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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

साहित्य के साथ निरामिष घृणा का व्यवहार अनुचित है

- अरुण माहेश्वरी


मैंने हॉसदा सोवेन्द्र शेखर की कहानियों के इस संकलन The Adivasi will not dance की कहानियों को पढ़ा है ।

'They eat meat' इसकी पहली 27 पेज की कहानी है जिसमें साफ-सुथरी प्रवाहमय भाषा में एक आदिवासी अफसर बिराम सोरेन की केंद्र सरकार की नौकरी ( निदेशक, ग्रामीण विद्युत निगम ) में गुजरात के वडोदरा में तबादला होता है । एक कट्टर शाकाहारी शहर में मांसाहारी दंपत्ति का तबादला । फिर भी बिराम की पत्नी पानमुनी झी को वडोदरा अपनी साफ सफाई के कारण ही भाने लगता है । बीच-बीच में उनका पारंपरिक भोजन, सीखी हुई नई-नई रेसिपी की उसे याद भी आती है, लेकिन वहां के सहज-पाच्य निरामिष खाने के साथ सिर्फ साफ-सफाई के अपने संस्कारों की वजह से ही वह निभाती जाती है । घर में चोरी-छिपे कभी-कभी एक अंडा पकाती है, लेकिन इस बात का ख़याल रखते हुए कि उसकी गंध बाहर न जाए क्योंकि दक्षिण भारतीय मकान मालिक की आमिष भोजन के बारे में गुजरातियों के निरामिषपन की वर्जना की वजह से ही ऐसा कुछ न करने सख़्त हिदायत थी ।

इसी बीच 2002 के गोधरा कांड और उसके बाद के दंगें और उनकी कॉलोनी में रह रहे इकलौते मुस्लिम परिवार की स्त्रियों पर हमले के लिये आई दंगाइयों की भीड़ के एक डरावने अनुभव से इस परिवार को गुज़रना पड़ता है । कॉलोनी के लोगों ने, खास कर स्त्रियों ने दंगाइयों का जो हाथ में था उसी से डट कर मुक़ाबला किया और पूरे एक महीने तक पहरेदारी करके उस कालोनी के लोगों ने अपनी कालोनी को दंगाइयों से बचा लिया ।

इस डरावने अनुभव के बाद जो पानमुनी झी पहले वडोदरा की सफाई और गुजराती भोजन को पसंद करने लगी थी, उसे अब भुवनेश्वर के दिनों की आजादी की यादें आने लगती है । 2004 में बिराम का राँची तबादला हो जाता है । पानमुनी झी को लगता है जैसे वह घर वापिस आ गई । कहानी की अंतिम पंक्तियाँ हैं - 'No one minds what we eat here' she would say marinating silver carp with salt and turmeric powder, without a care in the world. 'And we don't mind what others eat.'


इसके बाद शायद कहानी के व्यापक सामाजिक निहितार्थों पर कहने के लिये कुछ नहीं रह जाता । बंदिशों से भरी सभ्यताओं के विकास पर यह एक मार्मिक चोट करने वाली कहानी है । मांस खाने पर मनाही, मनुष्यों की हत्या पर नहीं ।

लेकिन इसी में एक और 25 पृष्ठों की लंबी कहानी हैं - Merely whore । कोयला खान इलाक़े के लक्खीपुर के रेड लाइट इलाक़े में झर्ना दी के कोठे की एक वैश्या सोना पर केंद्रित कहानी । कोयला खानों की खोज से आदिवासियों के जीवन में आए तूफान, दीकुओं(बाहरी लोगों) के प्रवेश के साथ गुँथी हुई इस कहानी में लंबे-लंबे ब्यौरे ऐसे हैं जिन्हें अंग्रेज़ी के किसी भी पौर्न उपन्यास से उठाया हुआ कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा । सोना अपनी मनुष्यता को गँवा कर शुद्ध रंडी बन गई थी, इसे बताने के लिये इतने विस्तार के साथ बार-बार पौर्नोग्राफिक विवरण निहायत अनावश्यक है और कहानी को वस्तुत: पौर्नोग्राफी में बदल देती है ।

संकलन के शीर्षक 'The Adivasi will not Dance' की कहानी विकास के साथ नष्ट हो गयी आदिवासियों के जीवन की अपनी धुन की त्रासदी के बारे में दिया गया एक विस्तृत बयान है । कहानी के अंत में एक थर्मल पावर प्लांट के उद्घाटन के लिये आए राष्ट्रपति जी के सामने गाँव का बुज़ुर्ग और आदिवासियों की नृत्य मंडली का मुखिया कथित विकास के प्रत्येक काम से आदिवासी समाज की बढ़ती हुई दुर्दशा पर एक वक्तव्य के अंत में अपने प्रतिवाद को दर्ज कराते हुए कहता है - 'The Adivasi will not dance' ।

इन तीन कहानियों के ब्यौरों से ही कोई भी सोवेंद्र शेखर की कहानियों की शक्ति और कमज़ोरी, दोनों का एक अनुमान लगा सकता है ।

जो लोग एक प्रकार की नैतिक पुलिसिंग के जरिये कथाकार पर राय देना चाहते हैं, उनका यह सात्विक क्रोध किसी कट्टर निरामिषवादी के अंदर पल रही मानव-विरोधी हत्यारी घृणा की तरह ही है । वे आज के 'नैतिकतावादी' ज़माने में साहित्य में ऐसे मानदंडों के प्रयोग से अपना उल्लू सीधा करने वाले अवसरवादी है । झारखंड में उनकी सरकार है, इसलिये इस संकलन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । जो भी आज साहित्य अकादमी से सोवेंद्र शेखर की कहानियों में अश्लीलता के नाम पर उनके खिलाफ कार्रवाई की पैरवी कर रहे हैं, वे इस कथाकार की लेखनी के दूसरे तमाम शक्तिशाली पक्षों पर पर्दा डालने के भी दोषी हैं । इसमें कोई शक नहीं है कि सोवेंद्र शेखर एक बहुत सशक्त कथाकार है ।

हम यहां वायर का वह लिंक दे रहे है जिसमें कतिपय तत्वों ने सोवेन्द्र से साहित्य अकादमी का अनुमोदन छीन लेने की बात कही है ।

https://thewire.in/167245/jharkhand-hansda-sowvendra-shekhar-book-banned/