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रविवार, 19 नवंबर 2017

यह कैसा गुलामी से मुक्ति का 'फंदा'

-अरुण माहेश्वरी



कल ही ‘लहक’ पत्रिका का नया अंक (अक्तूबर-नवंबर 2017) मिला है । इसमें एक अनोखी टिप्पणी है विजय बहादुर सिंह की । उमाशंकर सिंह परमार की किन्हीं बातों के जवाब में ।

इस टिप्पणी की पहली पंक्ति है - “गुलाम आदमी की सबसे पहली पहचान है आत्म विस्मरण” । और आगे पूरे लेख में आज की पीढ़ी पर पूर्ववर्ती पीढ़ी के लेखकों के अहसानों को गिनाते हुए उन्हें भुलाने या उन पर सवाल उठाने वालों की धृष्ट कृतघ्नता के लिये उन्हें फटकारा गया है ।

अतीत के साथ, पूर्ववर्ती ज्ञान और धर्म को भी अपनी बेड़ियाँ बनाने के बजाय उनसे एक आलोचनात्मक रिश्ता कायम करने की बात तो हमेशा कही जाती रही है । भारतीय योगसाधना में तो चित्त के स्वातंत्र्य की दिशा में बढ़ने के पहले चरण में ही मन को पूर्व प्रभावों से पूरी तरह से रिक्त करके आगे बढ़ने तक के लिये कहा गया है ।

लेकिन विजय बहादुर सिंह ग़ुलामी के बजाय स्वतंत्रता के लिये ही सब भले-बुरे को लाद कर चलने के उपदेश के साथ इस टिप्पणी में एक अजीब से सात्विक रोष से भरे दिखाई देते हैं !

बहरहाल, स्मृतियों के प्रति इस प्रकार के व्यामोह की बातों को भी हम भगवान और भक्त के आदर्श पर चलने का उपदेश देने वालों, गुरुडम का झंडा लहराने वालों से बार-बार सुनने के अभ्यस्त हैं और जिसे हमने विजय बहादुर सिंह की टिप्पणी का अनोखापन कहा है, वह ‘अनोखापन’ इस बात में निहित नहीं है ।

विजय बहादुर ने अपने इस लेख में एक ऐसी अद्भुत, मौलिक बात कही है जिसे हमने आज तक कभी न कहीं सुनी और न किसी जगह देखी है । वह बात है कार्ल मार्क्स के बारे में ।

पिछले काफी दिनों से हम मार्क्स की एक जीवनी लिखने की कोशिश कर रहे हैं, जो काम के दूसरे दबावों के चलते बार-बार अटक जा रहा है । इसके चलते हमने मार्क्स के लेखन के अलावा उनकी करीब पाँच काफी विस्तार से लिखी गई जीवनियों को इकट्ठा किया है और उनके समकालीनों के संस्मरणों से भी गुज़र चुका हूँ ।

आज तक एक भी जीवनी में हमने यह नहीं पढ़ा है कि मार्क्स नियमित चर्च जाया करते थे और उम्र की आख़िरी घड़ी तक जाते रहे थे । लेकिन विजय बहादुर सिंह ने प्रश्न की शक्ल में यह महान खोज की है कि - “मार्क्स किस वास्ते अन्तिम दिन तक चर्च जाते रहे, क्या कमी उन्हें अखरती रही, इसका समाधान कौन करेगा ? “

कहना न होगा, इसी प्रकार की उल-जलूल मनमानी बातों का पिटारा है उनकी यह टिप्पणी जिसका एक मात्र उद्देश्य हिंदी के नौजवान लेखकों तक इस संदेश को प्रेषित करना है कि तमाम धर्माधिकारियों, मठाधीशों और सत्ताधारियों की एहसानों के तले दबे रहो, उनकी पूजा-अर्चना में जुटे रहो, उसी में तुम्हारी मुक्ति है । उनकी अवज्ञा करके, उनके दिये को और आज भी उनके द्वारा किये जा रहे उपकारों को विस्मृत करके या अस्वीकार करके सिर्फ तुम अपनी ग़ुलामी के अलावा और कुछ हासिल नहीं करोगे !

इसे क्या कहेंगे ?