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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (25)


-अरुण माहेश्वरी

धर्म के प्रति नफरत से विचार के एक नये धरातल तक

यह सच है कि मार्क्स ने धर्म को हमेशा एक भूल, एक भ्रम माना। अपने वैचारिक जीवन का प्रारम्भ उन्होंने धर्म के प्रति सख्त नफरत के साथ किया था। लेकिन उनके विचारों के विकास के क्रम में ही धर्म के प्रति प्रारम्भिक घृणा ने जुगुप्सा का रूप नहीं लिया, जैसाकि अन्य तमाम नास्तिकतावादियों के मामले में दिखाई देता है।

एक वर्गीय समाज के अन्य तमाम पक्षों की तरह ही धर्म भी उनके लिए मानव अस्तित्व के साथ जुड़े एक ठोस यथार्थ के रूप में सामने आया। उन्होंने देखा कि धर्म उत्पीड़ित जनता के जीवन में एक सांत्वना के समान है, एक ऐसी जरूरी सांत्वना जिसके बिना आदमी का अपनी कठिन परिस्थितियों में जीना दूभर हो जायेगा। धर्म का नाश भ्रमों के नाश के लिए, आदमी को ठोस यथार्थ के सम्मुख लाने के लिए करना है लेकिन भ्रमों का नाश उस वक्त तक नहीं किया जा सकता जब तक मानव जीवन की उन परिस्थितियों को नहीं बदला जाता जिन्हें भ्रमों की आवश्यकता होती है।

“मनुष्य से यह मांग करना कि वह अपने जीवन की परिस्थिति के बारे में भ्रमों से मुक्त हो जाय, मनुष्य से ऐसी मांग करने के समान है कि वह ऐसे जीवन की परिस्थिति से मुक्त हो जाए जिसे भ्रमों की जरूरत पड़ती है।'' दुनिया को एक वास्तविक और सच्चा हृदय प्रदान करो, नकली हृदय की जरूरत नहीं रह जायेगी। परिवेश को इस प्रकार बदलो कि उसमें सच्ची आत्मा की प्रतिष्ठा हो तो आपको आत्मा की किसी नकली प्रेत छाया की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।

मार्क्स का धर्म के प्रति यह नजरिया धर्म की प्रशंसा का भाव तो था ही नहीं, लेकिन थोथी आलोचना का भाव भी नहीं था।


मार्क्स अपने बौद्धिक जीवन के कौन से रास्ते से होकर धर्म के बारे में इस प्रकार की एक समग्र समझ तक पहुँचे थे, उस पर यदि हम किंचित विस्तार से गौर करें तो हमारे लिए भी धर्म की आलोचना की मार्क्सवादी दृष्टि को आत्मसात करना आसान होगा। मार्क्स के प्रारंभिक बौद्धिक विकास, बर्लिन विश्वविद्यालय, डाक्टर्स क्लब, यंग हेगेलियन्स के बारे में हम पहले काफी चर्चा कर चुके हैं । फिर भी यहां संक्षेप में उस चर्चा के कुछ बिंदुओं को दोहराना उपयोगी होगा ।

जर्मनी के जिस परिवेश में मार्क्स ने अपने बौद्धिक जीवन का प्रारम्भ किया था उसमें दर्शन-शास्त्रीय प्रश्नों की तरह ही तमाम सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न भी एक प्रकार के धर्मशास्त्रीय चिंतन के दायरे में ही विवेचित होते थे। स्कूली जीवन में ही होमर, शेक्सपियर और विद्रोही चिंतक सेंट साइमन के साहित्य और विचारों से संस्कारित मार्क्स जब विश्वविद्यालय में गये उस समय वे हेगेल के से प्रभावित हुए थे। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, 1831 में हेगेल की मृत्यु तथा 1837 में हेगेलियन चिंतन पद्धति के प्रगतिशील नौजवानों ने मिलकर जिस डाक्टर्स क्लब की स्थापना की उसमें मार्क्स भी एक सक्रिय सदस्य बने।

हेगेल नास्तिक नहीं थे। वे ईसाई धर्म को एक सुसंगत धर्म मानते थे जो दर्शन शास्त्र के प्रश्नों की एक वास्तविक तस्वीर पेश करता है। धर्म और विवेकसंगत दर्शनशास्त्र को वे सारत: एक ही मानते थे। लेकिन हेगेल के बाद हेगेल की यह मान्यता वहां के किसी भी तबके के लिए मान्य नहीं रही। रेशनलिस्ट दर्शनशास्त्रियों ने तो इसे ठुकराया ही, पोप और पादरियों ने भी उनका तिरस्कार किया, क्योंकि हेगेल के लिए बाइबिल की कथाओं का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं था जबकि चर्च की तमाम स्थापनाएं उन्हें ऐतिहासिक सच मानने के विश्वास पर ही टिकी हुई थी। इसी बहस से यंग हेगेलियन्स का नया विद्रोही स्कूल पैदा हुआ। मार्क्स भी इसमें शामिल हुए। उन्हीं दिनों मार्क्स ने कैथोलिक धर्मशास्त्री हर्मेस की खिंचाई करते हुए एक लेख लिखने की योजना बनाई थी क्योंकि हर्मेस ने कांट के दर्शन और कैथोलिक विश्वास के बीच एक सामंजस्य बैठाने की कोशिश की थी।


दरअसल, यंग हेगेलियन्स शुरू में धर्म मात्र को अपने हमले का निशाना नहीं बनाया करते थे। जैसे आज भी अनेक लोग विचार में ही भौतिक प्रगति के गोमुख की तलाश करते हैं, उसी प्रकार वे भी प्रोटेस्टेंट धर्म को दुनिया की प्रगति का कारण समझते थे। लेकिन इन यंग हेगेलियन्स को धर्म के प्रति तमाम भ्रमों से मुक्त कराने में ब्रुनो बावर ने एक बड़ी भूमिका अदा की तथा उनकी संगत से ही मार्क्स भी इस निष्कर्ष पर पहुँच गये थे कि अकादमिक दृष्टि से धर्म महज एक धोखा तथा सामाजिक रूप में एक अवांछित वस्तु है। किसी ईश्वरीय सत्ता के बजाय मनुष्य की आत्म चेतना को दार्शनिक चिंतन के सर्वोच्च स्थान पर रखने की हेगेलीय अवधारणा को मार्क्स ने डॉक्टरेट के लिए तैयार की गयी अपनी थिसिस “डिफरेंस बिट्वीन द डेमोक्रेटियन एण्ड ऐपीक्यूरीयन फिलासाफी ऑफ नेचर'' के प्राक्कथन में प्रोमेथियस की आत्मस्वीकृति को दर्शन के राज के तौर पर उद्धृत करते हुए कहा था “साफ शब्दों में, मैं तमाम ईश्वरों से नफरत करता हूँ।''

मार्क्स के अनुसार प्रोमेथियस की यह आत्म-स्वीकृति है जिसमें स्वर्ग और धरती के ऐसे तमाम भगवानों से नफरत जाहिर की गया है जो मनुष्य की आत्मचेतना को सर्वोच्च दैवी स्थान प्रदान नहीं करते हैं। (MECW, Vol-1 पृष्ठ 30)।


1841 में प्रकाशित मार्क्स के इस कथन में भी सीधे तौर पर धर्म को हमले का निशाना नहीं बनाया गया था। धर्म के प्रति मार्क्स का आक्रोश आगे उस वक्त जाहिर होने लगा जब वे धर्म के तात्विक आलोचक के बजाय सामाजिक आलोचक हो गये ; नास्तिकतावादी हो गये। 1841 में ही उन्होंने बावर के साथ मिलकर बॉन से “एथीस्टिक आरकाइव्ज'' शीर्षक से एक पत्रिका के संपादन की योजना भी बनायी थी। लेकिन जब बावर को उनके नास्तिक और विद्रोही विचारों के कारण बॉन विश्वविद्यालय के प्राइवेट डासेंट ऑफ थियोलाजी के पद से हटा दिया गया तो यह योजना खटाई में पड़ गयी।

आरनोल्ड रूज

इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि फायरबाख से मार्क्स का सबसे पहले साबका धर्म और उससे जुड़े विषयों पर विचार के क्रम में ही पड़ा था। मार्क्स उन दिनों आरनोल्ड रूज द्वारा संपादित विपक्षी विचारों के पत्र “Deutsche Jahrbücher'' में नियमित लिखा करते थे। उन्हीं दिनों रूज के साथ मार्क्स के पत्राचार से पता चलता है कि मार्क्स ने ईसाई कला पर एक लेख लिखा था जो ब्रुनो बावर की एक पुस्तक के दूसरे खंड में प्रकाशित होने वाला था। इस लेख में वे फायरबाख के विचारों से टकराये थे। मार्क्स के शब्दों में “यह टकराहट सिद्धांत को लेकर नहीं बल्कि उसकी अवधारणा के बारे में थी। किसी भी हालत में इससे धर्म को कोई लाभ होने वाला नहीं था''।

फायरबाख से मार्क्स को नास्तिकता की शिक्षा नहीं मिली थी, लेकिन उनके द्वंद्वात्मक सोच को इस प्रकार के विचार अवश्य मिले थे कि ईश्वर एक कोरा धोखा है जिसके जरिये मनुष्य खुद को दैवी सत्ता प्रदान करता है। इस वक्त तक मार्क्स पूरी तरह भौतिकवादी नहीं हुए थे। 1843 के पहले तक दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में मार्क्स फायरबाख के विचारों का प्रयोग नहीं कर पाये थे। एक भौतिकवादी दार्शनिक के रूप में मार्क्स की यात्रा 1843 से शुरू हई और मार्क्स के चिंतन में इस रूपांतरण के साथ ही धर्म के प्रति उनकी आलोचना का पूरा आधार भी बदल गया।

(क्रमशः)