शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

मोदी की व्यापारी बुद्धि और राहुल की राजनीतिक दृष्टि

- अरुण माहेश्वरी 



हम सब जानते हैं कि व्यापारी बुद्धि और राजनीतिक बुद्धि का मूलभूत अंतर उनके लक्ष्य की प्रकृति में है। व्यापारी बुद्धि का लक्ष्य पहले से निश्चित होता है—मुनाफ़ा। उसकी सारी कुशलता, नवाचार और जोखिम उठाने की क्षमता के बावजूद उसकी सोच क्षितिज सीमाबद्ध होता है। उसके हर निर्णय का मूल्यांकन इसी प्रश्न से किया जाता है कि उससे कितना लाभ हुआ। इसे सीमित साधनों से सीमित परिणाम प्राप्त करने की सीमित बुद्धि का जा सकता है । 

इसके विपरीत राजनीतिक बुद्धि ठीक वहाँ से शुरू होती है जहाँ परिणाम की गणना समाप्त होने लगती है। ऐलेन बाद्यू जब कहते हैं कि राजनीति की मुख्य चुनौती “accepting the infinity of the future”—भविष्य की अनंतता को स्वीकार करना—है, तो इसका अर्थ यही है कि सच्ची राजनीति अपने को किसी पहले से तय अंतिम परिणाम में बंद नहीं कर सकती। चुनाव जीतना, सरकार बनाना, यहाँ तक कि क्रांति करके राज्यसत्ता पर अधिकार कर लेना भी राजनीतिक प्रक्रिया का अंत नहीं होता है। वास्तव में सबसे कठिन राजनीतिक प्रश्न तो इसके बाद शुरू होता है—आगे क्या?

इसी अर्थ में क्रांति के बाद का प्रश्न राजनीति का एक प्रमुख प्रश्न है। यदि क्रांति का अर्थ केवल सत्ता पर कब्जा करना हो, तो क्रांतिकारी बुद्धि और व्यापारी बुद्धि की संरचना में बहुत अंतर नहीं रह जायेगा । व्यापारी निवेश करता है, बाजार पर अधिकार करता है और मुनाफ़ा कमाता है; सीमित राजनीति संगठन बनाती है, चुनाव अथवा संघर्ष करती है, सत्ता पर अधिकार करती है और उस फिर अधिकार को बनाए रखने की कारस्तानियों में लग जाती है। दोनों के लक्ष्य पहले से निर्धारित है और लक्ष्य प्राप्त होते ही सारी गतिविधि उसी उपलब्धि के संरक्षण की तकनीक बन कर रह जाती है। राजनीति तब कोई सत्य-प्रक्रिया न रहकर शुद्ध सत्ता-प्रबंधन हो जाती है।

यहीं से कोई भी भाजपा में मोदी के प्रभुत्व से आए परिवर्तन को भी समझा जा सकता है। पार्टी को सिर्फ चुनाव जीतने वाली मशीन में बदल देना पहली और सीमित बुद्धि में उसकी असाधारण राजनीतिक सफलता दिखाई देता है; लेकिन दार्शनिक अर्थ में यही सफलता उसकी राजनीतिक सीमाबद्धता का प्रमाण हो सकता है। यदि संगठन, विचारधारा, सामाजिक क्रियाकलाप , नेतृत्व-निर्माण और जनता से संबंध—सबका मूल्य केवल इस कसौटी पर तय होने लगे कि उनसे अगला चुनाव जीता जा सकता है या नहीं, तो राजनीतिक बुद्धि और व्यापारी बुद्धि में कोई फर्क नहीं रह जाता है। वोट उसका बाजार, चुनाव उसकी बैलेंस-शीट और सत्ता उसका मुनाफ़ा बन जाती है।

इस प्रक्रिया में राजनीति का वास्तविक सत्त्व क्षीण हो जाता है, क्योंकि राजनीतिक सत्त्व सत्ता प्राप्त करने में नहीं, सत्ता प्राप्त होने के बाद भी समाज में निहित अभी-अज्ञात संभावनाओं को खुला रखने में होता है। व्यापारी बुद्धि पूछती है—हमें इससे क्या मिलेगा? चुनावी बुद्धि पूछती है—इससे कितनी सीटें मिलेंगी? पर राजनीतिक बुद्धि का प्रश्न इससे बिल्कुल अलग है—इस परिस्थिति से वह क्या नया उत्पन्न हो सकता है जिसकी अभी गणना ही संभव नहीं है? व्यापारी बुद्धि स्वार्थ केन्द्रित व्यवहारिक बुद्ध है, तो राजनीतिक बुद्धि सेवा-केन्द्रित सर्जनात्मक बुद्धि है, 

बाद्यू जब “भविष्य की अनंतता” की बात करते हैं तो यही उसका राजनीतिक अर्थ होता है। चुनाव अथवा क्रांति भी एक घटना हो सकती है; लेकिन घटना स्वयं सत्य नहीं होती। असली सवाल यह है कि उसके बाद कौन-सी सत्य-प्रक्रिया शुरू होती है और वह कौन-सा नया प्रमाता पैदा करती है। जिस राजनीति के लिए सत्ता अंतिम लक्ष्य है, वह सत्ता पाते ही समाप्त होने लगती है; जिस राजनीति के लिए सत्ता भी एक नया आरंभ है, वही अपने भविष्य की अनंतता को स्वीकार करती है।

इसीलिए मोदी की छोटी व्यापारी बुद्धि के चलते भाजपा जहां तेज़ी से अपने अंत की दिशा में बढ़ रही है तो वहीं राहुल गांधी की सत्ता की सीमा के परे जाने वाली राजनीति भविष्य के बंद दरवाज़ों को खोलने के लिए दस्तक दे रहीं है । मोदी राजनीति के अंत की भूमिका में हैं तो राहुल की भूमिका राजनीति की संभावनाओं को बनाए रखने की है ।

मूल मसला चुनावी कार्यनीति का नहीं, राजनीति का होना चाहिए

सीपीआई(एम) की पश्चिम बंगाल की विस्तारित राज्य कमेटी की कल्याणी बैठक के संदर्भ में एक प्रतिवेदन)


—अरुण माहेश्वरी





पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) की विस्तारित राज्य कमेटी की बैठक आगामी दो दिन (29–30 अगस्त) तक नदिया जिले के कल्याणी शहर में होने जा रही है। विधानसभा चुनाव की पराजय और चुनावोत्तर परिस्थिति की समीक्षा के साथ ही इस बैठक में जाहिरा तौर पर स्थानीय निकायों के चुनावों की कार्यनीति को स्वाभाविक रूप से विचार का विषय बनाया जायेगा। 


इसी बीच शुभेंदु अधिकारी की भाजपा सरकार ने अपने सौ दिन पूरे किए हैं। अभी से अखबारों में सरकार के कामकाज के दावों के झूठ पर प्रश्न उठने लगे हैं; भाजपा के भीतर भी इन “चूकों” पर असंतोष है । वसूली तथा भ्रष्टाचार के आरोपों में लगभग पचास नेताओं को निकालने और सौ से अधिक लोगों पर कार्रवाई की खबरें भी अखबारों में आ चुकी हैं।


अर्थात् परिस्थिति बिल्कुल खुली हुई है। चुनाव में विशाल बहुमत के बावजूद भाजपा सरकार की राजनीतिक जमीन स्थिर नहीं हुई है। उसके मंत्रियों का अहंकार, भाजपाइयों की मनमानी, प्रशासन के सांप्रदायीकरण की कोशिश और दिल्ली के निर्देशों पर राज्य को चलाने की प्रवृत्ति इतनी जल्दी प्रकट होने लगी है कि अभी से भाजपा की चुनावी जीत और बंगाल की जनता के वास्तविक राजनीतिक रुझान के बीच का अंतर साफ दिखाई देने लगा है।


ऐसे एक राजनीतिक संभावनाओं से भरे समय में सीपीआई(एम) के सामने मुख्य प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि आगामी नगरपालिका चुनावों में कांग्रेस से कितनी सीटों पर समझौता किया जाए, कितनी पर न किया जाए । हमारी नजर में असली प्रश्न यह है कि क्या पार्टी बंगाल में भाजपा की सत्ता को एक सामान्य ढंग से निर्वाचित सत्ता मानती है, अथवा इसे चुनाव आयोग और केंद्रीय सत्ता की पूरी मशीनरी की मदद से स्थापित फासीवादी आधिपत्य के रूप में देखती है?


इन दोनों आकलनों से पार्टी की राजनीति के लिए दो बिल्कुल भिन्न राजनीतिक रास्ते निकल सकते हैं।


यदि भाजपा की जीत को मुख्यतः तृणमूल के कुशासन की ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान लिया जाता हैं, तो वाम मोर्चा अपने को तृणमूल और भाजपा—दोनों के विकल्प के रूप में पेश करेगा। वह कांग्रेस से चुनावी तालमेल करेगा, तृणमूल के भ्रष्टाचार और भाजपा के सांप्रदायिक शासन को समान और समानांतर रखेगा और अपने लिए प्रतिपक्ष का कुछ अधिक बड़ा स्थान बनाने की कोशिश करेगा। यह मूलतः आगामी चुनावों में सत्ता-संतुलन बदलने की एक कार्यनीति होगी।


लेकिन यदि हमारा आकलन यह है कि चुनाव को निर्वाचन आयोग की सक्रिय सहायता से लूटा गया, मतदाता-सूचियों और राजकीय संस्थाओं का दुरुपयोग हुआ और चुनावी प्रक्रिया को जनता की स्वतंत्र इच्छा व्यक्त करने का माध्यम नहीं रहने दिया गया, तो हम भाजपा सरकार को सामान्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी नहीं मान सकते हैं । तब पहली राजनीतिक प्राथमिकता तीसरे विकल्प के लिए जगह बनाने की नहीं, लोकतांत्रिक राजनीति की जमीन को फिर से हासिल करने की होगी।


तृणमूल के कुशासन की आलोचना अपनी जगह पूरी तरह उचित है। उसके भ्रष्टाचार, दमन और प्रशासनिक स्वेच्छाचार ने भाजपा के प्रवेश के लिए रास्ता बनाया। लेकिन इसी बात को भाजपा की विजय का “मूल कारण” मान लेना चुनावों की लूट को एक मामूली तकनीकी गड़बड़ी भर मान लेने के समान होगा। यह प्रकारांतर से भाजपा सरकार के पक्ष में जनादेश को स्वीकारना होगा, जो जनता ने संभवतः उसे दिया ही नहीं है । तृणमूल की राजनीतिक विफलता और भाजपा के द्वारा चुनाव का अपहरण, ये दोनों सत्य हो सकते हैं; लेकिन फिर भी हम कहेंगे कि आज की राजनीति में इन दोनों को समान स्तर पर नहीं रखा जा सकता है। तृणमूल की विफलता का विषय पिछली सत्ता की आलोचना का विषय है; भाजपा के द्वारा चुनावों की लूट बंगाल में जनता की राजनीतिक सत्ता को बहाल करने का प्रश्न है ।


इसी बिंदु पर हम पार्टी की पूर्व-निर्धारित ढंग से एक निश्चित कार्यक्रम के मातहत राजनीति की कार्यपद्धति की सीमा पर कुछ बुनियादी सवाल उठाना चाहेंगे । कल्याणी बैठक में यदि परिस्थिति का विश्लेषण करके कांग्रेस के साथ गठबंधन, सीटों का बँटवारा, चुनावी नारे और संगठनात्मक कर्तव्य की कोई तयशुदा नीति तैयार की जाती है तो हमारे अनुसार वह एक संभावनामय राजनीति को पहले से निर्धारित कार्यनीति रे चौखटे में बाँधने का उपक्रम होगा । यह जीवित अर्थात् लगातार बदलती परिस्थिति को पार्टी की लाइन के अनुसार पढ़ने के समान होगा जबकि ज़रूरत  इस बात की है कि परिस्थिति में पैदा हो रही नई संभावनाओं के सामने पार्टी की लाइन को खोल कर रखा जाए । 


हमारी नजर में, बंगाल की आज की राजनीतिक परिस्थिति को “तृणमूल बनाम भाजपा बनाम वाम-कांग्रेस” के त्रिकोण में बंद करना एक सबसे बड़ी भूल होगी। इससे यही जाहिर होगा कि वामपंथ भाजपा-विरोधी जनता को राजनीतिक समुदाय के रूप में नहीं, अलग-अलग दलों के वोट-बैंक के रूप में देखता है । ऐसे में तृणमूल समर्थक जनता भाजपा-विरोधी संयुक्त संघर्ष की सहभागी होने के बजाय आगामी चुनाव में भी परास्त किए जाने वाला प्रतिद्वंद्वी बनी रहेगी। कहना न होगा, इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा, क्योंकि फासीवादी सत्ता हमेशा अपने विरोधियों के पारस्परिक विभाजन पर टिकी रहती है।


फासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे का अर्थ तृणमूल से चुनावी गठबंधन अथवा उसके कुशासन को क्षमा कर देना नहीं है। इसका अर्थ है कि भाजपा के विरुद्ध संघर्ष में जनता के किसी भी समुदाय को महज उसकी दलीय प्रतिबद्धता के कारण बाहर न रखना। तृणमूल के समर्थक, वामपंथी, कांग्रेसी, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, स्त्रियाँ, छात्र, मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी और किसी दल से न जुड़े नागरिक—सभी लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के एक साझा मैदान में आ सकते हैं। यह दलों का जोड़ नहीं, जनता की शक्तियों का नया राजनीतिक संयोजन होगा।


चुनावी गठबंधन का लक्ष्य सीटें होता है; संयुक्त जन-मोर्चे का लक्ष्य राजनीतिक परिस्थिति को बदलना। चुनावी गठबंधन ऊपर से दलों के नेताओं के बीच बनते हैं, जन-मोर्चा नीचे से संघर्षों, नागरिक समितियों और साझा प्रतिरोध के बीच पैदा होता है। गठबंधन एक चुनाव से अगले चुनाव तक चलता है, फासीवाद-विरोधी मोर्चा समाज की लोकतांत्रिक सामर्थ्य को पुनर्गठित करता है। अगर हम दोनों को एक मान लेके हैं तो हम राजनीति को महज चुनाव-प्रबंधन बना कर छोड़ देते हैं। 


आज जरूरत उन मतदाताओं की पहचान और आवाज को सामने लाने की है जिन्हें मतदाता-सूचियों से बाहर किया गया; चुनावी लूट के प्रमाणों को सार्वजनिक आंदोलन का विषय बनाने की है; प्रशासन और पुलिस के राजनीतिक उपयोग पर निगरानी रखने की है; अल्पसंख्यकों तथा असहमत नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्थानीय प्रतिरोध-समितियाँ बनाने की है; और भाजपा सरकार के प्रत्येक जनविरोधी कदम के विरुद्ध दलगत सीमाओं से परे जनता को संगठित करने की है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को भी भाजपा और तृणमूल के भ्रष्टाचार की तुलनात्मक तालिका बनाना नहीं, सत्ता और जनता के संबंध को बदलने वाला संघर्ष समझना चाहिए।


शुभेंदु अधिकारी की सरकार की लोकप्रियता में अभी से दिखाई देने वाली गिरावट को यदि सीपीआई(एम) अपने मतों में संभावित वृद्धि के रूप में देखेगी, तो वह फिर राजनीति के रास्ते पर चलने के बजाय पुराने संसदीय गणित में फँस जाएगी। भाजपा से जनता का मोहभंग अपने आप वामपंथ की शक्ति नहीं बनेगा। वह तृणमूल की वापसी, राजनीतिक उदासीनता या किसी और प्रतिक्रियावादी दिशा में भी जा सकता है। उसे लोकतांत्रिक परिवर्तन की शक्ति बनाने के लिए जनता के बीच ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक प्रक्रिया की जरूरत है जिसमें लोग केवल किसी दल के मतदाता नहीं, परिस्थिति को बदलने वाले सक्रिय प्रमाता बनें।


यही आज के समय के दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के इस कथन की महत्ता स्पष्ट होती है कि राजनीति का अर्थ है भविष्य की अनंतता को स्वीकारना । पार्टी कभी भी खुद यह पहले से तय नहीं कर सकती है कि बंगाल की जनता का प्रतिरोध किस रूप में विकसित होगा। वह केवल उन परिस्थितियों का निर्माण कर सकती है जिनमें जनता की अभी तक अप्रकट सामूहिक क्षमताएँ सामने आएँ। पार्टी का काम इस प्रक्रिया का कार्यक्रम लिखना नहीं, बल्कि खुले दिमाग़ से इसमें निष्ठापूर्वक भाग लेना है।


कल्याणी की विस्तारित बैठक की ऐतिहासिक सार्थकता इस बात में नहीं होगी कि वह अगली चुनावी लड़ाई के लिए कितनी चतुर कार्यनीति तय करती है। उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि सीपीआई(एम) स्वयं को प्रतिपक्ष की एक दावेदार पार्टी से आगे बढ़ाकर बंगाल में लोकतांत्रिक राजनीति के पुनर्गठन का साधन बना पाती है या नहीं। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के साथ कितनी सीटों पर समझौता हो। सवाल यह है कि क्या वामपंथ सत्ता के लिए दलों का गठजोड़ बनाएगा, अथवा फासीवादी सत्ता के विरुद्ध जनता के सभी समुदायों का खुला संयुक्त मोर्चा तैयार करेगा।

रविवार, 23 अगस्त 2026

सत्ता की सीमित बुद्धि बनाम प्रतिरोध की अनंत संभावनाएँ

 

(राहुल गांधी के आत्मविश्वास की राजनीतिक रणनीति का दार्शनिक आधार)

– अरुण माहेश्वरी



टाइम्स ऑफ इंडिया ने 20 अगस्त को राहुल गांधी के एक स्पष्ट वक्तव्य को अपनी सुर्खी बनाया। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने कहा – नरेंद्र मोदी का "राजनीतिक अंत" हो चुका है, उनका शासन अपने आखिरी पड़ाव पर है, और अब उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है।

यह बयान केवल एक आक्रामक राजनीतिक दाँव या आंतरिक सूचनाओं का नतीजा नहीं लगता। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी जिस अंदाज में बात कर रहे हैं, उसमें एक पैटर्न साफ दिखता है – वे राजनीतिक मुद्दों को भी दार्शनिक नज़रिए से देखने की कोशिश करते हैं। उनका दृष्टिकोण अक्सर निगमनात्मक (deductive) होता है, यानी वे किसी तत्काल घटना से निष्कर्ष नहीं निकालते, बल्कि सत्ता की मूल संरचना, उसकी मानसिकता और विचारधारा की सीमाओं को समझने से शुरू करते हैं।

ऐसा लगता है मानो उन्होंने संघी मानसिकता को अच्छी तरह पढ़ लिया है – कि वह किन धारणाओं में जकड़ी है, कहाँ उसे सोचने-समझने में दिक्कत होती है, और किस बिंदु पर वह पूरी तरह असमर्थ हो जाती है।

संघ की विचारधारा सिर्फ राजनीतिक मान्यताएँ नहीं देती; यह व्यक्ति की पूरी प्रतीकात्मक दुनिया बना देती है। इसी दुनिया में संघी मानसिकता को पाला-पोसा जाता है – उसके सोचने, देखने और समझने के ढर्रे पहले से तय कर दिए जाते हैं। गांधी की हत्या, मुसलमानों के प्रति शत्रुता, और जातिगत पदानुक्रम – ये ऐसे विषय हैं जिन पर संघी दिमाग पहले से ही बंद होता है। ये मात्र अप्रिय सत्य नहीं हैं; बल्कि इन तथ्यों को उसकी प्रतीकात्मक व्यवस्था में शामिल ही नहीं किया जाता। इसलिए गांधी की हत्या उसे एक अकेले हत्यारे का काम लगती है, मुसलमान-विद्वेष राष्ट्रवाद लगता है, और जातिगत ऊँच-नीच हिंदू-एकता।

राहुल गांधी की निगमनात्मक पद्धति इन्हीं बंद बिंदुओं को पहचानने से शुरू होती है। वे यह नहीं देखते कि मोदी ने किस प्रसंग में क्या कहा या क्या किया; वे देखते हैं कि संघी शिक्षा-दीक्षा ने उनकी सोच को किस तरह सीमित कर दिया है। मोदी की राजनीतिक दृष्टि की कमी सूचनाओं के अभाव से नहीं, बल्कि इसी संरचनात्मक जकड़ से पैदा होती है। जब नई परिस्थितियाँ उन बहुलताओं को सामने लाती हैं जिन्हें संघी व्यवस्था ने हाशिए पर रखा था, तो मोदी का दिमाग उन्हें समझ नहीं पाता। वे नई वास्तविकता को भी पुराने विभाजनों – हिंदू-मुसलमान, राष्ट्रवादी-विरोधी, अपना-पराया – के चश्मे से ही देखने की कोशिश करते हैं।

इसलिए जब समाज के अलग-अलग वर्ग आपस में अप्रत्याशित संबंधों में जुड़कर एक नई सामूहिकता (गठबंधन) बनाते हैं, तो संघी दिमाग भौचक रह जाता है। वह नई स्थिति में भी पुराने दुश्मन, पुरानी खाई और पुरानी दवा तलाशने में व्यस्त रहता है। राहुल गांधी इस आंतरिक असंगति को धीरे-धीरे उजागर करते हैं, और उसे उसके चरम पर ले जाते हैं – जहाँ वह अपने ही विरोधाभासों से जर्जर हो जाती है।

यह निगमनात्मक पद्धति किसी पूर्वनिर्धारित सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू करने जितनी सरल नहीं है। इसका विशिष्ट रूप है – reductio ad absurdum यानी 'असंगति-प्रमाण' – जिसमें सत्ता की अपनी मान्यताओं को उनके तार्किक नतीजे तक ले जाया जाता है, और फिर दिखाया जाता है कि वे अपने ही विरोधाभास में फँस जाती हैं। इस विधि से सोच की आंतरिक विसंगतियाँ खुलती हैं और एक नया राजनीतिक विमर्श बनता है।

राहुल गांधी शायद मोदी शासन को ठीक इसी नज़रिए से देख रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे कि सरकार इसलिए गिर रही है क्योंकि उसके खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं या उसकी लोकप्रियता घटी है। उनका निष्कर्ष गहरा है: मोदी की सत्ता जिस सीमित बुद्धि पर टिकी है, वह एक अनंत संभावनाओं से भरे राजनीतिक समाज को समझने में अक्षम है। और यही उसकी असफलता की जड़ है।

छोटी बुद्धि – जो गिनती तो करती है, संबंधों को नहीं पहचानती

आज की दुनिया के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू ने 'सीमाबद्धता' (finitude) पर विचार किया है – जहाँ न केवल वस्तुएँ, बल्कि उन्हें सोचने का तरीका भी पूर्वनिर्धारित नियमों में कैद हो जाता है। उदाहरण के लिए, प्राकृतिक संख्याएँ – एक के बाद दो, दो के बाद तीन – बढ़ती तो हैं, पर पैटर्न वही रहता है। यहाँ नवीनता भी पुराने क्रम की पुनरावृत्ति मात्र है। यही है 'छोटी बुद्धि' – जो भले ही नए तत्वों को जोड़ ले, पर सोचने का ढर्रा नहीं बदलता।

मोदी की सोच में भी समाज के कुछ स्थिर वर्ग हैं – हिंदू, मुसलमान, दलित, पिछड़े, सवर्ण, किसान, युवा, महिलाएँ, मध्यवर्ग। प्रत्येक वर्ग के लिए एक तय संदेश, तय भय और तय प्रलोभन है। राजनीति भी पहले से तय अनुक्रम में चलती है – एक चुनाव, एक योजना, एक सांप्रदायिक मुद्दा, फिर अगला…

जब कोई नया सामाजिक तत्व सामने आता है, तो उसे भी किसी पुराने खाँचे में ढाला जाता है। आंदोलनकारी छात्र – "विपक्ष द्वारा गुमराह युवक", असंतुष्ट किसान – "बिचौलियों का मोहरा", नागरिक अधिकारों की बात करने वाला – "राष्ट्रविरोधी", जातिगत न्याय की माँग करने वाला – "समाज तोड़ने वाला"। इस तरह हर नई घटना को पुरानी श्रेणियों में बाँध दिया जाता है। नक्सल से अर्बन नक्सल, फिर 'दिमागी नक्सल' – बस एक ही पुरानी प्रतिक्रिया नए नाम के साथ।

यह पद्धति तब तक चलती है जब तक समाज को अलग-अलग व्यक्तियों और स्थिर समूहों का जोड़ माना जाए। लेकिन राजनीति की नई स्थिति में असली सवाल यह है कि लोगों के बीच कितने नए संबंध और गठबंधन बन सकते हैं। एक छात्र केवल छात्र नहीं रह जाता – वह बेरोजगार युवा भी है, किसान का बेटा भी, दलित या पिछड़े समुदाय का सदस्य भी, संविधान का नागरिक भी, और चुनावी व्यवस्था से असंतुष्ट मतदाता भी।

यहीं पर 'छोटी बुद्धि' का गणित फेल होता है। सत्ता को यह समझ नहीं है कि किसी स्थिति का वास्तविक संसाधन व्यक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके बीच बन सकने वाले संबंधों की संभावनाएँ हैं। एक व्यक्ति कई मुद्दों पर अलग-अलग गठबंधनों का हिस्सा हो सकता है। इसलिए आंदोलन का संसाधन मतों की संख्या से कहीं ज्यादा होता है।

मोदी सरकार ने अब तक विपक्ष को कुछ दलों, नेताओं और परिवारों तक सीमित रखा। उसकी रणनीति सीमित थी – किसी नेता को बदनाम करना, किसी दल को तोड़ना, गठबंधन में फूट डालना, या मीडिया अभियान से छवि को नष्ट करना।

लेकिन अब उसके सामने सिर्फ कांग्रेस या कम्युनिस्ट या सपा नहीं है। आज छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएँ, दलित, आदिवासी, बेरोजगार, छोटे व्यापारी, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाले नागरिक और चुनावी निष्पक्षता की माँग करने वाले समूह – सभी नए-नए संबंध बना रहे हैं। हर संघर्ष दूसरे संघर्ष का हिस्सा बन सकता है, और हर नया संबंध एक नया राजनीतिक उपसमुच्चय पैदा करता है। सत्ता एक संगठन तो तोड़ सकती है, पर सभी संभावित संगठनों की संभावना को नहीं।

इसीलिए मैंने पहले फेसबुक पर लिखा था:

"मोदी वोट को साधते रहे, विपक्ष ने समूह की शक्ति पर दाँव लगाया। वोट व्यक्ति की शक्ति है, आंदोलन समूह की। वोट केवल एक को चुन सकता है, सामूहिक संघर्ष अनंत संभावनाएँ पैदा करता है।"

यही असली ताकत है – एक छात्र की छोटी सी माँग (जैसे परीक्षा-घोटाले के खिलाफ) जब बेरोज़गारी, शिक्षा का निजीकरण, सामाजिक न्याय, पुलिस-दमन, मताधिकार और संविधान के सवालों से जुड़ती है, तो वह एक अनंत राजनीतिक प्रक्रिया का रास्ता खोल सकती है। घटना एक समय और स्थान में घटती है, लेकिन उससे पैदा होने वाले संबंध और संभावनाएँ अनंत हैं।

राम मंदिर का चढ़ावा – छोटी बुद्धि की बड़ी पराजय

राम मंदिर के चढ़ावे का प्रकरण इसे पूरी तरह समझाता है। यह केवल वित्तीय भ्रष्टाचार का एक मामला नहीं है। संघी गलियारों में तो इसे भगवान कृष्ण के माखन-चोरी वाले प्रसंग से भी जोड़ा गया – मानो मोदी स्वयं भगवान हों।

पर सच्चाई यह है कि राम मंदिर मोदी और संघ के लिए सिर्फ एक मंदिर नहीं था; वह उनकी पूरी राजनीतिक संरचना का सबसे बड़ा प्रतीक था। अपनी छोटी बुद्धि में वे इसे हिंदुत्व की विजय का प्रतीक मानते थे। लेकिन वे यह समझ नहीं पाए कि धार्मिक आस्था किसी पार्टी की संपत्ति नहीं होती। उसमें पवित्रता, न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व भी होते हैं। मंदिर का चढ़ावा चुनावी चंदा नहीं, श्रद्धालु का अपने आराध्य को अर्पण है।

इसलिए यह चढ़ावा चोरी केवल 'इलेक्टोरल बॉण्ड' का मामला नहीं है – यह धर्मभीरुओं की आस्था की लूट है। यहाँ राजनीतिक भ्रष्टाचार नैतिक पतन बन गया है।

इस मामले में संघ और मोदी पूरी तरह लाचार दिखते हैं। उनके पास न तो इसका खुलकर जवाब देने की भाषा है, और न ही चुप रहने का विकल्प। अगर बोलते हैं, तो मंदिर ट्रस्ट, उसके हिसाब-किताब, और भाजपा-संघ से जुड़े लोगों की भूमिका पर सवाल उठेंगे। अगर चुप रहते हैं, तो हिंदू आस्था पर डाका डालने के कुप्रसिद्ध होंगे।

यही वह क्षण है जब सत्ता की बुद्धि अपने ही विरोधाभास में फँस जाती है – अपने सबसे बड़े प्रतीक का श्रेय लेना, और उसी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप से बचना, एक साथ संभव नहीं। सबसे सुरक्षित प्रतीक अब उसी के खिलाफ साक्ष्य बन चुका है। यहाँ विपक्ष ने उसकी विचारधारा नहीं तोड़ी, बल्कि सत्ता की आंतरिक असंगति ने ही उसे ध्वस्त कर दिया।

धैर्य और आत्म-विश्वास

ऐसे विश्लेषण में बहुत धैर्य चाहिए। कोई नहीं जानता कि झूठ कब उजागर होगा – लेकिन असंगतता अंततः खुद को ही खोल देती है। राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में हम यही धैर्य देख रहे हैं।

भाजपा ने उन्हें अपरिपक्व, वंशवादी, अनिच्छुक और असफल – जो नहीं कहा। लेकिन राहुल ने तत्काल जवाब देने की बजाय उस मिथ्या छवि को अपने तार्किक नतीजे तक विकसित होने दिया। यात्राओं, मुकदमों, संसद से निष्कासन, और लगातार निजी हमलों के बीच ही देखा गया कि भाजपा की बनाई हुई विरूपित छवि स्वतः ध्वस्त हो गई। वे उससे मुक्त हो गए।

दूसरी ओर, भाजपा ने पूरी कोशिश की कि राहुल को सिर्फ एक कांग्रेसी नेता की तरह देखा जाए – लेकिन उनकी इसी कोशिश ने राहुल को कांग्रेस की सीमाओं के परे, व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। अब भाजपा का झूठ उस बिंदु पर सामने आ रहा है, जिसका मोदी और उनकी सरकार को अंदाज़ा भी नहीं था। राहुल की छवि बिगाड़ने का अभियान ही मोदी के राजनीतिक अंत का संकेत बन गया है।

अनंतता की गणना – कैंटर से बाद्यू तक

बाद्यू आधुनिक गणितज्ञ जॉर्ज कैंटर के अनंतता-सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा करते हैं। कैंटर ने सिद्ध किया कि किसी भी समुच्चय का घात-समुच्चय (power set) – यानी उसके सभी संभावित उपसमुच्चयों का संग्रह – मूल समुच्चय से हमेशा बड़ा होता है। यह बड़ी अनंतता है। इसे यदि राजनीति पर लागू करें तो पायेंगे कि किसी स्थिति में मौजूद व्यक्तियों की संख्या गिनी जा सकती है, पर उन व्यक्तियों के बीच बन सकने वाले सभी संबंधों और गठबंधनों की संख्या हमेशा उस गिनती से अधिक होती है।

यही वह अनंतता है जिसे सत्ता की सीमित बुद्धि नहीं समझ सकती। वह व्यक्तियों को गिनती रहती है, पर उनके संबंधों की असीम संभावनाओं के प्रति अंधी रहती है।

हम पहले से यह नहीं जान सकते कि कौन सा छात्र आंदोलन किस किसान आंदोलन से जुड़ जाएगा, या कौन सा धार्मिक विश्वासघात किस नैतिक विद्रोह को जन्म देगा। लेकिन हम यह निश्चित कह सकते हैं कि स्थिति का सामूहिक संसाधन उसके व्यक्तिगत संसाधनों के साधारण योग से कहीं बड़ा होता है।

उपसंहार - अनंतता से टकराकर सत्ता का अंत 

बाद्यू कहते हैं – "The infinite infinitizes thought itself." – अनंतता स्वयं विचार को अनंत बना देती है।

राहुल गांधी का यह कथन कि मोदी शासन अपने अंतिम चरण में है – यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक निगमनात्मक राजनीतिक विश्लेषण है। मोदी सत्ता का अंत इसलिए नहीं है कि उसके खिलाफ एक बड़ी ताकत खड़ी हो गई है, बल्कि इसलिए कि उसकी सीमित संघी बुद्धि उस राजनीतिक समाज को समझने में असमर्थ है, जिसकी संभावनाएँ उसके हर दमन, हर झूठ और हर नैतिक विसंगति के साथ बढ़ती जा रही हैं।

सत्ता व्यक्तियों को पराजित कर सकती है, पर व्यक्तियों और सामूहिकता के बीच बन चुकी अनंतता की खाई को नहीं पाट सकती। जब सत्ता एक प्रतिरोध को दबाती है, तो उसी दमन से अनेक नए प्रतिरोध-समुच्चय जन्म ले लेते हैं।

मोदी शासन का राजनीतिक अंत इसी बिंदु पर स्पष्ट हो जाता है – जहाँ सत्ता के पास अभी भी साधन हैं, पर परिस्थिति की संभावनाएँ उन साधनों से अनंत रूप से बड़ी हो चुकी हैं।

वोट व्यक्ति की शक्ति है, आंदोलन समूह की। वोट एक को चुनता है, संघर्ष अनेक को जोड़ता है। बड़ा से बड़ा वोट-चोर भी सामूहिक संघर्ष के सामने असहाय होता है।


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

छप्पन इंच का छोटा बंदर!

( सीमित बुद्धि की राजनीति और बारिश में डूब गये मानसून सत्र का सबक)

—अरुण माहेश्वरी


ऐलेन बाद्यू की यह एक बेहद महत्वपूर्ण स्थापना है कि सत्य के बारे में सीमित (finite) और असीम (infinite) चिंतन के परिणाम बिल्कुल भिन्न होते हैं। यह बात राजनीतिक चिंतन पर भी समान रूप से लागू होती है।

सीमित चिंतन दुनिया को उन्हीं रूपों में देखता है जिन्हें तुरंत गिना, मापा और जोड़-घटाकर समझा जा सकता है। राजनीति में यह दृष्टि सांसदों की संख्या, दलों के समीकरण, वोटों के जोड़-घटाव और गठबंधनों की तात्कालिक स्थिति तक सीमित रहती है। इसके चलते वास्तविकता एक बंद गणितीय संरचना में बदल जाती है, जहाँ हर चीज को पहले से ज्ञात नियमों के भीतर फिट कर दिया जाता है। ऐसी सोच सत्ता पर अल्पकालिक नियंत्रण तो कायम कर सकती है, लेकिन राजनीति की गहराई और उसकी अप्रत्याशित गतिशीलता को पकड़ने में हमेशा चूकती है।

इसके विपरीत असीम चिंतन राजनीति को एक खुली और अपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखता है। वह जानता है कि हर परिस्थिति अपने भीतर ऐसी संभावनाएँ रखती है जो उसकी वर्तमान गणना में शामिल नहीं हैं। राजनीति केवल वर्तमान आँकड़ों का योग नहीं है। जनता, इतिहास, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, सामाजिक स्मृतियाँ और राजनीतिक घटनाएँ किसी भी क्षण ऐसा नया समीकरण पैदा कर सकते हैं जिसे पुराने हिसाब से समझा नहीं जा सकता।

इसी फर्क को हम सामान्य भाषा में राजनीति की छोटी बुद्धि और बड़ी बुद्धि का फर्क कह सकते हैं।

छोटी बुद्धि का अर्थ बुद्धि का अभाव नहीं है। वह कई बार बेहद चतुर, चालाक और हिसाबी होती है। वह जानती है कि किस दल में फूट है, किस नेता की क्या कमजोरी है, किस सांसद को तोड़ा जा सकता है, किस सहयोगी पर दबाव डाला जा सकता है और किस तात्कालिक प्रलोभन से कितने वोट जुटाए जा सकते हैं।

लेकिन चतुराई और राजनीतिक बुद्धि एक ही चीज नहीं हैं।

राजनीति की बड़ी बुद्धि किसी परिस्थिति को उसके तात्कालिक समीकरण से आगे जाकर देखती है। वह जानती है कि राजनीतिक दल केवल नेताओं और सांसदों के झुंड नहीं होते। उनके पीछे इतिहास होता है, सामाजिक आधार होता है, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ होती हैं, राजनीतिक स्मृतियाँ होती हैं और भविष्य की अपनी जरूरतें होती हैं। राजनीति में संबंध का अर्थ कभी भी अधीनता नहीं होता।

सद्यः समाप्त मानसून सत्र ने मोदी-शाह की इसी सीमित और छोटी राजनीतिक बुद्धि की बुनियादी सीमा को लगभग प्रयोगशाला की स्पष्टता के साथ सामने रख दिया है।

सत्र के पहले इस जोड़ी ने ऐसा वातावरण बना रखा था मानो संसद के अंकगणित की सारी गुत्थियाँ सुलझ चुकी हैं। तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट हो गई है; डीएमके और कांग्रेस के बीच तनाव है; शरद पवार की एनसीपी परिसीमन के किसी संशोधित फार्मूले पर बातचीत के लिए तैयार हो सकती है; तेलुगु देशम पहले से एनडीए में है। इन सबको जोड़कर वे सपना देखने लगे कि संविधान संशोधन के लिए आवश्यक लगभग 360 सांसदों की जादुई संख्या अब उनकी पहुँच में है।अर्थात राजनीति को महज एक एक्सेल शीट बना दिया गया ।

इतने अपने, इतने सहयोगियों के, इतने विपक्ष से तोड़ कर, इतनों को प्रलोभन देकर, इतने को डरा कर साथ लाया जा सकता है। अब सबको जोड़ कर 360 पूरे हो जायेंगे । इस जादुई संख्या के मिलते ही मानो संविधान-संशोधन की वैतरणी पार करके वे अपनी चिरस्थायी तानाशाही के बैकुंठ तक पहुँच जायेंगे । 

यहीं बाद्यू की finite और infinite की स्थापना का वास्तविक राजनीतिक अर्थ समझ में आता है। Infinite कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं है। असीम सीमित का विशाल रूप भर नहीं होता। वह उस संभावना का संकेत है जिसे वर्तमान गणना अपने भीतर पूरी तरह समेट नहीं सकती है । 

इसलिए 360 भी finite है और 543 भी finite है। संसद की सारी सीटें भी अंततः एक गणनीय समुच्चय हैं।

लेकिन राजनीति संसद की सीटों के इस समुच्चय में समाप्त नहीं होती। उसके बाहर जनता है। इतिहास है। भाषाएँ हैं। क्षेत्रीय आकांक्षाएँ हैं। सामाजिक संरचनाएँ हैं। संघीय संबंध हैं। राजनीतिक स्मृतियाँ हैं। और इन सबकी अपनी स्वतंत्र गति है।

मोदी-शाह की सीमित बुद्धि की मूल समस्या यही है कि वह इन स्वतंत्र गतियों को नहीं देखती। वह हर नई परिस्थिति को अपने पुराने गणित से हल करने की कोशिश करती है। 

विपक्ष मजबूत हुआ तो पार्टी तोड़ दीजिए; बहुमत कम हुआ तो सांसद जोड़ लीजिए; क्षेत्रीय दल असंतुष्ट है तो उसके नेता को साध लीजिए; कोई संस्था बाधक है तो उस पर नियंत्रण कायम कर लीजिए। हर समस्या का उत्तर प्रबंधन है।

इस मानसून सत्र से पहले इसी राजनीतिक प्रबंधन के चार बड़े शिकार साफ दिखाई दे रहे थे— डीएमके, तेलुगु देशम, शरद पवार की एनसीपी और तृणमूल के बागी सांसद।

डीएमके के प्रसंग में मोदी-शाह की छोटी बुद्धि का फार्मूला था कि कांग्रेस से दूरी का अर्थ होता है भाजपा से निकटता ! 

तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच तनाव दिखाई दिया और मोदी-शाह ने मान लिया कि स्तालिन को अब साधा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस और डीएमके के बीच मतभेद का अर्थ यह कैसे हो गया कि डीएमके भाजपा के केंद्रीकृत राज्य के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के राजनीतिक प्रकल्प का हिस्सा बनने के लिए तैयार है?

यही है छोटी बुद्धि की विडंबना जो सिर्फ वर्तमान क्षण को देखती है, इतिहास को नहीं।

डीएमके के पीछे द्रविड़ आंदोलन का लंबा इतिहास है; तमिल अस्मिता है; भाषा का प्रश्न है; संघवाद की परंपरा है; उत्तर और दक्षिण के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न है। इन सबको किसी तात्कालिक कांग्रेस-डीएमके तनाव में बदल देना एक राजनीति के इतिहास को मिटा कर देखने के समान है।

छोटी बुद्धि ने कांग्रेस और डीएमके के बीच की दरार देखी। बड़ी बुद्धि तमिलनाडु देखती है । 

तेलुगु देशम के मामले में इन छोटी बुद्धि वालों का फ़ार्मूला है — सहयोग का अर्थ है हुकुमबरदारी ! 

चंद्रबाबू नायडू एनडीए में हैं, इसलिए मान लिया गया कि उनकी पार्टी के सांसद सरकार की हर बड़ी संवैधानिक-ग़ैर-संवैधानिक परियोजना के लिए सहज उपलब्ध हैं। क्या किसी गठबंधन में शामिल होना अपने राजनीतिक अस्तित्व को सहयोगी दल के हाथों गिरवी रख देना होता है ? 

तेलुगु देशम की शक्ति दिल्ली से नहीं आती। वह आंध्र प्रदेश से आती है। उसे अपने राज्य की आकांक्षाओं, अपने मतदाताओं और अपने राजनीतिक भविष्य का हिसाब रखना है। परिसीमन जैसे प्रश्न पर वह सबसे पहले यह देखेगी कि आंध्र और दक्षिण भारत की राजनीतिक शक्ति पर उसका क्या असर पड़ेगा।

छोटी बुद्धि सोचती है कि वह हमारे गठबंधन में हैं, इसलिए उनके वोट हमारे हैं। बड़ी बुद्धि का सवाल होगा कि वे हमारे साथ क्यों हैं, किन प्रश्नों पर हैं और कब तक हैं?

शरद पवार के मामले में इन महानुभावों का सूत्र है- मुलाकात का अर्थ आत्मसमर्पण।

प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात हुई और उससे यह कहानी बना ली गई कि अब पवार को भी साध लिया गया है। यह उसी राजनीतिक शैली का घरेलू रूप है जिसमें राष्ट्राध्यक्षों को गले लगाकर राष्ट्रों को जीत लेने का भ्रम पाल लिया जाता है।

शरद पवार जैसे नेता की पूरी राजनीति को एक मुलाकात में सीमित नहीं किया जा सकता। महाराष्ट्र का अपना सामाजिक संसार है, किसानों का प्रश्न है, पार्टी का आधार है, गठबंधनों का इतिहास है और पवार की अपनी दीर्घ राजनीतिक यात्रा है।

राजनीति में बातचीत करना आत्मसमर्पण नहीं है।किसी प्रस्ताव पर विचार करना किसी के हाथ बिक जाना नहीं होता ।

छोटी बुद्धि हर बातचीत में ‘डील’ खोजती है। बड़ी बुद्धि राजनीतिक संबंधों की बहुस्तरीयता को समझती है।

और तृणमूल के बागी सांसदों के मामले में तो छोटी बुद्धि अपने सबसे शुद्ध रूप में सामने आई।

बीस सांसद टूट गए—अर्थात बीस वोट उधर से इधर आ गए।बस इतना ही?

उनके मन में एक बार भी यह सवाल नहीं आता कि क्या बीस सांसदों के साथ उनके बीस निर्वाचन क्षेत्र भी टूट कर भाजपा में आ गए हैं?क्या उनके मतदाता भी उनके साथ स्थानांतरित हो गए हैं? क्या पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति उन सांसदों के दल बदलने से बदल गई है? 

सांसदों को गिनना तो आसान है। लेकिन सांसद पैदा करने वाली राजनीतिक परिस्थिति को समझना दूसरी बात है। यही छोटी और बड़ी बुद्धि का फर्क है।छोटी बुद्धि सांसद देखती है। बड़ी बुद्धि उसके पीछे के मतदाता को देखती है।छोटी बुद्धि नेता को देखती है। बड़ी बुद्धि उस समाज को देखती है जिसने उस नेता को पैदा किया है।

इसलिए डीएमके को समझना है तो स्तालिन से आगे तमिलनाडु को देखना होगा। तेलुगु देशम को समझना है तो नायडू से आगे आंध्र प्रदेश को देखना होगा। एनसीपी को समझना है तो शरद पवार से आगे महाराष्ट्र को देखना होगा। और तृणमूल के बीस बागी सांसदों को समझना है तो उन बीस व्यक्तियों से आगे बंगाल की राजनीति को देखना होगा।

मोदी-शाह की राजनीति की मूल समस्या यह नहीं है कि उन्हें जोड़-तोड़ करना नहीं आता। इसके उलट, जोड़-तोड़ की कला के तो वे महा-उस्ताद हैं । असल समस्या यह है कि उन्होंने जोड़-तोड़ को ही राजनीति समझ लिया है।

चुनाव जीतना जनता को जीत लेना हो गया। बहुमत प्राप्त करना देश पर स्वामित्व का अधिकार हो गया। तब सहयोगी दल स्वतंत्र राजनीतिक शक्तियाँ नहीं, आश्रित दिखाई देने लगते हैं । सांसद जनप्रतिनिधि नहीं, गिने जाने वाले जीव हो जाते हैं। राजनीति के एक विशाल एक्सेल शीट में बदल जाने के पीछे की यही कहानी है ।

लेकिन राजनीति की मूल विशेषता यह है कि वह कभी पूरी तरह गिनी नहीं जा सकती। संसद में 360 सांसद जुटाए जा सकते हैं, पर भारत को 360 सांसदों में समेटा नहीं जा सकता।

भारत असंख्य भाषाओं, क्षेत्रों, इतिहासों, जातीय-सामाजिक अनुभवों, राजनीतिक स्मृतियों और आकांक्षाओं की वह बहुलता है जिसे किसी एक केंद्रीय सत्ता की गणना में पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। यही समझ राजनीति की बड़ी बुद्धि का आरंभ-बिंदु है। वह जानती है कि समाज किसी शासक की बनाई हुई शतरंज की बिसात नहीं है। उसमें असंख्य स्वतंत्र प्रवृत्तियाँ सक्रिय रहती हैं और वे किसी भी क्षण स्थापित समीकरणों को बदल सकती हैं।

यही बात विदेश नीति पर भी लागू होती है। दुनिया को राष्ट्राध्यक्षों के व्यक्तिगत संबंधों, गले मिलने की तस्वीरों, तत्काल सौदों और प्रचारात्मक उपलब्धियों में घटा देना छोटी बुद्धि का अंतरराष्ट्रीय संस्करण है। राष्ट्र अपने नेताओं से बड़े होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे राजनीतिक दल अपने सांसदों से बड़े और समाज अपने शासकों से बड़ा होता है।

सद्यः समाप्त मानसून सत्र का सबसे बड़ा सबक इसलिए किसी एक विधेयक के पारित अथवा पारित न होने में नहीं है। उसका असली सबक उस राजनीतिक बुद्धि की सीमा में है जिसने मान लिया था कि कुछ नेताओं को साधकर, कुछ दलों की दरारों का लाभ उठाकर और कुछ सांसदों को इधर से उधर करके भारत की राजनीतिक संरचना को अपनी इच्छा के अनुसार बदला जा सकता है।

बारिश आई, मानसून सत्र शुरू हुआ और जैसे शुरू हुआ, वैसे ही बीत भी गया।इसके साथ ही 360 सांसदों के सपनों का वह महल भी बह गया जिसे बड़ी मेहनत से हवा में खड़ा किया गया था। इसलिये, क्योंकि वह महल राजनीति की छोटी बुद्धि से तैयार किया गया था ।



मंगलवार, 11 अगस्त 2026

अमेरिका में Gen Z


-अरुण माहेश्वरी

 


आज (11 अगस्त 2026) के टेलिग्राफ में ‘न्यूयार्क टाइम्स न्यूज सर्विसकी एक रिपोर्ट है – ‘Beyond Class : And then there were some’। यह अमेरिका की चुनावी राजनीति में Gen Z के बढ़ते कदमों पर एक रिपोर्ट है।

एक नजर में यह अमेरिका की चुनावी राजनीति के नाना आयामों के एक विशेष आयाम पर सामान्य प्रकार की रिपोर्ट लग सकती है । पर इसमें पहले ही बता दिया गया है कि यह रिपोर्ट इस बात की पड़ताल है कि आखिर क्यों अमेरिका के Gen Z ने यह चुनाव का रास्ता चुना है ? इसे थोड़ा गहराई से पढ़ने पर पता चलता है यह उस पीढ़ी के एक राजनीतिक प्रमाता में रूपांतरण की रिपोर्ट है जो अब तक मुख्यतः सोशल मीडिया, कैंपस, भाषा, सांस्कृतिक विद्रोह और सड़क के आंदोलनों में दिखाई देती थी । वह अब अमेरिकी जनतंत्र में ही एक नई निष्ठा के साथ स्वयं राजनीतिक संस्थाओं में प्रवेश करना चाहती है।

 इस रिपोर्ट के शीर्षक में ही कहा गया है − “And then there were some” । अर्थात् अब ऐसे Gen Z उम्मीदवार इक्का-दुक्का नहीं रहे हैं।

इस रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण कहानी एक मीलाट किरोस की है । नोटेर डेम लॉ स्कूल से निकलने के बाद 29 वर्षीय किरोस न्यूयार्क की एक लॉ फर्म में काम कर रही थीं। उसने इज़राइल-गाज़ा प्रश्न के सिलसिले में फिलिस्तीनी छात्रों के पक्ष में महज एक लंबा पत्र लिखा, जिसके चलते उसकी नौकरी ही चली गई। इसके बाद वे कोलोरैडो में डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट के रूप में राजनीति में उतरीं और कांग्रेस के चुनाव में विजयी हुई । उनकी यह जीत कोई मामूली जीत नहीं थी । उन्होंने लगभग तीस वर्षों से कांग्रेस की सदस्या, पंद्रह बार चुनाव जीत चुकी डायना डिगेटे को डेमोक्रेटिक प्राइमरी में पराजित किया । किरोस को लगभग 51 प्रतिशत मत मिले, जबकि डायना को 42 प्रतिशत ।

किरोस कहती हैं:

“We’re seeing just how broken the system is…”

यहाँ महत्वपूर्ण बात किरोस का सोशलिस्ट होना भर नहीं है। महत्वपूर्ण है एक टूटन का अनुभव—“व्यवस्था में दरार है...।”

यह रिपोर्ट किरोस के इसी अनुभव को Gen Z के व्यापक अनुभव से जोड़ती है। महामारी, सामाजिक-माध्यम के अलगाव, एआई, गाजा, ट्रंप  की राजनीति और बाइडेन के दौर के वृद्ध तंत्र (gerontocracy) आदि के बीच बड़ी हुई पीढ़ी स्थापित अमेरिकी संस्थाओं को उसी स्वाभाविक रूप में स्वीकार नहीं कर पा रही है जिस तरह पिछली पीढ़ियाँ किया करती थीं।

लेकिन यह रिपोर्ट जेन जी के बारे में इस प्रारंभिक आख्यान के साथ ही तुरंत हमारे सामने विचार के नये प्रश्न खड़े कर देती है । इसमें हम देखते हैं कि यह पीढ़ी केवल किरोस जैसे डैमोक्रेटिक सोशलिस्ट ही पैदा नहीं करती, वह कंजर्वेटिव रिपब्लिकन उम्मीदवार भी पैदा कर रही है, ग्रीन पार्टी के ब्रैंडन ट्रैक्सेल और पार्कलैंड स्कूल में शूटिंग की घटना से उत्पन्न डैमोक्रेट टाइलर स्मिथ को भी पैदा करती है । बल्कि पार्कलैंड की घटना के प्रत्युत्तर में ब्रैक्सटन मिशेल जैसे युवा कंजर्वेटिव भी सामने आते हैं।

इस आधार पर कोई इस सरल नतीजे पर पहुंच सकता है कि जेन जी न वाम है, न दक्षिण; उसका कोई स्पष्ट राजनीतिक चरित्र नहीं होता ।

दरअसल, यह कहना एक गलत प्रस्तावना है। कोई भी घटना किसी पार्टी की सदस्यता का सबब नहीं होती । घटना का अर्थ यह नहीं कि समाज का कोई वर्ग अचानक किसी विचारधारा को अपना लेता है। घटना की भूमिका पुराने संसार के उस विन्यास को तोड़ने की होती है जिसमें सब कुछ पहले से निश्चित मान लिया जाता है। घटना से यह सामने आता है कि जो कल तक असंभव लगता था, वह अब आगे कैसे संभव हो गया है ।

और, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घटना से पैदा होने वाले विघटन से समाज का कोई भी हिस्सा पूरी तरह अछूता नहीं रहता। फ्रांस के सन् ’60 के कैंपस विद्रोह के समय ही यह बात सामने आई थी कि जब विश्वविद्यालय टूटेगा तो केवल वामपंथी छात्रों की भूमिका नहीं बदलेगी, परिवार, चर्च, राजनीतिक दल, मीडिया, नौकरशाही और दक्षिणपंथ भी बदलेगा। किसी भी बड़ी ऐतिहासिक घटना के बाद धर्म के जगत में भी एक मुक्तिकामी धर्मशास्त्र भी पैदा हो सकता है, बल्कि उसके साथ ही कट्टरपंथ की नई धारा भी सामने आ सकती है । इनमें कोई एक-दूसरे को निरस्त नहीं करता। ये सब पुराने संसार में आई दरार के अलग-अलग उत्तर होंगे।

बाद्यू ने अपनी पुस्तक Being and Event के बाद Logics of Worlds में प्रमाता के प्रश्न को और विकसित किया। उनके यहाँ घटना के बाद केवल सत्य के प्रति निष्ठावान प्रमाता (faithful subject) ही नहीं मिलता; वे प्रतिक्रियावादी (reactive) और पोंगापंथी (obscure) विषय की भी चर्चा करते हैं। सत्य के बरक्स प्रमाता और विषयों की गति का बाद्यू ने जो चार्ट तैयार किया था, उसकी रोशनी में देखें तो कम्युनिस्टों की तरह का नये के प्रति आग्रहशील, निष्ठावान प्रमाता घटना की शेषता के स्फोट से एक नया वर्तमान निर्मित करता है; प्रतिक्रियावादी विषय घटना के परिणामों के बीच रहते हुए भी उसके परिवर्तनकारी अर्थ को कमतर अथवा निष्प्रभावी करने की कोशिश करता है; और पोंगापंथी विषय उससे भी आगे जाकर उस नए वर्तमान को किसी भारी-भरकम बंद पहचान अथवा परमार्थिक चट्टान के तले दबाने की कोशिश करता है।

इसीलिये, यहाँ वाम और दक्षिण की धारणा को स्थापित पार्टियों के नामों से अलग करके देखने की जरूरत होगा। यदि वाम का अंतिम सत्य मनुष्य की स्वतंत्रता की संभावना के प्रति निष्ठा में है, तो वाम को वह प्रमात्रिक रूझान (subjective orientation) कहना होगा जो घटना द्वारा खोली गई नई संभावनाओं को अधिक सार्वभौमिक मानवीय स्वतंत्रता की दिशा में ले जाता है। वह मनुष्य के लिए जाति, नस्ल, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता अथवा सामाजिक पद की कैद से मुक्ति की संभावना खोलता है।

दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया भी पुराने संसार की दरार को महसूस करती है। बल्कि कभी-कभी वह उसे वाम से भी अधिक तीव्रता से अनुभव कर सकती है। लेकिन फर्क यह है कि वह उस अभाव को अंततः किसी नए प्रभु संकेतक (Master Signifier)राष्ट्र, नस्ल, धर्म, नेता, परिवार, परंपरा—से भर देना चाहती है।

जॉक लकान की भाषा में, ‘अन्य’  में अभाव दोनों देखते हैं। एक उस अभाव को नई सृष्टि की संभावना मानता है; दूसरा उसकी असह्यता से बचने के लिए नए प्रभु की तलाश करता है।

इसीलिए जेन जी के बारे में केवल इतना कहना उचित नहीं है कि वह “न वाम है, न दक्षिण”। बल्कि जेन जी किसी विचारधारा का नाम नहीं, वह उस नए ऐतिहासिक प्रमात्रिक जगत (subjective terrain) का नाम है जिसमें वर्तमान विघटन से अलग-अलग प्रकार के विषय निर्मित हो रहे हैं। वह वर्तमान में घटनामूलक विघटन का एक नया सामाजिक-भाषिक भुवन है, जिसमें एक ओर स्वातन्त्र्य के सत्य का वाहक प्रमाता आकार ग्रहण कर सकता है, और दूसरी ओर उसी विघटन के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी विषय भी सक्रिय हो सकते हैं।

इसी संदर्भ में ‘न्यूयार्क टाइम्स’ की रिपोर्ट में ब्रैंडन ट्रैक्सेल के प्रसंग का एक और महत्वपूर्ण पहलू उल्लेखनीय है, क्योंकि वे चुनाव सुधार की कई मांगों को उठा कर प्रश्न करते हैं आखिर सत्ता में प्रवेश के रास्ते में इतनी बाधाएं किसके हित में हैं?

ट्रैक्सेल की माँगों में ranked-choice voting और same-day voter registration शामिल हैं। पहली व्यवस्था में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पहली, दूसरी, तीसरी पसंद के क्रम में रखता है, जिससे छोटे दल अथवा स्वतंत्र उम्मीदवार को वोट देने का अर्थ वोट ‘बर्बाद’ करना नहीं रह जाता। दूसरी व्यवस्था पात्र नागरिक को मतदान के दिन ही अपना पंजीकरण पूरा करके वोट देने का अवसर देती है। इस प्रकार प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि सत्ता में कौन आएगा; Gen Z का एक हिस्सा उस चुनावी संरचना पर भी प्रश्न कर रहा है जो यह तय करती है कि सत्ता तक पहुँचने का रास्ता किसके लिए कितना खुला होगा।



जैसा कि हम जानते हैं, अमेरिका में जेन जी की भाषा पर पहले ही काफी महत्वपूर्ण काम हो चुके हैं। भाषाविद् ऐडम अलेक्सिक (Adam Aleksic) की प्रसिद्ध पुस्तक है − Algospeak: How Social Media Is Transforming the Future of Language । उन्होंने ही सबसे पहले दिखाया था कि कैसे सोशल मीडिया और उसके एल्गोरिदम केवल कुछ नए शब्द नहीं बना रहे; वे भाषा के अर्थ, चलन, ध्वनि, लय आदि से एक नई पहचान का निर्माण कर हैं। यह किशोर वय के महज slang नहीं हैं । एल्गोरिदम की सेंसरशिप से बचने के लिए dead या suicide की जगह unalive, sex की जगह seggs जैसे प्रयोग पैदा हुए। इसी प्रकार जानबूझकर गलत वर्तनी, emojis, coded expressions, memes और “I’m in my ___ era” जैसे वाक्य-विन्यास Gen Z के डिजिटल व्यवहार का हिस्सा बने। यहाँ परिवर्तन केवल शब्दावली का नहीं है; बोलने की लय, स्वर, व्यंग्य और आत्म-पहचान के ढंग तक बदल रहे हैं।

यहाँ भाषा किसी शब्दकोश से नहीं आती। वह निषेध, आनंद, हास्य, मीम और संकेतों के सामूहिक आविष्कार और एल्गोरिदम से बच निकलने की कोशिश के बीच पैदा होती है। अर्थात् यह एल्गोरिदम द्वारा बनाई गई भाषा नहीं, एल्गोरिदम से मुठभेड़ में विषय द्वारा निर्मित एक नई लेलैंग है। एल्गोरिदम निषेध लगाता है, विषय संकेतक बदलता है; नया संकेतक चलन में आता है, एल्गोरिदम उसे पहचानता है और विषय फिर उससे बच निकलने का नया रास्ता खोजता है।

इसी आधार पर न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट में मिलाट किरोस  का प्रसंग भी केवल एक युवा सोशलिस्ट के चुनाव की कहानी नहीं रह जाता। इसमें गाजा एक ऐसी घटना है जिसने अमेरिकी विश्वविद्यालय में दरार पैदा की; डैमोक्रेटिक पार्टी में दरार पैदा की; पेशेवर संस्थानों में दरार पैदा की; यहूदी और ईसाई धार्मिक समुदायों के भीतर बहस पैदा की; सोशल मीडिया की भाषा को बदलने पर मजबूर किया; और किरोस जैसे व्यक्ति के जीवन में पेशेगत विच्छेद ने घटना के प्रति राजनीतिक निष्ठा में बदलते हुए प्रमाता के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी।

बहरहाल, कोई भी घटना सबको विचलित कर सकती है, लेकिन हर विचलित विषय प्रमाता नहीं होता। प्रमाता वही है जो उस विघटन में प्रकट हुई स्वातन्त्र्य की संभावना को सत्य के रूप में ग्रहण करता है और उसके प्रति निष्ठा में स्वयं को निर्मित करता है। Gen Z न स्वयं वाम है, न दक्षिण और न स्वयं में प्रमाता। वह वर्तमान घटनात्मक विघटन का वह नया सामाजिक-भाषिक भुवन है जिसमें एक ओर स्वातन्त्र्य के सत्य का वाहक प्रमाता आकार ग्रहण कर सकता है, और दूसरी ओर उसी विघटन के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी विषय भी सक्रिय हो सकते हैं। घटना की व्यापकता इन दोनों को जन्म देती है; लेकिन सत्य के प्रति निष्ठा ही प्रमाता को बाकी विषयों से अलग करती है।