मंगलवार, 11 अगस्त 2026

अमेरिका में Gen Z


-अरुण माहेश्वरी

 


आज (11 अगस्त 2026) के टेलिग्राफ में ‘न्यूयार्क टाइम्स न्यूज सर्विसकी एक रिपोर्ट है – ‘Beyond Class : And then there were some’। यह अमेरिका की चुनावी राजनीति में Gen Z के बढ़ते कदमों पर एक रिपोर्ट है।

एक नजर में यह अमेरिका की चुनावी राजनीति के नाना आयामों के एक विशेष आयाम पर सामान्य प्रकार की रिपोर्ट लग सकती है । पर इसमें पहले ही बता दिया गया है कि यह रिपोर्ट इस बात की पड़ताल है कि आखिर क्यों अमेरिका के Gen Z ने यह चुनाव का रास्ता चुना है ? इसे थोड़ा गहराई से पढ़ने पर पता चलता है यह उस पीढ़ी के एक राजनीतिक प्रमाता में रूपांतरण की रिपोर्ट है जो अब तक मुख्यतः सोशल मीडिया, कैंपस, भाषा, सांस्कृतिक विद्रोह और सड़क के आंदोलनों में दिखाई देती थी । वह अब अमेरिकी जनतंत्र में ही एक नई निष्ठा के साथ स्वयं राजनीतिक संस्थाओं में प्रवेश करना चाहती है।

 इस रिपोर्ट के शीर्षक में ही कहा गया है − “And then there were some” । अर्थात् अब ऐसे Gen Z उम्मीदवार इक्का-दुक्का नहीं रहे हैं।

इस रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण कहानी एक मीलाट किरोस की है । नोटेर डेम लॉ स्कूल से निकलने के बाद 29 वर्षीय किरोस न्यूयार्क की एक लॉ फर्म में काम कर रही थीं। उसने इज़राइल-गाज़ा प्रश्न के सिलसिले में फिलिस्तीनी छात्रों के पक्ष में महज एक लंबा पत्र लिखा, जिसके चलते उसकी नौकरी ही चली गई। इसके बाद वे कोलोरैडो में डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट के रूप में राजनीति में उतरीं और कांग्रेस के चुनाव में विजयी हुई । उनकी यह जीत कोई मामूली जीत नहीं थी । उन्होंने लगभग तीस वर्षों से कांग्रेस की सदस्या, पंद्रह बार चुनाव जीत चुकी डायना डिगेटे को डेमोक्रेटिक प्राइमरी में पराजित किया । किरोस को लगभग 51 प्रतिशत मत मिले, जबकि डायना को 42 प्रतिशत ।

किरोस कहती हैं:

“We’re seeing just how broken the system is…”

यहाँ महत्वपूर्ण बात किरोस का सोशलिस्ट होना भर नहीं है। महत्वपूर्ण है एक टूटन का अनुभव—“व्यवस्था में दरार है...।”

यह रिपोर्ट किरोस के इसी अनुभव को Gen Z के व्यापक अनुभव से जोड़ती है। महामारी, सामाजिक-माध्यम के अलगाव, एआई, गाजा, ट्रंप  की राजनीति और बाइडेन के दौर के वृद्ध तंत्र (gerontocracy) आदि के बीच बड़ी हुई पीढ़ी स्थापित अमेरिकी संस्थाओं को उसी स्वाभाविक रूप में स्वीकार नहीं कर पा रही है जिस तरह पिछली पीढ़ियाँ किया करती थीं।

लेकिन यह रिपोर्ट जेन जी के बारे में इस प्रारंभिक आख्यान के साथ ही तुरंत हमारे सामने विचार के नये प्रश्न खड़े कर देती है । इसमें हम देखते हैं कि यह पीढ़ी केवल किरोस जैसे डैमोक्रेटिक सोशलिस्ट ही पैदा नहीं करती, वह कंजर्वेटिव रिपब्लिकन उम्मीदवार भी पैदा कर रही है, ग्रीन पार्टी के ब्रैंडन ट्रैक्सेल और पार्कलैंड स्कूल में शूटिंग की घटना से उत्पन्न डैमोक्रेट टाइलर स्मिथ को भी पैदा करती है । बल्कि पार्कलैंड की घटना के प्रत्युत्तर में ब्रैक्सटन मिशेल जैसे युवा कंजर्वेटिव भी सामने आते हैं।

इस आधार पर कोई इस सरल नतीजे पर पहुंच सकता है कि जेन जी न वाम है, न दक्षिण; उसका कोई स्पष्ट राजनीतिक चरित्र नहीं होता ।

दरअसल, यह कहना एक गलत प्रस्तावना है। कोई भी घटना किसी पार्टी की सदस्यता का सबब नहीं होती । घटना का अर्थ यह नहीं कि समाज का कोई वर्ग अचानक किसी विचारधारा को अपना लेता है। घटना की भूमिका पुराने संसार के उस विन्यास को तोड़ने की होती है जिसमें सब कुछ पहले से निश्चित मान लिया जाता है। घटना से यह सामने आता है कि जो कल तक असंभव लगता था, वह अब आगे कैसे संभव हो गया है ।

और, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घटना से पैदा होने वाले विघटन से समाज का कोई भी हिस्सा पूरी तरह अछूता नहीं रहता। फ्रांस के सन् ’60 के कैंपस विद्रोह के समय ही यह बात सामने आई थी कि जब विश्वविद्यालय टूटेगा तो केवल वामपंथी छात्रों की भूमिका नहीं बदलेगी, परिवार, चर्च, राजनीतिक दल, मीडिया, नौकरशाही और दक्षिणपंथ भी बदलेगा। किसी भी बड़ी ऐतिहासिक घटना के बाद धर्म के जगत में भी एक मुक्तिकामी धर्मशास्त्र भी पैदा हो सकता है, बल्कि उसके साथ ही कट्टरपंथ की नई धारा भी सामने आ सकती है । इनमें कोई एक-दूसरे को निरस्त नहीं करता। ये सब पुराने संसार में आई दरार के अलग-अलग उत्तर होंगे।

बाद्यू ने अपनी पुस्तक Being and Event के बाद Logics of Worlds में प्रमाता के प्रश्न को और विकसित किया। उनके यहाँ घटना के बाद केवल सत्य के प्रति निष्ठावान प्रमाता (faithful subject) ही नहीं मिलता; वे प्रतिक्रियावादी (reactive) और पोंगापंथी (obscure) विषय की भी चर्चा करते हैं। सत्य के बरक्स प्रमाता और विषयों की गति का बाद्यू ने जो चार्ट तैयार किया था, उसकी रोशनी में देखें तो कम्युनिस्टों की तरह का नये के प्रति आग्रहशील, निष्ठावान प्रमाता घटना की शेषता के स्फोट से एक नया वर्तमान निर्मित करता है; प्रतिक्रियावादी विषय घटना के परिणामों के बीच रहते हुए भी उसके परिवर्तनकारी अर्थ को कमतर अथवा निष्प्रभावी करने की कोशिश करता है; और पोंगापंथी विषय उससे भी आगे जाकर उस नए वर्तमान को किसी भारी-भरकम बंद पहचान अथवा परमार्थिक चट्टान के तले दबाने की कोशिश करता है।

इसीलिये, यहाँ वाम और दक्षिण की धारणा को स्थापित पार्टियों के नामों से अलग करके देखने की जरूरत होगा। यदि वाम का अंतिम सत्य मनुष्य की स्वतंत्रता की संभावना के प्रति निष्ठा में है, तो वाम को वह प्रमात्रिक रूझान (subjective orientation) कहना होगा जो घटना द्वारा खोली गई नई संभावनाओं को अधिक सार्वभौमिक मानवीय स्वतंत्रता की दिशा में ले जाता है। वह मनुष्य के लिए जाति, नस्ल, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता अथवा सामाजिक पद की कैद से मुक्ति की संभावना खोलता है।

दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया भी पुराने संसार की दरार को महसूस करती है। बल्कि कभी-कभी वह उसे वाम से भी अधिक तीव्रता से अनुभव कर सकती है। लेकिन फर्क यह है कि वह उस अभाव को अंततः किसी नए प्रभु संकेतक (Master Signifier)राष्ट्र, नस्ल, धर्म, नेता, परिवार, परंपरा—से भर देना चाहती है।

जॉक लकान की भाषा में, ‘अन्य’  में अभाव दोनों देखते हैं। एक उस अभाव को नई सृष्टि की संभावना मानता है; दूसरा उसकी असह्यता से बचने के लिए नए प्रभु की तलाश करता है।

इसीलिए जेन जी के बारे में केवल इतना कहना उचित नहीं है कि वह “न वाम है, न दक्षिण”। बल्कि जेन जी किसी विचारधारा का नाम नहीं, वह उस नए ऐतिहासिक प्रमात्रिक जगत (subjective terrain) का नाम है जिसमें वर्तमान विघटन से अलग-अलग प्रकार के विषय निर्मित हो रहे हैं। वह वर्तमान में घटनामूलक विघटन का एक नया सामाजिक-भाषिक भुवन है, जिसमें एक ओर स्वातन्त्र्य के सत्य का वाहक प्रमाता आकार ग्रहण कर सकता है, और दूसरी ओर उसी विघटन के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी विषय भी सक्रिय हो सकते हैं।

इसी संदर्भ में ‘न्यूयार्क टाइम्स’ की रिपोर्ट में ब्रैंडन ट्रैक्सेल के प्रसंग का एक और महत्वपूर्ण पहलू उल्लेखनीय है, क्योंकि वे चुनाव सुधार की कई मांगों को उठा कर प्रश्न करते हैं आखिर सत्ता में प्रवेश के रास्ते में इतनी बाधाएं किसके हित में हैं?

ट्रैक्सेल की माँगों में ranked-choice voting और same-day voter registration शामिल हैं। पहली व्यवस्था में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पहली, दूसरी, तीसरी पसंद के क्रम में रखता है, जिससे छोटे दल अथवा स्वतंत्र उम्मीदवार को वोट देने का अर्थ वोट ‘बर्बाद’ करना नहीं रह जाता। दूसरी व्यवस्था पात्र नागरिक को मतदान के दिन ही अपना पंजीकरण पूरा करके वोट देने का अवसर देती है। इस प्रकार प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि सत्ता में कौन आएगा; Gen Z का एक हिस्सा उस चुनावी संरचना पर भी प्रश्न कर रहा है जो यह तय करती है कि सत्ता तक पहुँचने का रास्ता किसके लिए कितना खुला होगा।



जैसा कि हम जानते हैं, अमेरिका में जेन जी की भाषा पर पहले ही काफी महत्वपूर्ण काम हो चुके हैं। भाषाविद् ऐडम अलेक्सिक (Adam Aleksic) की प्रसिद्ध पुस्तक है − Algospeak: How Social Media Is Transforming the Future of Language । उन्होंने ही सबसे पहले दिखाया था कि कैसे सोशल मीडिया और उसके एल्गोरिदम केवल कुछ नए शब्द नहीं बना रहे; वे भाषा के अर्थ, चलन, ध्वनि, लय आदि से एक नई पहचान का निर्माण कर हैं। यह किशोर वय के महज slang नहीं हैं । एल्गोरिदम की सेंसरशिप से बचने के लिए dead या suicide की जगह unalive, sex की जगह seggs जैसे प्रयोग पैदा हुए। इसी प्रकार जानबूझकर गलत वर्तनी, emojis, coded expressions, memes और “I’m in my ___ era” जैसे वाक्य-विन्यास Gen Z के डिजिटल व्यवहार का हिस्सा बने। यहाँ परिवर्तन केवल शब्दावली का नहीं है; बोलने की लय, स्वर, व्यंग्य और आत्म-पहचान के ढंग तक बदल रहे हैं।

यहाँ भाषा किसी शब्दकोश से नहीं आती। वह निषेध, आनंद, हास्य, मीम और संकेतों के सामूहिक आविष्कार और एल्गोरिदम से बच निकलने की कोशिश के बीच पैदा होती है। अर्थात् यह एल्गोरिदम द्वारा बनाई गई भाषा नहीं, एल्गोरिदम से मुठभेड़ में विषय द्वारा निर्मित एक नई लेलैंग है। एल्गोरिदम निषेध लगाता है, विषय संकेतक बदलता है; नया संकेतक चलन में आता है, एल्गोरिदम उसे पहचानता है और विषय फिर उससे बच निकलने का नया रास्ता खोजता है।

इसी आधार पर न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट में मिलाट किरोस  का प्रसंग भी केवल एक युवा सोशलिस्ट के चुनाव की कहानी नहीं रह जाता। इसमें गाजा एक ऐसी घटना है जिसने अमेरिकी विश्वविद्यालय में दरार पैदा की; डैमोक्रेटिक पार्टी में दरार पैदा की; पेशेवर संस्थानों में दरार पैदा की; यहूदी और ईसाई धार्मिक समुदायों के भीतर बहस पैदा की; सोशल मीडिया की भाषा को बदलने पर मजबूर किया; और किरोस जैसे व्यक्ति के जीवन में पेशेगत विच्छेद ने घटना के प्रति राजनीतिक निष्ठा में बदलते हुए प्रमाता के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी।

बहरहाल, कोई भी घटना सबको विचलित कर सकती है, लेकिन हर विचलित विषय प्रमाता नहीं होता। प्रमाता वही है जो उस विघटन में प्रकट हुई स्वातन्त्र्य की संभावना को सत्य के रूप में ग्रहण करता है और उसके प्रति निष्ठा में स्वयं को निर्मित करता है। Gen Z न स्वयं वाम है, न दक्षिण और न स्वयं में प्रमाता। वह वर्तमान घटनात्मक विघटन का वह नया सामाजिक-भाषिक भुवन है जिसमें एक ओर स्वातन्त्र्य के सत्य का वाहक प्रमाता आकार ग्रहण कर सकता है, और दूसरी ओर उसी विघटन के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी विषय भी सक्रिय हो सकते हैं। घटना की व्यापकता इन दोनों को जन्म देती है; लेकिन सत्य के प्रति निष्ठा ही प्रमाता को बाकी विषयों से अलग करती है।

 

 

 


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