिका अदा करती है । राजनीति के मसलों में संकेतक और संकेतित के बीच जो विरोध नजर आते हैं उसमें इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । संकेतित का प्रभाव तय करने में संकेतक की सक्रिय भूमिका अदा करते हैं । 

इसीलिए आज मोदी पर भी पराजय के संकेतकों की भूमिका को महत्वपूर्ण समझना चाहिए । वे क्रमशः मोदी के अवचेतन को उघाड़ रहे हैं । जाहिर है कि आगे इसके और भी भयंकर कुत्सित रूप देखने को मिलेंगे । इनका संबंध मोदी की सत्ता संबंधी अपनी वासनाओं से भी हैं और किसी की वासनाओं का संबंध सिर्फ उसके संतोष से नहीं होता । उसका उद्देश्य जितना व्यक्त होता है उतना ही अव्यक्त भी रहता है । आदमी की हर मांग आदमी की वासनाओं का एक खास रूप होती है । जाहिर है कि इन चुनावों में अभी हमें मोदी की मांगों के और भी बहुत भद्दे रूप देखने को मिलेंगे ।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

रवीश, श्रीमंत लुकास और विनय घोष

 



कल रवीश कुमार अपने एक ट्वीट में अमेरिका के रोह्वी आइलैंड राज्य के प्रोविडेंस शहर में ‘सिम्पोजियम’ नाम की किताबों की एक दुकान का अनुभव साझा कर रहे थे जहां एक गीतकार श्रीमंत लुकास का  ‘प्यारा सा’ गीत बज रहा था — Just outside of Austin । 


इस गीत का टेक था — turn off the news and build a garden (समाचार को बंद करो बाग़वानी करो) । इसमें लेखक कहता है — “नफ़रत इस समय का लक्षण है । … सारे दूसरे विचार उलझन पैदा करते हैं। मुझे अब और कोशिश और समझने की ज़रूरत नहीं । समाचार बंद करो तो शायद जंग जाऊँ । …शायद कुछ अधिक मुक्त महसूस करूँ । समाचार बंद करो और बच्चों को खिलाओ । विश्वास ही विश्वास पैदा करता है । समाचार बंद करो बाग़वानी करो ।” ( Turn off the news and build a garden…Hatred is a symptom of the times,…All these other thoughts have me confused/ Now I don’t need to try and understand/Nay be I’ll get up, turn off the news…We might get feel a bit more free / Turn off the news and raise the kids … Trust builds trust) 


रवीश के इस ट्वीट को पढ़ कर हमें बंगाल के नवजागरण के अपने प्रकार के प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार विनय घोष की सत्तर साल पहले कही गई वह बात याद आ गई जिसमें उन्होंने कोलकाता के संदर्भ में ‘मेट्रोपोलिटन मन’ (1967) शीर्षक एक लेख में आधुनिक मनुष्य के बारे में लिखा था कि “वह एक ऐसा प्राणी है जिसने सिर्फ़ भोग किया और अख़बार पढ़ा । …ये दोनों ही एक प्रकार का नित्य कर्म है, इनमें से किसी में कोई प्राण नहीं, चित्त नहीं है । पूँजीवादी यांत्रिक समाज में यही है आदमी की अंतिम परिणति ।” 


इसके बाद ही विनय घोष ने विद्यापति के एक पद को उद्धृत करते हुए लिखा : 


“तनु पसेब पासाहनि भासलि, पुलक तइसन जागु।

चूनि-चुनि भए कांचुअ फाटलि, बाहु बालआ भांगु।

भन विद्यापति कम्पित कर हो, बोलल बोल न जाए।”


(शरीर के प्रस्वेद से प्रसाधन बह गये, ऐसी पुलक उठी कि कंचुली तार-तार होकर फट गई । विद्यापति ने कहा कि इसके बाद जो हुआ हाथ कॉंप जाते हैं, उसे कह कर भी कहा नहीं जा सकता।)


विनय घोष कहते हैं कि “तब कवि के हाथ काँप गए थे यह लिखते हुए । अभी हमारे हाथ कॉंपते नहीं हैं । ऑटोमोबाइल की तरह आटोमैटिक लेखन में आधुनिक जीवन के बारे में सिर्फ रमन और भोजन की बातें ही अनर्गल रूप से कही जा सकती है । मनुष्य का वह शरीर तो शरीर ही है, पर वह प्रस्वेद अब नहीं है, जो है उसका नाम है पसीना, बासता हुआ पसीना । 


विनय घोष का यह लेख ‘मेट्रोपोलिटन मन’ शीर्षक से प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक में संकलित है । इस पुस्तक का पहला संस्करण 1973 में ओरियेंट लांगमैन से निकला था । इसके बाद 2009 में ओरियेंट ब्लैकस्वान से इसका छठां संस्करण प्रकाशित हुआ । इस पुस्तक के लेख पाठक को कोलकाता महानगर मध्यवर्ग के तथाकथित ‘विद्रोही’ मन में बहुत गहरे तक पैठने का रास्ता तैयार करते हैं । 

विनय घोष ने 1951 में एक लेख लिखा था — ‘कालपेंचार नक़्शा’। काली प्रसन्न मुखर्जी की 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध के कोलकाता के जीवन के बारे में किंवदंती स्वरूप पुस्तक ‘हुतुम पेंचार नक़्शा’ के शीर्षक की तर्ज़ पर ही इसका शीर्षक है । इसमें उन्होंने कोलकाता का जो चित्र खींचा था, देखने लायक़ है : 


“आइये, कोलकाता का असली बाइस्कोप देखते हैं । …पहले देखिए लाट साहब की कोठी ( गवर्नर हाउस) । फिर मोनुमेंट, मैदान देखिए, जादूगर (म्यूज़ियम) देखिए, बस-ट्राम पर नाना प्रकार के लोगों को देखिए, रंग-बिरंगी सजी हुई दुकानों को देखते-देखते चले जाइए काली घाट तक । काली घाट की काली देखिए, कोलकाता की गंगा देखिए, और उसके बाद चिड़ियाघर के तमाम विचित्र जीव-जन्तुओं को देखिए । जिराफ़ देखिए, हाथी देखिए, गैंडा देखिए, बाघ देखिए, भालू देखिए, उल्लू देखिए, बंदर देखिए, चिंपांजी देखिए, गुरिल्ला देखिए, वन मानुष और वन बिलाव देखिए। इसे ही चिड़ियाघर कहते हैं, कोलकाता का दूसरा नाम । अर्थात् जिसके पुकार का नाम ‘पहला’ उसका अच्छा ‘परमेश्वर ‘ । जैसे जिसके पुकार का नाम ‘चिड़ियाघर ‘ उसका असली नाम ‘कोलकाता’ । 


विनय घोष लिखते हैं कि “कोलकाता के कल्चर की 

मूल बात है — “पागलपन, मतवालेपन (हुजुम) और चालबाज़ी ( (बुजुरुकी) कोलकाता की प्राचीन संस्कृति इसी मतवालेपन और चालबाज़ियों की उपज बै ।” 


विनय घोष की ये टिप्पणियां समग्रतः कथित मेट्रोपोलिटन कल्चर पर की गई टिप्पणियाँ हैं । अख़बार और समाचार माध्यम इसी कल्चर के प्रमुख अंग हैं । 


आज अमेरिकी कवि कह रहा है, इन समाचारों को बंद कर दो ! बाग़वानी करो, बच्चों से खेलो । इस कल्चर का मूल जैसे अब अपने सारे आवरणों को फेंक कर नग्न बाहर आ गया है ! 


—अरुण माहेश्वरी


सोमवार, 11 सितंबर 2023

एक नई वैश्विक भूमिका के मुक़ाम पर भारत

 

(भारत की राजनीति में अघटन (catastrophe)की कुछ बिल्कुल ताज़ा सूरतें

 


अरुण माहेश्वरी 


अघटन ऐसा कोई आसन्न विध्वंस नहीं होता, जिससे हम सही रणनीति बना कर अपने को बचा सकते हैं । अघटन अपने तात्त्विक अर्थ में हमारे जीवन में पहले से ही घटित सत्य है, और हमारा अस्तित्व उससे बचे हुए लोग, मानो उसके अवशिष्ट की तरह होता है । 


‘हम , भारत के लोग’, का अर्थ है —  उपनिवेशवाद के अंत की एक भारी उथल-पुथल के बाद के बचे हुए लोग । 


यह कुछ वैसे ही है जैसे धरती पर हुई भारी उथल-पुथल ने कोयला और ईंधन को पैदा किया और फिर धरती पर जब मनुष्य आया जो उसने इस ईंधन का उपयोग करके अपने जीवन का विशाल महल तैयार किया। इस प्रकार, मानव जाति की सामान्यता हमेशा किसी सर्वनाश के बाद का सत्य ही होता है । मानव सभ्यता मूलगामी क्रांतियों से आगे बढ़ती है ।


आज हम मोदी युग के बाशिंदे हैं । अभी 2024 में नहीं, हमारे जीवन में मोदी नामक घटना-चक्र का सर्वनाश तो 2014 में ही घटित हो गया था । आज हम उस अघटन से उत्पन्न सामाजिक ईंधन से अपना जीवन नए सिरे से तैयार कर रहे हैं। अर्थात्, हम 2014 के अघटन के परवर्ती, बचे हुए लोग है । अघटनोत्तर अवशिष्ट । 


अपने बारे में इस सत्य को बिना समझे हम कभी अपनी वास्तविकता को नहीं पहचान सकते हैं । राजनीति के क्षेत्र में, ग़नीमत है कि ‘भारत जोड़ों’ यात्रा के बाद ‘इंडिया’ मोर्चे के गठन से भारत के विपक्ष ने इस यथार्थ बोध का परिचय देना शुरू कर दिया है । सब जानते हैं कि इस लड़ाई के परिणाम भी 2014 के पहले की स्थिति में पुनरावर्तन के रूप में सामने नहीं आयेंगे । उनसे आज के विश्व में भारत के पुनर्निर्माण की एक बिल्कुल नई चुनौती पैदा होगी। 


इसीलिए अभी से ‘इंडिया’ मोर्चे का संचालन उसके दूरगामी लक्ष्यों को सामने रखते हुए किया जाना चाहिए । इस मायने में सचमुच 2024 का महत्व एक और आज़ादी की लड़ाई से कम नहीं होगा । यह दुनिया में उत्तर-उपनिवेशवाद की तरह ही उत्तर-फासीवाद के एक नए युग का प्रारंभ होगा । 


आइये, यहाँ हम इस नई परिस्थिति की कुछ बिल्कुल ताज़ा सूरतों को विचार का विषय बनाते हैं। सबसे पहले हम धारा 370 के विषय को ही लेते हैं: 


सुप्रीम कोर्ट में धारा 370


सुप्रीम कोर्ट में धारा 370 पर चली लगभग अठारह दिन की बहस के बीच से सरकार की इच्छा के विपरीत यह बात बिल्कुल स्पष्ट रूप में सामने आई कि धारा 370 भारत के संविधान का एक अभिन्न अंग है । यह हमारे संविधान के संघीय ढाँचे की अर्थात् संविधान की धारा-1 की पुष्टि करने वाली एक सबसे महत्वपूर्ण धारा है ।


इस बहस में यह भी साफ़ हुआ कि धारा 370 ने भारत के साथ कश्मीर के पूर्ण विलय में कभी किसी बाधक की नहीं, बल्कि सबसे बड़े सहयोगी की ही भूमिका अदा की है । पिछले पचहत्तर साल का भारत का संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास इसी बात की गवाही देता है । संघीय ढाँचा भारत के वैविध्यपूर्ण स्वरूप की एकता और अखंडता की एक मूलभूत शर्त और भारत के संविधान की आत्मा है । इसीलिए धारा 370 को किसी भी शासक दल की राजनीतिक सनक का विषय नहीं बनाया जा सकता है । धारा-370 को हटाना भारत के संघीय ढाँचे और संविधान पर कुठाराघात से कम नहीं है । 


सुप्रीम कोर्ट में धारा 370 पर चली बहस से ये बातें बिल्कुल साफ़ रूप में उभर कर सामने आई थी।


इस विषय पर सरकारी पक्ष संवैधानिक दलीलों के बजाय राजनीतिक नारेबाज़ियों का ज्यादा सहारा लेता हुआ दिखाई दिया । सरकार की ओर से लगातार संघीय ढाँचे के खिलाफ केंद्रीयकृत, एकात्मक ढाँचे के पक्ष में, राष्ट्रपति में तमाम संवैधानिक शक्तियों और सार्वभौमिकता के निहित होने की तरह की तानाशाही की पैरवी करने वाली दलीलें दी जा रही थीं। इससे सिर्फ मोदी सरकार का तानाशाही चरित्र ही खुल कर सामने आया।


अब यह सवाल साफ़ हो चुका है कि संविधान के मूलभूत ढाँचे से जुड़ी इस प्रकार की एक धारा के बारे में कोई भी राय देने के पहले किसी के भी सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह भारत में किस प्रकार का राज्य चाहता है? जनतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष और संघीय राज्य या तानाशाही, धर्म-धारित और केंद्रीयकृत राज्य । आपका यह नज़रिया ही धारा 370 के प्रति आपके रुख़ को तय करेगा । 


धारा 370 में एक जनतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष और संघीय भारत की अधिकतम संभावनाओं के सूत्र निहित है । इसे हटा कर इनकी संभावनाओं को कम किया गया है । इस अर्थ में धारा 370 भारतीय संविधान का एक master signifier है ।


भारतीय राज्य का सच यह है कि वह विविधता का महाख्यान, बहु-जातीय आख्यानों का समुच्चय, बहु-राष्ट्रीय राज्य, अर्थात् एक आधुनिक उत्तर-आधुनिक राष्ट्र है। इसीलिए उसे बहु-देशीय उपमहादेश कहा जाता है। हमारे संविधान की भाषा में − “इंडिया, यानी भारत, राज्यों का एक संघ” । यह कोई एकात्मक, केन्द्रीकृत राज्य या तानाशाही नहीं, राज्यों का स्वैच्छिक संघ, विकेंद्रित सत्ता और भागीदारी पर आधारित विकसित जनतंत्र है ।


इसी बुनियाद पर भारत के संविधान में सार्वभौमिकता सिर्फ़ जनता (We the people) में निहित है । राज्य के बाक़ी सारे अंगों, न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का दायित्व है कि वह जनता के मूलभूत अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं, जन-जीवन में धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं अर्थात् धर्म-निरपेक्षता और विभिन्न राज्यों के अपने विधायी अधिकारों अर्थात् राज्य के संघीय ढाँचे की रक्षा करें । कमोबेश यही भूमिका राज्य के चौथे स्तंभ पत्रकारिता से भी अपेक्षित है । 


भारत में कश्मीर के विलय के साथ संविधान में जिस धारा 370 को जोड़ा गया, उसके पीछे परिस्थितियों का कोई भी दबाव क्यों न रहा हो, उसमें अन्य राज्यों की तुलना में कश्मीर की जनता को प्रकट रूप में कुछ अतिरिक्त अधिकारों की घोषणा के बावजूद वह भारतीय संविधान के संघीय, जनतांत्रिक और धर्म-निरपेक्ष ढाँचे से पूरी तरह से संगतिपूर्ण था। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि धारा 370 के ज़रिए भारत के संघीय ढाँचे के अंतर के उस तात्त्विक सच को कहीं ज्यादा व्यक्त रूप में रखा गया, जिसकी बाक़ी राज्यों के मामले में, अर्थात् सामान्यतः कोई ज़रूरत नहीं समझी गई थी ।

 

इस धारा के ज़रिए, कश्मीर की नाज़ुक परिस्थितियों के दबाव में ही क्यों न हो, जनता के आत्म-निर्णय के उस अधिकार को प्रकट स्वीकृति दी गई थी जिसे किसी भी संघीय ढाँचे के सत्य का मर्म कहा जा सकता है। राज्यों के आत्म-निर्णय के अधिकार को ही संघीय ढाँचे का अंतिम सच कहा जा सकता है । अर्थात् उसे हासिल करने का अर्थ है राज्यों का अपनी प्राणीसत्ता में सिमट जाना और उनके प्रमाता,  संघीय ढाँचे के अंग के रूप का अंत हो जाना । 


यही वजह है कि राज्यों का ‘स्वैच्छिक संघ’ विविधता में एकता का एक सबसे मज़बूत सूत्र है जिसमें हर राज्य अपनी अस्मिता से किंचित् समझौता करके ही संघ के साथ अपने को जोड़ता है । 


कहना न होगा, आज़ाद भारत कुल मिला कर एक ऐसे ही आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का प्रकल्प था जिसमें कश्मीर का विलय इसके संघीय ढाँचे के लचीलेपन की पराकाष्ठा को मद्देनज़र रख कर किया गया था । भारत में जो तमाम कथित राष्ट्रवादी ताक़तें बिल्कुल प्रकट रूप में, हमेशा भुजाएँ फड़काने वाले मज़बूत और केन्द्रीकृत भारत की कामना करती रही हैं, कश्मीर की विशेष स्थिति उन्हें कभी मान्य नहीं थी । उन्हें कश्मीर को अलग रखना मंज़ूर था, पर उसे भारत में कोई विशेषाधिकार देना स्वीकार नहीं था । इसीलिए इतिहास में वे कश्मीर को अलग रखने के पक्षधर महाराजा हरि सिंह के साथ खड़ी थी । 


आज यह ज़ाहिर है कि भारत के पुनर्निर्माण के इस आधुनिकता के प्रकल्प में शुरू में उनकी जिस आवाज़ को दबा दिया गया था, वही दमित आवाज़ अब धारा 370 को ख़त्म करने की बहस के ज़रिये प्रतिहिंसा के भाव के साथ लौट कर आ रही है । यह भारत के आधुनिकता के प्रकल्प में सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता के बीच के अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति है ।

 

सांप्रदायिक ताक़तें धारा 370 पर हमला करके भारत की एकता के ‘स्वैच्छिक संघ’ के सबसे मूलभूत सूत्र को कमजोर कर रही है और भारत में विभाजनकारी ताक़तों के लिए ज़मीन तैयार करती है । मज़े की बात है कि इस भारत-विरोधी मुहिम का नेतृत्व वर्तमान केंद्रीय सरकार खुद कर रही है । इसीलिए इस धारा पर विचार के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट को पूरी मोदी सरकार के दक्षिणपंथी प्रकल्प पर अपनी राय सुनानी है ।


जी-20 सम्मेलन


अब दूसरा उदाहरण बिल्कुल ताज़ा जी-20 सम्मेलन का लिया जा सकता है । 

सचमुच, इसे देख कर लगता है कि मानो यह दुनिया एक अनोखी, उल्टी-पुल्टी दुनिया है ।

भारत में जब शासक दल की राजनीति का मुख्य एजेंडा सांप्रदायिक असहिष्णुता पैदा करना, नफ़रत फैला कर समाज को तोड़ना और सभी जन-प्रचार माध्यमों पर क़ब्ज़ा करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बना हुआ है, तब इसी देश के तत्वावधान में जी-20 सम्मेलन के घोषणापत्र में गाजे-बाजे के साथ धार्मिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में संयुक्त राष्ट्र संघ की मूलभूत प्रतिबद्धता को दोहराया गया है !


इस घोषणापत्र में कहा गया है कि “हम संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव ए/आरईएस/77/318, विशेष रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता, संवाद और सहिष्णुता के प्रति सम्मान को बढ़ावा देने की इसकी प्रतिबद्धता पर ध्यान देते हैं। हम इस बात पर भी जोर देते हैं कि धर्म या आस्था की स्वतंत्रता, राय या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और सहचर्य की स्वतंत्रता का अधिकार एक दूसरे पर आश्रित, अंतर-संबंधित और पारस्परिक रूप से मजबूत हैं और उस भूमिका पर जोर देते हैं ये अधिकार धर्म या आस्था के आधार पर सभी प्रकार की असहिष्णुता और भेदभाव के खिलाफ लड़ाई में निभायी जा सकती है।’’


शब्दकोश के अनुसार उलट-पुलट जाने का अर्थ होता है कि आप जिस काम को बहुत सोच-समझ कर करते हैं, वही ऐन आख़िरी वक्त में बिल्कुल बिखर जाए, सारी चीज़ें दिशाहीन नज़र आने लगे, क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है, इसका कुछ पता ही न चले । पर जिसे हेगेलियन द्वंद्वात्मकता कहते हैं, उसमें ‘उलट-पुलट’ का मायने यह है कि किसी भी एक सुचिंतित प्रकल्प का उसके घोषित उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत परिणाम निकलना — मसलन, स्वतंत्रता के सपने का आतंक में बदल जाना, नैतिकता का मिथ्याचार में, बेशुमार दौलत का बहुसंख्यक आबादी की ग़रीबी में तब्दील हो जाना। 


मोदी चाहते हैं कि वे जी-20 का प्रयोग भारत में 2024 के चुनाव को जीतने के लिए करेंगे;  इससे अपनी कलंकित छवि को चमकाएँगे;  अपनी डूबती हुई राजनीति को पार करायेंगे । 


पर जी-20 का सम्मेलन ख़त्म हो गया, हज़ारों करोड़ फूंक कर दिल्ली में भारी तमाशा हुआ, मोदी दुनिया के अनेक राष्ट्राध्यक्षों के विनयी सेवक बने हुए उनके चारों ओर मंडराते दिखें, लेकिन कुल मिला कर हासिल क्या हुआ ? हासिल वही हुआ, जिसे हम ‘उलट-पुलट’ कहते हैं । इस सम्मेलन में जिस घोषणापत्र पर सर्वसम्मति बनी, उसकी एक भी पंक्ति मोदी की अपनी राजनीति का समर्थन नहीं करती है । 


अर्थात् भारत में आगामी चुनाव प्रचार में मोदी सिर्फ दुनिया के नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें ही चमका पायेंगे, इस सम्मेलन में हुई एक भी बात का वे प्रामाणिक रूप में कहीं उल्लेख नहीं कर पायेंगे । तोड़-मरोड़ कर झूठ के रूप में कहीं करें, तो कोई उपाय नहीं है !


इसके विपरीत, सच यह है कि सम्मेलन के घोषणापत्र की बातों से लगेगा कि जैसे इसमें ‘नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान खोलने’ की बात की ताईद की गई है । इसमें ‘धर्म या आस्था के आधार पर सभी प्रकार की असहिष्णुता और भेदभाव’ को ख़त्म करने की बात कही गई है जो ‘लव जेहाद’, ‘आबादी जेहाद’, ‘वोट जेहाद’ आदि-आदि नाना जेहादों के नाम पर मोदी और आरएसएस की मुसलमान-विरोधी राजनीति को एक सिरे से ठुकराती है ।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात भी मोदी की नीतियों के खुले विरोध से कम नहीं है । 

इस प्रकार, आँख मूँद कर कोरे उत्सव-धर्मी भाव से नाचने-कूदने की मोदी की राजनीति के इस प्रहसन वाले हिस्से ने उनकी समग्र राजनीति की कब्र खुद खोदने का काम किया है । अंत में जाकर, जी-20 सम्मेलन के स्थल ‘भारत मंडपम’ में बारिश का पानी भर जाने से आयोजन की व्यवस्था की मोदी की दक्षता की भी पोल खुल गई है।


यह है 2014 के अघटन के बाद का भारत जिसमें ‘इंडिया’ की जनतांत्रिक राजनीति को एक नए वैश्विक इतिहास की रचना करनी है । मोदी का ‘विश्वगुरु’ का प्रचार इसी प्रकार भारत में जनतांत्रिक आंदोलन की वैश्विक संभावनाओं को खोल रहा है।  

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

ज़िन्दगी तमाशा

 



कल यूट्यूब पर बहुचर्चितकई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ी जा चुकी पाकिस्तानी फ़िल्म ‘ज़िंदगी तमाशा’ देखी  


खुदा की शान में पूरी तरह से डूब कर क़सीदे पढ़ने वाले शायराना मिज़ाज के एक सम्मानित वयोवृद्ध मज़हबी चरित्र राहतख़्वाजा के जीवन में आए एक भारी तूफ़ान पर बनाई गई फिल्म  


राहत साहब शादी की एक दावत में अपने कुछ ख़ास मित्रों की महफ़िल में एक लोकप्रिय फ़िल्मी गाने ‘ ज़िंदगी तमाशा…’ पर दोस्तों के आग्रह पर एक नाच करते हैं  वहाँ मौजूद विडियोग्राफ़र ने उनके नाच का वीडियो बना कर उसे फ़ेसबुक परअपलोड कर दिया  उम्रदराज़ राहत साहब को इस प्रकार के एक कथित अश्लील गाने पर नाचते देख इंटरनेट की दुनियामें लोगों ने उसका भारी लुत्फ़ लिया  पर इसी नाच ने  सिर्फ़ मज़हब के ठेकेदारों के बीचबल्कि परिवार में बेटी औरआस-पड़ोस के लोगों में भी उनकी अब तक की मज़हबी और सौम्य-शालीन छवि को जैसे एक झटके में नष्ट कर दिया  


ऐसा लगा जैसे एक झटके में ख्वाजा साहब के मस्तमौला शायराना मिज़ाज का पर्दा फट गया  वह पर्दा जो चरित्र केबहुआयामी और बहुरंगी रूप को अपने में समोये रखता हैउसका फट कर इस प्रकार की एक निश्चितठोस पहचान मेंबदल जाना ख़्वाजा साहब के हरदिलअज़ीज़ मिज़ाज की सारी ख़ूबसूरती और ख़ुशबू को सोख लेने के मानिंद था  


वह वीडियो जैसे एक बेहतरीन पतिआदर्श पितानर्मदिल ख़ुदापरस्त इंसान के नाना रूपों की हत्या की साज़िश बन गया 


नाचते हुए ख़्वाजा साहब के वीडियो से उनकी जो एकरंगी अश्लील सी पहचान बनींवह किसी संकेतक के एक चिह्न मेंतब्दील हो कर अपनी मौत की घोषणा की तरह का माजरा था  एक खास चिह्न में बदल कर अब वह संकेतक सिर्फ एकबेजान व्यक्ति का ही पता दे सकता है  उसकी बाक़ी सारी संभावनाओं का वहीं अंत कर दिया जाता है  


ज़ाहिर है कि ख़्वाजा साहब के लिए कुल मिला कर ऐसी परिस्थितियाँ तैयार हो गईजिनमें जैसे शर्म में डूब कर मर जानेके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही  बचा हो  


ऐसे हालात मेंजब किसी की पहचान को किसी एक खास शर्मनाक स्थिति में कीलित कर दिया जा रहा होअर्थात् वहएक प्रकार से उसकी मौत का विज़िटिंग कार्ड बन जाएतो हमेशा यह ज़रूरी होता है कि पूरी धृष्टता और साहस के साथअपने उस विज़िटिंग कार्ड को फाड़ कर फेंक दिया जाए  


ज़िंदगी तमाशा’ फ़िल्म के ख़्वाजा साहब ने बिल्कुल ऐसा ही किया  उनकी बेटी और अन्य जन उनकी मौत के पहले हीअपनी धारणाओं और पूर्वाग्रहों के चलते उन्हें जिस प्रकार मृत घोषित कर रहे थेख़्वाजा साहब ने उसे ठुकरा कर अपनीस्वतंत्र प्राणी सत्ता की घोषणा की  


इस पूरे कथानक को बहुत ही कम साधनों से निदेशक सरमद खूसत ने जिस पटुता के साथ फिल्मांकित किया गया हैउसकी जितनी तारीफ़ की जाएकम है  ख़्वाजा साहब के रूप में आरिफ़ हसन  का अभिनय अनायास ही हमारी ‘गर्महवा’ फ़िल्म में बलराज साहनी के अभिनय की यादों को ताज़ा कर देता है  


अरुण माहेश्वरी