शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

बंगाल के इतिहास का पुनर्लेखन या इतिहास का राजनीतिक पुनरुत्पादन?

 

−अरुण माहेश्वरी 



अब बीजेपी के सत्ता पर आने के साथ ही लगता है बंगाल के इतिहास लेखन की नई शैली आकार लेना चाहती है।

यहां हमारा संकेत हितेन्द्र पटेल जी की 3 जुलाई की एक फेसबुक पोस्ट की ओर है । इसमें वे इतिहास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति न्याय करने के लिए एक पूरी बुकलेट लिखने की घोषणा करते हैं । हितेंद्र जी की परियोजना को हम यदि सिर्फ किसी अवसरवादी समायोजन के खाते में डालने के बजाय गंभीरता से लें, तो इस पर इतिहास लेखन संबंधी एक अन्य प्रकार की गंभीर अकादमिक चर्चा की जा सकती है ।

वे कहते हैं कि अब तक “मार्क्सवादी”, “कैम्ब्रिज”, “एलीट” इतिहासकारों ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि की उपेक्षा की । 

इतिहास में किसी का उपेक्षित रह जाना कोई नई बात नहीं है । वास्तव में कुछ अर्थ में किसी का वहां न होना ही इतिहास का होना भी होता है । पूर्ण इतिहास तो यूं भी इतिहास की ‘पूर्ण गति’ के समान होता है!

बहरहाल, सवाल यह है कि अब तक के इतिहास को ‘एलीट’ का धोखा बता कर उपेक्षित तथ्यों को सामने लाने का दावा क्या सिर्फ उपेक्षित के प्रति न्याय तक ही सीमित है या न्याय के नाम पर इसमें इतिहास की खुली दरारों को किसी नए खास प्रकार के आख्यान से पाटने की परियोजना भी है; अर्थात् उपेक्षित के पुनरुद्धार के नाम पर अतीत के किसी वृत्तांत को एक नई विचारधारा के अनुरूप तैयार करने की कोशिश तो नहीं है!

हम सारी दुनिया में दक्षिणपंथ की तमाम वैचारिक मुहिम को न्याय करने के नारों की ओट में ही ऐसे ही काम करते हुए देख सकते हैं। 

ट्रंप का ‘मागा’ (make America great again) अमेरिकी ‘एलीट’ से लड़ते हुए गाजा के ध्वंस-स्तूप पर एक और ‘एलीट’ के लिये ही पर्यटन केंद्र बनाने और ‘आतंकवादी’ ईरान के विध्वंस से धनाढ्य विस्तारवादी यहूदियों के ग्रेटर इज़रायल के निर्माण की घोषणाएँ कर रहा है।

इतिहास के उपेक्षित तथ्यों को सामने लाना तभी एक विश्लेषणात्मक कर्म है जब वे इतिहास की दरारों को और चौड़ा करें ताकि उसके सामाजिक सत्य पर रोशनी गिरे। लेकिन जब उन्हीं तथ्यों को किसी नए राजनीतिक प्रभुत्व के ज्ञान-तंत्र में व्यवस्थित कर बांधा जाता है, तब वह विश्लेषण नहीं, एक नया विश्वविद्यालयी विमर्श कहलाता है । इतिहास किसी प्रश्न के बजाय नए प्रभुओं को ज्ञान की वैधता देने का पाठ्यक्रम बन जाता है।

अब हम आते हैं हितेंद्र पटेल जी के विषय पर । उनका विषय है बंगाल के राष्ट्रवाद का इतिहास और उसमें हिंदुत्व या श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्थान।

सब जानते हैं कि उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक बंगाली राष्ट्रवाद पर हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का गहरा प्रभाव था। बंकिम, विवेकानंद, अरविन्द, बिपिन पाल और रवीन्द्रनाथ भी — इन सबके यहाँ हिंदू सांस्कृतिक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं । पर जो नोट करने की बात है कि इनमें से किसी की राजनीतिक कल्पना धार्मिक राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना की नहीं थी।

इसके विपरीत जहां तक हिंदू महासभा और हिंदुत्व का सवाल है, वे एक अलग, शुद्ध राजनीतिक परियोजना है जिसका विकास विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ।

इसीलिए यह निष्कर्ष सही नहीं है कि बंगाली राष्ट्रवाद में हिंदुत्व के तत्व हिंदू महासभा के हिंदुत्व के पूर्वरूप थे । इन दोनों को एक ही ऐतिहासिक धारा में मिलाना न सिर्फ इतिहास का सरलीकरणवादी है, बल्कि बंगाली राष्ट्रवाद में मौजूद हिंदू सांस्कृतिक तत्त्वों से हिंदुत्व के धार्मिक राष्ट्र-राज्य की प्रतिस्थापना की वैसी ही कोशिश है जिसे हमने ऊपर न्याय के नाम पर पुराने औजारों से ही किसी ‘नए विश्वविद्यालयी विमर्श की प्रतिस्थापना’ कहा है । 

अब विशेष रूप से श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिया जाए । वे एक गंभीर शिक्षाविद् थे और उन्होंने एक समय बंगाल के हिंदुओं की आशंकाओं को भी उठाया था । 1947 के बंगाल विभाजन में उन्होंने हिंदू-बहुल क्षेत्र को भारत में रखने की मांग का साथ दिया था । यह इतिहास का तथ्य है और इसे दर्ज जरूर किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने अंततः हिंदू महासभा का राजनीतिक मंच स्वीकार किया। इसलिए उनकी ऐतिहासिक भूमिका का आकलन केवल उनकी आशंकाओं से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक विकल्पों से भी होगा।

इतिहास किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक विकल्पों से करता है जिन्हें उसने उन परिस्थितियों में चुना।

इसी प्रकार, ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और राज करो” की नीति एक ऐतिहासिक तथ्य है । पर इसी से बंगाल के सारे सामाजिक अंतर्विरोधों की पर्याप्त व्याख्या नहीं मिलती । मुस्लिम किसानों की आर्थिक शिकायतें और आकांक्षाएँ, जातिगत असमानताएँ, नमशूद्र राजनीति का उदय और भद्रलोक समाज का वर्चस्व, इन सबको केवल औपनिवेशिक षड्यंत्र का परिणाम मान लेना इतिहास की आंतरिक जटिलताओं से आँख मूँद लेना है । प्रो. सुशोभन सरकार आदि के बंगाल रिनैसां संबंधी कामों में इन पहलुओं पर काफी प्रकाश डाला गया है जो इतिहास की ऐसी दरारों को खोलते हैं जिनसे उससे जुड़ा सामाजिक सत्य प्रकाश में आता है । तभी इतिहास समाज के गतिशील वर्गीय अन्तर्विरोधों के अध्ययन का सजीव स्रोत बनता है । 

दरार किसी पाठ की कमी नहीं होती । यह वह स्थान है जहाँ कोई वैचारिक रूप अपने ही सामाजिक आधार को पूरी तरह ढँक नहीं पाता। इतिहासकार उसी असंगति को बड़ा करता है। 

हितेंद्र जी ने प्रो.सव्यसाची भट्टाचार्य का खास ज़िक्र किया है। यह सच है कि प्रो. भट्टाचार्य ने बंगाल के इतिहास के कुछ ऐसे प्रसंगों को भी दर्ज किया जिन्हें आसानी से छोड़ा जा सकता था। उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सांप्रदायिक तनाव और बंगाल के हिंदू समाज की आशंकाओं को भी इतिहास का हिस्सा माना। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि उन्होंने इन तथ्यों से हिंदुत्व का कभी कोई वैचारिक आख्यान निर्मित नहीं किया। 

लकान के यहाँ विश्लेषक (Analyst) कभी नया गुरु नहीं बनता। वह विश्लेष्य को कोई नया अंतिम सत्य नहीं देता। कोई वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत नहीं करता। इतिहास की प्रगति किसी आख्यान के पूर्ण होने से नहीं, बल्कि समाज के अन्तर्विरोधों के उद्घाटन से होती है । 

प्रचारक पहले कहता है कि पुराने इतिहासकारों ने दरार छिपा दी थी। फिर उसी दरार पर अपने राजनीतिक आख्यान का नया प्लास्टर चढ़ा देता है। इस प्रकार पुराना आवरण हटता है, पर उसकी जगह नया आवरण आ जाता है। 

नए इतिहास-लेखन की बड़ी विशेषता यह नहीं होती कि वह नए तथ्य खोजती है। नए तथ्य तो हर पीढ़ी खोजती है। जो इतिहासकार उसकी जटिलता को बचाते हैं, वे इतिहास को समृद्ध करते हैं; और जो उसे एक वैचारिक आख्यान में समेटना चाहते हैं, वे चाहे कितने ही नए तथ्य क्यों न प्रस्तुत करें, अंततः इतिहास नहीं, स्मृति-राजनीति (politics of memory) का लेखन करते हैं। 

कुल मिला कर इतिहास का विश्लेषक उसकी दरारों को चौड़ा करता है; इतिहास का प्रचारक उन्हें अपने नए प्रभुत्व के गारे से भर देता है। 

अब जब हम स्मृति-राजनीति (politics of memory) की बात कर रहे हैं, हितेंद्र जी के द्वारा गुरुदत्त के उपन्यासों का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है । गुरुदत्त हिंदुत्ववादी वैचारिक पृष्ठभूमि के एक लोकप्रिय उपन्यासकार थे। उनके उपन्यास स्वतंत्रता, विभाजन और हिंदू समाज की कुछ खास प्रकार की स्मृतियों का लेखन है । उन्हें किसी मानसिक संसार को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत कहेंगे । लेकिन वे इतिहास के प्राथमिक स्रोत नहीं हैं।

साहित्य इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, इतिहास की चेतना का दस्तावेज़ होता है। यदि उपन्यासों को अभिलेखीय प्रमाणों के समकक्ष रख दिया जाए, तो इतिहास और साहित्य दोनों की प्रकृति विकृत हो जाती है। 

इतिहासकार का काम किसी दल की ओर से मुकदमा लड़ना नहीं है। लकान की भाषा में कहें तो विश्लेषक S₁ (मास्टर-संकेतक) का उत्पादक नहीं होता। वह उस स्थान को सक्रिय करता है जहाँ $ (विभाजित प्रमाता) (barred subject) अपने सत्य के साथ उपस्थित हो सकता है। 

अंत में हम यही कहेंगें कि इतिहास का विषय वैचारिक आकृतियाँ नहीं, उन आकृतियों को जन्म देने वाले सामाजिक अन्तर्विरोध हैं। राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और सांस्कृतिक पहचान इतिहास की गतिशील शक्तियाँ नहीं, बल्कि उन शक्तियों के वैचारिक रूप हैं। इतिहासकार यदि इन्हीं रूपों को विश्लेषण की अंतिम इकाई मान ले, तो वह स्वयं विचारधारा के भीतर काम करने लगता है। इतिहास का काम इन वैचारिक रूपों के आवरण को काटकर उन सामाजिक अन्तर्विरोधों को दृश्य बनाना है जिनकी वास्तविक गति इन रूपों के भीतर छिप जाती है।




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