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गुरुवार, 6 जुलाई 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (14)




-अरुण माहेश्वरी

(डेढ़ महीने से भी ज्यादा के अंतराल के बाद अब हम फिर से कार्ल मार्क्स की जीवनी की श्रृंखला शुरू कर रहे हैं । निहायत निजी कारणों से इसमें व्यवधान आया था । लगभग एक महीना तो कोलकाता में न रहने के कारण अपनी किताबों से दूर हो गया था । लौट कर आने के बाद भी विषय पर वापस आने में और समय लग गया । रोजमर्रे के दूसरे विषय वैसे ही घेरे रहते हैं । बहरहाल, उम्मीद है कि अब यह सिलसिला अविरत जारी रहेगा ।)

बर्लिन की नई दुनिया में मार्क्स

सन् 1836 के अक्तूबर महीने में बर्लिन विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर कार्ल बर्लिन पहुंचे । यह बर्लिन के तेजी से विकास का समय था । 1816 से 1846 के बीच बर्लिन की आबादी 19.7 लाख से बढ़ कर 39.7 लाख हो गई थी । हर साल इस शहर में आने वाले लगभग दस हजार श्रमजीवियों के पास रहने को अपना घर नहीं होता था । वे रात किसी रैन बसेरे में गुजारते थे । दर्जियों, मोचियों की अधिकांश आबादी करों के दायरे से बाहर थी। समाजवादी पत्रकार अर्न्स्त द्रोंक के अनुसार तब शहर की हर सत्रह स्त्रियों में एक, जो घरेलू काम की तलाश में आती थी, वैश्या बनने के लिये मजबूर हो जाती थी ।


तब बर्लिन में गरीबों की सुध लेने वाला कोई नहीं था। कुछ बेहतर जीवन जीने वालों के जीवन में कोई आकर्षण नहीं था । बड़ी-बड़ी सड़कों के दोनों ओर एक कतार में एक जैसे घर ऐसे थे मानो सड़कों की पहरेदारी करने वाले सिपाही खड़े हो । एक अंग्रेज यात्री हेनरी विजेटेल्ली ने बर्लिन पर धूल के बादलों का जिक्र किया है – खुश्क मौसम में थोड़ी सी हवा चलते ही धूल के बादल आसमान को ढक लेते थे। हाइने ने बर्लिन को उत्तर का सैंडबाक्स कहा था ।


बर्लिन उस प्रशिया का राजधानी शहर, जिसकी न कोई राष्ट्रीय सभा थी, न स्वतंत्र न्यायपालिका । सन् 1815 में राजा ने जिस संविधान का वादा किया था उस वादे पर भी कभी अमल नहीं किया गया । स्वतंत्र प्रेस नाम की कोई चीज नहीं थी । अखबारों पर सेंशरशिप थी। तब वहां से सिर्फ दो अखबार निकलते थे जिनके बारे में एडगर बावर ने कहा था कि वे अपने समय के महत्वपूर्ण संकेतों को पकड़ने में असमर्थ थे ।


इस शहर में मध्यवर्ग के लोगों का शासन से कोई सीधा विरोध भी नहीं था। इसके बावजूद शहर में राजनीतिक उत्तेजना की कमी नहीं थी । वहां के विश्वविद्यालय, थियेटर, काफी हाउस, पब्स और बीयर हाल्स में काफी बौद्धिक गतिविधियां रहती थी। 1806 में नेपोलियन ने जब जेना की लड़ाई में प्रशिया को पराजित किया, उसके बाद ही 1810 में बर्लिन विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी । इसके पीछे उदारतावादी विचार काम कर रहे थे । जर्मन भाववादी दर्शन के संस्थापक माने जाने वाले दार्शनिक जोहेन गोतलिएप फिख्ते इसके पहले निदेशक थे । इसी वजह से यह एक उदारवादी संस्थान था जिसे उस समय के एक सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय का सम्मान प्राप्त था ।


एक साहित्यिक आलोचक और यंग हेगेलियन एदुआर्द मेन के अनुसार बर्लिन तब जर्मन संस्कृति और जर्मन जीवन का एक केंद्र-बिंदु था। बर्लिन तब भले पेरिस, लंदन न रहा हो, लेकिन 19वीं सदी के बड़े शहरों में एक था — कस्बाई शहरों की जीवन शैली और पूर्वाग्रहों से मुक्त एक आधुनिक शहर ।
(क्रमश:)
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(Ernst Dronke, Berlin, 1846 ; Robert J Hellman, Berlin, the Red room and White beer : the free Hegelian Radicals in the 1840s ; Berlin under the New Empire; its institutions, inhabitants, industry, monuments, museums, social life, manners, and amusements by Vizetelly, Henry, 1820-1894)