शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

हिटलर की काली छाया का ख़तरा


आरएसएस ने लेखकों, इतिहासकारों, फ़िल्मकारों, वैज्ञानिकों और देश में बढ़ती हुई सांप्रदायिक असहिष्णुता का प्रतिवाद करने वालों की कार्रवाइयों को 'नंगा नाच' घोषित किया है । कल राँची में आरएसएस की चल रही बैठक के बीच से उसके प्रवक्ता ने संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही है ।

आरएसएस का यह रुख़ इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले समय में और भी संगठित रूप में सांप्रदायिकता-विरोध की हर आवाज़ को कुचल देने की साज़िशें रची जायेगी । लेखकों के खिलाफ गंदे प्रचार को, उनको दी जाने वली गालियों और धमकियों को तथा उन पर शारीरिक हमलों को और भी तेज़ किया जायेगा । उन्होने साफ तौर पर हिटलर के नक़्शे-क़दम पर चलने और तर्क तथा विवेक के बजाय शुद्ध रूप से पाशविक शक्ति के बल पर विरोधियों से निपटने का निर्णय लिया है । हिटलर कहा करता था तर्क और विवेक नहीं, सारे मामलों को हमारा घूँसा तय करेगा । जिन लोगों ने डाभोलकर, पानसारेऔर कलबुर्गी की हत्याएँ की, वे इसी हिटलरी सिद्धांत के समर्थक रहे हैं । अब आरएसएस ने लेखकों-बुद्धिजीवियों के प्रतिवाद को 'नंगा नाच' घोषित करके अपने ऐसे तमाम तत्वों को उतर पड़ने के लिये हरी झंडी दिखा दी है ।

क्रमश: देश में ऐसी परिस्थिति बनती हुई दिखाई दे रही है जिसमें लगता है सरकार तमाम बौद्धकों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर देगी । इस ख़तरे के प्रति सतर्क होने और प्रतिरोध की क़तार को और ज़्यादा विस्तृत और गहरा करने की ज़रूरत है । अन्यथा जैसे हिटलर का पूरा काल जर्मनी के लिये रचना-हीनता का काला काल साबित हुआ, भारत में भी कुछ ऐसा ही होता नज़र आयेगा ।

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