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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (15)


-अरुण माहेश्वरी

कविता का नशा उतरा

अर्न्स्त ड्रोंक ने 1846 के बर्लिन के राजनीतिक जीवन का चित्र खींचते हुए लिखा है कि “बर्लिन में वास्तविक राजनीतिक जीवन के अभाव की पूर्ति राजनीतिक बहस-मुबाहिसों से की जाती थी। वहां हर सामाजिक वर्ग, नौकरशाहों, सेना के लोगों, और कारोबारियों के आपस में मिलने बैठने की अलग-अलग तयशुदा जगहें होती थी । शहर के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, रंगकर्मियों के बीच तब कैफे स्टेह्ली काफी लोकप्रिय था जहां कभी-कभी मोजार्ट और ईटीएफ हौफमैन भी आया करते थे।1836 के आस-पास यहां दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र से जुड़े विषयों पर गर्मागर्म बहसें होने लगी थी।“


इसी कैफे में कानून की पढ़ाई के लिये बर्लिन आए कार्ल का सबसे पहले यंग हेगेलियन्स के डाक्टर्स क्लब के सदस्यों से परिचय हुआ और यहां की बहसों के बीच से ही उनके  शोध प्रबंध, ‘प्रकृति के बारे में डेमोक्रीटियन और एपीक्यूरियन दर्शन में फर्क पर’ (On the Difference between the Democritean and Epicurean Philosophy of Nature) का श्रीगणेश हुआ और 1841 में पूरा करके उसे उन्होंने विश्वविद्यालय में जमा भी करा दिया ।  इसी जगह चंद साल बाद, 1842-43 के समय से ‘फ्री’ के नाम से प्रसिद्ध हुए स्वतंत्र चिंतकों की बैठकें भी हुआ करती थी ।

विश्वविद्यालय में कानून विभाग के प्रमुख थे कार्ल वॉन सेविनी । कानून की ऐतिहासिक स्कूल के प्रवर्त्तक । इनके अलावा प्रसिद्ध हेगेलपंथी एदुआर्द गैन्स भी इस विभाग के अध्यापक थे । मार्क्स इन दोनों की कक्षाओं में जाया करते थे ।
कार्ल वॉन सेविनी                                           एदुआर्द गैन्स

जैसा कि हमने पहले ही विस्तार से बताया है कि मार्क्स जब बर्लिन में गये थे, उसके पहले ही वे जेनी के प्रेम में पूरी तरह से डूब गये थे। इसीलिये बर्लिन बहुत भारी मन से गये थे । अपने पिता को लिखे 10 नवंबर 1837 के लंबे पत्र में उन्होंने अपनी इस मनोदशा के बारे में लिखा था। वे प्रायः एक कवि की भाव दशा में रहते थे, और उन दिनों खूब कविताएं भी लिखी । कवि मार्क्स की चर्चा करते हुए हम उस पर थोड़ा विस्तार से लिख चुके हैं । लेकिन 10 नवंबर के उनके इसी पत्र से यह भी साफ होता है कि कानून और उसके दर्शन से जुड़े सवालों ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया था ।
स्ट्रैलो गांव (19वींं सदी)


स्ट्रैलो (वर्तमान)

यही वह दौर था जब कवि मार्क्स की रातों की नींद उड़ी रहती थी। वे बीमार पड़ गये। तभी डाक्टर ने हवा-पानी बदलने की सलाह दी। मार्क्स कुछ दिनों के लिये बर्लिन के ही निकट, स्प्री नदी और रमेल्सबर्ग समुद्र के बीच जीभ के आकार की जमीन पर बसे स्ट्रैलो गांव में चले गये । यहां रहते हुए ही उन्होंने उन हेगेल का गंभीरता से अध्ययन किया, जिनके बारे में वे पहले कह चुके थे कि हेगेल की ‘विलक्षण ऊंची तान’ (the grotesque craggy melody) उन्हें आकर्षित नहीं कर रही है । हेगेल की आधुनिकता की अवधारणा में कला और कविता को दोयम स्थान दिया गया था । उनकी साफ राय थी कि क्यों कोई किसी प्रतीक या कथा या बिंब के चक्कर में पड़ेगा जब दर्शन शास्त्र ने परम ज्ञान का रास्ता खोल दिया है और उससे एक बहुत साफ और सार्वकालिक भाषा में सत्य का बयान किया जा सकता है ।

स्ट्रैलो में हेगेल के अध्ययन का मार्क्स पर क्या असर पड़ा, इसे उनके इन शब्दों में ही देखा जा सकता है, जब वे उस पर लिखते है, “ मेरी सारी पवित्रताएं तार-तार हो गई और उनका स्थान नये ईश्वरों ने ले लिया ।“ वे एक बार और कला और विज्ञान को मिलाने की भावनात्मक कोशिश में लिखते हैं, “ मेरा सबसे प्रिय सृजन, चांदनी की चमक जैसा, एक झूठी चेतावनी की तरह शत्रु के हाथ में सौंप देता है ।“ यह एक खीझ से भरी प्रतिक्रिया जैसी थी । वे अपने साहित्यिक मिजाज को छोड़ नहीं पा रहे थे, इसे उनकी इस बात में देखा जा सकता है जिसमें वे कहते है कि वे “स्प्री नदी के गदले पानी के बगल के बगीचे में पागल की तरह दौड़ रहे थे “, जो हाइने के शब्दों में, “आत्मा को धो देती है और चाय को पतला कर देती है ।“ वे बताते हैं कि कैसे इसके बाद ही वे अपने मकान मालिक के साथ शिकार पर निकल जाते है, ‘दौड़ कर बर्लिन जाते हैं और सड़क किनारे के हर ऐरे-गैरे से लिपट जाना चाहते हैं ’। (देखें, स्टेडमैन जोन्स, वही, पृष्ठ – 61-61)
हेगेल

(क्रमशः)