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शनिवार, 5 अगस्त 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (26)


-अरुण माहेश्वरी

मार्क्स और यहूदी प्रश्न

हेगेल के भाववाद से मुक्त भौतिकवादी मार्क्स के लिए धर्म अब झूठ है या सच है की तरह का कोई प्रतिपाद्य विषय नहीं रह गया था। धर्म के झूठे या सच्चे होने के बजाय अब मार्क्स के लिए धर्म की सामाजिक भूमिका प्रमुख हो गयी थी। मार्क्स के दृष्टिकोण में आये इस परिवर्तन में एक संपादक और पत्रकार के रूप में उनके तमाम अनुभवों की काफी अहम भूमिका रही।

8 अक्टूबर 1842 में वे “राइनिश जेइतुंग'' पत्रिका के संपादक बने। इसके पहले तक इस अखबार की स्थिति यह थी कि इस पर यंग हेगेलियन एडगर बावर और “द फ्री'' कहलाने वाले लफ्फाजों ने कब्जा जमा रखा था। मार्क्स इनकी धर्म के विरुद्ध लफ्फाजी की थोथी बहसों को पहचानने लगे थे और उन्हें लगने लगा था कि ये लोग उग्र बातों के आवरण में अपने दर्शन की अस्पष्टता और उसके बेतुकेपन को छिपाने की कोशिश करते हैं।


आरनोल्ड रूज को उन्होंने लिखा “मैं चाहता था कि धर्म की आलोचना राजनीतिक परिस्थिति की आलोचना में अधिक की जानी चाहिए न कि धर्म की आलोचना के अंतर्गत राजनीतिक परिस्थिति की आलोचना। यही दृष्टिकोण किसी भी अखबार की प्रकृति और जनता की शिक्षा के स्तर के लिहाज से अधिक उपयुक्त है, क्योंकि धर्म की स्वयं में कोई अंतर्वस्तु नहीं होती। वह स्वर्ग के बल पर नहीं, बल्कि धरती के बल पर जीवित है तथा उस विकृत यथार्थ की समाप्ति के साथ ही स्वत: गिर जाता है जिस यथार्थ का यह सैद्धांतिक रूप है। अंत में, मैं यह चाहता था कि यदि दर्शन के बारे में बात करनी हो तो “नास्तिकता'' की चिप्पी के साथ छिछोरापन अधिक नहीं होना चाहिए, (यह हमें उन बच्चों की याद दिला देता है जो उन्हें सुनने के लिए तैयार हर किसी को यह कहते रहते हैं कि उन्हें भूत-प्रेत से डर नहीं लगता) बल्कि दर्शन की अंतर्वस्तु को लोगों के सामने लाना चाहिए।“


धर्म के बारे में मार्क्स का यह कथन उनके विचारों में एक बहुत बड़े मोड़ का सूचक था। 1839 से 1843 तक पूरे पांच वर्षों तक धर्म के विषय से लगातार टकराते हुए, एक पत्रकार और संपादक के अनुभवों से मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुँच गये थे कि धर्म की बेसिर-पैर की बातों के तर्कपूर्ण जवाब मात्र से ही समाज को धर्म रूपी बीमारी से मुक्त नहीं कराया जा सकता। धर्म स्वर्ग के बल नहीं, धरती के बल जीवित है और समाज की पार्थिव जरूरतों की पूर्ति करके ही वास्तव में धर्म की जरूरत से मुक्ति पायी जा सकती है।

इन्हीं दिनों लिखी गयी मार्क्स की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति “यहूदी प्रश्न पर'' (On the Jewish Question) का इस संदर्भ में विस्तार से जिक्र करना और भी प्रासंगिक होगा। धर्म और नागरिक जीवन से उसके संबंध के प्रश्न पर मार्क्स के दृष्टिकोण का खुलासा करने वाली यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। मार्क्स ने यह लम्बा लेख ब्रुनो बावर के दो लेखों के जवाब में लिखा था। बावर ने यहूदियों की मुक्ति की समस्या को यहूदी धर्म से उनकी मुक्ति की समस्या बना दिया था। एक भाववादी विचारक के रूप में बावर धार्मिक पूर्वाग्रह से उबरने को ही तमाम राष्ट्रीय अंतर्विरोधों की समाप्ति का निर्णायक उपाय मानते थे। बावर के तर्कों की धज्जियां उड़ाते हुए मार्क्स ने पूरी समस्या पर भौतिकवादी दृष्टि से विचार किया और सिर्फ यहूदियों को नहीं, पूरी मानवता को ही आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक बेड़ियों से आजाद करने की बात की थी।


यहूदी प्रश्न पर बावर की यह मान्यता थी कि यहूदियों की वर्तमान बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार राज्य का ईसाई चरित्र है और उस वक्त तक किसी राज्य को उसके धार्मिक चरित्र से मुक्त नहीं किया जा सकता है जब तक उस राज्य के सभी नागरिक धर्म को त्याग नहीं देते। यहूदी यदि समानता का अधिकार चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी यह है कि पहले वे खुद यहूदी धर्म को त्यागे और उनके साथ ही दूसरे तमाम लोग भी अपने-अपने धर्मों को त्याग दें। धर्म-निरपेक्ष राज्य का समाज भी धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए।

“जर्मनी के यहूदी आजादी चाहते हैं। वे किस प्रकार की आजादी चाहते हैं? नागरिक, राजनीतिक आजादी?“ ब्रुनो उनसे कहते हैं '' जर्मनी में राजनीतिक तौर पर कोई आजाद नहीं है। जब हम खुद ही स्वतंत्र नहीं हैं तो आप कैसे स्वतंत्र होंगे? आप यहूदी यदि यहूदी के नाते अपने लिए किसी प्रकार की विशेष स्वतंत्रता चाहते हैं तो आप अहमवादी हैं।''(MECW, Vol.-3 , page 146)

“यहूदी ईसाई राज्य से मांग करते हैं कि वह अपने धार्मिक पूर्वाग्रह को त्याग दें, तो क्या यहूदी ने अपने धार्मिक पूर्वाग्रह को त्याग दिया है?''

“अपनी प्रकृति से ही ईसाई राज्य यहूदियों को स्वतंत्रता देने में असमर्थ है लेकिन अपनी प्रकृति से यहूदी भी स्वतंत्र नहीं हो सकता। जब तक राज्य ईसाई है तथा यहूदी यहूदी है, एक आजादी देने में असमर्थ है तथा दूसरा उसे हासिल करने में असमर्थ है।''(MECW, Vol.-3 , page 146-147)

ब्रुनो बावर

बावर के इन तमाम तर्कों का हवाला देने के बाद मार्क्स ने अपने लेख में यह सवाल किया था कि “तब बावर के लिए यहूदी समस्या का समाधान क्या है? क्या फल निकला? कहावत है कि प्रश्न उठाना ही समस्या का समाधान होता है। यहूदी प्रश्न की आलोचना ही यहूदी प्रश्न का जवाब है। इसीलिए मुख्तसर में निष्कर्ष यह निकला, दूसरों को आजाद करने के पहले हमें खुद को आजाद करना होगा।“(MECW, Vol.-3 , page 147)

इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए मार्क्स लिखते हैं कि “यदि बावर यहूदियों से पूछते हैं- क्या आपको अपने ही मत के मुताबिक राजनीतिक स्वतंत्रता चाहने का अधिकार है? तो उलट कर हमारा प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक स्वतंत्रता का मत यह अधिकार देता है कि यहूदियों से यहूदी धर्म के खात्मे की मांग की जाय तथा मनुष्य से धर्म के खात्मे की मांग की जाय।''(MECW, Vol.-3 , page 150)

(क्रमशः)