रविवार, 15 जनवरी 2017

यूपी चुनाव और संसदीय राजनीति


-अरुण माहेश्वरी

ग्यारह मार्च अर्थात उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम का दिन इस बार भारत की राजनीति का एक ऐसा नया संयोग बिंदु साबित हो सकता है जहाँ से आजादी के बाद के इन सत्तर साल के अब तक के किये-धरे के पूर्ण प्रत्यावर्तन का सिलसिला शुरू होगा।  अर्थात अब तक की राजनीति का पूरा खोल उलट सकता है । आजाद भारत की राजनीति के पहले सर्ग के सभी पात्रों की तमाम संभावनाओं के अंत के प्रदर्शन के बाद एक नये प्रारंभ का सूत्रपात हो सकता है।

भारत के आजादी के बाद की सभी राजनीतिक ताक़तों ने अब तक अपने सकारात्मक और नकारात्मक, सभी पक्षों को पूरी तरह से खोल कर दिखा दिया है । अब तक जो चला है, वह आगे और नहीं चलेगा, इसके संकेत साफ है। और इसके बीच से जो प्रकट हो रहा है वह किसी नई चीज का संज्ञान नहीं है, न ही पुरानी चीजों का संग्रह। यह स्मृति और प्रत्यक्ष दर्शन के नयेपन का संयोग है। यह एक ऐसी पहचान की झलक दे रहा है जो एक ही साथ नया और पुराना , दोनों है। यही है, इसका नवीन को पुरातन के रूप में देखने का चमत्कार, भारत की राजनीति की एक नई अस्मिता की प्राप्ति का जादू । पुरातन को नया बनाने, जो छिपा हुआ है, उसे ज्ञात बनाने, उन दोनों के बीच की पहचान को स्वीकारने के, अभिनवगुप्त की शब्दावली में, प्रत्यभिज्ञा संयोग का बिंदु।

हम सबसे पहले कांग्रेस पार्टी पर ही आते हैं। आज देश की इस सबसे प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी ने अब तक अपने पास की सारी अच्छाई-बुराई को उलीच कर अपनी झोली को इस प्रकार खाली कर दिया है कि आगे उसके पास खोने के लिये कुछ नहीं बचा है ; और जिस जीवित प्राणी के पास खोने के लिये कुछ नहीं होता, उसके पास पाने के लिये तो पूरी दुनिया पड़ी होती है ! ‘कांग्रेस-विहीन’ भारत का नारा देने वालों की अभी की दुर्गति को देख कर नि:संकोच इतना तो कहा ही सकता है कि आगे के नये चरण में कांग्रेस के पुनरोदय, उसके दिन के फिरने की परिस्थितियां बन रही है। पिछले सत्तर साल का सारा राजनीतिक विमर्श मूलत: कांग्रेस पर ही केंद्रित रहा है। फिर भी आज यह लगता है जैसे राजनीति के इस नए मुकाम पर वे सारी चर्चाएं लगभग अप्रासंगिक हो गई है। उनसे न कोई इतिहास की नई सीख मिल सकती है, और न भविष्य का नया रास्ता। इस मायने में कहा जा सकता है कि यह समय एक नये भविष्य के जरिये वर्तमान और अतीत के भी पुनर्लेखन का समय है। इस समय की राजनीतिक चर्चा उन पर ही केंद्रित हो सकती है जो कांग्रेस के विपर्यय से पैदा हुए रिक्त स्थान पर अपना पूर्ण वर्चस्व कायम करने की दंभपूर्ण घोषणा के साथ, ‘कांग्रेस-विहीन’ भारत के नारे को लेकर आज सत्ता के शीर्ष पर स्थापित है।

आज भारतीय जनता पार्टी की स्थिति इतनी विकट नजर आती है कि जिस काल को उसका स्वर्णिम काल होना चाहिए था, उसी काल में उसने अपने सर्वनिम्न, निकृष्ट रूप को, गुजरात की मोदी-शाह जुगल- जोड़ी की उच्चाकांक्षी मूढ़मति वाली मोदी पार्टी के नग्न रूप के दर्शन दिये हैं। इस मोदी पार्टी की दिक्कत यह है कि उसे एक ओर आरएसएस की जड़मति से जुड़े सांप्रदायिक-सवर्ण आदर्शों के, और दूसरी ओर नव-उदारवाद की वैश्विक स्वछंद उड़ानों के परस्पर-विरोधी कार्यभारों को पूरा करना है। इसके चलते ही इसका पूरा शासन अढ़ाई सालों में ही सभी मोर्चों पर परस्पर-विरोधिता का एक मूर्त रूप बन कर रह गया है। मोदी-शाह युगल अंधेरे में उद्भ्रांत की तरह कुछ टटोलता हुआ इस प्रकार चल रहा है कि कभी एक वर्ग का समर्थन पाना चाहता है तो दूसरे को अपमानित करता है और दूसरे को अपने पास लाना चाहता है तो तीसरे का मान-मर्दन करता है। मोदी जी के कपड़ों की तरह हर रोज बदलती उसकी नीतियों के पीछे की अंधता के मुकाबले उसका व्यवहारिक ढुलमुलपन उसे और भी हास्यास्पद बना दे रहा है। इस सरकार के ओहदो पर बैठे सभी मंत्रियों और नौकरशाहों की सूरत इसी बीच कुछ ऐसी बन गई है जैसे, मार्क्स की शब्दावली में, वह कुछ महत्वाकांक्षी, जलील और लुटेरू लोगों की जमात हो जिसने शासन के ऊंचे ओहदेदारों की तरह की हास्यास्पद संजीदगी के साथ सरकारी पदों की वर्दिया पहन ली है !

परस्पर-विरोधी दबावों के बीच काम कर रही यह सरकार हर रोज एक नये शिगूफे और प्रचार की बाजीगरी से कभी मोदी जी को कभी ‘अचकन-शेरवानी’ वाले नेहरू, तो कभी ‘गुजरात वाले’ पटेल, तो कभी ‘गरीबी हटाओ’ वाली इंदिरा गांधी के स्वांग में पेश करती है, तो फिर कभी ‘सुवक्ता’ वाजपेयी या ‘फकीर’ दीनदयाल का बाना भी पहना दिया करती है। अभी अंत में इन्हें चरखे पर सूत कातने वाले लंगोटीधारी गांधी जी का रूप भी दे दिया गया है !

और, कहना न होगा, ऐसी तमाम फुलझडि़यां छोड़ कर, अंत में नोटबंदी की महाक्रांति से इन्होंने उस पूंजीवादी अर्थतंत्र को ही तहस-नहस कर दिया है, जिसकी रक्षा और विस्तार की कसमें खाकर ही वे सारी दुनिया में बहु-राष्ट्रीय निगमों और समृद्ध प्रवासी भारतीयों के चहेते बने हुए हैं। इस एक कदम से जो विषय अर्थ-व्यवस्था के साधारण नियम के अनुसार ही सबसे पवित्र माना जाता था, उसी का शीलभंग करके महीनों के लिये अर्थ-व्यवस्था से उसके स्वाभाविक वेग को ही छीन लिया गया। कुल मिला कर इस नोटबंदी ने भारत में राज्य तंत्र की पूरी गरिमा को धूल में मिला कर भ्रष्ट और घृणास्पद सा बना दिया है।

पूरे ढाई साल तक आरएसएस और यह मोदी पार्टी एक प्रधानमंत्री की निष्फल विदेश यात्राओं के अलावा कोरी भाषणबाजियों और विज्ञापनबाजियों के प्रबंधन के काम में लगी रही, और जब मोदी जी को लगा कि समय तो उनके लिये रुका हुआ नहीं है, उन्होंने एक झटके में स्वच्छ भारत, जनधन आदि की कोरी फुलझडि़यों को किनारे रख कर नोटबंदी का ऐसा मौलिक बम फोडा कि आज तक जानकारों को इसके पीछे के तर्क-कुतर्क का रहस्य ही समझ में नहीं आ रहा है । जब कतारों मे खड़े मर रहे लोगों में से ही कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि 'यह काम तो बहुत अच्छा हुआ', तब स्वाभाविक तौर पर सभी विचारवानों को आम लोगों को बेवजह दंडित करके अपने पक्ष में लेने का यह खेल और भी मायावी लगने लगता है।

पूरी भाजपा आज यह तो जानती है कि उसने अपने परंपरागत मतों के आधार को तो काफी हद तक गंवा दिया है, लेकिन मोदी-शाह की माया ने उन्हें इस बात से बांध रखा है कि जो उन्होने खोया है, उसकी तुलना में उनकी प्राप्ति बहुत ज्यादा होने वाली है । क्यों होने वाली है ? इस सवाल का किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है। बस विश्वास है जिसका हमेशा ही तर्क के अंदर की दरारों को भरने के लिये इस्तेमाल किया जाता है ! स्वपन दासगुप्त की तरह का पत्रकार इस मामले में थोड़ा बेशर्म होकर यहां तक कह जाता है कि मोदी-शाह ने लोगों की ईर्ष्या नामक सबसे अधम वृत्ति को जगाने में सफलता पाई है, और मनुष्यों की यह ‘उद्बुद्ध’ नीचता ही उनसे मोदी-शाह गिरोह के लिये काम करवायेगी ।(देखिये, टेलिग्राफ, 12 जनवरी 2017)

सहारा-बिड़ला कागजातों ने तो अब प्रेत-रूप धारण करके मारन की भारी तांत्रिक शक्ति को प्राप्त कर लिया है। कोई भी समझ सकता है, चीजें किस दिशा में जा रही है !


इसी सिलसिले में कुछ और राजनीतिक ताकतों की ओर नजर डालना भी प्रासंगिक होगा। कांग्रेस और भाजपा के अलावा तीसरे अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य वाले वामपंथी खेमे ने इन सत्तर सालों में अब जैसे अपने लिये दो-तीन राज्यों की क्षयिष्णु 'अखिल भारतीय पार्टी' की नियति को अंतिम सत्य की तरह मान लिया है । उसके नेतृत्व का यह भारी यथार्थबोध ही आज उसके पैरों की सबसे बड़ी जंजीर बन गई है ।


और, जहां तक समाजवादी पार्टी, बसपा आदि की तरह की पार्टियों का सवाल है, इनकी सीमित आकांक्षाएँ जैसी थी, वैसी ही सदा के लिये बनी रहने की अपनी अंतिम नियति का उद्घोष कर चुकी है । उत्तर प्रदेश में वे सत्ता के प्रबल दावेदार थे, हैं और शायद आगे भी रहेंगे । और यही वे ताकते हैं जो इस विशाल प्रदेश में अपनी भूमिका से अखिल भारतीय राजनीति के आगे कुछ ऐसे  नये समीकरण पैदा कर सकती हैं, जो 2019 तक आते-आते पूरी भारतीय राजनीति के खोल को ही पलट दें ।

इन्हीं तमाम कारणों से उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में जो पक रहा है, उसमें हम अखिल भारतीय राजनीति के लिये दूरगामी परिणाम का संयोग बिंदु देख पा रहे हैं । आज की दुनिया में दक्षिणपंथ की ओर दिखाई दे रहे नये रुझान की उल्टी यात्रा भी यहीं से शुरू होकर दुनिया में फिर एक बार वाम-केंद्रित नई उदार जनतांत्रिक राजनीति का श्रीगणेश कर सकती है।  यूरोप में ब्रेक्सिट वालों का, और अमेरिका में ट्रंप का भी तब तक अपने कार्यकाल के मध्य में ही मोदी की तरह दम फूलने लगेगा ।

इसीलिये बीस करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले भारत के उत्तर प्रदेश के ये चुनाव हमारी नजर में सारी दुनिया की राजनीति की दिशा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण साबित होंगे।

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